दक्षिण भारत के राजवंश 
राष्ट्रकूट वंश

⇒ इस वंश का संस्थापक दंतीदुर्ग/दंतीवर्मन
⇒ ये बादामी/वातापी चालुक्यों के सामंत थे
⇒ 752 ई. मे दंतीदुर्ग ने चालुन्य वंश के अंतिम शासक कीर्ति वर्मन II को पराजित कर → मान्यखेत/मालखेत (कर्नाटक) में स्वतंत्र राष्ट्रकूट वंश की नीव डाली
⇒ राष्ट्रकूट अभिलेखों के अनुसार – राष्ट्रकूटों का प्रारंभिक स्थान लातूर/लाटूर में था
⇒  बादमें एलिचपुर (बरार, महाराष्ट्र) पर अधिकार कर अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

⇒ दंतीदुर्ग ने चालुक्यों पर अरबो के आक्रमण के समय – चालुक्यों की सहायता की
⇒ चालुक्य नरेश ने इससे प्रसन्न होकर दंतीदुर्ग को “पृथ्वीवल्लभ” की उपाधी प्रदान की
⇒ दंतीदुर्ग ने कीर्ति वर्मन II को पराजित करने के बाद – उज्जैन (M.P) मे हिरण्यगर्भ (महादान) यज्ञ किया।
⇒ इस यज्ञ के दौरान गुर्जर प्रतिहार शासक देवराज ने द्वारपाल की भूमिका निभाई 

कृष्ण प्रथम – (756-779 ई.)
⇒ कृष्ण प्रथम दंतीदुर्ग की मृत्यु के बाद शासक बना
⇒ उपाधियाँ : 1. सतप्रजाबोध 2. वृतप्रजापाल → जीवन के अंतिम क्षणों तक प्रजा को पालने वाला
⇒ वातापी (बादामी) चालुक्यों का अस्तित्व पूर्णत नष्ट कर दिया
⇒ ऐलोरा (औरंगाबाद, महाराष्ट्र) के प्रसिद्व कैलाश मंदिर का निर्माण प्रारंभ कराया था। यह मन्दिर द्रविड़ शैली में निर्मित है।

ध्रुव प्रथम – (779-793 ई.)
⇒ कृष्ण प्रथम का पुत्र था
⇒ त्रि-पक्षीय संघर्ष में भाग लिया, ऐसा करने वाला (उत्तर भारत की राजनीति में भाग लेने वाला) प्रथम शासक था
⇒ ध्रुव प्रथम गुर्जर प्रतिहार शासक “वत्सराज” तथा पालवंश के शासक “धर्मपाल” को पराजित किया
⇒ त्रि-पक्षीय संघर्ष की विजय के उपलक्ष में – ध्रुव ने अपने राजचिन्ह पर गंगा व यमुना का अंकन कराया
⇒ ध्रुव प्रथम को धारा वर्ष भी कहा जाता है।

गोविन्द III (793-814 ई.)
⇒ गोविन्द III राष्ट्रकूट वंश का सबसे प्रतापी शासक → ध्रुव प्रथम का पुत्र था
⇒ त्रि-पक्षीय संघर्ष मे इसने गुर्जर प्रतिहार शासक नागभटृ II व पालवंश के “धर्मपाल” को पराजित किया
⇒ गोविन्द III ने श्रीलंका के राजा व उसके मंत्री को पराजित कर बंदी बनाकर – हालापुर कर्नाटक ले आया।
इसी दौरान श्रीलंका के इष्टदेव की दो प्रतिमाएं साथ लाया तथा उन्हें मान्यखेत के शिव मन्दिर के सामने विजय स्तंभ के रूप में लगवाया। 

अमोघवर्ष : (814 ई. - 873 ई.)

- गोविन्द III का पुत्र था अल्पव्यस्क शासक होने के कारण करकराज को इसका संरक्षक बनाया गया।

- शासक बनते ही वेगी चालुक्य शासक विजयादित्य II ने आक्रमण कर राज्य से भागने पर मजबूर कर दिया।

- अपने मंत्री करकराज की सहायता से पुन: राज्य प्राप्त किया व अपनी राजधानी अंतिम रूप से मान्यखेत को बनाया।

- अमोघवर्ष जैन धर्म का अनुयायी था, परन्तु वह लक्ष्मी का उपासक था।

- इसके दरबार में जैन कवि - जिनसेन - रचना: आदिपुराण

- महावीराचार्य - रचना: गणितसार संगृह

- जिनसेन व महावीराचार्य इन दोनों जैनमुनियों से प्रभावित होकर अमोघवर्ष ने कन्नड़ भाषा के प्रथम काव्य ग्रंथ ‘कविराज मार्ग’ की रचना की।

- अन्य ग्रंथ : प्रश्नोत्तर मालिका

Note : अमोघवर्ष के दरबार में शक्तायन भी निवास करते थे जिन्होने अमोधवृति की रचना की।

अमोघवर्ष ने अपनी जनता को महामारी से बचाने हेतु अपने बाँये हाथ की अंगुली काटकर देवी को चढा दी।

Note : अमोघवर्ष को उसके जनहित कार्यो व धार्मिक उदारता के कारण इतिहासकारों ने इसकी तुलना मौर्य सम्राट ‘अशोक’ से की है।

- दक्षिण भारत का अशोक कहा है। 

इन्द्र तृतीय : (915 ई. - 927 ई.)

- इसके शासनकाल में - अरबी यात्री व लेखक ‘अलमसुदी’ भारत आया।

- अलमसुदी ने इसे राष्ट्रकूट वंश का सबसे प्रतापी शासक एवं श्रेष्ठ शासक बताया।

- इसने गुर्जर प्रतिहार वंश के शासक ‘महिपाल’ को पराजित कर राजधानी कन्नौज को लूटा।

- पालवंश के देवपाल को भी पराजित किया।

- इन्द्र III के बाद गोविन्द चतुर्थ (927 - 936 ई.) व अमोघवर्ष II (936 - 939 ई.) तक शासक बने।

Note : अलमसुदी G.P. शासक महिपाल के दरबार में भी गया था।

- इन्द्र III के बाद गोविन्द चतुर्थ (927 - 936 ई.) व अमोघवर्ष II (936 - 939 ई.) तक शासक बने।

कृष्ण तृतीय : (939 ई. - 965 ई.)

- राष्ट्रकूट वंश का अंतिम महान शासक माना जाता है।

- इसने चोल नरेश परान्तक प्रथम को पराजित करके चोल साम्राज्य के उत्तरी भाग पर अधिकार कर लिया था।

- इसने चोल नरेश ‘परान्तक प्रथम’ को पराजित कर ‘अकाल वर्ष’ की उपाधी धारण की।

- इसने मालवा के परमारों, काँची के पल्लवों को पराजित कर, रामेश्वरम् (तमिल) एक विजय स्तंभ की स्थापना की।

- इसके दरबार में कन्नड़ कवि ‘पौन्न’ निवास करते थे जिन्होने शांति पुराण की रचना की।

अन्य उपाधियाँ : कृष्णेश्वर, गंडमार्तडांदित्य

- पल्लव व चोलों को पराजित करने के बाद ‘कांचीयम तंजेयमकोंड’ (अर्थात काँची व तंजौर का विजेता’) की उपाधी धारण की।

- 974-75 ई. में राष्ट्रकूट वंश के अंतिम शासक कर्क II को चालुक्य तैलप II ने पराजित कर मार डाला।

इसी के साथ राष्ट्रकूटों का अंत हो गया।

चालुक्य / सोलंकी वंश

इसकी वंश की तीन शाखाएँ है -

- वातापी / बादामी चालुक्य – यह इस वंश की मूल शाखा है।

- यह पश्चिमी चालुक्य कहलाते है।

- यह शाखा कर्नाटक (वातापी) से संबंधित है।

- इस शाखा का  शासनकाल 552 ई. से 750 ई. तक रहा है।

- इनके अंत से राष्ट्रकूटों का उदय हुआ।

(2) कल्याणी / लाट चालुक्य

- इस शाखा का संबंध मैसूर (कर्नाटक) से है।

- इस शाखा का शासनकाल 950 ई. से 1100 ई. तक रहा।

- राष्ट्रकूटों के पतन से इनका उदय हुआ।

(3) वेगी चालुक्य

- ये पूर्वी चालुक्य कहलाते हैं।

- यह शाखा आधुनिक आंध्रप्रदेश में स्थित है।

- इस शाखा का शासनकाल 600 ई. से 1200 ई. तक रहा। 

1. बादामी / वातापी चालुक्य - (543 - 757 ई. से 552 – 750 ई. तक)

- इस शाखा का संस्थापक पुलकेशिन प्रथम था।

- इस शाखा की राजधानी वातापी / बादामी कर्नाटक राज्य के बीजापुर में स्थित है।

- यह शाखा चालुक्यों की मूल / प्राचीनतम शाखा मानी जाती है।

- इसकी जानकारी के प्रमुख स्रोत – अभिलेख है।

ऐहोल अभिलेख

- ऐहोल अभिलेख प्रशस्ति के रूप में है।

- यह अभिलेख कर्नाटक के बीजापुर में स्थित है।

- मेगुती मंदिर (जैन मंदिर) के पश्चिमी भाग की दीवार पर उत्कीर्ण है।

- यह अभिलेख 643 ई. का माना जाता है।

- इस अभिलेख की संस्कृत भाषा है।

- इस अभिलेख की शैली पद्य (काव्य) शैली है।

लिपि: दक्षिणी ब्राह्मी

- इसकी रचना पुलकेशिन द्वितीय के जैन दरबारी  'रवि कीर्ति' द्वारा रचित है।

- इस अभिलेख में रवि कीर्ति ने स्वयं की तुलना  'तुलसीदास' व  'भास' के साथ की है।

- चालुक्य वंश व उसके शासक पुलकेशिन द्वितीय के बारे में इस अभिलेख से जानकारी मिलती है।

- इसमें पुलकेशिन द्वितीय को ‘सत्याश्रय’ अर्थात् सत्य को आश्रय देने वाला कहा गया है।

- इसमें पुलकेशिन द्वितीय व हर्ष के मध्य हुए युद्ध की जानकारी मिलती है।

- इस युद्ध में पुलकेशिन द्वितीय ने हर्ष को नर्मदा के तट पराजित करके  'परमेश्वर' की उपाधि धारण की थी।

नोट:- ऐहोल को मंदिरों का नगर कहा जाता है। जिनेन्द्र मंदिर व मेंगुती मंदिर प्रसिद्ध है।

बादामी शिलालेख:-

- यह शिलालेख बादामी किले के एक शिलाखंड पर उत्कीर्ण है।

- इस शिलालेख पर पुलकेशिन प्रथम (543 ई.) द्वारा बादामी किले के निर्माण की बात लिखी गई है।

- चालुक्य वंश की प्रारंभिक जानकारी इसी शिलालेख से मिलती है।

- चालुक्यों को  'हारिति पुत्र' व  'मानव्य गौत्रिय' बताया गया है।

महाकूट अभिलेख:

- महाकूट स्तंभ लेख - कर्नाटक के प्राप्त

- कब : 602 ई. का माना जाता है।

- इस स्तंभ लेख में पुलकेशिन प्रथम से पूर्व के दो शासकों - उल्लेख

जय सिंह रणराग (पुलकेशिन प्रथम के पिता)

- इनके अलावा - महाकूट स्तंभ लेख से कीर्तिवर्मन प्रथम की जानकारी भी मिलती है।

हैदराबाद दानपात्र :

- 612 ई. का है।

- इसमें पुलकेशिन II द्वारा दिए गए दान के बारे में उल्लेख मिलता है।

- चालुक्य कौन? इतिहासकारों ने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए है।

1. विसेंटस्मिथ : चालुक्य ‘चप’ जाति के लोग थे।

- यह मध्य एशिया के निवासी थे।

2. ह्रेनसांग :

- 641 ई. में पुलकेशिन II के दरबार में गया था।

- इसने चालुक्यों को ‘क्षत्रिय’ बताया है।

3. डा. निलकण्ठ शास्त्री :

- चालुक्यों को कदम्बों का सामंत बताया है।

- इनके मूल वंश का नाम ‘चल्क्य’ जो बाद में चालुक्य कहलाए।

- इन्हें क्षत्रिय बताया है।

महाकूट अभिलेख के अनुसार चालुक्य शासकों का क्रम :

- जय सिंह

- राणराग

पुलकेशिन प्रथम - चालुक्य वंश के संस्थापक, इसके दो पुत्र थे।

1. कीर्तिवर्मन I     

2. मंगलेश

कीर्तिवर्मन के दो पुत्र थे।

1. पुलकेशिन II        

2. कुब्ज विष्णुवर्धन

- पुलकेशिन II ने अपने चाचा की हत्या कर दी  एवं स्वयं शासक बना।

- कुब्ज विष्णुवर्धन वेंगी चालुक्य वंश का संस्थापक था।      

- पुलकेशिन II की मृत्यु के बाद क्रमश: निम्न शासक बने :

विक्रमादित्य I - विनयादित्य - विजयादित्य I - विक्रमादित्य II - कीर्तिवर्मन II

Note : अंतिम चालुक्य शासक कीर्तिवर्मन II को राष्ट्रकूट दंतीदुर्ग ने मार डाला व राष्ट्रकूट वंश की स्थापना की।

- पुलकेशिन प्रथम (543 - 566 ई.)

- वातापी चालुक्य वंश का संस्थापक था।

- इसने दक्षिणापथ पर विजय प्राप्त की तथा अश्वमेध व वाजपेय यज्ञों का आयोजन किया था।

कीर्तिवर्मन प्रथम : (566 - 597 ई.)

- पुलकेशिन प्रथम का पुत्र था।

- कीर्तिवर्मन प्रथम को वातापी चालुक्यों का प्रथम निर्माता कहा जाता है।

- उपाधियाँ : सत्याश्रय, व पृथ्वीवल्लभ

- ऐहोल अभिलेख में कीर्तिवर्मन प्रथम को, कदम्बो, नलों व मोर्यो के लिए कालरात्री के समान बताया गया है।

- सामाज्य विस्तार हेतु किए गए अभियान:

1. वनवासी अभियान :

- कहाँ - कर्नाटक

- यहाँ कदम्ब वंश के शासक अजयवर्मन को पराजित कर उसकी राजधानी पर अधिकार कर लिया। 

कीतिवर्मन प्रथम (566 ई. – 597 ई.):-

1. वनवासी अभियान

2. वेल्लूर अभियान :-

- नलवंशी शासकों को पराजित किया।

- वेल्लूर को नलवाड़ी कहा जाता था।

3. कोंकण अभियान:-

- यहाँ परवर्ती मोर्य शासन था, कीर्तिवर्मन ने इन्हे पराजित कर राजधानी “धारापुरी” पर अधिकार कर लिया।

- धारापुरी को “पश्चिमी समुन्द्र की देवी” कहा जाता है,

- कोंकण पर अधिकार होने के कारण कीर्तिवर्मन का अधिकार क्षेत्र गोवा तक हो गया था।

- गोवा का प्राचीन नाम “रेवति द्वीप”

- कीर्तिवर्मन ने बादामी का राजधानी के रूप में पुन: निर्माण करवाया तथा यहाँ अनेक सुंदर मंदिर व इमारतों का निर्माण बरवाया अत: इसे बादामी का प्रथम निर्माता कहा जाता है।

मंगलेश:-

- कीर्तिवर्मन प्रथम की मृत्यु के बाद शासक बना।

- कीर्तिवर्मन का भाई था।

अभियान:-

1.कलचूरी अभियान:-

- इस क्षेत्र में खानदेश, मालव व गुजरात का दक्षिणी भाग शामिल था।

- आक्रमण क्यों:- मंगलेश उत्तर भारत पर विजय प्राप्त करना चाहता था।

- मंगलेश ने कलचुरी राज्य के शासक बुद्धराज को पराजित किया।

2. कोंकण (M.H का पश्चिमी तट) अभियान

उल्लेख :- नरूरदान पत्रलेख (M.H)

शासक – स्वामीराज

- स्वामीराज चालुक्यों का सांमत था, जिसकी नियुक्ति कीर्तिवर्मन प्रथम द्वारा दी गई।

- मंगलेश ने स्वामीराज कपर आक्रमाण कर मार डाला।

उपाधियाँ:-

अभियानों को पूर्ण करने के बाद निम्न उपाधियाँ धारण की:-

1. परमभागवत – वैष्णव धर्म का अनुयायी होने के कारण

2. रणविक्रांत

3. श्री पृथ्वीवल्लभ

- मंगलेश ने कीर्तिवर्मन प्रथम द्वारा प्रारंभ करवाए गए बादामी गुहा मंदिर के निर्माण को पूर्ण करवाया तथा उसमें भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करवाई।
पुलकेशियन II अभियान

-  पुलकेशिन ने कदम्बों को पराजित किया।

-  लाट व मालवा प्रदेशेां पर विजय प्राप्त की।

-  630 ई. – 634 ई. के मध्य नर्मदा के तट पर हर्ष को पराजित किया।

चालुक्य पल्लव संघर्ष:-

-  यह संघर्ष प्रारंभ करने का श्रेय- पुलकेशिन द्वितीय को जाता है।

-  जो लगभग 200 वर्ष तक संघर्ष चला।

-  पल्लव शासक महेनद्रवर्मन प्रथम को पराजित कर काँची के उत्तरी-पूर्वी हिस्से पर अधिकार कर लिया।

-  इसी भाग पर पूर्वी चालुक्य (वेंगी) की नींव डाली – संस्थापक अपने भाई “कुब्ज विष्णुवर्धन” को बनाया।

-  महेन्द्र वर्मन मृत्यु के बाद पुन: काँची पर आक्रमण किया।

-  महेन्द्रवर्मन के पुत्र – नरसिंह वर्मन ने पुलकेशियन द्वितीय को पराजित किया।

-  नरसिंह वर्मन ने श्रीलंका के शासक “मानवर्मा” की सहायता से पुलकेशियन द्वितीय को बादामी मे पुन: पराजित कर उसके शरीर पर “विजित” लिखवा दिया।

-  नरसिंह वर्मन ने वातापीकोंड (वातापी को तोड़ने वाला) की उपाधि धारण की।

-  पुलकेशिन द्वितीय ने शर्मसार होकर आत्महत्या कर ली।

नोट:- अंजता की गुफ संख्या 16 में पूलकेशिन द्वितीय को ईरानी राजदूत शाह परवते खुशरो द्वितीय का स्वागत करते हुए दिखाया गया है।

विक्रमादित्य प्रथम (655 ई. – 681 ई.)

-  पुलकेशिन द्वितीय का पुत्र था।

-  येवूर अभिलेख (कर्नाटक) के अनुसार “पुलकेशिन II” की मृत्यु के बाद लगभग – 13 वर्ष तक पल्लव सांमत “अमर व आदित्यवर्मन” ने बादामी पर शासन किया था।

-  विक्रमादित्य ने अपनी नाना – गंग वंश के “दुर्रविनित” व अपने भाई जयसिंह वर्मन की सहायता से वातापी पर पुन: अधिकार किया।

-  अपने पिता की हत्या का बदला लेने हेतु पल्लवों पर आक्रमण कर नरसिंह वर्मन के पुत्र “महेन्द्रवर्मन द्वितीय” को मार डाला।

विनादित्य - (681 ई. – 696 ई.)

-  इसने पल्लव, केरल, चोल, पाण्डेय पर विजय प्राप्त की।

-  उपाधियाँ – राजाश्रय, युद्धधमल्ल

विजयादित्य :- (696 ई. – 733 ई.)

-  सबसे लम्बे समय तक शासक रहा।

-  श्रेष्ठ निर्माता माना जाता है।

-  इसने पट्डक्कल (कर्नाटक) में विशाल शिव मंदिर का निर्माण द्रविड़ शैली में करवाया।

विक्रमादित्य II (733 ई.- 747 ई.)

-  विजयादित्य का पुत्र था।

-  इसके समय द.भारत पर अरबों का आक्रमण हुआ।

-  इस आक्रमाण का सामना करने हेतु अपने भाई “जयसिंह वर्मन प्रथम” को भेजा।

-  जयसिंह ने अरबों को पराजित कर भागने पर बाध्य कर दिया।

-  विक्रमादित्य II ने जयसिंह को “अवनिजनाश्रे (पृथ्वी के लोगों को शरण देने वाला)” उपाधी दी।

-  विक्रमादित्य II ने पल्लव शासक नंदीवर्मन को पराजित कर काँचीकोण्ड की उपाधी धारण की।

-  विक्रमादित्य II की दो पत्नीयाँ थी –

1. लोकमहादेवी – लोकेश्वर शिव मंदिर का निर्माण

वर्तमान (विरूपाक्ष) मंदिर कर्नाटक हम्पी

2. लोक्यमहादेवी – त्रिलोकेश्वर शिव मंदिर

मल्लिकार्जुन शिव मंदिर हम्पी कर्नाटक

विक्रमादित्य - 733 ई. - 747 ई.

- 3 बार पराजित किया - काँची पल्लव को।

- काँची कोड (काँची को तोड़ने वाला)

- विक्रमादित्य की दो पत्नियाँ थी।

1. लोक महादेवी - इसने लोकेश्वर शिव मंदिर बनवाया।

- इसके अन्य नाम लोकेश्वर देवालय

- विरूपाक्ष शिव मंदिर

2. त्रिलोक्य महादेवी - त्रिलोकेश्वर शिव मंदिर

- इसे मल्लिकार्जुन मंदिर भी कहा जाता है।

- कैलास पर्वत को उठाते हुए रावण का चित्र

- बलि का वध करते राम का चित्रण

- कृष्ण लीला का चित्रांकन भी इस मंदिर में मिलता है

कीर्तिवर्मन II (747 ई. - 757 ई.)

- कीर्तिवर्मन ने अपने पिता के शासनकाल के दौरान ही पल्लवों को पराजित किया था।

- अत: विक्रमादित्य II ने इसे अपना उत्तराधिकारी बनाया।

- वातापी/बादामी के चालुक्यों का अंतिम शासक था।

- इसी के शासनकाल के दौरान राष्ट्रकूटों का उदय हुआ।

- राष्ट्रकूट दंतिदुर्ग ने अपनी पुत्री का विवाह पल्लव नरेश नंदिवर्मन के साथ किया था।

- दंतिदुर्ग ने आक्रमण कर चालुक्यों से महाराष्ट्र व गुजरात के क्षेत्र छीन लिए।

- कीर्तिवर्मन II ने इन क्षेत्रों पर पुन: अधिकार करने हेतु आक्रमण किया। परन्तु दन्तिदुर्ग ने कीर्तिवर्मन II को मार डाला इस प्रकार वातापी बादामी चालुक्यों के अंत के साथ राष्ट्रकूटों का उदय हुआ।

कल्याणी (लाट) चालुक्य (950 - 1190 ई.)

- उदय कैसे - राष्ट्रकूटों के पतन के बाद

- संस्थापक - तैलप II

- तैलप II ने राष्ट्रूकूट वंश के अंतिम शासक कर्क II को मार इस वंश की नींव डाली।

- कौन - नीलकंठ शास्त्री के अनुसार तैलप II से पूर्व इस वंश के लोग बीजापुर के आस पास के क्षेत्रों में राष्ट्रकूटों के सामंत थे।

- मुलत: यह कन्नड़ देश (केरल) के निवासी थे।

- तैलप II से पूर्व कीर्तिवर्मन III तैलप प्रथम, विक्रमादित्य III भीमराज, अय्यण विक्रमादित्य चतुर्थ का उल्लेख मिलता है।

- अय्यण ने राष्ट्रकूट वंश के शासक कृष्ण II की पुत्री के साथ विवाह किया - पुत्र विक्रमादित्य IV

- विक्रमादित्य IV का पुत्र तैलप II कल्याणी चालुक्यों का संस्थापक था।

सोमेश्वर चतुर्थ - अंतिम शासक

तैलप - II (973 - 997 ई.)

• पिता का नाम विक्रमादित्य चतुर्थ था।

• माता का नाम कलचुरी के शासक लक्ष्मण सेन की पुत्री बोन्था देवी थी।

• कल्याणी चालुक्य की स्वतंत्रता का संस्थापक माना जाता है।

• राष्ट्रकूट वंश के शासक कर्क III को पराजित कर उसकी राजधानी मान्यखेत पर अधिकार कर लिया था।

• अपनी राजधानी कल्याणी को बनाया।

तैलप द्वितीय ने राष्ट्रकूट सामंतों को पराजित करने हेतु निम्न अभियान -

1. शिमोगा कर्नाटक के राष्ट्रकूट सामंत शांति वर्मा को पराजित किया।

2. गंगवंश के शासक पांचालदेव को पराजित कर मार डाला।

3. वनवासी के शासक कन्नप व शोभन को अधीनता स्वीकार कराई।

4. दक्षिणी कोकण के शालिहार वंश को पराजित कर दक्षिणी कोंकण पर अधिकार कर लिया।

980 ई. में चोल साम्राज्य पर आक्रमण कर वहाँ के शासक उत्तम चौल को पराजित किया था।

इस प्रकार कल्याणी चालुक्य व चोल संघर्ष प्रारंभ हुआ था।

मालवा आक्रमण-

शासक - मुंज परमार

उल्लेख - प्रबंध चिंतामणि

प्रबंध चिंतामणि का लेखक मेरूतुंग था।

प्रबंध चिंतामणि में गुजरात का इतिहास लिखा गया है।

तैलप II ने मालवा के मुंज परमार पर छह बार आक्रमण किया था परन्तु हर बार तैलप II पराजित हुआ।

अंतत: मुंज ने तैलप पर निर्णायक विजय प्राप्त करने हेतु सातवीं बार गोदावरी नदी को पार करते हुए तैलप II पर आक्रमण किया।

तैलप II ने मुंज परमार को युद्ध में पराजित कर बंदी बनाकर मार डाला।

तैलप II ने महाराजाधिराज, चक्रवर्ती व परमेश्वर की उपाधि धारण की थी।

सत्याश्रय (997 ई. - 1008 ई.)

तैलप II का पुत्र था, साम्राज्यवादी नीति का अनुसरण किया था।

अपने साम्राज्य विस्तार हेतु निम्न अभियान -

1. उत्तरी कोंकण सत्याश्रय ने शालिहार वंश को पराजित कर उत्तरी कोंकण पर अधिकार कर लिया था।

2. गुर्जर राजय पर विजय यहाँ के शासक चामुण्डराय को पराजित किया था।

3. मालवा संघर्ष - मुंज परमार की मृत्यु के बाद सिन्धुराज शासक बना था।

सत्याश्रय ने मालवा पर अनेक आक्रमण किए प्रत्येक बार सिन्धुराज ने उसे पराजित किया व मालवा के खोये प्रदेश पुन: प्राप्त कर लिए थे।

सत्याश्रय का यह अभियान असफल हो गया था।

-: सत्याश्रय :-

चोलो से संघर्ष :-

जयसिंह II, (1015 ई. – 1043 ई.)

चोलो के साथ संघर्ष

1. राजराज      

2. विष्णु वर्धन विजयादित्य सप्तम

सोमेश्वर प्रथम : (1043 - 1068)

  1. सोमेश्वर प्रथम ने वेंगी पर आक्रमण किया और राजराज को पराजित कर दिया और विक्रमादित्य VII को शासक बना दिया था।

  2. राजराज भागकर चोलो कर शरण में चला गया। राजेन्द्र चोल ने पुन: राजराज को शासक बना दिया। परन्तु कुछ समय बाद राजेन्द्र चोल की मृत्यु हो गई।

  3. राजराज ने सोमेश्वर की अधीनता स्वीकार कर ली।

  4. राजाधिराज चोल ने वेंगी पर आक्रमण कर जीत लिया और विजैन्द्र की उपाधि धारण की थी।

  5. 1052 ई. में तुगंभ्रदा नदी के पास कोप्पम का युद्ध लड़ा गया जिसमें सोमेश्वर प्रथम ने राजाधिराज को पराजित करके मार डाला था।

-: सोमेश्वर प्रथम (1043 – 1068 ई.)

- कल्याणी को अंतिम रूप से राजधानी बनाया था।

-  चोलो के साथ संघर्ष :-

-  कारण :- वेंगी उत्तराधिकार

-  सोमेश्वर प्रथम भी अपने पिता की भाँति विजयादित्य के पक्ष में था।

-  सोमेश्वर ने वेंगी पर आक्रमण – राजराज को पराजित कर विजयीदित्य-VII को शासक बना दिया।

-  राजराज चोल शासक – राजेन्द्र प्रथम की शरण में चला गया था।

-  राजेन्द्र प्रथम ने वेंगी पर आक्रमण कर विजयादित्य VII को पराजित कर राजराज को पुन: शासक बना दिया था।

-  राजेन्द्र प्रथम की मृत्यु के बाद राजराज ने सोमेश्वर प्रथम की अधीनता स्वीकार कर ली।

-  राजेन्द्र के पुत्र – राजाधिराज ने वेंगी पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया तथा विजेन्द्र की उपाधि धारण की थी।

-  कोप्पम का युद्ध – कब : 1052 ई.

-  कहाँ – कृष्णा नदी के किनारे

-  राजाधिराज ने इस युद्ध के प्रारंभ में सोमेश्वर के कई क्षेत्र जीत लिया परन्तु अन्त में सोमेश्वर के हाथों मारा गया।

-  राजाधिराज के पुत्र राजेन्द्र II ने अपने पिता की हत्या का बदला सोमेश्वर को इस युद्ध में अंतिम रूप से पराजित कर लिया था।

उत्तरी कोकंण के साथ संघर्ष :-

-  उत्तरी कोकंण के शासक अनन्तपाल ने चालुक्यों से अपने आप को स्वतंत्र कर लिया था।

-  1068 ई. में सोमेश्वर प्रथम ने  तुंगभद्रा नदी में डुब कर आत्म हत्या कर ली थी।

-  सोमेश्वर II (1069 – 1076 ई.)

-  सोमेश्वर II सोमेश्वर प्रथम का पुत्र जो उसकी मृत्यु के बाद शासक बना था।

-  इसका छोटा भाई – विक्रमादित्य VI बड़ा महत्वकांक्षी था अत: उसने चोल शासक राजेन्द्र II की पुत्री के साथ विवाह कर गठबंधन कर लिया था।

-  राजेन्द्र II ने अपने दामाद को शासक बनाने हेतु – सोमेश्वर II पर आक्रमण किया।

- कल्याणी के दक्षिणी भाग पर अधिकार कर वहाँ का शासक अपने दामाद को बनाया था।

-: कल्याणी दो भागों में विभाजित हो गई

1. उत्तरी कल्याणी – शासक – सोमेश्वर  द्वितीय

2. दक्षिण कल्याणी – शासक – विक्रमादित्य VI

-  1070 ई. में राजेन्द्र II की मृत्यु हो गई।

-  विक्रमादित्य VI ने सोमेश्वर II पर आक्रमण कर उसे बंदी बना लिया था। 1076 ई. में अपने आपको कल्याणी का शासक घोषित कर दिया था।

-  विक्रमादित्य VI (1076- 1126 ई.)

-  विक्रमादित्य VI योग्य शासक था।

-  अपने राज्याभिषेक के समय 1076 ई. में चालुक्य विक्रम संवत चलाया था।

-  इसने एक नये नगर विक्रमपुर की स्थापना की थी।

-  विद्वानों का आश्रयदाता था, इसके दरबार में बिल्हण व विज्ञानेश्वर निवास करते थे –

-:  बिल्हण : कश्मीर का निवासी

ग्रंथ – विक्रमांकदेव चरित

-: विज्ञानेश्वर – इन्होंने याज्ञवल्क्य स्मृति पर

- “मिताक्षरा” नामक टीका लिखा था।

-: मिताक्षरा में उत्तराधिकार सिद्धान्तों का विवेचन है।

महत्वपूर्ण कार्य :-

-  वेंगी पर आक्रमण कर विक्रमादित्य VI ने चोलों को पराजित कर वहाँ अपने सेनापति अनंतपाल को शासक बनाया था।

-  कोंकण पर अधिकार कर अपना सामंत – कामदेव को नियुक्त किया था।

-  यादवों के विद्रोह का दमन

-  श्रीलंका के शासक – विजयबाहु की सभा में एक दूतमंडल भेजा।

-  सोमेश्वर III (1126-1138 ई.)

-  अंतिम प्रतापी शासक माना जाता है।

-  उपाधि – सर्वज्ञभूप:

-  ग्रन्थ – मानसोल्लास (शिल्पशास्त्र पर आधारित)

-: इसकी मृत्यु के बाद जगदेव मल्ल II

- (1139 – 1151 ई.) तक शासक बना था।

-: जगदेव के बाद तैलप III शासक बना।

-  तैलप III के बाद उसका पुत्र सोमेश्वर चतुर्थ (1181-1189 ई.) शासक बना।

-: जिसने कल्याणी चालुक्य की प्रतिष्ठा पुन: स्थापित करने का प्रयास किया परन्तु असफल रहा।

-  इसी के समय – देवगिरी (MH) के यादवो ने कल्याणी पर अधिकार कर लिया था।

-  दक्षिणी भाग पर होयसेलों ने अधिकार कर लिया था।

-  सोमेश्वर IV भागकर वनवासी चला गया था।

-: कल्याणी चालुक्यों का पतन हो गया था।

 

चोलों की जानकारी के स्त्रोत :-

1. अशोक के शिलालेख संख्या-13 में चोल राज्य में धम्म विजय का उल्लेख मिलता है।

2. संगम साहित्य – ई. की प्रथम शताब्दी से लेकर 300 ई. तक द.भारत के शासक संभाएँ (ज्ञान-विज्ञान, शास्त्रार्थ करते जिसे – संगम काल कहा गया)

-  संगम साहित्य से जानकारी – चोल साम्राज्य के प्रारम्भिक शासकों के बारे में जानकारी मिलती है।

-  चोलों के पड़ोसी राज्यों के साथ संबंधों के बारे में जानकारी मिलती है।

-  चोल शासक – कारिकाल का उल्लेख मिलता है।

-  कारिकाल के वाणक्य युद्ध के बारे में जानकारी मिलती है।

-  महावंश – बौद्ध ग्रन्थ

-  रचना – सिंहली द्वीप (श्रीलंका) में

-  चोल शासक – परान्तक प्रथम द्वारा पाण्डे्य शासकों पर विजय का उल्लेख मिलता है।

-  राजेन्द्र प्रथम द्वारा श्रीलंका विजय का उल्लेख मिलता है।

-  दीपवंश व महावंश को सिंहली अनुश्रुतियों के रूप में जाना जाता है (दोनों ही बौद्ध ग्रन्थ है)

-  वीरशोलियम् :– रचना – बुद्धमित्र

-  व्याकरण ग्रन्थ

-  उल्लेख वीर राजेन्द्र के बारे में जानकारी मिलती है।

-  अभिलेख :- 1. लीडन दानपत्र लेख – राजराज प्रथम के बारे में जानकारी मिलती है।

2. तंजौर अभिलेख – राजराज प्रथम के बारे में जानकारी मिलती है।

3. करन्दे अभिलेख – राजेन्द्र प्रथम के बारे में जानकारी मिलती है।

-: चोल वंश :-

-  दक्षिण भारत का सबसे प्राचीनतम वंश माना जाता है।

-  उदय : संगमकाल (3 शताब्दी) में परन्तु राजनैतिक उत्थान नवी शताब्दी में हुआ था।

-  चोल का शाब्दिक अर्थ – घूमना

-  चोल वंश का संस्थापक – विजयालय था

-  विजयालय (850 ई. – 871 ई.)

-  यह पल्लवों का सामन्त था।

-  तंजौर पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की थी।

-  नरकेशरी की उपाधि धारण की थी।

-   तंजौर में चोल साम्राज्य की नीव डाली।

-  चोलों की राजधानी थी – तंजौर

-  आदित्य प्रथम (871 ई. – 907 ई.) :-

-  प्रथम शक्तिशाली शासक जिसने पल्लवों को पराजित किया था।

-  उपाधि – कोदण्डराम

-  परान्तक प्रथम (907 ई. – 953 ई.) :-

-  915 ई. में वेल्लूर (कर्नाटक) के युद्ध में पाण्डे्य शासक राजसिंह-II व श्रीलंका के शासक कश्यप पंचम को पराजित किया।

-  मुदरै के युद्ध में पाण्डे्य शासकों को अंतिम रूप से पराजित कर “मदुरैकोण्ड” की उपाधि धारण की।

-  Note : 953 ई. से लेकर 985 ई. तक चोल साम्राज्य में राजनैतिक उठापटक रही इस दौरान उत्तम चोल (973-985 ई.) शासक जिसने पहली बार सोने के सिक्के चलाए ऐसा करने वाला प्रथम शासक था।

राजराज प्रथम (985-1014 ई.) :-

-  प्रथम सबसे प्रतापी शासक था।

-  श्रीलंका के शासक महेन्द्र-v को पराजित कर श्रीलंका के उत्तरी भाग पर अधिकार कर लिया था।

-  इस उत्तरी भाग को चोल साम्राज्य का एक प्रांत बनाया तथा इसका नाम “मुम्डीचोलमंडलम” रखा था।

-  श्रीलंका पर विजय की स्मृति में तंजौर में विशाल शिव मंदिर का निर्माण करवाया था जिसे “राजराजेश्वर शिव मंदिर/बृहदेश्वर शिव मंदिर” कहा जाता है।

-  1000 ई. में इसने भू-सर्वेक्षण ताकि भू-राजस्व का निर्धारण किया जा सके।

-  स्थानीय स्वशासन को प्रोत्साहन दिया।

-  एक दूत मण्डल चीन भेजा।

-  अपनी विजयों का समापन मालदीव समूह पर विजय प्राप्त करके किया था। जिसने

-  राजेन्द्र चोल प्रथम ऐसा शासक –भारतीय सीमाओं को जलमार्ग द्वारा बंगाल की खाड़ी तक स्थापित कर दिया था।

-  इन समस्त कारणों से बंगाल की खाड़ी को “चोलों की झील” कहा गया है।,

-  कावेरी नदी के किनारे “गंगकोडचोलपुरम” नगर की स्थापना तथा यहाँ पर “चोलगंगम” नामक तालाब का निर्माण करवाया था।

-  चालुक्य शासक जयसिंह-II व पाल शासकों को पराजित कर इस तालाब में गंगाजल लाकर डाला तथा इस तालाब से निकली जलधारा को राजेन्द्र चोल का जलीय स्तंभ कहा जाता था।

राजाधिराज प्रथम (1044-1052 ई.) :-

-  इसने चेर, पाण्डे्य व श्रीलंका पर नियंत्रण रखा था।

-  वेंगी चालुक्य उत्तराधिकार संघर्ष में भाग लिया था।

-  कल्याणी को जीतकर – विजेन्द्र की उपाधि धारण की थी।

-  1052 ई. में कृष्णा नदी के किनारे हुए कोप्पम युद्ध में सोमेश्वर प्रथम के हाथों मारा गया था।

राजेन्द्र-II (1052-1064 ई.) :-

- अपने पिता राजाधिराज की हत्या का बदला लेने हेतु कोप्पम की युद्ध भूमि में ही सोमेश्वर प्रथम को पराजित किया था।

- इस विजय के उपलक्ष में “कोल्हापुर” में एक विजय स्तंभ का निर्माण करवाया तथा अपना राज्याभिषेक करवाया था।

- 1062 ई. में कुंडलसंगम (कर्नाटक) के युद्ध में सोमेश्वर प्रथम को पुन: पराजित कर प्राकेसरी की उपाधि धारण की थी।

वीर राजेन्द्र (1064-1070 ई.) :-

- वीर राजेन्द्र, राजेन्द्र-II का पुत्र था।

- 1066 ई. इसने कल्याणी के शासक सोमेश्वर प्रथम को पराजित किया था ।

- सोमेश्वर ने अगले वर्ष पुन: लड़ने को चुनौती दी थी।

- 1067-68 ई. कुंडलसंगम के युद्ध में सोमेश्वर प्रथम बीमार होने के कारण स्वयं न आकर अपनी सेना को वीर राजेन्द्र से लड़ने भेजा था।

- वीर राजेन्द्र ने सोमेश्वर की सेना को पराजित किया था।

- तुंगभद्रा नदी के किनारे “विजय स्तंभ” व “राजकेशरी” की उपाधि धारण की थी।

- विजयवाड़ा (बैजवाड़ा) के युद्ध में वेंगी चालुक्यों को पराजित कर वेंगी पर पुन: चोलों का अधिकार स्थापित किया था।

- Note : वीर राजेन्द्र की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों में उत्तराधिकार संघर्ष हुआ, जिसमें अधिराजेन्द्र विजय रहा व शासक बना।

- 1070 ई. में जनविद्रोह में अधिराजेन्द्र की मृत्यु हो गई मूल चोल वंश समाप्त हो गया।

कुलोत्तुंग प्रथम (1070-1120 ई.) :-

- कौन – मुलत: यह वेंगी चालुक्य शासक राजेन्द्र द्वितीय था, जिसने अधिराजेन्द्र की मृत्यु के बाद चोल साम्राज्य पर अधिकार कर अपना राज्याभिषेक “कुलोत्तुंग प्रथम” के नाम से करवाया था।

- इसके समय भी अनेक जन विद्रोह हुए।

- 1076 ई. में सिंहल द्वीप (श्रीलंका) ने अपने आप को स्वतंत्र कर लिया था।

- 1078/79 कल्याणी शासक विजयादित्य (विक्रमादित्य) के साथ हुए युद्ध में इसने कल्याणी शासक को पराजित कर गंगवाडी पर अधिकार कर लिया था।

- पाण्डे्य व चेरो ने भी विद्रोह किए परन्तु उनका दमन कर दिया था।

- कलिंग आक्रमण :-

- कुलोत्तुंग ने दो बार कलिंग पर आक्रमण किया था :-

1. 1096 ई. – द.कलिंग के विद्रोह का दमन करने हेतु।

2. 1110 ई. – कलिंग शासक अंनतवर्मन को पराजित कर कलिंग पर अधिकार कर लिया था।

- उपाधि – श्रीभुवनचक्रवर्तिन (तीनों लोको का स्वामी)

- 1120 ई. में इसकी मृत्यु के साथ ही चोलों का पतन प्रारंभ हो गया था।

- राजेन्द्र-III (1246-1279 ई.) :-

- चोल वंश का अंतिम शासक।

- इसी ने मदुरै के पण्डे्य शासक सुन्दर पाण्डे्य, चेर, कावतीय व होयसल पर विजय प्राप्त की थी।

- सुंदर पाण्डे्य ने राजेन्द्र-III पर आक्रमण कर पराजित किया व इसे अपना सामंत बना लिया था।

- चोल साम्राज्य का विभाजन पाण्डे्य व होयसलो में हो गया था।

चोल प्रशासन:-

- शासन की प्रकृति- राजतंत्रात्मक थी।

- राजा की मृत्यु के बाद- ज्येष्ठाधिकार था।

- उपराजा का सामान्यत- राजकुमारियों को दिया जाता था।

- प्रशासन से संबंधित शब्दावली:

1. राजा के मौखिक आदेश- तिरुवायकेल्लि कहलाता था।

दो प्रकार के सरकारी अधिकारी

1 पेरुन्दनम: उच्च श्रेणी के अधिकारी

2 शिरुन्दम: निम्न श्रेणी के अधिकारी

- वैडेक्कार: राजा के व्यक्तिगत अंगरक्षक

- उडेनकुट्टम: शाब्दिक अर्थ: सदा प्रस्तुत समूह

- उडेनकुट्टम: में राजा के निजी सहायक शामिल होते थे।

- उडेनकुट्टम में आदेशों को लिपिबद्ध करने का कार्य किया जाता था।

Note- अधिकारियों को वेतन के रूप  में भूमि दी जाती थी।

साम्राज्य विभाजन:- 

- प्रशासन इकाई- केन्द्र (देश)

- मण्डलम (राज्य/प्रांत)

- कोट्टम/ वलनाडु:जिला

- नाडु- तहसील

- कुर्रम- ग्राम पंचायत

- गाँव- प्रशासन की सबसे छोटी इकाई

- इनके सिक्कों पर – व्याघ्र, मछली, धनुष, वराह का अंकन होता था।

- दक्षिण भारत में वराह प्रकार का सिक्का सबसे ज्यादा प्रचलित था।

- ताँबे के सिक्के हेतु कणि शब्द का प्रयोग किया गया था।

- उत्तम चोल प्रथम चोल शासक जिसने सोने के सिक्के चलाए

सैन्य प्रशासन-

- चोलो की 4 प्रकार की सेना थी- 1. पैदल सेना, 2.  अश्व सेना, 3. गज सेना, 4. जल सेना

- रथ सेना का उल्लेख नहीं मिलता है।

- सेना की टुकडी को- गुल्प

- सेना के प्रमुख- नायक

- सेनापति को- महादण्डनायक

- वीरतापूर्वक लडने वाले सैनिको को क्षत्रिय शिरोमणि की उपाधि दी जाती थी।

स्थानीय स्वशासन:-

-  चोल काल में सता का विकेन्द्रीकरण था।

- उर: सभी लोगों की ग्राम सभा (गाँव के सभी लोग शामिल) थी।

- सभा/महासभा: गाँव के ब्राह्मणों की सभा थी।

- नगरम: व्यापारिक समुदाय की प्रशासनिक सभा जिसमें केवल व्यापारी वर्ग ही शामिल था।

Note- स्थानीय स्वशासन विभिन्न समितियों द्वारा संचालित होता था जिन्हें वारियम कहा जाता था।    

चोल कला:-

- चोलकाल में पल्लवों द्वारा प्रारंभ की गई द्रविड़ मंदिर स्थापत्य कला अपने चरम विकास पर पहुँच गई थी।

- चोलकालीन मंदिर- आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रमुख केन्द्र थे।

चोल मंदिरों की विशेषता-

- इनका निर्माण ऊँचे वर्गाकार चबूतरे पर किया जाता था।

- ऊँचे विमान बनाए जाते थे।

- मंदिरों में राजा की प्रतिमा स्थापित की जाती थी तथा उनका पूजन देवता के रूप में किया जाता था।

- भीतरी भाग (गृभग्रह)

- भगवान की प्रतिमा स्थापित की जाती थी।

- चोल मंदिरों के संदर्भ में फर्ग्यूसन का कथन- चोल कलाकारों ने इन मंदिरों का निर्माण दानवों की भाँति किया तथा रत्नकारों (जोहरियों) की तरह विन्यास किया था।

- सभी मंदिर तमिलनाडु में स्थित है-

मंदिर → शासक → स्थान

चोलेश्वर मंदिर(शिव)- विजयालय – नरतमल्लै (तमिल)

- बृहदेश्वर मंदिर (राजराजेश्वर मंदिर)

- बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण- राजराज प्रथम ने करवाया था।

- बृहदेश्वर मंदिर स्थित है- तंजौर (दारासुरम)

- द्रविड़ शैली का सर्वोत्कृष्ठ नमूना माना जाता है।

- 1987 ई. में इसे यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत (धरोहर) सूची में शामिल किया गया था

- त्रिभुवनेश्वर मंदिर- कुलोत्तुंग III- त्रिभुवन तंजौर

- शिव मंदिर- अज्ञात- त्रिवलीश्वुर

- यह मंदिर भी चोलकालीन है।

- कम्हेश्वर मंदिर- कुलोत्तुंग III – त्रिभुवन (कुंभकोणम)

- सबसे बड़ा मंदिर- बृहदेश्वर शिव मंदिर।