निर्मित व लिखित संविधान-

- हमारा संविधान लम्बे विकास की देन नहीं है, जैसा हम ब्रिटिश संविधान के बारे में देखते हैं।

- भारत के संविधान को संविधान सभा ने बनाया है, अत: यह एक लिखित व निर्मित संविधान है|

- इसमें लगभग तीन वर्ष का समय लगा। इसके अतिरिक्त यह विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है । प्रस्तावना के बाद इसमें 395 अनुच्छेद हैं, जो 22 भागों में समाहित हैं। अन्त में अनुसूचियां हैं, जिनकी संख्या पहले आठ थी किन्तु अब बारह है ।

 

अनुसूचियाँ-

- प्रथम अनुसूची-

 राज्यों के नाम एवं उनके न्यायिक क्षेत्र, संघ राज्य क्षेत्रों के नाम और उनकी सीमाएं।

 

- दूसरी अनुसूची-

 भारत के राष्ट्रपति, राज्यों के राज्यपाल, लोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, राजयसभा के सभापति और उप-सभापति, राज्य विधानसभाओं के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष राज्य विधान परिषदों के सभापति और उप सभापति, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक आदि) को प्राप्त होने वाले वेतन, भत्ते और पेंशन का उल्लेख किया गया है|

 

- तीसरी अनुसूची-

 इसमें विभिन्न उम्मीदवारों द्वारा ली जाने वाली शपथ या प्रतिज्ञान के प्रारूप दिये गए है। संघ के मंत्री, संसद के लिए निर्वाचन हेत् अभ्यर्थी, संसद के सदस्य, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, राज्य मंत्री, राज्य विधानमण्डल के लिए निर्वाचन के लिए अभ्यथी, राज्य विधानमण्डल के सदस्य, उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश आदि के बारे में उल्लेखित है।

 

 - चौथी अनुसूची-

 राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों के लिए राज्यसभा में सीटों का आवंटन।

 

- पाँचवी अनुसूची-

 अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन तथा नियंत्रण के बारे में उपबंध।

 

- छठी अनुसूची-

 असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में उपबंध।

 

- सातवी अनुसूची-

 संघ सूची , राज्य सूची तथा समवर्ती सूची के संदर्भ में राज्य और केन्द्र के मध्य शक्तियों का विभाजन।

 

- आठवी अनुसूची-

 संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त भाषाएं (मूल रूप से 14 मगर फिलहाल 22) ये भाषाएं है- असमिया, बांग्ला, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिन्दी,कन्नड, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगू तथा उर्दू।

- सिंधी भाषा को 1967 के 21वें संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था।

- कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली को 1992 के 71वें संशोधन अधिनियम द्वारा और बोड़ो, डोगरी, मैथिली और संथाली को 2003 के 92वें संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था।

 

- नवीं अनुसूची

 भू-सुधारों और जमींदारी प्रणाली के उन्मूलन से संबंधित राज्य विधानमण्डलों और अन्य मामलों से संबंधित संसद के अधिनियम और विनियम (मूलतः 13 परन्तु वर्तमान में 282)।

- इस अनुसूची को पहले संशोधन (1951) द्वारा मूल अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक समीक्षा से इसमें सम्मिलित कानूनों से इसे बचाने के लिए जोड़ा गया था। तथापि वर्ष 2007 में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि इस अनुसूची में 24 अप्रैल, 1975 के बाद सम्मिलित कानूनों की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।

 

- दसवीं अनुसूची-

 दल-बदल के आधार पर संसद और विधानसभा के सदस्यों की निरर्हता के बारे में उपबंध, इस अनुसूची को 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया। इसे दल-परिवर्तन रोधी कानून भी कहा जाता है।

 

- ग्यारहवीं अनुसूची-

 पंचायत की शक्तियों, प्राधिकारों व जिम्मेदारियों। इसमें 29 विषय हैं।

- इस अनुसूची को 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा जोड़ा गया।

 

- बारहवीं अनुसूची-

 नगरपालिकाओं की शक्तियां, प्राधिकार व जिम्मेदारियाँ। इसमें 18 विषय है।

- इस अनुसूची को 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा जोड़ा गया।

 

संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न राज्य

- संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न का अर्थ यह है, कि आंतरिक या बाहरी दृष्टि से भारत पर किसी विदेशी सत्ता का अधिकार नहीं है।

- भारत, अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में अपनी इच्छानुसार आचरण कर सकता है और वह किसी भी अंतर्राष्ट्रीय समझौते या संधि को मानने के लिए बाध्य नहीं है।

 

लोकतंत्रात्मक राज्य

भारत, एक लोकतंत्रात्मक राज्य है, अर्थात् भारत में राजसत्ता जनता में निहित है।

जनता को अपने प्रतिनिधि निर्वाचित करने का अधिकार होगा, जो जनता का स्वामी न होकर, सेवक होंगे।

 

गणराज्य

- गणतंत्रात्मक व्यवस्था से अर्थ है, कि देश के सभी पद नागरिकों के लिए खुले होते हैं अर्थात् देश का सर्वोच्च पद भी सामान्य नागरिक प्राप्त कर सकता है। अतः भारत एक लोकतंत्रात्मक राज्य होने के साथ-साथ एक गणराज्य है।

- भारतीय राज्य का गणतंत्रात्मक स्वरूप इससे स्पष्ट हो जाता है, कि भारत राज्य का सर्वोच्च अधिकारी वंशक्रमानुगत राजा न होकर भारतीय जनता द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित राष्ट्रपति है। भारत अपने गणतंत्रात्मक स्वरूप के साथ राष्ट्रमंडल जैसे संगठन में सम्मिलित हुआ।

- राष्ट्रमण्डल की सदस्यता के अनेक कारण थे। अनेक व्यक्तियों का मत है, कि क्योंकि राष्ट्रमण्डल के सदस्य राज्यों द्वारा ब्रिटिश सम्राट को अपने प्रधान के रूप में स्वीकार किया जाना है। परंतु राष्ट्रमण्डल एक लचीला संगठन है और जिस समय भारत को राष्ट्रमण्डल की सदस्यता प्रदान की गई, उसी समय राष्ट्रमण्डलीय सम्मेलन में यह स्वीकार किया गया था, कि राष्ट्रमण्डल में भारत की स्थिति वैधानिक रूप में अन्य उपनिवेशों की अपेक्षा कुछ अलग है।

 

पंथनिरपेक्ष राज्य

- पंथनिरपेक्ष राज्य का तात्पर्य यह है, कि राज्य की दृष्टि से सभी धर्म समान हैं और राज्य के द्वारा विभिन्न धर्मावलंबियों में कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। पश्चिम की उदारवादी प्रजातांत्रिक परंपरा के अनुसार, पंथनिरपेक्ष राज्य धर्म के विरुद्ध नहीं है, वरन् वह धार्मिक मामलों में तटस्थ है। 42वें संविधान संशोधन द्वारा प्रस्तावना में अब भारत को स्पष्ट रूप से 'पंथनिरपेक्ष राज्य' घोषित किया गया है।

- मूल संविधान में कहीं पर भी भारत को स्पष्टतया पंथनिरपेक्ष राज्य घोषित नहीं किया गया है, फिर भी ऐसी व्यवस्थाएं हैं, जिनके कारण पंथनिरपेक्ष राज्य का रूप स्पष्ट हो जाता है। प्रस्तावना में सभी नागरिकों को धर्म, विश्वास और पूजा की स्वतंत्रता दी गई है। मौलिक अधिकारों के अंतर्गत् यह कहा गया है, कि राज्य धर्म, जाति, लिंग या इनमें से किसी के आधार पर अपने नागरिकों में कोई भेदभाव नहीं करेगा। संविधान में उपबंधित किया है, कि "सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के नियमों के अधीन रहते हुए सभी नागरिकों को अंत:करण की तथा धर्म के अबाध मानने, आचरण तथा प्रचार करने की पूर्ण स्वतंत्रता होगी। संविधान ने धार्मिक अल्पमतों को आश्वासन दिया है, कि वे अपनी भाषा की रक्षा कर सकेंगे और उन्हें अपनी इच्छा की शिक्षण संस्थाएं संचालित करने का अधिकार होगा।

 

कठोरता और लचीलेपन का समन्वय

- संशोधन प्रणाली के आधार पर संविधान दो प्रकार के होते हैं कठोर संविधान तथा लचीला संविधान।

- लचीला संविधान उस प्रावधान को कहते हैं, जिसमें साधारण कानून और संवैधानिक कानून में कोई अंतर नहीं किया जाता और संविधान में विधि निर्माण की साधारण प्रक्रिया के आधार पर संशोधन किया जा सकता है।

- इसके विपरीत, कठोर संविधान में संवैधानिक संशोधन के लिए साधारण कानून निर्माण से भिन्न तथा जटिल प्रक्रिया को अपनाया जाता है।

- भारत ने इन दोनों के बीच का रास्ता अपनाया। भारतीय संविधान न तो अत्यधिक कठोर है और न ही अत्यधिक लचीला। भारतीय संविधान में कुछ ऐसे प्रावधान हैं, जिन्हें आसानी से परिवर्तित नहीं किया जा सकता। इनमें संशोधन के लिए संसद के समस्त सदस्यों के बहुमत और उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत के अतिरिक्त कम-से-कम आधे राज्यों के विधान मण्डलों का अनुसमर्थन भी आवश्यक है। जैसे राष्ट्रपति के निर्वाचन की पद्धति, संघ और इकाईयों के बीच शक्ति विभाजन, राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व आदि।

- कुछ विषयों में तो संसद के साधारण बहुमत से ही संविधान में संशोधन हो जाता है। उदाहरणस्वरूप, नवीन राज्यों के निर्माण, वर्तमान राज्यों के पुनर्गठन और भारतीय नागरिकता संबंधी प्रावधानों में परिवर्तन आदि कार्य संसद साधारण संविधान या बहुमत से कर सकती है। इस प्रकार भारतीय संविधान न तो ब्रिटिश की भाँति लचीला है और न ही अमेरिकी संविधान की भाँति अत्यधिक कठोर।

- इस संबंध में भारतीय संविधान में मध्यम मार्ग को अपनाया गया है। यदि संविधान में सभी कुछ स्थायी और कठोर बना दिया जाए, तो राष्ट्र का विकास रुक जाएगा, क्योंकि राष्ट्र जीवित विकासशील प्राणियों का समूह है। किसी भी स्थिति में हम अपने संविधान को इतना कठोर नहीं बनाना चाहते, कि वह बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तित न हो सके।

 

संसदात्मक शासन व्यवस्था

- संसदीय प्रणाली, ऐसी शासन व्यवस्था है, जिसमें मंत्रियों के समूह द्वारा सरकार चलायी जाती है। सरकार एक संसद के प्रति जबावदेह होती है। जब तक संसद में बहुमत है, तब तक सरकार चलती है।

- संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका, विधायिका के प्रति उत्तरदायी रहती है तथा इसका विश्वास खो देने पर कायम नहीं रह सकती। भारतीय संविधान संसदात्मक शासन प्रणाली की स्थापना करता है, क्योंकि राष्ट्रपति संवैधानिक अध्यक्ष और वास्तविक शक्तियाँ मंत्रिमण्डल में निहित हैं, जो संसद के प्रति उत्तरदायी है। भारत के लोगों को 1919 और 1935 के भारतीय शासन अधिनियमों के अंतर्गत् संसदीय शासन का अनुभव था।

 

संसदीय प्रभुता तथा न्यायिक सर्वोच्चता में समन्वय

- भारतीय संविधान की एक विशेषता यह है, कि संविधान में संसदीय प्रभुसत्ता न्यायिक सर्वोच्चता के मध्यम मार्ग का अनुसरण किया गया है। संसदीय व्यवस्था में व्यवस्थापिका सर्वोच्च है और संसद द्वारा निर्मित कानून को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

- इसके विपरीत, न्यायिक सर्वोच्चता है, जिसका अर्थ है, कि न्यायालय संविधान का रक्षक और अभिभावक है और न्यायालय संघीय व्यवस्थापिका अर्थात् संसद द्वारा निर्मित कानून या कार्यपालिका के आदेशों का परीक्षण कर यह निश्चित करता है, कि कोई विधि या आदेश संविधान के उपबंधों के विरुद्ध तो नहीं है। संविधान का उल्लंघन करने वाली विधियों या आदेशों को उसके द्वारा अवैध घोषित कर दिया जाता है। न्यायालय की इस शक्ति को 'न्यायिक पुनराविलोकन का अधिकार' (Power of Judicial Review) कहते हैं।

- भारत में संसदात्मक व्यवस्था को अपनाकर संसदीय सर्वोच्चता को स्वीकार किया गया है, लेकिन इसके साथ ही संघात्मक व्यवस्था के आदर्श के अनुरूप न्यायालय को संविधान की व्याख्या करने तथा उन विधियों और आदेशों को अवैध घोषित करने का अधिकार दिया गया है, जो संविधान के विरुद्ध हों। इस प्रकार भारतीय संविधान द्वारा न तो ब्रिटिश के समान संसदीय प्रभुता को स्वीकार किया गया है और न ही अमेरिका की भाँति न्यायपालिका की सर्वोच्चता को वरन् उपर्युक्त दोनों पद्धतियों के बीच की प्रणाली को अपनाया गया है।

 

वयस्क मताधिकार

- भारतीय संविधान सभी लोगों को समान आधार पर मताधिकार प्रदान करता है। धर्म, जाति, धन के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता है। जबकि ब्रिटिश शासनकाल में 1909 के एक्ट द्वारा सांप्रदायिक प्रतिनिधत्व की पद्धति को लागू किया गया था, जिसने भारत के विभिन्न संप्रदायों को एक-दूसरे का विरोधी बना दिया। अतः नवीन संविधान के अंतर्गत् सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का अंत कर वयस्क मताधिकार के आधार पर संयुक्त प्रतिनिधित्व की पद्धति को अपनाया गया है। करोड़ों व्यक्तियों को एक साथ मताधिकार प्रदान करना संविधान सभा का निश्चित रूप से एक साहसिक कार्य था।

 

संघीय शासन

- संघीय शासन का तात्पर्य, संविधान द्वारा विभिन्न घटकों के मध्य शक्तियों के विभाजन से है। सामान्यतः संघीय शासन में एक संविधान के द्वारा केन्द्र व राज्य के मध्य शक्तियाँ विभाजित कर दी जाती हैं तथा एक संघीय न्यायालय की स्थापना कर दी जाती है, जो केन्द्र तथा राज्यों के मध्य विवादों का निपटारा करता है। भारत एक बहुभाषायी, बहुसांस्कृतिक एवं बहुजातीय सभ्यता वाला देश है। संविधान निर्माताओं ने एक ऐसी संघीय व्यवस्था की स्थापना की, जिसका झुकाव एक शक्तिशाली केन्द्र की तरफ था। संविधान की प्रथम धारा घोषित करती है, कि भारत 'राज्यों का संघ' (Union of states) है। 'राज्यों के संघ' शब्द के महत्व की व्याख्या करते हुए बी. आर. अम्बेडकर ने कहा, कि इसके अंतर्गत् दो चीजें अंतर्निहित हैं: प्रथम, 'भारतीय संघ इकाईयों के मध्य एक समझौते का परिणाम नहीं है।', द्वितीय, 'किसी भी इकाई को संघ से अलग होने की स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है।'

 

मौलिक अधिकार और मूल कर्तव्य

- मौलिक अधिकारों का आशय, नागरिकों को प्रदत्त ऐसे अधिकार और स्वतंत्रताओं से है, जिन्हें राज्य तथा केन्द्र सरकार के विरुद्ध भी लागू किया जा सकता है। संविधान द्वारा नागरिकों को इस प्रकार के सात (7) मौलिक अधिकार प्रदान किए गए थे, लेकिन अब संपत्ति का अधिकार एक मौलिक अधिकार नहीं रहा और अब नागरिकों को छः (6) मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के संबंध में विशेष बात यह है, कि संविधानों द्वारा अधिकार प्रदान किए जाने के साथ-साथ यह भी स्पष्ट कर दिया गया है, कि इन अधिकारों पर किन परिस्थितियों में और किस प्रकार के प्रतिबंध लगाए जा सकेंगे। इसके अतिरिक्त, भारतीय संविधान में संवैधानिक उपचारों के अधिकार के रूप में अधिकारों की क्रियान्वित के लिए पृथक से वैधानिक व्यवस्था की गई है।

 

राज्य-नीति के निदेशक तत्व

- राज्य-नीति के निदेशक तत्व को नीति निश्चित करने वाले तत्व कहा गया है। राज्य इन तत्वों को कानून निर्माण तथा नीति निर्माण में उपयोग करेगा। जहाँ संविधान मौन है, वहाँ निदेशक तत्व दिशा प्रदान करेंगे। भारतीय संविधान के चौथे अध्याय में शासन संचालन के लिए मूलभूत सिद्धांतों का वर्णन किया गया है। भारतीय संविधान में नीति निदेशक तत्व का विचार आयरलैण्ड के संविधान से लिया गया है और इस तत्व की प्रकृति के संबंध में संविधान के 37वें अनुच्छेद में कहा गया है, कि "नीति निदेशक तत्वों को किसी न्यायालय द्वारा बाध्यता न दी जा सकेगी, न तो ये तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं।" इस प्रकार निदेशक तत्वों को वैधानिक शक्तियाँ तो प्राप्त नहीं हैं, लेकिन इन्हें राजनीतिक शक्ति अवश्य प्राप्त है।

 

स्वतंत्र न्यायपालिका और अन्य स्वतंत्र अभिकरण

- संघात्मक शासन व्यवस्था में न्यायपालिका का संविधान की व्याख्याता और रक्षक होने के कारण स्वतंत्र होना आवश्यक है।

- इसके अतिरिक्त, संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किए गए मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए भी न्यायपालिका की स्वतंत्रता नितांत आवश्यक हो जाती है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता हेतु संविधान में अनेक विशेष व्यवस्थाएँ की गई हैं यथा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होना, न्यायाधीशों को पद की सुरक्षा प्राप्त होना, न्यायाधीशों के कार्यकाल के दौरान उनके वेतन में कमी न हो सकना और न्यायाधीशों के आचरण पर व्यवस्थापिका द्वारा विचार न कर सकना आदि।

 

एकल नागरिकता

- भारतीय संविधान के द्वारा संघात्मक शासन की व्यवस्था की गई है और सामान्यतया ऐसा समझा जाता रहा है, कि संघ राज्य के नागरिकों को दोहरी नागरिकता प्राप्त होनी चाहिए प्रथम, संघ की नागरिकता और द्वितीय, इकाई या राज्य की नागरिकता। भारतीय संविधान के निर्माताओं का विचार था, कि दोहरी नागरिकता भारत की एकता को बनाए रखने में बाधक सिद्ध हो सकती है। अतः संविधान निर्माताओं द्वारा संघ राज्य की स्थापना करते हुए भी दोहरी नागरिकता को नहीं वरन, एकल नागरिकता के आदर्श को ही अपनाया गया है।

 

सामाजिक समानता की स्थापना

सामान्यतया संविधानों के द्वारा अपने नागरिकों की राजनीतिक और कानूनी समानता पर ही बल दिया जाता है, सामाजिक समानता पर नहीं, लेकिन भारतीय संविधान की विशेषताएँ यह हैं, कि संविधान के द्वारा सामाजिक क्षेत्र में भी सभी नागरिकों की समानता के सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया है। कल्याणकारी राज्य की स्थापना का आदर्श संविधान के नीति निदेशक तत्वों के अध्ययन से यह नितांत स्पष्ट हो जाता है, कि संविधान निर्माताओं द्वारा भारत केलिए आदर्श निश्चित किया गया है और वह आदर्श है कल्याणकारी राज्य की स्थापना। भारतीय संविधान निर्माता स्पष्ट रूप से यह चाहते थे, कि भारत की केन्द्रीय और राज्य सरकारें भारतीय नागरिकों को पौष्टिक भोजन, वस्त्र, निवास, शिक्षा और स्वास्थ्य की अधिकाधिक सुविधाएँ प्रदान करें तथा उनके जीवन स्तर को ऊँचा उठाएँ और उनके द्वारा अधिक-से-अधिक संभव सीमा तक आर्थिक समानता की स्थापना की जाए।

 

भारतीय संविधान के स्रोत

- संविधान सभा ने संविधान को बनाने की प्रक्रिया प्रारम्भ की तो संविधान निर्माताओं ने सोचा कि जिन देशों में संविधान पहले से लिखे जा चुके हैं, क्यों न उन संविधानों के उपबंधों का प्रयोग भारतीय संविधान के लिए किया जाए?

- संविधान निर्माताओं ने अमेरिका, ब्रिटेन और कई अन्य देशों के संविधानों का गहन अध्ययन करना शुरू किया व भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल जो भी प्रावधान उन्हें उपयुक्त लगे, उन्हें भारतीय संविधान में शामिल कर लिया।

- भारतीय संविधान पर सबसे अधिक प्रभाव भारत शासन अधिनियम-1935 का है क्योंकि इसी अधिनियम से भारतीय संविधान के लगभग 200 प्रावधान लिए गए हैं।

 

- भारत शासन अधिनियम, 1935 -

 संघीय तंत्र, राज्यपाल का कार्यकाल, न्यायपालिका, लोक सेवा आयोग, आपतकालीन उपबंध व प्रशासनिक विवरण।

 

- ब्रिटेन का संविधान –

  संसदीय शासन, विधि का शासन, विधाय प्रक्रिया, एकल नागरिकता, मंत्रिमण्डल प्रणाली, परमाधिकार लेख, संसदीय विशेषधिकार और द्विसदनवाद।

 

- संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान –

 मूल अधिकार, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक पुनरावलोकन का सिद्धान्त उप-राष्ट्रपति का पद, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का पद से हटाया जाना और राष्ट्रपति पर महाभियोग।

 

- आयरलैंड का संविधान –

 राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्त, राष्ट्रपति की निर्वाचन पद्धति और राज्य सभा के लिए सदस्यों का नामांकन।

 

 - कनाडा का संविधान –

 सशक्त केन्द्र के साथ संघीय व्यवस्था, अवशिष्ट शक्तियों का केन्द्र में निहित होना, केन्द्र द्वारा राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति और उच्चतम न्यायालय का परामर्शी न्याय निर्णयन।

 

- ऑस्ट्रेलिया का संविधान –

 समवर्ती सूची, व्यापार, वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता और संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक।

 

- जर्मनी का वाइमर संविधान –

 आपातकाल के समय मूल अधिकारों का स्थान।

 

- सोवियत संघ का संविधान –

 मूल कर्तव्य और प्रस्तावना में न्याय का आदर्श।

 

- फ्रांस का संविधान –

 गणतंत्रात्मक और प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समता और बंधुता के आदर्श।

 

- दक्षिणी अफ्रीका का संविधान -

 संविधान में संशोधन की प्रक्रिया और राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन।

 

- जापान का संविधान –

 विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया।

 

 निष्कर्ष : उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भारतीय संविधान पर अनेक आन्तरिक व बाहा तत्वों का प्रभाव पड़ा है तथापि भारतीय संविधान भारतीय आदर्शों व परिस्थितियों का परिणाम है, जो भारत में लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली स्थापित करने में सफल रहा है जहाँ पड़ोसी देशों में अनेक बार तख्ताप्लट व सैनिक शासन स्थापित हुआ है, वहीं भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति से लेकर आज तक लोकतन्त्र बना हुआ है, यह भारतीय संविधान की मौलिकता व सफलता का प्रतीक है।

 

 

संविधान संशोधन

 संविधान संशोधन की प्रक्रिया

 1. संसद में सामान्य बहुमत से

 2. संसद के दोनों सदनों में अलग-अलग विशेष बहुमत के आधार पर अनुच्छेद 368 के अनुसार

 3. विशेष बहुमत तथा राज्यों के कम से कम आधे विधानमंडल का समर्थन

 

 साधारण बहुमत द्वारा संशोधन

-  संविधान में कुछ अनुच्छेद ऐसे हैं जिन्हें संसद के दोनों सदनों में साधारण बहुमत से संशोधित किया जा सकता है ।इस श्रेणी में अनुच्छेद 2, 3, 4, 100 (3), 106, 108, 124 (1), 169, 240, 327 तथा अनुच्छेद 348 को शामिल किया जा सकता है ।

- संशोधन करने के लिए कोई विधेयक संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है और एक सत्र द्वारा पारित किए जाने पर उसको दूसरे सदन में भेजा जाता है ।दूसरे सदन विधेयक को पारित करने पर उसे राष्ट्रपति की अनुमति के लिए भेजा जाता है और राष्ट्रपति द्वारा अपनी अनुमति प्राप्त कर लेने पर विधेयक अधिनियम के रूप में बन जाता है।

 

 विशेष बहुमत द्वारा संशोधन

- संसद के विशेष बहुमत द्वारा किए जाने वाले संवैधानिक परिवर्तन को संविधान संशोधन कहा जाता है इस प्रकार संविधान संशोधन करने के लिए किसी विधेयक को संसद द्वारा विशेष बहुमत से पारित किया जाना चाहिए।

- विशेष बहुमत से तात्पर्य सदन की कुल सदस्य संख्या के 50% तथा मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई से कम ना हो, जैसे मूल अधिकार राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत आदि में संशोधन।

 

 विशेष बहुमत तथा राज्यों के अनुमोदन से संविधान संशोधन

- इस श्रेणी में संविधान के उपबंध आते हैं जो संघात्मक राज्य से संबंधित है इन उपबंध में संशोधन करने के लिए संसद के प्रत्येक सदन के दो तिहाई बहुमत तथा कम से कम 50% राज्यों के विधान मंडलों का समर्थन आवश्यक है ।

-  राष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित निर्वाचक मण्डल तथा राष्ट्रपति की चुनाव प्रक्रिया अनुच्छेद 54 व अनुच्छेद 55, संघ तथा राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विचार अनुच्छेद 73 अनुच्छेद 162, उच्चतम न्यायालय के गठन तथा क्षेत्र अधिकार, सातवी सूची में वर्णित सूचियों की प्रविष्टि।

 

 संविधान संशोधन प्रणाली कठोर है। इसकी कठोरता का कारण है कि संविधान निर्माता यह जानते थे कि संघात्मक व्यवस्था से संबंधित प्रावधानों में परिवर्तन करते समय राज्य दोनों की सहमति प्राप्त की जाए। भारत में संघीय स्वरूप को बनाए रखने के लिए संविधान की या कठोर प्रणाली निर्धारित की गई है।

 

 अनुच्छेद 368

 संसद अपनी शक्ति के द्वारा और इस अनुच्छेद में वर्णित प्रक्रिया के अनुसार संविधान में उपबंध कर सकती है पहले से विद्यमान उपबंध को बदल या हटा सकती है|

 

आपातकालीन प्रावधान

- आपातकालीन प्रावधान का उल्लेख संविधान के में अनुच्छेद 352 से 360 के अंतर्गत है।

- इसका उद्देश्य देश की संप्रभुता, एकता, अखंडता, लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था तथा संविधान की सुरक्षा करना है। ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार सर्वशक्तिमान हो जाता है तथा सभी राज्य इसकी पूर्ण नियंत्रण में आ जाते हैं।

 

- संविधान में तीन प्रकार के आपातकाल का उल्लेख किया गया है

 1.अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल (युद्ध, बाह्य आक्रमण और सशस्त्र विद्रोह)

 2.अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन या राज्य आपातकाल या संवैधानिक आपातकाल (राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता)

 3.अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपातकाल आधार भारत में वित्तीय अस्थिरता।

 

 राष्ट्रीय आपातकाल

- अनुच्छेद 352 के तहत, अगर राष्ट्रपति युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के आधार पर देश की सुरक्षा के लिए पैदा हुई स्थिति को गंभीर मानें तो देश में आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं। आपातकाल पूरे भारत में या उसके किसी हिस्से में घोषित किया जा सकता है। सिर्फ कैबिनेट की लिखित सलाह पर ही राष्ट्रपति आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं।

 1. संसदीय अनुमोदन

- राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा जारी होने के एक माह के भीतर संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से इसका अनुमोदन होना आवश्यक है।

- इस दौरान यदि लोकसभा का विघटन हो जाता है तो यह उद्घोषणा लोकसभा के पुनर्गठन के बाद पहली बैठक से 30 दिनों तक जारी रहेगी (बशर्ते राज्यसभा द्वारा इसका अनुमोदन कर दिया गया हो)।

 

 2. उद्घोषणा की समाप्ति

- राष्ट्रपति द्वारा

- जब लोकसभा इसके जारी रहने के अनुमोदन के प्रस्ताव को निरस्त कर दे तो राष्ट्रपति को इसे समाप्त करना होगा।

- यदि लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 1/10 सदस्य स्पीकर को लिखित रूप से नोटिस दें तो प्रस्ताव को अस्वीकार करने के लिए एक विशेष बैठक विचार विमर्श के उद्देश्य से बुलाई जा सकती है।

- उद्घोषणा को अस्वीकार करना है तो केवल लोकसभा से साधारण बहुमत की आवश्यकता होती है परंतु यदि उद्घोषणा को जारी रखना है तो संसद के दोनों सदनों की विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है।

 

 3. राष्ट्रीय आपातकाल के प्रभाव

 केंद्र-राज्य संबंधों पर प्रभाव -

- कार्यपालक — सामान्य समय में केंद्र राज्यों को केवल कुछ विशेष विषयों पर ही कार्यकारी निर्देश दे सकता है किंतु राष्ट्रीय आपातकाल के समय केंद्र को किसी राज्य को किसी भी विषय पर कार्यकारी निर्देश देने की शक्ति प्राप्त हो जाती है।

- विधायी- राष्ट्रीय आपातकाल के समय संसद को राज्य सूची में वर्णित विषयों पर कानून बनाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है यद्यपि किसी राज्य विधायिका की विधायी शक्तियों को निलंबित नहीं किया जाता। संसद द्वारा आपातकाल में राज्य के विषयों पर बनाए गए कानून आपातकाल की समाप्ति के बाद 6 माह तक प्रभावी रहते हैं।

- वित्तीय- राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान राष्ट्रपति केंद्र से राज्यों को दिए जाने वाले धन को कम अथवा समाप्त कर सकता है।

- मूल अधिकारों पर प्रभाव

 राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 358 के तहत अनुच्छेद 19 द्वारा दिए गए मूल अधिकारों का निलंबन हो जाता है तथा अनुच्छेद 359 के तहत अन्य मूल अधिकारों का निलंबन (अनुच्छेद 20 तथा 21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छोड़कर) हो सकता है|

- अब तक की गई राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणाएं -

1962 में -चीनी आक्रमण के कारण

1971 में -पाकिस्तानी आक्रमण के कारण

1975 में -आंतरिक उपद्रव के कारण

 

 राष्ट्रपति शासन

- अनुच्छेद 356 के तहत, राष्ट्रपति किसी राज्य में यह समाधान हो जाने पर कि राज्य में सांविधानिक तंत्र विफल हो गया है तो आपातकाल की घोषणा कर सकता है । सांविधानिक तंत्र के विफल होने की जानकारी सम्बंधित राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति को देता है ।

- संसदीय अनुमोदन तथा समयावधि

राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति शासन की घोषणा जारी होने के 2 माह के भीतर संसद के दोनों सदनों में सामान्य बहुमत से इसका अनुमोदन होना आवश्यक है। इस दौरान यदि लोकसभा का विघटन हो जाता है तो यह उद्घोषणा लोकसभा के पुनर्गठन के बाद पहली बैठक से 30 दिनों तक जारी रहेगी (बशर्ते राज्यसभा द्वारा इसका अनुमोदन कर दिया गया हो |)

यदि दोनों सदनों द्वारा स्वीकृत हो तो राष्ट्रपति शासन 6 माह तक चलता है। इसे अधिकतम 3 वर्ष की अवधि के लिए संसद की प्रत्येक 6 माह की स्वीकृति से बढ़ाया जा सकता है।

- राष्ट्रपति शासन की समाप्ति की घोषणा

 यह घोषणा राष्ट्रपति के द्वारा किसी भी समय वापस ली जा सकती है इसके लिए संसद की अनुमति आवश्यक नहीं है |

- राष्ट्रपति शासन के परिणाम

 राष्ट्रपति राज्य सरकार के कार्यों को अपने हाथों में ले लेता है और राज्यपाल राष्ट्रपति के नाम पर प्रशासन चलाता है।

 वह घोषणा कर सकता है की संसद राज्य विधायिका की शक्तियों का प्रयोग करें।

- वह संवैधानिक प्रावधानों को निलंबित कर सकता है।

- इस दौरान बनाया गया कानून राष्ट्रपति शासन के बाद भी प्रभाव में रहेगा।

- इस दौरान राष्ट्रपति न्यायालयों की संवैधानिक प्रावधानों को निलंबित नहीं कर सकता।

 

 वित्तीय आपातकाल

 आधार- वित्तीय आपातकाल ऐसी स्थिति में प्रभाव में आती है जब देश में अथवा उसके किसी क्षेत्र में वित्तीय अस्थिरता का माहौल हो या वित्तीय स्थिति खतरे में हो।

 

- संसदीय अनुमोदन एवं समयावधि

 राष्ट्रपति द्वारा वित्तीय आपातकाल की घोषणा जारी होने के 2 माह के भीतर संसद के दोनों सदनों में सामान्य बहुमत से इसका अनुमोदन होना आवश्यक है। इस दौरान यदि लोकसभा का विघटन हो जाता है तो यह उद्घोषणा लोकसभा के पुनर्गठन के बाद पहली बैठक से 30 दिनों तक जारी रहेगी (बशर्ते राज्यसभा द्वारा इसका अनुमोदन कर दिया गया हो)।

- वित्तीय आपातकाल की समाप्ति की घोषणा

 इसकी अधिकतम समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है अतः संसद के दोनों सदनों से इसे मंजूरी प्राप्त हो जाने के बाद यह अनिश्चित काल के लिए तब तक प्रभावी रहेगा जब तक राष्ट्रपति द्वारा वापस लेने की घोषणा नहीं की जाती।