उत्तरवैदिक काल

¨ धार्मिक जीवन :-

- देवमण्डल की कल्पना की गई।

- त्रिदेव के रूप में ब्रह्मा, विष्णु, महेश की कल्पना की गई।

- यज्ञों पर बल दिया गया – कई, महीनों तक चलते थे।

- धार्मिक जीवन में तर्क का उदय हुआ इसी कारण उपनिषदों की रचना हुई थी।

- स्वर्ग-नरक की अवधारणा का जन्म हुआ था।

- मंत्रों व मंत्रोच्चारण पर बल दिया गया था।

- ब्राह्मणों द्वारा किए जाने वाले यज्ञों को श्रौत कहा गया है।

¨ महत्वपूर्ण यज्ञ :-

1. राजसूय यज्ञ :-

- राजा के सिंहसनारूढ़ होने के समय किया जाता था।

- इस यज्ञ में इन्द्र व प्रजापति की पूजा की जाती थी।

- रत्निनों के चयन के समय – राजा प्रत्येक रत्निन के घर जाकर भी यह यज्ञ संपादित करता था – राजा को रत्निदकर कहा जाता था।

2. वाजपेय यज्ञ :-

- राजा में दैव्य शक्तियों के आरोपण हेतु

- इस दौरान रथदौड़, घुड़दौड़ होती थी।

3. अश्वमेघ यज्ञ :-

- राजा के चक्रवर्ती होने हेतु किया जाता था।

- एक वर्ष तक चलता था।

- इस यज्ञ में राजा की पत्नी का साथ होना अनिवार्य था।

- इस यज्ञ के दौरान – एक/दो अश्व छोड़े जाते थे- राजा का संदेश अंकित होता था।

- घोड़ा पकड़ने वाले व्यक्ति को राजा के साथ युद्ध करना पड़ता था।

- घोड़ा जिन-जिन क्षेत्रों से होकर गुजरता वह क्षेत्र राजा के अधीन हो जाता था।

- यज्ञ समापन पर राजा को ‘राजाधिराज’ की उपाधि प्राप्त होती थी।

4. किरीरिष्ठ यज्ञ :-

- अकाल के समय वर्षा हेतु किया जाने वाला यज्ञ था।

5. पुत्रेष्ठी यज्ञ :-

- पुत्र प्राप्ति हेतु किया जाने वाला यज्ञ था।

6. अग्निष्ठोम यज्ञ :-

- इसके दौरान सोमरस पीसा जाता था।

- सोमरस का उल्लेख ऋग्वेद के 9वें मण्डल में मिलता है।

- इस यज्ञ से पूर्व याज्ञिक व उसकी पत्नी को सात्विक जीवन व्यतीत करना पड़ता था।

7. पुरुषमेध यज्ञ :-

- इसमें पुरुष की बलि दी जाती थी।

- 25 यूपों (यज्ञिक स्तंभ) का प्रयोग किया जाता था।

¨ गृहस्थ आर्यों द्वारा किए जाने वाले पंच महायज्ञ:-

  1. ब्रह्म यज्ञ (ऋषि यज्ञ) :- अध्ययन-अध्यापन द्वारा ब्रह्मा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने हेतु किया जाता था।
  2. देव यज्ञ :- देवताओं की पूजा-अर्चना हेतु किया जाता था।
  3. पितृ यज्ञ :- पूर्वजों को जल-भोजन के माध्यम से तर्पण करना।
  4. मनुष्य यज्ञ :- अतिथी सत्कार हेतु किया जाता था।
  5. भूतयज्ञ (नञ) :- समस्त जीव-आत्माओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने हेतु। किया जाता था।

मानव के तीन ऋण :-

  1. ऋषि ऋण :- गुरू से प्राप्त शिक्षा का प्रचार-प्रसार कर इस ऋण से मुक्त होना।
  2. पितृ ऋण :- सन्तानोत्पति के द्वारा
  3. देव ऋण :- देवताओं/भौतिक शक्तियों द्वारा प्राप्त ज्ञान का प्रचार-प्रसार करना।

¨ चार पुरुषार्थ :-

  1. धर्म
  2. अर्थ
  3. काम
  4. मोक्ष

- धर्म, अर्थ, काम – त्रि वर्ग – गृहस्थ आश्रम के दौरान पूर्ण हो जाते है।

- प्रथम अमर व्यक्ति – यम था।

- प्रथम जन्में व्यक्ति को – विश्वकर्मा कहा जाता है।

- ऋग्वेद में शरीर पंचतत्व से निर्मित होने के बजाए केवल एक ही तत्व जल से निर्मित बताया है।