-        किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र के निर्माण में मौलिक अधिकार तथा नीति निदेशक तत्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। राज्य के नीति निदेशक तत्व जनतांत्रिक संवैधानिक विकास के नवीनतम तत्व हैं। सबसे पहले ये आयरलैंड के संविधान में लागू किये गये थे। ये वे तत्व हैं जो संविधान के विकास के साथ ही विकसित हुए है। इन तत्वों का कार्य एक जनकल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है।

-        भारतीय संविधान में निदेशक तत्वों का अध्याय (भाग-iv) में वर्णित है। भाग-iv में 42वें संविधान संशोधन के द्वारा अन्य निदेशक तत्वों को भी जोड़ा गया जिसमें-

         (i) निःशुल्क वैधानिक सहायता एवं न्याय का सभी को समान अवसर प्रदान करना।

         (ii) बच्चों के स्वास्थ्य विकास के लिए अवसरों को सुरक्षित करना।

         (iii) उद्योगों के प्रबंध में कर्मचारियों या कर्मकारों की सहभागिता।

         (iv) पर्यावरण की रक्षा और इसका उत्थान तथा वन एवं वन्यजीवों की रक्षा।

निदेशक तत्वों को निम्नलिखित रूपों में भी व्यक्त किया

जा सकता है-

1. राज्य के आदर्श।

2. राज्य की नीतियों के लिए निर्देश।

3. नागरिकों के अवादयोग्य अधिकार।

-        अनुच्छेद 36- परिभाषा- इस भाग में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, “राज्य” का वही अर्थ है जो भाग 3 में है।

-        अनुच्छेद 37- इस भाग में अंतर्विष्ट तत्त्वों का लागू होना- इस भाग में अंतर्विष्ट उपबंध किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होंगे किंतु फिर भी इनमें अधिकथित तत्त्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्त्वों को लागू करना राज्य का कर्त्तव्य होगा।

-        अनुच्छेद 38- राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा-

         [(1)] राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था की, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करे भरसक प्रभावी रूप में स्थापना और संरक्षण करके लोक कल्याण की अभिवृद्धि का प्रयास करेगा।

         [(2)] राज्य, विशिष्टतया, आय की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा और न केवल व्यष्टियों के बीच बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले और विभिन्न व्यवसायों में लगे हुए लोगों के समूहों के बीच भी प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानता समाप्त करने का प्रयास करेगा।

         अनुच्छेद 39- राज्य द्वारा अनुसरणीय कुछ नीति तत्त्व-

         राज्य अपनी नीति का, विशिष्टतया, इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रूप से-

         (क) पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो।

         (ख) समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बँटा हो जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूप से साधन हो।

         (ग) आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन-साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संक्रेंद्रण न हो।

         (घ) पुरुषों और स्त्रियों दोनों का समान कार्य के लिए समान वेतन हो।

(ङ) पुरुष और स्त्री कर्मकारों के स्वास्थ्य और शक्ति का तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो और आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर नागरिकों को ऐसे रोजगारों में न जाना पड़े जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल न हों।

         (च) बालकों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाएँ दी जाएं और बालकों और अल्पवय व्यक्तियों की शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाए।

         अनुच्छेद 39क-  समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता-

         राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधिक तंत्र इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो और वह, विशिष्टतया, यह सुनिश्चित करने के लिए कि आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए, उपयुक्त विधान या स्कीम द्वारा या किसी अन्य रीति से निःशुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करेगा।

         अनुच्छेद 40- ग्राम पंचायतों का संगठन-

         राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिए कदम उठाएगा और उनको ऐसी शक्तियां और प्राधिकार प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हों।

         अनुच्छेद 41- कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार-

         राज्य अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के भीतर काम पाने के, शिक्षा पाने के और बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी और निःशक्तता तथा अन्य अनर्ह अभाव की दशाओं में लोक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त कराने का प्रभावी उपबंध करेगा।

         अनुच्छेद 42- काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता का उपबंध-

         राज्य काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करने के लिए और प्रसूति सहायता के लिए उपबंध करेगा।

-        अनुच्छेद 43- कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी आदि-

         राज्य, उपयुक्त विधान या आर्थिक संगठन द्वारा या किसी अन्य रीति से कृषि के, उद्योग के या अन्य प्रकार के सभी कर्मकारों को काम, निर्वाह मजदूरी, शिष्ट जीवनस्तर और अवकाश का संपूर्ण उपभोग सुनिश्चित करने वाली काम की दशाएँ तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर प्राप्त कराने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया ग्रामों में कुटीर उद्योगों को वैयक्तिक या सहकारी आधार पर बढ़ाने का प्रयास करेगा।

-        अनुच्छेद 43क- उद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों का भाग लेना-

         राज्य किसी उद्योग में लगे हुए उपक्रमों, स्थापनों या अन्य संगठनों के प्रबंध में कर्मकारों का भाग लेना सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त विधान द्वारा या किसी अन्य रीति से कदम उठाएगा।

-        अनुच्छेद 44- नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता-

         राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।

-        अनुच्छेद 45- बालकों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का उपबंध-

         राज्य, इस संविधान के प्रारंभ से दस वर्ष की अवधि के भीतर सभी बालकों को चौदह वर्ष की आयु पूरी करने तक, निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने के लिए उपबंध करने का प्रयास करेगा।

-        अनुच्छेद 46- अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि-

         राज्य, जनता के दुर्बल वर्गों के, विशिष्टतया, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से उसकी संरक्षा करेगा।

-        अनुच्छेद 47- पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार करने का राज्य का कर्त्तव्य-

         राज्य, अपने लोगों के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने और लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्त्तव्यों में मानेगा और राज्य, विशिष्टतया, मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकर औषधियों के, औषधीय प्रयोजनों से भिन्न, उपभोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करेगा ।

-        अनुच्छेद 48- कृषि और पशुपालन का संगठन-

         राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परिरक्षण और सुधार के लिए और उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा।

-        अनुच्छेद 48क- पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्धन और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा-

         राज्य, देश के पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्धन का और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा ।

-        अनुच्छेद 49- राष्ट्रीय महत्व के संस्मारकों, स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण-

         [संसद द्वारा बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन राष्ट्रीय महत्व वाले [घोषित किए गए] कलात्मक या ऐतिहासिक अभिरुचि वाले प्रत्येक संस्मारक या स्थान या वस्तु का, यथास्थिति, लुंठन, विरूपण, विनाश, अपसारण, व्ययन या निर्यात से संरक्षण करना राज्य की बाध्यता होगी ।

-        अनुच्छेद 50- कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण-

         राज्य की लोक सेवाओं में, न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने के लिए राज्य कदम उठाएगा।

-        अनुच्छेद 51- अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि--राज्य,-

         (क) अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का,

         (ख) राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखने का,

         (ग) संगठित लोगों के एक दूसरे से व्यवहारों में अंतरराष्ट्रीय विधि और संधि-बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का, और

(घ) अंतरराष्ट्रीय विवादों के मध्यस्थ द्वारा निपटारे के लिए

प्रोत्साहन देने का, प्रयास करेगा|

-        निदेशक तत्वों की प्रकृति

निदेशक तत्व, भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक न्याय प्राप्त करने का माध्यम हैं। पाणिक्कर के अनुसार, निदेशक तत्व, भारत में आर्थिक समाजवाद लाने के माध्यम हैं। डॉ. अंबेडकर ने इसे आर्थिक लोकतंत्र का पर्याय माना, जो राजनीतिक लोकतंत्र से भिन्न है। स्वतंत्र भारत में सभी व्यक्तियों को समान मताधिकार प्रदान किये गए थे। लेकिन समाज सामंतवादी, सोपानिक और विषमतामूलक था। समाज में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों, पिछड़े वर्गों, महिलाओं और बच्चों के कल्याण का विशेष उपाय किया गया।

ग्रेनविल ऑस्टिन के अनुसार, निदेशक तत्व, भारतीय संविधान के अंतर्विवेक हैं। इन्होंने भारतीय संविधान को मूलतः सामाजिक क्रांति का एक दस्तावेज माना, जिसके द्वारा एक नए समतामूलक समाज की स्थापना का लक्ष्य निर्धारित किया गया। निदेशक तत्व, मूलतः सामाजिक, आर्थिक अधिकार हैं, क्योंकि इनके द्वारा राज्य और सरकार को किन्हीं विशेष उद्देश्यों को प्राप्त करने का आदर्श प्रदान किया गया है। निदेशक तत्व, सदैव बने रहते हैं। इनका आपात काल में भी स्थगन नहीं हो सकता। निदेशक तत्व, मूलतः भारतीय समाज को, समाजवादी ढाँचे के रूप में ढालने के मूलमंत्र हैं। संविधान में अनुच्छेद-37 में स्पष्ट उल्लिखित है, कि निदेशक तत्वों को लागू करना, राज्य सरकार का मूल दायित्व है।

-        निदेशक तत्वों को कैसे लागू किया गया-

(i) निदेशक तत्वों को लागू करने के संदर्भ में भूमि सुधार किया गया। जमींदारी उन्मूलन के प्रयास किए गए। भूमिहीन लोगों को भूमि का वितरण किया गया, क्योंकि भारत जैसे, कृषि प्रधान देश में जहाँ अधिकांश लोग आजीविका के लिए भूमि पर निर्भर हैं। भूमि उनकी आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इसलिए अनुच्छेद-39(b) और 39(c) को प्रभावी रूप में लागू किया गया। जमींदारी उन्मूलन कार्यक्रम के अंतर्गत हदबंदी कानून का भी निर्माण किया गया।

(ii) अनुच्छेद-40 का उपयोग अत्यंत प्रभावी रूप में किया गया। भारत में पंचायती राज का प्रयोग वर्ष-1959 से ही आरंभ हो गया। 73वें व 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायती राज को संवैधानिक आधार भी प्रदान कर दिया गया।

(iii) भारत में कुटीर उद्योगों और लघु उद्योगों के विकास के लिए जो कि मूलतः राज्यसूची का विषय है। संघ सरकार के द्वारा विभिन्न संस्थाओं की स्थापना, वित्तीय प्रबंध और विपणन (Marketing) में राज्य सरकारों की सहायता प्रदान की जा रही है। इसी के परिणामस्वरूप अखिल भारतीय खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड का निर्माण हुआ।

(iv) वर्तमान समय में सरकार के द्वारा प्राथमिक निःशुल्क शिक्षा को अनिवार्य बना दिया गया है।

(v) अनेक राज्यों में मद्यपान निषेध कानूनों का भी निर्माण किया गया है।

(vi) अनुच्छेद-50 को लागू करने के लिए वर्ष-1975 में आपराधिक दंड संहिता के द्वारा भारत में कार्यपालिका और न्यायपालिका के मध्य पृथक्करण किया गया। इसके द्वारा न्यायिक मामलों का निर्धारण अब न्यायिक मजिस्ट्रेट के द्वारा होगा।

(vii) भारतीय सरकार द्वारा पर्यावरण को संरक्षित करने की अनेक योजनाओं एवं नीतियों का निर्माण हुआ है। बाघ संरक्षण योजना, जैव विविधता को बनाए रखना, अनेक संरक्षित क्षेत्रों का निर्माण करके वन्य जीवों की रक्षा करना।

(viii) निदेशक तत्वों को लागू करने के लिए मौलिक अधिकारों के भाग में अनेक संशोधन भी किए गए, जिसमें अनुच्छेद-1, 4, 17, 42, 44, 24, 25 अत्यधिक उल्लेखनीय हैं।

अतः उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है, कि 'निदेशक तत्व, भारतीय कल्याणकारी राज्य के मूल आधार हैं। ये केवल पुण्य आत्माओं की महत्वाकांक्षा मात्र नहीं है।'

-        आलोचना

“सर आइवर जेनिंग्स” ने निदेशक तत्वों को पुण्य आत्माओं की महत्वाकांक्षा मात्र कहा है। इनके अनुसार, 'निदेशक तत्वों में वर्णित आदर्श मूलतः फेबियन समाजवादी हैं, जिसमें समाजवाद का अभाव है। इसमें उत्पादन के साधन के न्यायपूर्ण वितरण और विनिमय का भी अभाव है जेनिंग्स के अनुसार, 'निदेशक तत्व,न्यायालयों द्वारा लागू नहीं हो सकते, जिससे संविधान के महत्व में कमी होती है, क्योंकि संविधान, देश की सर्वोच्च विधि है। इनको, केवल आदर्श के रूप में स्वीकार करना ही सही है? इनके अनुसार, यदि इसको लागू करने का प्रयास किया जाय, तो भी समस्या उत्पन्न होती है, क्योंकि सरकार के विभिन्न अंगों में संघर्ष उत्पन्न होगा। टी. टी. कृष्णमाचारी के अनुसार, 'यह भावनाओं का कूड़ेदान मात्र है।' आलोचकों के अनुसार, 'यह चुनावी घोषणा-पत्र एवं ऐसे बैंक के लिए जारी किया गया चेक है, जो दिवालिया हो चुका है।'

कुछ आलोचकों के अनुसार, निदेशक तत्व, वस्तुतः हिन्दू दर्शन की मान्यताएँ मात्र हैं