अर्थव्यवस्था- प्रमुख विशेषताएं
- अर्थशास्त्र एक ऐसा तंत्र है जिसके अन्तर्गत विभिन्न आर्थिक क्रियाओं, संस्थागत क्रियाओं एवं उसके क्रियात्मक संबंधों का अध्ययन किया जाता है। सामान्य शब्दों में यह अर्थ/वित्त/धन की प्राप्ति से संबंधित मानवीय क्रियाओं के अध्ययन से संबंधित है।
- आर्थिक क्रियाओं के अंतर्गत उत्पादन उपभोग, विनिमय, वितरण, बचत, निवेश शामिल है।
- अर्थव्यवस्था अर्थशास्त्र का व्यावहारिक पक्ष है।
अर्थव्यवस्था के प्रकार
1. बंद अर्थव्यवस्थाः बंद अर्थव्यवस्था के अंतर्गत एक अर्थव्यवस्था शेष विश्व के साथ किसी प्रकार की विदेशी व्यापार की क्रिया संपन्न नहीं करता है। इसकी सभी आर्थिक क्रियायें एक देश की सीमा के भीतर ही होती है।
2. खुली अर्थव्यवस्थाः यह बंद अर्थव्यवस्था के विपरीत नियंत्रण मुक्त अर्थव्यवस्था है, जो प्रतियोगिता को प्रोत्साहित करता है। यह अन्य अथव्यवस्थाओं के साथ निकटम संबंध, सहयोग एवं संलग्नता पर बल देता है। वर्तमान में वैश्वीकरण की नीति में सभी देश अब मुक्त अर्थव्यवस्था को अपना रहे हैं।
3. विकसित अर्थव्यवस्थाः यह आर्थिक गतिविधियों एवं विकास के एक बेहतर स्तर का प्रतिनिधित्व करता है। यह हमेशा सापेक्षिक एवं तुलनात्मक संदर्भ में प्रयुक्त होता है क्याकि इसकी किसी सीमा/स्तर/मानदण्ड का निर्धारण कठिन है। उदाहरण के रूप में यू.एस.ए. जापान, पश्चिमी यूरोप जैसे देशों की प्रतिव्यक्ति आय अथवा बेहतर जीवन के आधार पर विकसित देश कहा जा सकता है।
4. विकासशील अर्थव्यवस्था: यह विकास की ओर अग्रसर अर्थव्यवस्था का सूचक है। वैसे विश्व की सभी अर्थव्यवस्था इस श्रेणी में आती हैं परंतु इसका प्रयोग वैसी अर्थव्यवस्था को सूचित करने के लिये होता है जो पिछड़ी अवस्था से उच्च विकास की ओर प्रयासरत हैं। उदाहरण के रूप में भारत, चीन, ब्राजील आदि विकास की ओर अग्रसर हैं।
5. योजनाबद्ध अर्थव्यवस्थाः यह अर्थव्यवस्था के विकास की एक सुविचारित रणनीति है। यह नियोजित रूप में अर्थव्यवस्था के विकास की दिशा को निर्धारित करता है। इसके अंतर्गत अल्प, मध्य एवं दीर्घ अवधि की योजना हो सकती है। इसमें राज्य की केन्द्रीय भूमिका होती है। इसका उदाहरण मुख्यतः समाजवादी अर्थव्यवस्थाओं में देखा जा सकता है।
6. गैर योजनाबद्ध अर्थव्यवस्थाः जिस अर्थव्यवस्था के विकास के लिये कोई योजना नहीं बनायी जाती वह गैर योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था के अंतर्गत आता है। वर्तमान में विश्व में कोई भी ऐसा देश नहीं है जो योजना की रणनीति न अपनाता हो।
7. पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाः इसमें आर्थिक साधनों पर निजी स्वामित्व होता है। इसके अंतर्गत सरकार आर्थिक साधनों के संगठन में अहस्तक्षेप की नीति अपनाती है। यह बाजार की शक्तियों अर्थात मांग और आपूर्ति के सिद्धातों के अंतर्गत स्वतंत्र रूप से कार्य करती है। इसे बाजार अर्थव्यवस्था के रूप में जाना जाता है।
8. समाजवादी अर्थव्यवस्थाः यह कार्ल मार्क्स के विचारों पर आधारित वैसी ब्यवस्था का प्रतिपादन करता है जिसके अंतर्गत उत्पादन के समस्त साधनों पर राज्य/सरकार/समुदाय का नियंत्रण होता है जैसे पूर्व सोवियत अथव्यवस्था।
9. मिश्रित अर्थव्यवस्थाः यह पंूजीबादी एवं समाजवादी अर्थव्यवस्था के तत्वों का श्रेष्ठ समायोजन है। इसके अंतर्गत आर्थिक
संसाधनों के महत्वपूर्ण भाग पर सरकार अथवा राज्य का निंयत्रण होता है। साथ ही निजी क्षेत्र के विकास का भी उपयुक्त अवसर प्राप्त होता है। इसका व्यवहारिक रूप संयुक्त उपक्रमों के अंतर्गत दृष्टिगोचर होता है। भारतीय अर्थव्यवस्था इसका उदाहरण है।
10. आश्रित अर्थव्यवस्थाः वैसी अर्थव्यवस्था जो अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिये दूसरी अर्थव्यवस्था पर आधारित हो। वर्तमान भूमण्डलीकरण के युग में सभी अर्थव्यवस्था आश्रित अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर हैं। वर्तमान में नेपाल, भूटान आदि अल्पविकसित देश इस प्रकार की अर्थव्यवस्था के उदाहरण हैं।
11. आत्मपूरक अर्थव्यवस्थाः वैसी अर्थव्यवस्था जिसके अंतर्गत अपनी आवश्यकता के अनुरूप सभी वस्तुओं के उत्पादन की क्षमता विद्यमान है। वर्तमान ऐसी अर्थव्यवस्था कोई नहीं है।
अर्थव्यवस्था के क्षेत्र
सामान्यतः संपूर्ण अर्थव्यवस्था की आर्थिक गतिविधियों को लेख्ंााकित करने के लिये तीन क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है-
1. प्राथमिक क्षेत्र: इसके अंतर्गत निम्न क्षेत्रों को सम्मिलित किया जाता है-
- कृषि
- वानिकी
- मत्स्यन (मछली पकड़ना)
- खनन (उध्र्वाधर खुदाई) एवं उत्खनन (क्षैतिज खुदाई)
वस्तुतः इसके अंतर्गत अर्थव्यवस्था के प्राकृतिक क्षेत्रों का लेखांकन किया जाता है।
2. द्वितीयक क्षेत्रः इसके अंतर्गत -
1. निर्माण: जहां किसी स्थायी परिसम्पत्ति का निर्माण किया जाये - जैसे भवन।
2. विनिर्माण: जहां किसी वस्तु का उत्पादन हो जैसे-कपड़ा, ब्रेड आदि।
3. विद्युत, गैस एवं जलापूर्ति इत्यादि से संबंधित कार्य आते है। इस क्षेत्रक के अन्तर्गत मुख्यतः अर्थव्यवस्था की विनिर्मित वस्तुओं के उत्पादन का लेखांकन किया जाता है।
3. तृतीयक या सेवा क्षेत्र यह क्षेत्र अर्थव्यवस्था के प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रक को अपनी उपयोगी सेवायें प्रदान करता है। इसके अंतर्गतः--
- परिवहन एवं संचार,
- बैकिंग
- बीमा
- भण्डारण
- व्यापार
- सामुदायिक सेवायें आदि
- इसके अतिरिक्त अर्थव्यवस्था को कई अन्य आधारों पर भी विभाजित किया जाता है। इसे निम्न प्रकार से रेखांकित किया जा सकता है-
- वस्तु क्षेत्रक: प्राथमिक क्षेत्रक और द्वितीयक क्षेत्रक को सम्मिलित रूप में वस्तु क्षेत्रक कहा जाता है। इसके अन्तर्गत भौतिक वस्तुओं के उत्पादन को शामिल किया जाता है।
- गैर वस्तु क्षेत्रक: किसी अर्थव्यवस्था के सेवा क्षेत्रक को गैर वस्तु क्षेत्रक भी कहा जाता है।
- संगठित क्षेत्रक: इसके अंतर्गत वे सभी ईकाईया आ जाती हैं जो अपने आर्थिक कार्यकलापों के नियमित लेखांकन करती हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था में लगभग 9ः इस क्षेत्र से है।
- असंगठित क्षेत्र: इसके अंतर्गत सभी इकाइयां आ जाती हैं जो अपने आर्थिक कार्यकलापों का कोई लेखा जोखा नहीं रखती हैं। जैसे-रेहड़ी, खोमचे, सच्ची की खुदरा दुकानें, दैनिक मजदूर आदि। भारतीय अर्थव्यवस्था इसका लगभग 91ः भाग है।
अल्प विकास बनाम विकास
- विश्व की विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं की जानकारी प्राप्त करने हेतु अर्थशास्त्रियों ने विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं की तुलना करके उन्हें अल्पविकसित और विकसित अर्थव्यवस्थाओं में विभाजित किया है। अतः यह एक सापेक्ष शब्द है।
- पूर्व में प्रचलित शब्द पिछड़े और उन्नत के स्थान पर विकासशील और विकसित शब्दों के व्यवहार को श्रेयस्कर समझा जा रहा है। क्योंकि अल्पविकसित शष्य एक स्थिति का सूचक है जबकि विकासशील अर्थव्यवस्था में संभावना पर बल दिया जा रहा है। उदाहरण के लिये भारतीय एवं चीनी अर्थव्यवस्थाओं को अल्पविकसित कहना सही नहीं होगा क्योंकि ये दोनों तीव्रता से विकास कर रही हैं।
- संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रकाशनों में अल्पविकसित देशों को विकासशील अर्थवस्थाओं के रूप में परिभाषित किया गया है।
- विश्व बैंक ने विश्व विकास रिपोर्ट 2008 में प्रति व्यक्ति कुल राष्ट्रीय आय के आधार पर विभिन्न देशों का वर्गीकरण किया है। विश्व के देश तीन भागों में बाटे गये हैं-
(1) निम्न आय वाले देश जिनकी प्रति व्यक्ति आय 906 डाॅलर से कम है।
(2) मध्यम आय वाले देश जिनकी प्रति व्यक्तिं आय 906 डाॅलर से 11,115 डाॅलर की अभिसीमा के बीच है।
अल्प विकास के सूचक
- संयुक्त राष्ट्र संघ ने अल्प विकास के सूचक के रूप में निम्न प्रति व्यक्ति आय को मानक के रूप में स्वीकार किया है।
- इसके अनुसार जिनकी प्रति व्यक्ति वास्तविक आय संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, पश्चिमी यूरोप की तुलना में कम है वे अल्पविकसित देश हैं।
- यद्यपि सभी उच्च आय वाले देश अनिवार्यत: विकसित नहीं कहे जा सकते जैसे, तेल निर्यातक देश। वस्तुत: तेल निर्यातक देशो में आर्थिक संवृद्धि के साथ आधुनिकीकरण के तत्व जैसे औद्योगिक संरचना में बदलाव नही आया है एवं आय का बढ़ना सिर्फ तेल की कीमतों पर निर्भर करता है।
- अर्थशास्त्री गरीबी, आर्थिक असमानता और बेरोजगारी को इसके सूचक के रूप में स्वीकार करते हैं। इनके अनुसार विकास इन समस्याओं के निवारण की एक प्रक्रिया है।
अल्पविकास की विशेषताएं
- निम्न प्रति व्यक्ति आय एवं गरीबी: अल्पविकसित देशों के प्रति व्यक्ति आय काफी कम है एवं गरीबी का प्रसार काफी है। जैसे 2006 में भारत में प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय उत्पाद 820 डाॅलर था एवं जनसंख्या का लगभग 34. 3 प्रतिशत भाग अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा ( 1 डाॅलर प्रतिदिन आय ) के नीचे था।
- पूंजी का अभाव: अधिकता अल्पविकसित देशों में गरीबी के कारण पूंजी निर्माण की दर बहुत कम है। जब आय स्तर अधिक होता है तो बचत करने की क्षमता भी अधिक होती है। अल्पविकासित देशों में केवल चीन ही ऐसा देश है जिसमें बचत दर बहुत अधिक है तथा 40 प्रतिशत (राष्ट्रीय आय के अनुपात में ) के स्तर पर सतत रूप में टिकी हुई है।
- जनसंख्या का भार: अल्पविकसित देशों में तीव्र जनसंख्या वृद्धि दर (2 से 4 प्रतिशत वार्षिक ) एवं स्वास्थ्य सुविधाओं की बढ़ती उपलब्धता तथा गिरती मृत्यु दर के कारण जनसंख्या अधिक्य की स्थिति दिखायी देती है। अत: ऐसी स्थिति में 0 - 15 और 64 वर्ष से अधिक की आश्रित जनसंख्या देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ होती है। इस तरह इन देशों. में बचत कम रह जाती है अत: विकास हेतु निवेश कठिन हो जाता है।
विकसित तथा विकासशीत देशों में कृषि
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देश
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कृषि में लगी र्कायशील
जनसंख्या का प्रतिशत
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सकल घरेलू उत्पाद में
कृषि का प्रतिशत
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विकसित देश
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2%
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1%
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. इगंलैड
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3%
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1%
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. संयुक्त राज्य अमेरिका
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7%
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2%
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. जापान
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63%
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18%
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अल्पविकसित देश
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. भारत
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63%
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18%
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. चीन
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61%
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12%
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. बांग्लादेश
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65%
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20%
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- कृषि पर निर्भरता: अल्पविकसित देशों में 70 से 90 प्रतिशत तक जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। कृषि पर अत्प्धिक निर्भरता होने के बावजूद भी कृषि विकास का स्तर नीचा ही होता है। फलत: कृषि क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली आय इस व्यवसाय में लगी हुई जनसंख्या के अनुपात में नीची होती है। इसके साथ ही अल्पविकसित देशों में अक्सर खेतों की छोटी-छोटी जीतें, कृषि में दूनी का अल्प निवेश, खेती की पिछड़ी हुई रीतियां, कृषकों की ऋणग्रस्तता और उनमें कृषि के प्रति लगाव जैसे स्वरूप भी पाया जाता है।
- औद्योगिक पिछड़ापन: अल्पविकसित देशों में उद्योगों की कम संख्या, ळक्च् में कम सहभागिता, पिछड़ा औद्योगिक ढांचा, पुरानी पद्धति के लघु एवं कुटीर उद्योग आदि पाये जाते हैं। इन देशों में बुनियादी एवं भारी उद्योग हैं। जैसे लोहा और इस्पात, भारी इंजीनियरिंग, रसायन, परिवहन आदि अपेक्षाकृत कम कुशल एवं वैश्विक प्रत्पिोगिता में पिछडते हुए दिखाई पड़ते हैं।
- श्रम उत्पादकता का नीचा स्तर: अल्पविकसित देशों में श्रम उत्पादकता बहुत कम है। यहां श्रम उत्पादकता का तात्प्र्य कार्य में लगे हुये व्यक्ति द्वारा किये गये कार्य के सापेक्ष हुये उत्पादन की मात्रा से है। इस कारण आय का स्तर नीचा रहता है और यह गरीबी को जन्म देता है। श्रम उत्पादकता निम्न कारकों पर निर्भर करती है-
1. श्रमिक स्वास्थ्य
2. श्रमिक कौशल
3. आगतों की उपलब्धता
4. संस्थागत ढांचा
5. काम करने की प्रेरणा
- तकनीकी पिछड़ापन: अल्पविकसित देशों में उत्पादन संबंधी तकनीक पिछड़ी हुई है। प्राय: इसका कारण अज्ञानता समझा जाता है। यद्यपि वास्तविकता यह है कि पूंजी के अभाव और श्रम की अधिकता के कारण नयी तकनीकों का प्रयोग प्रचलित नहीं है, जबकि पश्चिमी देश इसे आसानी से अपना लेते है।
- बेरोजगारी: अल्पविकसित देशों में बेरोजगारी के विभिन्न स्वरूप दिखायी देते हैं। श्रमिकों की उपलब्धता के बाद भी रोजगार के अवसरों की उपलब्धता नहीं है। कई बार श्रमिकों को उनकी योग्यता से कम पर कार्य मिलता है। कृषि जैसे क्षेत्र में आवश्यकता से अधिक लोगों का संलिप्त होना प्रच्छन बेरोजगारी पैदा करता है।
- द्वैतवादी व्यवस्था: इन देशों में परम्परागत क्षेत्र (प्राथमिक ) एवं आधुनिक क्षेत्र (द्वितीयक एवं तृतीयक ) साथ-साथ पाये जाते हैं। परम्परागत क्षेत्र में न्यूनतम आवश्यकता के कारण प्रेरणा एवं उद्यमिता का अभाव होता है। इसके साथ ही आधुनिक क्षेत्र में पूंजी, तकनीक एवं कौशल के अभाव में विकास की गुंजाइश नही रहती है। अत: इन देशों में अधिकाधिक जनसंख्या कृषि में लगी रहती है।
- मानव कल्यााण की नीचा स्तर: अल्पविकसित देशों में मानव कल्याण का स्तर काफी नीचा देखा गया है। किसी देश में मानव कल्याण के तीन सूचक होते हैं- -
1. वास्तविक प्रति व्यक्ति आय: इन देशो की प्रति व्यक्ति आय का स्तर निम्न होता है। परिणामस्व: न्यूनतम आवश्यकताओं जैसे तक इनकी पहुंच कम होती है।
2. स्वास्थ्य: 2005 में विश्व बैंक के अनुसार जहां अल्पविकसित देशों में जन्म के समय जीवन प्रत्याशा 66.1 वर्ष थी वहीं विकसित देशों में 78ण्3 वर्ष थी। साथ ही विकसित देशों में बाल मृत्युदर 6 प्रति हजार थी वहीं अल्पविकसित देशों में 61 प्रति हजार थी।
3. शिक्षा: 2005 में अल्पविकसित देशों में महिला निरक्षरता 48 एवं पुरूष निरक्षरता 30 प्रतिशत थी वहीं विकसित देशों में दोनों ही वर्गो में यह 2 प्रतिशत थी।
- आर्थिक असमानताएं: विकसित देशों में की तुलना में अल्पविकसित देशों में आय और सम्पत्ति के वितरण में असमानताएं अधिक होती हैं। वस्तुतः विकसित देशों में कराधान की प्रगतिशील प्रणाली, सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था, शिक्षा व प्रशिक्षण और रोजगार की दृष्टि से समान अवसरों के कारण आर्थिक असमानताएं कम हुई हैं, वहीं अल्पविकसित देशों में व्यापक सामाजिक विषमता तथा बेरोजगारी ब्याप्त है।
अल्पविकसित अर्थव्यवस्था के रूप में भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताए
- निम्न प्रति व्यक्ति आय: विश्व बैंक एवं संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार अल्पविकसित देशों की पहली विशेषता उसकी निम्न प्रतिव्यक्ति आय होती है। अल्पविकसित देशों की भांति भारत की भी प्रतिव्यक्ति आय निन्म है (2006 में 820 डाॅलर )। हाॅलाकि 1990 -2006 के मध्य विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत में प्रतिव्यक्ति आय में सापेक्षत तेजी से वृद्धि हुई है (क्रयशक्ति समता के आधार पर )। फिर भी प्रतिव्यक्ति आय का स्तर अभी भी विकसित देशों के सापेक्ष कम है।
- भारत में उत्पादन का ढांचा प्राथमिक क्षेत्र से संबद्ध है। इसमें लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्या कृषि क्षेत्र में संलग्न है तथा इसका राष्ट्रीय आय में योगदान 185 प्रतिशत है। प्रत्येक 10 रोजगार प्राप्त व्यक्तियों में 6 कृषि में संलग्न हैं।
- बढ़ता जनसंख्या दबाव एक प्रमुख समस्या है। भारत विश्व में दूसरा सबसे बड़ा जनसंख्या वाला देश है। 1991 -2001 के बीच दशकीय वृद्धि दर 193 रही। अतः बढती आश्रित जनसंख्या हेतु भोजन, शिक्षा वस्त्र, औषधि आदि की मांग में तीव्रता से वृद्धि हो रही है। इससे संसाधनों का उपयोग उत्पादक कार्यों के बजाय अनुत्पादक कार्यों में बढ़ रहा है। यह बढ़ती जनसंख्या बेरोजगारी की समस्या को बढ़ा रही है। 11 वीं योजना में 65 करोड़ नये बेरोजगार तैयार होने की संभावना है।
- भारतीय अर्थव्यवस्थापूंजी के अभाव से ग्रस्त है। यह दो रूपों मे प्रकट होती है--
1. प्रतिव्यक्ति उपलब्ध पूंजी की निम्न मात्रा
2. पूंजी-निर्माण की प्रचालित निम्न दर
कुछ देशों में बिजली का प्रतिव्यक्ति उपयोग (2016)
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देशों
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बिजली का प्रतिव्यक्ति उपयोग (किलोवाट- घंटे)
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संयुक्त राज्य अमेरिका
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1683
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चीन
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458
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भारत
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101
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- विभिन्न देशों में विकास के सूचकांक के रूप में बिजली का प्रति व्यक्ति उपभोग मानक के रूप में स्वीकार किया जाता है। विकास की प्रक्रिया में प्रति व्यक्ति आय बढ़ने के साथ व्यक्ति वस्तुओं एवं सेवाओं की मांग बढ़ा देता है और इसे मापने का बेहतर सूचकांक प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत है जो विकसित एवं विकासशील देश के जीवन स्तर में तुलनात्मक स्तर को प्रदर्शित करता है। उपर्युक्त आॅकडे यह दर्शाते हैं कि उन्नत देशों की तुलना में भारत में बिजली का प्रति व्यक्ति उपभोग बहुत ही कम है।
- परिसम्पतियों का दोषपूर्ण वितरण: भारत में परिवारों के बीच परिसम्पतियों के वितरण में ब्यापक असमानता है। इसे हम रिजर्व बैंक के निम्न सर्वेक्षण द्वारा देख सकते हैं-
मानव पूंजी का निम्न स्तर
- भारत में मानव पूंजी का स्तर निम्न पाया गया है। मानवीय पूंजी के आधार पर लगभग 35 प्रतिशत लोग अशिक्षित हैं। इसमें महिलाओं को निरक्षता उनकी कुल जनसंख्या का 47 प्रतिशत है।
विश्व में भारत
1. विश्व में जनसख्ंया की दृष्टि से भारत दूसरे स्थान पर है।
2. विश्व में क्रय शक्ति समता ;च्च्च्द्ध के आधार पर भारत तीसरे स्थान पर है।
3. विश्व में अधिकतम ऋण ग्रस्त वाले देशों की सूची में भारत 28वें स्थान पर हैं।
उपभोग के सामाजिक-आर्थिक सूचक में भारत
- इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत के संदर्भ में सामाजिक-आर्थिक सूचक जैसे प्रति व्यक्ति कैलोरी उपभोग प्रति हजार जनसंख्या हेतु डाॅक्टर, मोटर गाड़ियों, टेलीफोनी एवं टी.वी. सेटों की संख्या अथवा जनंाकिकीय आँकड़े उसे अभी अल्पविकसित अवस्था बता रहे है। फिर भी 1950-51 से 2006-07 तक भारत की प्रगति निम्न है--
1. 1950-51 से 1970-71 की 3.5% की विकास दर 2006-07 में 8ः पहुंच गयी।
2. 1950-5 1 में गरीबी जो 54 प्रतिशत थी तो वर्तमान में 27ण्5 (2005 के आँकडो के अनुसार) है।
3. 1951 में 17 प्रतिशत साक्षरता आज 65ः से उपर है।
4. 1950-51 में महिलाओं की राजनीतिक-आर्थिक निर्णयों में भूमिका नगण्य थी जबकि 2008 में 12 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि है और उच्च पदों पर विद्यमान है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि यद्यपि भारतीय अर्थव्यवस्था ने बहुत से क्षेत्रों में सराहनीय प्रगति की है, परंतु इसे गरीबी दूर करने, कुपोषण पर नियंत्रण करने और अपनी समग्र जनसंख्या को आवास तथा सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने हेतु काफी कार्य करने हैं।
आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास
आर्थिक संवृद्धि
- आर्थिक संवृद्धि का तात्पर्य अर्थव्यवस्था में किसी समयावधि में होने वाली वास्तविक आय की वृद्धि से है। अर्थात किसी अर्थव्यवस्था मैं यदि सकल राष्ट्रीय उत्पाद, सकल घरेलू उत्पाद एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हो रही है तो यह माना जायेगा कि उस अर्थव्यवस्था की आर्थिक संवृद्धि हो रही है।
आर्थिक विकास
- यह आर्थिक संवृद्धि की तुलना में एक वृहत्तर संकल्पना है। इसमें आर्थिक संवृद्धि के साथ-साथ संरचनात्मक संस्थात्मक एवं गुणात्मक परिवर्तन होना अनिवार्य है। अर्थात किसी अर्थव्यवस्था में आर्थिक विकास तभी स्वीकार किया जायेगा जब लोगों की आय के साथ-साथ उनके जीवन स्तर में भी गुणात्मक परिवर्तन हो।
1. संरचनात्मक परिवर्तन का तात्पर्य अर्थव्यवस्थाकी उत्पाद संरचना में परिवर्तन से है अर्थात् प्राथमिक क्षेत्र के सापेक्ष क्रमश: द्वितीय (औद्योगिक ) एवं तृतीय क्षेत्र (सेवा ) का योगदान कुल राष्ट्रीय आय में अधिक हो साथ ही श्रम संरचना में परिवर्तन से भी है अर्थात् प्राथमिक क्षेत्र के सापेक्ष द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों के श्रमिक नियोजन अधिक हो।
2. संस्थात्मक परिवर्तन का तात्पर्य अर्थव्यवस्था के क्रियाकलापों हेतु औपचारिक संस्थात्मक ढांचे के विकास मे से है। उदाहरण के लिए मुद्रा हेतु बैंकिग, शिक्षा हेतु विद्यालय, विश्वविद्यालय, स्वास्थ हेतु कुशल अस्पताल आदि की व्यवस्था हो।
3. गुणात्मक परिवर्तन का तात्पर्य लोगों के रहन-सहन में परिवर्तन से है। अर्थात् जीवन प्रत्याशा, शिक्षा स्वास्थ्य सुविधाओं, प्रति व्यक्ति आय (क्रयशक्ति समता ), पोषण के स्तर एवं सामाजिक न्याय की गुणात्मक उपस्थिति हो।
- प्रो. अमत्र्य सेन आर्थिक विकास को दो प्रकार से परिभाषित करते हैं-
(।) अधिकारिता का विस्तार: आर्थिक विकास का आशय पोषण, भूख से मुक्ति, आत्मसम्मान एवं ऐसी दशाएँ उपलब्ध कराने से है, जो व्यक्ति को अपने जीवन को बेहतर बनाने में सामथ्र्यवान बना सके तथा जिससे व्यक्ति में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकारों के प्रति चेतना जागृत हो सके।
(।।) क्षमता का विस्तार: यहां क्षमता का तात्पर्य व्यक्ति को स्वतंत्रता प्रदान करने से है। अर्थात मनुष्य सभी प्रकार की आवश्यकताओं, गंदगी तथा अनभिज्ञता के दोषों से मुक्ति है।
उपरोक्त दोनों परिभाषाओं के आधार पर अमत्र्य सेन यह कहना चाहते हैं कि किसी देश का आर्थिक विकास तभी स्वीकार किया जायेगा जब उसके लोगों में चयन की स्वतंत्रता का विस्तार हो।
आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास में अंतर
- आर्थिक संवृद्धि का अर्थ देश के प्रतिव्यक्ति उत्पादन में एक निश्चित समयावधि हुई वृद्धि से है जबकि आर्थिक विकास में प्रतिव्यक्ति उत्पादन के साथ यह देखा जाता है कि अर्थव्यवस्था के सामाजिक व आर्थिक ढांचे में क्या परिवर्तन हुए है।
- जहां आर्थिक संवृद्धि का अर्थ उत्पादन में वृद्धि होता है, वहीं आर्थिक विकास का तात्पर्य उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ उत्पादन की तकनीकी और संरचना व्यवस्था में और वितरण प्रणाली में परिवर्तन होता है।
- इस तरह जहां आर्थिक संवृद्धि की जांच करने के लिए राष्ट्रीय आय के आॅकडो पर गौर करना होता है वहां आर्थिक विकास का अनुमान मुख्य रूप से ढांचागत परिवर्तनों के आधार पर लगाया जाता है।
- आर्थिक संवृद्धि का मापन वस्तुनिष्ठ तरीके से संभव है लेकिन आर्थिक विकास का नहीं।
आर्थिक विकास के मापक
- आर्थिक विकास एक व्यक्तिनिष्ठ अवधारणा है इसलिए इसकी मात्रा का निर्धारण संभव नहीं है फिर भी इसके मापन के संबंध में अनेक प्रयास किये गये हैं। यह किसी परिमाणात्मक चर के आधार पर नहीं बल्कि जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले अनेक चरों से बने सूचकांक के आधार पर विकास की माप करते हैं। यदि किसी देश की वास्तविक प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के साथ-साथ जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो, निर्धनता एवं भुखमरी में कमी हो अथवा साक्षरता तथा जीवन की प्रत्याशा में वृद्धि हो तो ऐसी स्थिति में प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि को आर्थिक विकास का सूचक माना जा सकता है। परंतु सामान्यत: प्रति व्यक्ति वास्तविक आय में वृद्धि गुणात्मक पहलू पर प्रकाश नही डालती अत: इसे आर्थिक विकास के मापक के रूप में नही लेते हैं।
विकास का मापन - मानव विकास
- यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्ट ( 1997 ) के अनुसार मानव विकास वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जनसामान्य के विकल्पों का विस्तार किया जाता है और इनके द्वारा उनके कल्याण के उन्नत स्तर को प्राप्त किया जाता है। ऐसे सिद्धांत न तो सीमाबद्ध होते है और न ही स्थैतिक। परन्तु विकास के स्तर को दृष्टि में रखते हुए जनसामान्य के पास तीन विकल्प हैं-
- एक लम्बा और स्वास्थ्य जीवन ब्यतीत करना
- ज्ञान प्राप्त करना
- अच्छा जीवन स्तर प्राप्त करने हेतु आवश्यक संसाधनों तक अपनी पहुंच बढ़ाना।
- इसके अलावा कई और विकल्प हैं जिन्हें बहुत से लोग महत्वपूर्ण मानते हैं। इनमें उल्लेखनीय हैं-राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता से सृजनात्मक और उत्पादक बनने के अवसर और स्वाभिमान एवं गारंटीकृत मानवीय अधिकारों का लाभ उठाना। इस प्रकार निम्न तत्व मानव विकास के स्तर को निर्धारित करते हैं:
- जीवन प्रत्याशा: जीवन प्रत्याशा का अर्थ है व्यक्ति के जिन्दा रहने की क्षमता अर्थात् किसी देश में लोगों की औसत आयु क्या है। इसका निर्धारण इससे होगा कि किसी राष्ट्र में खाद्य सुरक्षा का स्तर क्या होगा, स्वास्थ्य सुविधाओं का स्तर किस प्रकार होगा आदि।
- शिक्षा: शिक्षा न केवल व्यक्ति को स्थायी एवं गुणवत्ता परक रोजगार देती है बल्कि उसे राजनीतिक-सामाजिक सांस्कृतिक रूप से उसकी क्षमता का विस्तार भी करती है।
- प्रतिव्यक्ति आय ( क्रयशक्ति समता ): प्रति व्यक्ति आय (क्रयशक्ति समता ) का बढ़ना यह प्रदर्शित करता है कि किसी राष्ट्र में लोगों के वस्तुओं एवं सेवाओं तक पहुंच बढ रही है और उनके भौतिक जीवन का विकास हो रहा है।
- तकनीकी विकास: यह किसी देश में औद्योगिक संरचना में होने बाले परिवर्तनों का सूचकांक है।
- तकनीकी प्रगति: तकनीकी प्रगति का आशय उत्पादन क्रिया में उन्नत तकनीक के प्रयोग से जिसमें निम्न तत्वों को शामिल किया जाता है-
1. मशीनों का प्रयोग
2. मानव कुशलता
3. संगठनात्मक ढांचा
4. इनफारमेशन अर्थात् तकनीक से संबंधित सूचनायें
- इन तत्वों के आधार पर तकनीकी विकास निम्न प्रकार से होता हैः-
1. शोध तथा उद्योगों में बहुत अत्पधिक विनियोग
2. कुशल उद्यमी जो नव प्रवर्तित टेक्नोलाजी की ब्यापारिक संभावना तथा जोखिम का अनुमान लगा सकें।
3. विस्तृत बाजार
- तकनीक हस्तातरण: विकासशील तथा अल्पविकसित देश पूँजी की कमी के कारण नव प्रवर्तन तथा शोध पर बहुत कम व्यय कर पाते हैं, इसलिये वे अपनी स्व्यं की उन्नत तकनीकी विकसित नहीं कर पाते हैं। अत: वे अपने आर्थिक विकास के लिए बहुत हद तक विकसित देशों द्वारा किये गये तकनीकी हस्तान्तरण पर निर्भर रहते हैं।
- तकनीकी हस्तातरण की कुछ विधियां इस प्रकार हैं-
1. संयुक्त उद्यम: जिसमें स्वामित्व तथा नियंत्रण में हिस्सेदारी होती है।
2. लाइसेंसिंग: जिसमें स्वामित्व तथा प्रबंधन की जिम्मेदारी तकनीकी प्राप्त करने वाले देश के पास होगी पर लाइसेंस के साथ जुड़ी शर्तो के कारण प्रबंधन तथा स्वामित्व में होने के बावजूद भी तकनीक प्राप्तकर्त्ता देश के द्वारा स्वतंत्र निर्णय नहीं लिया जा पाता है। यह शर्त तकनीक देने वाला देश ही तय करता है।
3. फ्रेन-चाइजिंग: इसके अंतर्गत तकनीकी हस्तांतरण करने वाला देश अपनी ब्रांड नाम बेचता है तथा साथ में प्रबंधकीय तथा तकनीकी सहायता भी देता है।
4. टर्न की कान्ट्रैक्टसः इसके अंतर्गत पूर्णत्पा तैयार फैक्ट्री कम्पनी क्रेता को दी जाती है।
- इण्टरमीडिएट टेक्नॅालाॅजी: प्रसिद्ध पुस्तक स्म्पाॅल इज ब्यूटीफूल के लेखक ई.एफ. सुमाकर इस तकनीक की निम्न विशेषताएं बताते हैं- -
1. ऐसी तकनीक जो उन दशाओं के लिए उचित हो जिसमें विश्व के सभी लोग रहते हो।
2. इतनी सरल हो कि जिनके पास उच्च प्रशिक्षण तथा शिंछा का अभाव है उनको ग्राद्दय हो।
3. कम लागत वाली तकनीक
4. कुशल तथा कम कठिनाईयाँ उत्पन्न करने वाली हो
5. स्थानीय माल की पूर्ति तथा छोटे स्तर पर विपणन के अनुरूप हो।
मानव विकास के घटक
मानव विकास प्रतिमान के निम्नलिखित घटक स्वीकार किये जाते है-
- संवृद्धि: मानव विकास के प्रतिमान का एक आवश्यक तत्व संवृद्धि अर्थात व्यक्ति की आय में वृद्धि है। इसके द्वारा न केवल मानव की स्वास्थ्य, शिक्षा. भोजन जैसी आवश्यकताएं पूरी होती हैं बल्कि उसका आर्थिक सशक्तीकरण भी होता है। ऐसी संवृद्धि प्राप्त करने हेतु मानव पूंजी के रूप में विकसित करने हेतु उसमें निवेश आवश्यक है। साथ ही एक सहायक समष्टि आर्थिक पर्यावरण जारी है जिससे लोगों की सूजनात्मक क्षमता का अधिकतम उपयोग हो सके।
- समावेशन: यदि विकास द्वारा लोगों के विकल्पों का विस्तार होना है तो उनकी अवसरों तक न्यायोचित पहुंच होनी चाहिए। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन करने होंगे जैसे
- उत्पादक परिसंपतियों के वितरण में परिवर्तन, मुख्यतः भूमि सुधार हो।
- आय के वितरण में पुनर्गठन अर्थात आय का प्रवाह अमीरों से गरीबों की ओर होना चाहिये।
- साख प्रणाली में परिवर्तन अर्थात् गरीबों तक ऋण. की पहुंच सरल हो।
- राजनीतिक अवसरों में समता तथा मताधिकार में सुधार हो।
- महिलाओं, अल्पसंख्यकों, आदि की आर्थिक एवं राजनीतिक अवसर तक पहुंच में आने वाली सामाजिक एवं वैधानिक बाधाओं को दूर किया जाना चाहिये।
- संपोषणीयताः अगली पीढी को वे सभी अवसर मिलने चाहिए जो हमें प्राप्त हैं। अगली पीढी का यह अधिकार ही संपोषणीयता को मानव विकास प्रतिमान का अनिवार्य घटक बनाता है। इसका तात्पर्य केवल प्राकृतिक नवीकरण से ही नही है बल्कि उसका अर्थ भौतिक, मानव, वित्तीय और पर्यावरण संबंधी सभी प्रकार की पूंजी को बनाये रखना है।
- सशक्तीकरण: मानव विकास प्रतिमान लोगों के संपूर्ण सशक्तिकरण की कल्पना करता है। इसका अर्थ लोकतंत्र है जिसमें लोग अपने जीवन के बारे में लिए जाने वाले निर्णयों को प्रभावित कर सकें। इसके लिए व्यक्ति को आर्थिक, शारीरिक एवं राजनीतिक रूप से समर्थ बनाना होगा ताकि उनमें चुनने की क्षमता और स्वयं चुने जाने की स्वतंत्रता दोनों प्राप्त हो सके। ऐसा होने पर ही आर्थिक विकास हेतु उनका मानव पूंजी के रूप में कुशल प्रयोग हो सकेगा।
आर्थिक विकास की रणनीति
- किसी देश के आर्थिक विकास के मार्ग में उनके सामने मुख रूप से तीन समस्यायें होती है
- किस वस्तु का उत्पादन किया जाये तथा किसका उत्पादन नही किया जाये?
- विभिन्न प्रयोगों में संसाधनों का आवंटन कैसे हो?
- उत्पादन की प्रक्रिया किसके द्वारा हो - निजी क्षेत्र द्वारा या सरकार द्वारा अथवा दोनों के द्वारा?
- आर्थिक विकास के मार्ग में आने वाली इन बाधाओं का समाधान करने हेतु तीन झार की सकल्पनाए प्राप्त होती हैंः--
- बाजार व्यवस्था: उत्पादन उत्पादक संसाधनों का आबंटन, वितरण आदि आर्थिक क्रियाओं का निर्धारण बाजार शक्तियों द्वारा होता है। राज्य का हस्तक्षेप नहीं होता है।
- केंद्रीकृत नियोजन प्रणाली: आर्थिक क्रियाओं अर्थात साधनों का आवंटन, विनियोग की प्राथमिकताओं तथा उत्पादन के ढांचे का निर्धारण एक केंद्रीय इकाई या राज्य के द्वारा हो, इस प्रकार की व्यवस्था को हम केंद्रीकृत नियोजन व्यवस्था कहते हैं। इस प्रकार की व्यवस्था में दीर्घकालीन आर्थिक विकास की दृष्टि से प्राथमिकताओं का निर्धारण राज्य द्वारा किया जाता है तथा उसी के अनुसार अर्थव्यवस्था में विनियोग किया जाता है।
- मिश्रित प्रणालीः एक ऐसी प्रणाली जिसमें बाजार के साथ-साथ राज्य की भूमिका या नियोजन भी साथ-साथ चले या जिसमें निजी क्षेत्र के साथ सार्वजनिक क्षेत्र भी कार्यशील हो तो उसे हम मिश्रित आर्थिक प्रणाली कहते हैं। इस धारणा का प्रतिपादन जाॅन मेनार्ड कीन्स ने किया। इसके तीन रूप हो सकते हैं-
- मिश्रित बाजार प्रणाली: वह प्रणाली है जिसमें बाजार तंत्र की प्रधानता रहती है, संसाधनों का बँटवारा बाजार में प्रचलित मांग एवं पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है। इस प्रणाली में राज्य एक कल्याणकारी राज्य के रूप में कार्य करता है, विकास संबंधी क्रियाओं में उसकी भागीदारी नहीं होती।
- नियोजन मिश्रित प्रणाली: इस व्यवस्था में बाजार के साथ-साथ नियोजित प्रणाली क्रियाशील होती है। योजना आयोग या केंद्रीकृत व्यवस्था के द्वारा लक्ष्य निर्धारित होते हैं तथा सार्वजनिक तथा निजी - उद्यमों के बीच समन्वय स्थापित होता है। इसमें विकास कार्यो पर अधिक बल दिया जाता है।
- बाजार प्रधान नियोजित अर्थव्यवस्था या उदारवादी अर्थव्यवस्थाः ऐसी व्यवस्था जिसमें नियोजन तो हो पर बाजार तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी के प्रति अधिक उदारवादी नीति हो। इसमें नियोजन का स्वरूप निर्देशात्मक होता है। भारत में इस समय 1991 से नव आर्थिक सुधारों के बाद, यही प्रणाली प्रचालित है।
- इसे भारत में 1991 की विकास की रणनीति या राव-मनमोहन विकास रणनीति भी कहते हैं, आर्थिक विकास की वैश्वीकरण की अवधारणा पर आधारित है। इसके तीन स्तम्भ हैं-
- उदारीकरण: यहां उदारीकरण से तात्पर्य है कि राज्य का हस्तक्षेप आर्थिक क्रियाओं के निर्धारण में नही होगा इस प्रकार अर्थव्यवस्था में इंस्पेक्टर राज, कोटा राज, लाइसेंस राज समाप्त किया जायेगा।
- निजीकरण: सरकार निजी क्षेत्रों के विकास के लिये बेहतर आर्थिक वातावरण उपलब्ध करायेगी एवं स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का निर्माण करेगी। साथ ही वह स्वयं को आर्थिक क्रियाओं से हटा लेगी (विनिवेश के माध्यम से) तथा स्वयं को वितरण की समस्यायों पर गरीबी-बेरोजगारी आदि तक सीमित कर लेगी।
- वैश्वीकरण: वैश्वीकरण से तात्पर्य है भारतीय अर्थव्यवस्था का विश्व अर्थव्यवस्था से एकीकरण। अर्थात वस्तु, सेवा, पूंजी तकनीक आदि का मुक्त प्रवाह हो सके। निर्यात प्रेरित तीव्र विकास की यह रणनीति निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र की भागीदारी पर बल देती है। जो इस परिकल्पना पर आधारित है कि विकास की मूलधारा में सबको जोडा जाये जिससे आर्थिक विकास का लाभ सबको समान रूप से प्राप्त हो। विशेष रूप से गरीब वर्ग को, कोई वृष्टि छाया में न रह जाये। इसे 11वीं पंचवर्षीय योजना के स्वीकृत प्रारूप में समावेशी विकास रणनीति कहा गया है।
सतत् विकास
- वर्तमान में यह अवधारणा सर्वाधिक लोकप्रिय हुई है। इसके अंतर्गत विकास की एक नवीन अवधारणा विकसित की गई है। अर्थशास्त्र की परम्परागत अवधारणा में संसाधनों के अधिकतम उपयोग पर बल दिया जाता था परंतु इस अवधारणा में संसाधनों के इस प्रकार दोहन पर बल दिया जाता है जिसमें भावी पीढ़ी का विकास प्रतिकूल रूप में प्रभावित न हो। संसाधनों का अधिकतम संभव सदुपयोग सुनिश्चित करना इसकी प्रमुख विशेषता है। 1992 के रिया डी जेनेरियो तथा 2000 में जोहांसबर्ग के सम्मेलन का मुख्य विषय सतत् विकास ही था।
राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग की सिफारिशें
- भारतीय रिजर्व बैक ने भूतपूर्व गवर्नर श्री सी.रगराजन की अध्यक्षता में स्थापित राष्ट्रीय सांख्यिकीय आयोग ने भारतीय सांख्यिकीय प्रणाली में सुधार हेतु निम्न प्रमुख सिफारिशें की है-
- राष्ट्रीय स्तर के साथ राज्य स्तर पर औद्योगिक उत्पादन सूचकांक तैयार किए जाएं।
- राज्यों में औद्योगिक उत्पादन क आॅकडे एकत्र कर आधार- श्रृखंला तैयार की जायं।
- थोक कीमत सूचकांक और उपभोक्ता कीमत सूचकांक के राज्य स्तर पर आॅकडे तैयार किए जाएं। इसके अतिरिक्त निगम क्षेत्र के उद्यमों की संदर्भिका सर्वेक्षण भी तैयार करने चाहिए।
- सेवा क्षेत्र के लिए आयोग ने इस तथ्य का उल्लेख किया है कि निगम क्षेत्र के लिए सकल देशीय उत्पाद तैयार करने हेतु, राज्य सरकारी को कंपनियों के क्षेत्रीय रजिस्ट्रार द्वारा. बनाए गए ढांचे का प्रयोग करना चाहिए