सिरोही के चौहान
- प्राचीन नाम – अर्बुद क्षेत्र, अर्बुद – ऊपर उठा हुआ भाग।
- कर्नल जेम्स टॉड ने सिरोही नगर का मूल नाम शिवपुरी बताया है।
- इस क्षेत्र पर शासन करने वाले वंश – मौर्य, कुषाण, हूण, प्रतिहार, परमार, गुहिल,चौहान राठौड़ आदि।
- परमार वंश के समय यहाँ की राजधानी – चन्द्रवती
लुम्बा
- सिरोही के देवड़ा चौहान शाखा का आदि पुरूष।
- सिरोही के चौहान वंश का संस्थापक
- यह जालौर की देवड़ा शाखा से सम्बन्धित था।
- इसने 1311 ई. में आबू और चन्द्रवती केा परमारो से छीनकर अपनी सत्ता स्थापित की।
- 1320 में अललेश्वर मन्दिर का जीर्णोद्वार करवाया
- तथा इस मन्दिर को हैठूडी गाँव भेंट किया।
- 1321 मे लुम्बा की मृत्यु।
- लुम्बा के उत्तराधिकारी – तेजसिंह, कान्हड़देव, सामन्त सिंह, सलखा, रायमल
शिवभान/शिभान s/o रायमल –
- मुस्लिम आक्रमण से चन्द्रावती सुरक्षित नही थी अत: सरणवा पहाडो पर दुर्ग बनवाया 1405 में शिवपुरी नगर बसाया।
सहसमल – शिवमान का पुत्र था।
- इसने शिवपुरी से 2 मील आगे 1425 ई. में सिरोही नगर बसाया। इस इस राजधानी बनाया।
- इसने सोलंकी राजपूतों के कुछ क्षेत्र पर अधिकार किया
- मेवाड़ के महाराणा कुम्भा ने डोडिया नरसिंह के नेतृत्व में सिरोही पर सैना भेजी तथा आबू,बसन्तगढ़, भूड़ तथा पूर्वी सिरोही का कुछ भाग जीत लिया। तथा अपनी विजय के उपलक्ष में वहाँ अचलगढ़ कुम्भस्वामी का मन्दिर, एक ताल व राजप्रसाद का निर्माण करवाया।
लाखा – 1451 में सिरोही का शासक बना।
- लाखा ने मेवाड़ी शासक कुम्भा की मृत्यु के बाद “पुन: आबु पर अधिकार” किया (उदा को पराजित करके)
- इसने (गुजरात के पंचमहल जिले मे) पाबागढ़ से लाकर “कालिका की मूर्ति” सिरोही में स्थापित की और स्वयं के नाम से वहाँ “लाखा तालाब” का निर्माण करवाया।
- पावागढ़ में 51 शक्ति पीठ में से एक महाकाली मन्दिर बना है। व 3 तालाब बने है।
जगमाल – लाखा का पुत्र
- इसका विवाह मेवाड़ के महाराणा रायमल की पुत्री “आनन्दी बाई ” से विवाह हुआ जिसे वह बहुत दु:ख देता था।
- रायमल के पुत्र कुँवर पृथ्वीराज सेना सहित सिरोही आया परन्तु बाद में धोखे से जहर द्वारा जगताल ने पृथ्वीराज की हत्या की। कुम्भलगढ़ में कुँवर पृथ्वीराज की 12 खम्भो की छतरी बनी है।
- महाराणा रायमल तथा दिल्ली के सुल्तान बहलोत लोदी के बीच युद्ध (1474 ई.) में जगमाल ने रायमल का साथ दिया था।
- जगमाल ने “जालौर के मजीद खाँ को पराजित” करके कर वसूल किया।
- अखैराज चौहान – इसने खानवा युद्ध में साँगा की सहयता की थी।
सुरताण देवड़ा –
- इसने अकबर के समय “दत्ताणी के युद्ध (1583 ई.)” मुगल सेना को पराजित किया। इस युद्ध में मेवाड़ का “जगमाल” मारा गया था। मुगल सेना का नेतृत्व बीकानेर के रायसिंह ने किया था।
बेरीसाल – इसके समय दुर्गादास राठौड़ ने सिरोही राज्य के कालिंद्री ग्राम में अजीत सिंह को शरण दी थी। जहाँ गौराधाय ने उन का पालन-पोषण किया था। कालिंद्री के जयदेव ब्राहृण के घर अजीत सिंह को छोड़ा गया था। (मुकुन्दराव खींची के माध्यम से)
शिवसिंह – इसने 11 सितम्बर 1823 ई. को अंग्रेजों के साथ सहायक सन्धि की थी। सहायक सन्धि करने वाला राजूपाने का अंतिम शासक था।