त्रिपक्षीय संघर्ष
♦ पृष्ठभूमि -
• हर्ष की मृत्यु के बाद उत्तरी भारत में पुन: राजनैतिक विकेन्द्रीकरण व विभाजन की प्रक्रिया पुन: प्रारम्भा हो गई।
• हर्ष का कोई भी उत्तराधिकारी नहीं था, अत: छोटे-छोटे क्षेत्रीय राज्यों ने अपने आप को पुन: स्वतंत्र कर लिया, जैसे –
1. असम कामरूप के शासक भास्कर वर्मा ने कर्णसुवर्ण व उसके आस-पास के क्षेत्र को जीतकर अपने स्वतंत्र राज्य की स्थापना की
2. मगध –
• हर्ष के सामंत – माधवगुपत ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया।
• माधवगुप्त की मृत्यु के बाद 650 ई. में उसका पुत्र – आदित्यसेन शासक बना।
• आदित्यसेन ने आस-पास के क्षेत्रों को जीतकर परमभट्टारक व महाराजाधिराज की उपाधी धारण की।
• इसकी संपूर्ण जानकारी मदारगिरी अभिलेख से प्राप्त होती है।
3. उत्तर पश्चिमी भागों में भी अनेक स्वतंत्र राज्य स्थापित।
• कश्मीर में कार्कोट वंश की स्थापना हुई।
♦ कन्नौज की स्थिति:-
• चीनी लेखक मात्वानलिन के अनुसार चीन के नरेश (647 ई.) ने अपना एक दूत मंडल “वंग हुवनसे” के नेतृत्व में भारत भेजा।
• जिस समय यह दूत मंडल कन्नौज पहुँचा था, उस समय हर्ष की मृत्यु हो चुकी थी तथा कन्नौज पर किसी “अर्जुन” नामक शासक का अधिकार था।
• अर्जुन ने वंग के दूतमंडल को रोका व लूटपाट की।
• वंग ने तिब्बत के शासक गम्पों के पास शरण ली।
• नेपाल के शासक “अंशुवर्मा ने भी सैनिक सहायता दी”
• तिब्बत व नेपाल की संयुक्त सेना की सहायता से वंग ने अर्जुन को पराजित कर बंदी बनाकर चीन ले गया- वहीं जेल में अर्जुन की मृत्यु हो गई।
• अगले 75 वर्ष तक कन्नौज का इतिहास अंधकारमय रहा परन्तु अंत में “यशोवर्मन” नामक शासक ने कन्नौज पर अधिकार कर राजनैतिक अराजकता को समाप्त किया।
♦ यशोवर्मन :- (725-752 ई.)
• हर्ष की मृत्यु के बाद सबसे प्रतापी शासक यशोवर्मन बना।
• इतिहासकारों के अनुसार यशोवर्मन कश्मीर के “उत्पल” वंश से संबंधित था।
नोट- कई इतिहासकारों ने यशोवर्मन का समीकरण “कश्मीर के उत्पलवंशीय शासक शंकरवर्मन” के साथ किया है।
• इसके दरबार में “वाकपति” नामक कवि ने “प्राकृत भाषा” में “गौड़वहो” नामक ग्रंथ की रचना की।
• यशोवर्मन की मृत्यु के बाद भारत की तीन महान शक्तियाँ-
1. गुर्जर प्रतिहार
2. पालवंश
3. राष्ट्रकूट
• राष्ट्रकूट ने कन्नौज पर अधिकार करने हेतू “महान संघर्ष” किया जिसे- त्रि-पक्षीय संघर्ष कहा जाता है।
• यशोवर्मन ने महान नाटककार “भवभूति” को आश्रय प्रदान किया।

कारण:-
1. प्राचीन भारत में कन्नौज राजनीति का सर्वोच्च केन्द्र बिन्दु बन गया।
2. आर्थिक कारण- यह क्षेत्र आर्थिक रूप से समृद्ध था।
• सर्वाधिक नदियाँ उत्तर-पूर्वी भारत में है।
3. कन्नौज में कमजोर शासक- यशोवर्मा की मृत्यु के बाद कन्नौज पर आयुध वंश का अधिकार था।• आयुध वंश के शासकों में- वज्रायुद्ध, चक्रायुद्ध व इन्द्रायुद्ध प्रमुख थे।
• वज्रायुद्ध की मृत्यु के बाद - पाल वंश के शासक धर्मपाल ने इन्द्रायुद्ध व चक्रायुद्ध को शासक बनाया।
4. संस्कृति का केन्द्र बिन्दू-
• कन्नौज व मथुरा की सांस्कृतिक विरासत व भव्यता का वर्णन मध्यकालीन भारत में अरब, तुर्क आक्रांताओं ने भी किया है।
• अरब आक्रांताओं के आक्रमण- 712 ई. के आसपास प्रारंभ हुए।
त्रिपक्षीय संघर्ष:-
• किन-2 के मध्य-
1. गुर्जर प्रतिहार- विजेता बने
2. पालवंश
3. राष्ट्रकुट वंश- दक्षिण भारत का प्रथम राजवंश जिसने उत्तर भारत की सक्रिय राजनीति में भाग लिया।
• प्रारंभ- आठवीं शताब्दी में प्रारंभ होकर लगभग 150 वर्ष तक यह संघर्ष चला – जिसमें गुर्जर प्रतिहार विजयी रहे।
• गुर्जर प्रतिहार शासक- मिहीरभोज ने कन्नौज पर अधिकार कर इसे अपनी राजधानी बनाया।
वत्सराज:-
• गुर्जर प्रतिहार वंश का वास्तविक संस्थापक था।
• वत्सराज ने त्रिपक्षीय संघर्ष प्रारंभ किया।
• वत्सराज ने इन्द्रायुद्ध को पराजित किया।
• वत्सराज ने पालवंश के धर्मपाल को पराजित किया।
• वत्सराज स्वयं ध्रुव प्रथम से पराजित हुआ।
संघर्ष के चरण:-
त्रि-पक्षीय संघर्ष गुर्जर प्रतिहार के शासक- वत्सराज के द्वारा प्रारंभ किया गया था।
1. प्रथम चरण:- (775-795 ई. के मध्य)
1. गुर्जर प्रतिहार (G.P)- वत्सराज (775ई. – 800ई.)
2. पाल वंश- धर्मपाल (770ई. – 810ई.)
3. राष्ट्रकूट- ध्रुव प्रथम- इस चरण में विजयी रहा था।
(779ई. – 793ई.)
Note- राष्ट्रकूट दक्षिण भारत का प्रथम राजवंश जिसने उत्तर भारत की सक्रिय राजनीति में भाग लिया।
• G.P शासक वत्सराज ने कन्नौज के आयुध वंश के शासक इन्द्रायुद्ध व पालवंश के शासक धर्मपाल को पराजित कर-उत्तरी भारत में साम्राज्य विस्तार की नीवं रखी, परन्तु राष्ट्रकूट शासक “ध्रुव I” ने वत्सराज को पराजित कर दिया था।
• ध्रुव Ist ने पालवंश के शासक- धर्मपाल को गंगा- यमुना दौआब में पराजित किया।
• इस प्रकार प्रथम चरण का विजेता- ध्रुव प्रथम रहा।
2. द्वितीय चरण:- (795-814 ई. के मध्य)
1. गुर्जर प्रतिहार (G.P)- नागभट्ट II (800ई. – 833ई.)
2. पाल वंश- धर्मपाल (770ई. – 810ई.)- मृत्यु के बाद = देवपाल (810-850 ई.)
3. राष्ट्रकूट- गोविन्द III- विजय
• इस चरण के दौरान सर्वप्रथम- नागभट्ट II ने- धर्मपाल की सेना को मुंगेर (बिहार) के समीप पराजित किया।
• धर्मपाल ने पराजित होकर- राष्ट्रकूट शासक गोविन्द III से सहायता मांगी।
• संजन ताम्रपत्र के अनुसार- गोविन्द III ने G.P शासक- नागभट्ट II को पराजित कर पुन: दक्षिण भारत लौट आया।
• 810 ई. में धर्मपाल की मृत्यु के बाद गुर्जर प्रतिहार शासक “नागभट्ट II” ने कन्नौज पर अधिकार कर इसे अपनी राजधानी बनाया।
• प्रथम G.P. शासक
Note- पालवंश के शासक धर्मपाल ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की थी जो कि वर्तमान में (बिहार- भागलपुर जिले के अचिन्तक गाँव में)
• धर्मपाल ने सोमपुरी (बंगाल) व ओदन्तपुरी (बिहार) में मठों की स्थापना करवाई।
3. तृतीय चरण:- (814 ई. से अन्त तक)
• इस चरण के दौरान नागभट्ट II की मृत्यु के बाद “रामभद्र” नामक निर्बल शासक- राजा बना।
• पाल वंश के शासक- धर्मपाल के पुत्र देवपाल ने रामभद्र को पराजित कर- कन्नौज पर पुन: अधिकार कर लिया।
• रामभद्र के बाद मिहिरभोज प्रथम शासक बने जो कि गुर्जर प्रतिहार वंश के महान राजा हुए।
• मिहिरभोज ने पालवंश के शासक- देवपाल, विग्रहपाल को पराजित किया व साथ ही राष्ट्रकुट वंश के शासक कृष्ण II को पराजित कर कन्नौज को लम्बे समय हेतु राजधानी बनाया।
• 880 ई. के आस-पास पालवंश के शासक नारायण पाल व राष्ट्रकूट शासक कृष्ण II ने मिहिरभोज को पराजित कर दिया।
• भोज Ist ने नर्मदा के तट पर कृष्ण II को पराजित कर मालवा पर अधिकार कर अपनी पराजय का बदला लिया।
Note- भोज प्रथम वैष्णव धर्म का अनुयायी था।
• वह अपने आप को भगवान विष्णु का अवतार मानता था।
• भोज ने “आदिवराह” की उपाधि धारण की जिसका उल्लेख ग्वालियर अभिलेख में (अन्य उपाधी- प्रभास)
• भोज ने चाँदी का ‘द्रम्म’ नामक सिक्का प्रचलित किया।
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गुर्जर प्रतिहार |
पाल वंश |
राष्ट्रकूट वंश |
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1. वत्सराज |
1. धर्मपाल |
1. ध्रुव प्रथम- विजयी रहा (779 ई.–793 ई.) |
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2. नागभट्ट II |
2. देवपाल (810 ई.–850 ई.) |
2. गोविन्द III- विजयी |
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3. नागभट्ट की मृत्यु |
3. विग्रहपाल (850 ई.–854ई.) |
3. अमोघवर्ष |
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4.मिहिरभोज-I (विजयी रहे) |
4. नारायणपाल (854 ई.–915 ई.) |
4. कृष्ण II |
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5.महेन्द्रपाल- विजय |
5. राज्यपाल (915 ई.–940 ई.) |
5. इन्द्र III |
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- महेन्द्रपाल के बाद केवल 2 वर्ष हेतु भोज II शासक बना |
• भोज के बाद महेन्द्रपाल व महिपाल इस संघर्ष में विजय रहे तथा गुर्जर प्रतिहारों की शक्तिशाली व्यवस्था स्थापित हुई।
• महेन्दपाल के दरबार में महान विद्वान “राजशेखर” निवास करते थे, जिन्होंने काव्यमिमांसा, कर्पूरमंजरी व हरविलास आदि ग्रन्थों की रचना की।
• 963 ई. में राष्ट्रकूट शासक- कृष्ण III ने उत्तरी भारत पर अभियान करके गुर्जर प्रतिहारों को पराजित किया- इसी से गुर्जर प्रतिहार वंश का पतन प्रारंभ हो गया।
• 1018 ई. में महमूद गजनवी ने गुर्जर प्रतिहार शासक- राज्यपाल व 1019 ई. में त्रिलोचनपाल को पराजित किया इसी के साथ (गुर्जर प्रतिहार) G.P. सत्ता का अंत हो गया।