जैव-प्रौद्योगिकी
जैव-प्रौद्योगिकी के अंतर्गत वे सभी क्षेत्र आते हैं, जो सजीवों तथा उनसे प्राप्त पदार्थों के कृषि तथा उद्योग में उपयोग के लिए विकसित किये गये हैं, यथा-जैव उर्वरक, जैविक गैस, ऊतक संवर्द्धन, जीन अभियांत्रिकी, भ्रूण प्रतिरोपण, परखनली शिशु आदि। इस तकनीक के कई उत्पादों खमीर, एंजाइम टीके, प्रतिजैविक औषधियां, अल्कोहल, अमीनो अम्ल, हार्मोन साइट्रिक एसिड, लैक्टिक एसिड, आदि पर मनुष्य की निर्भरता बढ़ती जा रही है। जैव तकनीकी में हुआ विकास लगभग 20 वर्षों में जीव विज्ञान, आणविक जीव विज्ञान, जीन अभियांत्रिकी तथा रासायनिक अभियांत्रिकी के क्षेत्र में विभिन्न खोजों का परिणाम है। छोटे जन्तुओं, जीवाणुओं तथा पादपों की सहायता से वस्तुओं के उत्पादन की प्रक्रिया जैव-प्रौद्योगिकी कहलाती है। क्लोंनिग की सफलता ने इस तकनीक को व्यापक महत्व प्रदान किया है। जैव-प्रौद्योगिकी के उपयोग से प्रदूषण नियंत्रण, जीवाणुओं के माध्यम से विषाक्त अपवर्ज्य पदार्थों का विघटन, नवीन ईंधन, आदि का उत्पादन संभव है।
जैव-तकनीक
जैव प्रतिकारक
जैव प्रतिकारको के प्रयोग से बहुत थोड़े समय में कम लागत तथा कम श्रम द्वारा पौष्टिक एवं परिष्कृत खाद्य सामग्रियों का उत्पादन संभव हो सका है। सबसे अधिक साधारण जीवित कोशिका, जोकि उपयोग में लायी जा सकती है, एक कोशिकीय यीस्ट और जीवाणु की है। एंजाइम उपयोग होने वाला एक जैविक अणु है जोकि प्रोटीन का बना हुआ होता है। यह जैविक क्रियाओं को उत्प्रेरित करता है। जैव संसाधन के एक रूप में सूक्ष्मजीवी किण्वनीकरण (Fermentation) , बीयर, वाइन, अचार, ब्रैड बनाने में प्रयोग किया जा रहा है। सूक्ष्म जीवों तथा उनकी जैविक क्रियाओं की खोज ने सूक्ष्म जैविक किण्वनीकरण में और भी वृद्धि कर दी है।
सामान्य रूप से उत्पन्न सूक्ष्म जीवों की कुछ असाधारण विनिर्माण क्षमताओं के कारण अनेक उत्पाद जैसे एंटिबायोटिक्स, अमीनों अम्ल, विटामिन, औद्योगिक विलायक, रंजक और खाद्य प्रसंस्करण उपलब्ध हुए हैं।
कोशिका संलयन
कोशिका संलयन तकनीक का विकास 1975 में डॉ. मिलस्टोन कोहलर एवं जेमे द्वारा किया गया। बाहरी बहुआणविक पदार्थ, जो सामान्यतः एक प्रोटीन होती है तथा किसी जीव में प्रवेश करके प्रति जैविक की उत्यत्ति को प्रोत्साहित करती है, प्रतिजन कहलाता है। इस प्रतिजन के खिलाफ प्रतिक्रिया स्वरूप ग्राही जीव, प्रति जैविक पदार्थ पैदा करता है। इस विधि के उपयोग से जीवाणु विषाणु व अन्य सूक्ष्म जीवों से पैदा होने वाली बीमारियों के उपचार में काफी सफलता प्राप्त की जा सकती है।
ऊतक संवर्द्धन
ऊतक संवर्द्धन एक ऐसी प्रौद्योगिकीय प्रविधि है, जिसमें पौधों अथवा जंतुओं की कोशिकाओं, ऊतकों अथवा अंगों को अलग कर उन्हें नियंत्रित ताप, दबाव व अन्य अनुकूल परिस्थितियों में विशेष पात्रों में विकसित किया जाता है। यह संवर्द्धन पात्रों में उपयुक्त पोषक तत्वों को उपलब्ध कराकर किया जाता है। यह तकनीक पौधों की वृद्धि, रोग-निरोधक व रसायन-प्रतिरोधी क्षमता को उपयुक्तता प्रदान करने के लिए किया जाता है। पोषक तत्वों में ऊर्जा की आपूर्ति मुख्यतः सुक्रोज द्वारा की जाती है, जो संशोधित भागों में उपलब्ध कराई जाती है। पोषक तत्व में सुक्रोज के अतिरिक्त जो अन्य तत्व विद्यमान रहते हैं, वे हैं-एमीनो अम्ल, ग्लाइसिन, लवण, विटामिन, आदि।
कृषि कार्य के लिए ऊतक संवर्द्धन बहुत ही ज्यादा उपयोगी है। इस तकनीक से पौधों में वांछित गुणों का प्रत्यारोपण ऊतक स्थानांतरण द्वारा किया जा सकता है। इस प्रकार के प्रयोग सब्जियों, फलों एवं फूलों की किस्मों में सुधार के लिए किए जा रहे हैं। ऊतक संवर्द्धन की सर्वाधिक लाभप्रद विशेषता यह है कि इसके द्वारा विभिन्न जलवायविक एवं प्रतिकूल कृषि मौसम दशाओं में उत्पादकता प्रदान करने वाली पादप प्रजातियों का विकास किया जा रहा है। पौधों के आनुवंशिक विकास में ऊतक संवर्द्धन चक्र प्रभावी हो सकता है। राष्ट्रीय रसायन प्रयोगशाला को बांस की कृषि के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल हुई। इसके द्वारा बांस की तीन प्रजातियों में पादप ऊतक संवर्द्धन द्वारा समय से पूर्व फूल को पुष्पित कराने में सफलता मिली है। नई विकसित प्रजातियां हैं-डेण्डोकलमस स्टिक्टस, बम्बुसा अरुण्डिनेसिया एवं डेण्ड्रोकलमस ब्रेनडिसी।
इसके अतिरिक्त इलायची, मिर्च, काजू कॉफी, अदरक, हल्दी, आदि के पौधों को कीटाणुओं से संरक्षण के लिए आर.आर.एल., त्रिवेंद्रम द्वारा फेरोमोन्स विकसित करने की दिशा में कार्य किया गया है। शकरकंद की घुन के लिए फेरोमोन्स का विकास किया गया है। इसका क्षेत्र परीक्षण सी.टी.सी.आई. के विशेषज्ञों की सहायता से सफलतापूर्वक किया गया। आर.आर.एल, जम्मू द्वारा परंपरागत क्षेत्रों में जूविनाइल हारमोंस के प्रयोग से रेशम की उत्पादकता बढ़ाने के लिए एक कार्यक्रम शुरू किया गया। इस हारमोन का उपयोग करने से रेशम के उत्पादन में 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
ऊतक संवर्द्धन तकनीक के उपयोग से चुने हुए वृक्षों की प्रजातियों के विकास और मानकीकरण के लिए अनुसंधान और विकास परियोजनाएं लागू की गई हैं। राष्ट्रीय महत्व के वन वृक्षों की फसल के विकास में ऊतक संवर्द्धन तकनीक प्रभावी मानी गयी है।
ऊतक संवर्द्धन तकनीक के माध्यम से 14 राष्ट्रीय महत्व के वृक्षों के विकास की पद्धतियों का मानकीकरण किया गया है। इन वृक्षों का इसी मानकीकरण के आधार पर. व्यापक स्तर पर उत्पादन किया जाएगा। आर्थिक महत्व की बागवानी और वृक्षों की फसलों (आम, चाय, कॉफी, रबड़, काजू तथा मसाले) पर अनुसंधान और विकास कार्य शुरू किए गए हैं। पुणे की राष्ट्रीय रसायन प्रयोगशाला तथा नई दिल्ली के टाटा ऊर्जा अनुसंधान संस्थान में ऊतक संवर्द्धन संयंत्रों में श्रेष्ठ किस्म के वन-वृक्षों का उत्पादन हो रहा है।
भारत में जीन अनुसंधान
भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चलायी गयी मानव जीनोम परियोजना में हिस्सेदारी नहीं की, लेकिन इससे मिले नतीजों का लाभ उठाने के लिए भारतीय वैज्ञानिक तैयार हैं। वैलकम ट्रस्ट के अनुसार, परियोजना के डाटाबेस से अब तक 1,08,000 से अधिक भारतीय वैज्ञानिक जीनोम की संरचना की जानकारी प्राप्त कर चुके हैं। गौरतलब है कि, इस जानकारी का पेटेंट नहीं कराया गया है और इसे कोई भी इंटरनेट के माध्यम से निःशुल्क प्राप्त कर सकता है। वर्ष 1999 में चेन्नई में आयोजित भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशन में ही देश के जाने-माने वैज्ञानिकों की राय थी कि भारत को ‘जीनोम युग’ का लाभ उठाना चाहिए, क्याकि उसके पास पर्याप्त अवसर हैं। दरअसल भारत को अपनी जातीय, जनजातीय और सामुदायिक विभिन्नता के कारण मानव आनुवंशिकी की जीती-जागती प्रयोगशाला माना जाता है। ‘ऐंथ्रोपोलौजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के अनुसार, हमारे देश में मानव समुदायों की संख्या 4,635 है, जिसमें 75 लुप्तप्राप्य जनजातियां भी शामिल हैं। इस तरह भारत की अनोखी और विशाल आनुवंशिक विविधता से अनेक उपयोगी और कल्याणकारी जीन मिलने की प्रबल संभावनाएं हैं। भविष्य में इनकी मदद से अनेक आनुवंशिक रोगों का इलाज ढूंढ़ा जा सकता है। इसके अतिरिक्त कैंसर, मधुमेह और तपेदिक जैसे खतरनाक रोगों की व्यापकता और घातकता समझने में भी मदद मिलेगी। हैदराबाद स्थित देश के प्रतिष्ठित संस्थान ‘कोशिकीय एवं आण्विक जैविकी केंद्र (सीसीएमबी.), के निदेशक डा. लालजी सिंह कहते हैं कि वैज्ञानिक प्रगति किसी की प्रतीक्षा नहीं करती। इसलिए हमें जीनोम प्रौद्योगिकी का लाभ उठाने में देरी नहीं करनी चाहिए। शायद इसीलिए ‘भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद्‘ (आईसीएमआर.) द्वारा मानव जीनोम अनुसंधान पर प्रस्तावित 120 परियोजनाओं को हरी झंडी दिखा दी गयी है। योजना के अनुसार, भारतीय मूल के जीनोम से संबंधित समस्त जानकारी को राष्ट्रीय स्तर के डाटाबेस में सुरक्षित रखा जाएगा ताकि सभी अनुसंधान संगठन, केंद्र आदि इसका लाभ उठा सकें। इसके लिए देशभर में डी.एन.ए. बैंक स्थापित किए जा रहे हैं। देश का औषधि निर्माण व उत्पादन क्षेत्र भी जीनोमिक्स में गहरी रुचि ले रहा है। निकोलस पीरामल और रैनबैक्सी जैसी कंपनियों ने इसके लिए आवश्यक तैयारियां कर ली हैं। भारत सरकार के जैव-प्रौद्योगिकी विभाग की योजना के अनुसार, मानव जीनोम पर अध्ययन करने के लिए देश भर में उन्नत अनुसंधान केंद्रों का जाल बिछाया जाएगा ऐसा पहला केंद्र बेंगलूरु में स्थापित किया गया जिसका नाम ‘मानव आनुवंशिकी अनुसंधान केंद्र‘ रखा गया है। दूसरी ओर कोलकाता स्थित ‘भारतीय सांख्यिकी संस्थान के वैज्ञानिक भारत का जीनोग्राफ्रिक मानचित्र बनाने में जुटे हैं। इसमें विभिन्न समुदायों में जीनों का वितरण दर्शाया जाएगा। अब तक एक दर्जन से अधिक विभिन्न समुदायों के जीन पहचाने जा चुके है। इस प्रकार भारत में जीनोम अनुसंधान का लाभ उठाने तथा देशी स्तर पर जीनों की पहचान के लिए गंभीरता पूर्वक प्रयास किये जा रहे है।
आनुवंशिक अभियांत्रिकी
आनुवंशिक इंजीनियरिंग वह तकनीक है, जिसमें जीन को परिवर्तित कर दिया जाता है या जीन का पुनर्संयोजन किया जाता है। जीन में परिवर्तन के द्वारा वैज्ञानिक किसी जीव या उसकी संतानों के गुणों में परिवर्तन ला देते हैं। कई वर्षों से संकरणो का प्रयोग करके पौधों एवं जीवों की नयी संकरित प्रजातियों को पैदा किया जा रहा है। जेनेटिक इंजीनियरिंग के द्वारा फूलों, फलों, सब्जियों एवं कई जंतुओं की उन्नत प्रजातियां विकसित की गयी हैं। 1970 से 1980 के मध्य वैज्ञानिकों ने ऐसी विधियां विकसित कीं जिनके माध्यम से किसी कोशिका से जीन को पृथक् करके इसे दूसरी कोशिका में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। यह तकनीक किसी कोशिका या जीव की आनुवंशिकता को परिवर्तित कर देती है।
जीन को पृथक करने में वैज्ञानिक जिस विधि का प्रयोग करते हैं, उसे ‘जीन पृथक्करण’ कहते हैं। इस तकनीक द्वारा किसी जीन के DNAको पृथक करके दूसरे जीन के DNA के साथ एकीकृत कर दिया जाता है।
आनुवंशिक इंजीनियरिंग का उपयोग आजकल आनुवंशिकी विज्ञान की एक शाखा के रूप में विस्तृत रूप से किया जाता है। इस शाखा का मुख्य उद्देश्य किसी जीव के जींस या आनुवंशिक पदार्थ में स्वेच्छा से परिवर्तन, काट-छांट, मरम्मत अथवा सुधार आदि करके उनके लक्षणों को परिवर्तित करना है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि ‘आनुवंशिक इंजीनियरिंग विज्ञान की वह शाखा है, जिसमें DNA के अणु में निहित प्राकृतिक कमियों का उन्मूलन तथा विशिष्ट जीन को स्वेच्छा से जीन तकनीक के द्वारा परिवर्तन व विकसित करके गुणसूत्रों में प्रत्यारोपित किया जा सकता है।‘ इस तकनीक का उपयोग करके आनुवंशिक वैज्ञानिक जीन की संरचना में सुधार करके अथवा विकृत जीन को सामान्य जीन द्वारा विस्थापित करके आनुवंशिकी रोगों से मानव जाति की रक्षा कर सकेंगे या मनुष्यों के लिये उपयोगी जीवों की नस्लों में सुधार कर सकेंगे। वैज्ञानिकों के समक्ष यह प्रश्न था कि आनुवंशिक पदार्थ में किस प्रकार परिवर्तन किया जाये। इसके लिए वैज्ञानिकों ने एक अत्याधुनिक तकनीक का विकास किया है, जिसे DNA पुनर्योजग तकनीक कहते हैं।
इस तकनीक द्वारा किसी जीव के ऐच्छिक DNA खण्ड को लेकर दूसरे जीव के साथ परखनली में उसका संकरण कराया जाता है और इसे किसी दूसरे इच्छित जीव के शरीर में पहुंचा दिया जाता है, जिससे नये प्रकार का DNA प्राप्त हो जाता है। इस तकनीक द्वारा नये गुणों को पैदा किया जाता है। इस तकनीक में संकरण से प्राप्त नये DNA को पुनयाजिंग-DNA कहते हैं। इसी तकनीक को ‘जीन क्लोनिंग’ के नाम से भी जाना जाता है। इस तकनीक का आविष्कार 1972 में किया गया था।
संश्लेषित न्यूक्लिओटाइडों को परिष्कृत करने वाले एंजाइमों व समाक्षरो के मिश्रण की सहायता से संवर्द्धित किया जा सकता है। रूपान्तरण, पराक्रमण, प्लास्मिड इस तकनीक की मुख्य प्रविधियां हैं
रूपान्तरण : इसके अंतर्गत एक कोशिका ऊतक अथवा जीव किसी विलगित जीन (डी.एन.ए.) अंश को अपने चारों तरफ से ग्रहण कर लेता है। यह डी.एन.ए. अंश ग्राही जीव के आनुवंशिक पदार्थ में शामिल हो जाता है।
पराक्रमण : इस प्रक्रिया के अंतर्गत डी.एन.ए. फेग एवं जीवाणु में आनुवंशिक पदार्थ का आपस में पारगमन होता है।
प्लास्मिड : इस प्रक्रिया के अंतर्गत प्लास्मिडो द्वारा स्थानांतरण प्रतिरोधी हेतु दौ प्रकार के एंजाइमों एंडोन्यूक्लिएज और लाईगेज की आवश्यकता हाती है।
जीन अभियांत्रिकी के अंतर्गत रुग्ण जीन की मरम्मत, नये जीन संकरणों का निर्माण तथा जीन की संश्लेषण क्षमता को औद्योगिक उपयोग की विधियां विकसित की जाती हैं, जीनों ‘का संलयन, प्रतिरोपण, हस्तांतरण आदि का अध्ययन इसी के द्वारा संभव हो सकता है। इसके लिए कुछ खास प्रकार के जीवाणुओं का प्रयोग किया जाता हैं। ये जीवाणु रेस्ट्रिक्शन एंजाइम का निर्माण करते हुए डी.एन.ए. अणु को किसी खास स्थान पर तोड़ते हैं। डी.एन.ए. लाईगेज एक अन्य अणु होता है जो एक प्रकार से गोंद का काम करता है और डी.एन.ए. के भागों को जोड़ता है।
जीन अभियांत्रिकी मानव इंसुलिन, कैंसर, वायरस से लड़ने वाले प्रोटीन, अर्थात् इंटरफेरोन तथा हेपेटाइटिस के टीके के विकास में काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ है। जीन प्रौद्योगिकी तकनीक से विकसित टिश्यू प्लाज्माइनोजेन एस्टीवेटर का सफलतापूर्वक प्रयोग हृदय की धमनियों में रक्त के थक्के को विघटित करने में सफलता प्राप्त की गई है।
जीन थैरेपी का उद्देश्य शरीर की सामान्य क्रियाओं को पुनः चालू रखने हेतु शरीर की कोशिकाओं में विशिष्ट जीनों को प्रवेश कराकर रोग का निदान करना होता है। सेमिटिक जीन थैरेपी मनुष्य की आनुवंशिक बीमारियों के उपचार के लिए प्रयोग में लायी जा रही है। जीन थैरेपी का लिपिड संबंधी अनियमितता को दूर करने में काफी महत्व है। इसके द्वारा सिस्टिक फाइब्रोसिस बीमारी में भी सुधार किया जा सकता है।
जीन थैरेपी जटिल शल्य चिकित्सा की जरूरतों का एक अच्छा विकल्प है। यदि किसी बीमारी से शरीर का कोई अंग ग्रसित है तो जीन उपचार द्वारा उस अंग में इस बीमारी विशेष हेतु जिम्मेदार ऐसे जीन की खोज की जाती है, जिससे यह बीमारी पैदा हुई है। इस प्रकार के जीन की पहचानकर प्रयोगशाला में कृत्रिम तरीके से संश्लेषित जीन द्वारा शरीर में खराब जीन की मरम्मत की जाती है।
जीन गन : यह एक नवविकसित आधुनिक जैव तकनीक है, जिसकी सहायता से बाहृय जीन को मस्तिष्क ऊतक में प्रत्यारोपित किया जा सकता है। यह तकनीक पार्किंसन के रोगियों के लिए अत्यंत लाभकारी है। इस प्रकार से प्रत्यारोपित जीन कोशिका में डोपामाइन का निर्माण करता है, जो मस्तिष्क कोशिका में अन्तरकोशिकीय संचरण में सहायक होता है। पार्किंसन रोग मस्तिष्क से संबद्ध ऐसा रोग है, जिसमें मस्तिक ऊतकों में अन्तरकोशिकीय संचार क अभाव में मनुष्य का विकास नहीं हो पाता है।
पौधों में जीन अंतरण हेतु किसी जीन विशेष के डी.एन.ए. से सोना या टंगस्टन माइक्रोप्रोजेक्टाइल को आलेपित किया जाता है। फिर इस माइक्रोप्रोजेक्टाइल को लक्षित कोशिकाओं की ओर तीव्र गति से उन्मुख किया जाता है। एक बार लक्षित कोशिका में प्रवेश कर जाने के बाद माइक्रोप्रोजेक्टाइल के बाहर आलेपित डी.एन.ए. को मुक्त कर दिया जाता है, और इसे पौधे के जीनोम में संस्थापित कर दिया जाता है। इस पद्धति को माइक्रोप्रोजेक्टाइल बंबार्डमंट या बायोलिस्टिक्सि भी कहा जाता है। आनुवंशिक इंजीनियरिंग की महत्ता एवं उसके अनुप्रयोगः आनुवंशिक इंजीनियरिंग के अनेक लाभ हैं, जो निम्नानुसार हैः
डी.एन.ए. फिंगर प्रिंटिंग
मनुष्य में अपराध-प्रवृत्ति प्राचीन काल से विद्यमान है। अपनी आपराधिक प्रवृत्ति के कारण मनुष्य ऐसा-ऐसा कुख्यात अपराध कर डालता है कि उसके अपराध को साबित कर पाना साधारण तकनीक से संभव नहीं हो पाता है। यही कारण है कि, आवश्यकता के अनुसार अपराधियों को पकड़ने के लिए वैज्ञानिक आविकारों का उपयोग अपराध अनुसंधान में होता रहा है। एक शताब्दी पूर्व फ्रांसिस गाल्टन ने ही सर्वप्रथम यह ज्ञात किया कि प्रत्येक व्यक्ति की उंगलियों के निशान (फिंगर प्रिंटस) पृथक-पृथक होते हैं। समरूप जुड़वा भाई-बहनों की उंगलियों के निशान बहुत महत्व रखते हैं तथा अपराधी की पहचान में सहायक होते हैं। रक्त में हिमेटीन क्रिस्टल बनाकर रक्त और रक्त जैसे रंग में अन्तर करना भी पूर्व से ज्ञात है। रक्त समूह द्वारा पैतृक सम्पत्ति संबंधी कई झगड़े सुलझाए जाते हैं। बच्चे के वास्तविक माता-पिता का निर्धारण भी रक्त समूह द्वारा किया जाता है। उपर्युक्त विधियां न्यायालय द्वारा मान्यता प्राप्त हैं। डी.एन.ए. फिंगर प्रिंटिंग दो व्यक्तियों में मामूली अंतर को भी आणविक स्तर पर बता सकती है। हालांकि प्रत्येक व्यक्ति के डी.एन.ए. की रासायनिक संरचना समान होती है, पर विभिन्न लोगों के डी.एन.ए. में आधार जोड़ में मूल अंतर होता है। आनुवंशिक विशेषज्ञ, मनुष्य की आनुवंशिक संरचना की गहराई से जांच कर उन हिस्सों को मालूम कर लेते हैं, जिसकी रचना प्रत्येक मनुष्य के लिए विशिष्ट होती है। यही संरचना डी.एन.ए. की लम्बी श्रृंखलाओं से निर्मित 46 गुणसूत्रों पर भी होती है।
डी.एन.ए. में एडिनिन (A), ग्वानिन (G), थाइमिन (T) एवं साइटोसिन (C) चार प्रमुख घटक होते हैं, जो शर्करा एवं फॉस्केट अणुओं द्वारा आपस में जुड़े रहते हैं। यह द्विकुंडलित संरचना है, जिसमें एक तंतु का एडिनिन दूसरे के थाइमिन से तथा दूसरे का साइटोसिन पहले के ग्वानिन से जुड़ा रहता है। आनुवंशिक रूपरेखा सूचनाओं का एक कोड होता है। इस कोड में प्रत्येक शब्द तीन अक्षरों से मिल कर बना होता है, जिसे आनुवंशिक कोड कहा जाता है। प्रत्येक कोड एक एमीनो एसिड दर्शाता है एवं संपूर्ण डी.एन.ए. प्रोटीन अणु का निर्माण करता है। किन्हीं दो मनुष्यों में लगभग 90 प्रतिशत डी.एन.ए. समान होते हैं। शेष 10 प्रतिशत भिन्न डी.एन.ए. में एक समान क्षारों का एक सामान्य अनुक्रम होता है। डी.एन.ए. फिंगर प्रिटिंग, डी.एन.ए. कई इन्हीं हिस्सों का पता लगाने की युक्ति है। इस प्रकार, इस युक्ति द्वारा किसी भी व्यक्ति के विशेषज्ञ आनुवंशिक अंशों की पहचान की जा सकती है, जो किसी व्यक्ति की उंगलियों के निशान अथवा उनके हस्ताक्षर की तरह केवल उसी व्यक्ति की पहचान होती है। ध्यातव्य है कि, रिस्टिक्शन एंजाइम प्रत्येक जीवन में पाया जाता है। परन्तु एक व्यक्ति का एंजाइम दूसरे व्यक्ति के डी.एन.ए. को काटने में बिल्कुल ही अक्षम होता है। हजारों प्रकार के रिस्टिक्शन एंजाइम होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति में नाइट्रोजन बेस का अनुक्रम निस्वित होता है, इसलिए यह एंजाइम पूरे डी.एन.ए. को भिन्न-भिन्न आकार के टुकडों में काटता है। ये छोटे-बड़े आकार के टुकडे प्रत्येक व्यक्ति के डी.एन.ए. में अलग-अलग होते हैं और यही व्यक्ति विशेष की पहचान होते हैं।
प्रत्येक व्यक्ति के डी.एन.ए. में क्षार अनुक्रम निश्चित होता है। डी. एन.ए. के एक निश्चित भाग के क्षार अनुक्रम का कार्य एक विशेष प्रकार का प्रोटीन निर्माण करना होता है। जन्म के पहले यदि इस क्षार अनुक्रम में कोई विकृति आ जाए, तो उससे संबंधित प्रोटीन निर्माण की क्रिया विकृत या अवरुद्ध हो सकती है और इस कारण कई प्रकार की आनुवांशिक बीमारियां, यथा-हंटिंग्टन कोरिया, स्क्यूलर डिस्ट्रॉफी, सिस्टिक फाइब्रोसिस, हीमोफीलिया, आदि हो जाती हैं। इन आनुवंशिक रोगों का पता डी.एन.ए. फिंगर प्रिंटिंग द्वारा शिशु के जन्म के पूर्व भी लगाया जा सकता है। एन्डोन्यूक्लिएज द्वारा काटे गए विभिन्न लम्बाई के डी.एन. ए. के टुकड़ों को अब इलेक्ट्रो फोरेसिस की क्रिया से पृथक् किया जा सकता है। इलेक्ट्रो फोरेसिस वह प्रक्रिया है, जिसमें आवेशित कणों को तरल या अर्द्ध ठोस माध्यम में विद्युत द्वारा पृथक् किया जाता है। उपकरण के एक सिरे को धन आवेशित व दूसरे को ऋण आवेशित इलेक्ट्रोन से जोड़ दिया जाता है। एनोड ऋण आवेशित कणों को अपनी ओर आकर्षित करता है। कैथोड धन आवेशित कणों को आकर्षित करता है। अलग-अलग आयनों का अलग-अलग विभवान्तर होता है, जिसके कारण आवेशित कण विद्युत द्वारा पृथकृ हो जाते हैं। विभवान्तर कणों की लम्बाई, आकार तथा कुल आवेश पर निर्भर करता है। साधारण इलेक्ट्रो फोरेसिस के द्वारा पदार्थों को पृथकृ करने के लिए बहुत महीन छिद्र वाले ब्लाटिंग पेपर (सोखता कागज) प्रयोग में लाए जाते हैं। यथा-पॉलीएक्राइल एमाइड, सेल्यूलोज एर्साटेट, एगरोज जेल व हाइड्रॉक्साइड स्टॉर्च, आदि। डी.एन.ए. पर ऋणात्मक आवेश होता है, अतः विद्युत धारा प्रवाहित करने पर यह धनात्मक ध्रुव की ओर प्रवाहित होता है। डी.एन.ए. के छोटे-बड़े टुकडे अलग-अलग गति द्वारा एनोड की ओर एगरोज जेल में प्रवाहित होने लगते हैं। डी.एन.ए. के छोटे दुकड़े एगरोज. जेल के छोटे छिद्रां में तीव्र गति से प्रविष्ट होत हैं। अतः, वे आगे बढ़ जाते हैं और डी.एन.ए. के लम्बे टुकड़े पीछे रह जाते हैं। इस प्रकार, वे लम्बाई के अनुसार क्रम में जम जाते हैं। डी.एन.ए. के टुकड़ों वाली एक एगरोज जेल को ‘इथिडियम ब्रोमाइड‘ नामक रंग से रंगकर पराबैंगनी प्रकाश (अन्ट्रावॉयलेट लाईट) से इन्हें देखा जाता है। अब लम्बाई के अनुसार आगे पीछे जमे डी.एन.ए. के इन टुकड़ों को नाइट्रोसेल्यूलोज की चिपचिपी पट्टी पर चिपका दिया जाता है। और, इन पर रेडियोएक्टिव पदार्थ के साथ संलग्न किया जाता है। रेडियोएक्टिव पदार्थ के साथ संलग्न डी.एन.ए. के टुकड़े विभाजन के लिए रखे जाते हैं। विभाजन होने के पश्चात् रेडियोएक्टिव पदार्थ विभाजन द्वारा निर्मित नए भाग में आ जाता है। इस प्रकार, नवनिर्मित डी.एन.ए. में रेडियोधर्मिता होती है। रेडियोएस्टिविटी के कारण एक्स-रे शीट पर छोटी छोटी पट्टियों के रूप में इनके चित्र अंकित हो जाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति का पट्टीनुमा चित्र विशिष्ट होता है तथा अन्य व्यक्तियों के चित्र से भिन्नता रखता है। इसी विभिनता या विशिष्टता को ध्यान में रखते हुए किसी भी अपराध स्थल पर पाए गए नमूने से डी.एन.ए. को पृथकृ कर उसे विश्लेषित तथा व्याख्यायित किया जाता है। और, अभियुक्त के डी.एन.ए. से इसकी तुलना की जाती है। तुलना करने के बाद अभियुक्त की निश्वित पहचान की पुष्टि की जाती है। किसी भी व्यक्ति के शरीर की सभी कोशिकाएं चाहे वे रक्त की हों या त्वचा की या शुक्राणु की या बाल की, सभी से एक ही प्रकार के डी. एन.ए. चित्र बनते हैं। ये पट्टी चित्र ही डी.एन.ए. फिंगर प्रिंट्रस कहलाते हैं। उंगलियों के निशान की भांति ही डी.एन.ए. फिंगर प्रिन्टस भी व्यक्ति की पहचान होते हैं।
डी.एन.ए. फिंगरप्रिटिंग तकनीक फोरेन्सिक विज्ञान के लिए एक अद्भुत देन है। वर्ष 1985 में इंग्लैंड को प्रो. एलेक जेफरीज ने इस तकनीक का विकास किया था। वर्ष 1988 में हैदराबाद में स्थित कोशिकीय एवं आण्विक जीव विज्ञान केंद्र (सी.सी.एम.बी.) ने इस तकनीक के लिए आवश्यक प्रोब का पूर्णतः स्वदेशी रूप विकसित किया था। इस प्रकार भारत पूरे विश्व में इस तकनीक के प्रयोग करने वाले देशों में तीसरा देश बन गया। वर्ष 1989 में भारत के न्यायालयों ने आपराधिक मामलों में इस तकनीक को प्रमाण के रूप में मान्यता प्रदान की। आज आपराधिक मामलों के अलावा इस तकनीक को पैतृक पहचान में, रेशम कीट उद्योग में, बीजों की गुणवत्ता की पहचान करने में, चिकित्सा के क्षेत्र तथा पशु संरक्षण के लिए व्यापक रूप से प्रयोग में लाया जा रहा है।
ट्रांसएंब्रियो तकनीक
अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ट्रांसएंब्रियो नामक एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे ऐसे जानवरों को बनाया जा सकेगा, जिन्हें रोग नहीं होंगे। इससे आनुवंशिक रूप से नये जानवरों को तैयार करने की प्रक्रिया में भारत में परिवर्तन आएगा। इस तकनीक से वैज्ञानिकों को चूहे ही नहीं, लगभग सभी स्तनधारी प्रजातियों के बदले हुए जीन वाले जानवर तैयार करने में सहायता मिलेगी, तात्पर्य यह है कि, प्रजातीय बाधाएं समाप्त हो जाएंगी। इससे दवा अनुसंधान को वढावा मिलेगा तथा स्टेमसेल अनुसंधान और अधिक परिष्कृत हो सकेंगे।
सिंथेटिक डी.एन.ए. कोडिंग : सिंथेटिक डी.एन.ए. में सूचनाएं या सक्ते डालकर उसे किसी भी सीडी, परफ्यूम या किसी भी अन्य उत्पाद से सम्बद्ध किया जा सकता है। उत्पाद के डी.एन.ए. कोड से असली होने की गारंटी मिलेगी। इस तकनीक का उद्देश्य मानव जीनोम को जटिलता का लाभ लेते हुए डी.एन.ए. में लिखे कोड को छिपाना है। इस विधि से लिखे कोड को ढूंढ़ना असंभव होता है। इस तकनीक का प्रयोग करने वाले निर्माता डी.एन.ए. कोडिंग हेतु विभिन्न संख्याओं या संकेतकों का उपयोग कर सकते हैं। इन्हें एक डी.एन.ए. सुई की सहायता से सिंथेटिक डी.एन.ए. पर लिखा जा सकता है।
लखनऊ में भारत का पहला डी.एन.ए. बैंक
भारत का पहला डी.एन.ए. बैंक लखनऊ में स्थापित किया गया। यह डी.एन.ए. बैंक एशिया का पहला तथा विश्व का दूसरा डी.एन.ए. बैंक है। इससे पहले संयुक्त राज्य अमेरिका स्थापित डी.एन.ए. बैंक दुनिया का एकमात्र डी.एन.ए. बैंक था। इस डी.एन.ए. बैंक में कोई भी व्यक्ति अपने रक्त की चार बूंद दान कर इसका सदस्य बन सकता है। सदस्य बनने के बाद प्रत्यक सदस्य को डी.एन.ए. बैंक की ओर से माइक्रोचिप आधारित डी.एन.ए. कार्ड दिया जाएगा जिसमें उस व्यक्ति से संबंधित सामान्य जानकारी अंकित होंगी।
क्लोनिंग
क्लोन का अर्थ ‘ट्विन या समरूप होता है। क्लोन एक ऑरगेनिज्म है, जो एकमात्र जनक से गैर-लैंगिक विधि से उत्पादित होता है। क्लोन अपने जनक से भौतिक एवं आनुवंशिक रूप से बिल्कुल समान होता है। क्लोनिंग में नाभिक स्थानांतरण तकनीक द्वारा केन्द्रकरहित डिम्ब में समाविष्ट कर समरूप क्लोनस प्राप्त किए जाते हैं। इस तकनीक के अंतर्गत प्रायः नाभिकीय अंतरण विधि का प्रयोग किया जाता है। किसी एक कोशिका का नाभिक क्रोमोसोम एवं जीन का भंडार होता है, इसलिए इससे एक कोशिका की सभी आनुवंशिक सूचनाएं प्राप्त की जा सकती हैं। नाभिकीय अंतरण विधि के अंतर्गत कोशिका के नाभिक को यांत्रिक रूप से निकाल लिया जाता है। इसके बाद नाभिक रहित अंडाणु में प्रतिस्थापित कर दिया जाता है। तत्पश्चात् उन पर हल्की विद्युत तरंगों को प्रवाहित करके निषेचन प्रक्रिया को शुरू कराया जाता है, जिसके उपरांत कोशिका का तेजी से विभाजन शुरू हो जाता है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत पूर्ण विकसित अण्डाणु को प्रतिनियुक्ति मां के गर्भ में आरोपित कर दिया जाता है। इसके साथ ही गर्भाधान, बच्चे का विकास तथा उसका जन्म होता है।
कृषि और बागवानी के क्षेत्र में तो क्लोनिंग की प्रक्रिया प्राचीन काल से चल रही है, परंतु जंतुओं के निर्माण में क्लोनिंग का उपयोग हाल के वर्षों में होने लगा है।
रिकाबिनेंट डी.एन.ए. तकनीक, डी.एन.ए. क्लोनिग, आणविक क्लोनिंग एवं जीन क्लोनिंग सभी एक ही प्रक्रिया के द्योतक हैं। यह प्रक्रिया है एक जीव से जीवाणु प्लाजमिड जैसे स्व-समरूप आनुवंशिक तत्व को आवश्यक डी.एन.ए. अंश का हस्तांतरण। फिर उस आवश्यक डी.एन.ए. को बाल मेजबान कोशिका में प्रजनन कराया जाता है।
प्रजनक क्लोनिंग प्रौद्योगिकी का प्रयोग ऐसे जानवर के मृजन के लिए किया जाता है जिसके डी.एन.ए. अणु मौजूदा या पहले के जानवर के समान होता है। इस विधि से पहली क्लोनित भेड़ डॉली का क्लोन तैयार किया गया था। भ्रूणीय क्लोनिंग के अंतर्गत मानवीय भ्रूण का अनुसंधान में प्रयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य मानव का क्लोन तैयार करना न होकर, ऐसे स्टेम सेल का विकास है जिसका प्रयोग मानव के विकास एवं रोगों के उपचार में हो।
भैंस का प्रथम क्लोन
हरियाणा के करनाल जिले में स्थित राष्ट्रीय डयरी अनुसंधान संस्थान के पशु जैव-प्रौद्योगिकी केन्द्र के वैज्ञानिकों ने भैंस का क्लोन तैयार करने में सफलता प्राप्त की। 6 फरवरी, 2000 को जन्में भैंस के इस क्लोन की एक सप्ताह के भीतर ही मृत्यु हो गई। उल्लेखनीय है कि, भैंस का क्लोन बनाने वाला भारत विश्व का पहला देश है। इस क्लोन के लिए प्रथम चरण के अंतर्गत एक स्वस्थ भैंस के अण्डाशय से अण्डे लेकर प्रयोगशाला में सुरक्षित रखे गए और जीव रसायन क्रिया से अण्डों का कवच हटा दिया गया। द्वितीय चरण में जिस उन्नत प्रजाति की भैंस का क्लोन तैयार करना था, उसके कान के छोटे-से टुकडे से ढेर सारी कोशिकाएं तैयार की गईं। तृतीय चरण के अंतर्गत प्रयोगशाला में सुरक्षित रखे गए भैंस के अण्डे से कोशिका को मिलाया गया। इससे प्रयोगशाला में भ्रूण तैयार हो गया। चौथे चरण में इस भ्रूण को वैज्ञानिक तरीके से भैंस के गर्भाशय में (जिस भैंस से अण्डा लिया गया था) प्रत्यारोपित कर दिया गया। पांचवें चरण में भैंस के प्रथम क्लोन शिशु का जन्म हुआ।
दुनिया का पहला क्लोंड ऊंट
दुनिया के पहले क्लोंड ऊंट का जन्म 9 अप्रैल, 2009 को दुबई में हुआ। इस परियोजना के अंतर्गत क्लोनिंग मैं उसी मानक तकनीक का प्रयोग किया गया जो 1996 में इयान विल्मुट द्वारा ‘डॉली‘ नामक भेड़ की क्लोनिंग में अपनाया गया था। नामक इस क्लोन को एक मृत ऊंट के डी.एन.ए. से तैयार किया गया। इस ऊंट को मांस के लिए 2005 काटा गया। काटे जाने के बाद इसके अण्डाशय को अलग कर लिया गया था। इस अण्डाशय से डी.एन.ए. को निकालकर एक अण्डाणु में प्रविष्ट कराया गया तथा इसे सरोगेट मादा ऊंट के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया गया। इसके 378 दिन बाद इजाज नामक क्लोंड ऊंट का जन्म हुआ।
क्लोंड एंब्रियो
जापानी वैज्ञानिकों ने संकटग्रस्त खरगोशों की एक प्रजाति के मृत खरगोश से क्लोंड भ्रूण तैयार किया है। ‘एमामी खरगोश’ या ‘पेंटालागुस फरनेसी‘ केवल जापान में दो छोटे द्वीपों पर पाए जाते हैं। किकी विश्वविद्यालय की टीम ने मृत एमामी खरगोश के कान से एक कोशिका निकाली तथा इसे एक सामान्य खरगोश में आरोपित किया। इसके एग (अण्डे) का विकास एक क्लोड एब्रियो में हो गया तब इसे वापस सरोगेट मां के फैलोपियन ट्यूब में रख दिया गया। लगभग 32 दिन बाद एक खरगोश पैदा हुआ जिसमें एमामी खरगोश की आनुवंशिक सूचनाएं मौजूद थी।
इन्वोसेलः कृत्रिम प्रजनन तकनीक
कृत्रिम प्रजनन तकनीक से औलाद चाहने वालों के लिए देश में इन्वोसेल नामक तकनीक विकसित की है। इन्वोसेल सिलेंडर के आकार की दो इंच लंबी टय़ूब होती है। इसके अंदर पोषक द्रव डाले जाते हैं जिससे निषेचित डिम्ब का संवर्द्धन शुरू हो जाता है। इस तकनीक में कृत्रिम प्रजनन की प्रक्रिया आसान तरीके से संपन्न होती है। अभी देश में इन्विट्रो तकनीक से परखनली शिशु तैयार हो रहा है, इसमें शुक्राणु एवं डिम्ब को प्रयोगशाला में ही निषेचित किया जाता है तथा निषेचन के चार-पांच दिन बाद ही इसे महिला के गर्भ में प्रतिस्थापित किया जाता है। इन्दोसेल तकनीक में शुक्राणु और डिम्ब को इम्वोसेल में डालकर महिला के गर्भाशय में डाल दिया जाता है।
स्टेम सेल तकनीक
स्टेम सेल क्या है?
क्लेंनिग के विकास के साथ ही प्रौयोगिकी ने एक और क्षेत्र को पैदा किया जो कोशिका चिकित्सा के नाम से जाना जाता है। इसके अंतर्गत ऐसी कोशिका का अध्ययन किया जाता है जिसमें वृद्धि, विभाजन एवं विभेदन कर नए ऊतकों से चिकित्सा पर विचार व प्रयोग शुरू हुए। अस्थिमज्जा से प्राप्त ये कोशिकाएं अजीवन शरीर में खुन को पैदा करती हैं और कैंसर आदि रोगों में इसका प्रत्यारोपण कर पूरी रक्त प्रणाली का पुनसचित किया जा सकता है। ऐसी कोशिकाओं को स्टेमं सेल कहते हैं।
स्टेम सेल रिसर्च फोरम ऑफ इंडिया
भारत में स्टेम सेल के अनुसंधान एवं विकास के लिए ‘स्टेम सेल रिसर्च फोरम ऑफ इंडिया एक समर्पित संस्था है। इसका उद्देश्य स्टेम सेल अनुसंधान के क्षेत्र में जैवकीय एवं चिकित्ता विज्ञान को एक साथ लाकर स्टेम सेल जीव विज्ञान के वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देना है। इस संगठन का मिशन स्टेम अनुसंधान को बढ़ावा देना तथा इससे संबधित विभिन्न वैज्ञानिकों एवं संगठनों के वीच विचारों का आदान-प्रदान करना है ताकि लाइलाज तथा खतरनाक बीमारियों से ग्रसित मानव समुदाय को इससे मुक्ति की जा सके।
चिकित्सकीय जगत में स्टेम सेल तकनीक सवसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बनता जा रहा है। स्टेम सेल शरीर के कोशिका, ऊतक और प्रत्येक अंगों की आधार कोशिका होती हैं। वे एक माइक्रोचिप की तरह होती हैं जिसमें कितने भी विशेषीकृत कार्यो हेतु कार्यक्रम प्रयोग किया जा सकता है। जो उचित वातावरण में विशेषीकृत ऊतक एवं अंगों के रूप में विकसित की जा सकती हैं। ये पूर्वगामी, अविशेषीकृत अभिभाज्य कोशिकाएं होती हैं जो स्वप्रसरक, प्रवासन और विभेदीकरण में सक्षम हैं।
भ्रूणीय स्टेम सेल : वह कोशिका है जो भ्रूण विकास के दौरान पूरे जीव को बनाने की पूरी क्षमता रखती है। ये कोशिकाएं कई बार विभाजित होकर ऐसी कोशिकाएं बनाती हैं जो पूर्ण रूप से सक्षम होती हैं। कुछ और विभाजनों के पश्चात ये कोशिकाएं एक गोलाकार रचना बनाती हैं जिससे सटा हुआ कोशिकाओं का एक गुच्छा होता है जिसे इनर सेल मास कहते हैं। ये इनर सेल मास प्रकृति में बहुक्षमता वाली होती है तथा विशेषीकृत होकर स्टेम सेल में परिवर्तित हो जाती है जो निश्चित प्रकार्य वाले कोशिकाओं को जन्म देते हैं।
भ्रूणीय जर्म सेलः मानव भूणीय जर्म कोशिकाएं एम्ब्रीयो या फीटस अर्थात् भ्रूण के विशेष अंग से ली जाती हैं जिन्हें गौनेड रिज कहते हैं। गॉनेड रिज मुख्तया अण्डे और शुक्राणुओं में विकसित होते हैं। भ्रूणीय स्टेम सेल प्रयोगशाला में अमरत्व के क्रम में विकसित किये जा सकते हैं। परंतु ईजी सेल मात्र 70 या 80 सेल विभाजन तक ही जीवित रह सकते हैं।
वयस्क स्टेम सेल : वयस्क स्टेम सेल को अस्थि मच्चा, पेरीफेरल रक्त, ऊतक, मांसपेशी, कार्डियक यियूज, कार्टिलेज, ब्रेन टिश्यूज, इत्यादि से प्राप्त किया जाता है। अस्थिमज्जा से पृथक किये गये हिमैटोपॉएटिक स्टेम सेल रक्त बनाने वाले होते हैं। नॉनहिमैटोपॉएटिक स्टेम सेल मेसेंचाइमल स्टेम सेल होते हैं।
कॉर्ड रक्त स्टेम सेल : यह वह रक्त है जो जन्म के बाद कॉर्ड के कटने के बाद अम्बिलिकल कॉर्ड और प्लेसेंटा में बन जाता है। इस प्रकार अम्बिलिकल कॉर्ड रक्त स्टेम सेल का मुख्य स्रोत है।
लाइलाज का इलाज
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ने स्टेल सेल इंजेक्शन तैयार कर स्टेम सेल थेरेपी के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल की है। यह उपचार संस्थान में शोध द्वारा संभव हुआ है। कुछ और रोग/समस्या निम्नवत हैं जिनका निदान स्टेमसेल थेरपी द्वारा बहुत ही उपयोगी साबित हुआ है।
कैंसर : हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के वैज्ञानिकों ने रोडेंट में इंद्राक्रेनिथल ट्यूमर पैदा किया, उसके बाद मानव स्टेम सेल्स को इंजेक्ट कर दिया। कुछ ही समय में सेल्स ने कैंसर वाले क्षेत्र में पहुंचकर सायटोसिन डेमीनेज नामक एंजाइम बनाया। यह एंजाइम ऐसा है, जो नॉन-टॉम्हिक ड़ग को कीमोथेराप्युटिक एजेंट के रूप में बदल देती है।
मेरूरज्जु चोट : मेरुरज्जु चोट से पीड़ित मरीज में मल्टी पोटेंट वयस्क स्टेम सेल के सफलता पूर्वक प्रत्यारोपित हो जाने से वह इस समस्या से मुक्त हो जाता है।
दांत की समस्या : दांत की समस्या से निजात दिलाने के लिए स्टेम सेल द्वारा टूथबड को तैयार कर उन्हें मसूड़ों में इंप्लांट कर दिया जाता है जिसमें दांत निकल आता है।
आंखों का दृष्टिदोष : वैज्ञानिकों ने एंब्रायोनिक स्टेम सेल के द्वारा प्रयोगशाला में टोटीपोटेंट स्टेम सेल की पतली चादर विकसित कर ली है। इस चादर को क्षतिग्रस्त रोगियों में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। इसके बाद नजर ठीक प्रकार से काम करने लग जाती है।
अन्य रोगों का इलाज : अल्झाइमर, पार्किंसन्स, ल्यूकीमिया, मुस्कुलर गठिया, ब्रेन की चोट, मल्टीपल स्लेरासिस, डायबिटीज, स्ट्रोक, हृदय रोग, इत्यादि।
स्टेम सेल की नई तकनीकें
शोधकर्ताओं ने स्टेम सेल संबंधी ऐसी नई तकनीकें विकसित करने में सफलता हासिल की हैं, जिनमें जीवित भ्रूण को नष्ट करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। मैसाचुसेटस तकनीकी संस्थान के रूडोक्जे जेनिश और एलेल्फेडर मेइसनर ने स्टेम सेल का क्लोन तैयार किया है। उनके द्वारा क्लोन तैयार करने की विधि को ‘आल्ट न्युक्लियर ट्रांसफर’ (एएनटी) कहा गया है, जिसमें एक मरीज की कोशिका के केंद्रक की निषेचित अंडे में स्थानांतरित करने से पहले अंडे की एक जीन को बेअसर कर दिया जाता है, इससे अंडे का विकास कोशिकाओं के एक समान समूह के रूप में होता है, जिसे ब्लास्टोसिस्ट कहा जाता है। इसी ब्लास्टोसिस्ट से भ्रूणीय स्टेम सेल विकसित किए जा सकते हैं। दूसरी तकनीक इनविट्रे फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ.) से मिलती-जुलती है, जिसे प्री इम्प्लंटेशन जेनेटिक डायगनोसिस (पीजीडी) कहा जाता है। इस प्रक्रिया में ब्लास्टोमीयर्स के प्रत्यारोपण से पहले उन कोशिकीय भ्रूण से स्टेम सेल को आनुवंशिक परीक्षणों हेतु अलग कर लिया जाता है। अतः मानव भ्रूण को गर्भाशय में प्रत्यारोपित करने से पहले उससे आईवीएफ तकनीक का इस्तेमाल कर नई स्टेम कोशिकाएं तैयार की जा सकता हें।
तीसरी तकनीक के रूप में स्टेम सेल का नया विकल्प खोजा गया है। कोलकाता के स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. सुब्रत चटर्जी ने जन्म के समय फालतू समझकर काटकर फेंक दिए जाने वाले नाभिनाल से स्टेम सेल के संग्रह की तकनीक विकसित की है। उन्होंने इस तकनीक से एक ऐसे शिशु को जन्म दिलाने में सफलता हासिल की है, जिसके लिए गर्भनाल के रक्त की स्टेम सेल का प्रयोग किया गया था।
मानव भ्रूण के स्टेम सेल से तैयार त्वचाः फ्रांस के वैज्ञानिकों ने मानव भ्रूण से स्टेम सेल निकालकर करेटिनोसाइट्क नामक त्वचा के सेल तैयार करने में सफलता प्राप्त कर ली है। वैकल्पिक बचा की यह पूरी शीट गर्भाशय के ऊपर विकसित की है। वैज्ञानिकों का दावा है कि, बहुत अधिक जले हुए लोगों को स्टेम सेल से तैयार की गई त्वचा अस्थाई रूप से लगायी जा सकेगी। आमतौर पर बुरी तरह से जले व्यक्ति को उसी के सेल से तैयार की गई त्वचा लगाई जाती है, जिसे आटोलोगस स्किन कहते हैं। इस प्रकार की त्वचा तैयार करने में लगभग तीन हफ्ते का समय लग जाता है। इस दौरान मरीज को डीहाइड्रेशन के संक्रमण का गंभीर खतरा बना रहता है।
क्लोम भ्रूण से स्टेम सेलः अमेरिकी वैज्ञानिकों द्वारा बन्दर के क्लोन से भुण का निर्माण किया गया फिर उस भ्रूण से स्टेम सेल का। इस शोध से कई जटिल बीमारियों को समझने और उसक इलाज करने में आसानी होगी। इसमें एक अडाणु कोशिका के केंद्रक को निकालकर दाता केंद्रक के साथ लाया जाता है। यह कोशिका आगे चलकर ब्लास्टोसिस्ट में बदल जाती है। इसका डी.एन.ए., प्रदाता के डी.एन.ए. से मेल खाता है। इस कार्य हेतु एक नर बन्दर की त्वचा कोशिका का प्रयोग किया गया। अब क्लोड़ व्यस्क के शरीर की कोशिका से भूर्णीय सेल का उत्पादन संभव हो सकेगा।
भ्रूण अनुसंधान से संबंधित विभिन्न देशों के प्रावधान
आस्ट्रेलियाः यहां अनुसंधान हेतु प्रयोगशाला में भ्रूण निर्माण की अनुमति दी गई है, लेकिन मानव-पशु भ्रूण पर प्रतिबंध लगाया गया है। शुक्राणु की जांच हेतु भ्रूण अनुसंधान एक अपवाद के रूप में प्रचलित है।
कनाडाः यहां कानूनी रूप से मानव-पशु भ्रूण प्रतिबंधित है।
यू.एस.ए.: यहां संघीय कोष से केवल भ्रूण पूर्व अनुसंधान हेतु ही व्यय का प्रावधान है। यह अनुसंधान निषेचन उपचार के बाद बचे भ्रूण पूर्व अवशेष पर ही किया जा सकता है। संकर भ्रूण पर पूरी तरह प्रतिबंध है।
अन्य देशः अन्य देशों में संकर भ्रूण के लिए कोई विशिष्ट विधान नहीं है। लेकिन इटली तथा जर्मनी जैसे देशों में जहां भ्रूण पूर्व अनुसंधान की अनुमति दी गई है, वहीं आस्ट्रिया, नावें एवं ट्यूनीशिया जैसे देशों में भ्रूण अनुसंधान ही प्रतिबंधित है।
भारतः भारत में भ्रूण संबंधित सभी अनुसंधान प्रतिबंधित हैं। स्टेम सेल अनुसंधान को सीमित क्षेत्रों के लिए अनुमति दी गई है।
स्टेम सेल के उपयोगः स्टेम सेल का उपयोग निम्नलिखित हैः
भारत में स्टेम सेल अनुसंधानः केंद्र सरकार ने हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी परिसर में 25 नवंबर, 2007 को देश के पहलें स्टेम सेल तकनीक और पुनरुत्पादक औषधि पर चिकित्सकीय अनुसंधान सुविधा केंद्र की स्थापना की है। इस केंद्र का उद्देश्य स्टेम सेल पर आधारभूत अनुसंधान करना तथा आनुवंशिक एवं जीवन के लिए गंभीर रोगों का निदान ढूढना है।
केंद्र सरकार का जैव-प्रौद्योगिकी विभाग स्टेम सेल अनुसंधान को बढ़ावा देने पर काफी गंभीर है। इसमें शामिल कार्यक्रमों के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न समितियां बनाई गई हैं और भ्रूण एवं वयस्क स्टेमसेल दोनों मामलों के लिए कई परियोजनाएं क्रियान्वित की गई हैं।