प्रागैतिहासिक (प्री हिस्ट्री) शब्द का प्रथम प्रयोगकर्ता –
डेनियल विल्सन(1851)
डेनियल विल्सन की पुस्तक – “दी आर्कियोलॉजी एण्ड
प्री हिस्टोरिक एनल्स ऑफ स्कॉट लैण्ड”
- काल गणना की वैज्ञानिक पद्धति – C-14 पद्धति
- इसके अन्तर्गत C-14 से रेडियोधर्मी सौर विकिरण केउत्सर्जन के आधार पर काल निर्धारण होता है। रेडियो कार्बन का आधा जीवन काल 5730 वर्ष माना गया है।इस पद्धति की खोज विलियार्ड लिब्बी द्वारा की गयी।
- पृथ्वी की उत्पत्ति से वर्तमान तक के काल को 6 महायुगों/महाकल्पों में बाँटा गया जो निम्नलिखित हैं-
- एजोइक, आर्कियोजोइक, प्रोटिरोजोइक, पैलियोजोइक, मेसोजोइक, सिनोजोइक
- सिनोजोइक महायुग में मानव सभ्यता की उत्पत्ति मानी गयी।
सिनोजोइक महायुग के प्रमुख 3 युगों मे मानव नस्लें-
1. प्लायोसीन युग/अतिनूतन युग –
(i) रामपिथेकस नस्ल (ii) ऑस्ट्रेलो पिथेकस नस्ल
2. प्लीस्टोसीन युग/अत्यन्त नूतन युग-
(i) होमोइरेक्टस नस्ल (ii) निएण्डथल नस्ल
3. होलोसीन युग/नूतनतक युग –
(i) होमोसेपियन नस्ल
- प्रथम मानव जीवाश्म 1924 में अफ्रिका में ऑस्ट्रेलो पिथेकस नस्ल के प्राप्त हुए।मानव की प्राचीनतम् नस्ल रामापिथेकस के प्रमाण 1930 ई. में शिवालिक क्षेत्र(भारत) से प्राप्त हुए।राजस्थान के आधुनिक मानव की उत्पत्ति होमोसेपियन नस्ल (क्रोमेग्नॉन मानव) से मानी जाती है। अत: इसे आधुनिक मानव (प्रज्ञ मानव) भी कहा गया।होमो इरेक्टस नस्ल से मानव मस्तिष्क का विकास प्रारम्भ तथा निएण्डरथल नस्ल में मस्तिष्क का पूर्ण विकास माना गया।
- 1961 में दिल्ली में एशियाई विद्वानों के सम्मेलन में प्रागैतिहासिक काल को 3 भागों में बाँटा गया।
- पुरा पाषाण
- मध्य पाषाण
- नवपाषण
- प्रागैतिहासिक काल
- आद्यैतिहासिक
- ऐतिहासिक काल
- पुरा पाषाण काल की प्रथम प्रामाणिक जानकारी 1863 में रॉबर्ट ब्रुसफुट द्वारा पल्लवरम् (मद्रास के पास) स्थानसे प्राप्त की गयी।
- मध्यपाषाणिक की प्रथम प्रामाणिक जानकारी C.L कार्लाइल ने 1867 में विन्ध्यांचल पर्वत क्षेत्र में खोजीथी।
- नवपाषाण काल की प्रथम प्रामाणिक जानकारी लेम्नेसुरीपर ने 1860 में टोंस नदी घाटी (U.P) में खोजी थी।
प्राचीन सभ्यताएँ एवं पुरातात्विक स्थल
- इतिहास को प्रागैतिहासिक काल, आद्यैतिहासिक काल एवं ऐतिहासिक काल में विभाजित किया जाता है।
- ऐसा काल जिसके संबंध में मानव के इतिहास के बारे में कोई लिखित सामग्री उपलब्ध नहीं होती है, उसे प्रागैतिहासिक काल कहते हैं।
- ऐसा काल जिसके संबंध में लिखित सामग्री उपलब्ध है लेकिन जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है, उसे आद्यैतिहासिक काल कहते हैं। जैसे- सिन्धु घाटी सभ्यता।
- ऐसा काल जिसके संबंध में प्राप्त लिखित सामग्री को पढ़ा जा सकता है, उसे ऐतिहासिक काल कहते हैं।

राजस्थान की प्रमुख सभ्यताएँ :-
राजस्थान के अन्य पुरातात्विक स्थल :-
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क्र. सं.
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पुरातात्विक स्थल
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जिला
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1.
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कुराड़ा
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नागौर
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2.
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साबणिया
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बीकानेर
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3.
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एलाना
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जालौर
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4.
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झाड़ोल
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उदयपुर
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5.
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मलाह
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भरतपुर
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6.
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चीथवाड़ी
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जयपुर
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7.
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कोल माहोली
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सवाईमाधोपुर
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8.
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नन्दलालपुरा
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जयपुर
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9.
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बूढ़ा पुष्कर
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अजमेर
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10.
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पिण्ड-पांडलिया
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चित्तौड़गढ़
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11.
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चक-84
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श्रीगंगानगर
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12.
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तरखानवाला
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श्रीगंगानगर
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13.
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नैनवा
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बूँदी
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14.
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धौली मगरा
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उदयपुर
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15.
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पूंगल
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बीकानेर
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16.
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किराड़ोत
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जयपुर
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17.
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एकलसिंहा
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अजमेर
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18.
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बासमबसई
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अलवर
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19.
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वरमाण
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सिरोही
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20.
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बड़ोपल
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हनुमानगढ़
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21.
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बरोर
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श्रीगंगानगर
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22.
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सीसोल
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बूँदी
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23.
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कुण्डा व ओला
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जैसलमेर (मध्य पाषाणकालीन)
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24.
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तिपटियाँ
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कोटा
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25.
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डडीकर
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अलवर
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26.
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डाडाथोरा
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बीकानेर (लघु पाषाणकालीन)
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27.
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जहाजपुर
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भीलवाड़ा (महाभारत कालीन)
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28.
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दर
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भरतपुर (पाषाणकालीन)
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29.
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कोटड़ा
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झालावाड़
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30.
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जायल
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नागौर (पुरा पाषाणकालीन)
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31.
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खुरड़ी
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परबतसर (नागौर)
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32.
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खानपुरा
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झालावाड़
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|
33.
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चन्द्रावती
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झालावाड़
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|
34.
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पीलीबंगा
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हनुमानगढ़
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|
35.
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थेहड़
|
हनुमानगढ़
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36.
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लाछूरा
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भीलवाड़ा
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37.
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आलनीया
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कोटा
|
|
38.
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भरनी
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टोंक
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|
39.
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मरमी गाँव
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चित्तौड़गढ़
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40.
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अहेड़ा
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अजमेर
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41.
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सुखपुरा
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टोंक
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|
42.
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रेलावन
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बाराँ
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राजस्थान का पाषाण काल :-
- राजस्थान में इस समय के आदिमानव द्वारा प्रयुक्त जो प्राचीनतम पाषाण उपकरण प्राप्त हुए हैं वे लगभग डेढ़ लाख वर्ष पुराने हैं।
- राज्य में इस काल के बनास, बेड़च, गम्भीरी एवं चंबल आदि नदियों की घाटियों तथा इनके समीपवर्ती स्थानों से प्रस्तरयुगीन मानव के निवास करने के प्रमाण मिलते हैं।
पुरापाषाण काल :- (25 लाख ई. पू. से 10 हजार ई.पू.)
- इस काल में मनुष्य द्वारा पत्थर के खुरदरे औजार प्रयोग में लिये जाते थे। कॉर्टजाइट प्रस्तर का प्रयोग किया गया।
- वर्ष 1870 में सी.ए. हैकर ने जयपुर व इन्द्रगढ़ में ‘हैण्डएक्स’, ‘एश्यूलियन’ व ‘क्लीवर’ नामक औजारों की सर्वप्रथम खोज की।
- प्रारम्भिक पाषाणकालीन स्थल :- ढिंगरिया (जयपुर), मानगढ़, नाथद्वारा, हम्मीरपुर (भीलवाड़ा), मण्डपिया (चित्तौड़गढ़), बींगोद (भीलवाड़ा) एवं देवली (टोंक)।
- इस काल में मानव के राजस्थान में जयपुर, इन्द्रगढ़, अजमेर, अलवर, भीलवाड़ा, झालावाड़, चित्तौड़गढ़, जालौर, पाली, जोधपुर आदि जिलों में विस्तृत होने के प्रमाण मिले हैं।
- राजस्थान के विराटनगर, भानगढ़ तथा ढिंगरिया आदि स्थानों से ‘हैण्डएक्स’ संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- विराटनगर में शैलाश्रयों एवं प्राचीन गुफाओं से पुरापाषाण काल से उत्तरपाषाण कालीन सामग्री प्राप्त हुई है।
- विराटनगर के शैलाश्रयों में चित्र प्राप्त नहीं हुए है जबकि भरतपुर जिले के दर नामक स्थान से कुछ चित्रित शैलाश्रय प्राप्त हुए हैं, जिसमें मानव आकृति, व्याघ्र, बारहसिंगा तथा सूर्य आदि का चित्रण मिला है।
- बी.ऑलचिन ने पश्चिमी राजस्थान में लूणी नदी के किनारे तथा जालौर जिले के बालू के टीलों में पाषाण युगीन उपकरणों की खोज की।
- पुरापाषाण कालीन मानव का भोजन कंदमूल, फल, मछली तथा शिकार से प्राप्त वन्यजीव थे।
- इस काल में मृतक के शरीर को जंगली जानवरों को खाने के लिए फेंक दिया जाता था।
- इस समय मानव आग जलाना सीख चुका था लेकिन पहिये का आविष्कार अभी तक नहीं हुआ था।
- इस काल में पत्थर से निर्मित उपकरण एवं हथियार चित्तौड़गढ़ में बामनी नदी के तट पर भैंसरोड़गढ़, नवाघाट से, बेड़च एवं गम्भीरी नदी के तट पर खोर, नगरी, ब्यावर, खेड़ा, बड़ी आदि से, बनास नदी के तट पर एवं भीलवाड़ा में जहाजपुर, बींगोद, देवली, हम्मीरगढ़, खुरियास, मंगरोप, कुंवारिया, गिलूण्ड आदि से, जोधपुर जिले में लूणी नदी के तट से, गुहिया और बांडी नदी की घाटी में सिंगारी तथा पाली से मारवाड़ में शिकारपुरा, समदड़ी, पीचक, भांडेल, सोजत, धनेरी, धुंधाड़ा, पीपाड़ एवं उम्मेदनगर से, झालावाड़ में गागरोन से, अजमेर जिले में सागरमती के तट पर गोविन्दगढ़ से, कोटा जिले में परवन नदी के तट से तथा टोंक जिले में बनास नदी के तट पर जगन्नाथपुरा, सियालपुरा, तारावट, गोगासला, भुवाण, भरनी आदि से प्राप्त हुए हैं।
मध्यपाषाण काल :- (10,000 ई.पू. से 5,000 ई.पू)
- मध्यपाषाण काल का आरम्भ 10 हजार ई. पू. से माना जाता है।
- इस काल के उपकरणों में ‘स्क्रेपर’ एवं ‘पाइंट’ विशेष उल्लेखनीय हैं, जो अपेक्षाकृत छोटे-हल्के एवं कुशलतापूर्वक बनाये गये थे। (माइक्रोलिथ/सूक्ष्म पाषाण उपकरण)
- यह उपकरण लूणी तथा उसकी सहायक नदियों की घाटियों में, चित्तौड़गढ़ जिले की बेड़च नदी की घाटी में तथा विराटनगर (जयपुर) से प्राप्त हुए हैं।
- इस काल तक मानव पशुपालन सीख चुका था लेकिन उसे कृषि का ज्ञान नहीं था।
- नागौर से पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए है।
उत्तर/नवपाषाण काल :- (5,000 ई.पू. से 1,000 ई.पू)
- नवपाषाण काल का आरम्भ 5 हजार ई. पू. से माना जाता है।
- नवपाषाण काल में कृषि द्वारा खाद्य उत्पादन किया जाने लगा तथा इस काल में पशुपालन उन्नत हो चुका था। बागोर से 14 प्रकार की कृषि की जानकारी मिलती है।
- राजस्थान में नवपाषाण काल के अवशेष चित्तौड़गढ़ जिले में बेड़च व गम्भीरी नदियों के तट पर, चंबल व बामनी नदियों के तट पर भैंसरोड़गढ़ व नवाघाट से, बनास नदी के तट पर हम्मीरगढ़, जहाजपुर एवं देवली, गिलुंड से, लूणी नदी के तट पर पाली, समदड़ी से, टोंक जिले में भरनी आदि स्थानों से प्राप्त हुए हैं।
- इस काल में मानव घर बनाकर रहने लगा तथा मृतकों को समाधियों में गाढ़ना प्रारम्भ कर दिया। साथ ही चाकू, पहिया, मृदभाण्ड व बस्तियों के प्रमाण मिलते हैं।
- प्रसिद्ध पुरातत्वविद् ‘गार्डन चाइल्ड’ ने नवपाषाण काल को पाषाणकालीन क्रांति की संज्ञा दी।
- नवपाषाण काल में समाज में व्यवसाय के आधार पर जाति व्यवस्था का सूत्रपात हुआ था।
- कोल्डीहवा (यू.पी) – धान का प्राचीनतम् प्रमाण
1. कालीबंगा :-
- कालीबंगा कांस्ययुगीन सभ्यता मानी जाती है।
- कालीबंगा सभ्यता का समय 2350 ई.पू. से 1750 ई.पू. माना जाता है। (कार्बन डेटिंग पद्धति के अनुसार)
- कालीबंगा प्राचीन सरस्वती (वर्तमान में घग्घर) नदी के बायें तट पर हनुमानगढ़ जिले में है।
नोट :- सरस्वती नदी का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद के दसवें मण्डल में मिलता है। सरस्वती नदी की उत्पत्ति तुषार क्षेत्र से मानी गई है। सरस्वती नदी का वर्तमान स्वरूप घग्घर नदी है। घग्घर नदी को सोतर नदी, मृत नदी, लेटी हुई नदी, राजस्थान का शोक, वाहिद नदी भी कहा जाता है।
- सिन्धु घाटी सभ्यता के स्थलों का सर्वाधिक संकेन्द्रण/घनत्व घग्घर क्षेत्र में पाया जाता है।
- वर्ष 1952 में पहली बार अमलानंद घोष ने इसकी पहचान सिंधुघाटी सभ्यता के स्थल के रूप में की। अत: खोजकर्ता इन्हें ही माना गया।
- वर्ष 1961-1969 तक नौ सत्रों में बी. बी. लाल तथा बी.के. थापर के निर्देशन में यहाँ पर उत्खनन कार्य किया गया।
- कालीबंगा से पूर्व हड़प्पाकालीन, तथा उत्तर-हड़प्पाकालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ से उत्खनन में प्राप्त काली चूड़ियों के टुकड़ों के कारण इसे कालीबंगा नाम दिया गया।
- कालीबंगा (पंजाबी भाषा) का शाब्दिक अर्थ :- काले रंग की चूड़ियाँ।
- कालीबंगा देश का तीसरा सबसे बड़ा पुरातात्विक स्थल है। देश के दो बड़े पुरातात्विक स्थलों में राखीगढ़ी (हरियाणा) एवं धौलावीरा (गुजरात) है।
- कालीबंगा को ‘दीन-हीन’ बस्ती भी कहा जाता है। 8 स्तर मिले है।
- विश्व में सर्वप्रथम भूकम्प के साक्ष्य कालीबंगा में ही मिले हैं।
- विश्व में सर्वप्रथम लकड़ी की नाली के अवशेष कालीबंगा में से प्राप्त हुए हैं।
- कालीबंगा से प्राचीनतम नगर के साक्ष्य मिले हैं।
- कालीबंगा में मातृसत्तात्मक परिवार की व्यवस्था विद्यमान थी।
- कालीबंगा से कपालछेदन क्रिया का प्रमाण मिलता है।
- कालीबंगा से कलश शवादान के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
- कालीबंगा से किसी भी प्रकार के मंदिरों के अवशेष प्राप्त नहीं हुए हैं।
- कालीबंगा सभ्यता के समाज में पुरोहित का स्थान प्रमुख था।
- संस्कृत साहित्य में कालीबंगा को ‘बहुधान्यदायक क्षेत्र’ कहा जाता था।
- कालीबंगा से मिट्टी के भाण्डों एवं मुहरों पर लिपी के अवशेष मिले हैं। 6 प्रकार के मृदभाण्ड प्राप्त हुए।
- कालीबंगा से बेलनाकार तंदूरा भी मिला है। लाक ईरानी शैली का है।
- कालीबंगा निवासी गाय, भैंस, भेड़, बकरी, सुअर के साथ-साथ ऊँट एवं कुत्ता भी पालते थे। प्रिय पालतु पशु- कुत्ता था।
- पाकिस्तान के कोटदीजी नामक स्थान पर प्राप्त पुरातात्विक अवशेष कालीबंगा के अवशेषों से काफी मिलते जुलते हैं।
- कालीबंगा के नगरों की सड़कें समकोण पर काटती थी।
- कालीबंगा में दो टीलों पर उत्खनन कार्य किया गया, पश्चिम में (दुर्ग टीला )स्थित पहला टीला छोटा एवं अपेक्षाकृत ऊँचा है तथा पूर्व (नगर टीला) में स्थित दूसरा टीला अपेक्षाकृत बड़ा एवं नीचा है।
- यह दोनों टीलें सुरक्षात्मक दीवार से घिरे हुए थे। (दोहरा परकोटा)
- यहाँ के लोगों ने समचतुर्भुजाकार रक्षा प्राचीर के अन्तर्गत आवासों का निर्माण किया। इस सुरक्षा प्राचीर को 2 चरणों में बनाने के प्रमाण मिले हैं।
- यहाँ के लोग कच्ची ईटों से बने मकानों में रहते थे तथा मकानों की नालियाँ, शौचालय तथा कुछ संरचनाओं में पक्की ईटों का प्रयोग किया गया है।
- इन ईंटों की संरचना 4x2x1 के अनुपात में मिली।
- कालीबंगा में एक दुर्ग, मेसोपोटामिया की मुहर, सेलखड़ी पत्थर से बनी बेलनाकार मुहरें, तांबे का बैल, जुते हुए खेत, सड़कें तथा मकानों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- कालीबंगा से सात अग्निवेदियाँ प्राप्त हुई हैं।बेलनाकार स्तम्भ,कोयले के अंश व अन्न के दाने मिले है।
- डॉ. दशरथ शर्मा ने कालीबंगा को सैंधव सभ्यता की तीसरी राजधानी कहा है (पहली हड़प्पा तथा दूसरी मोहनजोदड़ो)।
- कालीबंगा से उत्खनन में दोहरे जुते हुए खेत के अवशेष प्राप्त हुए हैं जो विश्व में जुते हुए खेत के प्राचीनतम प्रमाण है।
- यहाँ से प्राप्त जुते हुए खेत में चना कम दूरी पर व सरसों अधिक दूरी पर बोया जाता था।
- कालीबंगा में समकोण दिशा में जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले है।
- यहाँ से एक ही समय में दो फसलें उगाने के प्रमाण प्राप्त हुए हैं जिसमें गेहूँ तथा जौ एक साथ बोये जाते थे। (मिश्रित फसल)
- कालीबंगा एक नगरीय प्रधान सभ्यता थी तथा यहाँ पर नगर निर्माण नक्शे के आधार पर किया गया था। (नगर नियोजन)
- कालीबंगा में मकानों से गन्दे पानी को निकालने के लिए लकड़ी की नालियों का प्रयोग किया जाता था।
- कालीबंगा के लोग मुख्यतया शव को दफनाते थे।
- 3 प्रकार की शवधान पद्धतियाँ थी।
- कालीबंगा सैंधव सभ्यता का एकमात्र ऐसा स्थल है जहाँ से मातृदेवी की मूर्तियाँ प्राप्त नहीं हुई है।
- कालीबंगा से मैसोपोटामिया की मिट्टी से निर्मित मुहर प्राप्त हुई है। (बेलनाकार मुहर)
- वर्ष 1961 में कालीबंगा अवशेष पर भारत सरकार द्वारा 90 पैसों का डाक टिकट जारी किया गया।
- राज्य सरकार द्वारा कालीबंगा से प्राप्त पुरा अवशेषों के संरक्षण हेतु वर्ष 1985-86 में एक संग्रहालय की स्थापना की गई।
- कालीबंगा सभ्यता की लिपि सैन्धवकालीन लिपि (ब्रूस्ट्रोफेदन लिपि) के समान थी जो दायें से बाऐं की ओर लिखी जाती थी। इस लिपि को अभी तक नहीं पढ़ा जा सका है।
- कालीबंगा में विशाल सांडों की जुड़वा पैरों वाली मिट्टी की मूर्ति भी मिली।
आहड़ (उदयपुर) :-
- आहड़ नामक ताम्रयुगीन सभ्यता उदयपुर में आयड़ नदी के किनारे स्थित है। आयड़ नदी उदयसागर झील में गिरती है, निकलने के बाद बेड़च कहलाती है।
- आहड़ सभ्यता का विकास बनास नदी घाटी में माना जाता है।
- दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में इसे आघाटपुर के नाम से जाना जाता था। इसे प्राचीन काल में ताम्रवती नगरी भी कहा जाता था।
- इसका एक अन्य नाम धूलकोट (मिट्टी का किला)भी है।
- इसके उत्खनन का कार्य सर्वप्रथम 1953 में अक्षयकीर्ति व्यास के नेत्तृत्व में हुआ।
- यहाँ पर व्यापक उत्खनन कार्य आर. सी. अग्रवाल द्वारा 1954 में करवाया गया।
- 1961-62 में यहाँ वी. एन. मिश्रा एवं एच. डी. सांकलिया द्वारा यहाँ उत्खनन करवाया गया।
- आहड़ के उत्खनन अभियान के समय राजस्थान सरकार की ओर से विजय कुमार एवं पी. सी. चक्रवर्ती भी उपस्थित रहे।
- डॉ. सांकलिया ने इसे आहड़ या बनास संस्कृति कहा है।
- यहाँ पर उत्खनन के फलस्वरूप बस्तियों के 8 स्तर प्राप्त हुए है।
- पहले स्तर में मिट्टी की दीवारें, मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े तथा पत्थर के ढे़र प्राप्त हुए है।
- आहड़वासी धूप में सुखाई गई कच्ची ईंटों से मकानों का निर्माण करते थे।
- आहड़वासी कृषि (चावल की खेती) एवं पशुपालन (कुत्ता, हाथी आदि) से परिचित थे।
- गिलुण्ड (राजसमन्द) से आहड़ के समान धर्म संस्कृति मिली है।
- आहड़ से छपाई के ठप्पे, आटा पिसने की चक्की, चित्रित बर्तन एवं तांबे के उपकरण मिले हैं।
- आहड़ के लोग मृतकों को कपड़ों एवं आभूषण के साथ गाड़ते थे।
- आहड़ के लोगों के अधिकांशत: आभूषण मिट्टी के मनकों के बने होते थे।
- आहड़वासी लाल एवं काले रंग के मृदपात्रों का उपयोग करते थे।
- तीसरी बस्ती में कुछ चित्रित बर्तन तथा उनका घरों में प्रयोग करना प्रमाणित हुआ है।
- चौथी बस्ती से दो तांबे की कुल्हाडियां प्राप्त हुई हैं।
- आहड़वासी ताम्रधातु कर्मी थे।
- आहड़ से अनाज रखने के मृदभांड प्राप्त हुए हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘गोरे’ या ‘कोठ’ कहा जाता है।
- आहड़ से तांबे की छ: मुद्राएँ तथा तीन मुहरें प्राप्त हुई है जिनका समय तीन ईसा पूर्व से प्रथम ईसा पूर्व है।
- यहाँ से प्राप्त एक मुद्रा पर एक ओर त्रिशूल तथा दूसरी ओर अपोलो देवता का चित्रण किया गया है। इस पर यूनानी भाषा में लेख भी अंकित किया गया है।
- यहाँ के लोगों का प्रमुख व्यवसाय तांबा गलाना तथा उससे उपकरण बनाना था।
- आहड़ से पक्की ईटों के प्रयोग के प्रमाण नहीं प्राप्त हुए हैं।
- डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने आहड़ सभ्यता का समृद्ध काल 1900 ई. पू. से 1200 ई.पू. तक माना है। C-14 के अनुसार 2000-1200 ई.पू.
- आहड़ से प्राप्त एक ही मकान में 4 से 6 चूल्हों का प्राप्त होना संयुक्त परिवार व्यवस्था की ओर संकेत करते है।
- आहड़ सभ्यता के लोग मिट्टी के बर्तन पकाने की उल्टी तिपाई विधि से परिचित थे।
- आहड़ से मिट्टी की बनी वृषभ आकृतियाँ प्राप्त हुई है जिन्हें बनासियन बुल कहा गया है।
|
क्र. सं.
|
सभ्यता
|
जिला
|
नदी
|
|
1.
|
कालीबंगा
|
हनुमानगढ़
|
सरस्वती (घग्घर)
|
|
2.
|
आहड़
|
उदयपुर
|
आयड़ (बेड़च)
|
|
3.
|
गिलूण्ड
|
राजसमंद
|
बनास
|
|
4.
|
बागोर
|
भीलवाड़ा
|
कोठारी
|
|
5.
|
बालाथल
|
उदयपुर
|
बेड़च
|
|
6.
|
गणेश्वर
|
सीकर
|
कांतली
|
|
7.
|
रंगमहल
|
हनुमानगढ़
|
सरस्वती (घग्घर)
|
|
8.
|
ओझियाना
|
भीलवाड़ा
|
खारी
|
|
9.
|
नोह
|
भरतपुर
|
रूपारेल
|
|
10.
|
नगरी
|
चित्तौड़गढ़
|
बेड़च
|
|
11.
|
जोधपुरा
|
जयपुर
|
साबी
|
|
12.
|
सुनारी
|
झुंझुनूं
|
कांतली
|
|
13.
|
तिलवाड़ा
|
बाड़मेर
|
लूणी
|
|
14.
|
रैढ़
|
टोंक
|
ढील
|
|
15.
|
गरदड़ा
|
बूँदी
|
छाजा
|
|
16.
|
बैराठ
|
जयपुर
|
बाणगंगा
|
|
17.
|
कोकानी
|
कोटा
|
परवन
|
|
18.
|
बल्लू खेड़ा
|
चित्तौड़गढ़
|
गंभीरी
|
शैलाश्रय :-
- राजस्थान में अरावली पर्वत श्रृंखला तथा चंबल नदी की घाटी से शैलाश्रय प्राप्त होते हैं, जिनसे प्रागैतिहासिक काल के मानव द्वारा उपयोग में लाये गए पाषाण उपकरण, अस्थि अवशेष तथा अन्य सामग्री प्राप्त हुई है।
- इन शैलाश्रयों में सर्वाधिक आखेट से संबंधित चित्र उपलब्ध होते हैं।
- बूंदी में छाजा नदी तथा कोटा में चंबल नदी क्षेत्र अरनीया उल्लेखनीय है।
- इनके अतिरिक्त विराटनगर (जयपुर), सोहनपुरा (सीकर) तथा हरसौरा (अलवर) आदि से चित्रित शैलाश्रय प्राप्त हुए हैं।
1. गिलू ण्ड (राजसमंद) :-
- यह एक ग्रामीण संस्कृति थी।
- यह ताम्रयुगीन सभ्यता राजसमंद जिले में बनास नदी के तट पर स्थित है।
- ‘मोडिया मगरी’ नामक टीले का संबंध गिलूण्ड सभ्यता से है।
- वर्ष 1957-58 में बी. बी. लाल द्वारा यहाँ पर उत्खनन का कार्य करवाया गया।
- यहाँ पर पक्की ईटों के प्रयोग के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ पर उत्खनन से ताम्रयुगीन सभ्यता एवं बाद की सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं।
- यहाँ पर आहड़ सभ्यता का प्रसार था तथा इसी के समय यहाँ मृदभांड, मिट्टी की पशु आकृतियां आदि के चित्र मिले हैं।
- गिलूण्ड के मृदभांडो पर ज्यामितीय चित्रांकन के अलावा प्राकृतिक चित्रांकन भी किया गया है।
- गिलूण्ड में उच्च स्तरीय जमाव में क्रीम रंग एवं काले रंग से चित्रित पात्रों पर चिकतेदार हिरण प्रकाश में आए हैं।
- गिलूण्ड में लाल एवं काले रंग के मृदभाण्ड मिले हैं।
- मृदभाण्डों पर नृत्य मुद्राएँ उत्कीर्ण हैं।
2. बागोर (भी लवाड़ा) :-
- प्रमुख औजार- हस्त कुठार
- यह एक मध्यपाषाणकालीन सभ्यता स्थल है।
- यह स्थल भीलवाड़ा की मांडल तहसील में कोठारी नदी के तट पर स्थित है।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य 1967-68 में डॉ. विरेन्द्रनाथ मिश्र, डॉ. एल.एस. जर्मन के लेश्निक व डेक्कन कॉलेज पूना तथा राजस्थान पुरातत्व विभाग के सहयोग से किया गया।
- बागोर सभ्यता के तीन स्तरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- बागोर की सभ्यता को ‘आदिम संस्कृति का संग्रहालय’ माना जाता है।
- यहाँ से 14 प्रकार की कृषि किए जाने के अवशेष मिले हैं।
- स्वास्तिक, काँच के आभूषण के प्रमाण, हथोडे़ की गोलियाँ, कंकाल(नर) पर दीवार जो समाधि का प्रतीक है।
- यहाँ के लोग कृषि, प्राचनीतम (पशुपालन) प्रमाण एवं आखेट करते थे।
- यहाँ उत्खनन से पाँच तांबे के उपकरण प्राप्त हुए हैं जिनमें से एक 10.5 सेमी. छेद वाली सूई है।
- बागोर में कृषि एवं पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ के मकान पत्थर से बने थे तथा फर्श में भी पत्थरों को समतल कर जमाया जाता था।
- यहाँ से प्राप्त पाषाण उपकरणों में ब्लेड, छिद्रक, स्क्रेपर तथा चांद्रिक आदि प्रमुख हैं।
- भारत का सबसे सम्पन्न पाषाणीय स्थल।
3. बालाथल (उदयपुर)
- 2350 ई.पू. काल निर्धारण ।
- उदयपुर जिले में बालाथल गाँव के वल्लभनगर तहसील मे पास बेड़च नदी के निकट एक टीले के उत्खनन से यहाँ ताम्र-पाषाणकालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- इस सभ्यता की खोज 1962-63 में डॉ. वी. एन. मिश्र द्वारा की गई।
- डॉ. वी. एस. शिंदे, आर. के. मोहन्ते, डॉ. देव कोठारी एवं डॉ. ललित पाण्डे का सम्बन्ध इसी सभ्यता से माना जाता है। इन्होंने 1993 में इस सभ्यता का उत्खनन किया था।
- बालाथल में उत्खनन से एक 11 कमरों के विशाल भवन के अवशेष मिले है।
- यहाँ के लोग बर्तन बनाने तथा कपड़ा बुनने के बारे में जानकारी रखते थे।
- बालाथल से लौहा गलाने की 5 भटि्टयाँ प्राप्त हुई हैं।
- बालाथल से कपड़े का टुकड़ा प्राप्त हुआ है।
- बालाथल के उत्खनन में मिट्टी से बनी सांड की आकृतियाँ मिली हैं।
- बालाथल निवासी माँसाहारी भी थे।
- यहाँ से 4000 वर्ष पुराना कंकाल मिला है जिसको भारत में कुष्ठ रोग का सबसे पुराना प्रमाण माना जाता है।
- यहाँ से योगी मुद्रा में शवाधान का प्रमाण प्राप्त हुआ है।
- बालाथल में अधिकांश उपकरण तांबे के बने प्राप्त हुए हैं। यहाँ से तांबे के बने आभूषण भी प्राप्त हुए है।
- यहाँ के लोग कृषि, शिकार तथा पशुपालन आदि से परिचित थे।
- बालाथल से प्राप्त बैल व कुत्ते की मृणमूर्तियाँ विशेष उल्लेखनीय है।
- 2 प्रकार के मृदभाण्ड प्राप्त हुए हैं।
- (i) परिष्कृत (ii) अपरिष्कृत
4. गणेश्वर (सीकर) :-
- खण्डेला की पहाड़ियों में स्थित है।
- सीकर जिले में नीम का थाना स्थान से कुछ दूरी पर स्थित गणेश्वर से उत्खनन में ताम्रयुगीन उपकरण प्राप्त हुए हैं।
- यह स्थान कांतली नदी के किनारे स्थित है।
- गणेश्वर को पूर्व हड़प्पा कालीन सभ्यता माना जाता है।
- गणेश्वर सभ्यता 2800 ई. पूर्व में विकसित हुई थी।
- गणेश्वर को ‘पुरातत्व का पुष्कर’ भी कहा जाता है।
- प्राचीन शिव मन्दिर होने के कारण गणेश्वर नाम पड़ा।
- भारत में पहली बार किसी स्थान से इतनी मात्रा में ताम्र उपकरण प्राप्त हुए हैं।
- गणेश्वर से तांबे का बाण एवं मछली पकड़ने का कांटा प्राप्त हुआ है।
- इन उपकरणों में तीर, भाले, सूइयां, कुल्हाड़ी, मछली पकड़ने के कांटे आदि शामिल हैं एवं यह माँसाहारी थे।
- गणेश्वर को भारत में ‘ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी’ कहा जाता है।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य रत्नचंद्र अग्रवाल द्वारा 1977 में तथा विस्तृत उत्खनन 1978-79 में विजय कुमार द्वारा करवाया गया।
- गणेश्वर से उत्खनन में जो मृदभांड प्राप्त हुए है उन्हें कपिषवर्णी मृदपात्र कहते हैं।
- गणेश्वर से मिट्टी के छल्लेदार बर्तन भी प्राप्त हुए हैं।
- गणेश्वर से काले एवं नीले रंग से अलंकृत मृदपात्र मिले हैं।
- गणेश्वर में बस्ती को बाढ़ से बचाने हेतु वृहृदाकार पत्थर के बाँध बनाने के प्रमाण मिले हैं।
- गणेश्वर में ईंटों के उपयोग के प्रमाण नहीं मिले हैं।
- मिट्टी के छल्लेदार बर्तन केवल गणेश्वर में ही प्राप्त हुए हैं।
- गणेश्वर सभ्यता के उत्खनन से दोहरी पेचदार शिरेवाली ताम्रपिन भी प्राप्त हुई है।
- गणेश्वर सभ्यता के लोग गाय, बैल, बकरी, सुअर, कुत्ता, गधा आदि पालते थे।
- गणेश्वर सभ्यता को ‘ताम्र संचयी संस्कृति’ भी कहा जाता है।
5. रंगमहल (हनुमानगढ़) :-
- रंगमहल हनुमानगढ़ जिले में सरस्वती (वर्तमान में घग्घर) नदी के पास स्थित है।
- यह एक ताम्रयुगीन सभ्यता है।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य डॉ. हन्नारिड के निर्देशन में स्वीडिश दल द्वारा 1952-54 ई. में किया गया।
- ये मृदभांड चाक से बने होते थे तथा ये पतले तथा चिकने होते थे।
- यहाँ से कुषाणकालीन तथा उससे पहले की 105 तांबे की मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं जिनमें कुछ पंचमार्क मुद्राएँ भी हैं।
- यहाँ से ब्राह्मी लिपि में नाम अंकित दो कांसे की सीलें (मुहर) भी प्राप्त हुई हैं।
- यहाँ से उत्खनन में डॉ. हन्नारिड को प्राप्त मिट्टी का कटोरा स्वीडन के लूण्ड संग्रहालय में सुरक्षित है।
- यहाँ के निवासी मुख्य रूप से चावल की खेती करते थे।
- यहाँ के मकानों का निर्माण ईटों से होता था।
- यहाँ से प्राप्त मृद्भांड मुख्यत: लाल या गुलाबी रंग के थे।
- यहाँ से गांधार शैली की मृणमूर्तियाँ, टोंटीदार घड़े, घण्टाकार मृद्पात्र एवं कनिष्क कालीन मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं।
- रंगमहल से ही गुरु-शिष्य की मिट्टी की मूर्ति प्राप्त हुई है।
- इसे कुषाणकालीन सभ्यता के समान माना जाता है।
- रंगमहल में बसने वाली बस्तियों के तीन बार बसने एवं उजड़ने के प्रमाण मिले हैं।
6. बैराठ (जयपुर) :-
- बैराठ जयपुर जिले में शाहपुरा उपखण्ड में बाणगंगा नदी के किनारे स्थित लौहयुगीन स्थल है।
- बैराठ का प्राचीन नाम ‘विराटनगर’ था। महाजनपद काल में यह मत्स्य जनपद की राजधानी था।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य वर्ष 1936-37 में दयाराम साहनी द्वारा तथा 1962-63 में नीलरत्न बनर्जी तथा कैलाशनाथ दीक्षित द्वारा किया गया।
- वर्ष 1837 में कैप्टन बर्ट ने यहाँ से मौर्य सम्राट अशोक के भाब्रू शिलालेख की खोज की। वर्तमान में यह शिलालेख कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित है।
- भाब्रू शिलालेख में सम्राट अशोक को ‘मगध का राजा’ नाम से संबोधित किया गया है।
- भाब्रू शिलालेख के नीचे बुद्ध, धम्म एवं संघ लिखा हुआ है।
- बैराठ में बीजक की पहाड़ी, भीमजी की डूंगरी तथा महादेवजी की डूंगरी से उत्खनन कार्य किया गया।
- यहाँ से मौर्यकालीन तथा इसके बाद के समय के अवशेष मिले हैं।
- यहाँ से 36 मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं जिनमें 8 पंचमार्क चांदी की तथा 28 इण्डो-ग्रीक तथा यूनानी शासकों की हैं। 16 मुद्राएँ यूनानी शासक मिनेण्डर की हैं।
- उत्तर भारतीय चमकीले मृद्भांड वाली संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाली राजस्थान में सबसे महत्वपूर्ण प्राचीन स्थल बैराठ है।
- C.L. कार्लाइल ने शंख लिपि का शिलालेख खोजा।
- वर्ष 1999 में बीजक की पहाड़ी से अशोक कालीन गोल बौद्ध मंदिर, स्तूप एवं बौद्ध मठ के अवशेष मिले हैं जो हीनयान सम्प्रदाय से संबंधित है।
- बैराठ सभ्यता के लोगों का जीवन पूर्णत: ग्रामीण संस्कृति का था।
- बैराठ में पाषाणकालीन हथियारों के निर्माण का एक बड़ा कारखाना स्थित था।
- यहाँ भवन निर्माण के लिए मिट्टी की बनाई ईंटों का प्रयोग अधिक किया जाता था।
- यहाँ पर शुंग एवं कुषाण कालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- ये सभी एक मृद्भांड में सूती कपड़े से बंधी मिली है।
- बैराठ सभ्यता के लोग लौह धातु से परिचित थे। यहाँ उत्खनन से लौहे के तीर तथा भाले प्राप्त हुए हैं।
- ऐसा माना जाता है कि हूण शासक परिपमोत्तर भातत नें एक वर्ष राज किया था एवं मिहिरकुल ने बैराठ को नष्ट कर दिया।
- मिहिरकुल ने 1600 स्तूपो व विहारों को नष्ट किया
- 634 ई. में ह्नेनसांग विराटनगर आया था तथा उसने यहाँ बौद्ध मठों की संख्या 8 बताई है।
- बैराठ से ‘शंख लिपि’ के प्रमाण प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ से मुगलकाल में टकसाल होने के प्रमाण मिलते है। यहाँ मुगल काल में ढ़ाले गये सिक्कों पर ‘बैराठ अंकित’ मिलता है।
- यहाँ बनेड़ी, ब्रह्मकुण्ड तथा जीणगोर की पहाड़ियों से वृक्ष, हिरण तथा वनस्पति का चित्रण प्राप्त होता है।
7. ओझिया ना (भीलवाड़ा) :-
- भीलवाड़ा के बदनोर के पास खारी नदी के तट पर स्थित यह स्थल ताम्रयुगीन आहड़ संस्कृति से संबंधित है तथा पहाड़ पर स्थित है।
- इस स्थल का उत्खनन बी. आर. मीणा तथा आलोक त्रिपाणी द्वारा वर्ष 1999-2000 में किया गया।
- यह पुरातात्विक स्थल पहाड़ी पर स्थित था जबकि आहड़ संस्कृति से जुड़े अन्य स्थल नदी घाटियों में पनपे थे।
- यहाँ से वृषभ तथा गाय की मृण्यमय मूतियाँ प्राप्त हुई हैं जिन पर सफेद रंग से चित्रण किया हुआ है।
- यहाँ से प्राप्त अवशेषों के आधार पर इस संस्कृति का विकास तीन चरणों में हुआ माना जाता है।
- यहाँ से कार्नेलियन फियान्स तथा पत्थर के मनके, शंख एवं ताम्र की चूड़ियाँ तथा अन्य आभूषण भी मिले हैं।
- इस सभ्यता का काल 2500 ईसा पूर्व से 1500 ईसा पूर्व तक माना जाता है।
8. नगरी ( चित्तौड़गढ़) :-
- नगरी नामक पुरातात्विक स्थल चितौड़गढ़ में बेड़च नदी के तट पर स्थित है जिसका प्राचीन नाम माध्यमिका मिलता है।
- यहाँ पर सर्वप्रथम उत्खनन कार्य वर्ष 1904 में डॉ. डी. आर. भण्डारकर द्वारा तथा तत्पश्चात 1962-63 में केन्द्रीय पुरातत्व विभाग द्वारा करवाया गया।
- यहाँ से शिवि जनपद के सिक्के तथा गुप्तकालीन कला के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- प्राचीन नाम ‘माध्यमिका’ पतंजलि के महाभाष्य में मिलता है।
- यहाँ से ही घोसूण्डी अभिलेख (द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व) प्राप्त हुआ है।
- नगरी शिवि जनपद की राजधानी रही है।
- यहाँ पर ‘कुषाणकालीन स्तर’ में नगर की सुरक्षा हेतु निर्मित मजबूत दीवार बनाये जाने के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- नगरी की खोज 1872 ई. में कार्लाइल द्वारा की गई।
- यहाँ से चार चक्राकार कुएँ भी प्राप्त हुए हैं।
9. जोधपुरा (जयपुर) :-
- जोधपुरा नामक पुरातात्विक स्थल जयपुर जिले की कोटपुतली तहसील में साबी नदी के किनारे स्थित है।
- यह एक लौहयुगीन प्राचीन सभ्यता स्थल है।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य 1972-73 में आर.सी. अग्रवाल तथा विजय कुमार के निर्देशन में सम्पन्न हुआ।
- जोधपुरा से ताम्रयुगीन सभ्यता के प्रतीक कपिषवर्णी मृदभांडो का डेढ़ मीटर का जमाव प्राप्त हुआ है।
- यहाँ उत्खनन से प्राप्त ताम्रयुगीन मृद्भांडो पर सिंधु सभ्यता का प्रभाव दिखाई देता है।
- यह सलेटी रंग की चित्रित मृदभांड संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थल था।
- जोधपुरा से लौह अयस्क से लौह धातु का निष्कर्षण करने वाली भटि्टयाँ भी प्राप्त हुई है।
- इस सभ्यता में मानव ने घोड़े का उपयोग रथ को खींचने में करना प्रारम्भ कर दिया था।
- जोधपुरा में मकान की छतों पर टाईल्स का प्रयोग एवं छप्पर छाने का रिवाज था।
- इस सभ्यता के लोगों का मुख्य आहार चावल एवं माँस था।
- यह सभ्यता 2500 ईसा पूर्व से 200 ई. के मध्य फली-फूली।
- यह शुंग एवं कुषाणकालीन सभ्यता स्थल है।
- जोधपुरा एवं सुनारी (झुंझुनूं) से मौर्यकालीन सभ्यता के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।
10. सुनारी (झुंझुनूं) :-
- सुनारी नामक पुरातात्विक स्थल झुंझुनूं की खेतड़ी तहसील में कांतली नदी के किनारे स्थित है।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य 1980-81 में राजस्थान राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा करवाया गया।
- यहाँ से लौहा गलाने की प्राचीनतम भटि्टयाँ प्राप्त हुई है।
- यहाँ से सलेटी रंग के मृदभांड संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- सुनारी से मातृदेवी की मृण्मूर्तियाँ तथा धान संग्रहण का कोठा प्राप्त हुआ है।
- सुनारी से मौर्यकालीन सभ्यता के अवशेष मिलते हैं जिनमें काली पॉलिश युक्त मृद्पात्र है।
- जोधपुरा, नोह तथा सुनारी से शुंग तथा कुषाणकालीन अवशेष भी प्राप्त होते हैं।
- सुनारी के निवासी भोजन के चावल का प्रयोग करते थे तथा घोड़ों से रथ खींचते थे।
- सुनारी से लौहे के तीर, भाले के अग्रभाग, लौहे का कटोरा तथा कृष्ण परिमार्जित मृद्पात्र भी मिले हैं।
11. तिलवाड़ा (बाड़मेर) :-
- तिलवाड़ा बाड़मेर जिले में लूणी नदी के किनारे स्थित पुरातात्विक स्थल है।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य 1967-68 में ‘राजस्थान राज्य पुरातत्व विभाग’ द्वारा करवाया गया।
- यहाँ पर उत्खनन का कार्य डॉ. वी. एन. मिश्र के नेतृत्व में किया गया।
- यह एक ताम्र पाषाणकालीन स्थल है जहाँ से 500 ई. पू. से 200 ई. तक विकसित सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं।
- यहाँ से उत्तर पाषाण युग के भी अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ पर उत्खनन से पाँच आवास स्थलों के अवशेष मिले हैं।
- यहाँ एक अग्निकुण्ड मिला है जिसमें मानव अस्थि भस्म तथा मृत पशुओं के अवशेष मिले हैं।
12. रैढ़ (टोंक) :-
- रैढ़ टोंक जिले की निवाई तहसील में ढ़ील नदी के किनारे स्थित पुरातात्विक स्थल है।
- यह एक लौह युगीन सभ्यता है।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य 1938-39 में दयाराम साहनी के नेत्तृत्व में तथा अंतिम रूप में उत्खनन का कार्य डॉ. केदारनाथ पूरी के द्वारा करवाया गया।
- रैढ़ के उत्खनन से बड़ी मात्रा में मिलने वाले लौह उपकरणों तथा मुद्राओं के कारण इसे प्राचीन भारत का टाटानगर कहा जाता है।
- यह एक धातु केंद्र था जहाँ पर औद्योगिक कार्य एवं निर्यात हेतु उपकरण एवं औजार बनाए जाते थे।
- रैढ़ में उत्खनन से 3075 आहत मुद्राएँ तथा 300 मालव जनपद के सिक्के प्राप्त हुए है। यहाँ से यूनानी शासक अपोलोडोट्स का एक खण्डित सिक्का भी प्राप्त हुआ है।
- रैढ़ में उत्खनन से हल्के गुलाबी रंग से मिट्टी का बना एक संकीर्ण गर्दन वाला फूलदान प्राप्त हुआ है।
- यहाँ से प्राप्त मृदभांड चक्र से निर्मित है तथा यहाँ से विभिन्न प्रकार के मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए हैं।
- रैढ़ के मृद्भांडो में गोल (115) ‘रिंग वेल्स’ एक दूसरे पर लगा दिए जाते थे।
- रैढ़ में पकाई गई मातृ देवी व शक्ति के विभिन्न रूपों की मूर्तियाँ प्राप्त हुई है।
- यहाँ से कर्णफूल, गले का हार, चुड़ियाँ, पायजेब आदि आभूषणों के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ से आलीशान इमारतों के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।
- रैढ़ से मृतिका से बनी यक्षिणी की प्रतिमा प्राप्त हुई है जो संभवत: शुंग काल की मानी जाती है।
- सिर पर पगड़ी पहने है।
- यहाँ से मालव जनपद के 14 सिक्के, 6 सेनापति सिक्के एवं 7 वपू के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
- रैढ़ से एशिया का अब तक का सबसे बड़ा सिक्कों का भण्डार मिला है।
- रैढ़ से जस्ते को साफ करने के प्रमाण मिले है।
- रैढ़ के निवासी मोटा एवं बारीक कपड़ा बनाने में सिद्धहस्त थे।
13. नगर (टोंक) :-
- नगर पुरातात्विक स्थल टोंक जिले में उणियारा कस्बे के पास स्थित है। इसे कर्कोट नगर भी कहा जाता है।
- इसका प्राचीन नाम ‘मालव नगर’ था।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य 1942-43 में श्रीकृष्ण देव द्वारा किया गया।
- यहाँ से बड़ी संख्या में मालव सिक्के तथा आहत मुद्राएं प्राप्त हुई है।
- यहाँ से प्राप्त मृदभांडो के अधिकतर अवशेषों का रंग लाल है।
- नगर में उत्खनन से गुप्तोत्तर काल की स्लेटी पत्थर से निर्मित महिषासुरमर्दिनी की मूर्ति प्राप्त हुई है।
- इसके अतिरिक्त यहाँ से मोदक रूप में गणेश का अंकन, फणधारी नाग का अंकन, कमल धारण किए लक्ष्मी की खड़ी प्रतिमा प्राप्त हुई है।
- वर्तमान में नगर सभ्यता को ‘खेड़ा सभ्यता’ के नाम से जाना जाता है।
- नगर के उत्खनन से 6000 मालव सिक्के मिले हैं।
- नगर से लाल रंग के मृद्भांड एवं अनाज भरने के कलात्मक मटकों के अवशेष प्राप्त हुए है।
14. भीनमाल (जालौर) :-
- यहाँ पर उत्खनन कार्य 1953-54 में रतनचंद्र अग्रवाल के निर्देशन में किया गया।
- यहाँ के मृद्पात्रों पर विदेशी प्रभाव दिखाई देता है।
- यहाँ की खुदाई से मृद्भांड तथा शक क्षत्रपों के सिक्के प्राप्त हुए है।
- भीनमाल से यूनानी दुहत्थी सुराही भी प्राप्त हुई है।
- यहाँ से रोमन एम्फोरा (सुरापात्र) भी मिला है।
- यहाँ से ईसा की प्रथम शताब्दी एवं गुप्तकालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- संस्कृत विद्वान महाकवि माघ एवं गुप्तकालीन विद्वान ब्रह्मगुप्त का जन्म स्थान भीनमाल ही माना जाता है।
- चीनी यात्री ह्नेनसांग ने भी भीनमाल की यात्रा की।
15. नोह (भरतपुर) :-
- वर्ष 1963-64 में रतनचंद्र अग्रवाल के निर्देशन में यहाँ पर उत्खनन कार्य किया गया।
- रेडियो कार्बन तिथि के अनुसार इस सभ्यता का समय 1100 ई.पू. से 900 ई.पू. माना जाता है।
- यहाँ से उत्खनन में विशालकाय यक्ष प्रतिमा तथा मौर्यकालीन पॉलिश युक्त चुनार के चिकने पत्थर से टुकड़े प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ से प्राप्त एक पात्र पर ब्राह्मी लिपि में लेख अंकित है।
- यह एक लौहयुगीन सभ्यता है तथा यहाँ से प्राप्त भांड काले तथा लाल वेयर युक्त है।
- यहाँ पर एक ही स्थान से 16 रिंगवेल प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ से 5 सांस्कृतिक युगों के अवशेष मिले हैं।
- यहाँ से लौहे के कृषि संबंधी उपकरण एवं चक्रकूपों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ के निवासी मकान बनाने के लिए पक्की ईंटों का प्रयोग करते थे।
- यहाँ से कुषाण नरेश हुविस्क एवं वासुदेव के सिक्के प्राप्त हुए है।
- नोह से ताम्र युगीन, आर्य युगीन एवं महाभारत कालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
16. बरोर (गंगानगर) :-
- गंगानगर में सरस्वती नदी के तट पर इस सभ्यता के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
- वर्ष 2003 में यहाँ उत्खनन कार्य शुरू किया गया।
- यहाँ से प्राप्त अवशेषों के आधार पर इस सभ्यता को प्राक् प्रारंभिक तथा विकसित हड़प्पा काल में बांटा गया है।
- यहाँ के मृद्भांडो में काली मिट्टी के प्रयोग के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
- वर्ष 2006 में यहाँ मिट्टी के पात्र में सेलखड़ी के 8000 मनके प्राप्त हुए हैं।
- यह स्थल हड़प्पाकालीन विशेषताओं के समान जैसे सुनियोजित नगर व्यवस्था, मकान निर्माण में कच्ची ईटों का प्रयोग तथा विशिष्ट मृद्भांड परम्परा आदि से युक्त है।
- यहाँ से बटन के आकार की मुहरें प्राप्त हुई हैं।
17. ईसवाल (उदयपुर) :-
- प्रागैतिहासिक काल से मध्यकाल तक के प्रमाण
- लौह युगीन सभ्यता।
- प्राचीन औद्योगिक बस्ती।
- इस स्थल का उत्खनन कार्य राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर के पुरातत्व विभाग के निर्देशन में किया गया।
- यहाँ से निरन्तर लौहा गलाने के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ से प्राक् ऐतिहासिक काल से मध्यकाल तक का प्रतिनिधित्व करने वाली मानव बस्ती के प्रमाण पाँच स्तरों से प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ पर 5वीं शताब्दी ई.पू. में लोहा गलाने का उद्योग विकसित होने के प्रमाण है।
- यहाँ से प्राप्त सिक्कों को प्रांरभिक कुषाणकालीन माना जाता है।
- मौर्य, शुंग, कुषाणकाल में यहाँ लौहा गलाने का कार्य होता था।
- यहाँ उत्खनन में ऊँट के दाँत एवं हडि्डयाँ मिली हैं।
- यहाँ के मकान पत्थरों से बनाये जाते थे।
18. लाछूरा (भीलवाड़ा) :-
- उत्तरी काले चित्रित मृद्भांड(NBPW) मृदभाण्ड
- कुषाण कालीन स्थल
- यह पुरातात्विक स्थल भीलवाड़ा जिले की आसींद तहसील में स्थित है।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य वर्ष 1998-1999 में बी. आर. मीना के निर्देशन में किया गया।
- यहाँ से 700 ई. पू. से 200 ई. तक की सभ्यताओं के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ से मानव तथा पशुओं की मृणमूर्तियाँ, ताँबे की चूड़ियाँ, मिट्टी की मुहरें जिस पर ब्राह्मी लिपि में 4 अक्षर अंकित है, ललितासन में नारी की मृण्मूर्ति आदि प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ से शुंगकालीन तीखे किनारे वाले प्याले प्राप्त हुए हैं।
19. जूनाखेड़ा (पाली) :-
- इस पुरातात्विक स्थल की खोज गैरिक ने की थी।
- यहाँ से उत्खनन में मिट्टी के बर्तन पर ‘शालभंजिका’ का अंकन मिला है।
- इसके अतिरिक्त यहाँ से काले ओपदार कटोरे तथा छोटे आकार के दीपक प्राप्त हुए हैं।
20. नलियासर (जयपुर) :-
- जयपुर स्थित इस पुरातात्विक स्थल से चौहान वंश से पूर्व की सभ्यता के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ से ब्राह्मी लिपि में लिखित कुछ मुहरें प्राप्त हुई हैं।
- यहाँ से आहत मुद्राएँ, उत्तर इण्डोससेनियन सिक्के, कुषाण शासक हुविस्क, इण्डोग्रीक, यौधेयगण तथा गुप्तकालीन चाँदी के सिक्के मिले हैं।
- यहाँ से 105 कुषाणकालीन सिक्के प्राप्त हुए हैं।
- इस सभ्यता का समय तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से छठी सदी तक माना जाता है।
21. कुराड़ा (नागौर) :-
- यह ताम्रयुगीन सभ्यता स्थल है।
- यहाँ से ताम्र उपकरणों के अतिरिक्त प्रणालीयुक्त अर्घ्यपात्र प्राप्त हुआ है।
22. किराडोत (जयपुर) :-
- इस सभ्यता स्थल से ताम्रयुगीन 56 चूड़ियाँ प्राप्त हुई है। इसमें अलग-अलग आकार की 28 चूड़ियों की 2 सेट प्राप्त हुए हैं।
23. गरड़दा (बूँदी) :-
- छाजा नदी के किनारे स्थित इस स्थान से पहली बर्ड राइडर रॉक पेंटिंग प्राप्त हुई है।
- यह देश में प्रथम पुरातत्व महत्त्व की पेंटिंग है।
24. कोटड़ा (झालावाड़) :-
- इस स्थल का उत्खनन वर्ष 2003 में दीपक शोध संस्थान द्वारा किया गया।
- यहाँ से 7वीं से 12वीं शताब्दी मध्य के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
25. मलाह (भरतपुर) :-
- यह स्थल भरतपुर जिले के घना पक्षी अभयारण्य में स्थित है।
- इस स्थल से अधिक संख्या में तांबे की तलवारें एवं हार्पून प्राप्त हुए हैं।
- हार्पून एक आयुध अस्त्र था। जो बड़े पशुओं का शिकार करने में उपयोगी थे।
26. कणसव (कोटा) :-
- इस स्थल से मोर्य शासक धवल का 738 ई. से संबंधित लेख मिला है।
27. नैनवा (बूंदी) :-
- यहाँ पर उत्खनन कार्य श्रीकृष्ण देव के निर्देशन में सम्पन्न हुआ।
- इस स्थल से 2000 वर्ष पुरानी महिषासुरमर्दिनी की मृण मूर्ति प्राप्त हुई है।
28. डडीकर (अलवर):-
- इस स्थल से पाँच से सात हजार वर्ष पुराने शैलचित्र प्राप्त हुए हैं।
29. सोंथी :-
- यह बीकानेर में स्थित है।
- खोज :- अमलानंद घोष द्वारा (1953 में) की गई।
- यह कालीबंगा प्रथम के नाम से प्रसिद्ध है।
- यहाँ पर हड़प्पाकालीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं।
30. बांका :-
- यह भीलवाड़ा जिले में स्थित है।
- यहाँ से राजस्थान की प्रथम अलंकृत गुफा मिली है।
31. गुरारा :-
- सीकर जिले में स्थित है।
- यहाँ से हमें चाँदी के 2744 पंचमार्क सिक्के मिले हैं।
32. बयाना :-
- यह भरतपुर में स्थित है।
- इसका प्राचीन नाम श्रीपंथ है।
- यहाँ से गुप्तकालीन सिक्के एवं नील की खेती के साक्ष्य मिले हैं।
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क्र.स.
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संस्कृति काल
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स्थल
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1.
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पुरापाषाण काल
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डीड़वाना एवं जायल (नागौर), भानगढ़ (अलवर), विराटनगर (जयपुर), दर (भरतपुर), इन्द्रगढ़ (कोटा)
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2.
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मध्यपाषाण काल
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बागौर (भीलवाड़ा), विराटनगर (जयपुर), तिलवाड़ा (बाड़मेर)
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3.
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नवपाषाण काल
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आहड़ (उदयपुर), कालीबंगा (हनुमानगढ़), गिलूंड (राजसमंद), झर (जयपुर)
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4.
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ताम्रपाषाण काल
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बागौर (भीलवाड़ा), तिलवाड़ा (बाड़मेर), बालाथल (उदयपुर)
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5.
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ताम्रयुगीन
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गणेश्वर (सीकर), साबणियां, पूंगल (बीकानेर), बूढ़ा पुष्कर (अजमेर), बेणेश्वर (डूँगरपुर), नन्दलालपुरा, किराड़ोत, चीथबाड़ी (जयपुर), कुराड़ा (परबतसर), पलाना (जालौर), मलाह (भरतपुर), कोल माहौली (सवाईमाधोपुर)
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6.
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लौहयुगीन
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नोह (भरतपुर), सुनारी (झुंझुनूं), विराटनगर, जोधपुरा, सांभर (जयपुर), रैढ़, नगर, नैणवा (टोंक), भीनमाल (जालौर), नगरी (चित्तौड़गढ़),चक-84, तरखानवाला (श्रीगंगानगर), ईसवाल (उदयपुर)
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अन्य तथ्य :-
- नोह एवं जोधपुरा के उत्खनन से ताँबे की सामग्री नहीं मिली है।
- आर्य सभ्यता के समकालीन राजस्थान के पुरास्थलों में सुनारी (झुंझुनूं), बैराठ (जयपुर), अनूपगढ़ (श्रीगंगानगर), चक-84 (श्रीगंगानगर), तरखानवाला (श्रीगंगानगर), नोह (भरतपुर) एवं जोधपुरा (जयपुर) प्रमुख हैं।