चौहानों को सूर्यवंशी बताने वाले स्त्रोत
- नयन चन्द्रसूरी – “हम्मीर महाकाव्य”
- जोधराज – “हम्मीर रासो”
- नरपति नाल्ह – “बीसल देव रासो”
- जयानक – “पृथ्वीराज विजय”
- G.H औझा – “राजपूताने का प्राचीन इतिहास”
- चौहानों को चन्द्रवंशी बताने वाले स्त्रोत
- आबू का अचलेश्वर शिलालेख (1285)
- हांसी अभिलेख
- चौहानों को इन्द्रवंशी बताने वाले स्त्रोत
- राज्यपाल का सेवाड़ी अभिलेख (पाली जिले की बाली तहसील में)
बिजोलिया शिलालेख व जान कवि – “कायम खाँ रासो” में चौहानो को ब्राह्मण कहा गया। बिजोलिया शिलालेख में चौहानों को ”वत्स गौत्रीय ब्राह्मणों की सन्तान” कहा गया।
- चौहानों का मूल स्थान से सम्बन्धित मत
- गोपीनाथ शर्मा – गुर्जरत्रा क्षेत्र
- डॉ.दशरथ शर्मा – चित्तौड़गढ़
- हम्मीर महाकाव्य
- पृथ्वीराज विजय पुष्कर
- सुर्जन चरित्र
- आसोपा ने पिछोला झील के चाहू ओर निवास के कारण चौहानों को चाहमान कहा।
- ‘पृथ्वीराज विजय’ में चौहानों का प्रथम शासक/संस्थापक चाहमान कहा है। जिसकी व्याख्या- क्रमश – चाप,हरि,मान व नीति में पारंगत होने वाले व्यक्ति के रूप में की गयी है।
- सपादलक्ष - सवालख गाँवों का समूह।
- शाकम्बरी (सांभर) रियासत – चौहानों की प्रारम्भिक रियासत।
वासुदेव चौहान (551ई.)
- चौहान वंश का संस्थापक/प्रथम शासक
- डॉ. दशरथ शर्मा ने बिजोलिया शिलालेख के आधार पर तथा राजशेखर के “प्रबन्ध कोष” के आधार पर वासुदेव चौहान को प्रथम शासक बताया है।
- इसने “साँभर कस्बा” बसाया व इसे राजधानी बनाया।
- “साँभर झील” का निर्माण करवाया।
- वासुदेव चौहान के बाद लगभग 400 वर्षों तक कम महत्वपूर्ण शासक रहे तथा ये प्रतिहारों के सामन्त थे, कुछ शासक निम्नलिखित है।
- सामन्त राज, नरदेव, जयदेव, विग्रहराज-I, चन्द्रराज, गोपेन्द्रराज।
- दुर्लभराज I - यह प्रतिहार नरेश वत्सराज का सामन्त था। इसके समय शाकम्भरी रियासत पर मुस्लिम आक्रमण हुआ (प्रथम बार)।
- गूवक I (गोविन्दराज I) – प्रतिहार नरेश नागभट्ट II ने इसे वीर राजा की उपाधि दी। हर्षनाथ मन्दिर का निर्माण शुरू करवाया। “सुल्तान वेग वारिस” को पराजित किया।
- चन्द्रराज II गूवक II (गोविन्द राज II) – अपनी बहन कमलावती का विवाह मिहिर भोज से किया।
- चन्द्रराज – इसकी रानी आत्मप्रभा/रूद्राणी ने कालसर्प दोष से मुक्ति पाने हेतु पुष्कर झील किनारे 1000 शिवलिंग स्थापित करवाए व 1000 दीपक जलाए। दिल्ली के तोमर शासक को पराजित किया।
- वाक्पतिराज – 188 युद्धों का विजेता माना जाता है। प्रतिहारो को पराजित किया। “महाराजा” की उपाधि धारण करने वाला प्रथम चौहान शासक।
- सिंहराज – प्रतिहारो से स्वयं को मुक्त किया। प्रथम स्वतंत्र चौहान शासक जिसने ‘हर्षनाथ मन्दिर’ का निर्माण पूर्ण करवाया। “महाराजाधिराज” की उपाधि धारण करने वाला प्रथम चौहान शासक।
- विग्रहराज II (956 राज्यारोहण तिथि) – प्रथम प्रतापी शासक, उपाधि- “परम भट्टारक महाराधिराज परमेश्वर” यह उपाधि धारण करने वाला प्रथम चौहान शासक, इसी के समय हर्षनाथ लेख (983 ई.) की रचना की गयी जिसमें वासुदेव से सिंहराज तक के शासकों की सूची मिलती है। इसने अन्हिल वाड़ा के चालुक्य शासक मूलराज I को पराजित किया। भड़ौच (भृगुकच्छ) व साँभर में आशापुरा देवी का मन्दिर बनवाया।
- दुर्लभराज II - इसे “दुर्लध्यमेरू” कहा गया है।
- गोविन्दराज III – पृथ्वीराज विजय में इसे “वेरीघट्ट” व ‘शत्रुसंहारक’ कहा गया है तथा फरिश्ता ने “तारीखे फरिश्ता” में इसे गजनी के शासक को मारवाड़ में रोकने वाला कहा गया है।
- वाक्पतिराज II – इसके पुत्र लक्ष्मण ने नाडोल(पाली जिले की देसूरी तहसील में) में चौहान शाखा को प्रारम्भ किया।
- वीर्यराम – 1024ई. में इसी के समय महमूद गजनवी ने साँभर पर आक्रमण किया।
- चामुण्ड राय – इसने पुन: साँभर पर अधिकार किया।
- दुर्लभराज III – सुल्तान इब्राहिम से युद्ध में वीरगति प्राप्त हुआ। मलेच्छों को मातंग भी कहा गया है।
- विग्रहराज III – यह एक दुराचारी शासक था। इसने महासत्या नामक ब्राह्मणी का अपहरण किया था।
- पृथ्वीराज I – “प्रबन्ध कोष” में इसे तुर्क सेना का विजेता कहा गया है। 1105 ई. में जीणमाता अभिलेख से इसकी जानकारी मिलती है। उपाधि – “परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर” पुत्र – अजयराज चौहान