रत्नि नाम  :

कार्य

1. राजा

सर्वोच्च प्रशासक

2. पुरोहित

राजा का सलाहकार

3. महिषी

पटरानी

4. युवराज

राजकुमार/राजा काउत्तराधिकार

5. सूत

राजा का रथवान

6. सेनानी

सेनापति

7.संगृहहिता

कोषाध्यक्ष

8. अक्षवाप

पासा विभाग का अध्यक्ष, पासे के खेल में राजा का प्रमुख सहयोगी होता था।

9. पालागल

राजा का मित्र, विदुषक (संदेश वाहक)

10. गोविकर्तन

गाय विभाग का प्रमुख अध्यक्ष (गवाध्यक्ष)

11. भागदुध

कर संग्रहकर्ता

12. क्षत्रि

राजप्रासाद का रक्षक

अन्य:-

बाबाता : प्रिय रानी

परिवृक्ति : उपेक्षित रानी

शतिपति: 100 गाँवों का मुखिया

स्थपति : सीमान्त क्षेत्रों का प्रशासक एवम् मुख्य न्यायाधीश

Note: शतिपति व स्थपति रत्निन में शामिल नहीं थे।

राजकृत:

शाब्दिक अर्थ: राजा ही निर्माता होता है।

ग्रामणी, तक्षण, व सूत को राजाकृत माना गया है।

तक्षण राजा का रथकार था।

विरास:

राजा के आठ प्रमुख सहयोगियों का समूह था।

इसमें युवराज, महिषी, बाबाता, पुरोहित, सेनानी इत्यादि शामिल थे।

सामाजिक जीवन:

-सामाजिक जीवन में सबसे बड़ा परिवर्तन "वर्ण व्यवस्था" में हुआ था।

-वर्ण व्यवस्था पूर्ण रूप से विकसित हुई तथा यह जन्म पर आधारित हो गई थी।

4 वर्णों में :-

1. ब्राह्मण
2. क्षत्रिय
3. वैश्य
4. शुद्र

शुद्र :- पाणिनी महोदय ने शुद्रों को दो भागों में विभाजित किया।

- निरवसित

- अनिरवसित

- परिणामस्वरूप समाज में मिश्रित जातियों का प्रार्दुभाव हुआ।

2 प्रकार के विवाह प्रचलन में आए-:

1.अनुलोम विवाह : उच्च वर्ण के पुरूष द्वारा निम्न वर्ण की महिला के साथ विवाह करना।

जैसे : ब्राह्मण पुरूष द्वारा क्षत्रिय महिला के साथ विवाह करना।

2.प्रतिलोम विवाह : उच्च वर्ण की महिला द्वारा निम्न वर्ण के पुरूष के साथ विवाह करना।