• वर्ण व्यवस्था :-
- उल्लेख – ऋग्वेद के 10वें मण्डल – पुरुष सूक्त में मिलता है।
- ऋग्वेदिक वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित थी।

 

वर्ण

उत्पति

कार्य

1.

ब्राह्मण

मुख से

यज्ञ, हवन, मंत्रोच्चारण आदि।

2.

क्षत्रिय

भुजाओं से

शासन, अन्य वर्णों की रक्षा

3.

वैश्य

जंघाओं से

व्यापार, वाणिज्य

4.

शुद्र

पैरों से

निम्न वर्ग के कार्य (ऊपर 3 वर्णों की सेवा)

• आश्रम व्यवस्था :-
- सम्पूर्ण मानव जीवन को 100 वर्ष का मानते हुए उसे 4 बराबर भागों में विभाजित किया जाता है।
- उल्लेख – सर्वप्रथम ‘छान्दोग्य उपनिषद’ में प्रारंभिक 3 आश्रमों का उल्लेख मिलता है।।
- परन्तु सम्पूर्ण चारों आश्रमों का उल्लेख ‘जाबालोपनिषद’ में मिलता है।
- आश्रम व्यवस्था पूर्ण रूप से उत्तरवैदिक काल में विकसित हुई थ्ज्ञी।।
1. ब्रह्मचर्य आश्रम (0-25 वर्ष)
- प्रारम्भ – उपनयन संस्कार से
 उप + नयन – गुरू के समीप ले जाना
 उप – समीप + ले जाना = गुरू के
- समापन – समावर्तन संस्कार से
 सम्+आ+वर्तन – सम्यक् रूप से लौट आना
- इस आश्रम के दौरान बालक गुरू के आश्रम में रहकर समस्त विद्याओं में निपुण बनता था। (अपने जीवन के 25 वर्ष समाप्त होने तक)
• उपनयन संस्कार क्रमश :-
1. ब्राह्मण – 8 वर्ष की आयु में
2. क्षत्रिय – 11 वर्ष की आयु में
3. वैश्य – 12 वर्ष की आयु में
- ब्रह्मचर्य आश्रम केवल इन तीन वर्णों के लिए ही था, इन तीनों वर्णों को द्विज कहा गया।
- शुद्रों हेतु केवल गृहस्थ आश्रम ही था।
• गृहस्थ आश्रम (26-50 वर्ष) :-
- मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आश्रम था।
- इसे संसार की रीढ़ की हड्डी कहा गया था।
- इसी आश्रम के दौरान मानव अपने त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) व पंच महायज्ञ पूर्ण करता है।
• वानप्रस्थ आश्रम (51-75 वर्ष) :-  
- शाब्दिक अर्थ – वन को गमन
- इस आश्रम के दौरान व्यक्ति पूर्ण रूपेण सांसारिक मोह-मायाद से मुक्त नहीं हो पाता है।
- वह पूरे समाज का हो जाता।
• संन्यास आश्रम (76-100 वर्ष) :-
- पूर्ण रूप से ईश्वर की भक्ति में लीन हो जाना 
- मोह माया बंधनों से मुक्त हो जाना