नैनों तकनीक विकास एवं अनुप्रयोग

‘नैनो विज्ञान’ आज के विज्ञान जगत् का बहुचर्चित शब्द है। स्थूल पदार्थों के लघुकरण से उपजने वाले गुणधर्मीय परिवर्तनों पर आधारित विज्ञान और प्रौद्योगिकी की इस नवीनतम तकनीक में मानवीय आवश्यकताओं के लिए अनंत संभावनाएं मौजूद हैं। अतिश्योक्ति नहीं होगी, यदि यह कहा जाए कि, आने वाला समय नैनो विज्ञान एवं तकनीक का होगा।

पदार्थों के लघुकरण की यात्रा मिलिमीटर से माइक्रान, नैनोमीटर, एंगस्ट्रॉम, पीको, फैन्टो और आप्टो तक जाती है। ज्ञातव्य है कि, नैनो कणों का आकार कुछ नैनोमीटर से लेकर 100 नैनोमीटर तक होता है। इसमें एक नैनोमीटर 10-9 मीटर, एक एंगस्ट्रॉम 10-10 मीटर तथा एक नैनोमीटर 10 एंगस्ट्रॉम के बराबर होता है। नैनोमीटर, मीटर के एक अरबवें हिस्से को कहा जाता है।

हालांकि, नैनोमीटर न्यूनतम इकाई नहीं है। इससे भी अन्य छोटी इकाइयां हैं। फिर भी वैज्ञानिकों ने नैनो स्तर पर ही सूक्ष्म निर्माण का प्रयास क्यों किया? वैज्ञानिकों के अनुसार, पदार्थों के स्थूल गुणधर्म का परमाणविक गुणधर्म में परिवर्तन नैनोमीटर स्तर पर ही होगा।

पदार्थों के सूक्ष्मीकरण की इस तकनीक ने कार्बन को वाष्पित कर उसे अक्रिय गैस में संघनित करने के साथ ही उसकी सूक्ष्म नलिकाएं, गोले, खगोल, बर्फ के फाहे तथा जटिल नैनी कण बनाने में सफलता पाई है। अब तो स्थूल पदार्थ के इन लघु कणों से रक्त कणों से भी छोटे नैनोशैल, नैनोमाइक्रो सुई, रेस्पिरोसाइट और नैनी रोबोटों का निर्माण संभव हो गया है। ऐसा अनुमान है कि, नैनो सुई के माध्यम से किसी बीमार कोशिका को सीधे टीका लगाया जाना संभव होगा। दूसरी ओर नैनो रोबोट के द्वारा डी.एन.ए. की मरम्मत भी की जा सकेगी। रेस्पिरोसाइट नामक रोबोट से दमा, खांसी जैसी सांस की बीमारियों से हमेशा के लिए छुटकारा मिल सकेगा। कुछ रोबोट ऐसे भी होंगे, जो धमनियों की गंदगी को साफ कर उसमें आए अवरोध को हटा कर उसे संपूर्ण रूप से सक्रिय कर देंगे। चौंकाने वाली बात है कि, रक्त प्रणाली में कार्यशील इन सूक्ष्म चिकित्सकीय उपकरणों को काम समाप्त हो जाने के पश्चात् शरीर से बाहर निकाला जा सकता है।

निःसंदेह नैनो विज्ञान का व्यावहारिक उपयोग अत्यंत सूक्ष्म उपकरणों एवं यंत्रों के निर्माण के अलावा औषधि, जैव प्रौद्योगिकी, पदार्थ विज्ञान, कंप्यूटर विज्ञान एवं सूचना प्रौद्योगिकी जैसे अनेक क्षेत्रों में किया जा रहा है।

नैनो तकनीक के नियम

नैनो पदार्थों का व्यवहार सामान्य पदार्थों के व्यवहार से अलग होता है, अतः इन्हें नियंत्रित करने वाले नियम भी भिन्न होते हैं। वस्तुतः नैनो पदार्थों के व्यवहार को न तो क्वांटम भौतिकी के नियमों से जाना जा सकता है और न ही पुरातन भौतिक की विधियों से। दरअसल, नैनो व्यवहार को परंपरागत एवं क्वांटम भौतिक के समन्वित नियमों से जाना जा सकता है। सर्वप्रथम कैलीफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों माइकल रूकज, थॉमस तिघे एवं कीघ श्वाब ने पता लगाया कि, नैनो युक्तियों से ऊष्मा का प्रवाह सतत की अपेक्षा सोपानी होता है जिसके परिणामस्वरूप नैनो स्तर के परिपथों को बनाने में परेशानी होती है। इस प्रकार नैनो स्तर पर विद्युत चालकत्व क्वांटीकृत हो जाता है, लेकिन लघु कणों से प्रवाहित होने वाले इलेक्ट्रॉन  तरंगवत व्यवहार करते हैं। अगर किसी नैनो तकनीक के माध्यम से नैनो स्तर पर आगम से निर्गम तक इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह के तरंगवत गुणधर्म को बनाए रखा जाए तो उसके प्रभाव काफी आश्चर्यजनक होंगे।

नैनो तकनीक उपागम

मुख्य रूप से नैनो तकनीक में दो प्रकार के उपागमो का प्रयोग किया जाता है। एक को बॉटम अप विधि एवं दूसरे को टॉप डाउन विधि कहा जाता है। ये दोनों तकनीकें या उपागम वैज्ञानिकों ने अपनी सुविधानुसार तथा पदार्थों की मूल प्रवृत्ति के अनुसार खोजी हैं। नैनो कणों की प्राप्ति की परम्परागत प्रविधि के अंतर्गत पदार्थ को एक विशेष फर्नेस में वाष्पीकरण के स्तर तक गर्म किया जाता है। तत्पश्चात् द्रव नाइट्रोजन से प्रशीतित किए गए सिलेण्डर की सतह तक पदार्थ के वाष्प स्वरूप को पहुंचाया जाता है, जिससे सिलेण्डर की सतह पर पदार्थ के नैनो कण एकत्रित होने लगते हैं। अंततः अपघर्षण द्वारा एकत्रित नैनो कणों को सिलेण्डर की सतह से खुरचकर प्राप्त कर लिया जाता है।

आधुनिक नैनो प्रविधि टॉप डाउन के अंतर्गत स्थूल पदार्थ संरचना को नैनो पदार्थ संरचना में तब्दील कर नैनो कणों की प्राप्ति की जाती है। इस तकनीक के माध्यम से स्वतंत्र धातुओं एवं मिश्र धातुओं के कण प्राप्त किए जाते हैं।

दूसरी ओर बॉटम अप प्रविधि में विद्युत रसायन प्रौद्योगिकियों के जरिए नैनो कणों को हासिल किया जाता है। इसमें विशेष रूप से मॉलिक्यूलर बीम एवीटेक्सी एवं मेटल आर्गेनिक डिपॉजिसन जैसी तकनीकियों का प्रयोग किया जाता है। विशिष्ट कार्यों एवं उच्च शोध गतिविधियों में प्रयुक्त होने वाले नैनो कणों को इसी तकनीक के जरिए प्राप्त किया जाता है। इस तकनीक का एक नकारात्मक पहलू है कि यह अत्यंत खर्चीली है, जिसके परिणामस्वरूप इसका औद्योगिक एवं व्यावसायिक अनुप्रयोग नहीं हो पा रहा है। बॉटम अप प्रद्योगिकी के अंतर्गत ही ‘निम्न ऊर्जा क्लस्टर बीम निक्षेपण‘ तथा ‘क्लस्टर्स निर्माण‘ प्रविधियों का भी इस्तेमाल किया जाता है। बहरहाल, वर्तमान समय में टॉप डाउन प्रौद्योगिकी का बहुतायत इस्तेमाल किया जा रहा है। दूसरी ओर, बॉटम अप प्रविधि अपेक्षाकृत अधिक व्यय साध्य तथा व्यावहारिक रूप से जटिल होने के कारण अनुप्रयोगात्मक दृष्टिकोण से सीमित बनी हुई है लेकिन सटीक एवं व्यापक परिणामों के दृष्टिगत यह तकनीक अधिक लाभकारी है।

बैंडगेप इंजीनियरिंगः इसके अंतर्गत अलग-अलग आकारों के कैडमियम सेलेनाइड के नैनो कणों को किसी द्रव में घोलने के बाद जब उस पर सफेद रोशनी प्रक्षेपित की जाती है, तब परखनलिकाओं में स्थित इस घोल के कैडमियम सेलेनाइड के नैनो कणों से विभिन्न वर्णीय प्रकाश का उत्सर्जन होता है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि कैडमियम सेलेनाइड का बैंडगेप नैनो कण के आकार के अनुसार परिवर्तित हो जाता है।

उल्लेखनीय है कि, इस तकनीक द्वारा इलेक्ट्रॉनिक प्रविधि के मूल पदार्थ सिलिकॉन के नैनो कणों को प्रकाश उत्सर्जक बनाया जा सकता है। इस विधि द्वारा जिरकोनियम सिरेमिक पारदर्शी पदार्थ का नैनो रूपांतरण किया जाता है। नैनोकरण से इसके बैंडगेपो की दूरी स्थूल रूप से भी अधिक बढ़ जाती है। जिसके परिणामस्वरूप इसकी पारदर्शिता आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है। इसके अनुप्रयोग के अंतर्गत जिरकोनियम के लेपन से प्लास्टिक लेंसों में जहां पारदर्शिता में वृद्धि होती है वहीं उसमें खरोंचरोधी गुण के पैदा होने से प्लास्टिक लैंसों की आयु एवं उपयोगिता में वृद्धि होती है।

नैनो तकनीक की उपलब्धियां

नैनो जैव संवेदीः ऐसे नैनो जैव-संवेदियों का विकास किया गया है जिनसे पौधों में लगने वाले रोगों को शुरू में ही पहचानना संभव हो सकेगा। ये जैव-संवेदी समय-समय पर नियमित रूप से पेड़-पौधों की स्थिति का जायजा लेंगे और उनकी समस्याओं को जानकर यथासाध्य सामयिक उपचार प्रदान करेंगे। इसके अतिरिक्त इनसे पशुओं के रोगों की जानकारी भी समय पर हासिल हो सकेगी।

जैव संवेदी नैनो नाकः नैनो वैज्ञानिक आकारनाथ श्रीवास्तव ने एक ऐसी ‘अपराध अन्वेषक जैव संवेदी नाक‘ का विकास किया है, जिसके माध्यम से जासूसी कुत्तों की तरह सूंघ कर
अपराधियों एवं विस्फोटको के बारे में पता लगाया जाना संभव होगा।

कृत्रिम नैनो हड्डीः कृत्रिम नैनो हड्डी एक ऐसी हड्डी है, जो एक बार आकार पा लेने पर अपना आकार बढ़ाकर प्राकृतिक हड्डी की तरह मजबूत हो जाती है। इस चमत्कारिक हड्डी का विकास नॉर्थ वेस्टन विश्वविद्यालय के डा. सैम स्टप और उनके साथियों ने किया। इस कृत्रिम नैनो हड्डी से टूटी हड्डियों को जोड़ा जा सकता है और हड्डी जनित विकृतियों को दूर किया जा सकता है।

नैनो सेंसरः नैनो सेंसर, जैवीय, सर्जिकल एवं रासायनिक सेंसर है जो नैनो कणों के बारे में जानकारी उपलब्ध कराता है। मानव देह की सूक्ष्म कोशिकाओं के बारे में बताने वाले नैनो सेंसर कार्बन परमाणुओं के पतले फिलामेंट से बने होते है। फिलामेंट कार्बन नैनो ट्यूब को डी.एन.ए के साथ मिश्रित कर इसे चिकित्सकीय उपयोग में लाया जाता है। शरीर के भीतर नैनोसेंसर इंफ्रारेड लाइट स्पेक्ट्रम के अंतर्गत फ्लोरसेट प्रकाश पैदा करते हैं। कोशिका के भीतर नैनोसेंसर डी.एन.ए. से पारस्परिक क्रिया करता है तब इसके द्वारा उत्पन्न प्रकाश सिग्नल में बदल जाता है। यह संकेतक कोशिका के विशेष परमाणुओं को खोजने में सहायक होता है। ये नैनो सेंसर डी.एन.ए. से युक्त होते हैं। अतः मनुष्य कोशिका (जीवित) में इसका प्रवेश पूर्णतया सुरक्षित तरीके से संभव हो पाता है।

नैनो प्रौद्योगिकी के संबंधित क्षेत्र

नैनो विज्ञान का व्यवहारिक उपयोग नैनो टेक्नोलॉजी के रूप में हो रहा है, जिसमें परमाणविक आकार के अत्यंत सूक्ष्म यंत्रों और उपकरणों का निर्माण किया जा सकता है। नैनो टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास ने औषधि, जैव-तकनीक, पदार्थ विज्ञान, जीनोमिक्स, सूक्ष्म उपकरणों के निर्माण, कंप्यूटर विज्ञान, सूचना प्रौद्योगिकी, रोबोटिक्स, संचार और विज्ञान के अन्य अग्रणी क्षेत्रों में नए द्वार खोल दिए हैं।

नैनो जीव एवं कृषि विज्ञानः पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ औद्योगिक और कृषि प्रणालियों की आवश्यकता को दृष्टिगत रखते हुए आज दुनियाभर में उधोगों में रसायन विज्ञान पर आधारित युक्तियों के स्थान पर जैव समाधानों को अपनाया जा रहा है। नैनो प्रौद्योगिकी ने एक ऐसी दुनिया का निर्माण किया है जिसमें चाहे जीन का क्षेत्र हो या प्रोटीन का, कार्बोहाइड्रेट का हो या लिपिड का, जब भी कोशिका स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता होगी, नैनो टेक्नोलॉजी को ही अपनाना होगा। कृषि के क्षेत्र में भी इस तरह की युक्तियों के उपयोग से उपज बढ़ाई जा सकेगी। मिट्टी में किन तत्वों की आवश्यकता है, उसे किस हद तक जल रिसाव के लिए उपयुक्त बनाया जा सकता है, इसके लिए नैनो टेक्नोलॉजी को अपनाया जाएगा। विश्व में कई देशों में ऐसी परियोजनाएं चलाई जा रही हैं, जहां नैनो पार्टिकल्स की मदद से मृदा प्रबंधन किया जा रहा है। अमेरिका के सिकोया पैसिफिक रिसर्च ऑफ ऊटा द्वारा उल्लेखनीय शोध कार्य संपन्न हुआ है। संस्थान द्वारा सॉयल सैट पद्धति विकसित की गई है जो मिट्टी बांधने में सहायक है। दरअसल मिट्टी सैट, नैनो स्तर पर रासायनिक प्रतिक्रियाएं कर मिट्टी को लम्बे समय तक बांधे रहता है। इसी दिशा में कनाडा के ओटावा संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. बी. जैंग ने नैनो सेंसर का प्रयोग कर पहली बार एक अत्यंत सूक्ष्म पद्धति ‘नैनो क्लीन अप सिस्टम‘ का प्रयोग किया है। इसके अंतर्गत प्रदूषित मिट्टी को चिन्हित किया जाता है और फिर इंजैक्शन द्वारा अति सूक्ष्म नैनो पार्टिकल्स को उन तक पहुंचाया जाता है। इस प्रक्रिया द्वारा नैनो कण सक्रिय हो जाते हैं और जल-प्रवाह के साथ अपनी यात्रा करते हैं। इस तरह यह मिट्टी पार्टिकल्स के बीच अपनी पैठ बना लेते हैं और छिपे हुए प्रदूषणकारी तत्वों को साफ करते जाते हैं। यह पद्धति पारंपरिक पद्धति की अपेक्षा न केवल तीव्र है, अपितु सस्ती भी है। इसके अंतर्गत फर्टीगेशन पद्धति उल्लेखनीय है, जिसमें खाद एवं पानी का घोल बनाकर संयुक्त रूप में पौधों तक पहुंचाया जाता है। इससे भी दो कदम आगे अब नैनो पोरस जियोलाइट्स का प्रयोग कर खाद-पानी को धीरे-धीर छोड़ने की असरकारी तकनीक भी तैयार की जा चुकी है। भूमिगत जल भी मूलभूत प्राकृतिक संसाधन है, इसलिए भूमिगत जल की शुद्धि न केवल धरती अपितु उससे सिंचित फसलों के लिए भी महत्वपूर्ण है। इस जल की शुद्धि हेतु नैनो कण, नैनोक्रोम, नैनो मैम्ब्रेन जैसी विधियां तैयार की जा चुकी हैं। अमेरिका की आर्गोनाइड कंपनी द्वारा बिगड़े भूमि जल के शुद्धिकरण के लिए नैनो मेम्ब्रेन (झिल्ली) का विकास किया गया है। यह जल से उसकी विषाक्तता एवं लवणता को समाप्त करती है। इसके अलावा इस कंपनी ने 2 नैनोमीटर व्यास के एल्यूमिनियम ऑक्साइड आधारित नैनोक्रोम से जल का शुद्धिकरण किया है। इस प्रकार के नैनो फाइबर फिल्टर से विषाणु, प्रोटोजोआ, जीवाणु तथा अन्य अत्यंत सूक्ष्म एवं खतरनाक तत्वों को जल से निकाला जा सकता है।

नैनो टेक्नोलॉजी द्वारा पशुधन विकास की योजनाएं भले ही नई हों, मगर एक प्रभावी सफलता की ओर संकेत करती है। देश में जब पहली बार पशु प्रजनन की दिशा में भ्रूण प्रत्यारोपण कर सफलता प्राप्त की गई थी तो किसी को यह इल्म न था कि नैनो तकनीक के रूप में इससे आगे की यात्रा अभी बाकी है। इधर नैनोफ्लू डिक्स का पशु प्रजनन में सफल प्रयोग नैनो क्रांति की और इशारा करता है। फ्लू डिक्स का प्रयोग पशु प्रजनन में शुक्राणुओं और अंडाणुओं के चयन में आपसी मिलान से पूर्व किया जाता है। नैनो सेंसर नेटवर्क पशु स्वास्थ्य के लिए वरदान साबित हुआ है। इसे पशुओं के अंदर लगा दिया जाता है, जिससे इनके स्वास्थ का परीक्षण विस्तार से किया जा सके। इसके अतिरिक्त नैनो सेंसर तंत्र द्वारा पशु की भू-स्थैतिक स्थिति भी जानी जा सकती है। उसके शरीर में विशेष प्रकार की चिप लगाए जाने से उसकी (पशु की) प्रत्येक गतिविधि को जाना जा सकेगा। गौरतलब है कि, मछली पालन में भी विभिन्न स्तरों पर नैनो के प्रयोग को लेकर अनुसंधान कार्य चल रहे हैं। समस्त विश्व में मछली पालन के क्षेत्र में नैनो टेक्नोलॉजी प्रभावी सिद्ध हुई। परिणामस्वरूप भारत में ही नहीं सारे विश्व में जल-जीव उत्पादन बढ़ रहा है।

नैनो मेट्रोलॉजीः नैनो तकनीक का संबंध माप विज्ञान से जुड़ा है। आज समस्त विश्व माइक्रो स्तर की मापन व्यवस्था से परिपूर्ण है तथा इस स्तर पर आसानी से कार्य किया जा रहा है। नैनो तकनीक के विकास ने नैनो मेट्रोलॉजी के लिए भी मार्ग खोल दिया गया है, क्योंकि मापन व्यवस्था में मानक का विकास होने पर ही सही-सही माप-तौल की जा सकती है। चाहे कोशिका की लम्बाई हो या मस्तिष्क के विद्युतीय चुम्बकीय क्षेत्र का मापन, जो अत्यंत सूक्ष्म होता है, सभी को मापने के लिए मानक आवश्यक है।

नैनो चिकित्साः नैनो टेक्नोलॉजी पर आधारित युक्तियों के उपयोग से कैंसर, एड्स, मधुमेह और कई अन्य रोगों के निदान और उपचार में क्रांति लाई जा सकती है। नैनो टेक्नोलॉजी से जैव औषधि के अनेक क्षेत्रों को लाभ हो सकता है। इन क्षेत्रों में अस्पतालों, प्रयोगशालाओं, यहां तक कि, मानव शरीर के भीतर उपयोग में लाए जाने वाले सेंसर औषधियों को शरीर के किसी खास अंग तक पहुंचा सकने वाली युक्तियां, मानव शरीर में प्रतिरोपित किए जाने वाले कृत्रिम अंगों के निर्माण में काम आने वाली परिष्कृत सामग्री और नई किस्म की औषधियां शामिल हैं।

चिकित्सा के क्षेत्र में नैनो टेक्नोलॉजी का संभावित उपयोग बीमारियों का प्रारंभिक अवस्था में पता लगाकर शीध्र उपचार में काम आने वाली युक्तियों के निर्माण में हो सकता है। इसके द्वारा ऐसे कृत्रिम अंग बनाए जा सकते हैं जो शरीर की बदलती आवश्यकताओं के अनुसार अपने-आप को ढाल सके और जिसे शरीर आसानी से स्वीकार कर ले। इसके द्वारा ऐसे पदार्थों और धातुओं का बनाना संभव हो जाएगा जो स्टील से पचास गुना ज्यादा मजबूत हों। इन धातुओं से शल्य चिकित्सा के उपकरण बनाए जा सकते हैं जो एक अकेली कोशिका तक की शल्य क्रिया करने में सक्षम होंगे।

नैनो टय़ूब एक ऐसी युक्ति है, जो अत्यंत सूक्ष्म नलिका के आकार की होती है। यह हमारी रक्त प्रणाली में आसानी से तैर सकती है, और इसके जरिए दवा को शरीर के किसी खास  अंग तक बड़ी आसानी से सही मात्रा मैं पहुंचाया जा सकता है।

नैनो तकनीक पर काम कर रहे जर्मनी के मैक्स लैंक संस्थान के वैज्ञानिकों ने क्वांटम डाट्स बनाया है। चुम्बकीय पदार्थो के नैनो कणों के स्वर्ण आवरण वाले इन चुम्बकीय आघूर्णन क्षमाताओं से युक्त क्यू बिंदुओं को कैंसर ग्रस्त रसौली तक ले जाकर अनियंत्रित रूप से बढ़ने वाली सूक्ष्म कैंसर कोशिकाओं के आस-पास एकत्र कर लिया जाता है। इन स्वर्ण आवरण युक्त चुम्बकीय पदार्थो के नैनो शैलों में भारी चुम्बकीय आघूर्णन मौजूद होता है। यह इसलिए संभव है, क्याकि सोने की परत चढ़ी इन नैनो शैलों का आकार लाल रक्त कोशिकाओं की अपेक्षा 20 गुना छोटा होता है। इंफ्रारेड द्वारा नैनो शैलों का तापमान कैंसरयुक्त कोझिकाओं को नष्ट कर दिया जाता है। इस प्रविधि को हाइपोथर्मिया कहा जाता है।

हजारों नैनो तारों युक्त सेंसर टेस्ट चिप कैंसरकारी कोशिकाओं द्वारा छोड़े गए जैवचिन्हों एवं प्रोटीनों को पहचानने में सक्षम है, जिसके परिणामस्वरूप रोगी के रक्त की कुछ बूंदों के परीक्षण से ही कैंसर की प्रारम्भिक अवस्था को जाना जा सकता है। इसके अतिरिक्त जॉन कैजियस ने एक रेडियो मशीन का आविष्कार किया है जो रेडियो तरंगों एवं कार्बन के कॉम्बिनेशन या सोने के नैनो कणों द्वारा कैंसर कोशिकाओं को नष्ट कर सकती है।

कैडमियम सेलेनाइड के नैनो कण जब पराबैंगनी प्रकाश का परित्याग करते हैं, तो ये चमकते हैं। जब केडमियम सेलेनाइड को मानव शरीर में प्रविष्ट कराया जाता है तो ये कैंसर ट्यूमर तक पहुंचकर चमकने लगते हैं जिससे ट्यूमर भी चमकने लगता है और सर्जन इसकी सटीक अवस्थिति एवं आकार का अनुमान लगाकर इसे भली-भांति हटा देते हैं।

चिकित्सा में नैनो विज्ञान का योगदान अविश्वसनीय क्षमताओं वाला है-विशेष तौर पर सर्जरी में। शरीर की कोशिकाओं के लिए सर्जरी एक विध्वंसकारी प्रक्रिया है। सर्जरी इसीलिए लाभदायक होती है क्योंकि कोशिकाओं में चोट को भरने एवं पुनः उत्पन्न होने की क्षमता होती है। परंतु यदि हम कोशिकाओं के अंदर नैनो माप पर शल्य-क्रिया द्वारा रोग निदान एवं दवा दें, तो यह बायो चिकित्सा विज्ञान में क्रांतिकारी सिद्ध होगा। कोशिकाओं तथा इस प्रकार प्राप्त सूचना द्वारा वैज्ञानिक किसी भी रोग को प्रारम्भ में ही समाप्त कर सकते हैं तथा मरम्मत की प्रक्रिया को तीव्र कर सकते हैं। अतः चिकित्सा में इनकी भूमिका काफी प्रमुख है, चूंकि किसी भी नैनो कण का रंग उसके आकार पर निर्भर करता है। अतः एक कोशिका के विभिन्न प्रोटीनों को पहचाना जा सकता है। उदाहरण के लिए, कैंसर की पहचान रक्त में विद्यमान एक विशेष प्रोटीन, जिसे ‘बायोमार्कर’ कहते हैं, द्वारा की जा सकती है।

चिकित्सा के क्षेत्र में मानव द्वारा उत्पन्न नैनो उपकरण मुख्यतः कार्बन आधारित होते हैं। चिकित्सीय उपयोग में धीरे-धीरे प्रयोग में आ रहे अन्य नैनो संरचनात्मक पदार्थ पालिमर डेंडरीमर तथा क्वांटम डॉट्स हैं। कृत्रिम रूप से उत्पन्न किए जाने वाले नैनो पदार्थ सूक्ष्म-पर्यावरणीय दशाओं में सामान्यतः स्वयं संगृहीत हो जाते हैं (वैसे इनकी रचना करना काफी कठिन होता है)। शरीर में डालने पर नैनो पदार्थ शरीर में सामान्य संचरण का मार्ग लेते हैं तथा रोगी कोशिकाएं दवा को सोख लेती हैं। इस प्रक्रिया में शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली इन्हें बाह्य पदार्थ के रूप में नहीं पहचान पाती। नैनो फार्माकोलॉजी के अंतर्गत भी जीव विज्ञानी रूप से सक्रिय यौगिकों तथा नैनो पदार्थों को जोड़ कर असामान्य व रोगी कोशिका की पहचान व चिकित्सा की जाती है। चिकित्सा में प्रयोग होने वाले नैनो उपकरण 1 से 100 नैनो मीटर के बीच होते हैं। एक नैनो मीटर, मिलीमीटर (mm) का 1/10,00,000 वां भाग होता है। मानव शरीर में पाई जाने वाली कुछ प्राकृतिक नैनो संरचनाएं हैं-इंसुलिन (2mm), हीमोग्लोबिन (4mm) तथा कई अन्य एंजाइम।

नैनो कण मजबूती, प्रत्यास्थता, विद्युत चालकता तथा रंग, आदि गुणों को प्रदर्शित करते हैं, जबकि इनके पदार्थ रूप सूक्ष्म अथवा वृहद स्तर पर ये गुण प्रदर्शित नहीं करते है। नैनो कण MRI तथा अल्ट्रासोनोग्राफी में निदानात्मक कार्य निभा सकते हैं। ये कोशिका भित्ति एवं केंद्रक में विधमान कोशिका द्रव्य को भेद सकते हैं जिससे चिकित्सा में सहायता मिलती है। ये शरीर में सीधे कैंसरग्रस्त कोशिकाओं तक पहुंचते हैं और उन्हें नष्ट कर देते है एवं अन्य स्वस्थ कोशिकाओं व ऊतकों को हानि नहीं पहुंचाते। ‘नैनो ड्रग‘ तथा ‘नैनो कोट‘ भी हाल ही में विकसित दवा प्रदान करने की प्रणालियां हैं। लागत एवं प्रभावशीलता, दोनों ही आधारों पर यह परम्परागत तकनीकों से लाभदायक हैं। इन तकनीकों में प्रमुख बल, इस बात पर दिया जाता है कि, माइग्रेन में घंटों में नहीं, बल्कि तुरंत आराम मिले, अस्थमा की एक ही खुराक पूरे दिन स्वस्थ रखे तथा दवा के दुष्परिणाम भी कम हों। स्वयं संगृहीत पेपराइड नैनो ट्यूब, बैक्टीरिया में घुसकर उन्हें नष्ट करती हैं।

4 फरवरी, 2007 से दवा देने की एक नई नैनों तकनीक प्रणाली, नैनोक्सेल बाजार में उपलब्ध हो गई है। यह प्रणाली कैंसर की दवा ‘पैक्लटेक्सल’ हेतु की गई। डाबर फार्मा लिमिटेड द्वारा आरम्भ की गई इस नई प्रणाली द्वारा पहली बार अमेरिका के बाहर नैनो तकनीक आधारित फार्मास्युटिकल उत्पाद का व्यावसायीकरण किया जा रहा है। एक कीमोथेरेपी चक्र हेतु नैनोक्सेल 16,000 रुपए में उपलब्ध होगी, जो कि वर्तमान थेरेपी से कुछ महंगी होगी। यह नवीन विधि नए पॉलिमर आधारित नैनो कण, जो जल में घुलनशील हैं, के रूप में होगी। पैक्लीटेक्सल, जो सबसे अधिक प्रयोग होने वाला कीमोथेरेपी एजेंट है, वर्तमान में कैस्टर ऑयल आधारित विलायक क्रेमोफोर के साथ मिलाकर दिया जाता है, जिससे इसके कई दुष्प्रभाव हो जाते हैं। डाबर की नैनोक्सेल, जिसमें दवा व पॉलिमर का अनुपात एक व आधे (1:½) का है वहीं क्रेमोफोर में यह अनुपात एक व अस्सी (1:80) का है। अतः आशा है कि नैनोक्सेल के दुष्प्रभाव कम होंगे।

राइस विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने मांस के दो टुकड़ों को जोड़ने में सफलता प्राप्त की है। ग्रीनिश द्रव, जिसमें स्वर्ण आवरण युक्त नैनो शैल मौजूद होती हैं, को दो मांस के टुकड़ों के मध्य संधि रेखा में धीरे-धीरे टपकाया जाता है। संधि रेखा के साथ-साथ इंफ्रारेड लेजर को गुजारा जाता है जिससे दोनों टुकड़े आपस में जुड़ जाते हैं। यह आविष्कार चिकित्सा जगत में क्रांतिकारी साबित होगा। इससे वृक्क एवं हृदय के प्रत्यारोपण के दौरान कट गई धमनियों को टांके लगाने में रक्त की होने वाली क्षति को रोका जा सकेगा। यह फ्लैश वेल्डर आसानी एवं विशिष्टता के साथ धमनियों को शीघ्र एवं सफलतापूर्वक जोड़ देगा। नैनो प्रणाली का उपयोग अन्य रोगों के निवारणार्थ भी किया जा सकता है। इसके अंतर्गत औषधियुक्त चुम्बकीय नैनो कणों के शक्तिशाली आघूर्ण को रक्त में अंतःक्षिप्त करने के बाद बाल चुम्बकों के सहयोग से रोगग्रस्त जगहों पर पहुंचाकर रोग के कारकों को समूल नष्ट कर दिया जाता है।

नैनो रोबोटः वैज्ञानिकों ने चिकित्सा एवं औषधि क्षेत्र में, नैनो रोबोट के प्रयोग की संभावना की परिकल्पना की है। अगर यह परिकल्पना साकार हो जाती है, तो यह चिकित्सा एवं दवा परिदृश्य को पूरी तरह बदलकर रख देगा। नैनो मेडिसिन के अंतर्गत इन नैनो रोबोट (कम्प्यूटेशनल जीन) को शरीर में क्षति की पहचान करने, उसकी मरम्मत करने तथा संक्रमण का पता लगाने के लिए प्रविष्ट कराया जाएगा। चिकित्सक ध्वनि तरंगों के माध्यम से इन नैनो डिवाइस की निगरानी एवं प्रगति का जायजा लेगे एवं निश्चित करेंगे, कि ये लक्षित उपचार क्षेत्र एवं अंग तक पहुंच गए हैं।

मॉलिक्युलर मैन्यूफैक्चरिंग संस्थान के वैज्ञानिक रॉबर्ट फेरिटॉस के अनुसार, रक्त धमनियों में तैरने वाले नैनो रोबोट का आकार 0.5 से 3 माइक्रोमीटर के बीच होगा तथा इन्हें मुख्यतः कार्बन तत्व द्वारा बनाया जाएगा। नैनो रोबोट द्वारा दवा की मात्रा इच्छित शारीरिक अंग एवं क्षेत्र तक शत-प्रतिशत रूप से पहुंचायी जा सकेगी। साथ ही उपचार को 100 प्रतिशत सफल बनाया जा सकेगा।

नैनो तकनीक एवं अंतरिक्ष विज्ञानः नैनो तकनीक की विशेषता है कि, इसके माध्यम से अत्यंत विकसित उपग्रहों पे लघु रूप तैयार किए जा सकते हैं तथा अनुसंधानों एवं अभियानों में प्रयुक्त किए जा सकते हैं। नैनो प्रौद्योगिकी से ऐसे रोबोट बनाए जा सकेंगे जो मंगल ग्रह पर पहुंचकर वहां के वातावरण में ऑक्सीजन और नाइट्रोजन गैसों की उपस्थिति एवं संरचना को पृथ्वी सदृश बनाने में सक्षम होंगे। इससे मंगल एवं अन्य ग्रहों (मानव जीवन की उपस्थिति की आशा वाले) पर पृथ्वी की तरह जीवन अनुकूल वातावरण तैयार किया जा सकेगा।

नैनो प्रविधि से अंतरिक्ष अभियान में उपयोग में लाई जाने वाली, कम भार एवं आयतन के साथ-साथ कम ऊर्जा खर्च करने वाले सेंसर, संचार एवं नेविगेशन से संबंधित उपकरण, प्रपल्सन प्रणाली, इत्यादि का निर्माण संभव है। इसके द्वारा उच्च इलेक्ट्रॉनिक्स एवं संगणकीय सुविधा उपलब्ध कराने के कारण भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के आधार पर कार्य करने वाले अंतरिक्ष यात्री का निर्माण किया जाना संभव होगा। कुल मिलाकर नैनो प्रौद्योगिकी के द्वारा अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में निर्माण कला को अत्याधुनिक एवं आश्चर्यजनक स्वरूप दिया जा सकेगा। ऊर्जा एवं नैनो तकनीक पिछले कुछ दशकों से, विज्ञान एवं इंजीनियरिंग के क्षेत्र में नयी एवं विकसित ऊर्जा तकनीकियों का विकास करने के प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि समस्त विश्व में जीवन क्षमता में विकास हो सके। इस दिशा में एक लंबी छलांग लगाने के लिए वैज्ञानिकों एवं इंजीनियरों ने नैनो तकनीक का प्रयोग ऊर्जा क्षेत्र में करने प्रारंभ कर दिए हैं। ऊर्जा के क्षेत्र में नैनो तकनीक के उपक्षेत्र को नैनो फेब्रीकेशन कहा जाता है। नैनो फेब्रीकेशन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें उपकरणों का निर्माण नैनो पैमाने पर किया जाता है। 100 नैनोमीटर से भी छोटे आकार के उपकरणों के निर्माण ने ऊर्जा के निर्माण, संचयन, एवं पारेषण तकनीक के विकास के नए आयाम प्रस्तुत किए हैं। ऊर्जा क्षेत्र में इन नैनो उपकरणों के लाभ महसूस किए गए हैं जिससे लाइटिंग और हीटिंग दक्षता में वृद्धि तथा ऊर्जा के उपयोग से उत्पन्न प्रदूषण में कमी आयी है। इन लाभों ने नैनो तकनीक में पूंजी निवेश को प्रोत्साहित किया है तथा नैनो अनुसंधान एवं विकास को उच्च प्राथमिकता का क्षेत्र बना दिया है।

इस दिशा में डेज एनालिटिक कॉरपोरेशन ने ‘कंजर्व’ नाम का उत्पाद बनाया है, जिसमें नैनो पैमाने पर पोलीमर मेम्ब्रिन का प्रयोग किया गया, जिसने निःसंदेह हीटिंग एवं कूलिंग सिस्टम की दक्षता को बढ़ाया है और ऊर्जा की खपत को कम किया है।

कार्बन नैनो ट्यूब

नैनो कार्बन ट्यूब अत्यंत सूक्ष्म नलिका के आकार की होती है एवं इनका आकार 1 नैनोमीटर तक होता है। यह हमारी रक्त प्रणाली में आसानी से तैर सकती है और इसके जरिए दवा को शरीर के किसी खास अंग तक बड़ी आसानी से और सही मात्रा में पहुंचाया जा सकता है। कार्बन नैनो ट्यूब की लोचशीलता अत्यधिक होती है, इसलिए इनको मोड़कर फिर से आसानी से सीधा किया जा सकता है। नैनो ट्यूबों में इलैक्ट्रॉनिक गुण होने के कारण इसका उपयोग विभिन्न नैनो इलेक्ट्रॉनिक युक्तियों एवं अनुसंधानों में हो सकता है।

नाभिकीय संयंत्रों में नैनो फिल्टर की सहायता से प्रयुक्त होने वाले ईधन का संसाधन, शुद्धिकरण एवं अपशिष्ट प्रबंधन तुलनात्मक रूप से अधिक सुरक्षात्मक एवं स्पष्ट रूप से किया जा सकता है। नैनो पोलिमर एवं सिरेमिक से कम घिसने वाले टायरों का निर्माण संभव होगा जिससे टायर किफायती साबित होंगे और प्रदूषण स्तर को भी घटाया जा सकेगा।

लैड आधारित उत्पाद परम्परागत बल्ब की अपेक्षा 10 प्रतिशत ही ऊर्जा की खपत करते है तथा लम्बे समय तक टिकाऊ रहते हैं।

वैज्ञानिक लंबे समय तक चलने वाली बैटरी पर भी नैनो तकनीक द्वारा शोध कर रहे है। कहा जा सकता है कि भविष्य में नैनो तकनीक का तापीय (थर्मल) अनुप्रयोग कम लागत की हीटिंग, वेंटिलेशन और एयर कंडीशनिंग व्यवस्था को स्थापित करेगा। इसमें आणविक संरचना को परिवर्तित कर तापमान का अधिक बेहतर प्रबंधन संभव होगा।

नैनो मैटेरियल (नैनो सामग्री)

नैनो पदार्थ के अंतर्गत पदार्थ विज्ञान को नैनो तकनीक की परिधि में विश्लेषित किया जाता है। इसके अंतर्गत पदार्थ को नैनो पैमाने पर उसके आकृति मूलक गुणधर्म के संदर्भ में जांचा परखा जाता है। खास तौर पर उन पदार्थों का, जिनमें नैनो आकार आयामों में विशेष गुणधर्म उत्पन्न होते हैं। नैनो आकार को साधारणतया माइक्रोमीटर के दसवें भाग से भी छोटा माना जाता है।

नैनो आकार पर पदार्थों को लाने से इनके गुणधर्मों में इनके स्थूल आकार से विपरीत अचानक एवं आश्चर्यजनक परिवर्तन एवं आयाम देखने को मिलते हैं, जैसे-अपारदर्शी पदार्थ का पारदर्शी बनना (तांबा), निष्क्रिय पदार्थ का उत्प्रेरक बनना (प्लेटीनम), स्थायी पदार्थ का दहनशील में परिवर्तित (एल्मुनियम), कमरे के तापमान (सामान्य तापमान) पर ठोस का द्रव में बदलना (सोना), कुचालक का चालक बनना (सिलिकॉन)। पदार्थ जैसे-स्वर्ण, जोकि सामान्य आकार में रासायनिक रूप से निश्क्रिय होता है, नैनो आकार में शक्तिशाली रासायनिक उत्प्रेरक का प्रदर्शन करता है। क्वांटम एवं स्थूल फीनोमिना के अंतर्गत, नैनो स्तर पर पदार्थ विशेष गुणधर्म उत्पन्न करते हैं, जो नैनो प्रौद्योगिकी के प्रति विशेष आकर्षण उत्पन्न करता है।

पदार्थ को नैनो पदार्थ में दो रूपों में वर्गीकृत किया जाता है-फुलरेन्स एवं अकार्बनिक नैनो कण। वस्तुतः फुलरेन्स कार्बन का अपरूप होता है तथा यह एक ग्रेफीन शीट है, जो टयूब में लिपटी होती है। अकार्बनिक नैनों कण या नैनो क्रिस्टल, धातुओं, अर्द्धचालकों या ऑक्साइडों के बने होते हैं, और अपने विशेष यांत्रिक, वैद्युतीय, मैग्नेटिक, ऑप्टिकल, रासायनिक एवं अन्य गुणधर्मो के लिए जाने जाते है। नैनो कणों का उपयोग क्वॉन्टम डाट्स तथा रासायनिक उत्पेरक के रूप में होता है। नैनो कण वैज्ञानिकों के लिए विशेष रुचिकर है, क्योंकि ये पदार्थ के स्थूल एवं आण्विक संरचना के मध्य सेतु का काम करते हैं।

नेनो पदार्थ एवं तकनीक से स्वास्थ्य रक्षा विकास में काफी अपेक्षाएं की गई है, जैसे अधिक सटीक दवा डिलीवरी, नई कैंसर उपचार तकनीक तथा रोगों की सामयिक पहचान आदि। लेकिन इसके कुछ अवांछित प्रभाव भी परिलक्षित हुए हैं। इसके अंतर्गत अधिक परिमाण में शरीर द्वारा दवा का अवशोषण चिंता का मुख्य विषय है।

जैसे-जैसे वैश्विक स्तर पर नैनो कणों का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे इसमें संलग्न कर्मियों एवं उपभोक्ताओं की सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ती जा रही हैं। इस दिशा में स्वीडिश केरोलिना संस्थान ने एक अध्ययन कराया। इसमें दर्शाया गया कि, आयरन ऑक्साइड के नैनो कण आंशिक डी.एन.ए. क्षति करते हैं तथा नॉन टॉक्सिक होते हैं। जिंक ऑक्साइड नैनो कण थोडे-बहुत खतरनाक हो सकते हैं। टीटोनियम डायोक्साइड केवल डी.एन.ए. क्षति पहुंचाते हैं। कार्बन नैनो ट्यूब निम्म स्तर पर डी.एन.ए. क्षति पहुंचाती है। कॉपर ऑक्साइड को अत्यधिक नुकसानदेह नैनो कण माना गया है तथा इसे स्पष्ट रूप से स्वास्थ्य का शत्रु घोषित किया गया है।

क्वांटम कंप्यूटिंग

नैनो टेक्नोलॉजी की भौतिक एवं रासायनिक प्रक्रियाओं का उपयोग करके विशेष प्रकार के कंप्यूटर प्रोसेसरों एवं मैमोरी डिवाइस का विकास किया जा सकता है। इस तकनीक से आणविक कंप्यूटरों का विकास भी किया जा सकता है। यह कंप्यूटर आधुनिक किस्म के होंगे और इन्हें बनाने में परम्परागत प्रणालियों की आवश्यकता नहीं होगी। इस दिशा में क्वांटम कंप्यूटिंग नैनो तकनीक का एक नया चमत्कार है। सर्वप्रथम रिचर्ड फिनमैन ने 1981 में क्वांटम कंप्यूटिंग का विचार दिया, जबकि वर्ष 1985 में डेविड डाउच ने इसकी सैद्धांतिक संरचना का विकास किया। परम्परागत कंप्यूटर में 0 एवं 1 की मदद से ही समस्त गणनाएं होती हैं जबकि क्वांटम कंप्यूटर में क्वांटम यांत्रिकी के सिद्धांत का प्रयोग होता है। इसके अंतर्गत अत्यंत छोटे पिंडों की संरचना एवं व्यवहार के बारे में अध्ययन एवं सूचना प्राप्त की जाती है। इसमें पूरा ‘कंप्यूटेशनल के केवल एक हार्डवेयर में होता है जो इसकी आश्चर्यजनक खूबी है। गौरतलब है कि, इस मार्ग में सुपर पोजीशन होता है, जिसके अंतर्गत अनावश्यक अंश धनात्मक एवं ऋणात्मक होकर समाप्त हो जाते हैं तथा गणना हेतु सिर्फ आवश्यक अंक ही बचे रह जाते हैं।

वर्ष 2005 में मिशिगन विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने एक अर्द्धचालक चिप का निर्माण किया, जिसने आयन मार्ग का काम किया। यह उपकरण मानक लिथोग्राफी तकनीक पर बनाया गया। वर्ष 2006 में इसका उन्नत रूप तैयार किया गया।

1 नवम्बर, 2007 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार नैनों स्केल कंप्यूटिंग व्यक्तिगत तथा औद्योगिक ‘डाटा संग्रह‘ में अत्यधिक परिवर्तन लाने वाली है। मैग्नेटिक रेन्डम एक्सेस मेमोरी, डिस्क ड्राइव तथा कंप्यूटर चिप को एक ही में समेट देगी, जिससे प्रोसेसिंग शक्ति तथा संग्रहण क्षमता दोनों ही विस्तृत हो जाएगी।

वर्ष 2009 में येल विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने पहला सालिड-स्टेट-क्वांटम प्रोसेसर तैयार किया। इसकी 2 क्यूबिट अतिचालक चिप प्रारम्भिक एलगोरिथम को चलाने में सक्षम थी। डी.एन.ए. नैनो तकनीक

डी.एन.ए. नैनो तकनीक की अवधारणा का सर्वप्रथम आविष्कार वर्ष 1980 में नेडरियन सीमन ने किया। वर्ष 1991 में सीमन प्रयोगशाला ने डी.एन.ए. से निर्मित एक क्यूब के संश्लेषण को प्रकाशित किया।

विभिन्न क्वाटम कंप्यूटर

यह पहली नैनो आकार पर आधारित त्रि-आयामी वस्तु थी। इसके लिए 1995 में नेडरियन सीमन को नैनो तकनीक में फेनमेन पुरस्कार प्राप्त हुआ। डी.एन.ए. नैनो तकनीक, डी.एन.ए. संरचना के उपयोगी प्रापर्टीज को प्रयोग करता है। डी.एन.ए. नैनो तकनीक का मुख्य उद्देश्य है कि, डी.एन.ए. अणु की कौन-सी सीक्वेंस दी हुई संरचना के साथ सम्बद्ध हो पाएगी। गौरतलब है कि, अभी तक तैयार एक सामान्य चिप में डी.एन.ए. के 200000 अलग-अलग धब्बे होते है और प्रत्येक धब्बे का व्यास 20-40 माइक्रोमीटर होता है। वर्तमान में नैनो लिथोग्राफी का प्रयोग करके पारम्परिक जीन चिप के एक धब्बे की जगह में 1,00,000 डी.एन.ए. धब्बे को तैयार किया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप, सुई की नोंक से भी कम जगह में 1,00,000 अलग-अलग विकिर्णिक जांच वाली जीन तैयार की जा सकेंगी। परिणामस्वरूप चंद सेकेंडों में जीन चिप निर्मित हो सकेगी।

डी.एन.ए. नैनो तकनीक द्वारा वैज्ञानिक आणविक वैद्युतीय उपकरणों को सम्बद्ध करने में रूचि ले रहे हैं। यहां तक कि, वैज्ञानिक डी.एन.ए. नैनो प्रविधि का प्रयोग सिंगल वॉल्ड कार्बन नैनोटयूब को फील्ड इफैक्ट ट्रांजिस्टर में परिवर्तित करने हेतु कर रहे हैं।

नैनो तकनीक के अन्य उपयोग

भारत में नैनों प्रौद्योगिकी

सूचना प्रौद्योगिकी विभाग का नैनो टेक्नोलॉजी प्रयास वर्ष 2004 में प्रारंभ हुआ, जिसमें नैनो इलेक्ट्रॉनिक्स पर फोकस किया गया। कार्यक्रम के अंतर्गत संस्थागत क्षमता निर्माण और अनुसंधान व विकास के लिए ढाँचागत सुविधाओं तथा नैनो इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में मानव संसाधन विकास पर ध्यान दिया गया है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मुंबई) तथा भारतीय विज्ञान संस्थान (बंगलुरू) में लगभग 100 करोड़ रुपए की लागत से नैनो इलेक्ट्रॉनिक्स उत्कृष्टता केंद्र बनाए जा रहे हैं। इन नैनो इलेक्ट्रॉनिक्स उत्कृष्टता केंद्र के अंतर्गत स्वास्थ्य एवं पर्यावरण निगरानी, आर्गेनिक एवं बायोपॉलीमर उपकरणों, जीएएन उपकरणों, ध्वनि आधारित संवेदी उपकरणों, एलसी रेजोनेटर्स के लिए चुंबकीय सामग्री, फेरोइलेक्ट्रॉनिक्स फेज शिफ्टर, आदि के विकास पर काम किया जाएगा। इसके अलावा 25 करोड़ की लागत से ‘भारतीय नैनो इलेक्ट्रॉनिक्स उपयोगकर्ता कार्यक्रम‘ भी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मुंबई) तथा भारतीय विज्ञान संस्थान (बंगलुरू) में प्रारंभ किया गया। इस कायक्रम के अंतर्गत स्थापित सुविधाओं को बाहरी उपयोगकर्ताओं की भागीदारी एवं सहभागिता के द्वारा नैनो इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में ज्ञान और विशेषज्ञता को बढ़ाने में सहोयता दी जाएगी।

नैनो मिशन

वर्ष 2007 में भारत सरकार द्वारा नैनो विज्ञान एवं तकनीक मिशन का अनुमोदन किया गया। इस मिशन के अंतर्गत पहले पांच वर्षों के लिए 1,000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए। इस मिशन का उद्देश्य भारत को विश्व स्तरीय नैनी प्रौद्योगिकी का केंद्र बनाना है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग इस मिशन के कार्यान्वयन की नोडल एजेंसी है। नैनो मिशन के मुख्य क्षेत्र होंगे-

भारत सरकार ने कुछ अन्य देशों के साथ मिलकर, ‘अंतरराष्ट्रीय चूर्ण धातुकर्म एवं नवीन पदार्थ उन्नत अनुसंधान केंद्र’ (हैदराबाद) में एक ‘राष्ट्रीय नैनो पदार्थ (मैटेरियल्स)‘ केंद्र स्थापित किया है। देश के कई शोधार्थी एवं वैज्ञानिक इस ज्ञानवर्धक एवं सक्षम प्रौद्योगिकी के विकास में संलग्न हैं।

नैनो सिटी प्रोजेक्ट

अक्टूबर 2007 में कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय ने चंडीगढ़ में नैनो सिटी परियोजना पर एक प्रस्तुतीकरण दिया। यह परियोजना हरियाणा के पंचकुला जिले में स्थापित की गई है। नैनी सिटी परियोजना को हरियाणा सरकार एवं प्रसिद्ध वैज्ञानिक सबीर भाटिया द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया है। इसकी संकल्पना एवं योजना कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के पर्यावरण डिजाइन कॉलेज द्वारा की गई है। परियोजना का लक्ष्य जल व विद्युत स्रोतों का पूर्ण एवं दक्षतापूर्ण उपयोग है, जिसमें पर्यावरणीय कारकों को भी ध्यान में रखा जाएगा।