विग्रजहराज IV (1152-63) बीसलदेव
- उपाधि – कविबान्ध्व, कटिबन्धु
- इसके काल को “चौहान वंश का स्वर्णकाल” कहलाता है। कुमारपाल चालुक्य को पराजित कर पाली,जालौर, नाडोल पर पुन:अधिकार किया।
- शिवालिक स्तम्भ लेखानुसार (1163 अशोक के शीलालेख पर, दिल्ली) इसने मुसलमानों का सफाया किया व उन्हे अटक नदी तक रोके रखा आगे नही बढ़ने दिया।
- गजनी के शासक अमीर खुसरू शाह को पराजित किया।
दरबारी साहित्यकार-
(i) नरपति नाल्ह – “बीसलदेव रासो” इस ग्रन्थ में विग्रहराज IV व परमार राजा भोज की पुत्री राजमति के बीच प्रेम प्रसंग का उल्लेख किया गया है।
(ii) सोमदेव – “ललित विग्रह राज” इस ग्रन्थ में इन्द्रपुरी की राजकुमारी देसल देवी व विग्रहराज IV के बीच प्रेम प्रंसग का उल्लेख मिलता है।
विग्रहराज ने बीसलदेव के नाम से “हरिकेलि” नामक संस्कृत नाटक लिखा जिसमें भगवान शिव व अर्जुन के बीच धनुर्युद्ध का उल्लेख है। इसी रचना के आधार पर कीलहॉर्न ने विग्रहराज की तुलना कालीदास व भवभूति से की है। यह कल्पना पर आधारित ग्रन्थ है।
दरबारी विद्वान धर्मद्योष सूरी के आग्रह पर “पशुवध पर प्रतिबन्ध” लगाया। (एकादशी के दिन)।
विग्रहराज के प्रमुख निर्माण कार्य-
(i) बीसलपुर कस्बा (टोंक) बसाया।
(ii) बीसलपुर बाँध (बीसलसागर तालाब) का निर्माण करवाया।
(iii) अजमेर में सरस्वती कण्ठाभरण संस्कृत विद्यालय का निर्माण करवाया तथा इसकी दिवारों पर हरिकेलि नाटक उत्कीर्ण करवाया।
- इस विद्यालय भवन को कुतुबुद्धीन एबक ने मुस्लिम ईमारत के रूप में परिवर्तित किया जिसे अढ़ाई दिन का झोपड़ा भी कहा जाता है क्योंकि वर्तमान में सूफी सन्त पंजाब शाह के उर्स में यहाँ भाग लेने हेतु आने वाले जायरीन (मुस्लिम श्रद्धालु) इस भवन में लगभग ढ़ाई दिन तक ठहरते है। इसे 16 खम्बा महल भी कहा जाता है। यह राजस्थान की प्रथम मस्जिद मानी जाती है।
- इसी संस्कृत ईमारत को देखकर कर्नल टॉड ने कहा कि- “यह हिन्दू शिल्पकाला का प्राचीनतम् व पूर्ण परिष्कृत नमूना है।”
- विग्रहराज IV के बाद अपरगांग्य व पृथ्वीराज II ने शासन किया।
- पृथ्वीराज II की रानी सुहावा देवी को रूठी राणी (चौहानों में) भी कहा जाता है। सुहावा देवी ने 1164 से 69 में मेनाल (भीलवाड़ा) में सुहावेश्वर मन्दिर का निर्माण करवाया जो भूमिज शैली में बना है।
- सोमेश्वर चौहान (शैवमतावलम्बी) (1169-77ई.) पालन पोषण ननिहाल (गुजरात) में कुमारपाल चालुक्य ने किया।
- यह अपरगांग्य (विग्रहराज) का छोटा भाई व अर्णोराज + कांचन देवी का पुत्र था। पृथ्वीराज II की नि:सन्तान मृत्यु के बाद सोमेनश्वर शासक बना।
- प्रधानमंत्री = कैमास (कदम्बवास) :- दाहिमा राजपूत (द.पू.पंजाब के निवासी)
- विवाह – कलचूरी नरेश की पुत्री कर्पूरी देवी से।
- पुत्र – पृथ्वीराज तृतीय व हरिराज
- इस के काल में बिजोलिया शिलालेख (1170 ई) की रचना “गुणभद्र” ने तथा उत्कीर्ण “गोविन्द” ने किया। यह दिग्म्बर लेख है। इसमें साँभर व अजमेर के चौहान वंश की सूची है। इसमें चौहानों को वत्सगौड़ीय ब्राह्मणों की सन्तान कहा है। इस अभिलेख में निम्नलिखित स्थानों के प्राचीन नामों का उल्लेख किया गया है-
1. जालौर = जाबालिपुर
2. नाडोल = नड्डुल
3. दिल्ली = ढ़िल्लिका
4. भीनमाल = श्रीमाल
5. माँडलगढ़ = मण्डलकर
6. बिजोलिया = विन्ध्यवल्ली
7. नागदा = नागह्द आदि।
- बिजोलिया शिलालेख पार्श्वनाथ मन्दिर के पास चट्टान पर अंकित है। इसकी रचना जैन श्रावक लोलाक ने मन्दिर व कुण्ड निर्माण की स्मृति में करवायी थी।
- जब सोमेश्वर चौहान आबू के शासक जैतसिंह की सहायता हेतु गया तब आबू के युद्ध में चालुक्य शासक भीम द्वितीय से युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ। स्त्रोत - पृथ्वीराज रासो
- अपने पिता व स्वयं की मूर्ति बनवायी। विशेष प्रकार की मूर्तिकला शैली को प्रश्रय दिया।
- पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज तृतीय ने पिता की हत्या का बदला लिया व भीम द्वितीय को युद्ध में मार डाला। परन्तु गोपीनाथ शर्मा के अनुसार भीम द्वितीय 12 पातक जीवित था जब कि पृथ्वीराज तृतीय की 1192 ई. में मृत्यु हो गयी थी।