आर्यो द्वारा पहने जाने वाले 4 प्रकार के वस्र थे:-
1. नीवी :-
- शरीर के निचले भाग (आंतरिक भाग) को ढकने हेतु प्रयुक्त वस्त्र। जैसे – जामा, अधोवस्त्र, धोती।
2. अधिवास :-
- शरीर के ऊपरी हिस्से को ढकने हेतु प्रयुक्त वस्त्र। जैसे – द्रापी, कुर्ता, कमीज आदि।
3. वास :-
- ऊपर से ओढ़ा जाने वाला वस्त्र। जैसे – शॉल, चुनरी, ओढ़नी आदि।
4. अंतका :- 
- बुना हुआ ऊनी वस्त्र।
 क्षौम :-
- धनी वर्ग रेशम से बने हुए विशेष वस्त्र धारण करते थे, जिन्हें क्षौम कहते हैं।
- पुरुष अपने सिर पर पगड़ी धारण करते थे जिसे ‘उष्णीय’ कहा जाता था तथा एक आभूषण धारण करते थे जिसे ‘कुम्ब’ कहा जाता था।
 पेशस :- 
- वैदिक नृतक व नर्तकियों द्वारा पहना जाने वाला वस्त्र।
 निष्क :-
- महिलाओं द्वारा गले में पहना जाने वाला स्वर्ण आभूषण।
- कई विद्वानों ने इसे स्वर्ण मुद्रा भी कहा है।
 निषक :-
- सोने की शुद्धता की जाँच हेतु प्रयुक्त पारख (पारस) पत्थर।
 स्त्रियों की स्थिति :-
- ऋग्वेदिक काल में महिलाओं की स्थिति सम्मानजनक थी।
- उन्हें पुरुषों के समान उपनयन संस्कार का अधिकार प्राप्त था।
- वह गुरू के आश्रम में रहकर शिक्षाओं में निपुण बनती थी।
- वैदिक काल मेंकन्याओं के विवाह की आयु- 16/17 वर्ष होती थी।
- पर्दा प्रथा, बाल विवाह, दहेज, सती प्रथा का उल्लेख नहीं मिलता है।।
- नियोग करने का अधिकार प्राप्त था।
 सद्योवधु :-
- 16 वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गुरू के आश्रम में रहकर ज्ञानार्जन करती थी, तथा बाद में गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर जाती थी।
 ब्रह्मचारिणी :-
- ऐसी कन्या जो आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गुरू के आश्रम में रहकर ज्ञानार्जन करती थी।
 ऋर्षि :-
- ऐसी विदुषी महिलाएँ जिन्होंने न केवल वैदिक मंत्रों की रचना की अपितु शास्त्रार्थ में पुरुषों को पराजित किया।
 जैसे – अपाला, घोषा, श्रद्धा, चंपा, लोपामुद्रा, विश्वसरा।
 अमाजु :-
- आजीवन अविवाहित रहने वाली महिला, परन्तु ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करती थी।
 वहतु :-
- विवाह के समय दिया जाने वाला उपहार।