रणथम्भौर के चौहान वंश
- सवाई माधोपुर से 6 मील उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में।
- अमीर खुसरो के अनुसार दिल्ली से 2 सप्ताह की यात्रा पर।
- रण + स्तम्भ + पुर = रणथम्भौर
- रण व स्तम्भ नामक पहाड़ियाँ स्थित हैं।
- 8 वीं शताब्दी में रणथम्मन चौहान ने इसका निर्माण करवाया था।
प्रमुख शासक
गोविन्द राज/गोविन्द चन्द्र चौहान
- रणथम्भौर के चौहान वंश का संस्थापक
- यह पृथ्वीराज चौहान तृतीय का पुत्र था।
- इसने मोहम्मद गौरी की अधीनता स्वीकार की।
वल्लनदेव चौहान
- गोविन्दराज का पुत्र व उत्तराधिकारी
- प्रथम स्वतंत्र शासक
- इसने इल्तुतमिश को वार्षिक कर देना बन्द कर दिया।
- इल्तुतमिश ने रणथम्भौर पर आक्रमण कर अधिकार किया वल्लनदेव को वनों में शरण लेनी पड़ी
- प्रहलाद, वीरनारायण ने भी वनों में रहकर ही संघर्ष किया।
बागभट्ट-
- यह रणथम्भौर का प्रथम प्रतापी चौहान शासक था।
- रजिया सुल्तान ने इसके समय सफल आक्रमण किया परन्तु उसने किला खाली कर दिया क्योंकि इस पर अधिकार रखना अधिक खर्चिला कार्य था
- इसने पुन: रणथम्भौर पर अधिकार किया।
जय सिम्हा/जैत्रसिंह (1250-82) ई.
- इसके समय दिल्ली के सुल्तान नासीरूद्दीन महमूद (1246-66) ई. ने बलबन को रणथम्भौर अभियान पर भेजा।
- बलबन ने 2 बार रणथम्भौर अभियान किया उसने झाईन पर तो सफल सैन्य अभियान किया परन्तु रणथम्भौर पर अधिकार करने में असफल रहा।
- इसने अपने तीसरे पुत्र जो सर्वाधिक योग्य था उसे सिंहासन सौंपा। (गोपीनाथ शर्मा के अनुसार)
हम्मीर देव चौहान (1282-1301) ई.
- रणथम्भौर के चौहान वंश का सबसे प्रतापी शासक।
- दरबारी विद्वान = बीजादित्य
- दिग्विजय पर निकला, निम्नलिखित राज्यों को पराजित किया-
1. भीमरस का राजा अर्जुन
2. धार राज्य (भोज परमार)
3. आबू, चित्तौड़, वर्धनपुर,पुष्कर,चम्पा
- दिग्विजय से लौटकर कोटियजन यज्ञ किया जिसका प्रमुख पण्डित विश्वरूप था।
- इसने कुल 17 युद्ध किए जिसमें 16 में विजयी हुआ।
- सुल्तान जलालुद्दी खिलजी ने 1291-92 ई. में रणथम्भौर पर असफल आक्रमण किया परन्तु झाईन पर अधिकार किया व इसे लूटा।
- झाईन को रणथम्भौर दुर्ग की कुंजी कहा जाता था।
- जलालुद्दीन ने 1192 ई. में रणथम्भौर का 8 माह तक घेरा डाला असफल रहने पर सेनापति मलिक अहमद चप को घेरा उठाने का आदेश दिया कारण पूछने पर जलालुद्दीन ने कहा कि-
- “ऐसे 10 किलों को भी मैं मुसलमान के एक बाल बराबर भी नहीं समझता”
- जलालुद्दीन के आक्रमण के समय हम्मीर का सेनापति “गुरूदास सैनी” वीरगति को प्राप्त हुआ।
अलाउद्दीन खिलजी के रणथम्भौर अभियान के कारण –
(i) चन्द्रशेखर- “हम्मीर हठ” के अनुसार अलाउद्दीन के भगोड़े सैनिक मोहम्मदशाह व केहब्रु को हम्मीर द्वारा शरण देना युद्ध का कारण बना। मोहम्मदशाह व अलाउद्दीन की मराठा बेगम चिमना बेगम के बीच प्रेम-प्रसंग बताया जाता है। इसे भी एक कारण बताया है।
(ii) पद्मनाथ – “कान्हड़देव प्रबन्ध” के अनुसार 1299 ई. में अलाउद्दीन के गुजरात अभियान के समय मोहम्मदशाह व केहब्रु ने शाही सेना में विद्रोह किया व पराजित होकर हम्मीर के पास शरण ली। हम्मीद द्वारा इन्हें नहीं लौटाने पर युद्ध हुआ।
(iii) अमीर खुसरो ने राजनीतिक महत्वकांक्षा को युद्ध का प्रमुख कारण माना (सर्वमान्य कारण)
- अलाउद्दीन खिलजी ने उलुग खाँ व नुसरत खाँ के नेतृत्व में शाही सेना रणथम्भौर भेजी (1299 ई.)
- प्रथम संघर्ष में हम्मीर की विजय हुई परन्तु उसका एक सेनापति भीमसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ तथा दूसरा धर्मसिंह लूट के माल को लेकर रणथम्भौर पहुँचने में सफल हुआ।
- इस समय हम्मीर मुनिव्रत/मौन व्रत में व्यस्त था।
- नाराज हम्मीर ने धर्मसिंह को अन्धा करवा दिया तथा उसके स्थान उसके भाई भोज को नियुक्त किया (स्त्रोत: हम्मीर महाकाव्य, डॉ. दशरथ शर्मा) धर्म सिंह प्रतिरोध लेना चाहता था, हम्मीर ने बाद में इसे धन वसूलने का दायित्व सौंपा तब धर्मसिंह ने अत्यधिक कर लगाए व कठोरता से इन्हें वसूल किया जिससे प्रजा में असन्तोष उत्पन्न हुआ।
- नुसरत खाँ मारा गया अत: शाही सेना में निराशा उत्पन्न हुई ऐसी स्थिति में अलाउद्दीन सेना सहित दिल्ली से रणथम्भौर पहुँचा।
- अलाउद्दीन ने लगभग 1 वर्ष तक रणथम्भौर दुर्ग का घेरा डाले रखा अन्तत: दुर्ग में अन्न की भारी कमी आ गयी थी।
- अमीर खुसरो इस अभियान में शाही सेना के साथ था। इसने दुर्ग में खाद्यान की कमी हेतु लिखा कि- “दुर्ग में सोने के 2 दानों के बदले अन्न का एक दाना भी नसीब नही था।”
- सरहिन्दी ने हम्मीर की घुड़सवार सेना की संख्या 12,000 तथा अमीर-खुसरो ने 10,000 बताई है।
- हम्मीर ने रतिपाल को सेनापति तथा रणमल को सेनानायक नियुक्त किया।
- अलाउद्दीन ने कूटनीति का प्रयोग करते हुए सन्धि का प्रस्ताव दिया। सन्धि की शर्तों को तय करने के लिए रतिपाल को भेजा गया जिसने विश्वासघात किया तथा गुप्त रास्ता बता दिया, इसने रणमल को अपनी ओर मिला लिया। सुर्जन शाह नामक अन्य अधिकारी ने भी विश्वासघात किया। शाही सेना ने दुर्ग में प्रवेश किया।
- अन्तिम समय जानकर रानी रंगदेवी/गंगदेवी ने जौहर (जल) व हम्मीद देव चौहान ने केसरिया का नेतृत्व किया तथा किले के द्वारा खोल दिए गए।
- नयनचन्द्र सूरी के “हम्मीर महाकाव्य” के अनुसार युद्ध के अन्तिम क्षणों में हम्मीर ने स्वयं अपना शीश काटकर भगवान शिव को अर्पित किया।
- निम्नलिखित के अनुसार इस दुर्ग पर अलाउद्दीन के अधिकार की भिन्न–भिन्न तिथियाँ दी गयी हैं-
1. बरनी = 10 जुलाई,1301ई.
2. इलियट = 11 जुलाई ,1301ई. (सर्वमान्य)
3. हम्मीर महाकाव्य = 12 जुलाई,1301ई.
- विजय के बाद अलाउद्दीन ने निम्नलिखित को मृत्युदण्ड दिया –
1. मोहम्मद शाह
2. केहब्रु
3. रतिपाल
4. रणमल
- दुर्ग का दायित्व उलुग खाँ को सौंपा गया।
- जन सामान्य का कत्लेआम किया गया व मन्दिरों को तोड़ा गया। अमीर खुसरो ने कहा – “कुफ्र का गढ़” इस्लाम का घर हो गया।
- इसामी- “हम्मीर के परिवार के किसी सदस्य को जीवित बन्दी नहीं बनाया जा सका।”
- अबुल फजल ने रणथम्भौर दुर्ग को सात पहाड़ियों से घिरा बख्तर बन्द दुर्ग कहा है।
जालौर का चौहान वंश
- जालौर का प्राचीन नाम जाबालिपुर बिजोलिया शिलालेख में मिलता है।
- साधारणत: जाल (एक प्रकार का वृक्ष) + लौर = जाल के वृक्षों की सीमा वाला क्षेत्र माना गया है।
- प्राचीन काल में यह प्रतिहारो व इनके बाद परमारों के अधीन था।
- जनश्रुति के अनुसार इसका एक नाम जालन्धर भी था। यह जालन्धर नाथ की तपोभूमि मानी जाती है। इस दुर्ग के पास सिरे मन्दिर (शिव मन्दिर) है जो नाथ सम्प्रदाय का माना जाता है।
- जालौर दुर्ग सूकड़ी नदी के (दाहिने) किनारे स्थित है।
- प्रतिहार नरेश वत्सराज के समय जैन आचार्य उद्योतन सूरी ने जालौर में ‘कुवलयमाला’ की रचना की थी।
- डॉ.दशरथ शर्मा के अनुसार प्रतिहार नरेश नागभट्ट प्रथम ने जालौर में अपनी राजधानी स्थापित की और उसने ही जालौर दुर्ग का निर्माण करवाया। G.H. ओझा ने परमारो को इसका निर्माता माना जाता है। जो सर्वमान्य नही है।
- सोनगिरि पर्वत के कारण यहाँ के चौहान शासक सोनगरा चौहान कहलाए।
- हसन निजामी “यह अजेय दुर्ग है” इसके द्वार कभी किसी विजेता द्वारा नही खोले गए।
प्रमुख शासक
कीर्तिपाल चौहान – 1181 ई. में परमारों को पराजित कर जालौर पर अधिकार किया व जालौर की चौहान शाखा की स्थापना की।
- यह नाडोल की चौहान शाखा के अल्हण चौहान का पुत्र था।
- अल्हण चौहान गुजरात के चालुक्यों का सामन्त था। प्रारम्भ में यह भी चालुक्यों की सेवा में था।
- सूंधा पर्वत अभिलेख में कीर्तिपाल के लिए “राजेश्वर”शब्द का प्रयोग हुआ है।
- कीर्तिपाल ने चालुक्यों की सहायता से मेवाड़ के शासक सामन्त सिंह को पराजित किया व मेवाड़ पर अधिकार किया।
- तत्पश्चात् जालौर पर अधिकार किया तथा यहाँ के परमारों को पराजित किया। जालौर को ही राजधानी बनाया।
- मुहणोत नैणसी ने कीर्तिपाल को “कीतू एक महान राजपूत” कहा।
समर सिंह (1182-1205) ई.
- कीर्तिपाल का पुत्र थाद्ध इसके समय दिल्ली पर मो.गौरी का शासन था।
- इसने किले की दृढ़ सुरक्षा का प्रबन्ध किया (सूंधा पर्वत शिलालेख स्त्रोत:)
- चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय (गुजरात) के साथ अपनी पुत्री लीलादेवी का विवाह किया।
उदयसिंह (1205-57)
- जालौर की सोनगरा चौहान शाखा का सबसे प्रतापी शासक (डॉ. दशरथ शर्मा)
- सुंधा अभिलेख में उदयसिंह को तुर्को का मानमर्दन करने वाला कहा गया है।
- नाडोल, मण्डोर, भीनमाल, सांचौर (जालौर सत्यपुर) पर विजय प्राप्त की।
- इल्तुतमिश ने इसके काल में जालौर पर 2 बार आक्रमण किया प्रथम बार उसे सन्धि करके 100 ऊँट + 200 घोड़े देकर लौटा दिया गया। दूसरी बार गुजरात के बाधेला शासक के साथ संयुक्त मोर्चा बनाया अत: इल्तुतमिश बिना लड़े ही लौट गया। (1221ई.) वि.सं. 1278 हसन निजामी के अनुसार (1228ई.)
- प्रधानमंत्री = यशोवीर (विद्वान भी था)
- मेवाड़ के समकालीन शासक जैत्रिसंह गुहिल ने अपने पूर्वज सामन्त सिंह की पराजय का बदला लेने हेतु जालौर पर आक्रमण किया परन्तु उदयसिंह ने अपनी पौत्री रूपा देवी (चाचिग देव की पुत्री) का विवाह जैत्रसिंह के पुत्र तेजसिंह के साथ करके मधुर सम्बन्ध स्थापित किए।
- 1254 ई. में दिल्ली के सुल्तान नासीरूद्दीन महमूद ने भी जालौर पर असफल आक्रमण किया।
- उदयसिंह के शासनकाल में जालौर अपने विस्तार और वैभव की पराकाष्ठा पर पहुँचा।
चाचिगदेव (1257-82 ई.)
- सुंधा अभिलेखानुसार इसने गुजरात के शासक वीरम को पराजित किया।
- समकालीन दिल्ली के सुल्तान नासीरूद्दीन, बलबन परन्तु दिल्ली पर मंगोलो के आक्रमण का भय होने से राजपूताना पर सुल्तानो का ध्यान नही गया।
सामन्त सिंह – (1282-1296ई.)
- 1291 ई. में जब दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी का जालौर पर आक्रमण हुआ तब सामन्त सिंह ने गुजरात के बाघेला राजा सारंग देव की सहायता से सफलता पूर्वक सामना किया। शाही सेना असफल होकर लौट गयी।
- सामन्त सिंह ने अपने पुत्र कान्हड़देव को 1296 में सत्ता सौंप दी।
कान्हड़देव चौहान (1296-1311)
1. समकालीन राजनीतिक स्थिति
2. दिल्ली = अलाउद्दीन खिलजी
3. मेवाड़ (चित्तौड़) को प्रशासक = खिज्र खाँ (अलाउद्दीन खिलजी का पुत्र)
4. सिवाणा – शीतलदेव चौहान
5. मण्डोर – प्रतिहार
6. आमेर – कच्छवाहा वंश
7. मुख्य रानी = देसल देवी
8. पुत्र = वीरम देवी
जानकारी के स्त्रोत
1. पद्मनाभ – “कान्हड़देव”
“वीरम देव सोनगरा री बात”
2. जालौर प्रशस्ती
3. मकराना शिलालेख
4. मुहणोत नैणसी – “नैणसी री ख्यात”
5. फरिश्ता – “तारीखे फरिश्ता”
6. अमीर खुसरो – “खजाईन-उल-फुतुह”
- जालौर पर अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के कारणों पर विभिन्न मत-
1. कान्हड़देव प्रबन्ध – गुजरात अभियान के समय शाही सेना को मार्ग नही देना तथा लौटती शाही सेना पर कान्हड़देव द्वारा आक्रमण
2. तारीखे फरिश्ता – “अलाउद्दीन द्वारा कान्हड़देव को दिल्ली बुलाकर अपमानित करना।”
3. नैणसी री ख्यात - “वीरम देव तथा फिरोजा (अलाउद्दीन की बेटी)” के बीच प्रेम प्रसंग, वीरम देव द्वारा विवाह प्रस्ताव को ठुकरा देना।
4. अमीर खुसरो – “राजनीतिक महत्वकांक्षा”(सर्वमान्य मत)
- अलाउद्दीन ने जालौर का प्रशासक कमलुद्दीन गुर्ग को नियुक्त किया।
- जालौर का नाम बदलकर जलालाबाद किया।
- किले में अलाई मस्जिद का निर्माण करवाया। जो मूलत: परमार शासक भोज द्वारा बनवायी गई संस्कृत पाठशाला थी।
- कान्हड़देव के भाई मालदेव सोनगरा ने बाद में अलाउद्दीन की अधीनता स्वीकार की, उसे चित्तौड़ का प्रशासक नियुक्त किया गया (1316-26) तक।
- डॉ.दशरथ शर्मा के अनुसार जून 1308 ई. में अलाउद्दीन सेना सहित जालौर अभियान हेतु चला। परन्तु सर्वप्रथम सिवाणा पर आक्रमण किया तथा 10 नवम्बर 1308 को सिवाणा पर विजय प्राप्त की।
सिवाणा विजय
- सिवाणा का तत्कालीन शासक शीतलदेव चौहान (कान्हड़ देव का भतीजा था)
- इस समय सिवाणा दुर्ग में साका हुआ जिसमें जौहर का नेतृत्व रानी मैणा दे द्वारा तथा केसरिया का नेतृत्व शीतल देव चौहान इस दुर्ग में दूसरा साका 1559 में यहाँ के शासक कल्ला जी रायमलोत के समय हुआ तब अकबर की सेना का नेतृत्व मोटा राजा उदयसिंह ने किया था।
- अलाउद्दीन के आक्रमण के समय (सिवाणा पर)भावले सरदार का विश्वासघात भी सिवाणा के पतन का एक कारण बना। इसने जल कुण्ड में गोरक्त मिला दिया तथा अन्न भण्डार में गाय की अस्थियाँ डलवा दी थी।
- अलाउद्दीन ने सिवाणा का नाम बदलकर खैराबाद किया व इसका प्रशासक कमालुद्दीन गुर्ग को नियुक्त कर दिल्ली लौट गया।
- सिवाणा दुर्ग को कुमटगढ़ तथा अणखैलो शिवाणो भी कहते है।
जालौर विजय
- कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में ही खिलजी ने जालौर अभियान पर सेना भेजी।
- दहिया सरदार बीका के विश्वासघात के कारण गुप्त मार्ग से शाही सेना में किले में प्रवेश किया।
- 1311 में किले पर खिलजी का अधिकार हो गया इस समय किले में साका हुआ जिसमे जौहर का नेतृत्व देसल दे ने तथा केसरिया का नेतृत्व कान्हड़ देव ने किया।
- कान्हड़देव + वीरमदेव वीरगति को प्राप्त हुए