जालौर का चौहान वंश
- जालौर का प्राचीन नाम जाबालिपुर बिजोलिया शिलालेख में मिलता है।
- साधारणत : जाल (एक प्रकार का वृक्ष) + लौर (सीमा) जाल के वृक्षों की सीमा वाला क्षेत्र माना गया है।
- प्राचीन काल में यह प्रतिहारों व इनके बाद परमारों के अधीन था।
- जनश्रुति के अनुसार इसका एक नाम जालन्धर भी था। जय जालन्धर नाथ की तपोभूमि मानी जाती है।
- यहाँ स्थित दुर्ग के पास सिरे मन्दिर (शिव मन्दिर) है जो नाथ सम्प्रदाय का माना जाता है।
- जालौर दुर्ग सूकड़ी नदी के किनारे(दाहिने) स्थित है।
- प्रतिहार नरेश वत्सराज के समय जैन आचार्य उद्योतन सूरी ने जालौर में कुवलयमाला की रचना की थी।
- डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार प्रतिहार नेरश नागभट्ट प्रथम ने जालौर में अपनी राजधानी स्थापित की और उसने ही जालौर दुर्ग का निर्माण करवाया। G.H.ओझा ने परमारों को इसका निर्माता माना है। जो सर्वमान्य नहीं है।
- सोनगिरि पर्वत के कारण यहाँ के चौहान शासक सोनगरा चौहान कहलाए।
- हसन निजामी- “यह अजेय दुर्ग है इसके द्वार कभी किसी विजेता द्वारा नहीं खोले गए”।
प्रमुख शासक
- कीर्तिपाल चौहान- 1181 ई. में परमारों को पराजित कर जालौर पर अधिकार किया व जालौर की चौहान शाखा की स्थापना की।
- यह नाडोल की चौहान शाखा के अल्हण चौहान का पुत्र था।
- अल्हण चौहान गुजरात के चालुक्यों का सामन्त था। प्रारम्भ में यह भी चालुक्यों की सेवा में था।
- सूंधा पर्वत अभिलेख में कीर्तिपाल के लिए “राजेश्वर” शब्द का प्रयोग हुआ है।
- कीर्तिपाल ने चालुक्यों की सहायता से मेवाड़ के शासक सामन्त सिंह को पराजित किया व मेवाड़ पर अधिकार किया।
- सामन्त सिंह के भाई कुमार सिंह ने चालुक्यों से सन्धि कर कीर्तिपाल को पराजित किया व पुन: मेवाड़ पर अधिकार कर लिया।
- तत्पश्चात् जालौर पर अधिकार किया तथा यहाँ के परमारों को पराजित किया। जालौर को ही अपनी राजधानी बनाई।
- मुहणोत नैणसी ने कीर्तिपाल को “कीतू एक महान राजपूत” कहा।
समर सिंह (1182-1205)
- कीर्तिपाल का पुत्र था। इसके मसय दिल्ली पर मो.गौरी का शासन था।
- इसने किले की दृढ़ सुरक्षा का प्रबन्ध किया (सूंधा पर्वत शिलालेख स्त्रोत)
- चालुक्य शासक भीमदेव II (गुजरात) के साथ अपनी पुत्री लीलादेवी का विवाह किया।
उदयसिंह (1205-57)
- जालौर की सोनगरा चौहान शाखा का (डॉ. दशरथ शर्मा)सबसे प्रतापी शासक।
- सुंधा अभिलेख में उदयसिंह को तुर्कों का मानमर्दन करने वाला कहा गया है।
- नाडोल,मण्डौर, भीनमाल, सांचौर (जालौर) सत्यपुर पर विजय प्राप्त की।
- इल्तुत मिश ने इसके काल में जालौर पर 2 बार आक्रमण किया। प्रथम बार उसे सन्धि करके 100 ऊँट + 200 घोडे़ देकर लौटा दिया गया। दूसरी बार गुजरात के बाघेला शासक के साथ संयुक्त मोर्चा बनाया अत: इल्तुतमिश बिना लड़े लौट गया ।
- प्रधानमंत्री = यशोवीर (विद्वान भी था)
- मेवाड़ के समकालीन शासक जैत्रसिंह गुहिल ने अपने पूर्वज सामान्त सिंह की पराजय का बदला लेने हेतु जालौर पर आक्रमण किया परन्तु उदयसिंह ने अपनी पौत्री रूपा देवी (याचिग देवी की पुत्री) का विवाह जैत्रसिंह के पुत्र तेजसिंह के साथ करके मधुर सम्बन्ध स्थापित किए।
- 1254 ई. में दिल्ली के सुल्तान नासीरूद्दीन महमूद ने भी जालौर पर असफल आक्रमण किया।
- उदयसिंह के शासनकाल में जालौर अपने विस्तार और वैभव की पराकाष्ठा पर पहुँचा।
चाचिगदेव (1257-82 ई.)
- सुंधा अभिलेखानुसार इसने गुजरात के शासक वीरम को पराजित किया।
- समाकालीन दिल्ली के सुल्तान – नासीरूद्दीन महमूद, बलबन परन्तु दिल्ली पर मंगोलो के आक्रमण का भय होने से राजपूताना पर सुल्तानों का ध्यान नहीं गया।
सामन्त सिंह (1282-1296ई.)
- 1291 ई. में जब दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी का जालौर पर आक्रमण हुआ तब सामन्त सिंह ने गुजरात के बाघेला राजा सारंगदेव की सहायता से सफलता पूर्वक सामना किया। शाही सेना असफल होकर लौट गयी।
- सामन्त सिंह ने अपने पुत्र कान्हड़देव को 1296 में सत्ता सौंप दी।
कान्हड़देव चौहान (1296-1311)
- समकालीन राजनीतिक स्थिति। मुख्य रानी = देसल देवी, पुत्र = वीरमदेव
- दिल्ली = अलाउद्दीन खिलजी
- मेवाड़ (चितौड़) = खिज्र खाँ (अलाउद्दीन खिलजी का पुत्र)
- सिवाणा = शीतल देव चौहान
- मण्डौर = प्रतिहार
जानकारी के स्त्रोत-
- पद्मनाभ – “कान्हड़देव प्रबन्ध” “वीरम देव सोनगरा री बात”
- जालौर प्रशस्ती
- मकराना शिलालेख
- मुहणोत नैणसी – “नैणसी री ख्यात”
- फरिश्ता = “तारीखे फरिश्ता”
- अमीर खुसरों – "खजाईन-उल-फुतुह”
जालौर पर अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के कारणो पर विभिन्न मत -
(1) कान्हड़देव प्रबन्ध- गुजरात अभियान के समय शाही सेना को मार्ग नहीं देना तथा लौटती शाही सेना पर कान्हड़देव द्वारा आक्रमण।
(2) तारीखे फरिश्ता- अलाउद्दीन द्वारा कान्हड़देव को दिल्ली बुलाकर अपमानित करना।
(3) नैणसी री ख्यात- वीरम देव तथा फिरोजा (अलाउद्दीन की बेटी) के बीच प्रेम प्रसंग, वीरमदेव द्वारा विवाह प्रस्ताव को ठुकरा देना।
(4) अमीर खुसरो- राजनीतिक महत्वकांक्षा - (सर्वमान्य मत)
- डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार जून 1308 ई. में अलाउद्दीन सेना सहित जालौर अभियान हेतु चला। परन्तु सर्वप्रथम सिवाणा पर आक्रमण किया तथा 10 नवम्बर,1308 को सिवाणा पर विजय प्राप्त की।
- सिवाणा विजय-
- सिवाणा पर तत्कालीन शासक शीतलदेव चौहान (कान्हड़देव का भतीजा था)
- इस समय सिवाणा दुर्ग में साका हुआ जिसमें जौहर का नेतृत्व रानी मैणा दे द्वारा तथा केसरिया का नेतृत्व शीतल देव चौहान द्वारा किया गया। यह इस दुर्ग का प्रथम साका था। इस दुर्ग में दूसरा साका 1559 ई. में यहाँ के शासक कल्ला जी रायमलोत के समय हुआ तब अकबर की सेना का नेतृत्व मोटा राजा उदयसिंह ने किया था।
- अलाउद्दीन के आक्रमण के समय (सिवाणा पर ) भावले सरदार का विश्ववासघात भी सिवाणा के पतन का एक कारण बना। इसने जल कुण्ड में गो रक्त मिला दिया तथा अन्न भण्डार में गाय की अस्थियाँ डलवा दी थी।
- अलाउद्दीन ने सिवाणा का नाम बदलकर खैराबाद किया व इसका प्रशासक कमालुद्दीन गुर्ग को नियुक्त कर दिल्ली लौट गया।
- सिवाणा दुर्ग के कुमटगढ़ तथा अणखैलो शिवाणो भी कहते हैं।
जालौर विजय-
- कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में ही खिलजी ने जालौर अभियान पर सेना भेजी।
- दहिया सरदार बीका के विश्वासघात के कारण गुप्त मार्ग से शाही सेना ने किले में प्रवेश किया।
- 1311 ई. में किले पर खिलजी का अधिकार हो गया इस समय किले में साका हुआ जिसमें जौहर का नेतृत्व रानी देसल दे ने तथा केसरिया का नेतृत्व ‘कान्हड़देव’ ने किया।
- कान्हड़देव + वीरमदेव वीरगति को प्राप्त हुए।
- अलाउद्दीन ने जालौर पर प्रशासक कमालुद्दीन गुर्ग को नियुक्त किया।
- जालौर का नाम बदलकर जलालाबाद किया।
- किले में अलाई मस्जिद का निर्माण करवाया। जो मूलत: परमार शासक भोज द्वारा बनवायी गई संस्कृत पाठशाला थी।
- कान्हड़देव के भाई मालदेव सोनगरा के बाद में अलाउद्दीन की अधीनता स्वीकार की उसे चित्तौड़ का प्रशासक नियुक्त किया गया (1316-1326 ई. तक)।