भारत में संसदीय शासन प्रणाली अपनाने के कारण-
- भारत की सभ्यता लगभग 5,000 वर्ष पुरानी है, परंतु लोकतंत्र का प्रयोग नवीन है। ऐसे नवीन लोकतंत्र के लिए भारत को एक ऐसी शासन प्रणाली की आवश्यकता थी, जिसमें सरकार के विभिन्न अंगों में संघर्ष कम एवं सहयोग और समन्वय अधिक बना रहे। ब्रिटिश शासन के माध्यम से संसदीय शासन प्रणाली को व्यावहारिक अनुभव भी प्राप्त था।
- भारतीय शासन अधिनियम-1935 के द्वारा पहली बार भारत में लोकप्रिय राज्य सरकारों का गठन हुआ तथा उनका निर्माण संसदीय आधार पर किया गया। यह सत्य है, कि इस शासन प्रणाली में मुटठीभर लोगों की भागीदारी थी, बहुमत जनता की भागीदारी नहीं थी। संसदीय शासन प्रणाली, नित-प्रतिदिन के उत्तरदायित्व के सिद्धांत पर कार्य करती है। अत: संविधान निर्माताओं ने स्थायित्व के बजाय, उत्तरदायित्व को प्राथमिकता दी।
- भारतीय समाज, विविधतापूर्ण और बहुलतावादी है। संसदीय शासन के अंतर्गत् विविधता और बहुलता का प्रतिनिधित्व ज्यादा बेहतर ढंग से संभव है।
अध्यक्षीय बनाम् संसदीय शासन-
- वर्ष-1960 के दशक में भारत में कुछ लोगों ने अध्यक्षात्मक प्रणाली लागू करने की माँग उठायी। पूर्व लोक सभा स्पीकर तथा उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के. एस. हेगड़े ने अखिल भारतीय अधिवक्ताओं के सम्मेलन में अध्यक्षीय शासन का समर्थन किया। आर. वेंकट रमन ने भी भारत में अध्यक्षीय शासन प्रणाली का समर्थन किया। प्रसिद्ध संविधान विशेषज्ञ पालकीवाला ने अध्यक्षीय शासन प्रणाली का समर्थन करते हुए कहा, कि इससे निम्नलिखित लाभ होंगे-
1.अध्यक्षीय शासन में विशेषज्ञों को शामिल किया जा सकेगा।
2.दल-बदल और सरकार के अस्थायित्व की समस्या समाप्त हो जाएगी।
- वर्ष-1989 के पश्चात् बढ़ते गठबंधन सरकारों के युग में अध्यक्षीय शासन प्रणाली का समर्थन किया गया। पूर्व उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत ने कहा, कि भारत में लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक निर्धारित समय पर ही होने चाहिए। इस वक्तव्य के संदर्भ में आलोचकों ने कहा, कि यह मूलत: अध्यक्षीय शासन प्रणाली का ही समर्थन है, क्योंकि जब संसदीय शासन प्रणाली में सरकार का कार्यकाल निर्धारित नहीं होता, तो चुनाव की तिथि का पूर्व निर्धारण कैसे हो सकता है। संसदीय सरकार के समर्थकों ने उपरोक्त मान्यता को अस्वीकार दिया। इनके अनुसार, भारत जैसे देश के लिए संसदीय शासन प्रणाली सबसे बेहतर विकल्प है। यद्यपि वर्तमान समय में यह विवाद का मुद्दा नहीं है, कि भारत में कौन सी शासन व्यवस्था है। इसके दो प्रमुख कारण हैं-
(i) नरसिंह राव वाद में न्यायपालिका ने स्पष्ट कहा, कि संसदीय शासन, संविधान का आधारभूत ढाँचा है।
(ii) संविधान के कार्यकरण की समीक्षा पर स्थापित 'वेंकट चेलैया आयोग' ने यह स्पष्ट कहा, कि संसदीय शासन प्रणाली के अंतर्गत संविधान के कार्यकरण पर पुनर्निरीक्षण होगा।
- आयोग ने यह अवश्य माना, कि भारतीय संसदीय शासन प्रणाली में कुछ सुधार की आवश्यकता है, जो निम्नलिखित हैं-
(i) गठबंधन सरकार या त्रिशंकु लोक सभा की स्थिति में लोक सभा के द्वारा अपने नेता का चुनाव होना चाहिए तथा बाद में राष्ट्रपति उसे प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त करेगा।
(ii) सकारात्मक अविश्वास प्रस्ताव का उपयोग। (जर्मनी)
(iii) अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए सदन की कुल सदस्य संख्या के 20% सदस्यों को पहले नोटिस देना होगा।
(iv) केंद्र और राज्य सरकारों में मंत्रियों की संख्या निचले सदन की कुल सदस्य संख्या के 10% से अधिक नहीं हो सकती।
(v) आयोग ने चुनाव प्रणाली के संदर्भ में संशोधन के भी सुझाव दिए|
संसद के कार्य-
- विधायिका या संसद के द्वारा सबसे महत्वपूर्ण कार्य कैबिनेट का निर्माण करना और संसद के प्रति उत्तरदायित्व बनाए रखना है।
भारत में कैबिनेट मंत्रिमंडल, लोक सभा (निम्न सदन) के प्रति उत्तरदायी होता है, परंतु कैबिनेट के सदस्यों को राज्य सभा (उच्च सदन) से भी लिया जा सकता है।
- मंत्रिमंडलीय उत्तरदायित्व का यह तार्किक परिणाम है, कि मंत्रिपरिषद् को सत्ता में बने रहने के लिए सदन के बहुमत के समर्थन की आवश्यकता होती है।
- संसद का एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य कार्यपालिका या कैबिनेट या मंत्रिपरिषद् की आलोचना के द्वारा उसे उत्तरदायी बनाए रखना है। संसद के द्वारा कार्यपालिका या कैबिनेट की निरंकुश शक्तियों पर प्रतिबंध भी आरोपित किए जाते हैं। कार्यपालिका या कैबिनेट द्वारा निर्मित नीतियों और निर्णयों पर सदन में चर्चा होती है तथा नीतियों की विसंगतियों को भी उजागर किया जाता है।
- सदन या संसद सूचना का सबसे बड़ा अंग भी है। सदन के सदस्य विभिन्न प्रश्नों के द्वारा मंत्रियों से सूचना माँग सकते हैं या सूचना प्राप्त कर सकते हैं। सदन को यह अधिकार है, कि कार्यपालिका उसे आवश्यक सूचना प्रदान करे।
- विधायिका का अन्य महत्वपूर्ण कार्य विधि का निर्माण करना है और भारत सदृश कल्याणकारी राज्य में विधायिका का कार्य सामाजिक न्याय को प्रभावी रूप में स्थापित करना भी है एवं अनेक विकास योजनाओं का निर्माण भी विधायिका के द्वारा किया जाता है।
- संसद के द्वारा कार्यपालिका पर सबसे प्रभावी नियंत्रण वित्तीय नियंत्रण के माध्यम से स्थापित किया जाता है। इसलिए सरकार को किसी नए करारोपण, अनुदान और व्यय के लिए संसद द्वारा अनुमति प्राप्त की जाती है। - संसद या विधायिका के द्वारा संविधान का संशोधन भी किया जाता है। भारतीय संविधान में संशोधन के लिए किसी अन्य संस्था का प्रावधान नहीं है, बल्कि यह संसद का उत्तरदायित्व है।
- संसद का वर्तमान स्वरूप कई हजार वर्षों के विकास का परिणाम रहा है। इस दृष्टि से ब्रिटिश संसद को 'संसदों की जननी' की संज्ञा दी जाती है, कालांतर में यही संस्था ब्रिटेन की प्रतिनिधित्व युक्त 'राष्ट्रीय मंडल' के रूप में विकसित हुई। ब्रिटिश संसद का इतिहास सामान्यतः विधान मंडल का इतिहास माना जाता है। भारत ने भी ब्रिटेन की इस संसदीय व्यवस्था को अपनाया है। भारतीय संविधान का स्वरूप गणतंत्रीय तथा ढाँचा संघीय है, उसमें संसदीय प्रणाली के प्रमुख तत्व विद्यमान हैं। इसमें संघ के लिए एक संसद का प्रावधान है, जिसमें राष्ट्रपति और दो सदन राज्य सभा और लोक सभा सम्मिलित हैं।
प्रधानमंत्री शासन-
- संसदीय शासन में कार्यपालिका लोक सभा के प्रति उत्तरदायी होती है। संसद, कार्यपालिका एवं उसके प्रधानमंत्री को नियंत्रित करती है, परंतु जब लोक सभा में किसी एक दल का स्पष्ट बहुमत हो जाए तब व्यावहारिक रूप में प्रधानमंत्री लोक सभा को नियंत्रित करने लगता है। क्योंकि प्रधानमंत्री लोक सभा के बहुमत दल का नेता भी होता है।
- प्रधानमंत्री का दल में प्रभाव उसके मंत्रिमंडल में प्रभाव को स्वयं बढ़ा देता है। इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल में संसदीय शासन के बजाय, प्रधानमंत्री शासन पाया जाता है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत में पुनः प्रधानमंत्री शासन की स्थापना हुई है। नरेन्द्र मोदी का न केवल लोक सभा पर प्रभावी नियंत्रण है, बल्कि मंत्रिमंडल पर भी शक्तिशाली नियंत्रण बना हुआ है।
छाया मंत्रिमंडल-
संसदीय शासन में जब दो मुख्य बल विद्यमान होते हैं, तब बहुमत दल के द्वारा सरकार का निर्माण किया जाता है। जबकि विपक्षी दल को प्रतीक्षारत मंत्रिमंडल कहा जाता है। इसी विपक्षी दल को छाया मंत्रिमंडल या भविष्य का वैकल्पिक मंत्रिमंडल भी कहा जाता है।