ऋग्वेदिक आर्थिक जीवन:
किसान अपनी कुल उपज का 1/6 भाग राजा को कर के रूप में देते थे।
सिचाई दो प्रकार से की जाती थी-
स्वंयजा: वर्षा के पानी/तालाब के माध्यम से सिंचाई
खत्रिनमा: कृत्रिम साधनों से जैसे: कुए से सिचाई (खनित्रमा)
जिन नालियों के माध्यम से पानी खेतों में लाया जाता था उन्हें कुल्या कहा जाता था।
ऋग्वेदिक काल में श्रेणि प्रथा का उल्लेख नहीं मिलता है।
पणि: ऋग्वेदिक व्यापारियों हेतु प्रयुक्त, वस्तुत: पणि गायों के चोर होते थे।
गाय सबसे महत्वपूर्ण पशु (रथी, संपत्ति के रूप में)
घोड़ा सबसे प्रिय पशु।
बैकनॉट: अत्यधिक ब्याज लेने वाले (सूदखोर) व्यक्ति को कहा जाता था।
ऋग्वेदिक आर्य लोहे से परिचित नहीं थे।
उत्तरवैदिक काल (1000ई.पू-600 ई.पू.)
वह काल जिसके दौरान अन्य तीन वेद (यजु, साम, अथर्व) व अन्य वैदिक साहित्य की रचना (ब्राह्मण, आरण्यक, स्मृतियाँ, उपनिषद्) की गई है।
राजनैतिक जीवन:
सभा व समिति का अस्तित्व समाप्त हो गया।
सभा को राजा की प्रीवी कौंशिल बना दिया गया।
राज्य का स्वरूप कबिलाई न रहकर “क्षेत्रीय” हो गया था।
उत्तरवैदिक आर्य लौहे से परिचित हुए।
इस काल के दौरान आर्यों का विस्तार “गंगा-यमुना” दौआब क्षेत्र तक हो गया था।
राजा में देवत्व का निवास, राजा को देवताओं के प्रतिनिधि के रूप में पूजा जाने लगा।
प्रशासनिक तंत्र को सुव्यवस्थित करने हेतु राजा ने एक तंत्र स्थापित किया जिसमें राजा के रथकार से लेकर पटरानी तक के लोग शामिल थे। जिन्हें रत्निन कहा गया।
रत्निन वर्तमान की मंत्री परिषद् के समान था।
रत्निन: राजा को प्रशासन में सहायता देने हेतु उसके प्रमुख सहयोगियों का समूह:
राजा सहित कुल रत्निनों की संख्या 12 थी।
रत्निनों में व्यवसायिक वर्ग को भी शामिल किया गया
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रत्निन नाम: |
रत्निन के कार्य: |
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राजा (सम्राट) |
सर्वोच्च प्रशासक |
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पुरोहित |
राजा का प्रमुख सलाहकार जिसे कर से मुक्ति प्राप्त थी |
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महिषी |
राजा की सबसे प्रिय रानी (पटरानी) |
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युवराज |
राजा का उत्तराधिकारी |
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सूत |
राजा का रथवान (सारथी) युद्ध के समय राजा का उत्साहवर्धन |
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सेनानी |
प्रमुख सेनापति युद्ध की लूट में सेनानी का हिस्सा होता था |