भारतीय संविधान का ऐतिहासिक आधार

- भारतीय संविधान कानिर्माण किसीनिश्चित समय पर न होकर क्रमागतविकास का परिणाम है, जोब्रिटिश शासन केदौरान धीमी गतिसेहुआ। ब्रिटिश शासन नेसाम्राज्यविस्तार की आकांक्षाओंसेभारत का आधुनिकीकरण किया तथापाश्चात्यशिक्षाकाप्रसार किया। परिणामस्वरूप भारत मेंराजनीतिक चेतनाजागृत हुई। इसीकारण भारतीयोंनेविकास व स्वतंत्रताहेतुब्रिटिश सरकार सेविभिन्नराजनीतिक सुधारोंकीमाँग की। इन्हींराजनीतिक सुधार कीमाँगोंमेंभारतीय संविधान केविकास के तत्वविद्यमान रहेहैं, जो इस प्रकार हैं-

भारत परिषद् अधिनियम, 1909

- इस अधिनियम के द्वारा पहली बार चुनाव का प्रावधान किया गया व इस अधिनियम में पृथक् निर्वाचन मण्डल का भी प्रावधान किया गया। जिसके अनुसार, मुसलमान केवल मुसलमानों के लिए ही मत प्रदान कर सकते थे। इसलिए लॉर्ड मिन्टो को 'सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का जन्मदाता' माना जाता है।

- इस अधिनियम द्वारा केन्द्रीय विधान परिषद् के सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 16 से 60 कर दी गई।

- केन्द्रीय विधान परिषद् में सरकारी सदस्यों का बहुमत बना रहा। परंतु राज्य विधान परिषदों में गैर-सरकारी संस्थाओं का बहुमत कायम रहा।

- विधानसभा में सदस्यों को पूरक प्रश्न पूछने व बजट की चर्चा करने की शक्तियाँ प्रदान की गईं।

- पहली बार वायसराय की कार्यकारी परिषद् में एक भारतीय 'सत्येन्द्र प्रसाद सिन्हा' की नियुक्ति हुई।

भारत शासन अधिनियम,1919

- 1919 ई. के अधिनियम को मॉण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार भी कहते हैं, क्योंकि इस अधिनियम के जन्मदाता भारत सचिव मॉण्टेग्यू और भारत में वायसराय चेम्सफोर्ड थे।

- यह अधिनियम ब्रिटिश सरकार द्वारा सुधारों का एक और तथाकथित प्रयास था। इसमेंनिम्न प्रावधान थे-

- उत्तरदायी शासन

 इस अधिनियम के आधार पर प्रांतों में आंशिक रूप में उत्तरदायी सरकार की स्थापना की गई। इसके अनुसार, प्रांतीय कार्यपालिका को दो भागों में बाँट दिया गया था|

 प्रांतीय विषयों को भी दो भागों में बाँट दिया गया था

 (i) संरक्षित विषय

 (ii) हस्तांतरित विषय

 संरक्षित विषय, कार्यकारिणी परिषद् के सदस्यों के जिम्मे था, जो गवर्नर के प्रति उत्तरदायी होते थे। हस्तांतरित विषय लोकप्रिय मंत्रियों के जिम्मे था, जो व्यवस्थापिका के निर्वाचित बहुमत से चुने जाते थे और व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरादायी होतेथे|

- विषयों का विभाजन

 इस अधिनियम के माध्यम से प्रांतों पर केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण को कम करने का प्रयास किया गया। केन्द्रीय तथा प्रांतीय सरकारों के बीच विषयों को विभाजन किया गया। अधिनियम के द्वारा केन्द्रीय और प्रांतीय सरकारों के बीच शक्तियों का विभाजन कर दिया गया।

- केन्द्र में द्वैध शासन

 1919 ई. के अधिनियम द्वारा केन्द्रीय विधान परिषद् के स्थान पर एक द्विसदनात्मक विधान मण्डल की स्थापना की गई। इन सदनों के नाम केन्द्रीय विधान सभा और राज्य परिषद् रखे गए।

- सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व

 इस अधिनियम द्वारा मुसलमानों के साथ-साथ अन्य संप्रदायों को भी विशेष प्रतिनिधित्व की सुविधा देकर भारत में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का और अधिक विस्तार कर दिया गया।

- भारतपरिषद् का पुनर्गठन

 इस अधिनियम के तहत भारत परिषद् का पुनर्गठन कर कम-से-कम 8 और अधिक से अधिक 12 सदस्य नियुक्त करने की व्यवस्था की गई, साथ ही इसमें कम से कम आधे सदस्य शेष होने आवश्यक थे, जो नियुक्ति के समय से पूर्व भारत में कम-से-कम 10 वर्ष व्यतीत कर चुके हों और जिनको भारत छोड़े 5 वर्ष से अधिक न हुए हों। इस परिषद् का कार्यकाल 7 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष कर दिया गया।

- प्रांतीय विधान परिषदों की संख्या में वृद्धि

 इस अधिनियम द्वारा प्रांतीय विधान परिषदों की सदस्य संख्या में वृद्धि की गई व बड़े प्रांतों की परिषदों में अधिकतम 140 और छोटे प्रांतों में न्यूनतम 60 सदस्य रखने की व्यवस्था की गई।

 इस अधिनियम द्वारा प्रांतों की कार्यकारिणी परिषदों में भारतीय सदस्यों की संख्या पहले से बढ़ा दी गई। मद्रास, बंबई और बंगाल की सरकारों के आरक्षित भाग के 4 सदस्यों में से 2 भारतीय सदस्य लेने की व्यवस्था की गई।

 इस अधिनियम के माध्यम से केन्द्रीय कार्यकारिणी परिषद् में अधिक भारतीयों की नियुक्ति का प्रावधान भी किया गया।

- अधिनियम के दोष

 1.केन्द्र में आंशिक रूप से उत्तरदायी सरकार की स्थापना नहीं की गई थी।

 2.सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली को समाप्त करने की बजाए उसका और विस्तार किया गया।

- महत्व

 1.प्रांतों में पहली बार उत्तरदायी शासन की स्थापना का शुभारंभ किया गया था।

 2.प्रथम बार भारत में ब्रिटिश शासन के उद्देश्य की स्पष्ट घोषणा की गई थी।

 3. मताधिकार में वृद्धि की गई।

 4.शासकीय सेवाओं के भारतीयकरण की दिशा में विशेष प्रगति हुई।

 5.भारतीयों को राजनीतिक प्रशिक्षण का अवसर प्राप्त हुआ।

 6.स्थानीय स्वशासन के क्षेत्र का विस्तार किया गया।

1935 ई. का अधिनियम (Act of 1935)

- 1930, 1931 और 1932 ई. के गोलमेज सम्मेलनों में किये गये विचार के आधार पर मार्च, 1933 में भावी सुधार योजना के संबंध में एक 'श्वेत-पत्र' (White Paper) प्रकाशित किया गया, जिसमें प्रांतों में उत्तरदायी शासन व्यवस्था और केन्द्र में आंशिक उत्तरदायी शासन की स्थापना का सुझाव दिया गया था।

- 'श्वेत-पत्र' के सुझावों को स्वीकार करते हुए ही ब्रिटिश सरकार द्वारा 1935 के 'भारतीय शासन अधिनियम' का निर्माण किया गया।अधिनियम की विशेषताएं-

- प्रस्तावना

 1935 के अधिनियम में कोई नई प्रस्तावना नहीं जोड़ी गई, क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने इस अधिनियम के लक्ष्य के संबंध में किसी नई नीति की घोषणा नहीं की थी, जिससे कि अधिनियम के उद्देश्य का ज्ञान हो सके।

- लंबा प्रलेख

 1935 का भारतीय शासन अधिनियम एक बहुत लंबा और जटिल प्रलेख था, इसमें 14 भाग, 321 धाराएँ और 10 परिशिष्ट थे।

 इसमें केन्द्रीय और प्रांतीय सरकारों के ढाँचे का विस्तृत वर्णन किया गया था।

- ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता

 1935 के अधिनियम में संशोधन सुधार या रद्द करने का अधिकार ब्रिटिश संसद के पास रखा गया।

- प्रांतीय स्वायत्तता

 1935 के अधिनियम की सबसे बड़ी विशेषता प्रांतीय स्वायत्तता की स्थापना थी। प्रांतों से द्वैध शासन के प्रावधानों को समाप्त कर दिया गया। अब प्रांतों को एक नया संवैधानिक दर्जा दे दिया गया, उनको अपने आंतरिक मामलों में पूर्ण स्वायत्तता प्रदान कर दी गई।

- केन्द्र में द्वैध शासन की स्थापना

 1935 के अधिनियम द्वारा प्रांतों में द्वैध शासन प्राणाली को समाप्त कर दिया गया, किंतु अब उसे केन्द्र में लागू कर दिया गया। केन्द्रीय विषयों को दो भागों में बाँटा गया-रक्षित विषय और हस्तांतरित विषय।

- संघीय शासन व्यवस्था

 1935के अधिनियम के अनुसार यह निर्णय किया गया, कि केन्द्र में ब्रिटिश प्रांतों और देशी रियासतों को मिलाकर एकसंघ स्थापित किया जाएगा। किंतु देशी रियासतों द्वारा संघ में सम्मिलित न होने के कारण प्रस्तावित संघ की स्थापना न हो सकी।

- विषयों का बँटवारा

 1935 के अधिनियम द्वारा विषयों को तीन सूचियों में बाँटा गया-संघीय सूची, प्रांतीय सूची और समवर्ती सूची।

- संघीय न्यायालय

 इस अधिनियम द्वारा भारत में एक संघीय न्यायालय की स्थापना भी की गई, जिसका प्रमुख कार्य संघ सरकार और इकाइयों के मध्य उत्पन्न होने वाले विवादों का निपटारा करना था।

- संरक्षण और आरक्षण

 प्रांतीय क्षेत्र में स्वराज व केन्द्र में अधिकांश उत्तरदायी शासन दोनों पर ही अनेक सीमाएँ एवं प्रतिबंध लगाये गए थे। अधिनियम में विशेष हितों और अल्पमतों की रक्षा के लिए अनेक संरक्षणों तथा आरक्षणों की व्यवस्था की गई थी।

- विधानमण्डलों और मताधिकार का विस्तार

 1935 ई. के अधिनियम द्वारा प्रांतीय और केन्द्रीय विधान मण्डलों की सदस्य संख्या में भी काफी वृद्धि की गई। केन्द्र में विधान सभा के सदस्यों की संख्या 275 और राज्य सभा के सदस्यों की संख्या 260 निर्धारित की गई।

 प्रांतीय विधान मण्डलों का आकार भी लगभग दुगुना कर दिया गया और 6 प्रांतों में विधान मण्डलों को दो सदनों वाला बनाया गया एवं मताधिकार का भी विस्तार किया गया।

 प्रांतों के लिए 10 प्रतिशत जनता को वोट देने का अधिकार दिया गया। सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति को कायम रखा गया, इनमें हरिजनों के लिए भी सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति का प्रावधान किया गया।

- भारतीय परिषद् की समाप्ति

 1935 ई. के अधिनियम द्वारा भारतीय परिषद् को समाप्त कर दिया गया।

- अधिनियम की आलोचना

 1935 ई. के अधिनियम को 1 अप्रैल, 1937 को लागू कर दिया गया। किंतु इस अधिनियम के संघीय सरकार से संबंधित प्रावधानों को लागू नहीं किया गया और केवल प्रांतों से संबंधित प्रावधानों को ही लागू किया गया।

 इस अधिनियम के अनेक दोष थे और भारत के लगभग सभी राजनीतिक दलों ने इस अधिनियम की कटु आलोचना की थी। मोहम्मद अली जिन्ना ने इसको पूर्ण रूप से रद्दी, बुनियादी रूप से बुरा और स्वीकार करने के पूर्णतया अयोग्य बताया। पण्डित मदन मोहन मालवीय ने कहा, कि यह एक्ट ऊपर से लोकतंत्रीय है, परंतु अंदर से खोखला है। पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने इस अधिनियम की आलोचना करते हुए कहा, कि 1935का अधिनियम दासता का एक नया अधिकार-पत्र (चॉर्टर) था।