राजस्थान का इतिहास

- इतिहास शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के हिस्तरी शब्द में मानी जाती है जिसका अर्थ बुनना जोड़ना होता है।

- इतिहास से तात्पर्य - घटित घटनाएँ जिनका लिखित साक्ष्य उपलब्ध हों।

- अतीत से आशय - ऐसी घटनाएँ जिनका कोई लिखित साक्ष्य उपलब्ध न हो।

- भारतीय इतिहास का जन्म सभ्यता काल से माना जाता है।

- राजस्थान इतिहास में राजपूत काल का प्रारंभ 7वीं सदी के मध्य से माना जाता है।

कर्नल जेम्स टॉड

 कर्नल जेम्स टॉड का जन्म 20 मार्च, 1782 को इंग्लैण्ड में हुआ था।

- 1798 ई. में टॉड एक सैन्य अधिकारी के रूप में भारत (पश्चिम बंगाल में) आए थे।

- 1806 ई. में टॉड सर्वप्रथम राजस्थान (माण्डलगढ़ - भीलवाड़ा) आए थे।

- 1813 ई. में टॉड को कर्नल की उपाधि दी गई।

- 1817-1818 ई. में राजपूताना में पॉलिटिकल एजेंट के रूप में कार्य किया।

- टॉड को घोड़े वाले बाबा के उपनाम से जाना जाता है।

- 1822 ई. में टॉड वापस इंग्लैण्ड रवाना हुए और 18  नवम्बर, 1835 को उनका निधन हो गया।

 राजपूताना शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1800 ई. में जॉर्ज थॉमस ने किया था।
 राजपूताना शब्द का लिखित रूप से सर्वप्रथम प्रयोग 1805 ई. में विलियम फ्रेंकलिन ने अपनी पुस्तक ‘द मिलिट्री मेमोयर्स ऑफ जॉर्ज थॉमस’ नामक पुस्तक में किया था।

 कर्नल जेम्स ने अपनी पुस्तक ‘एनाल्स एण्ड एण्टिक्विटीज ऑफ राजस्थान’ (1829 ई. में प्रकाशित) में सर्वप्रथम रायथान शब्द का प्रयोग किया था।
-  इसी पुस्तक का दूसरा भाग ‘द सेन्ट्रल एण्ड वेस्टर्न स्टेट राजपूताना ऑफ इण्डिया’ 1832 ई. में प्रकाशित हुआ, जिसमें कर्नल जेम्स टॉड ने सर्वप्रथम राजस्थान शब्द का प्रयोग किया था।

 कर्नल जेम्स टॉड द्वारा पुस्तक ‘एनाल्स एण्ड एण्टिक्विटीज ऑफ राजस्थान’ नामक पुस्तक टॉड के गुरु यतिज्ञानचन्द्र को समर्पित है एवं इस पुस्तक के संपादक टॉड के शिष्य विलियम क्रुक थे।

 T.H.   हेण्डले के अनुसार - राजस्थान की आकृति पतंगाकार विषमकोणीय चतुर्भुजाकार है।

राजस्थान के एकीकरण के समय कुल 19 रियासतें, 3 ठिकाने (नीमराणा- अलवर, लावा- टोंक व कुशलगढ़ - बाँसवाड़ा) एवं केन्द्रशासित प्रदेश अजमेर – मेरवाड़ा था।

1. मेवाड़ (उदयपुर) - राजस्थान की सबसे प्राचीन रियासत। (गुहिल राजवंश)
2. बांसवाड़ा \(\longrightarrow\)  महारावल
3. प्रतापगढ़  \(\longrightarrow\) महाराव 
4. डुंगरपुर   \(\longrightarrow\)  महारावल
 5.  करौली  \(\longrightarrow\) यादव राजवंश
6.  जैसलमेर   \(\longrightarrow\)यादव राजवंश
7.  अलवर - नरुका
8.  आमेर (जयपुर) - जनंसख्या की दृष्टि से सबसे बड़ी रियासत कच्छवाहा राजवंश
9.  भरतपुर  \(\longrightarrow\)जाट राजवंश
10.  धौलपुर  \(\longrightarrow\)जाट राजवंश
11. सिरोही - देवड़ा
12. शाहपुरा - क्षेत्रफल व जनंसख्या की दृष्टि से सबसे छोटी रियासत
13. कोटा \(\longrightarrow\) हाड़ा राजवशं 
14.  बूँदी  \(\longrightarrow\)हाड़ा राजवशं
15.  झालावाड़ - राजस्थान की नवीनतम रियासत
16. टोंक - एकमात्र मुस्लिम रियासत
17. जोधपुर  (मारवाड़)  - क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ी रियासत (राठौड़ राजवंश)
18. बीकानेर \(\longrightarrow\) राठौड़ राजवंश
19. किशनगढ़ \(\longrightarrow\)  राठौड़ राजवंश

 राजपूतों की उत्पति के संदर्भ में अग्निकुण्ड सिद्धांत चन्दबरदाई ने दिया।

- चन्दबरदाई के ग्रंथ पृथ्वीराज रासो के अनुसार वशिष्ठ मुनि ने आबू पर्वत पर यज्ञ किया और चार राजपूत जातियों की उत्पति हुई –

 1. गुर्जर प्रतिहार  
 2. परमार
 3. सोलंकी / चालुक्य
  4. चौहान / चहमान

 डी.आर. भण्डाकर के अनुसार राजपूतों की उत्पति ब्राह्मणों  गुर्जरों से हुई है।

-  इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा ने इस मत का समर्थन किया है।

 

 राजपूतों की उत्पति के संदर्भ में मिश्रित जाति के सिद्धांत का प्रतिपादन डी.पी.चटोपाध्याय ने किया था। इनके अनुसार राजपूत ना तो देशी है और ना ही विदेशी।

कर्नल जेम्स टॉड – राजपूत विदेशी है।

इस मत के समर्थ है- सूर्यमल्ल मिश्रण, नयनचन्द्र सुरी

कर्नल टॉड – शक + शिथियन की संताने राजपूत कहलायी।

विसेंट ए स्मिथ – यूची, हूणो, गुर्जरों की संताने राजपूत कहलायी।

कनिंघम अलेक्जेण्डर के अनुसार राजपूत विदेशी जाति कुषाणों की संताने हैं।

चन्दबरदाई ने अपने ग्रन्थ पृथ्वीराज रासो में अग्निकुण्ड का सिद्धांत दिया गया।

अग्निकुण्ड सिद्धांत के अनुसार – आबू पर्वत पर वशिष्ठ मुनि द्वारा यज्ञ किया गया।

अग्निकुण्ड यज्ञ से चार संताने उत्पन्न हुई-

1. प्रतिहार        2. परमार       3. चालुक्य/सोलंकी

4. चौहान

पृथ्वीराज रासो 18 भागों में विभक्त है,

8 भाग- चन्दबरदाई द्वारा रचित

6 भाग – राजाबाई द्वारा रचित

4 भाग – जल्हण द्वारा रचित

पृथ्वीराज रासो ग्रन्थ का उद्धारक कर्नल जेम्स टॉड को कहा जाता है।

मेवाड़ राज्य का इतिहास

मेवाड का प्राचीन नाम

- महाभारत काल में मेवाड़ शिवी जनपद के अन्तर्गत आता था। शिवी की राजधानी मध्यमिका (वर्तमान चित्तौड़गढ़) थी।

- मेदपाट – मेव जाति की अधिकता के कारण मेवाड़ को मेदपाट कहा गया।

- उदसर – भीलों का मुख्य क्षेत्र होने के कारण मेवाड़ का प्राचीन नाम उदसर था। 

प्रागवाट – शक्तिशाली/सम्पन्न शासकों का राज्यक्षेत्र

मेरुनाल – पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण मेवाड़ को प्राचीन काल में मेरुनाल कहा गया।

 

मेवाड़ का राज्य वाक्य- “जो दृढ़ राखै धर्म तिही राखे करतार” 

1. रावल शाखा
2. सिसोदा शाखा(सिसोदिया)

गढ़बौर माता का मन्दिर राजसमंद में स्थित है।

         ठिकाने - नीमराणा - अलवर

- लावा (वर्तमान टोंक) - जयपुर रियासत   

- कुशलगढ़ - बांसवाड़ा

देशी + विदेशी = मिश्रण à राजपूत