पृथ्वीराज चौहान तृतीय – (1177-92)
प्रधानमंत्री – कैमास (कदम्बवास) मूलत: दक्षिणी पूर्वी पंजाब के निवासी व सामन्त थे। ये दहिया राजपूत सरदार थे।
सेनापति – भुवन मल्ल (कर्पूरी देवी के सम्बन्धी चाचा)
पृथ्वीराज चौहान तृतीय की उपाधियाँ-
(i) दल पूँगल (विश्व विजेता)
(ii) रायपिथौरा (युद्ध में पीठ न दिखाने वाला)
महोबा से संघर्ष के प्रमुख कारण-
1. भण्डाणिको के दमन के बाद लौटते समय घायल चौहान राज्य के सैनिको की हत्या परमर्दीदेव ने करवाई थी।
2. भण्डाणिको के दमन के बाद महोबा राज्य से चौहान राज्य की सीधी सीमा लगने लगी अत: सीमा विवाद बढ़ा।
पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने महोबा राज्य से संघर्ष के समय सर्वप्रथम नरायन पर अधिकार किया था।
आल्हा-ऊदल से पूर्व परमर्दीदेव ने “मलखान” को चौहानो की प्रगति रोकन हेतु भेजा था। असफल रहा।
अजमेर-कन्नौज संघर्ष के कारण-
(1) पृथ्वीराज के अनुसार – संयोगिता विवाद अन्य नाम “पृथ्वीराज विजय में” तिलोत्तमा संजुक्ता “सुर्जन चरित में कांतिमती नाम मिलता हैं।
पृथ्वीराज रासो के मत का समर्थन गोपीनाथ शर्मा ने किया व डॉ. दशरथ शर्मा + अबुल फज़ल ने किया है।
(2) महोबा राज्य पर चौहानो का अधिकार होने के बाद चौहान व कन्नौज राज्यों की सीमा लगने लगी (हसन निजामी के अनुसार)अत: सीमा विवाद भी कारण बना।
(3) पूर्व में भी विग्रहराज चतुर्थ ने कन्नौज के विजयचन्द्र को पराजित किया था अत: शत्रुता पहले से ही थी।
चौहान-चालुक्य संघर्ष का कारण
1. पृथ्वीराज रासो के अनुसार आबू के परमार शासक जैतसिंह की पुत्री इच्छिनी देवी से विवाह को लेकर। तथा भीम द्वितीय (चालुक्य) द्वारा पूर्व में सोमेश्वर चौहान की हत्या करना।
2. पृथ्वीराज तृतीय के चाचा कान्हड़देव ने भीम द्वितीय के चचेरे भाई की हत्या की थी, तो भीम द्वितीय ने सोमेश्वर की हत्या कर दी व नागौर पर अधिकार कर लिया था। अत: बदला लेने हेतु पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने भीम द्वितीय से युद्ध कर उसे पराजित किया।
3. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार सीमाएँ लगने के कारण साम्राज्य विस्तार का प्रयास दोनों ओर से था अत: महतवकांक्षाओं का टकराव भी एक कारण बना।
4. नागौर युद्ध के बाद हुई सन्धि मे नागौर, पाली, जालौर व सिरोही पर पृथ्वीराज तृतीय का अधिकार हो गया था।
5. दोनो के बीच 1184 में नागौर का युद्ध हुआ इसमें भीम द्वितीय के प्रधानमंत्री जगदेव प्रतिहार ने चालुक्य सेना का नेतृत्व किया।
मो. गौरी-चौहान संघर्ष –
विभिन्न स्त्रोतों मे पृथ्वीराज तृतीय व मोहम्मद गौरी के बीच संघर्ष की संख्या अलग-अलग बतायी गयी है-
1. पृथ्वीराज रासो – 21 बार
2. सुर्जन चरित्र – 21 बार
3. प्रबन्ध कोष - 20 बार
4. प्रबन्ध चिन्तामणी - 23 बार
5. हम्मीर महाकाव्य – 7 बार
6. फारसी तवारीख – 2 बार
तबाकतें नासीरी (मिन्हाज सिराज)
ताज-उल-मआसिर (हसन निजामी)
मो. गौरी
तराईन का प्रथम युद्ध- (1191)
तराईन का द्वितीय युद्ध (1192)
चौहान की पराजय क्यों हुई-
1. चन्देल + गहड़वाल गठबन्धन
2. मुख्य सेना का अनुपस्थित होना, अव्यवस्थित सेना।
3. तराईन प्रथम युद्ध मे गौरी का पीछा न करना
4. राजकार्य में ध्यान न देकर विलासिता पूर्वक जीवन जीना।
5. पड़ौसी राज्यों से मैत्री सम्बन्ध न होने से समय पर सहायता न मिलतना।
6. अश्वपति, प्रतापसिंह जैसे सामन्तो द्वारा विश्वासघात करना।
तराईन द्वितीय युद्ध के बाद चौहन की मृत्यु से सम्बन्धित मत-
1. “पृथ्वीराज रासो”- पृथ्वीराज तृतीय को गजनी ले जाया गया वही मृत्यु।
2. “पृथ्वीराज प्रबन्ध” – चौहान को बन्दी बनाकर अजमेर लाया गया, बाद में उसे खड्डा खोदकर गाड़ दिया गया।
3. “हम्मीर महाकाव्य”- चौहान को कैद करके बाद में उसकी हत्या की गयी।
4. “विरूद्ध विधि विध्वंस”- युद्ध में ही वीरगति
5. हसन निजामी – “ताज उल मआसिर” बन्दी बनाकर अधीनता मनवाकर पुन: अजमेर का शासक बनाया बाद में विद्रोह करने पर मृत्युदण्ड दिया गया।
6. मिन्हाज सिराज – “तबकाते नासीरी”- तराईन, द्वितीय युद्ध के बाद सिरसा (हरियाणा) स्थान पर उसकी हत्या कर दी गयी।
7. अबुल फजल – गौरी उसे गजनी ले गया जहाँ उसकी मुत्यु हुई।
गोपीनाथ शर्मा ने भी चौहान को बन्दी बनाने व बाद में उसकी हत्या करने के मत का समर्थन किया है। प्रमाण स्वरूप अजमेर के तत्कालीन सिक्कों पर लिखा है कि:-
1. चौहान व मोहम्मद साम, का उल्लेख होने को माना जाता है।
2. कलमा व लक्ष्मी का चित्र
3. अव्यक्त मेव मोहम्मद अवतार लिखा है।
दरबारी साहित्यकार-
1. चन्द्रबरदायी (पृथ्वीभट्ट)
2. जयानक (कश्मीरी लेखक) इसकी रचना में तराईन युद्धों का उल्लेख नही है (पृथ्वी विजय)
3. वागीश्वर
4. जनार्दन
5. विश्वरूप
6. विद्यापति गौड़