जैव तकनीक के अनुप्रयोग

चिकित्सा

जैव-प्रौद्योगिकी द्वारा निर्मित उत्पादों के उपयोग में भारत में निम्नलिखित क्षेत्रों में आशातीत वृद्धि हुई हैः

टीकेः रेबीज, यकृतशोध, पोलियो, टी.बी., काली खांसी, डिप्थीरिया, इत्यादि के उत्पादन के लिए भारत ने प्रचुर क्षमता का सृजन कर लिया है। जीन-अभियांत्रिकी के द्वारा दिनोदिन इन टीकों की उत्पादन लागत कम होती जा रही है। उदाहरणार्थः इसी श्रेणी के एक प्रकार के टीके-हिपैटाइटिस, जो कि पीत ज्वर के नियत्रण के लिए उपयोग में लाया जाता है, विदेशों से आयात किए जाते रहे हैं, जिन्हें अब देश में ही उत्पादित किया जा रहा है।

इंसुलिनः इंसुलिन एक प्रकार की पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला है, जो अग्नाशय में आइसलेट ऑफ लैगरहेस की बीटा कोशिका से निकलता है। इंसुलिन रक्त में ग्लूकोज की मात्रा का निर्धारण करता है। इंसुलिन की कमी से डायबिटीज नामक रोग होता है। प्रतिजैविकः वर्तमान में संक्रामक बीमारियों के उपचार के लिए प्रतिजैविको को बड़े पैमाने पर उपयोग में लाया जा रहा है। 1928 में सर्वप्रथम एलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने ‘पेनिसीलीन‘ नामक प्रतिजैविक (एंटीबायोटिक) की खोज की। 1944 में दूसरे महत्वपूर्ण प्रतिजैविक ‘स्ट्रेप्टोमाइसीन‘ की खोज वेक्समान ने की। कुछ मुख्य प्रतिजैविको, जैसे-टेट्रॉसाइक्लिन, क्लोरोमाइस्टीन, जैनिटीमाइसीन की खोज भारत में हुई है।

इंटरफेरानः इंटरफेरान विषाणुओं के विरुद्ध शरीर में पैदा होने वाला प्रोटीन पदार्थ है। 1957 में इसाकस और लिन्डमान ने पहली बार इटरफेरान प्राप्त किए। इटरफेरान तीन प्रकार के होते हैः (क) अल्फा-इंटरफेरान या ल्यूकोसाइट इंटरफेरान, (ख) बीटा-इंटरफेरान या फाइब्रोब्लास्ट इंटरफेरान, (ग) गामा-इंटरफेरान या इम्यून इंटरफेरान। इटरफेरान द्वारा भयानक विषाणु रोगों पर नियंत्रण किया जाता है।

आनुवंशिक रोगों का उपचारः जीनों को परिवर्तित कर कई घातक आनुवंशिक बीमारियों, जैसे-हिमोफिलीया, सिकिल-सेल एनीमिया, इरोथोब्लास्टोसिस, आदि पर नियंत्रण किया जा रहा है।

मोनोक्लोनल एंटीबाडीजः विभिन्न बीमारियों से बचने के लिए एंटीबाडीज को उपयोग में लाया जाता है, जो रोगकारकों को मारकर शरीर को सुरक्षा प्रदान करते हैं। वर्ष 1975 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के केसल माइल्सटीन और जॉर्ज कोहलर ने एंटीबाडीज उत्पादन करने वाले लिम्फोसाइट कोशिका और कैंसर कोशिका को सयुग्मित कराने में सफलता पाई, जिससे कैंसर युक्त लिम्फोसाइट बना। इस प्रकार उत्पन्न संकर में दोनों गुण थे, पहला एंटीबाडी पैदा करने तथा दूसरा तेजी से विभाजित होने का भी। इस संकर कोशिका का नाम हाइब्रिडोमा कोशिका रखा गया तथा इस तकनीक को हाइब्रिडोमा तकनीक कहा जाता है।

डी.एन.. द्वारा रोगों की पहचान  कुछ ऐसी बीमारियां हैं, जिनकी पहचान काफी मुश्किल है। सामान्य रोगों के कीटाणुओं की पहचान थूक, मल, मूत्र और रक्त के परीक्षण द्वारा कर ली जाती है, किंतु कुछ कीटाणुओं के लक्षण दूसरे से मिलते हैं और एक कीटाणु को मारने वाली औषधि दूसरे कीटाणु को नहीं मार पाती। इस परिस्थिति में डी.एन.ए. विश्लेषण करके रोगकारक कीटाणु की पहचान कर ली जाती है।

पशु चिकित्सा मेः एण्टरोटैक्सिमिया, एथेक्स, रेबीज तथा मुर्गियों की रानीखेत बीमारियों के लिए टीकों का बड़े पैमाने पर उत्पादन और बिक्री जारी है। भारत जैसे देश में पशुपालन का अत्यधिक महत्व है। पशुओं से प्राप्त होने वाले विविध प्रकार के उत्पादों में गुणवत्ता लाने के लिए जैव-प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाता है। भारत में जैव-प्रौद्योगिकी ने पशुओं के नए नस्ल विकसित करने में, नस्ल सुधार में तथा पशुओं के स्वाथ्य सुधार में विशेष योगदान दिया है। शारीरिक क्रिया प्रणाली में सुधार तथा जीन प्रत्यारोपण प्रणाली प्रमुख पद्धतियां हैं।

जंतुओं के भ्रूण हस्तांतरण, पोषण स्वास्थ, रोगों के निवारण, टीकों, चमड़ा जैव-प्रौद्योगिकी आदि, क्षेत्र में उत्साहजनक परिणाम मिले हैं। नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय रोग प्रतिरक्षण संस्थान, हिसार स्थित भैंसों के संबंध में राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान और करनाल स्थित डेयरी अनुसंधान संस्थान में भ्रूण स्थानांतरण परियोजनाओं के उपयुक्त परिणाम मिले हैं। इन परियोजनाओं के अंतर्गत एंब्रियो माइक्रोमैनिपुलेशन, स्पिलिटिंग, क्लोनिंग और सेक्सिग की प्रक्रियाओं में सुधार लाया गया। बकरियों और ऊंटों में भ्रूण हस्तांतरण प्रक्रिया अपनाई गई। गोवंश के पशुओं के उपयुक्त प्राइमर का उपयोग कर सेक्सिग के प्रयोग किए गए। इनके परीक्षण के परिणाम बहुत ही अच्छे मिले हैं।

रिंडरपेस्ट जोंस डिजीज, ब्लू वर्णीय वायरस, डकप्लेग वायरस, बैसिलस एंथेसिस, जैसे रोगों के निवारण के लिए रोग प्रतिरक्षा प्रणाली के विकास पर कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। स्वदेशी पशु के नस्लों की आनुवंशिकता तथा आनुवंशिक गुणों के निर्धारण का अध्ययन किया गया है। गायों की दो स्वदेशी नस्लों-कंकरेज और ओंगोले के भ्रूण संग्रहण किए गए। ओपन न्यूक्लिअस ब्रीडिंग योजना के अंतर्गत नर बछड़ों का आनुवंशिक मानकीकरण किया गया। भैंसों के जीन अध्ययन के लिए बहुकेन्द्रीय कार्यक्रम लागु किया गया। इस कार्यक्रम के अंतर्गत आर्थिक महत्व के जीनो की पहचान पर ध्यान केन्दित किया गया। कार्डियो माइक्रोसाइट कल्चर के लिए मवेशियों के त्रिआयामी प्लेटफार्म के संरचनात्मक और क्रियाशील पहलुओं का अध्ययन किया जा रहा है।

जैव उत्प्रेरक

विनिर्माण प्रक्रिया में प्रयोग किये जाने वाले नए एंजाइमों और जैव उत्प्रेरकों के विकास में औद्योगिक जैव तकनीक जुड़ी हुई है। औद्योगिक जैव तकनीक कंपनियो द्वारा प्राकृतिक पर्यावरण से इन जैव उत्प्रेरकों को औद्योगिक स्तर पर निर्मित किया जा सकता है तथा जैव उत्प्रेरकों में सुधार करके नई जरूरतों को पूरा करना इसी का एक हिस्सा है। मानव औषधियों की तरह ही इन्हें उत्पादित करना ओद्योगिक जैव रसायन की एक जरूरत बन गयी है। आनुवंशिक तौर पर परिवर्तित किये गये सूक्ष्म जीव किण्वन करते हैं।

जैव-प्रौद्योगिकी विभाग ने जैव प्रौद्योगिकी पर आधारित उद्योगों को तकनीकी क्रांति की प्रथम पंक्ति में लाने हेतु सितम्बर 2005 में लघु व्यापार नवीकरण अनुसंधान योजना आरम्भ की। इस योजना का उद्देश्य जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भारत को विश्व के शीर्ष देशों के मध्य स्थापित करना है। इस योजना का कार्यान्वयन दो चरणों में किया जाता है। इसके प्रथम चरण में अत्यंत नवीन प्रारम्भिक एवं. अप्रमाणित अनुसंधान कार्यों में सहायता प्रदान की जाती है, जबकि द्वितीय चरण में विकसित परियोजनाओं, नई शोध सफलताओं के व्यावसायिक उपयोग, इत्यादि हेतु आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

इसमें महत्वपूर्ण राष्ट्रीय आवश्यकताओं से सम्बद्ध परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जाती है। इस योजना से सार्वजनिक-निजी सहयोग का एक नया दौर आरम्भ हुआ है, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र की क्षमता एवं निजी क्षेत्र की रचनात्मकता एवं तात्कालिकता सम्मिलित हैं।

कृषि

कृषि क्षेत्र में जैव-प्रौद्योगिकी के द्वारा कीट प्रतिरोधी फसलों का निर्माण संभव हो सका है जो कीटनाशकों की कम मात्रा उपयोग में लाती है। कृषि के विभिन्न क्षेत्रों में जैव-तकनीकी प्रयोग का काफी विस्तार हुआ है।

ऊतक सवर्द्धन द्वारा पौधों का प्रवर्द्धनः प्रत्येक जीवधारी एक या उससे अधिक कोशिकाओं द्वारा बना होता है। मानव शरीर भी असंख्य कोशिकाओं से बना हुआ है, किंतु चौंकाने वाली बात यह है कि प्रत्येक कोशिका अपने आप में पूर्ण एवं अपरिहार्य है। यदि एक कोशिका, अंग या एक उतक को अलग करके उसे उपयुक्त वातावरण व पोषक पदार्थ दिए जाएं तो उनसे पूरा जीवधारी विकसित किया जा सकता है। पौधों के संबंध में यह अधिक सुविधाजनक है। इस तकनीक को सूक्ष्म प्रवर्द्धन कहा जाता है। इस तकनीक द्वारा फूलों, सजावटी पुष्पों, कन्दों, शल्क कन्दों तथा फल पादप प्रजातियों के उत्पादन के लिए व्यापक रूप से प्रयोग में लाया जा रहा है।

ट्रांसजेनिक फसलः बीटी असल में 'Bacillus thuringiensis' (बैसिल्स थुरिंजिएंसिस) जीवाणु के लम्बे वैज्ञानिकी नाम का छोटारूप है। प्रकृति में 500 प्रकार के बीटी बैक्टीरिया पाए जाते हैं। यह जीवाणु खाद-मिट्टी में पाया जाता है।

बीटी बैक्टीरिया में एक ऐसा जीन होता है जो जब सक्रिय होता है, तो एक निष्क्रिय प्रोटीन बनाता है, जिसे बीटी प्रो-टोक्सिन कहकर संबोधित किया जाता है। जब इस बीटी बैक्टीरिया का सेवन कुछ खास प्रजातियों के कीड़ों द्वारा किया जाता है, तो यह उन कीड़ों के लिए घातक साबित हो जाता है। विभिन्न प्रकार के बीटी बैक्टीरिया लगभग 170 प्रकार के बीटी टोक्सिन बना सकते हैं जो कि अलग-अलग प्रजाति के कीड़ों के लिए घातक साबित हो सकते हैं, इसी खूबी के कारण इन बीटी बैक्टीरिया का जैविक खेती में इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि यह पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले कीटनाशकों के मुकाबले फसलों पर लगने वाले कीड़ों को मारने का एक प्राकृतिक समाधान पेश करते हैं।

बीटी बैंगनः बीटी बैंगन, जीन संशोधन तकनीक के अध्ययन से विकसित किया गया है, जिसका मतलब है कि, इस तकनीक का इस्तेमाल करके बैंगन के आनुवंशिक पदार्थ में बीटी बैक्टीरिया के अन्दर से निकाले हुए जीन को डाल दिया गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि जब बैंगन की फसलों पर धावा बोलने वाले ‘बोरेर‘ कीड़ा  इस बीटी जीन वाले बैंगन की फसल पर आक्रमण करेगा तब इस बीटी बैंगन पौधे का सेवन करने पर बैंगन के अन्दर डाला हुआ बीटी जीन सक्रिय होगा और बीटी टोक्सिन बनाएगा जो कि इस बोरेर कीड़े के हाजमे को खराब करके इसे अपने आप बिना कीटनाशक छिड़के मार डालेगा।

बीटी बैंगन को भारत में बनाने का कार्य सन 2000 में माहिको (महाराष्ट्र हाइब्रिड बीज कंपनी)- मोनसेट ‘बायोटेक द्वारा शुरू किया गया। इस कंपनी में माहिको और अमेरिकी मल्टीनेशनल कृषि बायोटेक कंपनी मौनसेंटो की 50-50 प्रतिशत की भागीदारी है। फिलहाल केंद्र सरकार ने भारतीय बाजार में बीटी बैंगन के प्रवेश पर रोक लगा दी है। भारत में इसका प्रयोग विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययन पर निर्भर करेगा। यह अध्ययन मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभाव पर आधारित होगा। ध्यातव्य है कि, जेनेटिक इंजीनियरिंग एपूवल कमिटी  (जीईएसी) ने अक्टूबर 2009 में भारतीय बाजार में बीटी बैंगन को उतारने की अनुमति दे दी थी, जिसके पश्चात् देशभर में इसके खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन हुआ। पर्यावरणविदों ने कमिटी पर पर्यावरण एवं मानवीय स्वास्थ पर पड़ने वाले प्रभावों की अनदेखी का आरोप लगाया। पर्यावरण एवं वन मंत्री जयराम रमेश ने निम्नलिखित कारणों से बीटी बैंगन के भारतीय बाजार में उतारने पर अस्थायी रोक लगाने की घोषणा की-

बीटी कपासः विशिष्ट बीटी जीव विष जींस बैसीलस थुरीनजिएसिस से पृथक् कर कई फसलों जैसे कपास में समाविष्ट किया जा चुका है। जींस का चुनाव फसल व निर्धारित कीट पर निर्भर करते हैं, जबकि सर्वाधिक बीटी जीव विष कीट-समूह विशिष्टता पर निर्भर करते हैं। जीव विष जिस जीन द्वारा कूटबद्ध होते हैं उसे क्राई कहते हैं, ये कई प्रकार के होते हैं-प्रोटींस जीन क्राई-1, एसी व क्राई-2 एबी द्वारा कूटबद्ध होते हैं। वे कपास के मुकुल कृमि को नियंत्रित करते हैं।

गोल्डन राइसः भिन्न जीन डालकर पैदा की गई पराजीनी फसलों से निर्मित जीन रूपांतरित खाद्य (जीएमफूड) की श्रेणी में गोल्डन राइस महत्वपूर्ण है। धान को विटामिन ‘ए से भरपूर बनाने के लिए इसमें अन्य जीवों का जीन प्रयुक्त कर इसके जीनोम को बदल दिया गया है। प्राकृतिक रूप से उत्पादन किए गए चावल में बीटा कैरोटीन की कमी होती है, जिसको शरीर विटामिन ‘ए‘ के कणों में बदल देता है। लेकिन अभी तक ऐसा कोई चावल पैदा नहीं किया गया है, जिसके दानों में विटामिन ‘ए‘ हो। लेकिन जैव तकनीक के द्वारा गोल्डन राइस में विटामिन  ‘ए‘ प्रचुरता में पाया जाता है। बीटा कैराटीन की वजह से इस चावल का रंग सुनहरा पीला होता है।

सुपर राइसः सुपर राइस अधिक पैदावार देने वाली, रोग निरोधी और पौष्टिकता से युक्त धान की नई विकसित प्रजाति है।

गेहूं : गेहूं में बायो-फोर्टीफिकेशन प्रोग्राम के अंतर्गत जिंक व आयरन के उच्च सूक्ष्म तत्वों के स्थानांतरण के लिए हाइब्रिडा इंजेक्शन शोध सफलतापूर्वक किया गया है।

सरसोः सरसों संकर DMH-11 किस्म के परंपरागत सरसों किस्मों की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत अधिक उत्पादकता दर्शायी गई है।

मक्काः कम फाइटेट जीन के जेनेटिक पृष्ठभूमि वाले पीएम (प्रोटीन माइज) वंशावली के स्थानांतरण पर उल्लेखनीय सफलता हासिल की है।

अरहरः विश्व की पहली अरहर की संकर प्रजाति का विकास भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर ने किया है। जिसका नाम जीटीएच-1 रखा गया है।

जैविक खेतीः जैविक खेती जीवों के सहयोग से की जाने वाली खेती के तरीके को कहते हैं। प्रकृति ने स्वयं संचालन के लिए जीवों का विकास किया है जो प्रकृति को पुनः ऊर्जा प्रदान करने वाले जैव संयंत्र भी हैं। यही जैविक व्यवस्था खेतों में कार्य करती है। खेतों में रसायन डालने से ये जैविक व्यवस्था नष्ट होने को है तथा भूमि और जल प्रदूषण बढ़ रहा है।

खेतों में हमें उपलब्ध जैविक साधनों की मदद से खाद, कीटनाशक दवाई, चूहा नियंत्रण हेतु दवा वगैरह बनाकर उनका उपयोग करना होगा। इन तरीकों के उपयोग से हमें पैदावार भी अधिक मिलेगी एवं अनाज, फल, सब्जियां भी विषमुक्त एवं उत्तम होंगी। प्रकृति के सूक्ष्म जीवाणुओं एवं जीवों का तंत्र पुनः हमारी खेती में सहयोगी कार्य कर सकेगा।

जैविक खेती के लाभः इससे यथोचित मात्रा में मानव पशुपालन के उपयोग के लिए उत्तम किस्म के खाद्यान्न, खाद्य पदार्थ, आदि का उत्पादन मिलता है।

जैव-उर्वरक

रासायनिक उर्वरकों में उत्पादन लागतों में अधिकता तथा इस्तेमाल के परिणामस्वरूप भू-प्रदूषण तथा भूमि की उर्वरता क्षमता में कमी से बचाव के लिए जैव-उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है। वास्तव में, भूमि में ऐसे अनेक जीवाणु स्वतंत्र रूप से या पौधों के संपर्क में विकास करते हैं जो वायु की नाइट्रोजन को स्थिर करके पौधों को प्रदान करते हैं।

राइजोबियमः ये दलहनी फसलों की जड़ों की गांठ में रहते हैं और सहजीवी जीवन व्यतीत करते हैं।

माइकोराइजाः जब कवक किसी बड़े पौधे की जड़ में सहजीवी ढंग से रहता है तो उसे माइकोराइजा कहा जाता है। माइकोराइजा नाइट्रेजन स्थिरीकरण में सहायक होते हैं।

एजोटो बेक्टरः ये स्वतंत्र रूप से सभी एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री फसलों पर पाये जाते हैं।

सायनोबैक्टिरियाः एनाबीना, नोस्टोक, टोलिपोथिक्स, ग्लीयोट्रिकिया, इत्यादि स्वतंत्र रूप से या सहजीवी रूप से नाइट्रोजन स्थिरीकरण करते हैं।

एजोलाः यह एक जलीय फर्न है इसकी जड़ों में एनाबीना रहता है और नाइट्रोजन स्थिरीकरण करता है। धान की खेती में एजोला का प्रयोग किया जा रहा है।

कंपोस्टः जैविक तथा औद्योगिक अपशिष्ट प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहते हैं। इन्हें पौधों के पोषण हेतु कंपोस्ट में बदला जा सकता है। कंपोस्ट तैयार करने में सूक्ष्म जीवाणुओं की अहम भूमि होती है।

वर्मीकल्चरः केंचुओं का कृत्रिम पर्यावरण में पालन-पोषण वर्मी-कल्चर कहलाता है। अनुसंधानों से सिद्ध हो चुका है कि केंचुओं द्वारा निर्मित खाद साधारण कंपोस्ट खाद से अधिक उपयोगी होती है।

टर्मिनेटर जीन

संयुक्त राज्य अमेरिका के कृषि विभाग तथा ‘डेल्टा एवं पाइनलैंड‘ कंपनी द्वारा मार्च 1998 में टर्मिनेटर जीन तकनीक का पेटेंट प्राप्त किया गया। टर्मिनेटर एक उपज शक्ति विनाशक जीन है, जिसका उपयोग करने पर बीज पहली बार बोये जाने पर तो सामान्य रूप से कार्य करता है, किंतु मूल बीज से उगायी गयी फसल से प्राप्त बीज की क्षमताएं लगभग समाप्त हो जाती हैं। इस क्षमताहीन बीज से पौधों की उत्पत्ति तो हो जाती है किंतु पौधों पर फूल या फल नहीं आते। अभी तक इस जीन का उपयोग तंबाकू और कपास के बीज में किया गया है।

टर्मिनेटर जीनयुक्त बीजों के प्रयोग से किसान पहली बार में फसल ले सकता है, किंतु अगली फसल के लिए उसे पुनः मंहगा बीज खरीदना पड़ेगा। भारत जैसे विकासशील देशों में अधिसंख्यक किसान फसल के एक हिस्से को बीज के रूप में संरक्षित रखतें हैं। टर्मिनेटर तकनीक में बीज के अंदर चार अलग-अलग जीनों को प्रविष्ट कराकर उसकी पुन: उत्पादन क्षमता को नष्ट कर दिया जाता है। यह तकनीक सभी प्रकार की फसलों पर प्रयुक्त की जा सकती है। इन जीनों के लाइसेंस अधिकार अमेरिकी बीज एवं जैव-प्रौद्योगिकी कंपनी मोनसेंटो द्वारा प्राप्त किये गये हैं।

मोनसेंटो द्वारा जीन अभियांत्रिकी द्वारा निर्मित बोलगार्ड टी एम नामक कपास की किस्म विकसित की है, जिसमें जीन शामिल किया गया है। यह जीन बोलवार्म नामक बीमारी पर नियंत्रण करता है, जो कपास के पौधों में पायी जाती है। मोनसेंटो द्वारा 1994 में भारतीय कंपनी माहिको के साथ मिलकर 1998 में बोलगार्ड से जुडे परीक्षण किए गए, जिससे कपास उत्पादक किसानों में यह संदेह पैदा हो गया कि टर्मिनेटर जीन तकनीक भारत में लाने का प्रयास किया जा रहा है। 1998 में किसानों द्वारा मोनसेंटो के खिलाफ देशव्यापी अभियान छेड़ा गया। मोनसेंटो द्वारा स्पष्टीकरण देते हुए कहा गया कि, बोलगार्ड में टर्मिनेटर जीन जैसी किसी तकनीक का प्रयोग नहीं किया गया है और न ही ऐसी कोई तकनीक वर्तमान में विश्व में उपलब्ध है। बाद में सरकार के इस आश्वासन के उपरांत किसानों के प्रदर्शनों को रोका जा सका कि, सरकार इस बीज के पूर्ण परीक्षण के उपरांत ही भारत में इसके प्रयोग की अनुमति देगी।

पीड़क प्रतिरोधी पौधाः विभिन्न सूत्र कृमि, मानव सहित जंतुओं व कई किस्म के पौधों पर परजीवी होते हैं। सूत्रकृमि मिल्वाडेगाइन इनकोगनीशिया तम्बाकू पौधों की जड़ों को संक्रमित कर उसकी पैदावार को काफी कम कर देता है। इस संक्रमण को रोकने के लिए एक नवीन योजना को स्वीकार किया गया है जो आर.एन.ए. अंतरक्षेप की प्रक्रिया पर आधारित है। आर.एन.ए. अंतरक्षेप सभी सीमित केंद्र की जीनों में कोशिकीय सुरक्षा की एक विधि है। पादप ऊतक संवर्धनः बांस की खेती के क्षेत्र में राष्ट्रीय रसायन प्रयोगशाला को उल्लेखनीय उपलब्धि प्राप्त हुई है। इसके द्वारा बांस की तीन किस्मों-डेन्डो कलमस स्टिस्ट्स, बम्बूसा अरुडिनेसिया एवं डेन्ड्रोकलमस ब्रेनडिसी में पादप ऊत्तक संवर्द्धन द्वारा समय से पहले फूल लाने में सफलता प्राप्त की गई है। इसके अलावा इलायची, मिर्च, काजू कॉफी, अदरक, हल्दी, इत्यादि के पादपों को कीटाणुओं से बचाने हेतु फेरोमोन्स विकसित करने की दिशा में काम किया गया है।

मशरूम संवर्द्धनः मशरूम संवर्द्धन तकनीक का उपयोग धान एवं गेहूं के पुआल से उच्च कोटि का प्रोटीन बनाने, औषधीय या औद्योगिक रूप से उपयोगी उत्पाद बनाने, जल अपघटनीय एंजाइमों तथा एंटीबायोटिक उत्पाद बनाने, आदि में किया जाता है। वस्तुतः मशरूम एक कोशिकीय यीस्ट होता है।

खाद्य जैव-प्रौद्योगिकी

जैव प्रतिकारको के प्रयोग से बहुत थोड़े समय में कम लागत तथा कम श्रम द्वारा पौष्टिक एवं परिष्कृत खाद्य सामग्रियों का उत्पादन संभव हो सका है। जैव-प्रौद्योगिकी द्वारा शैवाल एवं जीवाणुओं में मूलभूत परिवर्तन करके उन्हें संवर्द्धित तथा परिष्कृत करने में सहायता मिली है। इससे पौष्टिक भोज्य पदार्थों तथा शक्तिशाली औषधियों के उत्पादन में भी सहायता मिलती है।

संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए न्यूटारयूटिकल और प्रोबायोटिक्स के विकास और इस्तेमाल पर बल दिया गया है। भारत और कनाडा के विशेषज्ञो से विचार-विमर्श के बाद विभाग ने एक जैव-प्रौद्योगिक संस्थान और बायोप्रोसेसिग स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू की है। ये दोनों संस्थान विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त संस्थान होंगे।

जैव-ईंधन

जैव-प्रौद्योगिकी विभाग ने बायोमास से जैव ईंधन बनाने के लिए एक मिशन कार्यक्रम की शुरुआत की है। इसमें लिग्नोसे ल्युलोसिक कचरे को कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल कर एथनॉल बनाने, एथनॉल उत्पादन की मात्रा बढ़ाने के लिए रिकाम्बिनैट माइक्रोबियल स्टेन की पहचान करने, बायोडीजल उत्पादन हेतु उच्च गुणवत्ता वाले कच्चे माल के उत्पादन और तेल को बायोडीजल में परिवर्तित करने के लिए एंजाइमिक ट्राँसइस्टरिफिकेशन प्रक्रिया के विकास पर बल दिया गया है। जेट्रोफा करकैस के उच्च स्तरीय पौधों के लिए एक माइक्रोमिशन के अंतर्गत पहली बार एक व्यवस्थित वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया गया है जिसके अंतर्गत देशभर से अच्छे दर्जे के नमूने एकत्रित किए गए हैं। देशभर से लगभग 100 नमूने जुटाकर उनकी पहचान की गई है। अच्छे  दर्जे के पौधे उपलब्ध कराने हेतु देश में 12 स्थानों पर नर्सरी बनाई गई है।

बायो-एथनॉल कार्यक्रम के अंतर्गत रिकॉम्बिनैट माइक्रो ऑर्गेनिज्म की पहचान की गई है। ये ताप सहनशील है और इनसे एथनॉल उत्पादन बढ़ाने में सहायता मिलती है। लिग्नोसेल्युलोसिक कचरे के लिए एंजाइम के जरिए प्रशोधन पूर्व प्रक्रिया पर भी काम चल रहा है।

पर्यावरण

वर्तमान समय में प्रदूषण एक सार्वभौमिक समस्या बनती जा रही है। वर्ष 1989 में अलास्का के समुद्र तट पर बहते हुए तेल को समाप्त करने के लिए तेल खाने वाले जीवाणुओं को उपयोग में लाया गया। इस बैक्टीरिया का नाम है-सुपर बग। सुपर बग की खोज भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. आनंद चक्रवर्ती ने की है- डॉ. चक्रवर्ती द्वारा बनाया गया यह पहला मानव निर्मित जीव है, जिसे अमेरिका के इतिहास में पहली बार पेटेंट कराया गया है। इसी तरह विषैली गैसों से बचने के लिए जैव-संवेदक की खोज की गई। फ्रांस के वैज्ञानिकों ने चेरेनोबिल परमाणु दुर्घटना से ग्रस्त दस हजार वर्ग किमी भूमि में खेती करने का प्रयास किया। वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसे पौधों की खोज की है, जो रेडयोएक्टिव तत्त्वों को अपनी जड़ों के माध्यम से अवशोषित कर लेते हैं। इस प्रकार बार-बार बोने और काटने से परमाणु तत्व समाप्त हो जाएंगे तथा भूमि कृषि के योग्य बन जाएगी।

राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान, नागपुर के वैज्ञानिकों ने ऐसा जीवाणु ढूढ निकाला है, जो तेजी से डाइवेन्जो थायोफीन का अपघटन करता है। वैज्ञानिक सूक्ष्म जीवियों की कोशिकाओं को इस्तेमाल करके ऐसा संयंत्र बनाने में लगे हैं, जो कपड़ा मिलों द्वारा निकाले गए प्रदूषक घातक रंजकों को अपघटित कर सके।

जैव संवेदक (बायोसेंसर)

जैव संवेदक एक ऐसा विश्लेषक उपकरण है जो जैविक प्रतिक्रियाओं को विद्युत संकेतों में तब्दील कर देता है। वस्तुतः ये ऐसे शक्तिशाली उपकरण होते हैं जो जैव चिकित्सा इलाज के लिए औद्योगिक उत्पादों, रासायनिक पदार्थो, पर्यावरणीय नमूनों या जैविक प्रणालियों में विषाक्त रासायनिक बंध की चयनात्मक पहचान उपलब्ध कराता है।

जैव-डीजल

जैव-डीजल एक कृषि आधारित डीजल ईंधन होता है, जो खाद्य वनस्पति तेल अथवा अखाद्य वनस्पति तेल द्वारा बनाया जाता है। इसका स्रोत जंतुओं की वसा भी हो सकती है।

यूरोप तथा अमेरिका में जैव-डीजल परियोजना खाद्य तेलों पर आधारित होती है। भारत में अनुसंधान केंद्र, जैसे-फरीदाबाद स्थित भारतीय तेल अनुसंधान एवं विकास केंद्र रतनजोत या जट्रोफा तथा अन्य खाद्य तेल बीजों पर आधारित जैव-डीजल से संबंधित प्रयोग कर रहे हैं। वर्तमान में जैव-डीजल को 5 प्रतिशत डीजल के साथ मिलाकर प्रयोग किया जा रहा हैं। पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस मंत्रालय के निर्देशन में पेट्रोलियम संरक्षण व अनुसंधान संघ ने दिल्ली में जैव-ईंधन मुख्यालय स्थापित किया है, जो जट्रोफा की फसल उपजाने व जैव-ईंधन निर्मित करने व जागरूकता फैलाने का कार्य करेगा। हरियाणा, गुजरात तथा मुम्बई में राज्य यातायात प्राधिकरण की बसों में जैव-डीजल को मिश्रित करने पर प्रयोग किए जा रहे हैं। भारतीय तेल निगम द्वारा विभिन्न वनस्पति तेलों से कृत्रिम प्रक्रियाओं द्वारा जैव-डीजल के निर्माण को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस प्रकार विकसित तकनीक को ‘मेसर वीनस एथोसीथरस गोवा‘ को हस्तांतरित किया गया था। एक गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशाला फरीदाबाद में स्थापित की गई है। भारतीय तेल निगम (IOC) ने भारतीय रेलवे के साथ एक स्मरण-पत्र (मेमोरेंडम) पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके अंतर्गत गुजरात के सुरेंद्र नगर में 70 हेक्टेयर भूमि पर जैव-डीजल से संबंधित पौधों को उगाया जाएगा। यह देश की एकमात्र परियोजना है, जिसमें जट्रोफा जैव-डीजल के प्रत्येक पक्ष का अध्ययन किया जाएगा। शताब्दी व जन-शताब्दी रेलगाड़ियों में परीक्षण हेतु क्रमशः 5 प्रतिशत तथा 10 प्रतिशत जैव-डीजल मिलाया गया।

जैव-डीजल के लाभः जैव-डीजल का प्रयोग इंजनों में बिना किसी बड़े परिवर्तन के किया जा सकता है। जैव-डीजल के भंडारण हेतु भी किसी अलग आधारभूत संरचना की आवश्यकता नहीं है। जट्रोफा, पोंगोंमिया जैसे पौधों को खाली पड़ी भूमि पर भी उगाया जा सकता है। भारत में 100 मिलियन हेक्टेयर भूमि खाली पड़ी है। इस परियोजना से विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में संग्रहण, तेल निकलने इत्यादि के रूप में रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे। जैव-डीजल पर्यावरण अनुकूल भी है क्योकि यह ऑक्सीजिनेट के रूप में भी कार्य कर सकती है और इसका बेहतर दहन होता है एवं यह कम धुंआ छोड़ता है।

जीनोम विश्लेषण और मानव आनुवंशिकी

कुछ पौधों तथा जंतुओं के जेनेटिक कोड को सुलझाने की दिशा में प्रगति हुई है। मानव के जैविक प्रकार्य के संबंध में इसका बड़ा महत्व है, क्योंकि आणविक एवं कोशिकीय स्तर पर सभी उच्च जीवों की आधारभूत जैविक प्रक्रियाएं एक जैसी हैं।

मानव जीनोम मैंपिंग में वैज्ञानिक के दो समूह सम्मिलित हैं। एक तो मानव जीनोम परियोजना, जिसका नेतृत्व संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान के डॉ. फ्रांसिस कोलिन कर रहे हैं तथा दूसरा समूह निजी अनुसंधान संस्थान सेलेरा जिनोमिक कोर्प है, जिसका नेतृत्व डा. क्रेग वेन्टर कर रहे हैं। जून 2000 में दोनों समूहों ने सम्मिलित रूप से घोषणा की कि, उन्होंने जीनोम मैप का ड्रॉफ्ट तैयार कर लिया है। फरवरी 2001 में दोनों समूहों ने मानव जेनेटिक कोड की प्रथम विश्लेषण रिपोर्ट जारी की। इसकी प्रमुख बातें निम्नलिखित हैः

अक्टूबर 2004 के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में मानव जीनोम के यूक्रोमेटिक क्रम के पूर्ण होने की घोषणा की गई। छुटे हुए 341 अंतरालों में से 308 यूक्रोमेटिक एवं 33 हेटेरोक्रोमेटिक हैं। मई 2006 में क्रोमोसोम 1 के डी.एन.ए. क्रम निर्धारण को पूर्ण किया गया। इसके साथ ही सभी मानव क्रोमोसोमो का क्रम बना लिया गया। क्रोमोसोम 1 के क्रम निर्धारण में सबसे अधिक समय लगा, क्योंकि यह छोटे मानव क्रोमोसोमों, जैसे - 21, 22, 23 आदि से लगभग 6 गुना लम्बा है तथा इसमें मानव जेनेटिक सूचनाओं का लगभग 6 प्रतिशत है। इस क्रोमोसोम से कैंसर, पार्किंसन एवं अलजाइमर जैसे 350 से अधिक रोग संबंधित हैं।

मनुष्य के जीन उसके शारीरिक लक्षणों का निर्धारण करते हैं और ये ही क्रोमोसोम के माध्यम से इन लक्षणों को पीढ़ी दर पीढ़ी ले जाते हैं। अब इसके माध्यम से यह पता लगाया जा सकेगा कि किसी विशेष लक्षण के लिए कौन-सा जीन जिम्मेदार है और इस प्रकार कई असाध्य रोगों का इलाज भी किया जा सकेगा। अब तक जीनों की रचना के परिवर्तनों को समझ लिया गया है जिन्हें स्निप, इंडेल, सीएनबी, इनवर्जन्स के संक्षिप्ताक्षरों से संबोधित किया गया है। इस अनुसंधन जीन की पहचान करने के बाद उनके द्वारा बनाए जाने वाले प्रोटीन की पहचान भी वैज्ञानिकों के लिए आसान हों जाएगी, जिससे यह मालूम किया जा सकेगा कि कौन-सा जीन, किस प्रकार का प्रोटीन बनाता है और शरीर में क्या कार्य करता है। इससे जीन में उपस्थित कमी या दोषों को दूर करना संभव होगा।

भारत में जैव-प्रौद्योगिकी

भारत मै जैव-प्रौद्योगिकी को विकसित करने के लिए भारत सरकार द्वारा 1982 में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत एक राष्ट्रीय जैव-प्रौद्योगिकी निगम की स्थापना की गई। 1986 में राष्ट्रीय जैव-प्रौद्योगिकी निगम को जैव-प्रौद्योगिकी विभाग में रूपांतरित कर दिया गया, जो अब विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के नियंत्रणाधीन है। जैव-प्रौद्योगिकी विभाग ने भारत में जैव-प्रौद्योगिकी के विकास के लिए अनेक केंद्र स्थापित किए हैं और उनके माध्यम से अनुसंधान एवं विकास कार्यों को प्रेत्साहन प्रदान कर रहा है।

जैव-प्रौद्योगिकी विभाग ने कई स्वायत्त संस्थान स्थापित किए है। राष्ट्रीय रोग प्रतिरक्षा संस्थान (एन.आई.आई.), नई दिल्ली राष्ट्रीय कोशिका विज्ञान केंद्र (एन.सी.सी.एस.), पुणेः राष्ट्रीय डी.एन.ए. फिंगर प्रिंटिंग और नैदानिकी केंद्र (सी.डी.एफ.डी.), हैदराबाद नेशनल सेंटर फॉर प्लांट जीनोम रिसर्च .(एन.सी.पी.जी.आर.), नई दिल्लीय राष्ट्रीय मस्तिक अनुसंधान केंद्र (एनबीआरसी.) गुड़गांव, हरियाणा जैव संसाधन एवं दीर्घकालिक विकास संस्थान, इम्फाल एवं जीवन विज्ञान संस्थान (आई.एल.एस.), भुवनेश्वर।

एन.आई.आई. संस्थान प्रतिरक्षा प्रणाली से संबंधित आधारभूत अनुसंधान में आगे बढ़ रहा है। संस्थान ज्ञान की वृद्धि के जरिए देश की स्वास्थ्य समस्याओं से बेहतर ढंग से निपटने के लिए नए प्रभावी तरीके ढूंढने हेतु प्रतिबद्ध है। इस संस्थान ने कई समालोचित शोध प्रकाशित किए हैं। संस्थान जीव विज्ञान अनुसंधान में शुरू से अंत की अवधारणा पर चल रहा है और एस्ट्राजेन्का इंडिया, बंगलुरू और कैडिला फार्मास्युटिकल्स, अहमदाबाद के साथ माइक्रोबैक्टीरियल फैड-डी प्रोटीनों के नए अणुओं के रोकने से संबंधित समझौते किए हैं।

एनसीसीएस, पुणे के स्टेम सेल जीव विज्ञान, सिग्नल ट्रांसडक्शन, कैंसर जीव-विज्ञान, मधुमेह, संक्रमण और रोग प्रतिरोध क्षमता तथा क्रोमेटिन संरचना और जीन नियमन जैसे जीव विज्ञान के विषयों में अनुसंधान और विकास गतिविधियों में कार्यरत है। राष्ट्रीय कोशिका भण्डार ने देश में 128 वैज्ञानिक संस्थाओं को 1154 कोशिका श्रृंखलाओ की आपूर्ति की है। कोशिका जीव विज्ञान अनुसंधान के क्षेत्र में पहली बार न्यूक्लियर पोर प्रोटीन की खोज की है जो इंटरफेस सूक्ष्मनलिकाओं से सम्बद्ध है।

सी.डी.एफ.डी., हैदराबाद डी.एन.ए. फिंगर प्रिंटिंग, नैदानिकी, नवजात स्क्रीनिंग और जैव सूचना संबंधी सेवाएं आम लोगों तथा जीव विज्ञान के अग्रणी क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय स्तर के आधारभूत शोध के लिए देता है। इसमें यह आधुनिक उच्च प्रौद्योगिकी डी.एन.ए. आधारित विषयों का उपयोग करता है। इस समय जेनेटिक्स, आणविक तथा कोशिका जीव विज्ञान, कैंसर जीव विज्ञान, कैंसर जीव विज्ञान एचआईवी जीव विज्ञान, रोग प्रतिरक्षण, आदि से संबधित विविध अनुसंधान क्षेत्रों में 15 समूह कार्य कर रहे हैं।

तंत्रिका विज्ञान के क्षेत्र में उत्कृष्ट केंद्र के रूप में एन.बी.आर.सी. की स्थापना को गई है, ताकि इस क्षेत्र में उच्च श्रेणी के आधारभूत अध्ययन को बढ़ावा मिले। केंद्र में फंक्शनल मैग्नेटिक रेसोनेंस इमेजिंग (एफ.एम.आर.आई.) सुविधा 26 सितंबर, 2006 को शुरू हुई है। एनआईपीजीआर (पूर्व में नेशनल सेंटर) केंद्र का मुख्य बल संरचनात्मक जीनोमिक्स और व्यावहारिक जीनोमिक्स पर है। यह पादप अनु जीव विज्ञान, जीनोमिक्स और जीन आधारित परिवर्तन के क्षेत्रों में वैज्ञानिक मानव संसाधन के लिंग भी महत्वपूर्ण योगदान कर रहा है। जैव संस्थान एवं दीर्घकालिक विकास संस्थान, इम्फाल पूर्वेत्तर क्षेत्र के सामाजिक विकास के लिए प्रौद्योगिकी के जरिए जैव संसाधनों के विकास और उनके लम्बे समय तक उपयोग हेतु कई शोध कार्यक्रम चला रहा है। सूक्ष्म जीवों, खासतौर पर मणिपुर में पाए जाने वाले साइनो बैक्टीरिया के डेटाबेस पर काम शुरू किया गया है।

आईएलएस, भुवनेश्वर ने अणु जीव विज्ञान में आधुनिक तकनीक से वृद्धावस्था क्रॉनिक माइलॉइड, ल्यूकेमिया की पेथोजेनेसिस, हैजा, मलेरिया और फाइलेरिएसिस, जैसे संक्रामक रोगों और पादप व पर्यावरण जैव-प्रौद्योगिकी को समझने में सहायता की है।

मानव शक्तिः प्रशिक्षित कार्मिक बनाने और मौजूदा कार्मिकों के कौशल मैं सुधार हेतु जैव-प्रौद्योगिकी में समेकित मानव संसाधन विकास कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इस समय जैव-प्रौद्योगिकी के विभिन्न क्षेत्रों-सामान्य जैव-प्रौद्योगिकी, कृषि जैव-प्रौद्योगिकी, पशु विज्ञान, आर्युविज्ञान, समुद्र विज्ञान, तंत्रिका विज्ञान, औद्योगिक जैव-प्रौद्योगिकी, आणविक व मानव जीन विज्ञान, पर्यावरण जैव-प्रौद्योगिकी और भेषज जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में स्नातकोत्तर कार्यक्रम और जैव रसायन अभियात्रिकी एवं जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में एमटेक के अलावा जैव सुरक्षा और नियम, पशु कोशिका संवर्द्धन, आदि क्षेत्रों में स्नातकोत्तर पत्रोपाधि-पाठय़क्रमों को सहायता दी जा रही है ‘ जैव-प्रौद्योगिकी औद्योगिक प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत स्नातकोत्तर छात्रों को छह माह के लिए औद्योगिक अनुभव दिलाने का भी प्रावधान है। विभाग ने 2004 से कनिष्ठ अनुसंधान वृत्ति (जे.आर.एफ.) की शुरुआत की है। इन शोधार्थियों का चुनाव जैव-प्रौद्योगिकी योग्यता परीक्षा द्वारा पुणे विश्वविद्यालय करता है।

जैव-तकनीक सूचना प्रणाली

जैव-सूचना विभाग का जैव-तकनीक सूचना प्रणाली कार्यक्रम अब देशव्यापी नेटवर्क में बदल गया है। यह नेटवर्क जैव सूचना विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान और इस क्षेत्र में मानव संसाधन विकसित करके जैव-प्रौद्योगिकी अनुसंधान में सहयोग कर रहा है। जैव सूचना विज्ञान द्वारा जीव विज्ञान शिक्षण में नवीनता लाने के लिए 52 जैव सूचना विज्ञान सुविधाएं स्थापित की गईं। ये सुविधाएं जीव विज्ञान और जैव-प्रौद्योगिकी में शिक्षण क्षमता बढ़ाने में जैव सूचना विज्ञान संसाधन केंद्र के रूप में काम करेगी। जैव सूचना विज्ञान में विषय केन्द्रित बहुसस्थानीय संकाय परियोजनाएं शुरू की गई है ताकि जैव सूचना विज्ञान के दृष्टिकोण से खास समस्याओं को सुलझाया जा सके। देश में जैव सूचना विज्ञान में उपलब्ध श्रेष्ठ मानव संसाधन को पहचान दिलाने के लिए राष्ट्रीय स्तर की जैव सूचना विज्ञान प्रमाण-पत्र परीक्षा शुरू की गई है। राष्ट्रीय जैव-प्रौयोगिकी विकास नीति 13 नवम्बर, 2007 को केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय जैव-प्रौद्योगिकी विकास नीति को अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी गई। यह नीति सम्बन्धित मंत्रालयों, विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों, निजी क्षेत्रों, नागरिक समाज, उपभोक्ता समूहों, गैर-सरकारी और स्वैच्छिक संगठनों तथा अंतरराष्ट्रीय निकायों सहित विभिन्न वर्गें के लोगों के साथ दो वर्ष चले राष्ट्रव्यापी परामर्श प्रक्रिया का परिणाम है। इस नीति के अंतर्गत एक राष्ट्रीय जैव-प्रौद्योगिकी विनियामक प्राधिकरण का गठन किया जाएगा। राष्ट्रीय जैव-प्रौद्योगिकी नीति के प्रमुख तथ्य निम्नलिखित हैः

अनुप्रयोग और शोध उपलब्धियां

चावल में क्षारीयता और निर्जलीकरण सहनशक्ति बढ़ाने के लिए चल रहे एक कार्यक्रम में फास्फोफ्रक्टोकाइनेज के जीन कूट का पूरा क्लोन बना लिया गया, जिससे ज्ञात हुआ कि यह एंजाइम नमक की मौजूदगी में सक्रिय होता है। जीन परिवर्तन के बाद बनाई गई सरसों (डीएमएच-11 ) के कई स्थानों पर मूल्यांकन की बारनेस आधारित बारनेस-बारस्टार प्रणाली पर आधारित परियोजना में राष्ट्रीय अरंडी-सरसों अनुसंधान केंद्र भरतपुर ने परीक्षण किए। हिमालयन राई और देसी गेहूं के जीनोटाइप्स मिलाकर एक नई ट्रिटिकल लाइन विकसित की गई है, जिसे बहुत खास राई गेहूँ ट्रांसलोकेशन प्राप्त करने के विविध स्रोतों के रूप में उपयोग किया जाएगा।

कीट प्रतिरोधक जीन परिवर्तित कपास के विकास की परियोजना में सीआरवाई1 एसी जीनयुक्त कपास (कोकर 310 एफआर.) में लगभग 300 स्वतंत्र ट्राँसजेनिक्स पंक्तियां विकसित की गइ जिसमे हेलिकोवेरपा आर्मिगेरा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता थी।

पर्यावरण के प्रति चिंता बढ़ने के साथ ही रासायनिक खाद पर आधारित खेती की जगह कार्बनिक- और अकार्बनिकों को मिला-जुलाकर प्रयोग किया जा रहा है। इस संदर्भ में जैव उर्वरक उत्पादकता बढ़ाने के सस्ते, दोबारा इस्तेमाल योग्य और सुरक्षित स्रोत माने गए है। साथ ही जैविक/कार्बनिक खेती के बढ़ते चलन के कारण जैव उर्वरकों की मांग काफी अधिक होने की उम्मीद है। गुणवता आधारित उत्पादन और विपणन नेटवर्क में ग्राहक की संतुष्टि हेतु जैव उर्वरक निश्चय ही उपयोगी साबित होंगे।

आनुवंशिक रूप से परिवर्तित खाद्यान्न व औषधि

संकर परागकण द्वारा किसान परम्परागत रूप से बहुत पहले से फसलों की बेहतर किस्मों को उत्पन्न करते रहे हैं, जबकि आनुवंशिक परिवर्तन में डी.एन.ए. तकनीक द्वारा बाह्म जीन को किसी पौधे में जानबुझकर डाला जाता है। किसी भी जीव में कोई विशेष गुण किसी विशिष्ट प्रोटीन पर निर्भर करता है तथा यह प्रोटीन जीन के अंदर कूटबद्ध अनुदेशों पर आधारित होता है। जी.एम. पौधे में, किसी असंबद्ध पौधे जीव के किसी जीन को मूल जीन में कृत्रिम रूप से डाला जाता है। यह प्रक्रिया कुछ साधनों के माध्यम से की जाती है। इनमें मृदा बैक्टीरिया, जैसे-एग्रोबैक्टीरियम टुमेफेसिएन्स, बेसिलस थुरिएंजिएंसिस आदि साधन के रूप में काम करते हैं। चूकि पौधे अकेली कोशिका अथवा छोटे ऊतकों से उत्पन्न हो जाते हें अतः इनका आनुवंशिक परिवर्तन सरल होता है तथा नया पौधा उन गुणों को प्रदर्शित करता है जो कि नए जीन के फलस्वरूप होते हैं। यद्यपि जीन-गन तकनीक, इलेक्ट्रोपोरेशन, इत्यादि तकनीक भी उपलब्ध हैं परंतु ‘बैक्टीरिअल इसरशन’ सबसे अधिक प्रयुक्त की जाने वाली विधि है। वास्तव में मृदा बेक्टीरियम, एग्रोबैक्टीरियम टुमेफेसिएन्स ने 1977 में आनुवंशिकी अभियांत्रिकी के द्वारा खोले। काफी सारी जैव-प्रौद्योगिकीय प्रयोगशालाएं चिकित्सीय, कृषि तथा पर्यावरणीय क्षेत्रों में आरम्भ हुई हैं। बैक्टीरिया जो औद्योगिक कचरे के जहरीले पदार्थों का अपघटन कर दे अथवा खनन में उपयोगी सूक्ष्मजीव इत्यादि नई प्रौद्योगिकी के लाभदायक पदार्थ हैं। विश्वसनीय अनुमानों के अनुसार अमेरिका तथा कनाडा में 50 से अधिक जैव-प्रौद्योगिकी खाद्य पदार्थों को व्यावसायिक उपयोग हेतु अनुमति दी गई है। इनमें आनुवंशिक रूप से परिवर्तित सोयाबीन, मक्का, पपीता, टमाटर, आलू इत्यादि प्रमुख हैं। हेपिटाइटस वैक्सीन हेतु केले, सांस के रोग के जनक वाइरस के विरुद्ध सेब, हैजा के बचाव हेतु आलू विटामिन ई युक्त सोयाबीन व कैनोला तेल, कैफीन रहित कॉफी, आदि रूपांतरित जीन युक्त पदार्थ हैं, जो अभी बाजार में आने हैं।

जी.एम. खाद्य पदार्थों के कुछ जोखिम भी हैं। मानव द्वारा प्रयोग किए जाने से पूर्व इनको काफी अच्छी तरह से परीक्षणों से गुजरना चाहिए। आनुवंशिक रूपांतरण में प्रयोग किए जाने वाले बैक्टीरिया व वायरस विषैलापन तथा एलर्जी उत्पन्न कर सकते हैं।

अंकित जीन (वे जीन जिन्हें वैज्ञानिक यह जानने के लिए प्रयोग करते हैं कि नया जीन सफलतापूर्वक समाविष्ट कर लिया गया है) सामान्यतः प्रतिजैविक प्रतिरोधी होता है तथा संभव है कि यह प्रतिरोधकता पादप तंत्र से मानव तंत्र में चला जाए। यह बहुत खतरनाक साबित हो सकता है क्योंकि तब प्रतिजैविक संक्रमण को निंयत्रित करना बहुत कठिन हो जाएगा। कुछ अध्ययन भी किए गए हैं जिनमें यह साबित हो गया है कि आनुवंशिक रूप से रूपांतरित  खाद्य पदार्थों के स्वास्थ संबंधी खतरे भी हैं।

नेचर नामक पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में यह पाया गया कि बीटी कॉर्न के पराग कणों ने तितलियों में मृत्यु दर को बढ़ा दिया। ये तितलियां एक दूध युक्त खरपतवार से भोजन प्राप्त करती हैं तथा इस प्रकरण से यह बात पता चलती है कि अनिच्छित रूप से परिवर्तित जीन खरपतवार तंत्र में चला गया।

‘लैंनसेट’ नामक जर्नल में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में यह बात सामने आई कि आनुवंशिक रूप से परिवर्तित आलू का चूहे के पाचन तंत्र पर विपरीत प्रभाव पड़ा। इस प्रकार की भी रिपोर्ट मिली कि ‘मौन 863 मक्का खाने वाले चूहों की खून की रासायनिक संरचना में परिवर्तन हो गया। वैज्ञानिको ने यह भी बताया कि, विषाक्ता के अध्ययन के साथ-साथ उपापचय तथा प्रतिरोधकता संबंधी अध्ययन भी बहुत आवश्यक है।

भारत में लगभग 20 व्यावसायिक रूप से स्वीकृत जी.एम. दवाएं हैं। इनमें मानव इंसुलिन (मधुमेह के इलाज हेतु, हेपेटाइटिस वैक्सीन, इंटरफेरॉन (अल्फा, बीटा गामा-कैंसर व ओस्टोपोरेसिस में उपयोगी) तथा स्ट्रेप्टोकिनेस (मायोकॉर्डियल इंफेक्शन में उपयोगी) इत्यादि हैं।

खाद्य सुरक्षा उपाय

आनुवंशिक अभियांत्रिकी अनुमोदन समिति  जीन रूपांतरित (जी.एम.) खाद्य पदार्थ एवं दवाओ से संबंधित प्राधिकरण है। इसकी अनुमति के बिना कोई भी जी.एम. खाद्य पदार्थ बाजार में नहीं आ सकता। वर्ष 2002 में GEAC ने मोनसैन्टो मेहिको द्वारा निर्मित बीटी कॉटन को अनुमति प्रदान की। उसके पश्चात् बीटी कॉटन की चार किस्में अन्य कंपनियों द्वारा उत्पादित की गई। ऐसी फसलें, जो परीक्षण स्तर पर हैं-बैंगन, पत्ता. गोभी, फूलगोभी, मक्का, मूंगफली, ओक्रा (भिंडी जैसी एक सब्जी), आलू और चावल हैं।

कीट व खरपतवार नष्ट करने के प्रभावकारी और सस्ते जैविक तरीके विकसित कर लिए गए हैं। विभिन्न फसलों को कवक और विषाणु के प्रकोप से बचाने के लिए कई फार्मूले बनाकर उनका परीक्षण भी कर लिया गया है। एन्टोमोपैथोजेनिक निमेटोड्स की विभिन्न प्रजातियों में तापमान आदि पर्यावरणीय कारकों के प्रति सहनशक्ति बढ़ाने के लिए जेनेटिक सुधार किए गए। पौधों, जीवाणु, फफूंद, लाइकेन के आदर्श जीन, अणु और एंजाइम की खोज करने वाली परियोजनाओं को बढ़ावा दिया गया, ताकि इनसे औद्योगिक महत्व के उत्पादों के उत्पादन कीं बढ़ावा मिल सके। आदर्श जीन के कारणों की पहचान की जा रही है, ताकि जैविक और गैर-जैविक के ट्राँसजेनिक तैयार किए जा सकें और किसी जैविक प्रणाली में संचालित विभिन्न उपापचय अभियांत्रिकी मार्गों को चिन्हित किया जा सके। नाइट्रोजन और फॉस्फेट आधारित एक जैव-खाद फॉर्म्यूलेशन तैयार कर उद्योग को सौंपा गया है।

भारतीय कॉफी के जीन अनुसंधान हेतु एक नेटवर्क कार्यक्रम शुरू किया गया। इसके अंतर्गत डी.एन.ए. लाइब्रेरी विकसित की जा रही है। गन्ना जीन अध्ययन के अंतर्गत गन्ने में लालीपन लिए हुए रोग और धब्बा रोग की पहचान हेतु एक पीसीआर आधारित परीक्षण किट का विकास महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। इसे मान्यता दिलाने की प्रक्रिया जारी है।

बांस उत्पादन कार्यक्रम के अंतर्गत 380 हेक्टेयर में टिश्यू कल्चर के अंतर्गत पौधे लगाए गए। इसके अलावा बांस और दूसरी प्रजातियों के टिश्यू कल्चर प्रोटोकॉल के मानकीकरण और विकास के लिए अनुसंधान और विकास कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया गया।

औषधि जनन-द्रव्य अभिगमन के प्रकृति निर्धारण, संवर्द्धन और संग्रह के संदर्भ में चार जीन बैंकों की क्षमताएं बढ़ाई गई हैं। पिक्रोराइजा स्क्रोफ्लोरिफ्लोरा में बाहरी तत्त्व को बढ़ाने के लिए तेज और उच्च प्रजनन क्षमता के प्रोटोकॉल विकसित किए गए। पशुओं में पायी जाने वाली बीमारी ‘बोवाइन मास्टिटिस के लिए तैयार होने वाली आयुर्वेदिक औषधि के मानकीकरण के विकास का काम भी शुरू हो गया।

जैव विविधता की पहचान और निर्धारण के लिए आणविक तकनीक और उत्पादो का सहारा लिया गया। साथ ही पौधों से वांछित विशेषताएं हासिल करने के लिए परियोजनाएं चलाई गईं। हिमालयी क्षेत्र में चीड़ की जीन संरचना और उसकी विविधता का भी विश्लेषण किया जा रहा है।

पशुओं के पोषण और नए टीके विकसित करने की दिशा में नए कार्यक्रम शुरू किए गए हैं तथा मवेशियों के चारे में माइकोटॉक्सिन्स की मात्रा के आकलन के लिए मानक विकसित किए गए। एंथ्रेक्स का नया टीका विकसित किया गया। इसके अलावा भैंसों में होने वाले चेचक के वायरस के लिऐ टीके का परीक्षण चल रहा है।

बायोसर्फेसैंट, समुद्री एंजाइमों की खोज, जैव सक्रिय अणु पुनरुत्पादन जीव विज्ञान और कोशिका चक्र, प्लाज्मिड रोग प्रतिरोध प्रतिक्रिया, तंत्रिका-पेष्टाइड संश्लेषण, जैव प्रतिक्रियाकारी, मछलियों के लिए वैक्सीन विकास, झींगा मछली के लारवे में सुधार के लिए वैक्टीरिया भक्षी थैरेपी, समुद्री जीवों का जननाकी गुण निर्धारण, अंगों का विकास, झींगा गछली का जीन अध्ययन और मत्स्य पोषण आदि कार्यक्रम चलाए जा रहे है।

संक्रामक रोग विज्ञान, मूंगा रेशमकीट की बीमारियों के अस्थायी और स्थायी पक्षों पर एक सहयोगात्मक परियोजना शुरू की गई है। साथ ही टसर रेशम उत्पादन में जैव-प्रौद्योगिकी का एक नया कार्यक्रम केंद्रीय रेशम बोर्ड के साथ मिलकर शुरू किया गया है।

आणविक विकास और बर्डफ्लू  (एच 5 एन 1) वायरस के लिए सस्ती बहुसंयोजकीय वैक्सीन के विकास के अध्ययन के लिए प्रयास शुरू किए गए हैं।

सीएमसी वल्लूर  में मूलभूत और प्रयोगात्मक अनुसंधान के लिए ‘सीएमसी-डीवीटी सेंटर फॉर स्टेमसेल रिसर्च‘ की स्थापना की गई है। एक्यूट मायोकार्डियल इंफेक्शन के बारे में कई केंद्रो में नैदानिक अध्ययने किया गया है और एक्यूट इश्चेमिया स्ट्रोक के बारे में एक प्रायोगिक अध्ययन शुरू किया गया है ताकि अस्थि मज्जा की एक केन्द्रित कोशिकाओं की सुरक्षा और सामर्थ्य के बारे में जाना जा सके।

आनुवंशिकी और जैव-प्रौधोगिकी के क्षेत्र में नए घटजाक्रम

स्टेम सेल अनुसंधान

पहला स्टेम सेल बैंकः विश्व का पहला स्टेम सेल बैंक ब्रिटेन में 2004 में खोला गया था। यह केंद्र विकास और चिकित्सा
अनुसंधान के उपयोग के लिए स्टेम सेल का स्टोर है। न्यू कास्टल में शोध सुविधा किंग्स कॉलेज और लंदन, केंद्र से जीवन के लिए दो स्टेम लाइनों की बैंकिंग कर रहे हैं। मानव भ्रूण के स्टेम सेल की खोज प्रजनन उपचार के दौरान रोगियों द्वारा दान दिए गए ऊत्तको से की गयी थी। नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ स्टेम सेल बैंक एक अद्वितीय बैंक है। इसकी योजना है कि, मेजबान भ्रूण, भ्रूण और वयस्क स्टैम सेल की पूरी श्रृंखला स्टोर में उपलब्ध हो।

नाभिनालः समृद्ध और तैयार आदिम कोशिकाओं के उपलब्ध स्रोतों के द्वारा अमेरिका में स्थित कान्सस स्टेट विश्वविद्यालय के एक अनुसंधान दल के निष्कर्षों के अनुसार, जानवर और मानव नाल की गर्भाशय कोशिकाओं को व्हार्टन जेली के रूप में जाना जाता है, जो कि स्टैम सेल का प्रचुर स्रोत है और सभी स्टेम सेल की विक्षेषताओं के संकेतकों को प्रदर्शित करता है। यह पाया गया कि, मानव नाभिनाल और तैयार तंत्रिका कोशिकाएं सूअरों के नाभिनाल के मामले में विभेदित कोशिकाएं हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, नाभिनाल की तैयार कोशिकाएं पार्किंसंस रोग, स्ट्रोक, स्पाइनल कॉर्ड चोटों और कैंसर जैसे विभिन्न रोगों के उपचार के विकास के लिए स्टेम सेल के गैर-विवादास्पद और आसानी से प्राप्त स्रोत उपलब्ध करा सकते हैं।

ह्मर्टसन जेली पतला संयोजी ऊतक है यह केवल गर्भनाल में पाया जाता है। जेली कॉर्ड लचीलापन और लचक देता है, और संपीडन से नाभिनाल की रक्त नलिकाओं को बचाता है।

भ्रूण से स्टेम सेलः 2006 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, वैज्ञानिकों को स्टेम सेल का एक नया स्रोत, गर्भ में बच्चे के विकास के आस-पास के तरल पदार्थ में मिल गया है। जून 2007 में शोधकर्ताओं ने मानव  स्टेम सेल का एक गैर-विवादस्पद तरीका विकसित किया जिसमें भ्रूण की क्षति नहीं हुई है। ये पहली मानव भ्रूण कोशिका लाइनें अस्तित्व में आई हैं जिनके भ्रूण विनाश के संकेत नही थे।

हृदृय रोगियों के लिए वयस्क स्टेम सेल के उपयोगः हृदय रोगियों का इलाज हृदय में सीधे वयस्क स्टेम सेल आरोपित करने के बजाय इसकी आपूर्ति एक धमनी के माध्यम से की जाए। अभिनव प्रयास है कि, यह दिल की कम समय के अन्दर रक्त पम्पिंग क्षमता बढ़ा देता हे। यह नैदानिक परीक्षण पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय के मेडिकल सेन्टर में प्रदर्शन के लिए आयोजित किया गया। ‘

स्टेम सेल से इंसुलिनः वैज्ञानिकों ने पहली बार सफलता पूर्वक बच्चे के नाभिनाल से स्टेम कोशिकाएं लेकर इंसुलिन बनाया। जो भविष्य में मधुमेह टाइप-1 के इलाज के लिए कारगर हो सकता है। वर्ष 2007 में, टेक्सास विश्वविद्यालय की चिकित्सा शाखा के शोधार्थियों ने सर्वप्रथम बड़ी मात्रा में स्टेम सेल विकसित की एवं फिर इन्हें अग्नाशय की इंसुलिन उत्पन्न करने वाली सेलों के सदृश बनाने पर कार्य किया। गौरतलब है कि मधुमेह में अग्नाशय की इंसुलिन उत्पन्न करने वाली कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं।

जीनोम अनुक्रम

यूस्टन बॉयलर चिकित्सा कॉलेज को जेम्स डी वाटसन ने अनुक्रमण के लिए अपना डी.एन.ए. दान दिया और कहा कि, 50 से अधिक वर्षों के बाद वाटसन अनुक्रम डी.एन.ए. की दो तरफा कुण्डली संरचना को उजागर करने में सहायता करेगा। परियोजना को 1 मिलियन डॉलर की लागत से दो महीने में पूरा कर लिया गया। वाटसन अपने जीनोम अनुक्रम को देखकर रोमांचित हो गया और कहा कि यह विज्ञान के उपयोग के लिए प्रकाशित किया जाएगा। 1962 में जेम्स डी वाटसन और फ्रांसिस क्रिक को 1950 के दशक में उनके द्वारा की गई मानव आनुवंशिक कोड की संरचना की पहचान के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

वर्ष 2003 में मानव जीनोम डी.एन.ए. नक्शा 300 मिलियन डॉलर की सरकारी निधि और 100 मिलियन डॉलर की निजी परियोजना के प्रयास से पूरा हो गया।

स्तनपायी डायनासोर युग अनुक्रमः कैलीफोर्निया के वैज्ञानिकों ने 1 दिसंबर, 2004 को दावा किया कि, डायनासोर एक स्तनपायी हैं एवं जिनका उनके समय में ही पूरा जीनोम अनुक्रमण सफल हो गया था। शोधकर्ताओं के अनुसार, स्तनपायी रात के जानवर थे, क्योंकि वे मानव सहित सभी जानवरों के गर्भनालों के संयुक्त पूर्वज थे। वैज्ञानिकों ने कहा कि 75 लाख से अधिक वर्षों के मानव जीनोम के आणविक अवशेषों को ढूंढने में स्तनपायी के जीनोम से सहायता मिलेगी।

चिकन के जीन का अनुक्रमणः 12 देशों में स्थित 49 संस्थानों के शोधकर्ताओं ने वंशाणु के बारे में दिसंबर, 2004 में ‘नेचर‘ पत्रिका को बताया कि घरेलू मुर्गियों के पूर्वज के जेनेटिक कोड के रूप में मानव विकास पर प्रकाश डाला जा सकता है क्योंकि चिकन के जीनों का मानव के साथ काफी हिस्सा है। शोधकर्ताओं के तथ्य चिकन के आनुवंशिक कोड के विश्लेषण पर आधारित हैं।

कुत्ते के जीनोम का अनावरणः दिसंबर, 2005 में अमेरिकी वैज्ञानिकों ने घरेलू कुत्ते (पालतू कैनीस) के जीनोम का अनावरण किया। कुत्ते के अनुक्रम के बारे में नेचर पत्रिका में प्रकाशित, वैज्ञानिकों ने कहा कि कुत्ते के डी.एन.ए. ब्ल्यूप्रिंट मानव प्रभाव के अत्यधिक लक्षणों का परिवेधन करते है।

तबाही मचाने वाले मच्छर के ‘जेनेटिक मैप‘ की खोज

पित्त ज्वर, डेंगू व चिकुनगुनिया फैलाने वाले मच्छर ‘एडीज एजिप्टी‘ के जीनोम क्रम की सफलतापूर्वक खोज कर ली गई है। अनुसंधानकर्ताओं ने 17 मई, 2007 को एडीज एजिप्टी मच्छर के डी.एन.ए. का पूरा खाका प्रकाशित किया।

वैज्ञानिकों के अनुसार, जीनोम के द्वारा न केवल कीटनाशकों को विकसित करने में सहायता मिलेगी बल्कि, ऐसे जेनेटिक स्वरूप वाले मच्छरों को बनाने में भी मदद मिलेगी जो पीत ज्वर अथवा डेंगू को न फैला सकें।

यह दूसरी बार है, जब वैज्ञानिकों ने किसी मच्छर के जीनोम क्रम को निर्धारित किया है। मलेरिया फैलाने वाले मच्छर ‘एनोफिलीज गेम्बिया‘ के जीनोम को वर्ष 2002 में निर्धारित किया गया। यह सफलता उस समय दोगुनी हुई जब अनुसंधानकर्ताओं की एक अन्य टीम ने, मलेरिया के परजीवी ‘प्लाज्मोडियम फाल्सीफेरम‘ के जीनोम को भी खोजा। ‘एडीज एजिप्टी‘ के डी.एन. ए. स्वरूप का ‘एनोफिलीज गेम्बिया‘ के डी.एन.ए. स्वरूप से तुलना करने पर अनुसंधानकर्ताओं को पता चला कि, एडीज मच्छर 150 मिलियन वर्ष पहले ‘एनोफिलीज‘ से विकास क्रम की प्रक्रिया में अलग हुआ। इससे संभवत : इस बात का भी पता चलता है कि, क्यों इन दोनों प्रजातियों में जीन की एक ही संख्या होते हुए भी ये दोनों दिखाई देने में और इनकी भोजन की आदतों के परिप्रेक्ष्य में भिन्नता है।

इन दोनों मच्छरों के जीनोम क्रम का निर्धारण कई कारणों से महत्वपूर्ण है। मलेरिया उत्पन्न करने वाले मच्छर के जीनोम का क्रम निर्धारण मानव से भिन्न जीव के संबंध में ऐसा पहला प्रयास है, जिसका सीधा प्रभाव मानव जीवन पर पड़ता है। यद्यपि वैज्ञानिक मलेरिया उत्पन्न करने वाले कीट से बचाव की अभी कोई सफल रणनीति नहीं बना सके हैं, परंतु जीनोम के क्रम निर्धारण ने इस संबंध में नई संभावनाएं अवश्य उत्पन्न की हैं।

अंगूर की शराब का जीनोम निर्धारण

एक अध्ययन के अनुसार फ्रांस तथा इटली के वैज्ञानिकों ने अंगूर की शराब का उत्पादन करने वाले पौधे का संपूर्ण जेनेटिक कोड बना लिया। इससे जीन आधारित स्वाद बढ़ाने की विधियों एवं रोग प्रतिरोधकता में सुधार को बल मिलेगा।

अनुसंधानकर्ताओं ने विटिस विनिफेरा  की पॉइन्ट नॉइर किस्म, जिससे वास्तविक रूप से सभी अंगूरी शराबों  का निर्माण होता है, का विश्लेषण किया एवं पाया कि इसमें सुगंध से संबंधित तुलनात्मक रूप से दोगुने जीन पाए जाते हैं। इससे यह भी प्रतीत होता है कि, शराब के स्वाद को जीनोम स्तर पर पहचाना जा सकता है।

जुकाम के वायरस के आनुवंशिक कोड की खोज

वैज्ञानिकों द्वारा फरवरी 2009 में प्रथम बार जुकाम हेतु उत्तरदायी वायरस के पूर्ण आनुवंशिक कोड की खोज कर ली गई है। इससे अब जुकाम का बेहतर इलाज खोजने में वैज्ञानिकों को सहायता प्राप्त हो सकेगी। प्रतिवर्ष लाखों लोगों को अपनी चपेट में लेने वाले इस वायरस का कोई इलाज नहीं है।

वैज्ञानिकों द्वारा जुकाम हेतु उत्तरदायी वायरस की 99 प्रजातियों के डी.एन.ए. की मैपिंग कर ली गई है। अनुसंधान में वैज्ञानिकों ने देखा कि, किस प्रकार ये वायरस नई प्रजातियों को बनाते हैं और उनके किन कमजोर पक्षों पर चोट करने वाली औषधियां बनाई जा सकती है, किंतु इस अनुसंधान से यह भी स्पष्ट हो गया कि, इन विषाणुओं के विरुद्ध कोई भी प्रभावी वैक्सीन नहीं बन सकती। वैज्ञानिकों के अनुसार, इनके पूरे जीनोम की मैपिंग करने के पश्चात् ज्ञात हुआ कि कोई भी व्यक्ति एक ही समय में कई प्रकार के वायरस का शिकार हो सकता है। यही नहीं, ये परस्पर जीन भी बदल सकते हैं। इसी कारण से वैज्ञानिक कभी भी जुकाम के विरुद्ध पूर्ण रूप से प्रभावी कोई वैक्सीन नहीं बना पाएंगे।

शोर्घम (ज्वार) पौधे के आनुवंशिक कोड की खोज

विज्ञान पत्रिका नेचर के फरवरी 2009 के अंक में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिकों द्वारा शोर्घम के पौधे के आनुवंशिक कोड की खोज सफलतापूर्वक कर ली गई है। धान के पश्चात् शोर्घम घास प्रजाति का दूसरा पौधा है, जिसके आनुवंशिक कोड की खोज की गई है। इस खोज के पश्चात् वैज्ञानिकों को प्रभावी प्रकाश संश्लेषण हेतु उत्तरदायी जीनों की स्थिति को पहचानने में सहायता प्राप्त हो सकेगी। शोर्घम का आनुवंशिक कोड घास प्रजाति के अन्य पौधों, जैसे-गन्ना, मक्का, गेहूं आदि की तुलना में काफी छोटा है। यह पौधा सूखे के प्रति सहनशीलता हेतु जाना जाता है। शोर्घम का प्रयोग जैव-ईंधन बनाने में किया जा सकता है। इसके तने को निचोड़ने से मीठा रस निकलता है, जिससे शीरा जैसे उत्पाद की प्राप्ति होती है। इस शीरे से जैव-ईंधन बनाया जाता है।

जेनोट्रांसप्लांटेशन में मील के पत्थर

1682

: रूस में अभिजात्य वर्ग के एक व्यक्ति की खोपड़ी को ठीक करने के लिए कुत्ते की हड्डी का प्रयोग किया गया। उस व्यक्ति ने बाद में चर्च द्वारा बहिष्कृत होने के डर से उस हड्डी को निकलवा दिया।

1905

: फ्रांसीसी सर्जन डॉ. एम. प्रिंसटेउ ने खरगोश के गुर्दे के टुकड़ों को एक 16 वर्षीय बच्चे, जिसका गुर्दा खराब था, में लगाया। रोगी की दो सप्ताह के पश्चात् मृत्यु हो गई।

1909

: जर्मनी के डॉ. एर्नेंस्ट उगर ने लघु पुच्छ बंदर  के गुर्दों को एक महिला की जांघों पर लगाया। महिला की 32 घंटों के पश्चात् मृत्यु हो गई।

1920

: डॉ. सर्गे वोरोनोफ ने फ्रांस में बंदर के अंडकोष  को एक व्यक्ति में लगाया।

1964

: मिसिसिपी विश्वविद्यालय के डॉ. जेम्सडी. हार्डी ने चिंम्पैंजी के हृदय को 68 वर्षीय व्यक्ति में लगाया। यह हृदय मात्र 90 मिनट कार्य करता रहा।

1968         

 : लंदन के डॉ. रोस ने सूअर के हृदय को एक रोगी में लगाने का प्रयास किया परतु कुछ ही मिनटों में हृदय ने कार्य करना बंद कर दिया।

1969-1974

: कोलेरोडो विश्वविद्यालय के डॉ. थॉमस ई. स्टारजल ने चिम्पैंजी के यकृत को बच्चों में लगाया। परंतु इस प्रकार जीवन की दर 1 से 14 दिनों के बीच रही।

1984

: एक शिशु को बबून बंदर का हृदय लगाया गया। वह शिशु तीन सप्ताह तक जीवित रहा।

1992

: डय़ूक विश्वविद्यालय के डॉक्टरों ने दो महिलाओं, जिनका यकृत प्रत्यारोपण होना था, के लिए सेतु के रूप में सूअर के यकृत का प्रयोग किया। एक महिला तो मानव यकृत के प्रत्यारोपित होने तक जीवित रही परंतु दूसरी महिला की मृत्यु 32 घंटे बाद ही हो गई।

1992

: पिट्सबर्ग के अनुसंधानकर्ताओं ने बैबून बंदर की ‘बीन मैरो’ तथा गुर्दा एक रोगी में प्रत्यारोपित किया। रोगी की मृत्य 25 दिनों के पश्चात् ही संक्रमण के कारण हो गई।

1995

: मैसाच्यूट्स में बोलमोन्ट के मैक्लीन अस्पताल में डॉ. जेम्स शूमाकर ने पहली बार सूअर के मस्तिक की कोशिकाओं को 57 वर्षीय व्यक्ति में प्रत्यारोपित किया। सर्जरी के पश्चात् व्यक्ति के अंगों की गति एवं बोली ज्यादा निर्बाध हो गई।

1997

: भारत में डॉ. धनीराम ने मानव हृदय को सूअर के हृदय से बदलने का दावा किया। रोगी की तुरंत मृत्यु हो गई। डॉ. बक्का को हत्या के शक में जल की सजा दी गई।

निएण्डरथल मानव के जीनोम के प्रथम ड्राफ्ट की मैपिंग में सफलता

फरवरी 2009 में जर्मनी के वैज्ञानिकों को निएण्डरथल मानव के जीनोम के प्रथम ड्राफ्ट की मैपिंग करने में सफलता प्राप्त हुई। इससे आधुनिक मानव और उसके पूर्वजों के बीच के संबंधों को जानने में सहायता प्राप्त हो सकेगी। जीनोम की मैपिंग के लिए अनुसंधानकर्ताओं ने तीन क्रोएशियाई जीवाश्मों से मिले खंडित डी.एन.ए. का अध्ययन किया। इसी से पूरे निएण्डरथल जीनोम की 60 प्रतिशत से भी ज्यादा मैपिंग की जा सकी। अनुसंधान के अनुसार 6,60,000 वर्ष पूर्व तक निएण्डरथल और मनुष्यों के पूर्वज एक ही थे। निएण्डरथल को आधुनिक मानव का सर्वाधिक निकटवर्ती प्रतिरूप माना जाता है। हालांकि अभी इस संबंध की जांच की जानी बाकी है। उल्लेखनीय है कि, नीची भौहों वाले निएण्डरथल 1,70,000 वर्ष पूर्व यूरोप, मध्य एशिया और मध्य-पूर्व में निवास करते थे।

जीन संवर्द्धित आलू का विकास

एक भारतीय वैज्ञानिक दल द्वारा जीन संवर्द्धित (जीएम) आलू विकसित किया गया है, जिससे यह अब अमरान्य नामक प्रोटीन, जो कि आनुवंशिक परिवर्तन से प्राप्त होता है, से युक्त हो गया है। यद्यपि जीएम सरसों एवं कॉटन को भारत में जन-स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई, तथापि, जीएम आलू के प्रति लोगों की आरंभिक प्रतिक्रिया सकारात्मक रही है।

एक खाद्य वृक्ष से प्राप्त जीन से तैयार जी.एम. आलू मानव उपभोग हेतु सर्वथा सुरक्षित माना जा रहा है। निषेचन विधि द्वारा आनुवंशिक परिवर्तन सम्भव नहीं है, क्योंकि प्रकंद का विकास अनिषेचन प्रक्रिया द्वारा होता है। आलू के आनुवंशिक पदार्थ में अमरान्य का जीन एक विशेष बैक्टीरिया (एग्रोबैक्ट्रियम ट्यूमेफेसींस) के प्रयोग द्वारा डाला गया। यह जीन आलू के 48 क्रोमोसोम्स में से एक है, जिसके कारण प्रोटीन अधिक मात्रा में उत्पन्न होती हैं।

चावल की जीन मैपिंग में सफलता

भारत एवं जापान के कृषि वैज्ञानिकों द्वारा संयुक्त रूप से चावल के जीन अध्ययन हेतु ‘इंटरनेशनल राइस जीनोम सिक्वेंसिंग प्रोजेक्ट’ आरंभ किया गया था। इस अनुसंधान परियोजना में भारत एवं जापान सहित 10 देशों के कृषि ने भाग लिया। इस संयुक्त अनुसंधान कार्यक्रम के अंतर्गत वैज्ञानिकों द्वारा धान का उत्पादन बढ़ाने तथा चावल की गुणवत्ता में सुधार लाने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता अर्जित करते हुए धान के जीनोम को क्रमबद्ध करने का कार्य पूर्ण कर लिया गया। कृषि वैज्ञानिकों द्वारा इस प्रकार के 62,435 जीनों की पहचान कर उनके महत्व को भी चिन्हित किया गया है। विश्व में यह किसी भी अनाज की प्रथम जीन मैपिंग है।

जीन मैपिंग अनुसंधान में मील के पत्थर

1866

: ग्रेगर जॉन मैडेल ने बताया कि कुछ ऐसे आनुवंशिक कारक होते हैं, जो आंनुवशिक विशेषताओं को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानांतरित करते हैं। बाद में इन कारकों को ‘जीन‘ नाम दिया गया।

1910

: थामस हट मोर्गन ने ड्रोसोफिला नामक मक्खी का अध्ययन करते हुए यह साबित किया कि जीन क्रोमोसोम द्वारा संचारित किए जाते हैं तथा ये क्रोमोसोम पर रेखीय रूप में व्यवस्थित होते हैं।

1926

: हर्मन जे. मूलर ने मक्खियों में एक्स रे द्वारा जेनेटिक उत्परिवर्तन एवं आनुवंशिक परिवर्तन किया।

1944

: आनुवंशिक पदार्थ के रूप में प्रोटीन की जगह डी.एन.ए. की पहचान की गई।

1953

: डी.एन.ए. की संरचना का पता चला।

1960

: मैसेंजर आर.एन.ए. के अस्तित्व का पता चला, जो कि डी.एन.ए. से कौशिका की प्रोटीन उत्पादन करने वाली इकाइयों तक  आंनुवंशिक सदेंशों को ले जाता है।

1961

: इस बात की खोज हुई कि, डी.एन.ए. किस प्रकार कोशिकाओं को विशिष्ट प्रकार के प्रोटीनों के उत्पादन हेतु अनुदेश देता है।

1970

: उन एंजाइमों की खोज की गई जो डी.एन.ए. को विशिष्ट स्थानों से काटता है।

1977

: डी.एन.ए. सूचनाओं का क्रम निर्धारण किया गया तथा वायरस (बेक्टीरियोफोज) पहला ऐसा जीव बना, जिसके पूरे जीनोम का क्रम निर्धारण किया गया।

1983

: कैरी मुलिस द्वारा एक ऐसी क्रांतिकारी पॉलीमरेज चेन रिएक्शन तकनीक का विकास किया गया, जिसके द्वारा वैज्ञानिक कुछ ही घंटों में डी.एन.ए. तंतु की करोडों प्रतिलिपि निकाल सकते हैं।

1984-1986

: पूर्ण मानव जीनोम के क्रम निर्धारण हेतु वृहद स्तर पर प्रयास का विचार सामने आया।

1988

: डॉ. जेम्स वाटसन ने वर्ष 2005 तक 3 बिलियन डॉलर के खर्च में जीनोम के क्रम निर्धारण की प्रतिज्ञा की।

1990

: डॉ. जे. क्रेग वेन्तर ने ऐसी लघु विधि की खोज की, जिससे मानव जीन के टुकड़ों को जाना जा सके। इसके आधार पर पूरे जीन की पहचान की जा सकती है।

1995

: वेंटर की विधि को अपनाकर एक बैक्टीरिया (हेमोफिलस इंफ्लूएंजा) के जीनोम का क्रम निर्धारण किया गया।

1997-1998

: डॉ. माइकल हंकापिलर ने एक अलग मानव जीनोम परियोजना का विचार रखा।

1998 (मई)

: डॉ. वेन्टर एक नई कंपनी से जुड़े जिसने 3 वर्षें में ही मानव जीनोम को पूर्ण करने की योजना बनाई।

1998 (दिसंबर)

: गोलकृमि सी. एलीगेन्य की संपूर्ण जीनोम का क्रम निर्धारण किया गया। यह किसी भी जंतु का प्रथम संपूर्ण जीनोम था।

2000 (मार्च)

: डॉ. वेन्टर तथा डॉ. गेराल्ड रूबिन के नेतृत्व में ड्रोसिफेला मक्खी के जीनोम का क्रम निर्धारण किया गया।

2000 (दिसंबर)

: एक फूलों वाले पौधे एडाबिटोप्सि थेलिआने के संपूर्ण जीनोम के क्रम को निर्धारित किया गया।

2001 (फरवरी)

: मानव जीनोम का प्रधम विश्लेषण किया गया।

2004 (अक्टूबर)

: मानव जीनोम के संपूर्ण क्रम की घोषणा।

2005

: वैज्ञानिकों के अंतरराष्ट्रीय समूह द्वारा चावल के जेनेटिक कोड को जानने में सफलता मिली। इस तरह यह जीनोम क्रम निर्धारित की जाने वाली पहली फसल बनी।

चिन्हित किए गए जीन चावल की उत्पादकता से लेकर गुणवत्ता तक के लिए उत्तरदायी हैं। इसके उपरांत अब चावल के उत्पादन के संदर्भ में गुणवत्तायुक्त किस्में तैयार करना भी संभव होगा।

ट्रांसजेनिक अरहर और चने का विकास भारतीय वैज्ञानिकों ने पराजीनी (ट्रांसजेनिक) अरहर और चने का विकास कर लिया है। इन दालों में बैसीलस थूरिनजिएंसिस (बी.टी.) नामक बैक्टीरिया का वह जीन डालने में सफलता मिल गई है, जो जबर्दस्त असर वाली कीटनाशक प्रोटीन तैयार करता है। इसका अर्थ है कि, अब इन दालों की फसलों में जहरीले रासायनिक कीटनाशक छिड़कने की जरूरत नहीं रह जाएगी और पौधे अपना कीटनाशक खुद-ब-खुद बना लेंगे। आमतौर पर रासायनिक दवाएं छिड़कने के बाद भी तीस प्रतिशत तक फसल कीट-पतंगे बरबाद कर देते हैं, और साथ ही मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है। विशेष बात यह कि, बी.टी. का जो जीन इन दालों में डाला गया है, वह प्राकृतिक रूप से मिट्टी में मिलने वाले बैक्टीरिया से नहीं लिया गया, बल्कि प्रयोगशाला में उसे कृत्रिम ढंग से तैयार किया गया है। भारत में पहली बार कृत्रिम रूप से इतना बड़ा जीन रासायनिक ढंग से तैयार किया गया है। वैज्ञानिक इसे एक बड़ी उपलब्धि बता रहे हैं। यह इस बात का संकेत है कि, भविष्य में अन्य उपयोगी जीनों का निर्माण प्रयोगशाला में कृत्रिम ढंग से किया जा सकेगा। जिस ढंग से विकसित देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियां बी.टी. जीन वाली फसलों को लेकर घमासान प्रतिस्पर्धा में जुटी हैं, उसे देखते हुए भारत के इस अनुसंधान का आर्थिक तौर पर भी बहुत महत्त्व है। अमेरिका में तो ट्राँसजेनिक प्रजातियों के बारे में दावों और प्रतिदावों को लेकर कम-से-कम छह कंपनियों में भीषण मुकदमेबाजी चल रही है।

विश्व में अभी तक कपास, मक्का, तंबाकू सोयाबीन, आलू और टमाटर की ट्रांसजेनिक किस्में विकसित हो चुकी हैं। भारत भी कपास और तंबाकू में प्रयोगशाला स्तर पर बी.टी. जीन डालने में सफल हो चुका है। लेकिन अरहर और चने में इस सफलता का विशेष महत्व है। क्योंकि इस प्रयास में अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी लगी थीं और सफलता सबसे पहले लखनऊ स्थित नेशनल बॉटेनिकल रिसर्च इंस्टीट्य़ूट (एन.बी.आर.आई.) को मिली।

जेनोट्रांसप्लांटेशनः नए युग की युक्ति

मानव शरीर में किसी अन्य प्राणी के अंगों को प्रत्यारोपित करने की विधि का तकनीकी नाम जेनोट्रांसप्लांटेशन है‘। अंग-प्रत्यारोपण या जेनोट्रांसप्लांटेशन एक कठिन प्रक्रिया है। इसकी सफलता की प्रतिशतता शून्य के बराबर है, क्येंकि अब तक जितने भी लोगों पर ऐसे प्रयोग किए गए हैं, उनमें से अधिकांश ने बहुत जल्द ही दम तोड दिया है। किसी एक जीव में दूसरे जीव का अंग प्रत्यारोपित कर देने से उस जीव की संपूर्ण प्राकृतिक कार्य-संरचना बाधित हो जाती है, क्योंकि उस जीवकी प्रतिरक्षा प्रणाली प्रत्यारोपण का विरोध करती है। शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली में एक ऐसा तत्व होता है, जो बाह्म आरोपण को तत्काल पकड़ लेता है। इस तत्व को ‘कंप्लीमेण्ट’ की संज्ञा दी जाती है। मानव शरीर के भीतर कोशिकाएं ‘डिके एक्सीलरेटिंग फैक्टर’ से ढंकी रहती हैं। यह डी.ए.एफ. एक प्रकार का प्रोटीन है। कंप्लीमेण्ट द्वारा अन्य जीव के अंग प्रत्यारोपण या किसी अन्य तत्त्व के प्रत्यारोपण की पहचान इसी प्रोटीन की सहायता से की जाती है। आधुनिक काल में अंग-प्रत्यारोपण सर्वप्रथम 1964 ई. में किया गया।

वर्ष 2008 में जारी एक रिपोर्ट के माध्यम से ज्ञात हुआ कि एशिया के कई देश शरीर के अंगों की मांग आपूर्ति अंतर को कम करने के लिए जेनोट्राँसप्लांटेशन जैसी तकनीकों को विकसित कर रहे हैं। हालांकि यह प्रक्रिया अभी प्रयोगात्मक स्थिति में है तथापि इसके समर्थकों का मानना है कि यांत्रिक उपकरणों की अपेक्षा इनमें अधिक संभावनाएं हैं। अभी तक विश्व में 60 जेनोट्रासप्लांट हैं। आलोचकों का यह भी मानना है कि, जेनोट्रांसप्लांटेशन उपलब्ध चिकित्सा के स्रोतों को विस्थापित कर सकता है एवं आसानी से इसका दुरुयोग हो सकता है। एक अन्य जैव-अभियांत्रिकी प्रौद्योगिकी, जो आशा की किरण तो जगाती है परंतु विवादास्पद भी है, वह है-मानव ऊतकों तथा रोगी के अंगों की कोशिकाओं को मानव भ्रूण स्टेम सेल के साथ संवर्द्धित कर क्लोनिंग करना।

पेटेंट और जैव-प्रौद्योगिकी

पेटेंट नियम, राजनैतिक, आर्थिक, नीतिशास्त्रीय और दार्शनिक प्रश्नों के विषयों में भी प्रस्तुत होते हैं।

बौद्धिक संपदा अधिकार बौद्धिक संपदा अधिकार में पेटेंट की महत्वपूर्ण भूमिका है, परंतु पेटेंट का प्रावधान काफी विवादास्पद बना रहता है। विश्व व्यापार संगठन के व्यापार संबद्ध बौद्धिक सम्पदा अधिकार प्रावधान के अनुसार प्रौद्योगिकी के प्रत्येक उत्पाद अथवा प्रक्रिया के अन्वेषण पर पेटेंट उपलब्ध होगा बशर्ते कि, वे नए हों, उनमें अन्वेषणात्मक घटक हों तथा वे औद्योगिक उपयोग हेतु सक्षम हों। यह बौद्धिक संपदा के संरक्षण की व्यवस्था करता है।

1967 में पेरिस में विश्व बौद्धिक संपदा संगठन की स्थापना की गई। 1974 में यह संयुक्त राष्ट्र संघ की एक विशेष संस्था बन गई। बाद में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भी बौद्धिक संपदा के संरक्षण हेतु तथा बौद्धिक संपदा सृजित करने वाले के लिए अनुकूल दशाएं शामिल की गयीं। इसके अंतर्गत विभिन्न प्रकार के स्वामित्व प्रदान किए जाते है :  पेटेंटः पेटेंट, आविष्कारों पर स्वामित्व का अधिकार प्रदान करता है।

कॉपीराइटः कॉपीराइट के अंतर्गत संरक्षण के दायरे में साहित्यिक, वैज्ञानिक और कलात्मक अभिव्यक्ति के सभी प्रकार आते हैं। यह मौलिक होना आवश्यक है। कम-से-कम अभिव्यक्ति का मौलिक होना आवश्यक है।

ट्रेडमार्क: ट्रेडमार्क पर हुए समझौते में ट्रेडमार्क की परिभाषा, ट्रेडमार्क धारक का एकमात्र अधिकार, ट्रेडमार्क के उपयोग के लिए विशेष शर्तें लगाए जाने का निषेध, ट्रेडमार्क का निरस्तीकरण आदि नियम शामिल हैं।

ट्रेडमार्क की परिभाषा एक ऐसे चिन्ह के रूप में दी गयी है जो एक औद्योगिक या व्यावसायिक उपक्रम के उत्पादों को अन्य उपक्रमों के उत्पादों से अलग करता है।

ट्रेड सीक्रेटः इसमें कहा गया है कि अगर किसी के पास कानूनी रूप में कोई गोपनीय सूचना है जिसका मूल्य है तो उसे अनुमति बिना किसी अन्य को प्रयोग करने से रोकने का अधिकार है।

ज्योग्राफिकल इण्डीकेशन: कई उत्पाद क्षेत्र सामान्य होते हैं। उनकी पहचान विशेष से जुड़ी होती है। त्रिपक्षीय समझौते में ज्योग्राफिकल निर्देश के आधार पर इनका संरक्षित करने का प्रावधान किया गया है।

औद्योगिक डिजाइनः समझौते के दायरे में औद्योगिक डिजाइन आते है जो उत्पाद की आकति रेखाओं के मूलभाव, आदि के रूप में व्यक्त होते हैं।

एकीकृत सर्किट का लेआउट डिजाइनः यदि अन्य प्रावधान नहीं तो यह समझौता सदस्य देशों से एकीकृत सर्किट के लेआउट डिजाइन की रक्षा करने को कहता है।

भारत में बौद्धिक संपदा अधिकार अधिनियमों का ऐतिहासिक परिदृश्य

- सामाजिक एवं रक्षा दोनों प्रकार के प्रयोग में आने वाली प्रौद्योगिकी को विदेशी पेटेंट करवाए जाने पर रोक लगाया जाना शामिल है।

- सरकार जनस्वास्थ्य की मांग के अनुसार किसी कंपनी के पेटेंट का अधिग्रहण कर सकती है या मेडिसिन बाहर से आयात कर सकती है।

- इस व्यवस्था के लागू हो जाने पर पेटेंटधारी कंपनियों को ही विपणन का एकमात्र अधिकार होगा।

- पेटेंट के आवेदन पर निर्णय के पहले और पश्चात् प्रतिवाद और अपील दर्ज करने का प्रावधान है।

- पेटेंट संबंधी आवेदन की जांच एवं निर्णय साढेचार वर्षें में हो जानी चाहिए।

इस प्रकार किसी भी अन्वेषण पर चाहे व प्रक्रिया हो या उत्पाद, पेटेंट कानून लाग होगा, बशर्ते कि उसमें नवीनता हो। अन्वेषक को उसकी तकनीक पर 20 वर्ष तक अधिकार प्राप्त हो जाएगा। पेटेंट धारक का यह अधिकार उसकी अगली पीढ़ी के लिए भी हस्तांतरणीय होगा। इस कानून के अंतर्गत विवाद की स्थिति में साक्ष्य देने की जिम्मेदारी प्रतिवादी की होगी। ट्रिप्स से संगत संशोधित पेटेंट कानून, 2005 लाग होने से भारत 1970 के पूर्व की स्थिति में आ गया है जब उत्पादक संस्थान अपना उत्पाद एकाधिकार बनाए रखने में समर्थ थे।

पहले बहुर्राष्ट्रीय कम्पनियों को उत्पाद पेटेंट का अधिकार था। भारत विभिन्न फसलों और वनस्पतियों का उद्गम स्थल है। अब नए पेटेंट कानून के अनुसार बहुराष्ट्रीय कंपनियां विभिन्न जड़ी-बूटियों, वनस्पतियों, फसलों और जीव- जंतुओं पर अपना पेटेंट अधिकार प्राप्त कर सकती हैं। ऐसी स्थिति में किसानों के लिए इनका इस्तेमाल करना पहले जैसा नहीं रहेगा। इसी प्रकार अमेरिका के पेटेंट एवं ट्रेड मार्क कार्यालय ने भारत के नीम एवं हल्दी का पेटेंट हासिल कर लिया, जिसे केंद्रीय औद्योगिक अनुसंधान संस्थान ने विविध ठोस साध्य प्रस्तुत कर पुनः प्राप्त किया। इसी तरह विदेशी कंपनियों ने तुलसी, करेला, जामुन और चावल का पेटेंट प्राप्त कर लिया था जिसे एक लम्बी लड़ाई. के बाद पुनः वापिस ले लिया गया।

एक और तथ्य जो इस संशोधन से सामने आ रहा है कि, मेडिसिन को उत्पाद पेटेंट के अंतर्गत लाए जाने के कारण दवा कीमतों में वृद्धि होगी तथा कम कीमत पर मेडिसिन उपलब्धता का उद्देश्य ढह जाएगा। गौरतलब है कि, जीवनरक्षक मेडिसिन की कीमतों के बढ़ने से जीवन बचाने की चुनौती भी खड़ी हो सकती है। हालांकि इस संशोधन के अंतर्गत जनहित हेतु रक्षा के उपाय भी सम्मिलित किए गए हैं। उल्लेखनीय है कि, भारत ने निम्नलिखित क्षेत्रों में पेटेंट को स्वीकार नहीं किया गया है-

सुइ जेनेरिस

सुइ जेनेरिस लैटिन भाषा का मुहावरा है जिसका आशय है ‘अपनी तरह का’। सुइ जेनेरिस एक प्रकार की कानून व्यवस्था है जो विशिष्ट रूप से एक विशेष विषय से जुड़ी चिंताओं को संबोधित करने के लिए निर्मित की गई है। इस अभिव्यक्ति को, शैक्षिक दर्शन द्वारा एक विचार, इकाई एवं वास्तविकता का संकेत देने के लिए बनाया गया, जिसे व्यापक अवधारणा में शामिल नहीं किया गया हो।

यूपी.ओ.वी. अभिसमय में प्रौधा प्रजनकों के अधिकार एवं बौद्धिक संपदा संरक्षण, जैसाकि वाशिंगटन संधि में परिलक्षित होता है, अक्सर सुई जेनेरिस शासन के उदाहरण को उद्धृत करता है। परम्परागत ज्ञान के संदर्भ में यह मौजूदा बौद्धिक संपदा शासन एवं कानून को परम्परागत ज्ञान के संरक्षण में अक्षम मानता है तथा परम्मरागत ज्ञान के संरक्षण के लिए एक विशेष कानूनी व्यवस्था बनाने की मांग करता है।

वर्गीकरण संरचना में ‘जीनस प्रजाति ऐसी प्रजाति है जो स्वयं अपनी जीनस का नेतृत्त्व करती है, सुई जेनेरिस कही जाती है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि सभी प्रजाति जिसका केवल एक ही सदस्य होता है, सुई जेनेरिस प्रजाति बनाती हैं।

विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी.ओ.) और बौद्धिक संपदा नेटवर्क की स्थापना होने से नई पौध किस्मों को पेटेंट या सुई जेनेरिस व्यवस्था द्वारा संरक्षित किए जाने की आवश्यकता पैदा हो गई है। नौवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान ‘पौध किस्मों एवं किसान अधिकारों‘ को संरक्षित करने हेतु विधान लागू करने की योजना शुरू की गई। दसवीं योजनान्तर्गत एक कदम आगे बढ़ते हुए ‘पौध किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण‘ के निर्माण का प्रावधान भी किया गया।

इस अधिनियम को लागू करने के निम्मलिखित उद्देश्य है :-

इस विधान की मुख्य विशेषताएं हैं-

- यह अधिनियम माइक्रो-आर्गेनिज्म पौध के अतिरिक्त सभी प्रकार के पौधों पर लागू होगा।

- पौध संरक्षण कराने के लिए पौध किस्म नयी, भिन्न, अद्वितीय होनी चाहिए।

- अधिनियम में जनहित की स्थिति में बाध्यकारी लाइसेंसिग का प्रावधान किया गया है।

इस प्रकार किसान, संरक्षित किस्म को बेचने इस्तेमाल करने, विनिमय करने, बांटने एवं संभालने के परम्परागत अधिकार को प्रयोग कर सकेगा। पौध किस्मों को संरक्षित करने के विभिन्न कार्यो की कार्यकारी शक्ति पौध किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण में निहित होगी।

जैव-प्रौद्योगिकी एवं पेटेंट संबंधी शब्दावली