थायरॉइड हॉर्मोन्स (T3+T4) के कार्य –
ये हॉर्मोन्स हमारी उपापचयी क्रियाओं को प्रेरित करते हें तथा शारीरिक वृद्धि एवं विकास को प्रेरित करते हैं।
ये शारीरिक तापमान एंव हृदय की धड़कन का नियमन करते हैं।
ये वृद्धि अवस्था के दौरान ये हॉर्मोन्स मानसिक विकास को प्रेरित करते हैं।
थायरॉक्सिन हॉर्मोन्स (T4 हार्मोन्स) उभयचरों के कायान्तरण में सहायक हैं।
मेढ़क टेडपोल लार्वा को वयस्क मेढ़क में रूपान्तरित करने की क्रिया कायान्तरण कहलाती है।
थायरॉइड हॉर्मोन्स के अतिस्त्रवण से होने वाले रोग-
1. पेरी रोग
2. प्लूमर
(1) पेरी रोग/बेसडाऊ/एक्सोफ्थैलिक/गॉयटर/घेंघा-
रोगी में थायरॉइड हॉर्मोन्स की अधिकता, उपापचयी क्रियाऐं तीव्र, भूख-प्यास की अधिकता पसीने का अधिक स्त्रवण, हृदय धड़कन तीव्र, नेत्रों के पीछे तरल पदार्थ का जमाव होने से नेत्र बड़े-बड़े एंव बाहर की ओर उभरे हुए दिखाई देते हैं।
इनमें थायरॉइड ग्रंथि में सूजन आ जाती हैं।
(2) प्लूमर रोग – इसमें थायरॉइड में गाँठे बन जाती हैं।
थायरॉइड हॉर्मोन्स के अल्प स्त्रवण से होने वाले रोग:-
जड़वामनता (क्रिएटेनिज्म)
गुल रोग
साधारण घेंघा
हशिमोटा
(I) जड़वामनता (क्रिएटेनिज्म):-
बच्चों में थायरॉइड हॉर्मोन्स की कमी से मानसिक विकास नहीं हो पाता हैं।
ये बच्चे मन्दबुद्धि के रह जाते हैं।
(II) गुल रोग –
वयस्कों में थायरॉइड हॉर्मोन्स की कमी से शारीरिक वजन में वृद्धि, शरीर पर सूजन, मोटापे में वृद्धि, हृदय धड़कन में कमी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
(III) साधारण घेंघा –
यह रोग भोजन में आयोडीन की कमी से होने वाला रोग है।
ये रोग पहाड़ी क्षेत्रों में लोगों में एण्डेमिक रुप में पाया जाने वाला रोग है।
(IV) हाशिमोटा –
ये एक स्व प्रतिरक्षा रोग है, जिसमें थायरॉइड हॉर्मोन्स की अत्यधिक कमी हो जाती है तथा हमारे शरीर थायरॉइड ग्रंथि के विरूद्ध एंटीबॉडीज बन जाती है, जो इसे नष्ट करने लग जाती है, अत: इसे थायरॉइड की आत्महत्या कहते हैं।