मौलिक अधिकारों की संकल्पना-
- व्यक्ति में प्राकृतिक रूप से ही अनंत संभावनाएँ और क्षमताएँ विद्यमान होती हैं, जिनके माध्यम से वह अपने व्यक्तित्व का विकास करता है, किंतु इसके लिए उसे कतिपय सुविधाओं की आवश्यकता होती है। ये सुविधाएँ जिन्हें राज्य और समाज द्वारा स्वीकृत किया जाता है, वे अधिकार कहलाते हैं।
- लॉस्की के अनुसार, 'अधिकार, सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं, जिनके बिना साधारणतया कोई भी व्यक्ति अपना विकास नहीं कर सकता है। दूसरे शब्दों में, अधिकार, प्रत्येक नागरिक की मौलिक आवश्यकताएँ हैं, जिनकी राज्य द्वारा गारंटी दी जाती है। अधिकार के लिए राज्य आवश्यक है। क्योंकि अधिकार, राज्य से ही प्राप्त होते हैं। अधिकार, विकसित होती अवधारणा है।
- निरंकुश राजतंत्र के समय अधिकारों का अर्थ, राजनीतिक असहमति और शासकों के विरोध से था। उदारवादी क्रांतियों (ब्रिटेन, फ्रांस) ने अधिकारों को व्यापकता प्रदान की और सरकार के चयन का अधिकार एवं विधि के समक्ष समानता के अधिकार को वैधता मिली। यदि इन परिस्थितियों या अधिकारों को देश के संविधान में शामिल किया जाता है, तो ये मूल अधिकार कहलाते हैं। भारत के संविधान के भाग-3 में इन्हें स्थान प्रदान किया गया है। इंग्लैण्ड में मूल अधिकार उन्हें कहा जाता है, जिन्हें जनता ने 'बिल ऑफ राइट्स' के द्वारा प्राप्त किया था।
मूल अधिकारों का अर्थ
किसी भी देश के संविधान को उस देश का मूल या मौलिक कानून माना जाता है। भारत में नागरिकों को मिलने वाले अधिकारों को संविधान के भाग-3 में स्थान प्रदान करने से उन्हें मौलिक अधिकार कहा जाता है। इन अधिकारों के बिना किसी भी व्यक्ति का संपूर्ण विकास संभव नहीं है।
भारत के संविधान के भाग-3 के अनुच्छेद-12 से 35 तक मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है। ये अधिकार, नागरिकों के लिए न्याय योग्य हैं किंतु अंतिम नहीं हैं। शासन द्वारा समाज तथा राज्यहित में इन अधिकारों पर कुछ प्रतिबंध भी लगाए गये हैं। यह प्रतिबंध व्यक्तिगत और सामाजिक हित में संतुलन के लिए आवश्यक हैं। इसके अतिरिक्त संविधान में देश की संसद तथा मंत्रिपरिषद् आदि किसी को भी मौलिक अधिकारों को कम करने, निरस्त करने का अधिकार नहीं है। यदि शासन का कोई अंग मौलिक अधिकारों में हस्तक्षेप करता है या बाधा पहुँचाता है, तो न्यायपालिका को यह अधिकार है, कि वह ऐसे कार्यों को अवैध घोषित कर दे।
मौलिक अधिकार पर संविधान सभा के विचार
भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों की लिखित गांरटी दी गई है। वर्ष-1946 के कैबिनेट मिशन योजना में भारतीय संविधान के निर्माण के लिए एक संविधान सभा के निर्माण का विचार व्यक्त किया गया था, जिसके कारण एक सलाहकारी समिति का निर्माण किया गया, जो संविधान सभा को मौलिक अधिकारों के सुझावों की एक रिपोर्ट पेश करे।
- कैबिनेट मिशन के सुझाव के अनुसार 24 जनवरी, 1947 को संविधान सभा ने सलाहकारी समिति की स्थापना को समर्थन दिया तथा सरदार पटेल इसके अध्यक्ष नियुक्त हुए। समिति को मौलिक अधिकारों की सूची, अल्पसंख्यकों के संरक्षण संबंधी खंड इत्यादि की रिपोर्ट संविधान सभा को पेश करनी थी। सलाहकारी समिति द्वारा एक मौलिक अधिकारों की उप समिति की नियुक्ति की गई, इस उप समिति का अध्यक्ष आचार्य कृपलानी को नियुक्त किया गया। इस उप समिति का पहला अधिवेशन 24 फरवरी, 1947 को वी. एन. राव, के. टी. शाह, के. एम. मुंशी, डॉ. बी. आर. अंबेडकर, हरनाम सिंह तथा कांग्रेस विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई सूची के मसौदे के साथ-साथ विविध टिप्पणियों और अधिकारों के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा के लिए हुआ। यह सूची अत्यंत लंबी और विस्तृत थी, क्योंकि इनमें भारत एवं अन्य स्रोतों से लिए गए सिद्धांतों की व्याख्याएँ तथा नकारात्मक एवं सकारात्मक अधिकारों को भी समाविष्ट किया गया था। संविधान निर्माताओं के समक्ष व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं सामाजिक व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करने की समस्या बड़ी जटिल थी। संविधान निर्माताओं के बीच हालाँकि तकनीकी को लेकर विवाद था, परंतु मौलिक सिद्धांतों के प्रति संभवतया एकमत था। यह निर्णय लिया गया, कि मौलिक अधिकार वादयोग्य होने चाहिए। मौलिक स्वतंत्रताओं तथा संवैधानिक उपचारों के अधिकारों को स्वीकृत कर लिया गया। मौलिक अधिकारों को हालाँकि वाद योग्य माना गया था, परंतु यह असीम नहीं थे। इन अधिकारों को विशेष परिस्थितियों के अंतर्गत सीमित भी किया जा सकता था और निलंबित भी, अर्थात् मौलिक अधिकारों पर कुछ सीमाएँ लगाई गयीं थीं। व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता का अधिकार, मौलिक स्वतंत्रताएँ इत्यादि को कुछ सीमाओं के साथ पारित किया गया।
मौलिक अधिकारों तथा कानूनी अधिकारों में अंतर-
कानूनी अधिकार, कानून के द्वारा संरक्षित और न्यायालय द्वारा बाध्यकारी होते हैं। मौलिक अधिकार भी कानून द्वारा संरक्षित और बाध्यकारी होते हैं, लेकिन दोनों में अंतर यह है, कि कानूनी अधिकारों के उल्लंघन पर निचले न्यायालय और सामान्य प्रक्रियाओं के माध्यम से कार्यवाही होती है। जबकि मौलिक अधिकारों के हनन पर सीधे सर्वोच्च न्यायालय में अनुच्छेद-32 में वर्णित विशिष्ट रिटों के माध्यम से कार्यवाही की जाती है। कानूनी अधिकारों को विधायिका द्वारा बनाये गये सामान्य कानूनों से परिवर्तित किया जा सकता है। जबकि मौलिक अधिकारों के परिवर्तन के लिए संविधान संशोधन का सहारा लिया जाता है। सभी कानूनी अधिकारों का पूर्णतः समापन या उनमें अंशतः परिवर्तन किया जा सकता है। केशवानंद भारती वाद के पश्चात मौलिक अधिकारों में परिवर्तन किया जा सकता है। लेकिन, केशवानंद भारती वाद के पश्चात उन मौलिक अधिकारों को संसद या विधान सभाएँ संशोधित या परिवर्तित नहीं कर सकती हैं, जो आधारभूत ढाँचे से संबंधित हैं।
- मौलिक अधिकारों को आपातकाल के अतिरिक्त कभी भी निलंबित नहीं किया जा सकता। 44वें संविधान संशोधन के पश्चात अपराध के लिए दोष सिद्धि के विषय में संरक्षण (अनुच्छेद-20) व जीवन का अधिकार (अनुच्छेद-21) आपातकाल के दौरान भी समाप्त नहीं किया जा सकता।
मौलिक अधिकारों की प्रकृति या विशेषताएँ-
मौलिक अधिकारों का प्रेरणा स्रोत संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान है, जहाँ प्रथम दस संविधान संशोधनों द्वारा इन अधिकारों का सृजन किया गया, फिर भी भारतीय संविधान भाग-3 में वर्णित मौलिक अधिकार, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और भारत की सामाजिक समस्याओं से सर्वाधिक प्रेरणा ग्रहण करते हैं-
1. मौलिक अधिकार, सर्वाधिक विस्तृत घोषणा-पत्र है। कुछ अनुच्छेद तो व्यापक रूप से विस्तृत हैं। इस अध्याय में मौलिक अधिकारों से संबंधित सभी बातों का समावेश किया गया है तथा यह प्रयास किया गया है, कि मौलिक अधिकारों को विवाद रहित बनाया जाये।
2. प्रमुख अधिकारों की घोषणा के साथ उस पर लगने वाले युक्तियुक्त प्रतिबंधों का विवरण प्रत्येक अनुच्छेद में निहित है। मौलिक अधिकार, निरपेक्ष व असीमित नहीं हैं। यह राज्य द्वारा निरुद्ध युक्तियुक्त प्रतिबंधों के अधीन है। प्रतिबंधों की युक्तियुक्तता की जाँच सर्वोच्च और उच्च न्यायालय करते हैं।
3. मौलिक अधिकार, मुख्यतः कार्यपालिका और अंशत: विधायिका के विरुद्ध प्रदान किये गये हैं, क्योंकि निरंकुश कार्यपालिका से इन अधिकारों को सर्वाधिक खतरा रहता है। ब्रिटिश भारत इसका गवाह रहा है।
4. राज्य सेना, अर्द्धसैनिक बल, पुलिस, आसूचना आदि वर्गों को प्रशासनिक क्षमता व राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर मौलिक अधिकार से वंचित रखता है, साथ ही उन क्षेत्रों के लिए मौलिक अधिकार निलंबित रहते हैं, जहाँ सैन्य कानून घोषित हों। राष्ट्रपति, आपातकाल के दौरान अनुच्छेद-20 व 21 को छोड़कर इन अधिकारों को निलंबित कर सकते हैं।
5. प्रथम संविधान संशोधन से नौवीं अनुसूची का को बनाया गया, जो पूर्णतः मौलिक अधिकारों को प्रभावहीन कर देती है एवं विधायिका कोई भी कानून बनाकर इस अनुसूची में समाहित कर न्यायिक पुनरावलोकन से बच सकती है। केशवानंद भारती वाद के बाद आधारभूत ढाँचे के सिद्धांत के अंतर्गत इस अनुसूची की समीक्षा भी न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में है।
6. भाग-3 में वर्णित मौलिक अधिकारों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- नकारात्मक अधिकार एवं सकारात्मक अधिकार।
नकारात्मक अधिकार, राज्य की शक्ति को कम करते हैं तथा उन्हें लोगों के जीवन में हस्तक्षेप करने से रोकते हैं जैसे-अनुच्छेद-14, 16(2), 18(1), 20, 22(1) इत्यादि। सकारात्मक अधिकार, राज्य को नागरिकों के हित में कार्य करने की शक्ति प्रदान करते हैं। जैसे अनुच्छेद-16(1),19, 25, 19(1), 30(1) इत्यादि।
7. गोपालन बनाम् मद्रास राज्य वाद में न्यायालय का मत है, कि मौलिक अधिकारों की सूची निःशेषकारी नहीं है। अर्थात् भाग-3 में वर्णित अधिकार, न्यायालय समय-समय पर न्यायिक व्याख्या के माध्यम से इन अधिकारों की सूची को बढ़ा सकता है। जैसाकि अनुच्छेद-21 तथा अनुच्छेद-24 में सृजित नए अधिकार।
मौलिक अधिकारों का वर्गीकरण-
1. केवल नागरिकों को प्राप्त मौलिक अधिकार
(i) धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद से प्रतिषेध (अनुच्छेद-15)
(ii) लोक नियोजन के विषय में अवसर की समानता (अनुच्छेद-16)
(iii) स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद-19)
(iv) अल्पसंख्यकों का संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद-29, 30)
2. भारत में निवास करने वाले सभी व्यक्तियों (विदेशियों को भी) प्राप्त मौलिक अधिकार
(i) विधि के समक्ष समता और विधि का समान संरक्षण (अनुच्छेद-14)
(ii) अपराध के लिए दोष सिद्ध में संरक्षण (अनुच्छेद-20)
(iii) जीवन का अधिकार (अनुच्छेद-21)
(iv) शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद-23)
(v) धर्म की स्वतंत्रता (अनुच्छेद-25, 26, 27, 28)
राज्य की परिभाषा
- अनुच्छेद-12 में राज्य की परिभाषा दी गई है, जिसमें संघ सरकार, राज्य सरकार, नगर पालिकाएँ तथा अन्य सभी निकाय अर्थात् वैधानिक या गैर-संवैधानिक प्राधिकरण जैसे एलआईसी, ओएनजीसी, सेल आदि शामिल हैं।
- मौलिक अधिकार के अध्याय की शुरूआत राज्य से होती है, क्योंकि मौलिक अधिकार राज्य के विरुद्ध प्राप्त होने वाले अधिकार हैं।
विधि की परिभाषा
- अनुच्छेद-13 में अन्य उपबंधों के साथ विधि एवं अध्यादेश की परिभाषा दी गयी है, जो इस प्रकार हैं|
- अनुच्छेद-13 (i) के अनुसार संविधान लागू होने के पहले की विधि- मूल अधिकार के बीच टकराव हो, तो मूल अधिकार संविधान लागू होने के पहले की विधियों को ढँक लेते हैं। अतः संविधान पूर्व निर्मित विधि का प्रभाव समाप्त हो जाता है।
- अनुच्छेद-13 (ii) के अनुसार, राज्य के द्वारा ऐसी विधि का निर्माण नहीं होगा, जो भाग-3 में वर्णित मूल अधिकारों के विरुद्ध हो या प्रतिकूल हो, तो ऐसी विधियों को न्यायपालिका द्वारा असंवैधानिक घोषित कर दिया जाएगा।
- अनुच्छेद-13 (iii) में विधि की परिभाषा है, इन विधियों में अध्यादेश, उपनियम, नियंत्रण और अधिसूचना भी सम्मिलित है। राज्य विधान सभा अथवा भारतीय क्षेत्र में किसी भी अधिकारी द्वारा निर्मित विधियों को भी इसमें सम्मिलित किया जाएगा।
- अनुच्छेद-13 (iv) यह अनुच्छेद 24वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया। इसके अनुसार, इस अनुच्छेद में वर्णित प्रावधान अनुच्छेद-368 के अंतर्गत किये गये सांविधानिक संशोधनों पर लागू नहीं होते, क्योंकि संविधान संशोधन विधि एवं सामान्य विधि अलग-अलग हैं।
समानता का अधिकार (अनुच्छेद-14)
- भारतीय समाज, मूलतः एक सोपानीकृत, श्रेणीबद्ध और सामंतवादी समाज था, जिसे लोकतांत्रिक बनाने के लिए विधि के समक्ष समानता को स्वीकार किया गया।
- समानता के अधिकार के दो पक्ष हैं-विधि के समक्ष समानता एवं विधियों का समान संरक्षण। विधि के समक्ष समानता का अभिप्राय है, कि सभी व्यक्तियों पर एक समान विधि लागू की जाएगी। किसी व्यक्ति की पद, प्रतिष्ठा कुछ भी क्यों न हो, वह विधि के समक्ष समान माना जायेगा, धन, संपत्ति, भूमि एवं वंश आदि के आधार पर नागरिकों में विभेद नहीं किया जायेगा। कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है। सभी को कानून के उल्लंघन पर दण्डित किया जायेगा। लेकिन समानता की उपरोक्त संकल्पना नकारात्मक है। क्योंकि यह केवल समता प्रदान करता है, समता लाने का प्रयास नहीं करता।
विधियों के समान संरक्षण से तात्पर्य यह है, कि सभी व्यक्तियों की कानून तक पहुँच बराबर होनी चाहिए। स्थितियों के आधार पर कानून में विभेद किया जा सकता है, अर्थात् सभी व्यक्तियों के लिए एक जैसे नियम नहीं बनाये जा सकते हैं। समान लोगों के साथ, समान कानून बनाये जायेंगे। जैसे-करारोपण कानून सभी पर आरोपित करना सही नहीं है। महिलाओं, बच्चों तथा आम पुरुषों हेतु एक कानून नहीं बनाये जा सकते। इसके अतिरिक्त अन्य आधारों पर भी अलग विभेद किये जा सकते हैं। भौगोलिक आधार पर वर्गीकरण के तहत, पूर्वोत्तर के लोगों या पहाड़ी लोगों हेतु अलग कानून बनाया जा सकता है। इसलिए विधि के समान संरक्षण को भी स्वीकार किया गया, जिसके अनुसार, समान लोगों के साथ, समान विधि लागू की जायेगी। अतः परिस्थितियों की भिन्नता के आधार पर अलग-अलग विधि लागू करना, समानता का उल्लंघन नहीं होगा। न्यायालय ने नागरिकों के इस तरह के वर्गीकरण को सही माना, समानता के अधिकार की माँग है, कि लोगों में तार्किक विभेद किए जाएँ।
तार्किक विभेद
अनुच्छेद-14 में प्रावधान किया गया समता का अधिकार पूर्णतः समानता की माँग नहीं करता है। सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था के सुचारू रूप से संचालन हेतु समाज का तार्किक तथा युक्तियुक्त वर्गीकरण किया जा सकता है। बशर्ते यह वर्गीकरण मनमाना नहीं होना चाहिए। न्यायालय का मानना है, कि वर्गीकरण का आधार बोधगम्य होना चाहिए तथा न्याय के सामान्य सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए। उदाहरण के लिए, कुटीर उद्योग तथा बड़े उद्योगों में अंतर किया जा सकता है।
विधि के समक्ष समानता का अपवाद
विधि के समक्ष समता के कुछ अपवाद भी हैं, जो इस प्रकार हैं-
1.(i) राष्ट्रपति एवं राज्यपाल को विधि के समक्ष समानता से छूट प्रदान की गई है। (अनुच्छेद-361)
(ii) राष्ट्रपति एवं राज्यपाल, दोनों अपने पद के शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों के लिए न्यायपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होंगे।
(iii) दोनों के विरुद्ध उनके कार्यकाल के दौरान किसी प्रकार की दाण्डिक अथवा आपराधिक कार्यवाही न तो आरंभ होगी और न ही बनी रहेगी।
(iv) राष्ट्रपति व राज्यपाल पर उनके कार्यकाल के दौरान या बाद में सिविल कार्यवाही आरंभ की जा सकती है।
2.कोई भी व्यक्ति यदि संसद के या राज्य विधानसभा के किसी भी सदन की सत्य कार्यवाही से संबंधित विषय वस्तु का प्रकाशन समाचार-पत्र में (रेडियो या टेलीविजन) करता है तो उस पर किसी प्रकार का मुकदमा, देश के किसी भी न्यायालय में नहीं चलाया जा सकेगा। (अनुच्छेद 361-क)
3.संसद या राज्य के विधानमण्डल या संसदीय समिति या राज्य विधानमण्डलीय समिति के किसी सदस्य द्वारा कही गयी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कार्यवाही नहीं की जाएगी। (अनुच्छेद 105,194)
4. विदेशी संप्रभु (शासक), राजदूत एवं कूटनीतिक व्यक्ति, दीवानी और फौजदारी मुकदमों से मुक्त होंगे।
5.संयुक्त राष्ट्र संघ एवं इसकी एजेंसियों को छूट प्राप्त है।
धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग व जन्मस्थान के आधार पर विभेद से प्रतिषेध ( अनुच्छेद-15)
समता के आधार को विशेष क्षेत्रों में लागू करने हेतु अनुच्छेद-15 की व्यवस्था की गयी है। यह अनुच्छेद धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग तथा जन्मस्थान के आधार पर किसी भी प्रकार के विभेद से रोकता है। यह मूल अधिकार सिर्फ भारतीय नागरिकों को उपलब्ध है। इस अनुच्छेद के पाँच खण्ड हैं|
अनुच्छेद-15 (1)-
इस अनुच्छेद के अनुसार, राज्य केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग व जन्मस्थान के आधार पर (एक या सभी) नागरिकों के मध्य विभेद नहीं करेगा। यह अनुच्छेद राज्य के विरुद्ध है।
इस अनुच्छेद में केवल' शब्द का प्रयोग किया गया है, जिसका तात्पर्य यह है, कि राज्य अन्य आधार पर भेदभाव कर सकता है, बशर्ते भेदभाव तार्किक हो।
अनुच्छेद-15 (2)-
यह अनुच्छेद राज्य तथा व्यक्तियों को यह आदेश देता है, कि राज्य या कोई भी व्यक्ति केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग व जन्मस्थान के आधार पर निम्नलिखित स्थितियों में विभेद नहीं करेगा या निम्नलिखित स्थानों के उपयोग से नहीं रोकेगा-
1. दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों तथा सार्वजनिक मनोरंजन के स्थान पर
2. ऐसे कुओं, तालाबों व स्नानघाट, सड़क, सार्वजनिक रिसोर्ट पर विभेद नहीं किया जायेगा, जो पूर्णत: या अंशतः राज्य वित्त द्वारा संचालित हैं तथा सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए निर्मित हैं
अनुच्छेद-15 (3)-
यह अनुच्छेद, राज्य द्वारा विभेद का प्रावधान करता है। इस अनुच्छेद के अनुसार, राज्य, महिलाओं व बच्चों के उत्थान के लिए विशेष उपाय करेगा।
अनुच्छेद-15 (4)-
यह अनुच्छेद, सामाजिक तथा शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जातियों व जनजातियों के उत्थान के लिए राज्य द्वारा किये जाने वाले प्रावधान या कार्य विधि के समक्ष समानता का उल्लंघन नहीं है। चूँकि ये जातियाँ सदियों से दमित रही हैं एवं सामाजिक विकास में निम्न स्थान पर रही हैं। अतः इनके उत्थान व विकास हेतु राज्य आवश्यक संरक्षण प्रदान कर सकता है।
अनुच्छेद-15 (5)-
संप्रति 93वें संविधान संशोधन के पश्चात सामाजिक और शैक्षिक रूप में पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण की व्यवस्था की गई, चाहे वे संस्थाएँ राज्य के द्वारा अनुदान प्राप्त करती हों या नहीं। अतः यह आरक्षण मूलतः निजी शैक्षणिक संस्थाओं के लिए ही है, लेकिन अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं पर यह आरक्षण लागू नहीं होगा।
लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता(अनुच्छेद-16)-
अनुच्छेद-16 के अनुसार, राज्य के अंतर्गत सेवाओं में किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान एवं निवास स्थान या इनमें से किसी भी एक के आधार पर भेदभाव नहीं किया जायेगा।
सरकारी सेवाओं में अवसर की समानता के अनुसार, प्रत्येक नागरिकों को रोजगार एवं राज्य के अंतर्गत नियुक्ति में समान अवसर की समानता से है। यह अनुच्छेद नौकरियों, सरकारी सेवाओं में सभी की नियुक्ति हेतु समानता का अवसर उपलब्ध करवाता है। अनुच्छेद-16 पाँच खण्डों में विभाजित है, जो इस प्रकार है
अनुच्छेद-16 (1), (2)-
अनुच्छेद-16(1) के अनुसार, राज्य के अंतर्गत नियुक्ति और रोजगार में सभी नागरिकों को अवसर की समानता प्रदान की जायेगी।
अनुच्छेद-16(2) यह निर्धारित करता है, कि राज्य के अंतर्गत रोजगार और नियुक्ति में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान एवं निवास स्थान के आधार पर अथवा इनमें से किसी भी एक आधार पर भेदभाव नहीं किया जायेगा। जबकि अन्य आधारों जैसे शैक्षणिक योग्यता, शारीरिक क्षमता (पुलिस व सैन्यबल सेवाओं), तकनीकी के आधार पर विभेद किये जा सकते हैं, जो तार्किक व आवश्यक हैं। उपरोक्त व्यवस्था केवल सरकारी सेवाओं हेतु है, न कि गैर-सरकारी कंपनियों के लिए।
अनुच्छेद-16 (3)-
अनुच्छेद-16 (3) में यह व्यवस्था की गयी है, कि संसद, विधि द्वारा राज्य विशेष को यह अधिकार दे सकती है, कि वह सरकारी सेवाओं में चयन के लिए निवास के आधार पर अपने राज्य के निवासियों को आरक्षण दे सकती है। अर्थात् भर्ती प्रक्रियाओं में निवास की शर्त लगायी जा सकती है। परंतु यह तभी हो सकता है, जब संसद अनुमति दे। राज्य विधान सभाओं को यह अधिकार नहीं दिया गया है।
अनुच्छेद-16 (4)-
यह अनुच्छेद भी विशेष उद्देश्यों हेतु समता के नियमों में ढील देता है। इस अनुच्छेद के तहत राज्य नागरिकों के किन्हीं पिछडे़ वर्गों को नियुक्ति में आरक्षण प्रदान करेगा राज्य पिछडे़ वर्गों को तब आरक्षण दिया जा सकता है, जब उस वर्ग को राज्य के अधीन पदों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त न हो। अर्थात् अनुच्छेद-16(4) तभी लागू हो सकता है, जब वह वर्ग-(i) पिछड़ा हो, (ii) सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न हो। इन दोनों शर्तों के पूरा होने पर ही आरक्षण की व्यवस्था की जा सकती है।
अनुच्छेद-16 (5)-
किसी धार्मिक मामलों के प्रबंध अथवा धार्मिक संस्थाओं में उस धर्म से संबंधित व्यक्तियों की नियुक्ति की जा सकती है। ऐसे नियम को अवसर की समता का उल्लंघन नहीं माना जायेगा। जैसे हिन्दू धार्मिक संस्थाओं या मन्दिरों में हिन्दुओं की नियुक्ति तथा मुस्लिम धार्मिक संस्थाओं में मुसलमानों की नियुक्ति की जा सकती है।
अनुच्छेद-16 (4) से संबंधित विवाद-
अनुच्छेद-16(4) अत्यंत विवादित धारा है। यह सामाजिक आंदोलनों का कारण भी रहा है तथा न्यायिक वाद-विवाद का केंद्र भी रहा है। इस अनुच्छेद से संबंधित महत्वपूर्ण बिंदु इस प्रकार हैं-
पिछड़ेपन की पहचान व आधार
अनुच्छेद-16(4) में या संविधान के अन्य भागों में "पिछड़ेपन” को परिभाषित नहीं किया गया है। अतः इन वर्गों के पहचान व निर्धारण में समस्याएँ रही हैं। सरकार ने समय-समय पर पिछड़े वर्ग की पहचान हेतु प्रयास किया है। स्वतंत्रता के बाद पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए भारत में “काका कालेलकर” आयोग की स्थापना हुई। वर्ष-1953 में गठित यह आयोग अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सका, कि पिछड़े वर्ग के लोग कौन हैं।? इनके अनुसार, केवल जाति को भारत में पिछड़े वर्ग का आधार नहीं माना जा सकता है।
- इसी समस्या के समाधान के लिए पुनः मंडल आयोग (वर्ष-1979) की स्थापना हुई, जिसकी नियुक्ति जनता पार्टी सरकार द्वारा की गयी। मंडल आयोग ने पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए सामाजिक व शैक्षिक एवं आर्थिक संकेतकों का प्रयोग करते हुये यह निष्कर्ष निकाला, कि भारत में पिछड़ी जातियाँ ही, पिछड़े वर्ग में सम्मिलित की जा सकती हैं। कहने का अभिप्राय है, कि भारत में जाति और वर्ग परस्पर अंतर्संबंधित हैं। इसलिए पिछड़ी जाति के लोग, पिछड़े वर्ग तथा अगड़ी जाति के लोग, अगड़े वर्ग में शामिल किये जा सकते हैं। अत: वर्ष-1990 में केन्द्रीय सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया तथा जाति को पिछड़ेपन का आधार माना। जाति ही सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन का आधार माना गया तथा सरकार ने पिछड़े वर्गों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की।
'इंदिरा साहनी बनाम् भारत संघवाद' का ऐतिहासिक निर्णय -
1. भारत में पिछड़ी जातियों को ही पिछड़े वर्ग की श्रेणी में रखा जा सकता है, लेकिन पिछड़े वर्ग की एकमात्र पहचान जाति ही नहीं है, क्योंकि पिछड़ी जातियों में सम्मिलित वे लोग जो सामाजिक एवं आर्थिक रूप में संपन्न हैं, उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। अतः न्यायालय के अनुसार, ये लोग 'मलाईदार परत'(CreamyLayer) में सम्मिलित किये जायेंगे।
2.उच्चतम न्यायालय ने मंडलवाद के निर्णय में यह कहा, कि पिछड़े वर्गों की सूची का निर्माण करने और पिछड़े वर्गों को आरक्षण की सीमा से बाहर रखने के लिए एक स्थायी सांविधिक संस्था का निर्माण किया जाए, साथ ही क्रीमीलेयर की सीमा का निर्धारण भी करे।
3.न्यायपालिका ने आरक्षण की उच्चतम सीमा 50% निर्धारित की तथा न्यायालय ने कहा, कि आरक्षण प्रदान करते समय सेवाओं में दक्षता या कुशलता को बनाये रखा जाना चाहिए।
4. न्यायपालिका ने प्रोन्नति में दिये जा रहे आरक्षण को अस्वीकार कर दिया। न्यायालय के अनुसार, आरक्षण का आशय, केवल आरंभिक नियुक्ति से ही है।
5. न्यायपालिका के अनुसार, किसी विशेष कुशलता वाले पदों, जैसे डॉक्टर, वैज्ञानिक आदि पर आरक्षण नहीं होगा।
6. न्यायालय ने आर्थिक आधार पर दिये गये 10 प्रतिशत आरक्षण को रद्द कर दिया, क्योंकि संविधान में पिछड़ापन मूलतः सामाजिक पिछड़ापन है।
7. न्यायपालिका ने 'आगे ले जाने के नियम' (Carry forward Rule) को स्वीकार किया और यह कहा, कि आरक्षित वर्गों के रिक्त पदों को अगले वर्ष भरा जायेगा, परंतु आरक्षण की उच्चतम सीमा 50% से अधिक नहीं होनी चाहिए।
पिछड़े वर्गों का उपवर्ग-
इन्दिरा साहनी वाद के पहले न्यायपालिका ने पिछड़ों में पिछड़े के सिद्धांत को अस्वीकार कर दिया था, परंतु इन्दिरा साहनी वाद में न्यायपालिका ने क्रीमीलेयर की संकल्पना का प्रयोग करते हुए 'पिछड़ों में भी पिछडे़ के सिद्धांत' को स्वीकार कर लिया। यह उल्लेखनीय है, कि अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों में अभी भी कोई विभाजन स्वीकार नहीं किया गया है, परंतु न्यायपालिका ने 'नागराज वाद' में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों में भी विभाजन का संकेत दिया है।
महिला आरक्षण
आरक्षण की सीमा में महिलाओं को पिछड़ा माना जा सकता है या नहीं? यह भी इसी अनुच्छेद से जुड़ा विवादित विषय है। काका कालेलकर आयोग ने महिलाओं को पिछड़ा मानते हुए आरक्षण की बात कही थी, परंतु मंडल आयोग ने महिलाओं के आरक्षण के दावे को नकार दिया था। अतः अब महिलाओं को पिछड़ा नहीं माना गया है तथा उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था नहीं है, जो महिलाएँ पिछड़े वर्गों से संबंधित हैं, वे उस वर्ग में आरक्षण ले सकती हैं।
क्रीमीलेयर की संकल्पना
क्रीमीलेयर के अंतर्गत निम्नलिखित को शामिल किया जाता है-
(i) संवैधानिक पद धारण करने वाले व्यक्ति।
(ii) ग्रुप 'ए' तथा ग्रुप 'बी' की सेवा के क्लास सेकेण्ड रैंक के अधिकारी।
(iii) सेना में कर्नल या उससे ऊपर रैंक के अधिकारी।
(iv) डॉक्टर, अधिवक्ता, इंजीनियर, कलाकार, लेखक, सलाहकार आदि प्रकार के पेशेवर।
(v) व्यापार, वाणिज्य एवं उद्योग में लगे व्यक्ति।
(vi) शहरी क्षेत्रों में जिन लोगों के पास भवन हैं तथा जिनके पास एक निश्चित सीमा से अधिक की कृषि भूमि या रिक्त भूमि रखने वाले तथा जिन लोगों की सालाना आय 6 लाख से अधिक है या जिनके पास एक छूट सीमा से अधिक की संपत्ति है, ऐसे लोग आरक्षण में भागीदार नहीं होंगे तथा आरक्षण पिछड़े वर्गों को ही मिलना चाहिए, जिनका सेवाओं में प्रतिनिधित्व अपर्याप्त हो।
इंदिरा साहनी वाद के निर्णय का प्रभाव-
इंदिरा साहनी वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह कहा, कि आरक्षण 50% से ज्यादा नहीं होगा। जबकि तमिलनाडु में 69% आरक्षण प्रदान किया गया था। तमिलनाडु के इस आरक्षण को बचाने के लिए संसद के द्वारा 76वाँ संविधान संशोधन किया गया और तमिलनाडु के आरक्षण को नौवीं अनुसूची में शामिल कर दिया गया, क्योंकि परंपरागत रूप में यह माना जाता है, कि नौवीं अनुसूची का न्यायिक पुनरावलोकन नहीं होगा। यद्यपि वर्तमान में न्यायपालिका ने यह स्पष्ट कहा है, कि वर्ष-1973 के बाद नौवीं अनुसूची में शामिल उन विषयों का न्यायिक पुनरावलोकन होगा, जिनके द्वारा मूलभूत ढाँचे का उल्लंघन किया जा सकता है।
(A) प्रोन्नति में आरक्षण (77वाँ संविधान संशोधन)
न्यायालय का मानना है, कि अनुच्छेद-16(4) के अनुसार, आरक्षण केवल प्रारंभिक नियुक्तियों में प्रदान किया जा सकता है, पदोन्नति में नहीं। न्यायालय का तर्क था, कि प्रोन्नति में आरक्षण से प्रशासनिक कार्यकुशलता प्रभावित होगी, जो अनुच्छेद-335 में निहित कार्यकुशलता तथा दक्षता की भावनाओं के खिलाफ है। अतः न्यायालय के आदेश को समाप्त करने हेतु सरकार द्वारा 77वाँ संविधान संशोधन (वर्ष-1995) पास किया गया तथा अनुच्छेद-16(4)(क) स्थापित किया, जिसमें यह व्यवस्था की गयी, कि अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों को प्रोन्नति में आरक्षण दिया जाना वैधानिक है।
(B) आरक्षित सीटों के न भरने की स्थिति पर विवाद (81वाँ संविधान संशोधन)
किसी निश्चित वर्ष में यदि उम्मीदवार न मिलने के कारण पिछड़े वर्ग व अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों की सीटों को नहीं भरा जा सकता था, तो उसे सामान्य वर्ग को हस्तांतरित कर दिया जाता था। इस विकृति को दूर करने हेतु सरकार ने नियम बनाया, कि इन उपरोक्त सीटों को अगले वर्ष वाले आरक्षण में जोड़ दिया जायेगा, जिसका परिणाम यह हुआ, कि पिछड़े वर्ग की सीटों के जुड़ने से अगले वर्ष आरक्षण की सीमा 50% से अधिक हो जाती थी, जो मंडलवाद के निर्णयों के विपरीत था। फलतः सर्वोच्च न्यायालय ने सीटों के अग्रेषण को कुछ शर्तों के साथ वैधानिक ठहराया। न्यायालय की शर्त थी, कि एक वर्ग में अग्रेषण सहित कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं होना चाहिए। फलतः संसद ने 81वाँ संविधान संशोधन पारित किया। इसके तहत संविधान में अनुच्छेद-16 (4 ख) जोड़ा गया, जिसमें यह कहा गया है, कि यदि आरक्षित सीटें खाली रह जाती हैं, तो इन्हें अलग माना जाय तथा अगले वर्ष होने वाली नियुक्तियों में इन्हें न जोड़ा जाय, बल्कि अलग से रिक्तियों को भरा जाय। यह भर्ती 50% सीमा के अंदर नहीं मानी जायेगी।
(C) प्रोन्नति में आरक्षण और वरिष्ठता (85वाँ संविधान संशोधन)
वीरपाल सिंह चौहान वाद में न्यायालय ने यह कहा, कि आरक्षण से प्रोन्नति प्राप्त करने वाले अधिकारी वरिष्ठता का फायदा नहीं प्राप्त कर सकते। अर्थात् अपने समकक्षों तथा ज्येष्ठ अधिकारियों से उन्हें वरिष्ठ नहीं माना जायेगा तथा ज्येष्ठता के निर्धारण का आधार प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि होगी, न कि प्रोन्नति की। उपरोक्त प्रावधानों को रद्द करने हेतु संसद ने 85वाँ संविधान संशोधन-2001 पारित किया तथा अनुच्छेद-16(1)(क) में संशोधन कर यह व्यवस्था दी गयी, कि प्रोन्नति में आरक्षण के साथ वरिष्ठता का लाभ भी इन वर्गों को दिया जा सकता है, जिसे 'पारिणामिक वरिष्ठता का सिद्धांत' कहा जाता है।
अस्पृश्यता का अंत (अनुच्छेद-17)
समानता का अभिप्राय, केवल अवसर की समानता नहीं, अपितु विशेषाधिकारों और विषमताओं का भी अंत करना है। इसी उद्देश्य हेतु अनुच्छेद-17 में अस्पृश्यता के समापन की व्यवस्था की गयी है। अनुच्छेद-17 में यह उल्लिखित है, कि अस्पृश्यता का किसी भी रूप में प्रयोग दंडनीय अपराध है और अस्पृश्यता को समाप्त कर दिया गया है। अस्पृश्यता का अंत (अनुच्छेद-17) एक निरपेक्ष अधिकार है। अतः इस अधिकार के विरुद्ध कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। अनुच्छेद-17 व्यक्ति एवं राज्य, दोनों के विरुद्ध उपलब्ध है।
- अस्पृश्यता में निम्नलिखित बिंदु सम्मिलित हैं-
(i) किसी सार्वजनिक संस्था, जैसे-अस्पताल, शैक्षणिक संस्थाओं में किसी व्यक्ति के प्रवेश को प्रतिबंधित करना।
(ii) सार्वजनिक पूजा स्थलों पर किसी व्यक्ति को पूजा से प्रतिबंधित करना।
(iii) किसी भी सार्वजनिक स्थान में प्रवेश से प्रतिबंधित करना।
(iv) अनुसूचित जाति के लोगों को छुआछूत के नाम पर अपमानित करना।
(v) छुआछूत का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उपदेश देना।
(vi) छुआछूत को ऐतिहासिक, धार्मिक या दार्शनिक या अन्य किसी आधार पर औचित्यपूर्ण बताना।
इस अनुच्छेद को पूर्ण करने हेतु संसद ने अस्पृश्यता निवारण अधिनियम, 1955 पारित किया।
उपाधियों का अंत (अनुच्छेद-18)
एक लोकतांत्रिक देश में व्यक्ति का महत्व उसकी क्षमता या योग्यता से है, उसके जन्म से नहीं। राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं द्वारा सदैव शिकायत की जाती रही, कि ब्रिटिश शासन साम्राज्यवादी है और अपने हित के लिए तथा सार्वजनिक जीवन को भ्रष्ट करने के लिए उपाधियाँ प्रदान कर रही हैं। जे. बी. कृपलानी ने उपाधियों पर संविधान सभा में तीखा आक्षेप किया था। इसलिए स्वतंत्र भारत में शैक्षिक संस्थाओं या सैन्य प्रयोजनों के अलावा राज्य द्वारा उपाधियों को प्रदान करने पर प्रतिबंध है, क्योंकि उपाधियाँ एक प्रकार से समाज में विषमता पैदा करती हैं। यह अनुच्छेद निम्नलिखित प्रकार की उपलब्धि पर रोक लगाता है-
(i) इसके अंतर्गत किसी प्रकार की उपाधियाँ राज्य के द्वारा नहीं प्रदान की जायेंगी।
(ii) परंतु राज्य, अकादमिक एवं सैन्य उपाधियाँ प्रदान कर सकता है।
(iii) कोई भी भारतीय नागरिक विदेशी राज्य से कोई उपाधि ग्रहण नहीं करेगा।
(iv) एक ऐसा व्यक्ति, जो भारत का नागरिक न हो, लेकिन राज्य के अंतर्गत किसी लाभ के पद पर हो, वह राष्ट्रपति की सहमति के बिना किसी विदेशी राज्य से उपाधि ग्रहण नहीं कर सकता।
(v) ऐसा कोई व्यक्ति, जो राज्य के अंतर्गत किसी लाभ के पद या ट्रस्ट पर है, वह राष्ट्रपति की सहमति के बिना किसी विदेशी राज्य से उपहार या उपलब्धि प्राप्त नहीं कर सकता।
विवाद-
वर्ष-1954 में भारत सरकार ने चार प्रकार के सम्मान प्रारंभ किए भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण एवं पद्म श्री। आलोचकों ने इनका विरोध करते हुए कहा, कि यह उद्देशिका में वर्णित प्रतिष्ठा एवं समता के अधिकार के विरुद्ध है। परिणाम स्वरूप वर्ष-1977 में जनता पार्टी की सरकार ने इन सम्मानों को समाप्त कर दिया। परंतु इंदिरा गाँधी सरकार ने वर्ष-1980 में इन सम्मानों को पुनः प्रारंभ कर दिया, जिसे न्यायपालिका में चुनौती दी गयी। न्यायपालिका ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा. कि उपाधियों और पुरस्कारों में अंतर होता है। भारत रत्न जैसे पुरस्कार सामंतवादी उपाधियाँ नहीं हैं। न्यायालय के अनुसार, 'समानता का यह अभिप्राय नहीं है, कि विशिष्टता या गुणवत्ता का सम्मान न किया जाय।'
स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद-19)
स्वतंत्रता, मानव जीवन की वे दशाएँ हैं, जिनसे मनुष्य अपना स्वाभाविक विकास करता है। बोलने, भ्रमण करने, सम्मेलन करने, समुदाय बनाने की स्वतंत्रता के अभाव में मानव, मानव न रहकर पशुवत जीवन के करीब पहुँच जायेगा। राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान हमारी जनता ने इन अधिकारों हेतु लंबा संघर्ष किया। फलतः भारतीय संविधान के इस अनुच्छेद में स्वतंत्रता की व्यवस्था की गयी है। यह अधिकार, मौलिक अधिकारों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है तथा अनुच्छेद-21 में वर्णित जीवन के अधिकार का अंग है। अर्थात् जीवन के अधिकार का तात्पर्य, 'जीवन जीना ही नहीं, बल्कि अनुच्छेद-19 में वर्णित स्वतंत्रताओं का उपभोग करते हुए जीवन जीना है।' मूल संविधान में इस अनुच्छेद के तहत सात स्वतंत्रताएँ प्रदान की गयी हैँ। परंतु 44वें संविधान संशोधन के तहत अनुच्छेद-19(1)(च) को समाप्त कर दिया गया, जिसमें संपत्तियों के धारण करने की व्यवस्था थी।
भाषण व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद-19(1)(A)-
बोलने की आजादी, लोकतंत्र का अपरिहार्य लक्षण है तथा मानवता का महत्वपूर्ण गुण है। भाषण तथा अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ है, कि कोई भी नागरिक किसी भी तरीके से अपने विचारों की अभिव्यक्ति दे सकता है। वह चाहे बोले, लिखे, पत्र छपवाये या चुप रहे। इसमें से कुछ भी करे, यह उसकी आजादी है। न्यायालय ने इस अनुच्छेद की उदार व्याख्या की, जिसमें निम्नलिखित बातें निहित हैं
(i) प्रेस की स्वतंत्रता
भारतीय संविधान में प्रेस के लिए कोई अलग से प्रावधान नहीं है, बल्कि यह अनुच्छेद-19(1) में ही निहित है। प्रेस की स्वतंत्रता से तात्पर्य, किसी भी समाचार को छापने, प्रसारित करने तथा किसी घटना के संदर्भ में दृष्टिकोण व्यक्त करने से है। डिजिटल तथा प्रिंटिंग दोनों माध्यमों को प्रेस की स्वतंत्रता में सम्मिलित किया जाता है।
(ii) चुप रहने का अधिकार
अभिव्यक्ति के अधिकार में चुप रहने का अधिकार भी सम्मिलित है, किसी नागरिक को जबरन बोलने हेतु मजबूर नहीं किया जा सकता।
(iii) राष्ट्र ध्वज फहराने का अधिकार
अनुच्छेद-19(1)(क) के तहत सभी नागरिकों को अपने घर एवं कार्यालय में राष्ट्रध्वज फहराने का अधिकार है।
(iv) सूचना का अधिकार
अभिव्यक्ति की आजादी को व्यापकता प्रदान करते हुए इंडियन एक्सप्रेस वाद में न्यायालय ने यह कहा, कि नागरिकों को यह अधिकार है, कि वे सरकार तथा सरकारी कार्यवाही से संबंधित तथ्यों की जानकारी प्राप्त करें। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण लक्षण है, परंतु सूचना के अधिकार को सुरक्षा एवं लोकहित आदि बंधनों के अधीन किया जा सकता है।
(v) मतदाताओं को अपने उम्मीदवारों के बारे में जानने का अधिकार
न्यायालय ने निर्धारित किया है, कि प्रत्येक मतदाता को अपने उम्मीदवारों की संपत्ति, आपराधिक मामलों तथा अन्य जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है। इस हेतु प्रत्येक उम्मीदवार नामांकन के समय पाँच सूचनाओं को फॉर्म में भरता है-चल-अचल संपत्ति, सरकारी देनदारी का ब्यौरा, उम्मीदवार का आपराधिक रिकॉर्ड, उम्मीदवार की शैक्षिक योग्यता एवं सजायाफ्ता जीवन के बारे में जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर निर्बंधन अनुच्छेद-19(2) के तहत अभिव्यक्ति की आजादी अनुच्छेद-19(1)(क) पर निर्बंधन लगाया जा सकता है। अनुच्छेद-19(2) के अनुसार, राज्य सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोकव्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय की अवमानना, मानहानि, अपराध उद्दीपन, भारत की संप्रभुता एवं अखण्डता के आधार पर अभिव्यक्ति की आजादी को प्रतिबंधित किया जा सकता है।
शांतिपूर्ण एवं बिना हथियार के सम्मेलन का अधिकार (अनुच्छेद-19(1)(B)
सभी नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से सम्मेलन करने का अधिकार प्राप्त है, जो बिना हथियार के हों। नागरिक जुलूस या प्रदर्शन एवं सभा भी कर सकते हैं।
प्रतिबंध-अनुच्छेद-19(1)(ख) पर अनुच्छेद-19(3) के तहत लोकव्यवस्था, भारत की संप्रभुता एवं अखण्डता के आधार पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
समुदाय या संघ बनाने की स्वतंत्रता (अनुच्छेद-19(1)(C)-
समस्त भारतीय नागरिकों को समुदाय या संघ बनाने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इस अधिकार के बिना लोकतांत्रिक प्रक्रिया ठप हो जायेगी। इसी अनुच्छेद के तहत दलों, मजदूर संगठनों द्वारा दबाव समूहों का निर्माण किया जाता है। 97वें संविधान संशोधन, 2011 के तहत सहकारी समिति का निर्माण भी समुदाय निर्माण की स्वतंत्रता में सम्मिलित हो गया है। प्रतिबंध-अनुच्छेद-19(4) के तहत समुदाय या संघ बनाने की स्वतंत्रता के ऊपर लोकव्यवस्था, सदाचार, भारत की प्रभुता एवं अखण्डता के आधार पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
अबाध भ्रमण की स्वतंत्रता (अनुच्छेद-19(1)(D)-
भारत में सभी नागरिकों को भारतीय क्षेत्र में कहीं भी बिना रोक-टोक भ्रमण करने का अधिकार प्राप्त है। कोई राज्य अन्य राज्यों के निवासियों को आने-जाने से रोक नहीं सकता है। अतः यह अनुच्छेद क्षेत्रवाद की प्रवृत्तियों के विरोध में है। प्रतिबंध-अनुच्छेद-19(5) में भ्रमण करने के अधिकार पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। प्रतिबंध का आधार, अनुसूचित जनजाति के हितों का संरक्षण है।
निवास करने और बस जाने की स्वतंत्रता (अनुच्छेद-19(1)(E))-
किसी भी भारतीय नागरिक को भारतीय क्षेत्र के किसी भी भाग में निवास करने एवं बसने की आजादी है, कहीं भी बसने के लिए किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती है। बसने या निवास करने की आजादी, बिना रोक-टोक यात्रा करने की आजादी का पूरक है। प्रतिबंध-अनुच्छेद-19(5) के तहत निवास करने या बस जाने की आजादी पर प्रतिबंध लगाया गया है। यह प्रतिबंध उन्हीं आधारों पर है, जो अबाध संचरण के लिए है अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण एवं सार्वजनिक हितों के लिए प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
संपत्ति का अधिकार अनुच्छेद-19(1)(F)-
इसमें मूल रूप में संपत्ति के अर्जन एवं व्यय का अधिकार था। इस अनुच्छेद को 44वें संविधान संशोधन, 1978 के तहत समाप्त कर दिया गया है। इसमें नागरिकों को संपत्ति का अधिकार दिया गया था। अब यह अधिकार अनुच्छेद-300(क) में सम्मिलित किया गया है, जो एक वैधानिक अधिकार है, न कि मूल अधिकार।
कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार (अनुच्छेद-19(1)(G))
यह अधिकार भारत के प्रत्येक नागरिक को अपनी इच्छानुसार व्यवसाय करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इस अनुच्छेद में वृत्ति (Profession), उपजीविका (Occupation), व्यापार (Trade) तथा कारोबार (Business) जैसे शब्दों से व्यवसाय की व्याख्या की गई है। सार रूप में यह अनुच्छेद मनचाहे व्यवसाय की आजादी देता है। प्रतिबंध-अनुच्छेद-19(6) व्यवसाय के अधिकार पर प्रतिबंध लगाता है। किसी भी व्यवसाय के लिए न्यूनतम तकनीकी अर्हता का निर्धारण किया जा सकता है और राज्य के द्वारा किसी भी व्यवसाय, व्यापार उद्योग को पूर्णतः अथवा आंशिक रूप में व्यक्ति को व्यवसाय में सम्मिलित होने से प्रतिबंधित कर सकता है।
युक्तियुक्त या तार्किक निर्बंधन-
अनुच्छेद-19(1) में वर्णित स्वतंत्रताएँ निरपेक्ष नहीं हैं, बल्कि युक्तियुक्त (तार्किक) प्रतिबंधों के अधीन हैं, जो अनुच्छेद-19(2) से 19(6) तक वर्णित हैं। युक्तियुक्त निर्बंधन समाज, राष्ट्र तथा जनता के हित में ऐसे प्रतिबंध हैं, जो राज्य द्वारा स्वतंत्रता पर आरोपित किया जाता है। न्यायालय का मानना है, कि ये प्रतिबंध मनमाना नहीं होना चाहिए तथा न्यायालय इन प्रतिबंधों की जाँच कर सकता है। न्यायालय ने इन प्रतिबंधों हेतु आधारभूत सिद्धांत दिया है, जो इस प्रकार है
(i) युक्तियुक्तता निश्चित नहीं है, वरन् प्रत्येक स्वतंत्रता के संबंध में अलग-अलग हो सकती है।
(ii) युक्तियुक्तता की जाँच न्यायालय करता है, यह न्यायिक पुनरावलोकन अधिकारों के अधीन है।
(iii) वहीं युक्तियुक्त निर्बंधन आरोपित किये जा सकते हैं, जो अनुच्छेद-19(2) से (6) तक संविधान में वर्णित हैं।
(iv) निर्बंधन की मात्रा न्यूनतम तथा उतनी होनी चाहिए, जितनी आवश्यकता है।
(v) निर्बंधन प्रक्रिया तथा उद्देश्य दोनों दृष्टिकोणों से सही होना चाहिए।
आपातकाल का अनुच्छेद-19 पर प्रभाव-
राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद-352) के अनुसार, 'बाह्य आक्रमण, युद्ध, सशस्त्र विद्रोह के आधार पर आपातकाल लगाया जाता है, जिसका स्वतंत्रता पर प्रभाव पड़ता है। आपात की घोषणा के उपरांत अनुच्छेद-358 के अंतर्गत स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद-19) स्वतः समाप्त हो जाता है। अतः राष्ट्रपति की घोषणा की आवश्यकता नहीं होती है तथा अनुच्छेद-359 के अंतर्गत स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद-19) अपने आप समाप्त नहीं होता, बल्कि राष्ट्रपति की घोषणा के अनुसार समाप्त होता है।
अपराधों के लिए दोष सिद्धि में संरक्षण का अधिकार (अनुच्छेद-20)
भारतीय संविधान के मूल अधिकारों वाले भाग में किसी अपराध में बंदी व्यक्ति के लिए भी मूल अधिकारों का प्रावधान है। इस अनुच्छेद के तहत सभी व्यक्ति को तीन प्रकार के मूल अधिकार प्रदान किए गए हैं-
1.आपराधिक विधियों को भूतलक्षी प्रभाव से संरक्षण।
2. एक सजा के लिए एक बार से अधिक दण्ड से संरक्षण।
3. अपने विरुद्ध गवाही देने हेतु बाध्य किए जाने से संरक्षण।
भूतलक्षी दांडिक विधियों से संरक्षण (अनुच्छेद-20(1)-
भूतलक्षी विधि से तात्पर्य, ऐसी विधियों से है, जिन्हें निर्माण की तारीख से पहले लागू कर दिया जाता है। जैसे संसद ने वर्ष 2013 में कोई विधि पास किया और उसे वर्ष-2005 में संपन्न कार्यों या विवादों हेतु भी लागू कर दिया, परंतु इस अनुच्छेद के अनुसार, राज्य किसी व्यक्ति को अपराधी पाये जाने पर उतना ही दण्ड दे सकता है जितना कि अपराध करते समय लागू विधि में वर्णित है, उससे अधिक नहीं। तात्पर्य यह है, कि राज्य अपराध से संबंधित विधियों को भूतलक्षी प्रभाव वाला नहीं बना सकता अर्थात् ऐसी कोई आपराधिक विधि नहीं बन सकती, जो पूर्व में किये गये अपराधों के दण्ड को बढ़ाये। जबकि राज्य सिविल कानूनों को भूतलक्षी प्रभाव दे सकता है अर्थात् संपत्ति विवादों जैसे-सिविल कानूनों को पिछली तारीखों से लागू किया जा सकता है|
दोहरे दण्ड से संरक्षण (अनुच्छेद-20(2)-
दोहरे दण्ड, शब्द अमेरिकी संविधान में वर्णित है। दोहरे दण्ड का आशय, केवल न्यायपालिका द्वारा दिये गये दण्ड से है, प्रशासनिक दण्ड से नहीं। अतः किसी व्यक्ति को न्यायिक और प्रशासनिक दोनों दण्ड दिया जाय, तो यह दोहरे दण्ड का उदाहरण नहीं होगा, अपितु एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक न्यायिक दण्ड नहीं दिया जाय।
यहाँ यह बिंदु ध्यान देने योग्य है, कि दोहरे दण्ड का आशय, न्यायिक दण्ड के प्रति है, यानि एक व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजित और दण्डित नहीं किया जा सकता। यह प्रावधान गैर-न्यायिक दण्ड के लिए लागू नहीं होता। इसलिए किसी सरकारी सेवक को विभागीय कार्यवाही द्वारा भी दण्डित किया जा सकता है एवं न्यायपालिका द्वारा भी।
अपने विरुद्ध गवाही देने से संरक्षण (अनुच्छेद-20(3)-
इस अनुच्छेद के अनुसार, किसी व्यक्ति को किसी आपराधिक मामले में स्वयं अपने विरुद्ध गवाही देने हेतु बाध्य नहीं किया जायेगा। अर्थात् किसी भी व्यक्ति को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित कर अपराध कबूलने पर मजबूर नहीं किया जायेगा, परंतु व्यक्ति स्वेच्छा से अपने विरुद्ध गवाही दे सकता है। इसी के साथ किसी भी अभियुक्त को अपने विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए बाध्य नहीं किया जायेगा, लेकिन ऐसे अभियुक्त के विरुद्ध पाये गये शारीरिक निशान या चिकित्सीय परीक्षा (Medical Test) उसके विरुद्ध साक्ष्य माना जायेगा। अतः एक लोकतांत्रिक देश में कोई भी व्यक्ति तब तक निरअपराधी है, जब तक उसे न्यायपालिका द्वारा दण्डित नहीं किया जाय।
हाल में ही न्यायालय ने इस अनुच्छेद की नई व्याख्या दी है, अब किसी भी व्यक्ति को अपराध परीक्षण हेतु नॉर्को, पॉलीग्राफ, ब्रेन मैपिंग, फिंगर प्रिंटिंग जैसे मामलों को अपनाने हेतु बाध्य नहीं किया जायेगा। क्योंकि इन विधियों में व्यक्ति स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख सकता, जिसे मजबूरन गवाही दिलवाना माना जायेगा। न्यायपालिका ने दस्तागीर बनाम् मद्रास वाद में स्पष्ट कहा, कि 'किसी व्यक्ति को अपने विरुद्ध साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए बाध्य नहीं किया जायेगा।'
जीवन का अधिकार ( अनुच्छेद-21)
आत्म संरक्षण, मनुष्य का सबसे प्राथमिक उद्देश्य होता है। इंग्लैण्ड के मैग्नाकार्टा में भी यह स्पष्ट रूप में वर्णित है, कि किसी व्यक्ति को देश की विधि के अनुसार ही गिरफ्तार या निर्वासित किया जायेगा। संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद-21 के तहत प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण का प्रावधान किया है, जिसमें यह स्पष्ट वर्णित है, कि किसी भी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है। इसका सामान्यतः यह अर्थ है, कि कार्यपालिका या सरकार किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता में तभी हस्तक्षेप करेगी, जब उसने देश में स्थापित किसी विधि का उल्लंघन किया हो।
जीवन के अधिकार पर न्यायिक बहस
न्यायपालिका ने अनुच्छेद-21 में वर्णित अधिकारों की व्याख्या में परिवर्तन किया है, क्योंकि 'गोपालन वाद' में न्यायपालिका ने स्पष्ट रूप में स्वीकार किया, कि यदि विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन किया जा रहा है, तो न्यायालय को यह शक्ति नहीं है, कि वह संसद की विधि को अविधिमान्य करे। वस्तुतः ब्रिटेन में भी संसद द्वारा निर्मित विधि का किसी भी प्रकार से न्यायिक पुनरावलोकन नहीं होता। अतः गोपालन वाद में न्यायपालिका ने यह स्पष्ट रूप में माना, कि उसका कार्य विधि के औचित्य का परीक्षण करना नहीं है। इसलिए संविधान निर्माता भी विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का प्रावधान स्थापित कर रहे थे। विस्तृत विवरण इस प्रकार है|
गोपालन वाद (विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का प्रयोग)
गोपालन वाद में न्यायपालिका ने कहा, कि 'उसका कार्य विधि का अर्थ स्पष्ट करना है. न कि विधि के औचित्य का परीक्षण करना है।'गोपालन वाद में न्यायपालिका ने स्पष्ट कहा, कि 'विधि के निर्माण का अधिकार विधायिका को है।' न्यायपालिका के अनुसार, 'जीवन के अधिकार (अनुच्छेद-21) के अंतर्गत प्राप्त जीवन का अधिकार कार्यपालिका के विरुद्ध है, विधायिका के विरुद्ध नहीं।' न्यायपालिका ने स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद-19) एवं (अनुच्छेद-21) को अलग-अलग माना।
हैवियस कॉर्पस वाद में न्यायपालिका ने आपातकाल में व्यक्ति के जीवन के अधिकार की रक्षा करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की। क्योंकि न्यायपालिका के अनुसार, विधायिका को विधि निर्माण करने का अधिकार प्राप्त है। अतः न्यायपालिका ने विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन किया। लेकिन 'मेनका गाँधीवाद' में न्यायपालिका ने 'गोपालन वाद' के निर्णय में परिवर्तन कर दिया। न्यायपालिका ने अमेरिका की विधि की उचित प्रक्रिया का अनुगमन किया। मेनका वाद में राज्य द्वारा बनायी गई कोई भी विधि, जिससे व्यक्ति की दैहिक स्वतंत्रता समाप्त होती है, मनमानी और अयुक्तियुक्त नहीं होनी चाहिए।
मेनका गाँधी केस-1978 (विधि की उचित प्रक्रिया का प्रयोग)
न्यायपालिका ने इस वाद में विधि की उचित प्रक्रिया की संकल्पना का प्रयोग किया तथा न्यायपालिका ने इस वाद में प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत भी प्रतिपादित किया। सात, न्यायाधीशों की बेंच ने पहले के गोपालन वाद के निर्णय को परिवर्तित करते हुए कहा, कि विधायिका द्वारा निर्मित विधि तार्किक, उचित एवं औचित्यपूर्ण होनी चाहिए, न कि मनमानी और भेदभावपूर्ण होनी चाहिए। गोपालन वाद में दिये गये अपने निर्णय को पलटते हुए न्यायपालिका ने कहा, कि 'जीवन का अधिकार (अनुच्छेद-21) एवं स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद-19) आपस में अंतर्संबंधित हैं। इसलिए जीवन के अधिकार में विशिष्ट स्वतंत्रताओं का अधिकार स्वाभाविक रूप में सम्मिलित हो जाता है।' न्यायपालिका ने यह भी कहा, कि 'जीवन के अधिकार का आशय, गरिमामय जीवन का अधिकार है।'
दूसरे शब्दों में, न्यायपालिका ने यहाँ विधि के औचित्य का परीक्षण किया और नैसर्गिक या प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों का पालन किया। न्यायपालिका के अनुसार, जीवन के ऐसे अधिकार का महत्व नहीं होगा, जिसमें व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अबाध रूप में संचरण से वंचित किया जाय। इसलिए 'जीवन के अधिकार का आशय, गरिमामय जीवन से है, पशुवत जीवन से नहीं।
न्यायपालिका के अनुसार, निम्नलिखित बातें जीवन के अधिकार में अंतर्निहित हैं-
1. न्यूनतम आजीविका का अधिकार।
2. स्वास्थ्य का अधिकार।
3. निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा का अधिकार।
4. स्वच्छ पर्यावरण (जल, हवा आदि) का अधिकार।
5. त्वरित सुनवाई का अधिकार|
6. एकांतता का अधिकार।
7. कार्यस्थल पर महिलाओं के उत्पीड़न से बचाव पाने का अधिकार।
8. भोजन का अधिकार।
9. आश्रय का अधिकार।
10. बिजली का अधिकार।
शिक्षा का अधिकार-
इस समय राज्य या केन्द्र सरकार के द्वारा निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा को 86वें संविधान संशोधन के द्वारा मूल अधिकारों के भाग में अनुच्छेद-21(A) में सम्मिलित कर लिया गया है। मूल संविधान में शिक्षा के अधिकार को नीति निदेशक तत्वों में सम्मिलित किया गया था, परंतु अब यह मौलिक अधिकारों का भाग है। अतः भारत में 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है। यह राज्य का दायित्व है, कि वह प्रत्येक बच्चों को शिक्षा उपलब्ध करवाए। वर्ष-2009 में 'निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम, 2009' पारित किया गया और यह एक वास्तविक अधिकार बन गया।
कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण (अनुच्छेद-22)
इस अनुच्छेद द्वारा नागरिकों को मनमानी गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान की गई है। निरोध का तात्पर्य, गिरफ्तारी से है। भारतीय संविधान में दो प्रकार के निरोध का उल्लेख है-
(i) दण्डात्मक निरोध।
(ii) निवारक निरोध।
(i) दण्डात्मक निरोध-
भारतीय संविधान में अनुच्छेद-22(1),(2) में स्पष्ट रूप में वर्णित है, कि किसी भी व्यक्ति को मनमाने रूप में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता एवं किसी भी व्यक्ति को मनमाने रूप में बंदी नहीं बनाया जा सकता। बंदी बनाए गए व्यक्ति को बंदी बनाए जाने के कारणों की सूचना दी जाएगी और उसे वकील से परामर्श करने का अधिकार होगा तथा उसे 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, जिसमें यात्रा का समय शामिल नहीं होगा।
(ii) निवारक निरोध-
इसका अभिप्राय किसी व्यक्ति को किसी अभियोग के लिए दण्ड देना नहीं, बल्कि उसे अपराध करने से रोकना है। संक्षेप में यह एक सचेत करने का उपकरण है। यह शासन के हाथ में एक ऐसा यंत्र है, जिससे अपराध की आशंका मात्र पर ही व्यक्ति को अदालती जाँच के बिना बंदी अथवा नजरबंद रखा जा सकता है। संविधान के अनुसार, इस प्रकार की निवारक निरोध की व्यवस्था सामान्य एवं संकटकाल दोनों में ही की जा सकती है।
नजरबंद व्यक्तियों को प्राप्त अधिकार
अनुच्छेद-22 के दूसरे भाग में, निवारक निरोध में बंदी बनाये गये व्यक्तियों के लिए अधिकारों का प्रावधान है। अतः यह भारतीय संविधान की विशेषता है, कि निवारक निरोध में बंदी बनाये गये व्यक्तियों को भी निवारक निरोध के आधार बताये जायेंगे और इसके विरुद्ध आवेदन के लिए उनको अधिकार दिया गया है। निवारक निरोध में बंदी व्यक्तियों के लिए मूल अधिकार के रूप में अनुच्छेद-22(4) से 22(7) तक प्रदान किया है, जिसके अंतर्गत वे भी अपने निवारक निरोध का कारण जान सकेंगे और वे अपनी सहायता के लिए वकील भी कर सकते हैं। किसी भी व्यक्ति को यदि तीन माह से अधिक निवारक निरोध के तहत बंदी रखना है, तो उसके लिए उसे एक बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत करना होगा, जिसका अध्यक्ष हाईकोर्ट के न्यायाधीश स्तर का व्यक्ति होगा। इसकी अनुमति के बाद ही व्यक्ति को तीन महीने से ज्यादा नजरबंद रखा जा सकता है। निवारक नजरबंदी में रखे गए व्यक्तियों को नजरबंदी का कारण नहीं बताया जाएगा यदि यह सार्वजनिक हितों के विरुद्ध हो। संसद को नजरबंदी की ऐसी विधि के निर्माण का अधिकार जिसमें व्यक्तियों को तीन महीने से ज्यादा नजरबंद रखा जा सकता है।
नजरबंदी के आधार-
निवारक नजरबंदी बनाने का आधार है-राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था, समुदाय की आवश्यक सेवाओं की पूर्ति को बनाये रखना, रक्षा, विदेश संबंधी अथवा भारत की सुरक्षा से संबंधित आधारों पर किसी भी व्यक्ति को निवारक नजरबंदी में लिया जा सकता है। निवारक निरोध के संबंध में कानून बनाने की शक्ति संसद और राज्य विधान सभाओं दोनों को है।
संविधान सभा में इस बिंदु पर अत्यधिक विवाद हुआ, कि क्या निवारक निरोध जैसे प्रावधानों का उल्लेख मूल अधिकारों के भाग में तार्किक है। यदि तत्कालीन परिस्थितियों की ओर ध्यान दिया जाय, तब विध्वंसकारी तत्वों से नवजात गणतंत्र को बचाने के लिए राज्य को यह शक्ति प्रदान करना आवश्यक था। इसके लिए किन्हीं अन्य देशों से तुलना करना तार्किक नहीं है, क्योंकि प्रत्येक देश की परिस्थितियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं। अतः निवारक निरोध, संविधान में एक अनिवार्य दुर्गुण के रूप में है। समकालीन समय में जहाँ राज्य की आंतरिक सुरक्षा को अलगाववादी व आतंकवादी तत्वों से खतरा है, इस विधि की प्रासंगिकता आज भी है|
संघ सरकार द्वारा बनाये गये निवारक नजरबंदी के कानून-
निवारक निरोध से संबंधित पहला कानून बंगाल में 'बंगाल अधिनियम, 1818' के नाम से बनाया गया, उसके बाद वर्ष-1939 में भारतीय रक्षा अधिनियम बनाया गया, जो वर्ष-1950 तक लागू रहा। अन्य कानून इस प्रकार हैं-
1. निवारक निरोध अधिनियम, 1950
2. आंतरिक सुरक्षा कानून, 1971
3.विदेशी मुद्रा संरक्षण एवं तस्करी निवारक अधिनियम 1974
4. राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980
5. आतंकवाद एवं विध्वंसक गतिविधि निवारक अधिनियम, 1985 (Terrorist and Disruptive Activities (Prevention) Act, (TADA)-
यह कानून वर्ष-1985 में आतंकी गतिविधियों से निपटने हेतु बनाया गया, पंजाब तथा कश्मीर में आतंकवाद से लड़ने में मदद लिया गया, परंतु दुरुपयोग के कारण वर्ष-1995 में इसे निरस्त कर दिया गया।
6. आतंकवाद निवारक अधिनियम, 2002 (Prevention of Terrorism Act, 2002 or POTA)-
यह कानून पोटा के नाम से जाना जाता है। इसे एन. डी. ए. सरकार ने वर्ष 2001 में पारित करवाया। इस अधिनियम के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को बिना आरोप-पत्र के 180 दिनों तक कारावास में रखा जा सकता था। इस कानून को वर्ष-2002 में संशोधित किया गया। वर्ष-2004 में इस कानून को यू.पी.ए. सरकार ने निरस्त कर दिया।
7. गैर-कानूनी गतिविधि निवारण संशोधन अधिनियम, 2008-
यह कानून वर्ष-1967 में पास किया गया था तथा वर्ष-2008 में आवश्यकतानुसार संशोधित किया गया। इस कानन के अंतर्गत 'पोटा' की अधिकांश उपयोगी धाराएँ सम्मिलित हैं। यह अब भी उपयोग में है।
शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद-23,24)
मानव के दुर्व्यापार और बलात्श्रम का प्रतिषेध (अनुच्छेद 23)-
जीवन के अधिकार से आशय, गरिमामय जीवन से है। भारतीय संविधान में मानव के दुर्व्यापार, बेगार और बलात्श्रम के अन्य प्रकार प्रतिबंधित हैं और इनका उल्लंघन दण्डनीय अपराध है।
मानव दुर्व्यापार का अभिप्राय, महिलाओं, बच्चों और अपंग व्यक्तियों के अनैतिक दुर्व्यापार पर प्रतिबंध लगाना है। सामंतवादी व्यवस्था में बेगार पद्धति प्रचलित थी, जहाँ व्यक्ति को कार्य करने के पश्चात् किसी भी प्रकार से पैसा नहीं दिया जाता था। लेकिन यह ध्यान देने योग्य है, कि राज्य लोक प्रयोजन या सार्वजनिक कल्याण के लिए अनिवार्य भर्ती या सेवा लागू करे, तब इसे शोषण नहीं माना जायेगा, यद्यपि इन सेवाओं में केवल धर्म, प्रजाति, जाति अथवा वर्ग या इनमें से किसी एक आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। इस अनुच्छेद को पूर्ण करने हेतु संसद द्वारा विधियाँ पारित की गई हैं, जो इस प्रकार हैं
(i) अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम, 1956
(ii) बँधुआ मजदूर श्रम व्यवस्था समाप्त एक्ट, 1976
(iii) न्यूनतम मजदूरी एक्ट, 1948
(iv) समझौता मजदूर एक्ट, 1970
(v) समान पुरस्कार एक्ट, 1976
शोषण के विरुद्ध अधिकार से संबंधित वाद-
एम. सी. मेहतावाद में उच्चतम न्यायालय ने बालश्रम के संदर्भ में महत्वपूर्ण निर्देश जारी किये और न्यायपालिका ने यह भी निर्देश दिया कि 'बालश्रम पुनर्वास कल्याण कोष' का निर्माण हो, जिसमें वह व्यक्ति 20 हजार जमा करेगा, जिसने बच्चों को काम पर लगाया था।
वह उस बच्चे के घर के वयस्क सदस्य को रोजगार प्रदान करेगा। इसके अतिरिक्त बँधुआ मुक्ति मोर्चावाद, 1997 में उच्चतम न्यायालय ने मजदूरों को उचित दर पर मजदूरी प्रदान करने के निर्देश जारी किये।
कारखानों आदि में बालकों के कार्य करने पर प्रतिबंध (अनुच्छेद-24)-
अनुच्छेद-24 में विशिष्ट रूप में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी कारखाने या खान या किसी अन्य संकटमय या खतरनाक नियोजन में नहीं लगाया जायेगा। यहाँ यह उल्लेखनीय है, कि भारत में कुछ अधिकार निरपेक्ष हैं, जिसमें अनुच्छेद-24 भी शामिल है। अत: बच्चों को किसी भी रूप में खतरनाक कार्यों में नहीं लगाया जा सकता। राज्य एवं व्यक्ति, दोनों के विरुद्ध प्राप्त है। इस अनुच्छेद को पूर्ण करने हेतु संसद द्वारा विधियाँ पारित की गई हैं, जो इस प्रकार हैं
(i) बालश्रम अधिनियम, 1986
(ii) बच्चों का रोजगार अधिनियम, 1938
(iii) कारखाना अधिनियम, 1948
(iv) खान अधिनियम, 1952
(v) व्यापारी जहाज अधिनियम, 1956
(vi) प्लानटेशन लेबर अधिनियम, 1951
(vii) मोटर ट्रान्सपोर्ट मजदूर अधिनियम, 1951
(viii) बीड़ी-सिगार कार्य अधिनियम, 1966
अनुच्छेद-25-
भारत, मूलतः एक बहुधर्मी, बहुभाषायी राष्ट्र है, राज्य के लिए सभी व्यक्तियों का महत्व समान है, चाहे वह कोई धर्मावलंबी क्यों न हो, क्योंकि धर्म, व्यक्ति की आस्था का विषय है। इसलिए राज्य का कोई धर्म नहीं होगा तथा राज्य सभी धर्मों के लिए तटस्थ होगा।
धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत भारतीय संविधान में धर्म को अंत:करण के रूप में मानने, आचरण करने एवं उसके प्रचार करने की स्वतंत्रता है।
धार्मिक स्वतंत्रता का अपवाद-
भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार निरपेक्ष नहीं है। इसे सदाचार, स्वास्थ्य और लोकव्यवस्था बनाये रखने के लिए प्रतिबंधित किया जा सकता है। राज्य के द्वारा धर्म से जुड़ी हुई आर्थिक, वित्तीय व राजनीतिक और अन्य लौकिक गतिविधियों पर नियंत्रण किया जा सकता है। भारत में सामाजिक सुधार और हिन्दू धार्मिक संस्थाओं को हिन्दू समाज के सभी वर्गों के लिए खोलने का प्रावधान किया जाएगा, जिसे धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर रोका नहीं जा सकता। भारतीय संविधान निर्माताओं ने एक ओर, अंत:करण और धर्म की स्वतंत्रता का पूर्ण समर्थन किया, तो दूसरी ओर, सामाजिक सुधार एवं लोकव्यवस्था पर भी पर्याप्त बल दिया।
धर्म परिवर्तन एवं धार्मिक स्वतंत्रता-
मूल प्रश्न उठता है, कि क्या धार्मिक स्वतंत्रता के अंतर्गत धर्म परिवर्तन भी सम्मिलित है। वस्तुतः यह विवाद तब उत्पन्न हुआ, जब मध्य प्रदेश और उड़ीसा की सरकारों ने एक विधि निर्मित करते हुए यह व्यवस्था की, कि लोभ, कपट और बल के आधार पर धर्म परिवर्तन दण्डनीय अपराध होगा। लेकिन कुछ लोगों ने इसे धर्म विशेष के प्रति विरोधी बताते हुए न्यायपालिका में चुनौती दी। ऐसे लोगों का तर्क था, कि धार्मिक प्रचार में, धार्मिक परिवर्तन का अधिकार भी सम्मिलित है। स्टेनिस्लासवाद के प्रसिद्ध निर्णय में मध्य प्रदेश और उड़ीसा सरकारों द्वारा बनायी गयी विधि को सही माना गया। न्यायपालिका ने यह स्पष्ट कहा, कि लोभ, कपट और बल के आधार पर धर्म परिवर्तन से लोकव्यवस्था क्षतिग्रस्त हो सकती है। यहाँ यह उल्लेखनीय है, कि व्यक्तिगत रूप में कोई भी व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर सकता है, लेकिन लोभ, कपट और बल का प्रयोग न किया जाय।
पंथनिरपेक्षता का अभिप्राय-
धर्म, व्यक्ति की आस्था का विषय है। राज्य का कोई धर्म नहीं है। राज्य का धार्मिक गतिविधियों से अलगाव है या राज्य धार्मिक मान्यताओं से तटस्थ है। भारत में पंथनिरपेक्षता का अभिप्राय, यह नहीं है, कि राज्य, धर्म के विरुद्ध होगा, बल्कि भारत में पंथनिरपेक्षता का वास्तविक आशय है, कि राज्य के द्वारा सभी धर्मों का समान सम्मान किया जायेगा। भारतीय संविधान में अन्य अनुच्छेदों में भी वर्णित है, कि धर्म के आधार पर व्यक्ति से कोई भेदभाव नहीं होगा।
धार्मिक गतिविधियों के प्रबंध का अधिकार (अनुच्छेद-26)-
धार्मिक कार्यों का प्रबंध भी धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में सम्मिलित है राज्य, किसी भी धर्म विशेष की अभिवृद्धि के लिए करारोपण नहीं कर सकता है, लोकव्यवस्था, सदाचार एवं स्वास्थ्य के प्रतिबंध के अंतर्गत सभी धार्मिक समुदायों या उनके वर्गों का निम्न अधिकार होगा-
(i) धार्मिक और दान के उद्देश्य के लिए संस्थाओं की स्थापना, उनको बनाये रखना।
(ii) धार्मिक कार्यों का प्रबंध करना।
(iii) चल एवं अचल संपत्ति अर्जन एवं प्राप्त करना।
(iv) संपत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन करना।
धार्मिक उद्देश्यों हेतु करारोपण पर प्रतिबंध (अनुच्छेद-27)-
इस अनुच्छेद के अनुसार, राज्य किसी धर्म विशेष को प्रोत्साहन के लिए कर नहीं लगा सकता है तथा राज्य सरकारी धन को किसी विशेष धर्म या संप्रदाय की उन्नति के लिए उपयोग नहीं करेगा। परंतु न्यायालय के अनुसार, राज्य, सभी धर्मों को समान महत्व देते हुए धार्मिक कार्यों हेतु तथा धार्मिक उत्सव के प्रबंध हेतु सरकारी धन का उपयोग कर सकते हैं।
कुछ शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा और धार्मिक उत्सव के समय उपस्थित होने से छूट (अनुच्छेद-28)-
ऐसी शिक्षण संस्थाएँ, जो पूर्णतः राज्य वित्त द्वारा पोषित हैं, उनमें धार्मिक शिक्षा पूर्णतः निषिद्ध है।
- राज्य द्वारा निर्मित और पूर्णतः वित्त से संचालित किसी भी शैक्षणिक संस्था में कोई भी धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती।
- वे शैक्षणिक संस्थाएँ, जो राज्य द्वारा अनुदान प्राप्त करती हैं और राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त हों, तो ऐसी स्थिति में धार्मिक शिक्षा छात्र की सहमति द्वारा दी जा सकती है, यदि बच्चा अल्पवयस्क है, तो बच्चों के अभिभावकों की सहमति द्वारा धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है।
- अल्पसंख्यकों की ऐसी शैक्षणिक संस्था, जो किसी ट्रस्ट द्वारा संचालित है, उनमें धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है।
अल्पसंख्यकों के अधिकार (अनुच्छेद-29, 30)
- किसी समाज में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा एवं संरक्षण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। भारतीय संविधान में भी इनके संरक्षण के लिए विशेष व्यवस्था की गयी है। भारतीय संविधान में भाषाई एवं धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यकों का निर्धारण होता है।
- मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, जैन एवं बौद्ध धर्म को मानने वाले व्यक्ति को अल्पसंख्यकों में शामिल किया गया है। भारत में अल्पसंख्यकों का निर्धारण राज्य स्तर पर होता है, अखिल भारतीय स्तर पर नहीं। क्योंकि भारत में भाषाई आधार पर ही राज्यों का निर्माण हुआ है। अल्पसंख्यकों से संबंधित निम्नलिखित अधिकार हैं-
संस्कृति व शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद-29)-
अल्पसंख्यक शब्द, संविधान में परिभाषित नहीं है, लेकिन अनुच्छेद-29 में भारतीय नागरिकों के किन्हीं वर्गों को भाषा, विधि और संस्कृति का अधिकार प्रदान किया गया है। राज्य, उन पर अन्य भाषा, लिपि या संस्कृति नहीं थोपेगा। राज्य द्वारा वित्त प्राप्त शिक्षण संस्थाओं में भाषा, प्रजाति एवं धर्म इत्यादि के आधार पर किसी भी व्यक्ति को प्रवेश से वंचित नहीं किया जायेगा। अतः अल्पसंख्यकों के अधिकार वस्तुतः समूहों के अधिकार हैं। यह भारतीय संविधान की विशिष्टता है, कि अधिकार, व्यक्ति और समूह दोनों को प्राप्त हैं।
शिक्षण संस्थानों की स्थापना व प्रशासन का अधिकार (अनुच्छेद-30)-
अनुच्छेद-30 में स्पष्ट रूप में उल्लेखित है कि भाषायी एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपनी शैक्षिक संस्थाओं की स्थापना एवं उनके प्रबंध का अधिकार प्राप्त है। यह भी उल्लिखित है, कि राज्य द्वारा शिक्षण संस्थाओं को दिये गये अनुदान में इस आधार पर भेदभाव नहीं किया जायेगा, कि वे अल्पसंख्यकों के प्रबंध हेतु हैं।
संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद-31)
- निर्देशक तत्वों को लागू करने के लिए आरंभ से ही संपत्ति के अधिकारों को सीमित किया गया और पहले संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद-31 (A) और अनुच्छेद-31 (B) जोड़ा गया।
- अनुच्छेद-31 (A) में भूमि सुधार के संबंध में यदि राज्य के द्वारा विधि का निर्माण करके भूमि को अधिग्रहित किया जाय तो मूल अधिकारों में वर्णित अनुच्छेद-14, 19 और 31 का उल्लंघन किया जा सकता है।
- नौवीं अनुसूची (अनुच्छेद-31(B))- पहले संविधान संशोधन द्वारा नौवीं अनुसूची का निर्माण किया गया। नौवीं अनुसूची में भूमि सुधार संबंधित किसी भी मामले को सम्मिलित करके न्यायिक पुनरावलोकन से बचाया गया। इस सूची में सम्मिलित विषयों को इस आधार पर अवैध नहीं किया जा सकता, कि वे मूल अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।
- अनुच्छेद-31 (c), 25वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया। इसी संशोधन से मुआवजे (Compensation) के बजाय, राशि (Amount) शब्द का प्रयोग किया गया। इसी संशोधन के द्वारा यह भी प्रावधान किया गया. कि निर्देशक तत्वों में वर्णित अनुच्छेद-39 (b) और (c) को लागू करने के लिए मूल अधिकारों में वर्णित समानता का अधिकार (अनुच्छेद-14), स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद-19) एवं संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद-31) का उल्लंघन किया जा सकता है।
- 25वें संविधान संशोधन को न्यायपालिका में चुनौती दी गई, जिसका निर्णय केशवानंद भारती वाद (1973) में देते हुए न्यायपालिका ने कहा कि निदेशक तत्वों के अनुच्छेद-39 (b) (c) को लागू करने के लिए मूल अधिकारों के अनुच्छेद-14, 19 एवं 31 का उल्लंघन किया जा सकता है। अतः न्यायपालिका ने एक निदेशक तत्व को तीन मूल अधिकारों से प्राथमिक बना दिया।
- 44वें संविधान संशोधन के द्वारा संपत्ति के अधिकार को पूर्णतया भाग-3 से हटा दिया गया और अब भाग-12 के अनुच्छेद-300 (A) में सम्मिलित किया गया। बची हुई संपत्ति, मूल अधिकार के रूप में-
- यदि किसी किसान की भूमि सीलिंग की सीमा के अंदर है, तो यदि राज्य उसकी भूमि का अधिग्रहण करेगा, तो उसे बाजार दर पर राशि प्रदान करनी होगी। परंतु मकान के मामले में उसे राशि प्रदान करना आवश्यक नहीं है।
- यदि किसी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था की भूमि अधिग्रहित की जा रही है, तो राज्य द्वारा उसका भुगतान बाजार दर पर करना होगा।
संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद-32)
मौलिक अधिकारों का प्रावधान बिना उपचारों के खोखला है। यदि अधिकार प्रदान कर दिया जाय तथा उनके संरक्षण की व्यवस्था न हो, तो वह व्यर्थ है। इसीलिए डॉ. अंबेडकर ने "अनुच्छेद-32 को संविधान की आत्मा कहा है।" यह अधिकार अन्य अधिकारों को प्रकार्यात्मक बनाता है। मौलिक अधिकारों के हनन की स्थिति में उच्चतम न्यायालय निम्नलिखित पाँच प्रकार की रिटें जारी करता है-
1. बंदी प्रत्यक्षीकरण।
2. परमादेश।
3. अधिकार पृच्छा।
4. उत्प्रेषण।
5. प्रतिषेध।
1. बंदी प्रत्यक्षीकरण
इसका शाब्दिक अर्थ होता है, सशरीर उपस्थित होना। इस रिट के द्वारा न्यायालय व्यक्ति को सशरीर अपने सामने उपस्थित कराता है, जिससे न्यायालय उसके बंदी बनाए जाने की कारणों को जान सके। यदि बंदी रखना अवैधानिक है, तो न्यायालय उस व्यक्ति को मुक्त कर सकता है। यह रिट सरकारी अधिकारी एवं निजी लोगों, दोनों को जारी हो सकती है। निम्नलिखित मामलों के विरुद्ध बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका का प्रयोग नहीं किया जा सकता है-
(i) यदि न्यायपालिका ने आपराधिक मामले में किसी व्यक्ति को सजा दी हो।
(ii) न्यायालय की अवमानना या संसदीय विशेषाधिकार के अवमानना का व्यक्ति दोषी हो।
(iii) न्यायपालिका द्वारा अपनी अधिकारिता के बाहर बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट नहीं जारी की है।
2. परमादेश
परमादेश का शाब्दिक अर्थ है, आज्ञा देना। परमादेश के तहत ऐसे व्यक्ति को आदेश दिया जाता है, जो किसी सार्वजनिक (सरकारी) पद पर बैठा हो या उसका कोई अर्द्धसरकारी कानूनी कार्य हो तथा उसने अपने कर्तव्य पालन में ढिलाई बरती हो अथवा कार्य करने से मना कर दिया हो। यह आदेश उच्चतर न्यायालयों द्वारा निम्नतर न्यायालयों को भी दिया जा सकता है। उच्च न्यायालय, परमादेश का प्रयोग मूल अधिकारों की रक्षा के अलावा अन्य मामलों के लिए भी करते हैं। राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए परमादेश रिट का प्रयोग नहीं किया जा सकता।
3. अधिकार पृच्छा
इस रिट के अंतर्गत न्यायालय सार्वजनिक (सरकारी) पद धारण करने वाले किसी व्यक्ति के दावे की वैधता की जाँच करता है। यदि उसका दावा सही नहीं है, तो न्यायालय उसे उस पद से हटा सकता है। अधिकार पृच्छा जारी करने के लिए शर्तें-
(i) पद सार्वजनिक (सरकारी) होना चाहिए।
(ii) पद निजी नहीं होना चाहिए।
(iii) ऐसे व्यक्ति को पद पर नियुक्त करने में विधि का उल्लंघन हुआ हो।
4. उत्प्रेषण
उत्प्रेषण का अर्थ है, मँगा लेना। उच्चतम न्यायालय कोई भी मामला अपने पास मँगा सकता है। उत्प्रेषण निम्नलिखित मामलों में जारी होती है-
(i) जब किसी न्यायालय ने अपने क्षेत्राधिकार का उल्लंघन किया हो।
(ii) सामान्यतः उच्चतम न्यायालय का मानना है, कि इसका प्रयोग विशुद्ध प्रशासनिक मामलों में नहीं किया जाना चाहिए परंतु बाद में वैधानिक एवं प्रशासनिक दोनों मामलों में उत्प्रेषण रिट का प्रयोग किया जाने लगा।
(iii) उत्प्रेषण की रिट तब जारी की जाती है, जब संबंधित मामले में न्यायालय ने अपना निर्णय दे दिया हो।
(iii) अतः उत्प्रेषण की रिट निर्णय देने के बाद में जारी की जाती है।
उत्प्रेषण एवं प्रतिषेध की याचिकाएँ उच्चतर न्यायालय से निम्न/अवर न्यायालयों (Higher-Lower Court) को जारी की जाती हैं। प्रतिषेध के अंतर्गत अवर न्यायालय को किसी वाद में कार्य करने से मनाही की जाती है। जबकि यदि किसी अवर न्यायपालिका ने किसी विषय पर अपना निर्णय कर दिया हो, तो उच्चतर न्यायपालिका के द्वारा उत्प्रेषण के तहत मुकदमा मँगाया जा सकता है।
5. प्रतिषेध
इसका प्रयोग न्यायपालिका द्वारा उस समय किया जाता है, जब न्यायपालिका में मामला विचाराधीन हो। अतः ‘प्रतिषेध’ किसी वाद के पहले चरण में दिया जाता है। प्रतिषेध के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय, निचले न्यायालय के संबंधित मामले में कार्य करने से रोक देता है। ‘परमादेश’ के अंतर्गत न्यायपालिका के द्वारा कुछ कार्य करने का निर्देश दिया जाता है। जबकि प्रतिषेध के अंतर्गत कार्य करने के लिए मना किया जाता है। प्रतिषेध का प्रयोग सामान्यतः न्यायिक और अर्द्धन्यायिक निकायों के विरुद्ध किया जाता है। प्रतिषेध का प्रयोग व्यक्तियों के विरुद्ध बिल्कुल नहीं किया जाता है।
अनुच्छेद-32 के अंतर्गत केवल उच्चतम न्यायालय के द्वारा मूल अधिकारों की रक्षा का प्रावधान है। समूचे भारतीय क्षेत्र से कोई भी व्यक्ति अपने मूल अधिकारों की रक्षा के लिए सीधे उच्चतम न्यायालय में प्रवेश कर सकता है। संसद के द्वारा भारत के अन्य न्यायालयों को भी मूल अधिकारों के रक्षा की शक्ति प्रदान की जा सकती है, परंतु इससे उच्चतम न्यायालय की शक्ति प्रभावित नहीं होनी चाहिए। मूल अधिकारों की रक्षा के लिए परंपरागत प्रक्रिया के अनुसार जिस व्यक्ति के मूल अधिकारों का हनन हुआ है, वही उच्चतम न्यायालय के समक्ष जायेगा। वर्तमान समय में उच्चतम न्यायालय ने परंपरागत प्रक्रिया को परिवर्तित कर दिया है, जिसके अनुसार कोई तीसरा व्यक्ति भी समूह के मूल अधिकारों की रक्षा के लिए उच्चतम न्यायालय में प्रवेश कर सकता है।
मूल अधिकारों पर प्रतिबंध-
1. सैन्य बल, अर्द्ध-सैन्य बल एवं मूल अधिकार-
अनुच्छेद-33 के अंतर्गत संसद को यह अधिकार है, कि वह सैन्य बलों और अर्द्ध-सैनिक बलों के सदस्यों के लिए मूल अधिकार को प्रतिबंधित कर सकती है। अनुच्छेद-33 के अंतर्गत विधि निर्माण की यह शक्ति केवल संसद को प्रदान की गयी है, विधान सभाओं को नहीं। इसका मूल उद्देश्य, सैन्य बलों एवं अर्द्ध-सैन्य बलों में अनुशासन बनाए रखना है। इसके अंतर्गत संसद ने निम्नलिखित विधियों का निर्माण किया है-
(i) सेना एक्ट-1950
(ii) एयर फोर्स एक्ट-1950
(iii) नेवी एक्ट-1950
(iv) पुलिस फोर्स अधिकार परिसीमन एक्ट-1966
(v) सीमा सुरक्षा बल एक्ट-1968
अनुच्छेद 32 के अंतर्गत निर्मित संसदीय विधि, जहां तक मूल अधिकारों को लागू करने का संबंध है, कोर्ट मार्शल (सैन्य विधि के अंतर्गत स्थापित अधिकरण) को उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के रिट क्षेत्राधिकार से अपवर्जित करती है।
2. सैन्य अधिनियम एवं मूल अधिकार-
अनुच्छेद-34 के अंतर्गत भारत के किसी भी क्षेत्र में यदि सैन्य एक्ट लागू है, तो संसद को यह शक्ति है, कि मूल अधिकारों पर प्रतिबंध आरोपित किये जा सकते हैं। संसद, विधि के द्वारा सरकारी कर्मचारियों द्वारा किये गये कार्यों और उनके द्वारा पारित नियमों को वैध ठहरा सकती है। यह उल्लेखनीय है, कि सैन्य अधिनियम का प्रावधान आपातकाल के प्रावधान से बिल्कुल अलग है। आपातकाल युद्ध, बाह्य आक्रमण तथा सशस्त्र संघर्ष के द्वारा यदि भारत की सुरक्षा अथवा किसी भाग की सुरक्षा खतरे में है, तब आपातकाल का प्रयोग किया जाता है।
अनुच्छेद-35-
भारतीय संविधान के भाग-3 में वर्णित मूल अधिकारों में दो प्रकार के अधिकार वर्णित हैं- वे अधिकार, जो संविधान लागू होने के बाद स्वाभाविक रूप में लागू हो जाते हैं। जबकि कुछ मूल अधिकारों को लागू करने के लिए संसदीय विधि के निर्माण की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, छुआछूत एक दंडनीय अपराध है, जिसका उल्लेख अनुच्छेद-17 में किया गया है। इसे लागू करने के लिए संसदीय विधि के निर्माण की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त शोषण के विरुद्ध अधिकार को लागू करने के लिए संसद के द्वारा विधि का निर्माण किया गया है। संसद को यह शक्ति अनुच्छेद-35 से प्राप्त होती है।