-     राष्ट्रपति, भारत का पहला नागरिक होता है। राष्ट्रपति, भारतीय गणराज्य का सर्वोच्च पद है। संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति संघ का शासन चलाने वाला व्यक्ति है।
-     संघ की कार्यपालिकीय शक्ति राष्ट्रपति में निहित है। संविधान की प्रस्तावना में 'गणराज्य' (Republic) शब्द का प्रयोग इस अर्थ में किया गया है कि भारतीय संघ का प्रधान राष्ट्रपति है, न कि कोई राजा। राष्ट्रपति, एक निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है।
राष्ट्रपति पद के लिए योग्यताएँ-
- संविधान के अनुसार, निम्नलिखित योग्यताएँ रखने वाला व्यक्ति राष्ट्रपति पद के लिए योग्य माना जाता है, यदि-
(i) वह भारत का नागरिक हो।
(ii) वह 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो।
(iii) वह लोक सभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
 (iv) वह किसी लाभ के पद पर न हो।
राष्ट्रपति के निर्वाचन का तरीका-

- राष्ट्रपति के निर्वाचन में इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों का प्रयोग नहीं होता, क्योंकि राष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के द्वारा होता है। राष्ट्रपति के निर्वाचन में चुनाव चिन्ह का प्रयोग नहीं होता। इसलिए राष्ट्रपति सैद्धांतिक रूप में किसी दल विशेष का सदस्य नहीं होता है, क्योंकि उससे निष्पक्ष रूप में कार्य करने की अपेक्षा है और वह भारत का राष्ट्रपति है, न कि किसी दल का प्रधान है।
-  राष्ट्रपति चुनाव में लोक सभा महासचिव तथा राज्य सभा महासचिव क्रमिक रूप में निर्वाचन अधिकारी के रूप में कार्य करते हैं। भारत के राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली की ‘एकल संक्रमणीय मत पद्धति' द्वारा होता है। राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल द्वारा संपन्न होता है। राष्ट्रपति के चुनावों में प्रत्येक सदस्य वरीयता के आधार पर मतदान करता है, इस आधार पर प्रत्येक सदस्य मतपत्र में सभी उम्मीदवारों के सामने प्रथम व द्वितीय वरीयता अंकित करता है।
-  निर्वाचक मंडल में संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य तथा राज्यों के विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य सम्मिलित होते हैं, इसमें मनोनीत सदस्य व राज्यों की विधान परिषदों के सदस्य सम्मिलित नहीं होते हैं|(70वें संविधान संशोधन, 1992 के तहत केन्द्र शासित राज्य दिल्ली तथा पांडिचेरी की विधान सभाएँ राष्ट्रपति चुनाव में हिस्सा लेती हैं।)
मतदान प्रक्रिया एवं वोटों की गणना -
-  मतगणना के प्रथम चक्र में उम्मीदवारों को प्राप्त पहली प्राथमिकता वाले मतों की ही गणना होगी। यदि इस प्रथम चक्र में ही किसी उम्मीदवार को निर्धारित कोटा से अधिक मत मिल जाते हैं, तो उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है। यदि प्रथम चक्र में किसी भी उम्मीदवार को निर्धारित कोटा प्राप्त नहीं होता, तो मतगणना का दूसरा चक्र चलाया जाता है, जिसमें उम्मीदवारों को मिली द्वितीय प्राथमिकता को गिना जाता है। ऐसे अवसर पर यदि किसी उम्मीदवार को मिले मत बहुत कम होते हैं तथा यह लगता है, कि उसके विजयी होने के अवसर न के बराबर हैं, तो उसके मतों को अन्य उम्मीदवारों के मध्य हस्तांतरित कर दिया जाता है।
- यदि द्वितीय चरण में कोई उम्मीदवार निर्धारित कोटा पूरा कर लेता है, तो उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है। यह मतगणना तथा हस्तांतरण का दौर उस समय तक चलता रहता है, जब तक कि कोई उम्मीदवार विजयी घोषित होने के लिए निर्धारित मत प्राप्त न कर ले। यदि अंत में केवल दो ही प्रत्याशी शेष रह जाते हैं, तो बहुमत के आधार पर प्रत्याशी को निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है। राष्ट्रपति के अभी तक के निर्वाचनों में केवल एक ही बार दूसरी प्राथमिकताओं को गिनने की आवश्यकता पड़ी है।
राष्ट्रपति के परोक्ष निर्वाचन के पक्ष में तर्क-
(
i) समय, धन और श्रम की बचत-
- भारत, एक बहुत बड़ा देश है, जहाँ करोड़ों वयस्क मतदाता निवास करते हैं, ऐसे में जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रपति का निर्वाचन करना संभव नहीं है तथा प्रत्येक 5 वर्ष बाद प्रत्यक्ष चुनाव करवाने पर बहुत व्यापक पैमाने पर निर्वाचन तैयारी की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन राष्ट्रपति केवल औपचारिक प्रधान ही होता है, तो इतना समय, धन और श्रम क्यों व्यर्थ किया जाय? के. संथानम् के अनुसार, 'राष्ट्रपति को औपचारिक प्रधान बनाना है, तो फिर उसको प्रत्यक्ष रीति से निर्वाचित करना व्यर्थ का परिश्रम होगा।'
(ii) राष्ट्रपति का मंत्रिमंडल और संसद से टकराव टालना-
-     भारतीय संविधान द्वारा संसदीय शासन प्रणाली में व्यवस्था की गई है, जिसमें वास्तविक शक्ति मंत्रिमंडल और विधानमंडल में निवास करती है, जिन्हें आम जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित किया जाता है। ऐसी व्यवस्था में राष्ट्रपति को भी प्रत्यक्ष विधि से चुनना असंगत होता। राष्ट्रपति यह कहकर मंत्रिमंडल और संसद का विरोध कर सकता है, कि उसे भी शासन सत्ता सीधे आम जनता द्वारा प्राप्त हुई है और वह शक्ति का दूसरा केंद्र बन जाएगा।(iii) एक तटस्थ व्यक्ति का चयन-
- यदि राष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष विधि से होता, तो उससे दलीय प्रतिद्वंद्विता बढ़ जाती है। उस स्थिति में राष्ट्रपति किसी एक दल का प्रतीक बन जाता या कई दलों के संगठन का एक समर्थक - होता। ऐसे में राष्ट्रपति समस्त देश के प्रतीक के रूप में मध्यस्थ और तटस्थ रहकर कार्य नहीं कर पाता। लोकप्रिय राष्ट्रपति का सत्तारूढ़ दल से विरोध होने पर वह स्थिति का अनुचित लाभ उठाकर राष्ट्र का नायक बनने का प्रयत्न भी कर सकता है व सरकार के लिए परेशानी का कारण भी हो सकता है और उसके तटस्थ रहने की संभावना बहुत कम होगी।
कार्यकाल-
- राष्ट्रपति पद ग्रहण करने की तिथि से 5 वर्ष तक अपने पद पर रहता है। इसके बाद भी वह जितनी बार चाहे चुनाव लड़ सकता है।
त्यागपत्र-
- वह अपने कार्यकाल की समाप्ति से पूर्व उपराष्ट्रपति को संबोधित त्यागपत्र द्वारा पद छोड़ सकता है। राष्ट्रपति अपना त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को देगा।
पदमुक्ति-
- संविधान के उल्लंघन के आधार पर राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाकर उसे पद से हटाया जा सकता है। महाभियोग, संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है। महाभियोग हेतु अभियोग चलाने वाले सदन की समस्त संख्या के 1/4 सदस्यों के हस्ताक्षर होने आवश्यक हैं।
-  अभियोग चलाने के 14 दिन बाद अभियोग चलाने वाले सदन में उस पर विचार किया जाएगा, यदि अभियोग का प्रस्ताव सदन की कुल सदस्य संख्या के 2/3 सदस्यों द्वारा स्वीकृत हो जाय, तो उसके उपरांत प्रस्ताव द्वितीय सदन को भेज दिया जाता है। दूसरा सदन, इन अभियोगों की या तो स्वयं जाँच करेगा या इस कार्य के लिए एक विशेष समिति नियुक्त करेगा। राष्ट्रपति स्वयं उपस्थित होकर या अपने प्रतिनिधि द्वारा अपना पक्ष प्रस्तुत कर सकता है। यदि इस सदन में राष्ट्रपति के विरुद्ध लगाए गए आरोप सिद्ध हो जाते हैं और सदन भी अपने कुल सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से महाभियोग के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता है, तो प्रस्ताव स्वीकृत होने की तिथि से राष्ट्रपति पदमुक्त समझा जाएगा।
पद की शपथ-
- राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश अथवा उसकी अनुपस्थिति में उच्चतम न्यायालय का वरिष्ठतम न्यायाधीश शपथ दिलाता है।
-  राष्ट्रपति के द्वारा अपनी समूची क्षमता से संविधान के संरक्षण, रक्षा तथा बचाव की शपथ ली जाती है। राष्ट्रपति के द्वारा भारत की जनता के कल्याण और उनकी सेवा के लिए शपथ लेता है। यह उल्लेखनीय है, कि राष्ट्रपति केवल पद की शपथ लेता है, गोपनीयता की नहीं।
-  राष्ट्रपति संविधान की रक्षा और संरक्षण की शपथ लेता है, जिससे यह प्रतीत होता है, कि राष्ट्रपति की शक्तियाँ केवल नाम मात्र की नहीं हैं, बल्कि वह संविधान की रक्षा के लिए संवैधानिक कदम उठा सकता है।      कार्यवाहक राष्ट्रपति-
-     उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति का पद निम्नलिखित परिस्थितियों में ग्रहण कर सकता है-
(i) पाँच वर्ष का कार्यकाल समाप्त होने पर।
(ii) राष्ट्रपति की मृत्यु होने पर।
(iii) महाभियोग द्वारा हटाए जाने पर।
(iv) राष्ट्रपति द्वारा स्वयं पद त्यागने पर।
(v) राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचन को अवैध घोषित किए जाने पर।

- उपराष्ट्रपति के द्वारा, राष्ट्रपति पद के कार्यों के निर्वहन के समय यदि मृत्यु हो जाए या अन्य किसी कारण से उन्हें अपने पद से हटना पड़े, तो सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति पद का कार्यभार ग्रहण करता है।
-  राष्ट्रपति का पद रिक्त होने पर अधिक से अधिक छ: (6) महीने के भीतर राष्ट्रपति का चुनाव हो जाना चाहिए।
राष्ट्रपति की उपलब्धियाँ-
-  वर्तमान समय में राष्ट्रपति का वेतन 5 लाख रुपये मासिक निर्धारित किया गया है। राष्ट्रपति को वे सभी भत्ते व विशेषाधिकार प्राप्त हैं, जो समय-समय पर संसद निर्धारित करती है। कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति के वेतन व भत्ते कम नहीं किए जा सकते। राष्ट्रपति बिना किराया दिए सरकारी आवास का उपयोग करता है।
- अवकाश ग्रहण कर लेने के पश्चात् पूर्व राष्ट्रपति को पेंशन राशि के अलावा सरकारी खर्चे पर भ्रमण एवं ऑफिस चलाने के लिए सचिवालय जैसी सुविधाएँ भी दी जाती हैं।
राष्ट्रपति को प्राप्त विशेषाधिकार-
- भारतीय संविधान का मूल आधार विधि के समक्ष समानता है, जिसका अभिप्राय है, किसी व्यक्ति की पद और प्रतिष्ठा कुछ भी क्यों न हो, उस पर समान विधि लागू होगी। परंतु राष्ट्रपति और राज्यपाल को विधि के समक्ष समानता से छूट दी गयी है।
- राष्ट्रपति, अपनी शक्तियों और कार्यालय के कर्त्तव्यों का निष्पादन करते रहने के लिए किसी भी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं होंगे। उनके पद पर रहने के दौरान उनके विरुद्ध किसी भी प्रकार की आपराधिक कार्यवाही आरंभ नहीं की जाएगी और न ही इसे बनाया रखा जाएगा।
-  राष्ट्रपति को अपने पद के दौरान किसी भी न्यायपालिका के दौरान हिरासत में रखने अथवा जेल में रखने का आदेश नहीं दिया जाएगा। राष्ट्रपति के द्वारा व्यक्तिगत रूप में किए गए कार्यों के विरुद्ध सिविल कार्यवाही आरंभ की जा सकती है, परंतु इसके पहले आवेदन कर्ता को अपना नाम निवास स्थान तथा राष्ट्रपति के विरुद्ध कार्यवाही के कारण का विवरण 2 महीने पूर्व प्रस्तुत करना होगा।
राष्ट्रपति चुनाव से संबंधित विवाद-
- राष्ट्रपति का निर्वाचन चुनाव आयोग द्वारा संपन्न कराया जाता है तथा इससे संबंधित सभी विवाद केवल सर्वोच्च न्यायालय के अधीन हैं।
- राष्ट्रपति का निर्वाचन लोक सभा के निर्वाचित सदस्यों और राज्य विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा होता है। यदि चुनाव के दौरान कोई विधान सभा भंग हो, तो चुनाव स्थगित नहीं होगा। उच्चतम न्यायालय द्वारा यदि किसी राष्ट्रपति के निर्वाचन को अवैध घोषित कर दिया गया, तो राष्ट्रपति के द्वारा संपादित कार्य अवैध नहीं होंगे।
राष्ट्रपति का चुनाव तथा राजनीति-
- राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार होना व्यक्तिगत कार्य हो सकता है, लेकिन चुनाव जीतना व्यक्तिगत न होकर, राजनीतिक है। विभिन्न राजनीतिक दल अपने उम्मीदवार खड़े कर सकते हैं तथा कभी-कभी कई राजनीतिक दल संयुक्त रूप से अपना उम्मीदवार खड़ा करते हैं। राष्ट्रपति का चुनाव वही व्यक्ति जीतता है, जिसके राजनीतिक दल के संसद में तथा राज्यों की विधान सभाओं में अधिक सदस्य होते हैं।
- लोक सभा में किसका बहुमत है तथा कौन व्यक्ति प्रधानमंत्री है, इसका भी प्रभाव चुनाव परिणाम पर पड़ता है।
राष्ट्रपति की शक्तियाँ एवं कार्य-
- विधिशास्त्रियों के अनुसार, भारतीय राष्ट्रपति सर्वशक्तिमान है। जबकि राजनीतिशास्त्रियों का यह तर्क है, कि केवल वह संवैधानिक औपचारिक अध्यक्ष है, जो कि शक्ति का नहीं, बल्कि प्रभाव का प्रयोग करता है। भारत के राष्ट्रपति को संविधान के प्रावधानों के अनुसार दो प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त हैं-
1. सामान्य कालीन शक्तियाँ।
2. आपात कालीन शक्तियाँ।
1. सामान्य कालीन शक्तियाँ-
कार्यपालिकीय शक्तियाँ-

- संघ की समस्त कार्यपालिकीय शक्तियाँ राष्ट्रपति में निहित होती हैं। भारत सरकार के कार्यपालिकीय संबंधी कार्य राष्ट्रपति के नाम से संपादित किए जाएंगे।
- प्रधानमंत्री, जो कि मंत्रिमंडल का अध्यक्ष है, राष्ट्रपति को कार्यपालिकीय शक्तियों के उपयोग में लाने के लिए सलाह देगा।
- भारत का राष्ट्रपति, संघीय कार्यपालिका का प्रमुख है, उसे समस्त विषयों पर संसद को कानून बनाने का अधिकार है, उनसे संबंधित कार्यपालिका के अधिकार राष्ट्रपति में निहित हैं।
- राष्ट्रपति द्वारा निम्न महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियाँ, जैसे-प्रधानमंत्री एवं प्रधानमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की, संघ के महान्यायवादी, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, सर्वोच्च व उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की, संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व अंतर्राज्यीय लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की, राज्यों के राज्यपाल की, वित्त आयोग, जल विवाद जाँच आयोग, मुख्य निर्वाचन आयुक्त व निर्वाचन आयोग के अन्य सदस्यों की, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए विशेषाधिकारों की, अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन व आयोग की, अन्य पिछड़ा वर्ग के आयोग की, राजभाषा आयोग, भाषायी आयोग तथा अल्पसंख्यक आयोग की नियुक्ति करता है।     विधायी शक्तियाँ-
- राष्ट्रपति, संसद का अभिन्न अंग है। संसद के एक महत्वपूर्ण अंग के रूप में और राष्ट्राध्यक्ष होने के नाते राष्ट्रपति को भारतीय शासन प्रणाली में अनेक विधायी कार्य करने होते हैं। जैसे-संसद को आमंत्रित एवं स्थगित करना।
-  लोक सभा को भंग करना।
- साधारण विधेयक पर संसद के दोनों सदनों में मतभेद होने पर दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाना। प्रत्येक अधिवेशन में राष्ट्रपति का आरंभिक भाषण होता है। वह राज्य सभा में 12 सदस्यों को मनोनीत करता है। राष्ट्रपति की स्वीकृति के बिना कोई भी विधेयक कानून नहीं बन सकता है। धन विधेयक पर राष्ट्रपति अपनी स्वीकृति देने से इंकार नहीं कर सकता, किंतु साधारण विधेयकों को पुनर्विचार हेतु संसद में लौटा सकता है। यदि संसद बहुमत से दोबारा पारित कर दे, तो राष्ट्रपति को स्वीकृति देना अनिवार्य होता है।
राष्ट्रपति की वीटो की शक्ति-
-  संविधान में 'वीटो' शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, बल्कि इसका प्रयोग व्यावहारिक रूप में होता है। लोक सभा एवं राज्य सभा के द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष हस्ताक्षर के लिए प्रस्तुत किया जाता है, राष्ट्रपति विधेयक पर अनुमति दे सकता है अथवा अनुमति नहीं देगा या पुनर्विचार के लिए भेज सकता है।
- वीटो के प्रकार-
(
i) निरपेक्ष वीटो- जब राष्ट्रपति किसी विधेयक पर अनुमति न दे। भारत में निरपेक्ष वीटो का प्रयोग केवल एक बार ही किया गया है। निरपेक्ष वीटो का प्रयोग राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने पेप्सू विधेयक पर किया था।
(ii) निलंबनकारी वीटो- जब राष्ट्रपति किसी विधेयक को पुनर्विचार के लिए भेज दे।
(iii) पॉकेट वीटो- जब राष्ट्रपति किसी विधेयक पर कोई कार्यवाही न करे। संविधान में यह उल्लेखित नहीं है, कि राष्ट्रपति किसी विधेयक पर कितने समय में अनुमति प्रदान करेगा। इसलिए किसी भी विधेयक पर अनुमति प्रदान करने में राष्ट्रपति विलंब कर सकता है। संविधान द्वारा राष्ट्रपति को किसी विधेयक को अनुमति देने या इनकार करने या उसे वापस लौटाने के संबंध में कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है। समय सीमा के अभाव में भारत का राष्ट्रपति जेबी वीटो का इस्तेमाल कर सकता है।
अध्यादेश जारी करने की शक्ति-
- भारतीय संविधान में अध्यादेश का प्रावधान 'भारत शासन अधिनियम, 1935' से लिया गया है। ऐसी शक्ति संसार में किसी भी राष्ट्राध्यक्ष को प्राप्त नहीं है।
- अनुच्छेद-123 के अनुसार, 'जब संसद के एक सदन का सत्र नहीं चल रहा हो, अथवा दोनों सदन सत्र में न हों, तो राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकता है। यह संसद के कानून के समान ही प्रभावशाली होगा। अध्यादेश के द्वारा कार्यपालिका को विधि के निर्माण की शक्ति प्राप्त हो जाती है। अध्यादेश उस समय जारी किया जाता है, जब सरकार के समक्ष कोई आवश्यक परिस्थिति उत्पन्न हो जाए और विधि के तत्काल निर्माण की आवश्यकता हो। क्योंकि विधि निर्माण में होने वाला विलंब सहन नहीं किया जा सकता। अध्यादेश की शक्ति, विधि  की शक्ति की भाँति है, परंतु अध्यादेश विधि का विकल्प नहीं है, क्योंकि विधि निर्माण में विचार-विमर्श होता है तथा जनप्रतिनिधि जनता की इच्छाओं को व्यक्त करते हैं तथा उसके गुण और दोष को भी प्रकट करते हैं।
- वर्तमान में जिन विधेयकों को सदन के द्वारा पारित नहीं किया गया, उसे अध्यादेश के द्वारा लागू किया गया। यह संसदीय परंपरा के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है।
- अध्यादेश को कभी भी राष्ट्रपति समाप्त कर सकता है। संसद की बैठक के छः (6) सप्ताह की अवधि में यदि संसद में अध्यादेश का अनुमोदन नहीं किया, तो यह स्वाभाविक रूप में समाप्त हो जाएगा। अध्यादेशों का न्यायिक पुनरावलोकन किया जा सकता है।
वित्तीय शक्तियाँ-
-  प्रत्येक वित्त वर्ष के प्रारंभ होने से पहले संसद के पटल पर राष्ट्रपति के नाम से वार्षिक वित्तीय विवरण तथा पूरक बजट पेश किया जाता है। अर्थात् राष्ट्रपति के नाम से ही प्रतिवर्ष बजट वित्तमंत्री द्वारा संसद में पेश किया जाता है। कोई भी धन विधेयक, राष्ट्रपति की अनुमति के बिना लोक सभा में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
-  राष्ट्रपति प्रतिवर्ष लेखा परीक्षक की रिपोर्ट प्रस्तुत करता है। राष्ट्रपति, समय-समय पर वित्त आयोग की नियुक्ति करता है, जो संघ या राज्यों के बीच करों के संबंध में उसे परामर्श देता है और वित्त आयोग की सिफारिशें वह संसद के समक्ष रखवाता है। भारत की आकस्मिक निधि पर उसका पूर्ण नियंत्रण होता है। वह संसद की स्वीकृति के बिना इसमें से अचानक पड़ने वाले खर्चों के लिए सरकार को धन दे सकता है। वह संसद से पूरक, अतिरिक्त व अपवाद अनुदानों की माँग कर सकता है। राष्ट्रपति कुछ राज्यों को केन्द्रीय अनुदान प्रदान करने के लिए आज्ञा जारी कर सकता है। वह करों से होने वाली आय के वितरण का भी निर्धारण करता है।
न्यायिक शक्तियाँ-
-  राष्ट्रपति को क्षमादान (अनुच्छेद-72) देने की शक्ति है। वे संघ सूची या संघ शासन से संबंधित सभी विषयों पर क्षमा दे सकते हैं,  कोर्ट मॉर्शल अपराधी को भी क्षमादान दे सकते हैं। मृत्युदण्ड से पूर्ण क्षमादान की शक्ति, केवल राष्ट्रपति को है। क्षमादान, एक व्यापक शब्द है, जिसमें अपराधी को सभी दोषों से बरी कर दिया जाता है। इसके अन्य रूप निम्नलिखित हैं-
(i) लघुकरण में, एक प्रकार के दण्ड के स्थान पर दूसरा दण्ड दे दिया जाता है, जिसमें दण्ड की प्रकृति परिवर्तित हो जाती है। जैसे कि मृत्युदण्ड प्राप्त व्यक्ति की सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर देना।
(ii) परिहार में, केवल दण्ड की अवधि को कम कर दिया जाता है। दण्ड की प्रकृति में कोई परिवर्तन नहीं होता है। जैसे-1 वर्ष की सजा को 6 महीने की सजा में परिवर्तित कर देना।
(iii) निलंबन में, जब किसी विशेष परिस्थिति को देखते हुए अथवा किसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए दोषी व्यक्ति को निर्धारित सजा के बजाय, कम सजा प्रदान करना।
(iv) क्षमादान के लिए जब राष्ट्रपति के समक्ष अनुरोध किया जाता है, तो उस अवधि में सजा स्थगित कर दी जाती है, जिसे विराम ( Reprieve) कहा जाता है। यह मृत्युदण्ड के मामले में लागू होता है।
क्षमादान तथा न्यायपालिका-
- मारूराम वाद में न्यायपालिका ने पहले ही निर्धारित कर दिया है, कि अनुच्छेद-72 के अंतर्गत प्रयुक्त शक्तियों का न्यायिक पुनरावलोकन होगा। यदि यह निर्णय अतर्कसंगत तथा मनमाने रूप में किया गया है।
- केहर सिंह वाद में न्यायपालिका ने निम्न आधार रखे, जो क्षमादान की शक्ति के संदर्भ में हैं। क्षमादान की शक्ति, राष्ट्रपति के विवेकाधीन है। इस शक्ति का प्रयोग सरकार की सलाह पर किया जायेगा। राष्ट्रपति, न्यायालय से अलग मत रख सकता है। राष्ट्रपति के समक्ष क्षमादान के लिए मौखिक सुनवाई नहीं होती है।
- न्यायपालिका ने यह भी स्पष्ट किया है, कि किसी भी व्यक्ति को मनमानी तरीके से क्षमा नहीं किया जाएगा और किसी भी व्यक्ति को राजनीतिक या संकीर्ण धार्मिक या जातीय आधारों पर क्षमा नहीं किया जा सकता। क्षमादान, राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्ति है, लेकिन यह उसकी संवैधानिक शक्ति है, व्यक्तिगत शक्ति नहीं। यदि किसी व्यक्ति की दया याचिका 6 वर्षों से ज्यादा अवधि से लंबित है, तो उसके मृत्युदण्ड को आजीवन कारावास में बदल दिया जायेगा। अत: किसी व्यक्ति को क्षमा करने के आधार में उसके परिवार पर पड़ने वाले प्रभाव या समाज पर पड़ने वाले व्यापक प्रभाव को ध्यान में रखा जा सकता है।
उच्चतम न्यायालय एवं मृत्युदण्ड-
18 फरवरी, 2014 को उच्चतम न्यायालय के द्वारा दिए गए एक ऐतिहासिक निर्णय में मृत्युदण्ड की सजा प्राप्त राजीव गाँधी की हत्या के आरोप में मूरूगन, संथान एवं पेरारिवलन की सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया गया। उच्चतम न्यायालय का तर्क है, कि इन्हें मृत्युदण्ड देने में अनावश्यक और अनपेक्षित विलंब किया गया। उच्चतम न्यायालय ने इनकी दया याचिका में हुए विलंब के कारण इनकी सजा को परिवर्तित कर दिया। न्यायपालिका के अनुसार, किसी व्यक्ति को दोहरी सजा नहीं दी जा सकती और जीवन के अधिकार के उल्लंघन के लिए प्रक्रिया भी तार्किक और निष्पक्ष होनी चाहिए, जिसका अमानवीय प्रभाव नहीं होना चाहिए। न्यायपालिका के अनुसार, मृत्युदण्ड देने में विलंब प्रताड़ना की भाँति है, जो अनुच्छेद-21 में वर्णित जीवन के अधिकार के विरुद्ध है। यह भी उल्लेखनीय है, कि जनवरी, 2014 में उच्चतम न्यायालय ने मृत्युदण्ड प्राप्त 15 अभियुक्तों की सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया था। यह उल्लेखनीय है, कि न्यायपालिका ने कहा, कि अभियुक्तों की सजा का परिवर्तन प्रत्येकवाद के अनुसार अलग-अलग निर्धारित किया जाएगा। इसलिए सभी मृत्युदण्ड प्राप्त व्यक्तियों की सजा को स्वाभाविक रूप में आजीवन कारावास में परिवर्तित नहीं किया जाएगा।
- राजीव गाँधी के हत्यारों की दया याचिका का वर्ष-2000 में तमिलनाडु के राज्यपाल के द्वारा अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद वर्ष-2000 में इनकी क्षमा याचिका राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत की गई, जिसे राष्ट्रपति ने वर्ष-2011 में अस्वीकृत कर दिया।
-  उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद तमिलनाडु सरकार के द्वारा इन तीनों अभियुक्तों को जेल से मुक्त करने का आदेश दे दिया गया, क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने कहा था, कि इन अपराधियों की सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित किया जा रहा है, जो राज्य सरकार की क्षमा के अधीन होगा। भारतीय आपराधिक प्रक्रिया, 1973 के धारा-432 में राज्य सरकार को क्षमादान की शक्ति है। तमिलनाडु सरकार के इस निर्णय के विरोध में केन्द्र सरकार के द्वारा उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की गयी। उच्चतम न्यायालय ने इनकी रिहाई पर रोक लगा दी। केन्द्र सरकार का एक तर्क है, कि इन अपराधियों को केन्द्रीय अधिनियम के अंतर्गत दण्डित किया गया है, जिसे क्षमा करने का अधिकार केन्द्र सरकार को है अथवा राज्य सरकार, केन्द्र सरकार की सहमति से इन्हें क्षमा दे सकती है। इन अपराधियों को हथियार अधिनियम, विस्फोटक अधिनियम, विदेशी अधिनियम तथा पासपोर्ट के अधिनियम द्वारा दण्डित किया गया था, जो संघ सूची के विषय हैं।
सैनिक शक्तियाँ-
तीनों सेनाओं की सर्वोच्च कमान राष्ट्रपति में निहित है, परंतु वे इस शक्ति का प्रयोग विधि के अनुसार ही कर सकेंगे। इस अधिकार के अंतर्गत युद्ध और शांति की घोषणा करने का अधिकार, रक्षा बलों को अभिनियोजित करने का अधिकार शामिल है। लेकिन इन अधिकारों को संसद द्वारा विधि बनाकर विनियमित या नियंत्रित किया जा सकता है। जैसे-भर्ती, प्रशिक्षण तथा अनुरक्षण को राष्ट्रपति के बिना संसद की मंजूरी के नहीं कर सकता।
कूटनीति या राजनीतिक शक्तियाँ-
- राष्ट्रपति विदेशों में, देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे राजदूतों, राजनयिक प्रतिनिधियों तथा वाणिज्य दूतों की नियुक्ति करते हैं। विदेशी राजदूत और अन्य प्रतिनिधियों का स्वागत करते हैं। विदेशों से संधियों और अंतर्राष्ट्रीय समझौते आदि राष्ट्रपति के नाम से ही किए जाते हैं। व्यवहार में ये तभी लागू होते हैं, जब इन पर संसद की स्वीकृति मिल जाती है।
राज्यों के संबंध में शक्तियाँ-
- राष्ट्रपति, राज्य के राज्यपाल व न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है। राज्यों को कुछ अधिनियम बनाने के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक होती है। जैसे-राज्य द्वारा संपत्ति प्राप्त करने हेतु अधिनियम, किसी राज्य के अंदर या दूसरे राज्यों के साथ व्यापार आदि पर प्रतिबंध लगाने वाले विधेयकों को राज्य की विधान सभा में प्रस्तुति से पूर्व राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक है।
- भारत के राष्ट्रपति को शांतिकाल में विस्तृत शक्तियाँ प्राप्त हैं। शांतिकाल में यह अपेक्षा की गई है, कि वह संवैधानिक अध्यक्ष के रूप में ही कार्य करेगा, क्योंकि भारत देश में 'संसदात्मक प्रणाली' अपनाई गई है। वस्तुतः उसकी समस्त शक्तियों का प्रयोग प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिमंडल करेगा, जो संसद के प्रति उत्तरदायी होगा।
आपात कालीन शक्तियाँ-
- संविधान के भाग-18 (अनुच्छेद-352 से 360 तक) में आपात काल की स्थिति उत्पन्न होने पर राष्ट्रपति को संकटकाल से निपटने के लिए विस्तृत अधिकार प्रदान किए गए हैं। भारतीय संविधान के निर्माण के समय आपात कालीन व्यवस्था की जितनी आलोचना हुई, उतनी अन्य किसी भी व्यवस्था की नहीं हुई थी। राष्ट्रीय आपात की स्थिति से निपटने हेतु राष्ट्रपति को निम्नलिखित आपात कालीन शक्तियाँ प्रदान की गई हैं, जो इस प्रकार हैं|   
युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह से उत्पन्न आपात काल (अनुच्छेद-352)-

- यदि राष्ट्रपति को यह विश्वास हो जाए, कि युद्ध, बाह्य आक्रमण या आंतरिक अशांति के कारण भारत या उसके किसी भाग की शांति या व्यवस्था नष्ट होने का भय है या वास्तविक रूप से इस प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न होने पर राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपात की घोषणा कर सकता है।
-  अब तक वर्ष-1962, 1965, 1971, 1975 में राष्ट्रीय आपात काल लागू हुआ है।
-  44वें संविधान संशोधन द्वारा आपात काल में भी जीवन और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार को समाप्त या सीमित नहीं किया जा सकेगा। आपात कालीन घोषणा को संबंधित न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
राज्यों में संवैधानिक तंत्र के विफल होने पर (अनुच्छेद-356)-
-  यदि राष्ट्रपति को राज्यपाल की रिपोर्ट या किसी अन्य प्रकार से यह संतुष्टि हो जाए, कि ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई हैं, जिससे किसी राज्य का शासन संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता, तो राष्ट्रपति राज्य में संकटकाल की घोषणा कर सकता है। 44वें संविधान संशोधन के अनुसार, 'किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन 6 माह तक रहता है, परंतु इससे अधिक समय तक संसद की स्वीकृति, निर्वाचन आयोग के परामर्श तथा अन्य कारणों से आपातकाल की अवधि बढ़ाई जा सकती है।
-  राष्ट्रपति शासन में राज्य का शासन राष्ट्रपति या उसके द्वारा नियुक्त अधिकारी द्वारा चलाया जाता है। राज्य विधान मंडल की शक्तियाँ राष्ट्रपति द्वारा संसद या किसी अन्य उपयुक्त अधिकारी को हस्तांतरित की जा सकती हैं, उच्च न्यायालय को छोड़कर अन्य समस्त शक्तियाँ राष्ट्रपति अपने हाथ में ले सकता है। लोक सभा में राष्ट्रपति राज्य की संचित निधि से धन स्वीकृत कर सकता है।
वित्तीय आपात (अनुच्छेद-360)-
-     यदि राष्ट्रपति को यह विश्वास हो जाए, कि भारत या उसके किसी भाग में आर्थिक साख को खतरा है, तो वह वित्तीय आपात की घोषणा कर सकता है। वित्तीय आपात के प्रभाव निम्नलिखित हैं-
(i) संघ तथा राज्य के किसी वर्ग के अधिकारियों के वेतन में कटौती की जा सकती है।
(ii) राज्य के समस्त वित्त विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए पेश किए जाने के निर्देश दिए जा सकते हैं।
(iii) संघीय कार्यपालिका, राज्य कार्यपालिका को शासन संबंधी आदेश दे सकती है।
(iv) राष्ट्रपति द्वारा केंद्र तथा राज्यों के मध्य धन संबंधी बँटवारे के प्रावधानों में संशोधन किया जा सकता है। परंतु अभी तक देश में वित्तीय आपात की घोषणा नहीं हुई है।
राष्ट्रपति की आपात कालीन शक्तियों की आलोचना-
- भारतीय संविधान, के आपात कालीन उपबंध संविधान निर्माण के समय और उसके बाद कटु आलोचना के विषय रहे हैं। यह भी कहा गया था, कि 'संविधान के संकट कालीन प्रावधान राष्ट्रपति के हाथों में भरी हुई पिस्तौल के समान है और उनसे मौलिक अधिकारों का हनन बड़ी सुगमता से किया जा सकता है।'
(i) राष्ट्रपति न तो जनता का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि है और न ही संसद के प्रति उत्तरदायी है। उसे इतनी अधिक शक्तियाँ प्रदान करना उचित नहीं हैं।
(ii)राष्ट्रपति द्वारा जारी की गई संकट कालीन घोषणा पर दो मास तक कोई प्रतिबंध नहीं है। यह शक्तियाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन करती हैं। मौलिक अधिकारों को सरलतापूर्वक तो स्थगित किया ही जा सकता है, साथ ही राष्ट्रपति संवैधानिक उपचारों के अधिकार को भी स्थगित कर सकता है।
(iii) राष्ट्रपति को एक मात्र संकट कालीन स्थिति का निर्णय करने का अधिकार देना आलोकतांत्रिक होगा। वह इसका दुरुपयोग कर सकता है।
(vi) संकट काल की घोषणा द्वारा संघात्मक व्यवस्था में राज्यों की सरकारों को भंग कर देना उचित नहीं है, क्योंकि इन अधिकारों से संकट काल में राज्यों की स्वायत्तता समाप्त हो जाएगी।
आपात कालीन शक्तियों का महत्व-
-  आलोचकों ने भारतीय संघ व्यवस्था के व्यावहारिक पहलू को नजर अंदाज कर दिया है। इन शक्तियों का मूल्यांकन करते समय हमें निम्नलिखित बातों को भी ध्यान में रखना चाहिए-
(i) संकट काल में राष्ट्र की एकता, अखंडता एवं सुरक्षा को  बनाए रखने के लिए केंद्र के पास ऐसी शक्तियों का होना आवश्यक है।
(ii) राष्ट्रपति, तानाशाह एवं अधिनायक नहीं बन सकता, क्योंकि 44वें संविधान संशोधन के अनुसार, राष्ट्रपति तब तक आपात स्थिति की घोषणा नहीं कर सकता, जब तक कि इसके संबंध में मंत्रिमंडल की ओर से लिखित निवेदन उसे न मिल जाए।
(iii) आंतरिक संकट, आर्थिक एवं वित्तीय संकट एवं बाह्य चुनौतियों का सामना करने के लिए ये शक्तियाँ आवश्यक हैं|
(iv) अनुच्छेद-356 के प्रयोग से राज्य में स्थायी सरकार का निर्माण संभव हो पाता है।
(v) व्यक्ति की स्वतंत्रता और राज्य की सुरक्षा में समन्वय आवश्यक था।
भारत का राष्ट्रपति एवं संघीय कार्यपालिका-
- भारत में संसदीय शासन प्रणाली की स्थापना की गई है। केंद्रीय स्तर पर संघीय कार्यपालिका में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद एवं मंत्रिमंडल सम्मिलित होते हैं। संविधान के 74वें अनुच्छेद के अनुसार, 'राष्ट्रपति को परामर्श देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी, जो प्रधानमंत्री के कार्यों के संपादन में सहायता करेगी। इस मंत्रिपरिषद का नेतृत्व प्रधानमंत्री करता है। मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोक सभा के प्रति उत्तरदायी होती है। संसदीय व्यवस्था में वास्तविक कार्यपालिकीय शक्ति प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद में निहित होती है। मंत्रिपरिषद के सभी मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री के परामर्श से की जाती है। राष्ट्रपति, कार्यपालिका का मात्र संवैधानिक तथा औपचारिक अध्यक्ष होता है। राष्ट्र का समस्त प्रशासनिक कार्य राष्ट्रपति के नाम पर संचालित होता है।
-     संविधान के अनुच्छेद-74(1) के अनुसार, प्रधानमंत्री की नियुक्ति, राष्ट्रपति द्वारा होती है। प्रधानमंत्री, शासन का वास्तविक प्रधान होता है तथा उसका महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व नीति निर्धारण और नीति क्रियान्वयन करना है। इसके अतिरिक्त प्रशासनिक दक्षता बनाए रखना, जनता और सरकार के बीच प्रभावशाली संबंध बनाना तथा सरकार का संसद के साथ संपर्क बनाए रखना भी प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी होती है।