भारतीय संविधान का निर्माण
- भारत का संविधान,भारत का सर्वोच्च विधान है जो संविधान सभा द्वारा लिखित है।भारत का संविधान विश्व के किसी भी गणतांत्रिक देश का सबसे लंबा लिखित संविधान है जो भारत मे शासन व्यवस्था के बारेमेंउल्लेखितहै।
- भारतीय संविधान के निर्माणको निम्न बिन्दुओं के अन्तर्गत समझा जा सकता है।
संविधान सभा का गठन
- भारत में संविधान सभा की मांग एक प्रकार से राष्ट्रीयस्वतन्त्रता की मांग थीजो अंग्रेजों केशासन के समय से ही उठ रही थी।संविधान सभा के सिद्धान्त के सर्वप्रथम दर्शन 1895 के स्वराज विधेयक' में होते हैं जिसे तिलक ने तैयार किया था। गांधी ने 1924 में संविधान सभा की मांग स्पष्ट रूप से रखी थी।
- अंग्रेजों ने भारतीयों की मांग 'अगस्त प्रस्ताव में स्वीकार की, लेकिन संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन की संस्तुति पर हुआ था।
- कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार जुलाई में संविधान सभा के चुनाव हुए। संविधान सभा के लिए 389सदस्यों से प्रान्तों के लिए निर्धारित 296 सदस्यों के लिए ही ये चुनाव हुए। इसमें 10 लाख लोगों पर एक प्रतिनिधि चुना गया।
- 296 सदस्यों में से 208 कांग्रेस से, 73 मुस्लिम लीग से तथा 15 अन्य दलों के व अन्य स्वतन्त्र उम्मीदवार निर्वाचित हुए।
- संविधान सभा के गठन के चरण-
प्रथमचरण-सर्वप्रथम कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार संविधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन हुआ एवं कुल 389 सदस्यों की संख्या निश्चित की गई।
द्वितीय चरण- माउण्टबेटन योजना (3 जून, 1947) के अनुसार संविधान सभा का पुनर्गठन किया गया, जिसके अनुसार 324 प्रतिनिधि थे।
तृतीय चरण- देशी रियासतों से सम्बन्धित और उनके प्रतिनिधि संविधान सभा में अलग-अलग समय पर सम्मिलित हुए। हैदराबाद ही एक ऐसी रियासत थी, जिसके प्रतिनिधि सम्मिलित नहीं हुए।
संविधान सभा का कार्यकाल
- संविधान सभा का प्रथम अधिवेशन 9 दिसम्बर, 1946 को संसद भवन के केन्द्रीय कक्ष में प्रारम्भ हुआ। डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा को सर्व सम्मति से इसअधिवेशन काअस्थायी अध्यक्ष चुना गया। संविधान सभा की प्रथम बैठक में 210 सदस्य उपस्थित थे।
- 11 दिसम्बर, 1946 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थायी अध्यक्ष चुना गया व बी.एन.राव को संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार के पद पर नियुक्त किया गया। 13 दिसम्बर, 1946 को पं. जवाहर लाल नेहरू ने उद्देश्य प्रस्ताव संविधान सभा में प्रस्तुत किया। यह प्रस्ताव 22 जनवरी, 1947 को पारित किया गया।
संविधान सभा की समितियां
- संविधान सभा ने संविधान के निर्माण से संबंधित विभिन्न कार्यों को करने के लिए कई समितियों का गठन किया। इनमें से 8 बड़ी समितियां थीं तथा अन्य छोटी।
- इन समितियों तथा इनके अध्यक्षों के नाम इस प्रकार है-
बड़ी समितियां -
1. संघ शक्ति समिति - जवाहरलाल नेहरू।
2. संघीय संविधान समिति - जवाहरलाल नेहरू।
3. प्रांतीय संविधान समिति - सरदार पटेल ।
4. प्रारूप समिति - डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ।
5. मौलिक अधिकारों एवं अल्पसंख्यकों संबंधी परामर्श समिति - सरदार पटेल।
note- इस समिति की दो उप समितियां थी
a.मौलिक अधिकार उप समिति - जे.बी. कृपलानी।
b.अल्पसंख्यक उप समिति – एच.सी. मुखर्जी।
6. प्रक्रिया नियम समिति - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
7. राज्यों के लिये समिति (राज्यों से समझौता करने वाली) - जवाहर लाल नेहरू।
छोटी समितियां -
1. संविधान सभा के कार्यों संबंधी समिति - जी.वी मावलंकर।
2. कार्य संचालन समिति - डॉ. के.एम. मुंशी।
3. सदन समिति - बी. पट्टाभिसीतारमैय्या।
4. राष्ट्र ध्वज संबंधी तदर्थ समिति - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ।
5. प्रारूप संविधान का परीक्षण करने वाली समिति – अल्लादी कृष्ण स्वायी अय्यर।
6. क्रीडेंस्यिल समिति - सर अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर।
7. वित्त एवं स्टाफ समिति - ए.एन. सिन्हा।
प्रारूप समिति -
- संविधान सभा की सभी समितियों में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण समिति प्रारूप समिति थी।
- इससमिति का गठन 29 अगस्त, 1947 को हुआ था। इस समिति को नए संविधान का प्रारूप तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
- इससमिति में सात सदस्य थे-
1. डॉ. बी.आर. अंबेडकर (अध्यक्ष)
2. एन. गोपालस्वामी आयंगर।
3. अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर।
4. डॉक्टर के.एम. मुंशी।
5. सैयद मोहम्मद सादुल्ला।
6. एन. माधव राव।
7. टी.टी. कृष्णामाचारी।
- विभिन्न समितियों के प्रस्तावों पर विचार करने के बाद प्रारूप समिति ने भारत के संविधान का पहला प्रारूप तैयार किया जिसे फरवरी 1948 में प्रकाशित किया गया था।
- भारत के लोगों को इस प्रारूप पर चर्चा करने और संशोधनों का प्रस्ताव देने के लिए 8 माह का समय दिया गया। लोगों की शिकायतों, आलोचनाओं और सुझावों के परिप्रेक्ष्य में प्रारूप समिति ने दूसरा प्रारूप तैयार किया, जिसे अक्टूबर, 1948 में प्रकाशित किया गया। प्रारूप समिति ने अपना प्रारूप तैयार करने मे छह माह से भी कम का समय लिया। इसदौरान उसकी कुल 141 बैठकें हुई।
संविधान का प्रभाव में आना
- डॉ बी.आर. अंबेडकर ने सभा में 4 नवंबर, 1948 को संविधान का अंतिम प्रारूप पेश किया। इस बार संविधान पहली बार पढ़ा गया जिस पर पांच दिन तक आम चर्चा हुई।
- संविधान पर दूसरी बार 15 नवंबर, 1948 से विचार होना शुरु हुआ। इसमें संविधान पर खंडवार विचार किया गया।यह कार्य 17 अक्टूबर, 1949 तक चला। इस अवधि में कम से कम 7653 संशोधन प्रस्ताव आये थे।
- संविधान पर तीसरी बार 14 नवंबर, 1949 से विचार होना शुरु हुआ। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने 'द कॉन्स्टीट्यूशन ऐज सैटल्ड बाई द असेंबली बी पास्ड’ प्रस्ताव पेश किया। संविधान के प्रारूप पर पेश इस प्रस्ताव को 26 नवंबर, 1949 को पारित घोषित कर दिया गया और इस पर अध्यक्ष व सदस्यों के हस्ताक्षर लिए गए। सभा में कुल 299 सदस्यों में से उस दिन केवल 284 सदस्य उपस्थित थे, जिन्होंने संविधान पर हस्ताक्षर किए। संविधान की प्रस्तावना में 26नवंबर, 1949 का उल्लेख उस दिन के रूप में किया गया है जिस दिन भारत के लोगों ने सभा में संविधान को अपनाया, लागू किया व स्वयं को संविधान सौंपा।
- 26 नवंबर, 1949 को अपनाए गए संविधान में प्रस्तावना, 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थीं। प्रस्तावना को पूरे संविधान को लागू करने के बाद लागू किया गया।
- नए विधि मंत्री डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने सभा में संविधान के प्रारूप को रखा। उन्होंने सभा के कार्य-कलापों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्हें भारत के संविधान के पिता के रूप में पहचाना जाता है। इस महान लेखक, संविधान विशेषज्ञ, अनुसूचित जातियों के निर्विवाद नेता और भारत के संविधान के प्रमुख शिल्पकार को आधुनिक मनु की संज्ञा भी दी जाती है।
संविधान का प्रवर्तन
- 26 नवंबर, 1949 को नागरिकता, चुनाव, तदर्थ संसद, अस्थायी व परिवर्तनशील नियम तथा छोटे शीर्षकों से जुड़े कुछ प्रावधान अनुच्छेद 5, 6, 7, 8, 9, 60, 334, 366, 367, 379,380, 388, 391, 392 और 393 स्वतःही लागू हो गए।
- संविधान के शेष प्रावधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुए। इस दिन को संविधान की शुरुआत के दिन के रूप में देखा जाता है और इसे गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है।
- इस दिन को संविधान की शुरुआत के रूप में इसलिए चुना गया क्योंकि इसका अपना ऐतिहासिक महत्व है। इसी दिन 1930 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन (दिसंबर 1929) में पारित हुए संकल्प के आधार पर पूर्ण स्वराज दिवस मनाया गया था।
भारतीय संविधान के स्रोत
- संविधान सभाने संविधान को बनाने की प्रक्रिया प्रारम्भ की तो संविधान निर्माताओं ने सोचा कि जिन देशों में संविधान पहले से लिखे जा चुके हैं, क्यों न उन संविधानों के उपबंधों का प्रयोग भारतीय संविधान के लिए किया जाए?
- संविधान निर्माताओं ने अमेरिका, ब्रिटेन और कई अन्य देशों के संविधानों का गहन अध्ययन करना शुरू किया व भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल जो भी प्रावधान उन्हें उपयुक्त लगे, उन्हें भारतीय संविधान में शामिल कर लिया।
- भारतीय संविधान पर सबसे अधिक प्रभाव भारत शासन अधिनियम-1935 का है क्योंकि इसी अधिनियम से भारतीय संविधान के लगभग 200 प्रावधान लिए गए हैं।
- भारत शासन अधिनियम, 1935 -
संघीय तंत्र, राज्यपाल का कार्यकाल, न्यायपालिका, लोक सेवा आयोग, आपतकालीन उपबंध व प्रशासनिक विवरण।
- ब्रिटेन का संविधान –
संसदीय शासन, विधि का शासन, विधायी प्रक्रिया, एकल नागरिकता, मंत्रिमण्डल प्रणाली,परमाधिकार लेख, संसदीय विशेषधिकार और द्विसदनवाद।
- संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान –
मूल अधिकार, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक पुनरावलोकन का सिद्धान्त, उप-राष्ट्रपति का पद, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का पद से हटाया जाना और राष्ट्रपति पर महाभियोग।
- आयरलैंड का संविधान –
राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्त, राष्ट्रपति की निर्वाचन पद्धति और राज्य सभा के लिए सदस्यों का नामांकन।
- कनाडा का संविधान –
सशक्त केन्द्र के साथ संघीय व्यवस्था, अवशिष्ट शक्तियों का केन्द्र में निहित होना, केन्द्र द्वारा राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति और उच्चतम न्यायालय का परामर्शी न्याय निर्णयन।
- ऑस्ट्रेलिया का संविधान –
समवर्ती सूची, व्यापार, वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता और संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक।
- जर्मनी का वाइमर संविधान –
आपातकाल के समय मूल अधिकारों का स्थान।
- सोवियत संघ का संविधान –
मूल कर्तव्य और प्रस्तावना में न्याय का आदर्श।
- फ्रांस का संविधान –
गणतंत्रात्मक और प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समता और बंधुता के आदर्श।
- दक्षिणी अफ्रीका का संविधान -
संविधान में संशोधन की प्रक्रिया और राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन।
- जापान का संविधान –
विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया।
निष्कर्ष : उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भारतीय संविधान पर अनेक आन्तरिक व बाहा तत्वों का प्रभाव पड़ा है तथापि भारतीय संविधान भारतीय आदर्शों व परिस्थितियों का परिणाम है, जो भारत में लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली स्थापित करने में सफल रहा है जहाँ पड़ोसी देशों में अनेक बार तख्ताप्लट व सैनिक शासन स्थापित हुआ है, वहीं भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति से लेकर आज तक लोकतन्त्र बना हुआ है, यह भारतीय संविधान की मौलिकता व सफलता का प्रतीक है।