अधिवृक्क ग्रंथि (Adrenal Gland)-
ये ग्रंथि दोनों वृक्कों के ऊपर स्थित होती हैं।
इसे 3F ग्रंथि भी कहते हैं क्योंकि आपातकालीन परिस्तियों में ये ग्रंथि अनुरकंपी तंत्रिका तंत्र के साथ मिलकर हमें प्रतिक्रिया देने हेतु तैयार करती हैं, ये प्रतिक्रियाएँ निम्न हैं-
Flight (पलायन)
Fear (डर)
Fight (संघर्ष)
एड्रीनल ग्रंथि को 4S ग्रंथि कहते है, जिसके द्वारा निम्न 4 (चार) कार्य किए जाते हैं-
Salt Reteution/ लवण धारण करना
Suger Metabolism/ शर्करा की मात्रा का नियमन करना
Sex- Harmones/ लिंग हॉर्मोन्स का स्त्रवण
Stress Management/ दबाव प्रबधंन
एड्रीनल ग्रंथि के दो भाग होते हैं-
(A) कार्टेक्स भाग-
(i) मिनरेलोकॉर्टिकोइड हॉर्मोन्स- इससे स्त्रावित एल्डोस्टीरोन हॉर्मोन्स रक्त में Na+ आयन्स की मात्रा को बढ़ाता हैं जबकि K+ आयन्स के उत्सर्जन को बढ़ाता हैं- रक्तदाब, मूत्र निर्माण क्रिया की नियमन करता है।
(ii) ग्लूकोकॉर्टिकॉयड हॉर्मोन्स – इनसे स्त्रावित हॉर्मोन्स को कार्टिसोल, कॉर्टिसोन, कॉर्टिकोस्टीरोन कहते हैं।
यह रक्त में ग्लूकोज की मात्रा को बढ़ाते हैं।
ये हार्मोन्स WBC की संख्या में कमी लाकर हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम करता है।
इस हार्मोन्स को ‘तनाव हार्मोन्स’ कहते हैं।
वर्तमान में कार्टिसॉल का उपयोग अंग प्रत्यारोपण तथा गठिया रोग में किया जाता हैं।
(iii) गानेडोकॉर्टिकॉयड हॉर्मोन्स –
इनमें स्त्रावित हॉर्मोन्स एन्ड्रोजन (नर) तथा एस्ट्रोजन (मादा) कहलाते हैं।
नोट- सभी लैंगिक हॉर्मोन्स स्टेरॉयड होते हैं।
(B) आन्तरिक भाग-
एड्रीनलीन हॉर्मोन्स
नॉर एड्रीनलीन हॉर्मोन्स आपातकालीन परिस्थितियों में एड्रीनलीन हॉर्मोन्स जबकि सामान्य परिस्थितियों में नॉर एड्रीनलीन हॉर्मोन्स हृदय दर का बढ़ाते हैं।
एड्रीनल ग्रंथि से संबंधित रोग-
(i) एडीसन रोग-
मिनरेलोकार्टिकॉयड तथा ग्लूकोकॉर्टिकॉयड की कमी अर्थात् यह रोग कार्टिसोल की कमी से होने वाला रोग हैं।
इस रोग में जल, रक्तदाब, BMR तथा ताप की कमी हो जाती हैं।
(ii) कुशिंग सिन्ड्रोम-
कार्टिसोल की अधिकता से कुशिंग सिन्ड्रोम होता है।
इसस रोग में शरीर चौडा, वसा की मात्रा बढ़ जाती है तथा ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती हैं।
(iii) कॉन्स सिन्ड्रोम (एल्डोस्टीरॉनिज्म)
यह एल्डोस्टिरॉन की उच्च मात्रा से उत्पन्न विकार है।
नोट- Na+ व K+ तत्त्वों की गड़बड़ी होने से तंत्रिका कोशिका प्रभावित होती हैं।
(iv) विरलिज्म-
मादा में नर के लक्षण दिखाई देना।
(v) गायनेकोसेस्टिजिया-
नर में मादा के लक्षण दिखाई देना।
जैसे:- (i) आवाज पतली
(ii) स्तनों का विकास।
(iii) कमर के नीचे वाला भाग चौड़ा।