अर्थव्यवस्था- प्रमुख विशेषताएं

अर्थव्यवस्था के प्रकार

          1. बंद अर्थव्यवस्थाः बंद अर्थव्यवस्था के अंतर्गत एक अर्थव्यवस्था शेष विश्व के साथ किसी प्रकार की विदेशी व्यापार की क्रिया संपन्न नहीं करता है। इसकी सभी आर्थिक क्रियायें एक देश की सीमा के भीतर ही होती है।

          2. खुली अर्थव्यवस्थाः यह बंद अर्थव्यवस्था के विपरीत नियंत्रण मुक्त अर्थव्यवस्था है, जो प्रतियोगिता को प्रोत्साहित करता है। यह अन्य अथव्यवस्थाओं के साथ निकटम संबंध, सहयोग एवं संलग्नता पर बल देता है। वर्तमान में वैश्वीकरण की नीति में सभी देश अब मुक्त अर्थव्यवस्था को अपना रहे हैं।

          3. विकसित अर्थव्यवस्थाः यह आर्थिक गतिविधियों एवं विकास के एक बेहतर स्तर का प्रतिनिधित्व करता है। यह हमेशा सापेक्षिक एवं तुलनात्मक संदर्भ में प्रयुक्त होता है क्याकि इसकी किसी सीमा/स्तर/मानदण्ड का निर्धारण कठिन है। उदाहरण के रूप में यू.एस.ए. जापान, पश्चिमी यूरोप जैसे देशों की प्रतिव्यक्ति आय अथवा बेहतर जीवन के आधार पर विकसित देश कहा जा सकता है।

          4. विकासशील अर्थव्यवस्था: यह विकास की ओर अग्रसर अर्थव्यवस्था का सूचक है। वैसे विश्व की सभी अर्थव्यवस्था इस श्रेणी में आती हैं परंतु इसका प्रयोग वैसी अर्थव्यवस्था को सूचित करने के लिये होता है जो पिछड़ी अवस्था से उच्च विकास की ओर प्रयासरत हैं। उदाहरण के रूप में भारत, चीन, ब्राजील आदि विकास की ओर अग्रसर हैं।

          5. योजनाबद्ध अर्थव्यवस्थाः यह अर्थव्यवस्था के विकास की एक सुविचारित रणनीति है। यह नियोजित रूप में अर्थव्यवस्था के विकास की दिशा को निर्धारित करता है। इसके अंतर्गत अल्प, मध्य एवं दीर्घ अवधि की योजना हो सकती है। इसमें राज्य की केन्द्रीय भूमिका होती है। इसका उदाहरण मुख्यतः समाजवादी अर्थव्यवस्थाओं में देखा जा सकता है।

          6. गैर योजनाबद्ध अर्थव्यवस्थाः जिस अर्थव्यवस्था के विकास के लिये कोई योजना नहीं बनायी जाती वह गैर योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था के अंतर्गत आता है। वर्तमान में विश्व में कोई भी ऐसा देश नहीं है जो योजना की रणनीति न अपनाता हो।

          7. पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाः इसमें आर्थिक साधनों पर निजी स्वामित्व होता है। इसके अंतर्गत सरकार आर्थिक साधनों के संगठन में अहस्तक्षेप की नीति अपनाती है। यह बाजार की शक्तियों अर्थात मांग और आपूर्ति के सिद्धातों के अंतर्गत स्वतंत्र रूप से कार्य करती है। इसे बाजार अर्थव्यवस्था के रूप में जाना जाता है।

          8. समाजवादी अर्थव्यवस्थाः यह कार्ल मार्क्स के विचारों पर आधारित वैसी ब्यवस्था का प्रतिपादन करता है जिसके अंतर्गत उत्पादन के समस्त साधनों पर राज्य/सरकार/समुदाय का नियंत्रण होता है जैसे पूर्व सोवियत अथव्यवस्था।

          9. मिश्रित अर्थव्यवस्थाः यह पंूजीबादी एवं समाजवादी अर्थव्यवस्था के तत्वों का श्रेष्ठ समायोजन है। इसके अंतर्गत आर्थिक

संसाधनों के महत्वपूर्ण भाग पर सरकार अथवा राज्य का निंयत्रण होता है। साथ ही निजी क्षेत्र के विकास का भी उपयुक्त अवसर प्राप्त होता है। इसका व्यवहारिक रूप संयुक्त उपक्रमों के अंतर्गत दृष्टिगोचर होता है। भारतीय अर्थव्यवस्था इसका उदाहरण है।

          10. आश्रित अर्थव्यवस्थाः वैसी अर्थव्यवस्था जो अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिये दूसरी अर्थव्यवस्था पर आधारित हो। वर्तमान भूमण्डलीकरण के युग में सभी अर्थव्यवस्था आश्रित अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर हैं। वर्तमान में नेपाल, भूटान आदि अल्पविकसित देश इस प्रकार की अर्थव्यवस्था के उदाहरण हैं।

          11. आत्मपूरक अर्थव्यवस्थाः वैसी अर्थव्यवस्था जिसके अंतर्गत अपनी आवश्यकता के अनुरूप सभी वस्तुओं के उत्पादन की क्षमता विद्यमान है। वर्तमान ऐसी अर्थव्यवस्था कोई नहीं है।

 

अर्थव्यवस्था के क्षेत्र

सामान्यतः संपूर्ण अर्थव्यवस्था की आर्थिक गतिविधियों को लेख्ंााकित करने के लिये तीन क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है-

          1. प्राथमिक क्षेत्र: इसके अंतर्गत निम्न क्षेत्रों को सम्मिलित किया जाता है-

  1. कृषि
  2. वानिकी
  3. मत्स्यन (मछली पकड़ना)
  4. खनन (उध्र्वाधर खुदाई) एवं उत्खनन (क्षैतिज खुदाई)

 

वस्तुतः इसके अंतर्गत अर्थव्यवस्था के प्राकृतिक क्षेत्रों का लेखांकन किया जाता है।

          2. द्वितीयक क्षेत्रः इसके अंतर्गत -

           1. निर्माण: जहां किसी स्थायी परिसम्पत्ति का निर्माण किया जाये - जैसे भवन।

           2. विनिर्माण: जहां किसी वस्तु का उत्पादन हो जैसे-कपड़ा, ब्रेड आदि।

           3. विद्युत, गैस एवं जलापूर्ति इत्यादि से संबंधित कार्य आते है। इस क्षेत्रक के अन्तर्गत मुख्यतः अर्थव्यवस्था की विनिर्मित वस्तुओं के उत्पादन का लेखांकन किया जाता है।

          3. तृतीयक या सेवा क्षेत्र यह क्षेत्र अर्थव्यवस्था के प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रक को अपनी उपयोगी सेवायें प्रदान करता है। इसके अंतर्गतः--

  1. परिवहन एवं संचार,
  2. बैकिंग
  3. बीमा
  4. भण्डारण
  5. व्यापार
  6. सामुदायिक सेवायें आदि

अल्प विकास बनाम विकास

          (1) निम्न आय वाले देश जिनकी प्रति व्यक्ति आय 906 डाॅलर से कम है।

          (2) मध्यम आय वाले देश जिनकी प्रति व्यक्तिं आय 906 डाॅलर से 11,115 डाॅलर की अभिसीमा के बीच है।

अल्प विकास के सूचक

अल्पविकास की विशेषताएं

विकसित तथा विकासशीत देशों में कृषि

देश

कृषि में लगी र्कायशील
जनसंख्या का प्रतिशत

सकल घरेलू उत्पाद में
कृषि का प्रतिशत

विकसित देश

2%

1%

. इगंलैड

3%

1%

. संयुक्त राज्य अमेरिका

7%

2%

. जापान

63%

18%

अल्पविकसित देश

 

 

. भारत

63%

18%

. चीन

61%

12%

. बांग्लादेश

65%

20%

 

           1. श्रमिक स्वास्थ्य

           2. श्रमिक कौशल

           3. आगतों की उपलब्धता

           4. संस्थागत ढांचा

           5. काम करने की प्रेरणा

          1. वास्तविक प्रति व्यक्ति आय: इन देशो की प्रति व्यक्ति आय का स्तर निम्न होता है। परिणामस्व: न्यूनतम आवश्यकताओं जैसे तक इनकी पहुंच कम होती है।

          2. स्वास्थ्य: 2005 में विश्व बैंक के अनुसार जहां अल्पविकसित देशों में जन्म के समय जीवन प्रत्याशा 66.1 वर्ष थी वहीं विकसित देशों में 78ण्3 वर्ष थी। साथ ही विकसित देशों में बाल मृत्युदर 6 प्रति हजार थी वहीं अल्पविकसित देशों में 61 प्रति हजार थी।

          3. शिक्षा: 2005 में अल्पविकसित देशों में महिला निरक्षरता 48 एवं पुरूष निरक्षरता 30 प्रतिशत थी वहीं विकसित देशों में दोनों ही वर्गो में यह 2 प्रतिशत थी।

अल्पविकसित अर्थव्यवस्था के रूप में भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताए

           1. प्रतिव्यक्ति उपलब्ध पूंजी की निम्न मात्रा

           2. पूंजी-निर्माण की प्रचालित निम्न दर

 

कुछ देशों में बिजली का प्रतिव्यक्ति उपयोग (2016)

देशों

बिजली का प्रतिव्यक्ति उपयोग (किलोवाट- घंटे)

संयुक्त राज्य अमेरिका

1683

चीन

458

भारत

101

         

मानव पूंजी का निम्न स्तर

विश्व में भारत

1. विश्व में जनसख्ंया की दृष्टि से भारत दूसरे स्थान पर है।

2. विश्व में क्रय शक्ति समता ;च्च्च्द्ध के आधार पर भारत तीसरे स्थान पर है।

3. विश्व में अधिकतम ऋण ग्रस्त वाले देशों की सूची में भारत 28वें स्थान पर हैं।

उपभोग के सामाजिक-आर्थिक सूचक में भारत

           1. 1950-51 से 1970-71 की 3.5% की विकास दर 2006-07 में 8ः पहुंच गयी।

           2. 1950-5 1 में गरीबी जो 54 प्रतिशत थी तो वर्तमान में 27ण्5 (2005 के आँकडो के अनुसार) है।

           3. 1951 में 17 प्रतिशत साक्षरता आज 65ः से उपर है।

           4. 1950-51 में महिलाओं की राजनीतिक-आर्थिक निर्णयों में भूमिका नगण्य थी जबकि 2008 में 12 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि है और उच्च पदों पर विद्यमान है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि यद्यपि भारतीय अर्थव्यवस्था ने बहुत से क्षेत्रों में सराहनीय प्रगति की है, परंतु इसे गरीबी दूर करने, कुपोषण पर नियंत्रण करने और अपनी समग्र जनसंख्या को आवास तथा सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने हेतु काफी कार्य करने हैं।

आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास

आर्थिक संवृद्धि

आर्थिक विकास

           1. संरचनात्मक परिवर्तन का तात्पर्य अर्थव्यवस्थाकी उत्पाद संरचना में परिवर्तन से है अर्थात् प्राथमिक क्षेत्र के सापेक्ष क्रमश: द्वितीय (औद्योगिक ) एवं तृतीय क्षेत्र (सेवा ) का योगदान कुल राष्ट्रीय आय में अधिक हो साथ ही श्रम संरचना में परिवर्तन से भी है अर्थात् प्राथमिक क्षेत्र के सापेक्ष द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों के श्रमिक नियोजन अधिक हो।

           2. संस्थात्मक परिवर्तन का तात्पर्य अर्थव्यवस्था के क्रियाकलापों हेतु औपचारिक संस्थात्मक ढांचे के विकास मे से है। उदाहरण के लिए मुद्रा हेतु बैंकिग, शिक्षा हेतु विद्यालय, विश्वविद्यालय, स्वास्थ हेतु कुशल अस्पताल आदि की व्यवस्था हो।

           3. गुणात्मक परिवर्तन का तात्पर्य लोगों के रहन-सहन में परिवर्तन से है। अर्थात् जीवन प्रत्याशा, शिक्षा स्वास्थ्य सुविधाओं, प्रति व्यक्ति आय (क्रयशक्ति समता ), पोषण के स्तर एवं सामाजिक न्याय की गुणात्मक उपस्थिति हो।

           (।) अधिकारिता का विस्तार: आर्थिक विकास का आशय पोषण, भूख से मुक्ति, आत्मसम्मान एवं ऐसी दशाएँ उपलब्ध कराने से है, जो व्यक्ति को अपने जीवन को बेहतर बनाने में सामथ्र्यवान बना सके तथा जिससे व्यक्ति में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकारों के प्रति चेतना जागृत हो सके।

           (।।) क्षमता का विस्तार: यहां क्षमता का तात्पर्य व्यक्ति को स्वतंत्रता प्रदान करने से है। अर्थात मनुष्य सभी प्रकार की आवश्यकताओं, गंदगी तथा अनभिज्ञता के दोषों से मुक्ति है।

उपरोक्त दोनों परिभाषाओं के आधार पर अमत्र्य सेन यह कहना चाहते हैं कि किसी देश का आर्थिक विकास तभी स्वीकार किया जायेगा जब उसके लोगों में चयन की स्वतंत्रता का विस्तार हो।

आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास में अंतर

आर्थिक विकास के मापक

विकास का मापन - मानव विकास

  1. एक लम्बा और स्वास्थ्य जीवन ब्यतीत करना
  2. ज्ञान प्राप्त करना
  3. अच्छा जीवन स्तर प्राप्त करने हेतु आवश्यक संसाधनों तक अपनी पहुंच बढ़ाना।

           1. मशीनों का प्रयोग

           2. मानव कुशलता

           3. संगठनात्मक ढांचा

           4. इनफारमेशन अर्थात् तकनीक से संबंधित सूचनायें

           1. शोध तथा उद्योगों में बहुत अत्पधिक विनियोग

           2. कुशल उद्यमी जो नव प्रवर्तित टेक्नोलाजी की ब्यापारिक संभावना तथा जोखिम का अनुमान लगा सकें।

           3. विस्तृत बाजार

           1. संयुक्त उद्यम: जिसमें स्वामित्व तथा नियंत्रण में हिस्सेदारी होती है।

           2. लाइसेंसिंग: जिसमें स्वामित्व तथा प्रबंधन की जिम्मेदारी तकनीकी प्राप्त करने वाले देश के पास होगी पर लाइसेंस के साथ जुड़ी शर्तो के कारण प्रबंधन तथा स्वामित्व में होने के बावजूद भी तकनीक प्राप्तकर्त्ता देश के द्वारा स्वतंत्र निर्णय नहीं लिया जा पाता है। यह शर्त तकनीक देने वाला देश ही तय करता है।

           3. फ्रेन-चाइजिंग: इसके अंतर्गत तकनीकी हस्तांतरण करने वाला देश अपनी ब्रांड नाम बेचता है तथा साथ में प्रबंधकीय तथा तकनीकी सहायता भी देता है।

           4. टर्न की कान्ट्रैक्टसः इसके अंतर्गत पूर्णत्पा तैयार फैक्ट्री कम्पनी क्रेता को दी जाती है।

           1. ऐसी तकनीक जो उन दशाओं के लिए उचित हो जिसमें विश्व के सभी लोग रहते हो।

           2. इतनी सरल हो कि जिनके पास उच्च प्रशिक्षण तथा शिंछा का अभाव है उनको ग्राद्दय हो।

           3. कम लागत वाली तकनीक

           4. कुशल तथा कम कठिनाईयाँ उत्पन्न करने वाली हो

           5. स्थानीय माल की पूर्ति तथा छोटे स्तर पर विपणन के अनुरूप हो।

मानव विकास के घटक

मानव विकास प्रतिमान के निम्नलिखित घटक स्वीकार किये जाते है-

  1. संवृद्धि: मानव विकास के प्रतिमान का एक आवश्यक तत्व संवृद्धि अर्थात व्यक्ति की आय में वृद्धि है। इसके द्वारा न केवल मानव की स्वास्थ्य, शिक्षा. भोजन जैसी आवश्यकताएं पूरी होती हैं बल्कि उसका आर्थिक सशक्तीकरण भी होता है। ऐसी संवृद्धि प्राप्त करने हेतु मानव पूंजी के रूप में विकसित करने हेतु उसमें निवेश आवश्यक है। साथ ही एक सहायक समष्टि आर्थिक पर्यावरण जारी है जिससे लोगों की सूजनात्मक क्षमता का अधिकतम उपयोग हो सके।
  2. समावेशन: यदि विकास द्वारा लोगों के विकल्पों का विस्तार होना है तो उनकी अवसरों तक न्यायोचित पहुंच होनी चाहिए। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन करने होंगे जैसे

आर्थिक विकास की रणनीति

  1. किस वस्तु का उत्पादन किया जाये तथा किसका उत्पादन नही किया जाये?
  2. विभिन्न प्रयोगों में संसाधनों का आवंटन कैसे हो?
  3. उत्पादन की प्रक्रिया किसके द्वारा हो - निजी क्षेत्र द्वारा या सरकार द्वारा अथवा दोनों के द्वारा?
  1. बाजार व्यवस्था: उत्पादन उत्पादक संसाधनों का आबंटन, वितरण आदि आर्थिक क्रियाओं का निर्धारण बाजार शक्तियों द्वारा होता है। राज्य का हस्तक्षेप नहीं होता है।
  2. केंद्रीकृत नियोजन प्रणाली: आर्थिक क्रियाओं अर्थात साधनों का आवंटन, विनियोग की प्राथमिकताओं तथा उत्पादन के ढांचे का निर्धारण एक केंद्रीय इकाई या राज्य के द्वारा हो, इस प्रकार की व्यवस्था को हम केंद्रीकृत नियोजन व्यवस्था कहते हैं। इस प्रकार की व्यवस्था में दीर्घकालीन आर्थिक विकास की दृष्टि से प्राथमिकताओं का निर्धारण राज्य द्वारा किया जाता है तथा उसी के अनुसार अर्थव्यवस्था में विनियोग किया जाता है।
  3. मिश्रित प्रणालीः एक ऐसी प्रणाली जिसमें बाजार के साथ-साथ राज्य की भूमिका या नियोजन भी साथ-साथ चले या जिसमें निजी क्षेत्र के साथ सार्वजनिक क्षेत्र भी कार्यशील हो तो उसे हम मिश्रित आर्थिक प्रणाली कहते हैं। इस धारणा का प्रतिपादन जाॅन मेनार्ड कीन्स ने किया।                  इसके तीन रूप हो सकते हैं-
  4. मिश्रित बाजार प्रणाली: वह प्रणाली है जिसमें बाजार तंत्र की प्रधानता रहती है, संसाधनों का बँटवारा बाजार में प्रचलित मांग एवं पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है। इस प्रणाली में राज्य एक कल्याणकारी राज्य के रूप में कार्य करता है, विकास संबंधी क्रियाओं में उसकी भागीदारी नहीं होती।
  5. नियोजन मिश्रित प्रणाली: इस व्यवस्था में बाजार के साथ-साथ नियोजित प्रणाली क्रियाशील होती है। योजना आयोग या केंद्रीकृत व्यवस्था के द्वारा लक्ष्य निर्धारित होते हैं तथा सार्वजनिक तथा निजी - उद्यमों के बीच समन्वय स्थापित होता है। इसमें विकास कार्यो पर अधिक बल दिया जाता है।
  6. बाजार प्रधान नियोजित अर्थव्यवस्था या उदारवादी अर्थव्यवस्थाः ऐसी व्यवस्था जिसमें नियोजन तो हो पर बाजार तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी के प्रति अधिक उदारवादी नीति हो। इसमें नियोजन का स्वरूप निर्देशात्मक होता है। भारत में इस समय 1991 से नव आर्थिक सुधारों के बाद, यही प्रणाली प्रचालित है।
  1. उदारीकरण: यहां उदारीकरण से तात्पर्य है कि राज्य का हस्तक्षेप आर्थिक क्रियाओं के निर्धारण में नही होगा इस प्रकार अर्थव्यवस्था में इंस्पेक्टर राज, कोटा राज, लाइसेंस राज समाप्त किया जायेगा।
  2. निजीकरण: सरकार निजी क्षेत्रों के विकास के लिये बेहतर आर्थिक वातावरण उपलब्ध करायेगी एवं स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का निर्माण करेगी। साथ ही वह स्वयं को आर्थिक क्रियाओं से हटा लेगी (विनिवेश के माध्यम से) तथा स्वयं को वितरण की समस्यायों पर गरीबी-बेरोजगारी आदि तक सीमित कर लेगी।
  3. वैश्वीकरण: वैश्वीकरण से तात्पर्य है भारतीय अर्थव्यवस्था का विश्व अर्थव्यवस्था से एकीकरण। अर्थात वस्तु, सेवा, पूंजी तकनीक आदि का मुक्त प्रवाह हो सके। निर्यात प्रेरित तीव्र विकास की यह रणनीति निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र की भागीदारी पर बल देती है। जो इस परिकल्पना पर आधारित है कि विकास की मूलधारा में सबको जोडा जाये जिससे आर्थिक विकास का लाभ सबको समान रूप से प्राप्त हो। विशेष रूप से गरीब वर्ग को, कोई वृष्टि छाया में न रह जाये। इसे 11वीं पंचवर्षीय योजना के स्वीकृत प्रारूप में समावेशी विकास रणनीति कहा गया है।

सतत् विकास

 

राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग की सिफारिशें

  1. राष्ट्रीय स्तर के साथ राज्य स्तर पर औद्योगिक उत्पादन सूचकांक तैयार किए जाएं।
  2. राज्यों में औद्योगिक उत्पादन क आॅकडे एकत्र कर आधार- श्रृखंला तैयार की जायं।
  3. थोक कीमत सूचकांक और उपभोक्ता कीमत सूचकांक के राज्य स्तर पर आॅकडे तैयार किए जाएं। इसके अतिरिक्त निगम क्षेत्र के उद्यमों की संदर्भिका सर्वेक्षण भी तैयार करने चाहिए।
  4. सेवा क्षेत्र के लिए आयोग ने इस तथ्य का उल्लेख किया है कि निगम क्षेत्र के लिए सकल देशीय उत्पाद तैयार करने हेतु, राज्य सरकारी को कंपनियों के क्षेत्रीय रजिस्ट्रार द्वारा. बनाए गए ढांचे का प्रयोग करना चाहिए