अंतरिक्ष (SPACE)
- खगोल विज्ञान के अनुसार अन्तरिक्ष एक विशाल त्रिविमीय (3-D) क्षेत्र है, जो पृथ्वी के वायुमण्डल की समाप्ति की सीमा से प्रारंभ होता है। सामान्यत: अन्तरिक्ष को उस निम्नतम ऊँचाई से आरंभ माना जाता है, जिस ऊँचाई पर कोई उपग्रह पृथ्वी के वातावरण में बिना गिरे एक उचित समय तक अपनी कक्षा को बनाये रख सकता है।
- अन्तरिक्ष के आरंभ की कोई सर्वमान्य सीमा अभी तक निर्धारित नहीं की जा सकी है। फिर भी परंपरागत रूप से अन्तरिक्ष सन्धियों और एयरोस्पेस रिकॉर्ड रखने के लिए समुद्र तल से 100 किमी (62 मील) की ऊँचाई पर निर्धारित ‘कारमन रेखा’(Karman line) का उपयोग अंतरिक्ष की सीमा हेतु किया जाता है।
- कारमन रेखा को फेडरेशन एयरोनॉटिक इंटरनेशनल(FAI) द्वारा मान्यता प्राप्त है। FAI वैमानिकी और अंतरिक्ष विज्ञान के लिए अन्तर्राष्ट्रीय मानकों का निर्धारण और अभिलेखीकरण करने वाली संस्था है।
- HG वेल्स के अनुसार पृथ्वी के वायुमण्डल की बाह्य परतों से प्रारंभ होने वाला वह स्थान जहाँ हाइड्रोजन और अन्य गैसें प्लाज्मा अवस्था में पाई जाती है तथा विद्युत चुम्बकीय विकिरणों की अधिकता पाई जाती है, अन्तरिक्ष कहलाता है।
- नासा के अनुसार भी पृथ्वी से 80 किमी की ऊँचाई से अंतरिक्ष आरंभ हो जाता है।
बाह्य अन्तरिक्ष सन्धि-
- इस सन्धि को 1967 में अमेरिका, इंग्लेण्ड और सोवियत संघ के मध्य साइन किया गया था।
- जून 2020 तक इस सन्धि के हस्ताक्षरकर्त्ता 110 देश है।
- इसका पूरा नाम – “राज्यों द्वारा बाह्य अन्तरिक्ष, जिसमें चन्द्रमा और अन्य खगोलिय पिण्ड शामिल है, के अन्वेष्ज्ञण और उपयोग को नियंत्रित करने वाले सिद्धान्तों पर सन्धि” है।
- इसका उद्देश्य अन्तरिक्ष में हथियारों की होड़ को रोकना है और इसका शान्तिपूर्वक उपयोग सुनिश्चित करना है।
- अंतरिक्ष व अंतरिक्ष तकनीक से संबंधित विषयों के अंतर्गत पृथ्वी के बाह्य वायुमण्डल के चारों ओर विद्यमान स्थान, खगोलीय पिण्ड, उनके अध्ययन के लिए आवश्यक तकनीकें तथा अंतरिक्ष आधारित तकनीकें सम्मिलित हैं। अंतरिक्ष तकनीक के अंतर्गत मुख्य रूप से कृत्रिम उपग्रह, प्रक्षेपणयान प्रौद्यागिकी तथा अन्य सहायक प्रौद्योगिकी (एंटीना, दूरदर्शी आदि) सम्मिलित हैं।
कृत्रिम उपग्रहों को कुछ निश्चित कक्षाओं में स्थापित किया जाता है। पृथ्वी से दूरी, उपग्रह द्वारा पृथ्वी का चक्कर लगाने में लिया गया समय तथा उपग्रह की कक्षा में झुकाव के आधार पर इन कक्षाओं का वर्गीकरण किया गया है।
प्रमुख उपग्रह कक्षाएँ इस प्रकार हैं (Orbits of Satellites) :–
1. निम्न भू कक्षा- (Law Earth orbit : LEO)-
- यह कक्षा पृथ्वी सतह से 200 से 2000 किमी की ऊँचाई पर स्थित होती है। यह कक्षा उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव के ऊपर से गुजरती है। इसलिए इसे ध्रुवीय कक्षा भी कहते हैं।
- प्रत्येक परिक्रमा में अंतरिक्ष यान पृथ्वी के ऊपर से विभिन्न बिन्दुओं से गुजरता है क्योंकि पृथ्वी स्वयं परिक्रमा कर रही होती है।
- ध्रुवीय कक्षा का उपयोग मुख्य रूप से वैज्ञानिक उपग्रहों के लिए किया जाता है, जो परिक्रमा करते हुए प्रतिदिन एक बार ध्रुवों के ऊपर से गुजरते हैं और साथ ही साथ ही प्रतिदिन पूरी पृथ्वी के चित्र भी भेज सकते हैं।
- इन उपग्रहों का परिक्रमण काल 80-130 मिनट होता है।
2. मध्य भू-कक्षा (Middle Earth Orbit : MEO) –
- यह निम्न भू-कक्षा और भूस्थिर-कक्षा के बीच की कक्षा है, जो 2,000-35,786 किमी की ऊँचाई पर स्थित होती है। ।
- इस कक्षा में उपग्रह नेविगेशन, संचार और ऊपरी वायुमण्डल का अध्ययन करने हेतु भेजे जाते हैं।
- इस कक्षा में धूम रहे उपग्रहों का परिक्रमण काल 2-24 घण्टे होता है। इसकी ऊँचाई 600-800 किमी होती है। यह भी एक ध्रुवीय कक्षा ही है, इसमें घूमते उपग्रह का आवर्तकाल 96-100 मिनट होता है।
3. भू-स्थैतिक कक्षा (Geo-Stationary Orbit : GSO) –
- भू-स्थैतिक कक्षा में परिक्रमा कर रहा उपग्रह प्रतिदिन पृथ्वी की एक परिक्रमा करता है। यदि उपग्रह को विषुवत् रेखा के ऊपर प्रक्षेपित किया जाए तो वह उत्तर-दक्षिण की ओर गति किये बिना स्थिर रहता है, तब इस कक्षा को भू-स्थैतिक कक्षा कहते हैं।
- इसका परिक्रमण काल 23 घंटे, 56 मिनट और 4.1 सेकेण्ड होता है। यदि कक्षा विषुवत् रेखा की दिशा में हों और कक्षा वृत्तीय हो तो परिक्रमा कर रही वस्तु स्थिर प्रतीत होगी और तब उसे भू-स्थैतिक उपग्रह कहेंगे।
- भू-स्थैतिक कक्षा की ऊँचाई 36,000 किलोमीटर (35,786 किमी) होती है। इस कक्षा में स्थित उपग्रहों का उपयोग संचार तथा मार्गदर्शन के लिए किया जाता है।
- भू-तुल्यकालिक कक्षा (Geo-Synchronus Orbit) की ऊँचाई भी 36,000 किमी होती है परन्तु इसकी कक्षा का विषुवत् रेखा की दिशा में होना अनिवार्य नहीं है।
4. सूर्य तुल्यकालिक ध्रुवीय कक्षा (Sun-Synchronous Polar Orbit : SSPO) –
- इसका तात्पर्य यह है कि यदि उपग्रह की कक्षा का झुकाव सूर्य-पृथ्वी की रेखा के सापेक्ष सभी ऋतुओं में एक समान रहे तो इस कक्षा को सूर्य तुल्यकालिक कक्षा कहते हैं।
- इस उपग्रह की कक्षीय परिक्रमा का समय भी पृथ्वी के घूर्णन समय के बराबर होता है, जिससे प्रेक्षणों की तुलना की जा सकती है और उनके बीच तारतम्य भी स्थापित हो पाता है।
- यह कक्षा दृश्य प्रकाश तथा अवरक्त प्रकाश का प्रयोग करने वाले सुदूर-संवेदी उपग्रहों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। इस कक्षा में स्थापित होने पर किसी विशेष स्थान से गुजरते हुए सौर प्रकाश की उपलब्धता सुनिश्चित हो जाती है।
5. भू-स्थैतिक/भू-तुल्यकानिक स्थानान्तरण कक्षा (Geosynchronous Transfer Orbit : GTO) –
- यह भू-स्थैतिक या भू-तुल्यकालिक कक्ष से कुछ नीचे स्थित होती है। इसमें भूस्थिर/भूतुल्यकालिक उपग्रह प्रक्षेपित किये जाते हैं। यहाँ से थर्स्ट-वेक्टर्स की सहायता से इन्हे ऊपरी कक्षाओं में भेजा जाता है।
उपग्रह की संरचना/घटक
- एक सामान्य संचार उपग्रह में दो प्रमुख प्रणालियाँ होती है-
- उपग्रह के परिचालन के लिए अंतरिक्ष यान बस या सेवा मॉड्यूल जिसके अंतर्गत उपग्रह के संरचनात्मक ढाँचा (बस), ऊष्मा नियंत्रण प्रणाली, ऊँचाई एवं कक्षा नियंत्रण प्रणाली तथा उपग्रह की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सोलर पैनल सम्मिलित हैं।
- उपग्रह का दूसरा मुख्य अवयव संचार पेलोड है। इस अवयव का वाणिज्यिक उपयोग है।
- इस अवयव के साथ टेलीमेट्री सिस्टम भी जुड़ा रहता है। इसी की सहायता से संचार पेलोड पृथ्वी के उपग्रह प्रसारण स्टेशनों (एंटीना) से अपलिंक संकेत प्राप्त करता है तथा इन संकेतों को आवर्धित कर पृथ्वी की ओर प्रसारित करता है। इन डाउनलिंक संकेतों को पृथ्वी पर स्थित डाउनलिंक एंटीना ग्रहण कर लेते हैं।
-संचार पेलोड का प्रयोग उच्च आवृत्ति के संकेतों (Signlas) के लिए किया जाता है। निम्न आवृत्ति के संकेत आयनमण्डल द्वारा परावर्तित हो जाते है।
संपादित कार्य के आधार पर उपग्रहों को मुख्य रूप से सुदूर-संवेदी उपग्रह, नौवहन उपग्रह तथा संचार उपग्रह में बाँटा जाता है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम (Indian Space Research Programme)
- 1962 में डॉ० विक्रम साराभाई की अध्यक्षता में 'भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति' (INCOSPAR) के गठन के साथ ही भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रम का सूत्रपात हुआ। 15 अगस्त, 1969 को इसी समिति को पुनर्गठित करके भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की स्थापना की गयी।
- अंतरिक्ष अनुसंधान को प्रोत्साहन व स्वतंत्र अस्तित्व प्रदान करने हेतु 1972 में 'राष्ट्रीय अंतरिक्ष कार्यक्रम' बनाया गया। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रमों के कुशल संचालन के लिए 1972 में ही अंतरिक्ष आयोग और अंतरिक्ष विभाग का गठन किया गया तथा इसरो को अंतरिक्ष विभाग के नियंत्रण में रखा गया।
- 21 नवम्बर, 1963 को देश के पहले साउंडिंग रॉकेट 'नाइक आपाची' (अमेरिका निर्मित) को थुम्बा भूमध्य रेखीय रॉकेट प्रक्षेपण केन्द्र (TERLS) से प्रक्षेपित किया गया। 1975 में प्रथम भारतीय उपग्रह आर्यभट्ट लाँच किया गया। 1979 में भास्कर-I उपग्रह रोहिणी मिशन के तहत लाँच किया गया।
- भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ० विक्रम साराभाई के निधन के पश्चात् TERLS का नाम बदलकर विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र रख दिया गया। कृत्रिम उपग्रहों के विकास व संचालन तथा प्रेक्षेपण के क्षेत्र में देश ने आत्मनिर्भरता प्राप्त करते हुए अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भी अपनी दस्तक दे दी है।
- भारत के गगनयान मिशन के सपने संजोने से स्पष्ट आभास होता है कि आने वाले समय में भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम नये क्षितिज को छूने जा रहा है।
अंतरिक्ष आयोग के कार्यकारी अंग (Executive Bodies of Space Commission)
अंतरिक्ष आयोग अपने कार्यकारी अंगो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) एवं भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पी.आर.एल) अहमदाबाद के अलावा चार अन्य स्वायत्त निकायों के माध्यम से अपने कार्यों का संपादन करता है। अंतरिक्ष आयोग के ये चार स्वायत्त निकाय निम्नलिखित हैं-
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- राष्ट्रीय वायुमण्डलीय अनुसंधान प्रयोगशाला, तिरुपति।
- सैमी-कंडक्टर लेबोरेटरी, मोहाली।
- पूर्वोत्तर अंतरिक्ष अनुप्रयोग केन्द्र (NE-SAC), शिलाँग।
- भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान और प्रोद्योगिकी संस्थान (ST), तिरूवनंतपुरम।
एंट्रिक्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड (ACL)- इसरो द्वारा विकसित प्रोद्योगिकियों के वाणिज्यिक दोहन और प्रचार-प्रसार के लिए इसे सरकार के स्वामित्व वाली प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी के रूप में स्थापित किया गया। इसका प्रशासनिक नियंत्रण अंतरिक्ष विभाग के पास है।
इसरो व उसकी विभिन्न इकाइयाँ (ISRO and it's associated Unites)
1969 में स्थापित एवं 1975 से पूर्ण रूप से एक सरकारी संस्था के रूप में कार्य कर रहा 'इसरो' (ISRO - Indian Space Research Organisation) अपनी विभिन्न इकाइयों के माध्यम से अंतरिक्ष विज्ञान, प्रौद्योगिकी तथा उनके व्यावहारिक अनुप्रयोग के सभी क्षेत्रों में विभिन्न योजनाओं तथा कार्यक्रमों को संचालित करता है।
इससे संबंधित प्रमुख अंतरिक्ष केन्द्र तथा इकाइयाँ निम्नलिखित हैं –
विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र (VSSC-Vikram Sarabhai Space Centre) तिरुअनंतपुरम :
थुम्बा में अवस्थित यह इसरो का सबसे बड़ा केन्द्र है, जो प्रक्षेपण यान का विकास करता है। अब तक भारत द्वारा प्रक्षेपित सभी प्रक्षेपण यानों को इसी केन्द्र में विकसित किया गया है। यह केन्द्र प्रक्षेपास्त्र अनुसंधान तथा प्रक्षेपण यान विकास में अग्रणी भूमिका का निर्वहन करता है।
इसरो उपग्रह केन्द्र (ISAC - ISRO Satellite Centre), बंगलुरु :
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के विभिन्न प्रौद्योगिकीय व व्यावहारिक उपयोग से संबंधित मिशनों के लिए स्वदेशी उपग्रहों के निर्माण, परीक्षण व प्रबंधन के साथ-साथ परियोजनाओं को लागू करने का उत्तरदायित्व इसी संस्थान पर है।
अंतरिक्ष प्रयोग केन्द्र (SAC - Space Application Centre), अहमदाबाद :
उपग्रहों की पेलोड प्रणाली की कल्पना तथा विकास एवं अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के व्यावहारिक अनुप्रयोग को प्रदर्शित करने के उद्देश्य से इस केन्द्र की स्थापना की गई है। दूरसंचार व टेलीविजन में उपग्रहों का प्रयोग, प्राकृतिक संसाधनों के सर्वेक्षण और प्रबंधन के लिए दूरसंवेदन, मौसम विज्ञान व पर्यावरण संरक्षण से संबंधित कार्य इस केन्द्र के द्वारा किये जाते हैं।
सतीश धवन स्पेस सेन्टर (SDSC) शार (SHAR- Sri Harikota HighAltitude Range), श्रीहरिकोटाः आन्ध्रप्रदेश के पूर्वी तट पर अवस्थित इसरो का यह प्रमुख प्रक्षेपण केन्द्र है। यहाँ प्रक्षेपण यान के ठोस ईंधन रॉकेट के विभिन्न चरणों का सतह पर परीक्षण तथा प्रणोदकों (Propellants) का प्रसंस्करण किया जाता है।
द्रव प्रणोदन प्रणाली केन्द्र (LPSC-Liquid Propulsion System Centre) :
इसरो के उपग्रह प्रक्षेपण यानों और उपग्रहों के लिए द्रव ईंधन से चलने वाली चालक नियंत्रण प्रणालियों, क्रायोजनिक संचालन प्रणाली, ऑक्जिलरी नोदन प्रणाली और इंजनों के डिजाइन, विकास व आपूर्ति हेतु यह संस्था कार्य करती है।
मुख्य नियंत्रण सुविधा केन्द्र (MCF - Master Control Facility), हासन :
कर्नाटक के हासन में स्थित इस केन्द्र से इनसेट अंतरिक्ष यानों का प्रक्षेपण कक्षा में स्थापित करने तथा कक्षा में स्थापित होने के बाद इनके संचालन संबंधी कार्य किये जाते हैं। इसरो का दूसरा 'मुख्य नियंत्रण सुविधा केन्द्र' भोपाल में स्थापित किया गया है।
इसरो जड़त्व प्रणाली इकाई (ISRO Inertial System Unit), तिरुअनंतपुरम :
इसका प्रमुख कार्य प्रक्षेपण यानों और उपग्रहों के लिए जड़त्व प्रणाली का विकास करना है।
भौतिक शोध प्रयोगशाला (Physical Research laboratory), अहमदाबाद :
यह संस्थान अंतरिक्ष और संबद्ध विज्ञान में अनुसंधान एवं विकास कार्य करने वाला प्रमुख राष्ट्रीय केन्द्र है, जो अंतरिक्ष विभाग के अंतर्गत कार्यरत है।
राष्ट्रीय दूर-संवेदी एजेंसी (NRSA - National Remote Sensing Agency), हैदराबाद :
उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग करके पृथ्वी के संसाधनों की पहचान, वर्गीकरण व निगरानी करने की जिम्मेदारी इस एजेंसी की है। राष्ट्रीय दूर-संवेदी एजेंसी का ही एक अंग भारतीय दूर-संवेदी संस्थान है, जो देहरादून में स्थित है। यह दूर-संवेदी तकनीकों और हवाई चित्र व्याख्या तकनीकों के लिए मुख्य प्रशिक्षण केन्द्र है।
न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड – यह इसरों की वाणिज्यिक इकाई व एक केन्द्रिय सार्वजनिक क्षेत्र की ईकाई (CPSU) है। इसका मुख्यालय बैंगलुरू में है। इसकी स्थापना मार्च 2019 में की गई। यह अन्तरिक्ष विभाग के अधीन है, यह निजी कम्पनियों को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी संबंधी लाइसेंस प्रदान करेगी।
अंतरिक्ष कार्यक्रम के उद्देश्य (Objectives of Space programme)
- उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण के क्षेत्र में विकास करना और आत्मनिर्भरता प्राप्त करना। दूरसंचार, टेलीविजन प्रसारण, मौसम अध्ययन एवं संसाधन सर्वेक्षण तथा प्रबंधन के क्षेत्र में प्रौद्योगिकी विकसित करना।
- विकसित अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी पर आधारित सेवाएं उपलब्ध कराना व इसके कार्यान्वयन के लिए उपग्रहों, प्रक्षेपण यानों तथा संबद्ध
- भू-प्रणालियों का विकास करना। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम मुख्यतः उपयोगिता संचालित है तथा इसका मुख्य उद्देश्य राष्ट्र के सामाजिक-आर्थिक विकास में सहयोग करना है।
भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली (INSAT - Indian National Satallite System)
- भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली इसरो द्वारा विकसित एक बहुउद्देश्यीय भूस्थैतिक उपग्रह प्रणाली है, इसकी स्थापना 1983 में की गई।
- इसका उपयोग घरेलू दूरसंचार, ग्रामीण क्षेत्रों में उपग्रह के माध्यम से सामुदायिक दूरदर्शन के राष्ट्रव्यापी प्रसारण को बेहतर बनाने, भू-स्थित ट्रांसमीटरों के माध्यम से पुनः प्रसारण के लिए आकाशवाणी तथा दूरदर्शन कार्यक्रमों को देशभर में प्रसारित करने, मौसम संबंधी जानकारी, वैज्ञानिक अध्ययन हेतु भू-सर्वेक्षण तथा आंकड़ों के संप्रेषण में होता है।
- इनसैट प्रणाली अंतरिक्ष विभाग, दूरसंचार विभाग, भारतीय मौसम विभाग, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन का संयुक्त प्रयास है। इनसैट उपग्रह प्रणाली की व्यवस्था, निगरानी व संचालन का पूर्ण दायित्व अंतरिक्ष विभाग को सौंपा गया है।
- इनसैट प्रणाली की पहली पीढ़ी के चारों उपग्रह अमरीकी कम्पनी 'फोर्ड एरोस्पेस' द्वारा बनवाए गये परन्तु इसके बाद द्वितीय एवं तृतीय पीढ़ी के सभी उपग्रह स्वदेश में ही निर्मित किये गये इनसैट 1 श्रृंखला अथवा पहली पीढ़ी के उपग्रह 1982-90 के दौरान विकसित किये गये।
- इस श्रृंखला में चार उपग्रह थे इनसैट 1(A), 1(B), 1(C), 1(D)। श्रृंखला के चारों उपग्रहों में से वर्तमान समय में केवल एक उपग्रह इनसैट 1(D) कार्यरत है। इस श्रृंखला के इनसैट 1(B) में पहली बार मौसम संबंधी आंकड़ों के लिए VHRR (Very High Resolution Radio meter) का प्रयोग किया गया था।
- उपग्रहों के विकास की दूसरी पीढ़ी इनसैट 2 श्रृंखला कहलाती है। इस श्रृंखला के उपग्रह न केवल भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा परिकल्पित थे बल्कि इनके डिजाइन भी इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा ही तैयार किये गये। इस श्रृंखला के अंतर्गत 5 उपग्रह छोड़े गये 2A, 2B, 2C, 2D एवं 2E।
- इस श्रृंखला का प्रयोग 1990 से कुछ पहले आरंभ हुआ तथा सन् 2000 तक चलता रहा। इस श्रृंखला में C एवं S बैंड के ट्रांसपोण्डर्स का प्रयोग तो हुआ ही, 2C में पहली बार KU बैण्ड के ट्रांसपोण्डर भी प्रयुक्त हुए। मौसम संबंधी सूचनाओं, मेट्रो, टीवी, वीडियो और टेलीफोन आदि सुविधाओं का विकास इसी श्रृंखला के अंतर्गत किया गया। अभी इस श्रृंखला के दो उपग्रह 2B एवं 2F काम कर रहे हैं।
- संचार उपग्रहों के विकास की तीसरी पीढ़ी को इनसैट 3 श्रृंखला कहते हैं, जिसका प्रथम उपग्रह इनसैट 3B मार्च 2000 में प्रक्षेपित किया गया था। 2D के अचानक खराब हो जाने के कारण भारत को अरबसेट के ट्रांसपोण्डर किराए पर लेने पड़े थे। इस समस्या के उपाय के रूप में इनसैट 3A से पहले 3B को प्रक्षेपित किया गया, क्योंकि वह उन सभी आवश्यकताओं को पूरा करने में ज्यादा सक्षम था।
- इसमें लगे C बैंड के ट्रांसपोण्डर न केवल पहले की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली हैं, बल्कि यह पहली बार क्षैतिज दिशा में काम करने के साथ-साथ लम्बवत् भी काम कर सकेंगे। टेली मेडिसिन और टेली एजुकेशन जैसे क्षेत्रों में इस उपग्रह के विशेष उपयोग होंगे। इसी के आधार पर ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की शिक्षा देने के लिए विद्यावाहिनी चैनल की स्थापना की गई थी।
- वर्तमान में INSAT श्रेणी के उपग्रहों को GSAT कहा जा रहा है। जनवरी 2020 में फ्रेंच गुयाना से GSAT 30 को लॉच किया गया। यह 3357 किग्रा वजनी संचार उपग्रह है। यह INSAT-4A उपग्रह को प्रतिस्थापित करेगा। यह भूस्थैतक कक्षा में C & Ku बैंड स्पैक्ट्रम में सेवाएँ प्रदान करेगा।
उपरोक्त संचार उपग्रहों के उपयोग को दो क्षेत्रों में वर्गीकृत करके देखा जा सकता है
(a) संचार क्षेत्र में उपयोग
(b) गैर-संचार उपयोग
संचार के क्षेत्र में उपयोग (Uses in Communication)
- इन उपग्रहों से दूरदर्शन के राष्ट्रीय नेटवर्क की स्थापना हुई, जिससे पूरा देश एकता के सूत्र में बँधा। साथ ही KU बैंड के ट्रांसपोण्डरों के माध्यम से DTH सुविधा भी आरम्भ की जा चुकी है।
- रेडियो क्षेत्र में एफ. एम. (FM) सेवा का विकास इसी का परिणाम है। एफ. एम. की मूल विशेषता यह है कि इस पर वायुमंडलीय व्यावधनों का कोई असर नहीं होता।
- आपातकालीन स्थितियों में जहाँ केबल के माध्यम से संचार स्थापित करना संभव नहीं होता, वहाँ इनका उपयोग किया जा सकता है। गुजरात में आये भूकंप के बाद सबसे पहले सेटेलाइट के माध्यम से ही संचार स्थापित हो सका था।
- यदि कोई वायुयान या जलयान किसी विपदा में फँस जाए तो इन उपग्रहों के माध्यम से उससे संचार स्थापित किया जा सकता है। इसके लिए उपग्रहों पर विशेष सर्च एंड रेस्क्यू ट्रांसपोण्डर लगाये जाते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग के आधार पर विश्व भर में काम करते हैं।
- ये ट्रांसपोण्डर 2A तथा 2B उपग्रहों में लगाए गये हैं। समुद्र के भीतर विभिन्न जहाजों, तेल उत्पादन केन्द्रों आदि के बीच भी ये उपग्रह संचार सेवा उपलब्ध कराते हैं। ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का नाम 'इन्मारसेट' (INMARSET) है।
- शिक्षा और सामुदायिक स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में भी संचार उपग्रहों का प्रयोग किया जा रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में इसे 'दूरस्थ शिक्षा (Tele-education) कहते हैं तथा चिकित्सा के क्षेत्र में इसका प्रयोग 'टेलीमेडिसिन' के रूप में होता है।
- सरकारी क्षेत्र में निकनेट (NICNET – National Informatics Network) जैसे नेटवर्क इन उपग्रहों के प्रयोग से देश के प्रत्येक जिले को केन्द्र सरकार के साथ हमेशा संचार की स्थिति में बनाए रखते हैं।
गैर-संचार क्षेत्र में उपयोग (Uses in Non-Communication)
- मौसम विज्ञान का अध्ययन इन उपग्रहों पर एक विशेष यंत्र लगा होता है, जिसे वी.एच.आर.आर. (VHRR) कहते हैं। इसकी मदद से ये उपग्रह मौसमी दशाओं का अंकन करके बेस स्टेशन को प्रेषित करते हैं। इससे बादलों के आच्छादन तथा प्रदूषण की मात्रा आदि के सम्बन्ध में तथ्यात्मक जानकारी उपलब्ध हो जाते हैं।
- प्राकृतिक विपदा की चेतावनी ये उपग्रह कई प्राकृतिक विपदाओं की पूर्व सूचना देने में सक्षम होते है। भारत के पूर्वी तट पर बाढ़ एवं चक्रवात जैसी स्थितियाँ अक्सर बनती रहती हैं। ये उपग्रह अन्य स्थानों से तुलना करके इन विपदाओं का पूर्वानुमान लगाते हैं।
- विदेश तथा शत्रु देशों में जासूसी कार्य के लिए भी इनका प्रयोग किया जा सकता है। शत्रु देशों के सैन्य ठिकानों तथा स्थापित मिसाइलों के चित्र इनके माध्यम से प्राप्त किये जा सकते है।
- इन उपग्रहों के माध्यम से विदेशी मुद्रा का अर्जन भी किया जा सकता है। वर्तमान समय में भारत ने अंतरिक्ष एन्ट्रिक्स निगम का गठन किया है, जो ट्रांसपोण्डर्स तथा उनसे प्राप्त सूचनाओं का विपणन और विक्रय करता है।
List of Communication Setellites= ISRO द्वारा प्रेषित संचार उपग्रह
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Satellite
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Launch Date
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Launch Mass
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Launch Vehicle
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Application
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GSAT-30
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Jan 17, 2020
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3357 kg
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Ariane-5 VA-251
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Communication
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GSAT-31
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Feb 06, 2019
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2536 kg
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Ariane-5 VA-247
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Communication
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GSAT-7A
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Dec 19, 2018
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GSLV-F11 / GSAT-7A Mission
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Communication
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GSAT-11 Mission
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Dec 05, 2018
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5854 kg
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Ariane-5 VA-246
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Communication
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GSAT-29
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Nov 14, 2018
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3423 kg
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GSLV Mk III-D2 / GSAT-29 Mission
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Communication
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GSAT-6A
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Mar 29, 2018
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GSLV-F08/GSAT-6A Mission
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Communication
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GSAT-17
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Jun 29, 2017
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3477 kg
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Ariane-5 VA-238
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Communication
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GSAT-19
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Jun 05, 2017
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3136 Kg
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GSLV Mk III-D1/GSAT-19 Mission
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Communication
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GSAT-9
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May 05, 2017
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2230 kg
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GSLV-F09 / GSAT-9
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Communication
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GSAT-18
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Oct 06, 2016
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3404 kg
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Ariane-5 VA-231
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Communication
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GSAT-15
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Nov 11, 2015
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3164 kg
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Ariane-5 VA-227
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Communication, Navigation
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GSAT-6
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Aug 27, 2015
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2117 kg
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GSLV-D6
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Communication
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GSAT-16
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Dec 07, 2014
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3181.6 kg
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Ariane-5 VA-221
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Communication
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GSAT-14
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Jan 05, 2014
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1982 kg
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GSLV-D5/GSAT-14
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Communication
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GSAT-7
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Aug 30, 2013
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2650 kg
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Ariane-5 VA-215
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Communication
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GSAT-10
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Sep 29, 2012
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3400 kg
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Ariane-5 VA-209
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Communication, Navigation
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GSAT-12
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Jul 15, 2011
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1410 kg
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PSLV-C17/GSAT-12
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Communication
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GSAT-8
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May 21, 2011
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3093 kg
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Ariane-5 VA-202
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Communication, Navigation
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GSAT-5P
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Dec 25, 2010
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2310 kg
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GSLV-F06 / GSAT-5P
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Communication
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GSAT-4
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Apr 15, 2010
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2220 Kg
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GSLV-D3 / GSAT-4
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Communication
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INSAT-4CR
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Sep 02, 2007
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2,130 kg
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GSLV-F04 / INSAT-4CR
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Communication
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INSAT-4B
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Mar 12, 2007
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3025 Kg
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Ariane5
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Communication
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INSAT-4C
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Jul 10, 2006
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GSLV-F02 / INSAT-4C
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Communication
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INSAT-4A
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Dec 22, 2005
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3081 Kg
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Ariane5-V169
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Communication
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HAMSAT
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May 05, 2005
|
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PSLV-C6/CARTOSAT-1/HAMSAT
|
Communication
|
|
|
EDUSAT
|
Sep 20, 2004
|
1950.5 kg
|
GSLV-F01 / EDUSAT(GSAT-3)
|
Communication
|
|
|
INSAT-3E
|
Sep 28, 2003
|
2,775 Kg
|
Ariane5-V162
|
Communication
|
|
|
GSAT-2
|
May 08, 2003
|
1800 Kg
|
GSLV-D2 / GSAT-2
|
Communication
|
|
|
INSAT-3A
|
Apr 10, 2003
|
2,950 Kg
|
Ariane5-V160
|
Climate & Environment, Communication
|
|
|
KALPANA-1
|
Sep 12, 2002
|
1060 Kg
|
PSLV-C4 /KALPANA-1
|
Climate & Environment, Communication
|
|
|
INSAT-3C
|
Jan 24, 2002
|
2,650 Kg
|
Ariane5-V147
|
Climate & Environment, Communication
|
|
|
GSAT-1
|
Apr 18, 2001
|
1530 Kg
|
GSLV-D1 / GSAT-1
|
Communication
|
|
|
INSAT-3B
|
Mar 22, 2000
|
2,070 Kg
|
Ariane-5G
|
Communication
|
|
|
INSAT-2E
|
Apr 03, 1999
|
2,550 Kg
|
Ariane-42P H10-3
|
Communication
|
|
|
INSAT-2D
|
Jun 04, 1997
|
2079 Kg
|
Ariane-44L H10-3
|
Communication
|
|
|
INSAT-2C
|
Dec 07, 1995
|
2106 Kg
|
Ariane-44L H10-3
|
Communication
|
|
|
INSAT-2B
|
Jul 23, 1993
|
1906 kg
|
Ariane-44L H10+
|
Communication
|
|
|
INSAT-2A
|
Jul 10, 1992
|
1906 kg
|
Ariane-44L H10
|
Communication
|
|
|
INSAT-1D
|
Jun 12, 1990
|
|
Delta 4925
|
Communication
|
|
|
INSAT-1C
|
Jul 22, 1988
|
|
Ariane-3
|
Communication
|
|
|
INSAT-1B
|
Aug 30, 1983
|
|
Shuttle [PAM-D]
|
Communication
|
|
|
INSAT-1A
|
Apr 10, 1982
|
|
Delta
|
Communication
|
|
भारतीय दूर-संवेदी उपग्रह प्रणाली (Indian Remote Sensing Satellite System)
- सुदूर संवेदन का अर्थ है लक्षित वस्तु के प्राथमिक संपर्क में आये बिना उसके संबंध में संवेदन के माध्यम से जानकारी प्राप्त करना। सुदूर-संवेदी उपग्रह विभिन्न क्षेत्रों से तरंगों का आदान-प्रदान करते हैं तथा उनकी प्रत्यावर्तित तरंगों के आधार पर यह संभावना व्यक्त करते हैं कि पृथ्वी के भीतर या समुद्र में कौन से तत्व के होने की संभावना है?
- इसके लिए प्रायः अवरक्त किरणों (Infrared Rays) का प्रयोग किया जाता है, जो अपनी उच्च भेदन क्षमता के कारण सतह के काफी भीतर तक पहुँचकर वास्तविक तथ्यों का बोध कराती हैं।
- भारत में सुदूर-संवेदी उपग्रहों के विकास की तीन पीढ़ियाँ मानी जाती हैं। भास्कर-1 तथा भास्कर-2 जैसे प्रायोगिक दूर-संवेदी उपग्रहों के बाद 1988 में IRS-1A के साथ ही यह विकास यात्रा आरंभ हुई। पहली पीढ़ी में IRS-1A के अतिरिक्त IRS-1B को 1991 में छोड़ा गया। इस पीढ़ी के उपग्रहों में LISS (Liner Imaging Self Sacnning Sensor) नामक कैमरे का प्रयोग किया गया।
- दूर-संवेदी उपग्रहों की दूसरी पीढ़ी में IRS-1C, 1D, 1E थे। यह श्रृंखला 1993-1995 तक चली। इसमें IRS-1D को पहली बार स्वदेशी ध्रुवीय प्रक्षेपण यान (PSLV) से छोड़ा गया। इस श्रृंखला के उपग्रहों में विशेष पैनक्रोमेटिक कैमरों का प्रयोग किया गया। इनकी क्षमता पहली पीढ़ी की तुलना में काफी अधिक थी।
- दूर-संवेदी उपग्रहों की तीसरी पीढ़ी 1996 से प्रारंभ होकर वर्तमान समय तक की है, जिसमें IRS-P1 से P6 तक उपग्रह प्रक्षेपित किये गये। वर्तमान में रिसैट और कार्टोसेट श्रेणी के उपग्रह रिमोट सेन्सिंग हेतु प्रक्षेपित किये जा रहे हैं।
भारतीय सुदूर संवेदन प्रणाली के उपयोग (Use of IRSS)
- भारतीय सुदूर संवेदन कार्यक्रम उपयोगकर्ताओं की आवश्यकता से प्रेरित है। वास्तव में 1970 में केरल में नारियल के पेड़ों की जड़ों में विल्ट रोग की पहचान के लिए प्रथम सुदूर संवेदन आधारित पायलट प्रोजेक्ट संचालित किया गया। इस पायलट प्रोजेक्ट ने भारतीय सुदूर संवदेन प्रणाली के विकास की अगुआई की।
- आई.आर.एस. उपग्रहों में ऐसे कई उपकरण लगाए गए जिनका कार्य विविध स्थानिक, स्पेक्ट्रम और हाई रिजोल्यूशन वाले आँकड़े प्रदान करना था, जिसका उपयोग देश में ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी किया जा सके।
- ये सुदूर संवेदन उपग्रह पृथ्वी का अंतरिक्ष से अवलोकन करते हैं और हमें पर्यावरण के विभिन्न पक्ष, वायुमंडल, समुद्र तथा भूमि से संबंधित सूचना समय-समय पर संयुक्त व व्यवस्थित रूप से प्रदान करते हैं
- यह जानकारी खाद्य और जल सुरक्षा सुनिश्चित करने, हमारे पर्यावरण व पारिस्थितिक तंत्र को सतत बनाए रखने, जलवायु व मौसम को समझने, प्राकृतिक संसाधनों की निगरानी व प्रबंधन, विकासात्मक कार्यक्रमों की निगरानी व योजना बनाने, आपदा के दौरान राहत और बचाव कार्यों आदि में सहायता करती है।
रिमोट सेंसिग सेटेलाइट्स 2 प्रकार के है – सक्रिय और निष्क्रिय रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट
सक्रिय रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट ये उपग्रह स्वयं की विकिरणों को पृथ्वी की ओर भेजते हैं और यहाँ से परावर्तित विकिरणों का अध्ययन करके रिमोट सेंसिंग करते हैं। उदाहरण RISAT श्रेणी के उपग्रह, HYSISD उपग्रह आदि।
निष्क्रिय रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट- ये उपग्रह पृथ्वी से उत्सर्जित और परावर्तित सौर विकिरणों का अध्ययन करके रिमोट सेंसिंग डेटा तैयार करते हैं। उदाहरण- कार्टोसेट, रिर्सोसेसेट, ओशनसेट आदि।
विविधीकृत क्षेत्रों में सुदूर संवेदन प्रणाली के उपयोग
(1) कृषि एवं मृदा
• फसल उत्पादन का पूर्वानुमान
• क्षारीय या लवणीय मृदा का पता लगाना
• बागवानी विकास
• कृषि मौसम सेवाएं एवं आपदा निगरानी (कीट, बाढ़, सूखा)
(2) जैव संसाधन व पर्यावरण
• वनाच्छादित क्षेत्र एवं वन के प्रकारों का पता लगाना।
• आर्द्र भूमि सूची एवं संरक्षण योजना बनाना।
• जैव विविधिता की विशेषताएँ ज्ञात करना।
• मरुस्थलीकरण के स्तर का पता लगाना।
• तटीय मैंग्रोव व प्रवालों से संबंधित जानकारी प्राप्त करना
• हिमपात एवं हिमानियों का अध्ययन करना
(3) मानचित्र में
• बड़े पैमाने पर मानचित्रण।
• उपग्रह आधारित स्थलाकृति नक्शा।
डिजिटल एलीवेशन मॉडल।
(4) भूगर्भशास्त्र एवं खनिज संसाधन
• भू-स्खलन के खतरे वाले क्षेत्रों का निर्धारण।
• खनन क्षेत्र, खनिज/तेल अन्वेषण में।
• भूकंपीय व विवर्तनिकी अध्ययन।
• इंजीनियरिंग व भू-पर्यावरण का अध्ययन।
(5) महासागर और मौसम विज्ञान
• समुद्री प्राथमिक उत्पादकता के आँकड़ों के संबंध में समुद्री स्तर का पूर्वानुमान, तूफान की सूचना।
• क्षेत्रीय मौसम की भविष्यवाणी, उष्णकटिबंधीय चक्रवात का वृहद् अध्ययन।
• विस्तारित रूप से मानसून की भविष्यवाणी।
(6) ग्रामीण विकास
• बंजर भूमि का मानचित्रण/अद्यतन करना।
• वाटर शेड विकास और निगरानी।
• भू-अभिलेख आधुनिकीकरण योजना।
(7) नगरीय विकास
• प्रमुख शहरों के फैलाव का मानचित्रण, मास्टर प्लान तैयार करना,चयनित शहरों व कस्बों की व्यापक योजना, शहरों के निर्माण के लिए आधारभूत नक्शा बनाने में।
• राष्ट्रीय शहरी सूचना प्रणाली के विकास में।
(8) जल संसाधन प्रबन्धन-
• सिंचाई की आधारभूत संरचना के मूल्यांकन में।
• जल संसाधन सूचना प्रणाली।
• जलाशय क्षमता का मूल्यांकन।
• जलविद्युत के लिए स्थान का चयन।
(9) प्राकृतिक संसाधनों की गणना
• भूमि का उपयोग, भूमि आकृति विज्ञान, भूमि क्षरण, भू उपयोग में परिवर्तन की जानकारी।
• प्राकृतिक संसाधनों के भंडारों का समय-समय पर अनुमान।
(10) आपदा प्रबंधन सहायता
• विभिन्न प्राकृतिक आपदाएँ जैसे बाढ़, चक्रवात, सूखा, भू-स्खलन, वनाग्नि से निबटने में प्रक्रियात्मक भूमिका।
• पूर्व चेतावनी प्रणाली तथा डिसीजन सपोर्ट टेल पर अनुसंधान व विकास।
(11) जलवायु परिवर्तन अध्ययन
• मीथेन उत्सर्जन का अध्ययन।
• जलवायु के चरों की विशेषताओं का अध्ययन।
अतः भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह प्रणाली क्षेत्रीय स्तर पर स्थित विभिन्न संस्थानों के साथ मिलकर पृथ्वी के अवलोकन में प्रमुख भूमिका निभा रही है। यह मानव जीवन को सुविधा सम्पन्न बनाने तथा समाज को सुदृढ़ करने के साथ देश में संसाधनों के विकास के साथ अन्य क्षेत्रों में इस प्रणाली की अग्रणी भूमिका है।
महत्वपूर्ण दूर-संवेदी उपग्रह (Important Remote Sensing Satellites)
IRS-P4 (ओशनसैट 1)
PSLV-C2 द्वारा प्रक्षेपित यह विश्व का पहला उपग्रह है, जिसे केवल समुद्र के चित्रण एवं सर्वेक्षण के लिए विकसित किया गया। इसी कारण इसका नाम ओशनसैट 1 रखा गया। ओशनसैट 1 उपग्रह का मुख्य उद्देश्य सागरों की सतह का तापमान, सागरों के ऊपर वायुमंडल में जलवाष्प की मात्रा, सागरों की गहराई, सागरों में तैरते फाइटोप्लैंकटन की मात्रा आदि का पूरा-पूरा वास्तविक आकलन करना है। ओशनसैट 1 पर एक 'मल्टी फ्रिक्वेंसी स्कैनिंग माइक्रोवेव रेडियोमीटर' और 'ओशन कलर मॉनिटर' लगाया गया है। इस रेडियोमीटर से छोड़ी गई माइक्रोवेव किरणें बादलों को भेदने तथा सभी मौसम में कार्य करने में सक्षम हैं। यह रेडियोमीटर समुद्र की गहराई की भी पड़ताल करने में समर्थ है।
PSLV-C2 प्रक्षेपण यान द्वारा ओशनसेट 4 के साथ ही कोरिया के 'किटसैट 3' एवं जर्मनी के 'डी.एल.आर. ट्यूबसेट' को भी पृथ्वी की ध्रुवीय कक्षा में स्थापित किया गया। इस क्रम में भारतीय प्रक्षेपण यान द्वारा देश से किसी विदेशी उपग्रह को पहली बार प्रक्षेपित किया गया।
IRS-P6 ( कार्टोर्ससेट1)
17 अक्टूबर, 2005 को मानचित्र संबंधी उद्देश्यों के लिए निर्मित और अत्याधुनिक सुविधाओं एवं उपकरणों से युक्त विश्वस्तरीय भारतीय दूर-संवेदी उपग्रह IRS-P5 (कार्टोसेट 1) को PSLV-C6 द्वारा श्रीहरिकोटा (आन्ध्र प्रदेश) में नवनिर्मित दूसरे लॉन्चिंग पैड से ध्रुवीय कक्षा में प्रक्षेपित किया गया। इसके साथ संचार उपग्रह 'हैमसेट' को भी छोड़ा गया। यह पहला अवसर था, जब इसरो ने एक अभियान के तहत दो स्वदेशी उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया। कार्टोसेट 1 भारतीय दूर-संवेदी उपग्रह श्रृंखला का ग्यारहवाँ तथा मानचित्र संबंधी कार्यों के लिए निर्मित स्वदेशी उपग्रहों की श्रृंखला का पहला उपग्रह था।
ओशनसैट 2
23 दिसम्बर, 2003 को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से PSLV-C14 द्वारा ओशनसैट 2 को प्रक्षेपित किया गया। यह देश का सोलहवाँ दूर-संवेदी उपग्रह है, जो समुद्र की स्थिति की भविष्यवाणी करने और तटीय क्षेत्रों के अध्ययन में सहायक है। यह उपग्रह ज्वार-भाटे की भविष्यवाणी व जलवायु अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण है। इसका कार्यकाल 5 वर्ष का था।
कार्टोसैट 2B
कार्टोसैट 2 के पूरक रूप में इस उपग्रह को 12 जुलाई, 2010 को PSLV-C15 द्वारा सफलतापूर्वक पृथ्वी की ध्रुवीय कक्षा में स्थापित किया गया। इस उपग्रह में ऑनबोर्ड एवं पैनक्रोमेटिक कैमरा लगा हुआ है, जो 0.8 मीटर रिजोल्यूशन वाले चित्र देने में सक्षम है, इनका प्रयोग मानचित्रण व नागरिक उपयोगों के लिए किया जायेगा।
मेघा-ट्रॉपिक्स
12 अक्टूबर, 2011 को PSLV-C18 द्वारा इसे कक्षा में स्थापित किया गया। यह भारत एवं फ्रांस का संयुक्त उपग्रह है जिसका निर्माण जलवायुवीय घटनाओं को समझने के लिए किया गया है। इसकी विस्तृत चर्चा आगे की गयी है।
रीसैट 1
सभी मौसमों में उपयोगी भारत के प्रथम स्वदेशी रडार इमेजिंग उपग्रह रीसैट 1 का 26 अप्रैल, 2012 को PSLV-C19 के जरिये सफल प्रक्षेपण किया गया। इस उपग्रह का उपयोग कृषि और प्राकृतिक आपदा प्रबंधन में किया जायेगा।
सरल (Satellite with ARGOS & ALTIKA) यह भारत-फ्रांस का संयुक्त उपग्रह मिशन है।
सरल (SARAL) शोध कार्य एवं व्यावहारिक अनुप्रयोगों के लिए लक्षित एक विशिष्ट उपग्रह है। 25 फरवरी, 2013 को PSLV-C20 द्वारा इस उपग्रह का सफल प्रक्षेपण किया गया था। यह उपग्रह सामुद्रिक अध्ययनों में मदद करेगा। इसके जरिए समुद्री जलधाराओं और समुद्री सतह की ऊँचाइयों का अध्ययन किया जा सकेगा। एक ओर जहाँ आर्गोस से आँकड़े एकत्र किये जाएंगे, वहीं अल्टीकामीटर से समुद्री सतह की ऊँचाई मापी जा सकेगी। आर्गोस के जरिए वैज्ञानिकों को पर्यावरण के प्रति करने में सहजता होगी तथा पर्यावरणीय सुरक्षा विनियमों से संबद्ध संगठनों को भी मदद मिलेगी। सरल के द्वारा जलवायु के विकास का अध्ययन किया जाएगा। महाद्वीपीय हिम अध्ययनों, तटीय अपरदन, जैव-विविधिता की सुरक्षा, समुद्री जीवों के अध्ययन एवं अन्य व्यावहारिक अनुप्रयोगों में भी इसका उपयोग किया जा सकेगा। उल्लेखनीय है कि सरल का जीवन काल 5 वर्षों का होगा।
हाल ही में लॉच किये गये दूर संवेदी उपग्रह – वर्ष 2019 में इसरो ने RISAT-2B, Cartosat-3 & RISAT-2BR1 लाँच किये। वर्ष 2018 में इसरों ने कार्टोसेट शृंखला के उपग्रह और HYSIS उपग्रह लाँच किये। ये सभी PSLV से लॉन्च किये गये थे।
RISAT-2BR1-
यह रडार इमेजिंग अर्थ ऑब्जरवेशन सैटेलाइट है।
इसे 11 दिसम्बर 2019 को श्री हरिकोटा स्थित सतीश धवन अन्तरिक्ष केन्द्र से लाँच किया गया।
इसे निम्न-भू-कक्षा(LEO)में स्थापित किया गया है। इसमें x-बैंड रडार लगा है।
यह उपग्रह कृषि, वानिकी और आपदा प्रबन्धन में सहायता करेगा।
कार्टोसेट-3
• यह तीसरी पीढ़ी का आधुनिकतम ‘हाई रिजोल्यूशन इमेजिंग क्षमता’ वाला उपग्रह है।
• इसे 27 नवम्बर, 2019 को श्रीहरिकोटा से लाँच किया गया।
• इसे ‘सूर्य तुल्यकालिक ध्रुवीय कक्षा’(SSPO) में लाँच किया गया है।
• यह उपग्रह वृहद् स्तरीय नगरीय नियोजन, ग्रामीण संसाधन और अवसंरचना विकास, तटीय भूमि प्रयोग आदि में सहायता करेगा।
RISAT-2B
• इसे 22 मई 2019 को, श्रीहरिकोटा से लाँच किया गया था।
• यह ISRO द्वारा विकसित रडार इमेजिंग अर्थ- आब्जरवेशन सैटेलाइट है।
• इसे निम्न-भू-कक्षा (LEO) में स्थापित किया गया है।
• इसका उपयोग पृथ्वी का सर्वेक्षण और आपदा प्रबन्धन आदि में किया जायेगा।
HYSIS-(Hyperspectral Imaging Satellite)
• इसे 29 नवम्बर, 2018 को PSLV-(43 रॉकेट द्वारा श्रीहरिकोटा से लाँच किया गया था)।
• इसका प्रमुख उद्देश्य विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम की विभिन्न तरंगों जैसे- दृश्य प्रकाश, अवरक्त (near infrared) तरंगों और शॉर्टवेव अवरक्त तरंगों के द्वारा पृथ्वी की सतह का अध्ययन करना है।
• इसे ‘सूर्य तुल्यकालिक ध्रुवीय कक्षा (SSPO)’ में स्थापति किया गया है।
• इसका उपयोग कृषि, वानिकी, तटीय क्षेत्रों के भूगोल और अन्तर्देशीय जलमार्गों के अध्ययन हेतु किया जायेगा।
कार्टोसेट-2 श्रृंखला उपग्रह –
• इस उपग्रह को 12 जनवरी, 2018 को श्रीहरिकोटा से PSLV-C40 रॉकेट द्वारा श्रीहरिकोटा से लाँच किया गया था।
• इस उपग्रह द्वारा प्रेषित आँकड़ो का प्रयोग कार्टोग्राफिक अनुप्रयोग, ग्रामीण और शहरी अनुप्रयोग, तटीय भूमि प्रयोग और नियमन, सड़क नेटवर्क की निगरानी, जल वितरण, भूमि अनुप्रयोग के नक्शों का निर्माण, लैण्ड इन्फोर्मेशन सिस्टम (LIS) और ज्योग्राफिकल इन्फोर्मेशन सिस्टम (GIS) आदि हेतु किया जायेगा।
• इस उपग्रह का निर्माण ISRO ने किया है और इसे ‘सूर्य तुल्यकालिक ध्रुवीय कक्षा (SSPO)’ में स्थापित किया गया है।
ISRO द्वारा लॉन्च किये गए अर्थ ऑब्जरवेशन या रिमोर्ट सेंसिंग उपग्रह
|
Satellite
|
Launch Date
|
Launch Mass
|
Launch Vehicle
|
Orbit Type
|
Application
|
|
RISAT-2BR1
|
Dec 11, 2019
|
628 Kg
|
PSLV-C48/RISAT-2BR1
|
LEO
|
Disaster Management System, Earth Observation
|
|
|
Cartosat-3
|
Nov 27, 2019
|
|
PSLV-C47 / Cartosat-3 Mission
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
RISAT-2B
|
May 22, 2019
|
615 Kg
|
PSLV-C46 Mission
|
LEO
|
Disaster Management System, Earth Observation
|
|
|
HysIS
|
Nov 29, 2018
|
|
PSLV-C43 / HysIS Mission
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
Cartosat-2 Series Satellite
|
Jan 12, 2018
|
710 Kg
|
PSLV-C40/Cartosat-2 Series Satellite Mission
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
Cartosat-2 Series Satellite
|
Jun 23, 2017
|
712 kg
|
PSLV-C38 / Cartosat-2 Series Satellite
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
Cartosat -2 Series Satellite
|
Feb 15, 2017
|
714 kg
|
PSLV-C37 / Cartosat -2 Series Satellite
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
RESOURCESAT-2A
|
Dec 07, 2016
|
1235 kg
|
PSLV-C36 / RESOURCESAT-2A
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
SCATSAT-1
|
Sep 26, 2016
|
371 kg
|
PSLV-C35 / SCATSAT-1
|
SSPO
|
Climate & Environment
|
|
|
INSAT-3DR
|
Sep 08, 2016
|
2211 kg
|
GSLV-F05 / INSAT-3DR
|
GSO
|
Climate & Environment, Disaster Management System
|
|
|
CARTOSAT-2 Series Satellite
|
Jun 22, 2016
|
737.5 kg
|
PSLV-C34 / CARTOSAT-2 Series Satellite
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
INSAT-3D
|
Jul 26, 2013
|
2060 Kg
|
Ariane-5 VA-214
|
GSO
|
Climate & Environment, Disaster Management System
|
|
|
SARAL
|
Feb 25, 2013
|
407 kg
|
PSLV-C20/SARAL
|
SSPO
|
Climate & Environment, Earth Observation
|
|
|
RISAT-1
|
Apr 26, 2012
|
1858 kg
|
PSLV-C19/RISAT-1
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
Megha-Tropiques
|
Oct 12, 2011
|
1000 kg
|
PSLV-C18/Megha-Tropiques
|
SSPO
|
Climate & Environment, Earth Observation
|
|
|
RESOURCESAT-2
|
Apr 20, 2011
|
1206 kg
|
PSLV-C16/RESOURCESAT-2
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
CARTOSAT-2B
|
Jul 12, 2010
|
694 kg
|
PSLV-C15/CARTOSAT-2B
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
Oceansat-2
|
Sep 23, 2009
|
960 kg
|
PSLV-C14 / OCEANSAT-2
|
SSPO
|
Climate & Environment, Earth Observation
|
|
|
RISAT-2
|
Apr 20, 2009
|
300 kg
|
PSLV-C12 / RISAT-2
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
IMS-1
|
Apr 28, 2008
|
83 kg
|
PSLV-C9 / CARTOSAT – 2A
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
CARTOSAT – 2A
|
Apr 28, 2008
|
690 Kg
|
PSLV-C9 / CARTOSAT – 2A
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
CARTOSAT-2
|
Jan 10, 2007
|
650 kg
|
PSLV-C7 / CARTOSAT-2 / SRE-1
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
CARTOSAT-1
|
May 05, 2005
|
1560 kg
|
PSLV-C6/CARTOSAT-1/HAMSAT
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
IRS-P6 / RESOURCESAT-1
|
Oct 17, 2003
|
1360 kg
|
PSLV-C5 /RESOURCESAT-1
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
The Technology Experiment Satellite (TES)
|
Oct 22, 2001
|
|
PSLV-C3 / TES
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
Oceansat(IRS-P4)
|
May 26, 1999
|
1050 kg
|
PSLV-C2/IRS-P4
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
IRS-1D
|
Sep 29, 1997
|
1250kg
|
PSLV-C1 / IRS-1D
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
IRS-P3
|
Mar 21, 1996
|
920 kg
|
PSLV-D3 / IRS-P3
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
IRS-1C
|
Dec 28, 1995
|
1250 kg
|
Molniya
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
IRS-P2
|
Oct 15, 1994
|
804 kg
|
PSLV-D2
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
IRS-1E
|
Sep 20, 1993
|
846 kg
|
PSLV-D1
|
LEO
|
Earth Observation
|
|
|
IRS-1B
|
Aug 29, 1991
|
975 kg
|
Vostok
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
SROSS-2
|
Jul 13, 1988
|
150 kg
|
ASLV-D2
|
|
Earth Observation, Experimental
|
|
|
IRS-1A
|
Mar 17, 1988
|
975 kg
|
Vostok
|
SSPO
|
Earth Observation
|
|
|
Rohini Satellite RS-D2
|
Apr 17, 1983
|
41.5 kg
|
SLV-3
|
LEO
|
Earth Observation
|
|
|
Bhaskara-II
|
Nov 20, 1981
|
444 kg
|
C-1 Intercosmos
|
LEO
|
Earth Observation, Experimental
|
|
|
Rohini Satellite RS-D1
|
May 31, 1981
|
38 kg
|
SLV-3D1
|
LEO
|
Earth Observation
|
|
|
Bhaskara-I
|
Jun 07, 1979
|
442 kg
|
C-1Intercosmos
|
LEO
|
Earth Observation, Experimental
|
|
प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी (launch Vehicle Technology)
- उपग्रहों को उनकी कक्षा में स्थापित करने के लिए रॉकेट अथवा उपग्रह प्रक्षेपण यान की आवश्यकता होती है। यह यान तेज गति से यात्रा करके पूर्व निर्धारित कक्षा में उपग्रह को स्थापित कर देता है। निर्धारित कक्षा में उपग्रह स्थापित करने के लिए प्रक्षेपण स्थल का चुनाव अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है। प्रक्षेपण स्थल का चुनाव करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा जाता है-
-
- प्रक्षेपण स्थल आबादी वाले क्षेत्रों से दूर या समुद्र तट के समीप होना चाहिए।
- प्रक्षेपण स्थल को भूमध्य रेखा के निकट रखा जाता है ताकि भू-समकालिक स्थानांतरण कक्षा में उपग्रह को प्रवेश कराने में कम ऊर्जा खर्च हो।
- चूँकि पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन करती है अतः उपग्रहों को पूर्व की तरफ प्रक्षेपित किया जाता है जिससे वे पृथ्वी की गति ग्रहण कर सकें। यदि उपग्रहों को पश्चिम की तरफ प्रक्षेपित किया जाए तो उपग्रहों को कक्षा में स्थापित करने में काफी अतिरिक्त ऊर्जा देनी पड़ेगी।
- प्रक्षेपण यान न्यूटन के गति के तीसरे नियम के आधार पर कार्य करते हैं। प्रक्षेपण यान में प्रणोदक (प्रक्षेपण यान का ईंधन) के दहन (ऑक्सिडेशन) द्वारा उत्पन्न गैसें नीचे की ओर गति करती हैं जिसकी प्रतिक्रिया में प्रक्षेपण यान ऊपर की ओर गति करता है।
- प्रणोदक के साथ ही प्रक्षेपण यान दहन के लिए आवश्यक ऑक्सीकरण एजेंट भी अपने साथ लेकर चलता है। प्रणोदक का चुनाव उनकी प्रति ईकाई द्रव्यमान ऊर्जा प्रदान करने की क्षमता, आयतन तथा संग्रहण व परिवहन की सुविधा के आधार पर किया जाता है।
- सामान्यतः द्रव प्रणोदक ठोस प्रणोदकों की अपेक्षा प्रति इकाई द्रव्यमान अधिक ऊर्जा प्रदान करते हैं। सामान्यतः प्रक्षेपण यान में एक से अधिक चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में भिन्न या समान ईंधन का प्रयोग किया जा सकता है। सबसे निचले चरण में प्रायः ठोस प्रणोदकों का प्रयोग किया जाता है।
- प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी में तकनीक का विकास मूलतः दो संदर्भो में देखा जाता है –
-
-
-
- रॉकेट कितनी ऊँचाई तक जाने में सक्षम है।
- रॉकेट कितने भारी उपग्रह को ढोने में सक्षम है।
- इसी दृष्टि से भारत की उपग्रह प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी के विकास को कुछ चरणों के माध्यम से विश्लेषित किया जा सकता है। उपग्रह के निर्माण की तरह उपग्रह का प्रक्षेपण भी एक कठिन और जटिल चुनौती है।
- आमतौर पर भारत को उपग्रह निर्माण में तो 80 के दशक से ही सफलता मिलनी शुरु हो गयी थी किन्तु प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी का वास्तविक विकास पिछले कुछ दशक में ही दिखता है। कभी-कभी तो उपग्रह के निर्माण में आने वाले खर्च से अधिक राशि भारत को प्रक्षेपण के लिए विदेशी एजेंसियों को देनी पड़ी है।
- ऐसी स्थिति में प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी का विकास न केवल विदेशी मुद्रा को बचाने के लिए आवश्यक है बल्कि इस तकनीक के विकास से विदेशी मुद्रा का अर्जन भी किया जा सकता है।
भारत के उपग्रह प्रक्षेपण यान विकास कार्यक्रम को चार चरणों में बाँटा जा सकता है –
1. SLV
2. ASLV
3. PSLV
4. GSLV
SLV विकास कार्यक्रम
- प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी के विकास का कार्यक्रम 1979 में विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र के निर्देशन में आरंभ हुआ। इसके अंतर्गत 1979 से 1983 तक 4 बार SLV का प्रक्षेपण किया गया, जिनमें पहला प्रयाग विफल रहा किन्तु शेष प्रयोग अंशतः या पूर्णतः सफल रहे। SLV चार चरणों वाला रॉकेट था।
- इसमें ठोस ईंधन का ही प्रयोग होता था। SLV का विकास, दूरी और भार क्षमता के दृष्टिकोण से तो महत्वपूर्ण नहीं था किन्तु इसने पहली बार प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी के भावी विकास की संभावनाओं को जन्म दिया।
- 1987 से 92 तक का समय प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी के विकास का काल है। इस दौर में ASLV के निर्माण के प्रयास किये गये। 1987-88 में ASLV-D1 तथा ASL-D2 के प्रक्षेपण के माध्यम से SROSS-I & II को भेजा गया, किन्तु ये दोनों प्रयास असफल रहे। (Stretched Rohini Satellite Series) .
- 1992 में इस विकास यात्रा का एक अति महत्वपूर्ण चरण सामने आया, जब ASLV-D3 प्रक्षेपण यान के माध्यम से सफलतापूर्वक SROSS-III उपग्रह को प्रक्षेपित किया गया।
- इस रॉकेट का निर्माण विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र द्वारा किया गया था। यह रॉकेट 150 किग्रा के उपग्रह को 100 किमी ऊँची कक्षा में स्थापित करने में सक्षम था। इस यान में 5 चरणों वाले रॉकेट का प्रयोग किया गया था, जो ठोस ईंधन से चलता था। इस प्रयोग की सफलता ने PSLV एवं GSLV के विकास के लिए महत्वपूर्ण संभावनाएँ पैदा की।
PSLV विकास कार्यक्रम
- उपग्रह प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी के विकास का उच्च स्तर PSLV के साथ शुरु हुआ, इससे संबंधित प्रयोग 1993 से शुरु हुए। PSLV के प्रक्षेपण का पहला प्रयास 1993 में PSLV-D-1 के रूप में किया गया किन्तु चौथे चरण में खराबी होने के कारण यह प्रयोग विफल रहा।
- 1994 में PSLV-D2 द्वारा IRS-P2 को सफलतापूर्वक ध्रवीय कक्षा में स्थापित किया गया। PSLV चार चरण वाला रॉकेट है जिसके पहले और तीसरे चरण में ठोस प्रणोदक HTPB (हाइड्रॉक्सिल टर्मिनेटेड पॉलीब्यूटाडाईन-बाउन्ड) तथा दूसरे व चौथे चरण में तरल प्रणोदक UDMH- (अनसिमेट्रीकल डाईमिथाईल हाइड्राजाइन) और MMH(मोनो मेथिल हाइड्रेजीन) का उपयोग किया जाता है, तरल प्रणोदक की ज्वलन क्षमता बेहतर होने तथा उसे किसी भी बिन्दु पर आसानी से नियंत्रित करने के कारण PSLV में इसका उपयोग होता है।
- तरल ईंधन को जलाने हेतु नाइट्रोजन के ऑक्साइड्स N2O4 और नाईट्रिक अम्ल का उपयोग ऑक्सीकारक के रूप में करते हैं।
PSLV प्रक्षेपण यान की विशेषताएँ -
ऊँचाई 44 मीटर
व्यास 2.8 मीटर
चरणों की संख्या 4
लिफ्ट ऑफ मास 320 टन (XL)
प्रथम उड़ान 20 सितम्बर, 1993
- PSLV 1750 किग्रा के पेलोड को सूर्य तुल्यकालिक ध्रुवीय कक्षा (SSPO) में 600 किमी की ऊँचाई पर स्थापित कर सकता है। PSLV को सतत रूप से आई.आर.एस. (I.R.S.) सीरीज के विभिन्न उपग्रहों को निम्न भू-कक्षा में स्थापित करने के कारण इसे “वर्कहोर्स ऑफ इसरो" की पदवी प्रदान की गई है।
- इसके अलावा उप-भूतुल्यकालिक स्थानांतरण कक्षा (Sub Geosynchronous Transfer Orbit) में यह 1425 किग्रा के उपग्रह को स्थापित कर सकता है।
- यह 1200 किलो वजनी उपग्रह के GTO कक्षा में स्थापित कर सकता है।
- यह 3800 किलो वजनी उपग्रह को निम्न भू-कक्षा (LEO) में स्थापित कर सकता है।
-
List of PSLV Launches
|
SN
|
Title
|
Launch Date
|
Launcher Type
|
Orbit
|
Payload(satellite)
|
|
|
50
|
PSLV-C48/RISAT-2BR1
|
Dec 11, 2019
|
PSLV-QL
|
|
RISAT-2BR1
|
|
|
49
|
PSLV-C47 / Cartosat-3 Mission
|
Nov 27, 2019
|
PSLV-XL
|
SSPO
|
Cartosat-3
|
|
|
48
|
PSLV-C46 Mission
|
May 22, 2019
|
PSLV-CA
|
|
RISAT-2B
|
|
|
47
|
PSLV-C45/EMISAT MISSION
|
Apr 01, 2019
|
PSLV-QL
|
|
EMISAT
|
|
|
46
|
PSLV-C44
|
Jan 24, 2019
|
PSLV-DL
|
SSPO
|
Microsat-R
|
|
|
45
|
PSLV-C43 / HysIS Mission
|
Nov 29, 2018
|
PSLV
|
SSPO
|
HysIS
|
|
|
44
|
PSLV-C42 Mission
|
Sep 16, 2018
|
PSLV
|
SSPO
|
|
|
|
43
|
PSLV-C41/IRNSS-1I
|
Apr 12, 2018
|
PSLV-XL
|
GSO
|
IRNSS-1I
|
|
|
42
|
PSLV-C40/Cartosat-2 Series Satellite Mission
|
Jan 12, 2018
|
PSLV-XL
|
SSPO
|
Cartosat-2 Series Satellite
|
|
|
41
|
PSLV-C39/IRNSS-1H Mission
|
Aug 31, 2017
|
PSLV-XL
|
|
IRNSS-1H
|
|
|
40
|
PSLV-C38 / Cartosat-2 Series Satellite
|
Jun 23, 2017
|
PSLV-XL
|
SSPO
|
Cartosat-2 Series Satellite
|
|
|
39
|
PSLV-C37 / Cartosat -2 Series Satellite
|
Feb 15, 2017
|
PSLV-XL
|
SSPO
|
Cartosat -2 Series Satellite
|
|
|
38
|
PSLV-C36 / RESOURCESAT-2A
|
Dec 07, 2016
|
PSLV-XL
|
SSPO
|
RESOURCESAT-2A
|
|
|
37
|
PSLV-C35 / SCATSAT-1
|
Sep 26, 2016
|
PSLV
|
SSPO
|
SCATSAT-1
|
|
|
36
|
PSLV-C34 / CARTOSAT-2 Series Satellite
|
Jun 22, 2016
|
PSLV-XL
|
SSPO
|
CARTOSAT-2 Series Satellite
|
|
|
35
|
PSLV-C33/IRNSS-1G
|
Apr 28, 2016
|
PSLV-XL
|
GTO
|
IRNSS-1G
|
|
|
34
|
PSLV-C32/IRNSS-1F
|
Mar 10, 2016
|
PSLV-XL
|
GTO
|
IRNSS-1F
|
|
|
33
|
PSLV-C31/IRNSS-1E
|
Jan 20, 2016
|
PSLV-XL
|
GTO
|
IRNSS-1E
|
|
|
32
|
PSLV-C29 / TeLEOS-1 Mission
|
Dec 16, 2015
|
PSLV-CA
|
LEO
|
|
|
|
31
|
PSLV-C30/AstroSat MISSION
|
Sep 28, 2015
|
PSLV-XL
|
LEO
|
Astrosat
|
|
|
30
|
PSLV-C28 / DMC3 Mission
|
Jul 10, 2015
|
PSLV-XL
|
LEO
|
|
|
|
29
|
PSLV-C27/IRNSS-1D
|
Mar 28, 2015
|
PSLV-XL
|
GTO
|
IRNSS-1D
|
|
|
28
|
PSLV-C26/IRNSS-1C
|
Oct 16, 2014
|
PSLV-XL
|
GTO
|
IRNSS-1C
|
|
|
27
|
PSLV-C23
|
Jun 30, 2014
|
PSLV-CA
|
SSPO
|
|
|
|
26
|
PSLV-C24/IRNSS-1B
|
Apr 04, 2014
|
PSLV-XL
|
GTO
|
IRNSS-1B
|
|
|
25
|
PSLV-C25
|
Nov 05, 2013
|
PSLV-XL
|
HEO
|
Mars Orbiter Mission Spacecraft
|
|
|
24
|
PSLV-C22/IRNSS-1A
|
Jul 01, 2013
|
PSLV-XL
|
GTO
|
IRNSS-1A
|
|
|
23
|
PSLV-C20/SARAL
|
Feb 25, 2013
|
PSLV-CA
|
SSPO
|
SARAL
|
|
|
22
|
PSLV-C21
|
Sep 09, 2012
|
PSLV-CA
|
SSPO
|
|
|
|
21
|
PSLV-C19/RISAT-1
|
Apr 26, 2012
|
PSLV-XL
|
SSPO
|
RISAT-1
|
|
|
20
|
PSLV-C18/Megha-Tropiques
|
Oct 12, 2011
|
PSLV-CA
|
SSPO
|
Megha-Tropiques
|
|
|
19
|
PSLV-C17/GSAT-12
|
Jul 15, 2011
|
PSLV-XL
|
GTO
|
GSAT-12
|
|
|
18
|
PSLV-C16/RESOURCESAT-2
|
Apr 20, 2011
|
PSLV-G
|
SSPO
|
RESOURCESAT-2
YOUTHSAT
|
|
|
17
|
PSLV-C15/CARTOSAT-2B
|
Jul 12, 2010
|
PSLV-CA
|
SSPO
|
CARTOSAT-2B
|
|
|
16
|
PSLV-C14 / OCEANSAT-2
|
Sep 23, 2009
|
PSLV-CA
|
SSPO
|
Oceansat-2
|
|
|
15
|
PSLV-C12 / RISAT-2
|
Apr 20, 2009
|
PSLV-CA
|
SSPO
|
RISAT-2
|
|
|
14
|
PSLV-C11
|
Oct 22, 2008
|
PSLV-XL
|
Lunar
|
Chandrayaan-1
|
|
|
13
|
PSLV-C9 / CARTOSAT – 2A
|
Apr 28, 2008
|
PSLV-CA
|
SSPO
|
CARTOSAT – 2A
IMS-1
|
|
|
12
|
PSLV-C10
|
Jan 21, 2008
|
PSLV-CA
|
HEO
|
|
|
|
11
|
PSLV-C8
|
Apr 23, 2007
|
PSLV-CA
|
LEO
|
|
|
|
10
|
PSLV-C7 / CARTOSAT-2 / SRE-1
|
Jan 10, 2007
|
PSLV-G
|
SSPO
|
CARTOSAT-2
SRE-1
|
|
|
9
|
PSLV-C6/CARTOSAT-1/HAMSAT
|
May 05, 2005
|
PSLV-G
|
SSPO
|
CARTOSAT-1
HAMSAT
|
|
|
8
|
PSLV-C5 /RESOURCESAT-1
|
Oct 17, 2003
|
PSLV-G
|
SSPO
|
IRS-P6 / RESOURCESAT-1
|
|
|
7
|
PSLV-C4 /KALPANA-1
|
Sep 12, 2002
|
PSLV-G
|
GTO
|
KALPANA-1
|
|
|
6
|
PSLV-C3 / TES
|
Oct 22, 2001
|
PSLV-G
|
SSPO
|
The Technology Experiment Satellite (TES)
|
|
|
5
|
PSLV-C2/IRS-P4
|
May 26, 1999
|
PSLV-G
|
SSPO
|
Oceansat(IRS-P4)
|
|
|
4
|
PSLV-C1 / IRS-1D
|
Sep 29, 1997
|
PSLV-G
|
SSPO
|
IRS-1D
|
|
|
3
|
PSLV-D3 / IRS-P3
|
Mar 21, 1996
|
PSLV-G
|
SSPO
|
IRS-P3
|
|
|
2
|
PSLV-D2
|
Oct 15, 1994
|
PSLV-G
|
SSPO
|
IRS-P2
|
|
|
1
|
PSLV-D1
|
Sep 20, 1993
|
PSLV-G
|
SSPO
|
|
|
PSLV के विभिन्न संस्करण-
1. PSLV-G (जेनेरिक)- यह 1550 किलो के पेलोड को 600 किलो मीटर की ऊँचाई तक निम्न भू-कक्षा (LEO) में स्थापित कर सकता है। इसमें स्ट्रेप ऑन मॉटर्स लगी रहती है।
2. PSLV-CA(Core Alone)- इसमें स्ट्रेप ऑन मॉटर्स का प्रयोग नहीं किया जाता है। इसकी क्षमता कम होती है।
3. PSLV-XL (Extra Large)- इसमें स्ट्रेप-ऑन मोटर्स का प्रयोग होता है।
यह 1750 किलो वजनी उपग्रह को LEO में तथा हल्के उपग्रहों के GTO में प्रक्षेपित कर सकता है। इसी से चन्द्रयान-1 और मंगलयान मिशन भेजे गये थे।
GSLV विकास कार्यक्रम
वाहन की विशेषताएं
|
ऊंचाई
|
: 49.13 मी
|
|
चरणों की संख्या
|
: 3
|
|
उत्थापन द्रव्यमान
|
: 414.75 टन
|
|
पहली उड़ान
|
: अप्रैल 18, 2001
|
· भारत के प्रक्षेपण यान कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण चरण GSLV (Geosynchronouns satellite launch vehicle) कहलाता है।
· वर्तमान में GSLV श्रृंखला का GSLV-MK II प्रयोग में लिया जा सकता है।
· यह चौथी पीढ़ी का लाँच व्हीकल है, जिसमें तीन चरण है।
· इसमें स्वदेश निर्मित क्रायोजेनिक ईंजन का प्रयोग किया गया है।
· यह एक ऐसा रॉकेट है, जो 2500 किग्रा वजन वाले उपग्रह को भू-स्थैतिक कक्षा में स्थापित करता है। यह कक्षा पृथ्वी से 36,000 किमी की ऊँचाई पर अवस्थित है। इसके अलावा GSLV 5 टन वजन वाले उपग्रह या विभिन्न उपग्रहों को निम्न भू-कक्षा में स्थापित कर सकता है।
· यह रॉकेट तीन चरणों का होता है, जो इस प्रकार हैं:
(क) पहले चरण में ठोस प्रणोदक का प्रयोग किया जाता है। यह चरण PSLV के प्रथम चरण के समान है। इसमें प्रयुक्त होने वाला ईंधन HTBP है।
(ख) इसका दूसरा चरण PSLV के दूसरे चरण पर आधारित है। जिसमें UDMH तथा N204 जैसे तरल प्रणोदक का प्रयोग किया जाता है। इस चरण में विकास ईंजन का रहा है।
(ग) इसका तीसरा चरण सबसे महत्वपूर्ण और जटिल है। इसमें प्रयुक्त होने वाली तकनीक को क्रायोजेनिक तकनीक कहते हैं। क्रायोजेनिक इंजन का अर्थ है अति निम्न ताप पर काम करने वाला इंजन।
- यह इंजन उपग्रह को भू-स्थैतिक कक्षा तक पहुँचाता है और इसमें द्रव हाइड्रोजन तथा द्रव ऑक्सीजन जैसे ईंधनों का प्रयोग किया जाता है। द्रव के रूप में परिवर्तित करने के लिए हाइड्रोजन गैस को -253°C तथा ऑक्सीजन को –183°C के तापमान पर लाना होता है।
- इसके अतिरिक्त कार्य करते समय इस इंजन से इतनी अधिक तापीय ऊर्जा निकलती है कि इंजन के भीतर का तापमान 2000°C के आसपास पहुँच जाता है। हाइड्रोजन के विस्फोटक होने के कारण यह खतरा और अधिक बढ़ जाता है। इसके अलावा अति तीव्र गति की जरूरत होने के कारण इस इंजन को एक ऐसे थर्मो पंप की आवश्यकता होती है, जो अति तीव्र गति से घूम सके, इन तकनीकी जटिलताओं के बावजूद भारत ने स्वदेशी क्रायोजैनिक ईंजन का निर्माण कर लिया है।
- इससे पहले भारत अपने प्रक्षेपण यान GSLV के क्रायोजेनिक इंजन के लिए रूस पर निर्भर था, रूस द्वारा प्रदान किये गये 7 क्रायोजेनिक इंजन में से 6 का उपयोग इसरो द्वारा किया जा चुका था। इसलिए विदेशी निर्भरता को समाप्त करने की दिशा में भी स्वदेशी क्रायोजेनिक ईंजन का विकास विशिष्ट महत्व रखता है।
क्रायोजेनिक इंजन का विकास
- भारत द्वारा रूस के साथ क्रायोजेनिक इंजन तथा इसकी तकनीक की आपूर्ति के लिए समझौता किया गया था। किन्तु अमेरिका के दबाव के कारण रूस ने केवल इंजनों की आपूर्ति की अमेरिका का तर्क यह था कि यह एक द्वैध प्रयुक्त तकनीक (Dual Use Technology) है, अर्थात् इसका प्रयोग उपग्रह प्रक्षेपण के साथ-साथ अंतरमहाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्र निर्माण के लिए भी किया जा सकता है।
- ऐसी स्थिति में भारत ने स्वयं इस तकनीक को विकसित करने का फैसला किया, तथा इस कार्यक्रम का नाम C.U.S.P. (Cryogenic Upper State Programme) रखा गया। भारत ने अपना क्रायोजेनिक अपर स्टेज कार्यक्रम विकसित करके 18 फरवरी, 2000 को परीक्षण भी कर दिया, परन्तु परीक्षण असफल रहा।
- 'क्रायोजेनिक इंजन' का 9 फरवरी, 2002 को महेन्द्रगिरि स्थित 'लिक्विड प्रोपल्शन सिस्टम्स सेंटर' में सफल परीक्षण किया गया। जबकि अप्रैल 2010 एवं दिसम्बर 2010 में किये गये जीएसएलवी के प्रक्षेपण असफल रहे। किन्तु जनवरी, 2014 में स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन वाले GSLV D-5 रॉकेट ने जीसेट-14 संचार उपग्रह को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया।
- भारत के अलावा यू.एस.ए., रूस, जापान, चीन एवं यूरोप के पास अपना क्रायोजेनिक इंजन है। अब GSLV मार्क III (LVM3) नामक आधुनिकतम GSLV का विकास किया गया है, जिससे 5 टन तक वजन वाले उपग्रहों को भू-तुल्यकालिक कक्षा (GTO) कक्षा में भेजा जा सकेगा।
GSLV के विभिन्न संस्करण-
GSLV-MK-II
· GSLV के इस संस्करण में, प्रथम स्वदेशी क्रायोजेनिक ईंधन CE-7.5 का उपयोग किया गया है।
यह रॉकेट वर्तमान में ऑपरेशनल है।
· यह रॉकेट 2500 किलो वजनी उपग्रह को GTO कक्षामें तथा 5000 किलो वजनी उपग्रहों को LEO (निम्न भू-कक्षा) में स्थापित करने में सक्षम है।
· इस रॉकेट की द्वितीय अवस्था में विकास ईंजन का प्रयोग किया गया है।
List of GSLV Launches
|
SN
|
Title
|
Launch Date
|
Launcher Type
|
Orbit
|
Payload(Satellite)
|
|
|
13
|
GSLV-F11 / GSAT-7A Mission
|
Dec 19, 2018
|
GSLV
|
|
GSAT-7A
|
|
|
12
|
GSLV-F08/GSAT-6A Mission
|
Mar 29, 2018
|
GSLV
|
GSO
|
GSAT-6A
|
|
|
11
|
GSLV-F09 / GSAT-9
|
May 05, 2017
|
GSLV
|
GSO
|
GSAT-9
|
|
|
10
|
GSLV-F05 / INSAT-3DR
|
Sep 08, 2016
|
GSLV-MK-II
|
GTO
|
INSAT-3DR
|
|
|
9
|
GSLV-D6
|
Aug 27, 2015
|
GSLV-MK-II
|
GTO
|
GSAT-6
|
|
|
8
|
GSLV-D5/GSAT-14
|
Jan 05, 2014
|
GSLV-MK-II
|
GTO
|
GSAT-14
|
|
|
7
|
GSLV-F06 / GSAT-5P
|
Dec 25, 2010
|
GSLV-MK-II
|
GTO
|
GSAT-5P
|
|
|
6
|
GSLV-D3 / GSAT-4
|
Apr 15, 2010
|
GSLV-MK-II
|
|
GSAT-4
|
|
|
5
|
GSLV-F04 / INSAT-4CR
|
Sep 02, 2007
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GSLV-MK-II
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GTO
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INSAT-4CR
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4
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GSLV-F02 / INSAT-4C
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Jul 10, 2006
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GSLV-MK-II
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GTO
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INSAT-4C
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3
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GSLV-F01 / EDUSAT(GSAT-3)
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Sep 20, 2004
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GSLV-MK-II
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GTO
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EDUSAT
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2
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GSLV-D2 / GSAT-2
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May 08, 2003
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GSLV-MK-II
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GTO
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GSAT-2
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1
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GSLV-D1 / GSAT-1
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Apr 18, 2001
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GSLV-MK-II
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GTO
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GSAT-1
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GSLV-MK III-
- यह GSLV के पूर्ववर्ती संस्करणों से पूर्णत: भिन्न रॉकेट है। यह एक नवीन लॉन्च व्हीकल है।
- यह तीन अवस्थाओं- 2 सॉलिड स्ट्रेप-ऑन, 1 कोर लिक्विड बूस्टर और एक क्रायोजेनिक अपर स्टेज-वाला रॉकेट है।
- यह 4 टन वजनी उपग्रह को ‘निम्न भू-कक्षा (LEO) में प्रक्षेपित करने में सक्षम है।’
- इसने प्रथम विकासात्मक उड़ान GSLV-MK III –D1 जून 2017 में भरी। इसने GSAT-19 उपग्रह को GTO कक्षा में स्थापित किया।
- 22 जुलाई, 2019 को GSLV-MK III द्वारा चन्द्रयान-II की सफल लॉचिंग की गई।
- इसकी ऊँचाई 43.43 मीटर व्यास 4 मीटर तथा टेक-ऑफ वजन 640 टन है।
- GSLV-MK III की सभी उड़ाने सफल रही है।
GSLV Mk III Launches Till Date - By ISRO
स्क्रेम जेट ईँजन –
- क्रायोजेनिक ईंजन में द्रव O2 भारत अधिक होने के कारण यान की क्षमता पर प्रभाव पड़ा रहा है, जिसे ठीक करने हेतु स्क्रेमजेट ईंजन का विकास किया गया। यह ईंजन अपनी उड़ान के दौरान वायुमंडलीय ऑक्सीजन का प्रयोग ऑक्सीकरक के रूप में कर सकता है।
पुनरुपयोगी प्रक्षेपण यान (Reusable Launch Vehicle)
- पुनरुपयोगी प्रक्षेपण यान से अभिप्राय ऐसे प्रक्षेपण यान से है जिसे अंतरिक्ष में कार्य पूरा कर लेने के बाद पुनः सफलतापूर्वक पृथ्वी पर उतारा जा सकता है। यह आर्थिक दृष्टि से कम खर्चीला है क्योंकि मशीन पर बार-बार खर्च करने व उसके निर्माण की आवश्यकता नहीं रह जाती है।
- इसके द्वारा सस्ती अंतरिक्ष परिवहन प्रणाली का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है। इसरो की यह महत्वाकांक्षी परियोजना है तथा पहले Reusable Launch Vehicle - Technology Demonstration (RLV-TD) का इंजीनियरिंग मॉडल विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर, तिरुवनंतपुरम में तैयार कर लिया गया है। RLV – TD का सफलतापूर्वक परीक्षण 23 मई, 2016 को SDSC श्रीहरिकोटा से किया जा चुका है।
- पुनरुपयोगी प्रक्षेपण यान की परीक्षण तकनीक यह होगी कि इसे एक उपग्रह प्रक्षेपण यान के जरिए अंतरिक्ष में ले जाया जायेगा एवं उपग्रह प्रक्षेपण यान से अलग होकर यह उड़ान भरेगा। इसके बाद जब यह पृथ्वी के वायुमण्डल में प्रवेश करेगा तो इस पर लगे पैराशूट इसकी गति को नियंत्रित करते हुए इसे वापस पृथ्वी पर उतार लाएंगी।
स्पेस कैप्सूल रिकवरी एक्सपेरिमेंट [(Space Capsule Recovery Experiment (SRE-1)]
- पुनर्प्रवेशी तकनीक पर आधारित इस कैप्सूल उपग्रह को इसरो द्वारा 10 जनवरी, 2007 को PSLV-C7 के माध्यम से अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया। दो प्रयोगात्मक पेलोड आइसोथर्मल हीटिंग फर्नेस व बायोमिमेटिक उस उपग्रह के साथ भेजे गये थे, जिनमें से पहला धातु संबंधी प्रयोगों से जुड़ा है और दूसरा बायोमिमेटिक संश्लेषण से संबंधित है।
- सूक्ष्म गुरुत्वीय पेलोड के अलावा वायु तापीय संरचना, गति मंदक, अंतरिक्ष प्लेटफार्म व इसे तैरने योग्य बनाने वाले यंत्र जैसे उपकरण इस कैप्सूल उपग्रह में लगाये गये थे। इसके अंदर लगाये सभी तरह के उपकरणों के कार्य व क्षमता प्रदर्शन को मापने के लिए सेंसर लगे हुए थे।
- सूक्ष्म गुरुत्वीय दशाओं में अनुसंधान व प्रयोग हेतु इसे अंतरिक्ष में भेजा गया था। जब यह वापस पृथ्वी की ओर आने के लिए तैयार हुआ तो डीबूस्ट रॉकेट व पैराशूट की सहायता से यह कुशलतापूर्वक श्रीहरिकोटा के समीप बंगाल की खाड़ी में उतरा।
- फ्लोटेशन सिस्टम के द्वारा यह पानी की सतह पर रहा तथा इसे सुरक्षित तरीके से बाहर ले आया गया। SRE 1 के सफल प्रक्षेपण के साथ उसे वापस लाने के पश्चात् अमरीका, रूस व चीन के पश्चात् भारत चौथा देश है जिसके पास यह प्रौद्योगिकी है।
- भारत इस प्रयोग से प्रेरित होकर भविष्य में और अधिक उन्नत कैप्सूल उपग्रह विकसित करेगा। इससे न सिर्फ पुनरुपयोगी प्रक्षेपण यान बनाने के लिए प्रेरणा मिलेगी अपितु अंतरिक्ष में परिवहन और पर्यटन की दुनिया बसाने के लिए भी मार्ग प्रशस्त होगा।
- इसे Air breathing engine भी कहते है। भारत विश्व का चौथा देश है, जिसने स्क्रेमजेट-टैकनोलॉजी डेमोन्ट्रेटर परीक्षण किया है। यह सुपरसेनिक स्पीड पर सफल कार्य कर सकता है।
ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS - Global Positioning System)
- ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम एक अत्याधुनिक तकनीक है, जिसके द्वारा भू-सर्वेक्षण करने, मानचित्र तैयार करने, वैज्ञानिक शोध करने व किसी वस्तु की सटीक अवस्थिति ज्ञात करने में सहायता प्राप्त की जाती है। यह प्रणाली उपग्रह की सहायता से कार्य करती है। अमेरिकी प्रणाली को GPS, यूरोप की प्रणाली को गैलीलियो, रूस की प्रणाली को ग्लोनास तथा चीन की प्रणाली को कम्पास या बाइदू कहा जाता है।
- वैश्विक अवस्थापन प्रणाली के मुख्य रूप से तीन घटक हैं (i) अंतरिक्ष संबंधी (ii) नियंत्रण संबंधी और (iii) उपयोग संबंधी।
- अंतरिक्ष संबंधी घटक से अभिप्राय उपग्रहों के अवस्थापन से है। उपग्रहों को उचित कोण पर मध्य भू-कक्षा में स्थापित किया जाता है। इसका औसत कोण 55° है। उपग्रहों द्वारा भेजी गयी सूचनाओं को संग्रहित करने व नियंत्रित करने के लिए पृथ्वी पर पार्थिव नियंत्रण नेटवर्क अथवा निगरानी केन्द्र स्थापित किया जाता है। ये केन्द्र सूचना संग्रहण का कार्य करते हैं। जैसे यूएसए के निगरानी केन्द्र हवाई द्वीप तथा डियागो गार्सिया में स्थापित हैं।
- एण्टीना, घड़ी व प्रोसेसर युक्त जीपीएस संग्राहकों द्वारा प्राप्त सूचना का उपयोग भूगणितीय मानचित्रण, सेना की अवस्थिति, आँकड़ा संग्रहण, नौवहन संबंधी गतिविधियों व सर्वेक्षण तथा मानचित्रण में होता है। संक्षेप में, इसका उपयोग स्थलीय, जलीय व वायवीय तीनों अनुप्रयोगों में होता है।
- नोट- नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम के निर्माण हेतु न्यूनतम 4 उपग्रहों की आवश्यकता होती है, जो अक्षांश, देशान्तर, समुन्द्र तल की ऊँचाई तथा समय की सटीक जानकारी उपलब्ध करवा सकें।
भारतीय क्षेत्रीय नौसंचालन उपग्रह प्रणाली (IRNSS)
अमरीकी जीपीएस प्रणाली पर निर्भरता कम करने के लिए इसरो द्वारा एक क्षेत्रीय नेवीगेशन उपग्रह प्रणाली तंत्र है। यह प्रणाली दक्षिण एशिया पर लक्षित होगी और इसे इस प्रकार तैयार किया गया है कि यह देश के भीतर और इसकी सीमा से 1500 किमी तक की दूरी के क्षेत्र में प्रयोगकर्ताओं को सटीक जानकारी उपलब्ध करा सके। यह प्रणाली सभी मौसमों में सटीकता के साथ उत्तम स्थिति प्रदान करेगा।
इस प्रकार के कुछ प्रमुख उपयोग हैं-
स्थलीय, हवाई और समुद्री नेवीगेशन, आपदा प्रबंधन, वाहन ट्रैकिंग, मानचित्रण, पर्वतारोहियों और यात्रियों के लिए दिशा सूचनाएँ, चालकों के लिए ध्वनि एवं दृश्य संबंधी सूचनाएँ
• मोबाइल फोन के साथ एकीकरण
• सटीक समय (Precise Timing), सटीक लोकेशन की जानकारी आदि।
IRNSS/NavIC (Navigatino with Indian Constellation) –
- इस प्रणाली के संचालन हेतु वर्तमान में 8 उपग्रह कार्यशील हैं। इनमें से 3 उपग्रह भू-स्थैतिक कक्षा में तथा शेष उपग्रह भू-तुल्यकालिक कक्षा में घूम रहे है।
- IRNSS को NavIC नाम दिया गया है। 2018 से यह कार्यशील है।
- आम जनता को यह 1 मीटर तक की सटीक जानकारी और कूट उपयोग(सैन्य) के लिए 10 सेमी तक की सटीक जानकारी नाविक उपलब्ध करा सकता है।
- भारत में सभी वाणिज्यिक वाहनों के लिए नाविक आधारित ट्रेकर अनिवार्य कर दिये गये है। (1 अप्रैल, 2019 से)
- 2020(जनवरी) में ISRO और चिप निर्माता क्वालकॉम के मध्य हुए एक समझौते के तहत नाविक आधारित चिप वाले मोबाइल फोन आम नागरिकों के शीघ्र मिल सकेंगे।
- नाविक दो प्रकार की सेवाएँ प्रदान करेगा-
- स्टैण्डर्ड पोजिशनिंग सर्विस (SPS)
- रेस्ट्रिक्टेड सर्विस (RS)
QZSS-Quasi Zenith Satellite System-
- भारत के NavIc की भाँति यह जापान की क्षेत्रीय नेविगेशन प्रणाली है।
- यह जापान और उसके आसपास के क्षेत्रों में नेविगेशन में सहायता करती है।
गगन(GAGAN-GPS Aided GEO Augmented Navigation)
- यह एक SBAS(Space Based Augmentation System) प्रणाली है, जिसका विकास ISRO और भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने संयुक्त रूप से किया।
- GPS प्रणाली अन्तर्राष्ट्रीय नागरिक उड्यन संगठन(ICAO) के मानकों के अनुसार सटीक सही और गहन जानकारी उपलब्ध नहीं करा पाता है।
- GAGAN विभिन्न उपग्रहों और ग्राउण्ड स्टेशनों की मदद से GPS सिग्नलों को सही करना और लोकेशन पोजिशन की सटीक जानकारी प्रदान करता है।
- तीन भू-स्थैतिक उपग्रह GSAT- 8,10,&15 GAGAN प्रणाली को सपोर्ट कर रहे हैं।
- GAGAN अन्तर्राष्ट्रीय SBAS प्रणालीयों के संगत है। जैसे USA का WAAS प्रणाली, जापान की MSAS प्रणाली आदि।
- GAGAN प्रणाली के अन्य अनुप्रयोग-
- वन्य संसाधनो के प्रबन्धन और वनों की निगरानी हेतु।
- रियल टाईम ट्राफिक मैनेजमेंट हेतु, ताकि रोड़ जाम को टाला जा सके।
- राष्ट्रीय राजमार्गों हेतु रोड़ एसेट मैनेजमेंट सिस्टम (RAMS) के निर्माण हेतु ।
- रेलवे हेतु एंटीकोलीजन डिवाइस (ACD) तथा ट्रेन कोलीजन अवोइडेंस सिस्टम के निर्माण हेतु।
- GEMINI- Gagan Enabled Mariner’s Instrament for Navigation & Information-
- यह प्रणाली मुख्य रूप ही समुन्द्री क्षेत्रों में आपदा संबंधी चेतावनी जारी करने ओर नेविगेशन में सहायता करती है।
- यह प्रणाली 300 नॉटिकल मील के क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क की अनुपस्थिति में भी मधुआरों को उनके मोबाइल पर आपदा की चेतावनी दे सकता है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान के प्रमुख पड़ाव
(Major Stages of Indian Space Research
चन्द्रयान-1 परियोजना (Chandrayan-1Project)
- इसरो ने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को एक नई दिशा देते हुए 22 अक्टूबर, 2008 को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से PSLV-C11 के जरिए चन्द्रयान-1 को पृथ्वी की भू-स्थैतिक कक्षा में स्थापित किया।
- इस उपलब्धि के साथ ही अमरीका, रूस, यूरोप, जापान व चीन के बाद भारत छठा देश हो गया, जिसने चन्द्रमा की सतह के अध्ययन के लिए अभियान संचालित किया है। बंगलुरू स्थित 'स्पेसक्राफ्ट कंट्रोल सेण्टर' द्वारा 5 बार ऊपरी कक्षाओं में स्थानांतरित किये जाने के बाद चन्द्रयान-1 ने चन्द्रमा की कक्षा में प्रवेश किया।
- 12 नवम्बर, 2008 को यह अपनी निर्धारित कक्षा में पहुँच गया, जहाँ से चन्द्रमा का निकटस्थ बिन्दु 100 किमी तथा दूरस्थ बिन्दु मात्र 182 किमी है। चन्द्रयान-1 के साथ गये उपकरण 'मून इंपेक्ट प्रोब' ने भारतीय राष्ट्रीय झंडे 'तिरंगे' को चन्द्रमा पर उपस्थिति दर्ज करायी।
- चन्द्रयान-1 अपने साथ 11 उपकरणों को लेकर गया, जिसमें 5 इसरो के, 2 नासा के, 3 यूरोपीय स्पेस एजेंसी के तथा एक बुल्गारिया का था।
- यह अभियान 2 वर्षों के लिए था, लेकिन 29 अगस्त, 2009 को सम्पर्क टूट जाने का कारण यह 312 दिनों में ही समाप्त हो गया। फिर भी वैज्ञानिकों ने इस अभियान को एक सफल अभियान करार दिया है।
- इस अभियान में भेजे गये मून इंपैक्ट प्रौब द्वारा चन्द्रमा की सतह पर जल की उपलब्धता का पता लगाया जाना, चन्द्रमा की सतह का त्रिआयामी मानचित्रण, ट्यूबूलर संरचनाओं की उपस्थिति को खोज, चन्द्रमा पर विद्यमान खनिज सामग्री व अन्य आँकड़ों से संबंधित जानकारी देने के संदर्भ में इसे एक सफल योजना कहा जा सकता है।
मेघा-ट्रॉपिक परियोजना (Megha-Tropiques Projects)
- मेघा-ट्रॉपिक परियोजना इसरो तथा फ्रांस की अंतरिक्ष एजेंसी, सी.एन.ई.एस. (CNES) की संयुक्त परियोजना है। 'मेघा' तथा 'ट्रॉपिक्स' शब्द का अर्थ क्रमशः बादल तथा उष्णकटिबंध है। 500 किग्रा भार वाले इस उपग्रह के लिए भारत व फ्रांस के बीच 2004-05 में हस्ताक्षर हुए।
- उपग्रह द्वारा बादलों के भौतिक गुणों तथा संवहनीय प्रक्रियाओं के अध्ययन के साथ-साथ महासागरों एवं पृथ्वी के ऊपर जलवाष्प और वर्षा प्रतिरूप का भी अध्ययन किया जायेगा। इसके अलावा मानसून व विकिरण बजट के अध्ययन में भी इससे सहायता मिलेगी।
- उपग्रह में एक MADRAS (microwave Analysis and Detection of Rain and Atmospheric Structures), एक छः चैनल का Humidity Sounder तथा विकिरण बजट मापन के लिए चार चैनल के स्केनर (Scanner for Radiation Budget Measurement - SCARAB) का प्रयोग किया गया है।
जुगनू (Jugnu)
- यह लगभग 3 किलो का बहुत ही छोटा उपग्रह है जिसका निर्माण भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर द्वारा किया गया है। इस उपग्रह को पीएसएलवी-सी18 के जरिए 12 अक्टूबर, 2011 को मेघा ट्रॉपिक्स के साथ श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से कक्षा में स्थापित किया गया। इसका उपयोग बाढ़, आपदा, सूखा व दूरसंचार के अध्ययन के लिए किया जा रहा है।
आदित्य L-1-
- सौर मिशन 'आदित्य' (Aditya) L-1 - भारत के सफल चन्द्रयान-1 मिशन के बाद से ही इसरो सूर्य अभियान 'आदित्य'L-1 की तैयारी कर रहा है। इसरो वैज्ञानिक सूर्य के बाहरी क्षेत्र 'कोरोना' के अध्ययन के लिए आदित्य नामक अंतरिक्ष यान करो डिजाइन कर रहे हैं। लैंग्रेजियन बिन्दु पर सूर्य और पृथ्वी का परिणामी गुरूत्वाकर्षण शून्य होता है। उसे शीघ्र ही PSLV-xL रॉकेट से लाँच किया जायेगा।
- हालांकि सोलर कोरोना का अध्ययन करना ही आदित्य-L1 का मुख्य उद्देश्य है लेकिन इसकी मदद से यह भी पता लगाया जायेगा कि सोलर मैक्सिस के दौरान सूर्य से कौन सी गैसों का उत्सर्जन होता है तथा वायुमंडल पर इनका क्या प्रभाव पड़ता है।
- आदित्य-L1 मिशन के तहत 400 किलो वजनी उपग्रह को पृथ्वी से 15 लाख किमी की दूरी पर स्थित ‘लैंग्रेजियन प्वाइंट1’(L1) के चारों ओर स्थित Halo orbit (हेलो ऑर्बिट) में स्थापित किया जायेगा।
- इससे यह उपग्रह सूर्यग्रहण आदि से बचते हुए निरन्तर सूर्य का अध्ययन कर सकेगा।
- नासा ने भी ‘पार्कर सोलर प्रोब नामक मिशन सूर्य के कोरोना के अध्ययन हेतु भेजा था’
इसरो का मंगल अभियान (ISRO'S Mars Mission)
- PSLV-C25(XLवर्जन) द्वारा 5 नवम्बर, 2013 को मंगलयान सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र, श्रीहरिकोटा से अपनी यात्रा पर रवाना किया गया। GSLV की भारवहन क्षमता PSLV से अधिक है परन्तु अधिक विश्वसनीय होने के कारण PSLV का चयन किया गया।
- न्यूनतम ऊर्जा मे प्रक्षेपण के लिए मंगल की ओर प्रक्षेपण लगभग 780 दिनों के अंतर से आता है। इसरो के मंगलयान का तकनीकी उद्देश्य मंगल ग्रह तक की यात्रा में सक्षम तकनीकों में सफलता प्राप्त करना, कखा अंतरण तकनीक, गहन अंतरिक्ष संचार तथा आपातकालीन स्थितियों के लिए स्वचालित प्रणालियों का विकास व प्रदर्शन करना है।
- इसका वैज्ञानिक उद्देश्य मंगल की सतह, आकृति, खनिज तथा मंगल के वायुमण्डल का देश में विकसित उपकरणों से विश्लेषण करना है।
- 5 नवम्बर के प्रक्षेपण के बाद 1 दिसम्बर तक मंगलयान पृथ्वी के चक्कर लगाता रहा। इस दौरान मंगलयान को क्रमशः ऊँची कक्षा में स्थापित किया जाता रहा (6 चरणे में) ताकि पृथ्वी के गुरुत्व का अनुकूलतम प्रयोग कर मंगलयान पलायन वेग प्राप्त कर सके। 31 दिसम्बर की मध्यरात्रि मंगलयान को मार्स ट्रासफर ट्रेजेक्टरी में प्रविष्ट करा दिया गया। नौ महीने से अधिक की यात्रा के बाद 24 सितम्बर, 2014 को यह मंगल की कक्षा में स्थापित हो गया।
- मंगलयान अपने साथ मंगल ग्रह पर मीथेन की मात्रा मापने के लिए मीथेन सेंसर (संवेदक), मंगल ग्रह का तापमान तथा उत्सर्जकता मापकर उसके सहारे मंगल ग्रह की खनिज संरचना का पता लगाने के लिए थर्मल इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोमीटर, मंगल के ऊपरी वातावरण में ड्यूटीरियम तथा हाइड्रोजन की मात्रा मापने के लिए ल्यूमैन अल्फा फोटोमीटर, बहिर्मण्डल में अनावेशित कण संरचना के विश्लेषण के लिए मार्स एक्सोस्फीयरिक न्यूट्रल कम्पोजीशन एनालाइजर तथा मार्स के मौसम व घटनाओं पर नजर रखने के लिए मार्स कलर कैमरा आदि उपकरण ले गया है।
- मंगलयान मिशन को सफलता तक पहुँचाने वाली इसरो विश्व की चौथी अंतरिक्ष एजेंसी है अब तक अमेरिका, रूस और यूरोपीय संघ ही मंगल पर सफलतापूर्वक मिशन भेजने में सफल रहे हैं।
- इनके साथ भारत विश्व का चौथा और एशिया का पहला देश बन गया है। भारत पहले ही प्रयास में ऐसा इतिहास रचने वाला विश्व का पहला देश है।
भुवन (Bhuvan)-
- 'भुवन' इसरो की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है, जिसमें भारतीय भू-भाग के त्रिविमीय (3D) चित्रों को इंटरनेट पर देखा जा सकेगा (यह 2D में भी उपलब्ध है)। इसमें विभिन्न तरह से भारतीय सतह के चित्र प्रदर्शित किये गये हैं, जहाँ व्यक्ति अपनी रुचि से संबंधित स्थलों को लंबवत् या तिर्यक रूप में देख सकते हैं।
- इसमें आम आदमी को किसी इच्छित क्षेत्र को बड़े आकार में उच्च विभेदन के साथ देखने की सुविध प्रदान करायी गयी है। यह हमारे प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित ऐसा आईआरएस चित्र प्रस्तुत कर सकेगा जिससे प्राकृतिक संसाधनों में हो रहे परिवर्तनों पर प्रकाश डाला जा सकेगा।
- एस्ट्रोसेट- भारत की प्रथम अन्तरिक्ष वेधशाला (Space Observatoery) इसे PSLV-C-30 द्वारा प्रक्षेपित किया गया है। यह ब्रह्माण्ड के अध्ययन में सहायता करेगा।
चन्द्रयान-2
- इस मिशन को जुलाई 2019 में GSLV-MKIII रॉकेट द्वारा श्रीहरिकोटा से लाँच किया गया। इस मिशन में ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर शामिल है।
- पूर्व में इस रूस के सहयोग से 2012 में लाँच किया जाना था परन्तु रूस ने स्वयं केा इस मिशन से पृथक कर लिया।
- 1471 किलो वजनी, विक्रम लैंडर को चन्द्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करनी थी। फिर परिज्ञान रोवर द्वारा चन्द्रमा की सतह पर चट्टानों के नमूने लेना और उनका परीक्षण करना था।
- यह मिशन पूर्णत: सफल नहीं हुआ। चन्द्रमा की सतह ही 2 किमी की ऊँचाई पर ब्लैंडर से सम्पर्क टूट गया और लैंडर ने क्रेश लैंडिंग की।
गगनयान –
- इस मिशन के तहत इसरो 2022 में अंतरिक्ष में मानव को भेजने की योजना बना रहा है।
- इन्हें ‘व्यॉमनोट’ कहा जायेगा और इनका प्रशिक्षण रूस में हो रहा है।
- गगनयान को GSLV-MK III रॉकेट से प्रक्षेपित किया जायेगा।
- गगनयान में एक महिला सहित तीन व्यॉमनोट अंतरिक्ष में भेजे जायेंगे। ये अन्तरिक्षयान के क्रू मॉड्यूल में रहेगें।
- इसे निम्न भू-कक्षा (LEO) में 300-400 मीटर की ऊँचाई पर भेजा जायेगा। अन्तरिक्ष यात्री 5-7 दिन अन्तरिक्ष में रहेंगे।
PSLV C-37-
- इसे 2017 में लाँच किया गया।
- इस मिशन में PSLV ने 104 उपग्रहों को एक साथ अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित करके एक विश्व कीर्तिमान स्थापित किया।
वर्ष 2020 में निम्न 3 मिशन मंगल ग्रह के लिए लाँच किये गये हैं-
1. UAE का हॉप आर्बिटर मिशन।
2. चीन का तियानवेन-1- आर्बिटर, लैंडर और रॉवर मिशन।
3. USA का परसीवरेंस मिशन-ऑर्बिटर, लैंडर और रॉवर युक्त।
अवतार (Aerobic Vehicle for Advanced Trans-Atmospheric Hypersonic Aerospace Trans Partation-AVATAR)
- भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिक एक बहुउद्देश्यीय स्वप्रणोदित अंतरिक्ष यान 'AVATAR' का विकास कर रहे हैं, जो अंतरिक्ष में कार्य-प्रक्रिया पूर्ण कर लेने के बाद अपनी ऊर्जा से ही अंतरिक्ष की कक्षा से बाहर निकलने, वायुमंडल में प्रवेश करने और पृथ्वी पर उतरने में सक्षम होगा।
- यह अत्याधुनिक अंतरिक्ष यान उपग्रहों की भांति निगरानी, गुप्तचरी तथा टोहगिरी जैसी सेवाएं पूर्ण विश्वसनीयता के साथ उपलब्ध कराएगा। साथ ही अंतरिक्ष की निचली कक्षाओं में छोटे संचार एवं नेवीगेशनल उपग्रहों को भी स्थापित करने में सक्षम होगा।
- अवतार में तीन प्रकार के इंजन का प्रयोग किया जायेगा टर्बोफैन रैमजेट, स्क्रैमजेट तथा रॉकेट इंजन। प्रथम चरण में टर्बोफैन रैमजेट इंजन की मदद से यान पृथ्वी से उड़ान भरेगा। एक निश्चित ऊँचाई पर पहुँचने के बाद द्वितीय चरण में स्क्रैमजेट इंजन की सहायता से यान को ध्वनि के वेग से 7 गुना अधिक गति होगी। तीसरे और अंतिम चरण में रॉकेट इंजन के माध्यम से यान पुनः वायुमण्डल में लौटकर पृथ्वी पर उतर सकेगा।
स्पेस विजन इंडिया 2025 इसके निम्नलिखित उद्देश्य हैं-
- ग्रामीण संयोजन, सुरक्षा आवश्यकताएँ और मोबाइल सेवाओं के लिए उपग्रह आधारित संचार और नौसंचालन प्रणालियाँ विकसित करना।
- प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, मौसम और जलवायु परिवर्तन के लिए उन्नत प्रबंधन क्षमता, सौर प्रणाली और ब्रह्माण्ड को बेहतर समझने के लिए अंतरिक्ष विज्ञान अभियान, ग्रह अन्वेषण हेतु हेवी लिक्ट लॉचर/रॉकेट का विकास (Development of Heavy lift launcher) पुनरुपयोगी प्रक्षेपण यान (Reusable launch Vehicle) - हेतु प्रौद्योगिकी प्रदर्शन मिशन का विकास, (टीएसटीओ) समानव अंतरिक्ष उड़ान आदि इस नीति के प्रमुख उद्देश्य है।
अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन(International Space Station-ISS)
- ISS की स्थापना अमेरिका व रूस द्वारा 1998 में की गई थी। वर्तमान में इसमें सम्मिलित देशों की संख्या 16 है। यह पृथ्वी से लगभग 400 किमी ऊँचाई पर स्थापित है और 90 मिनट में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करता है।
- ISS की शुरुआत के संकेत दिसम्बर 1998 में मिले, जब अंतरिक्ष यान एंडेवर द्वारा एक रूसी व एक अमरीकी मॉड्यूल को उतारा गया। होटल सुविधाओं व अनुसंधान प्रयोगशालाओं से युक्त इस अंतरिक्ष स्टेशन में यात्रियों के आने-जाने की सुविधाएँ उपलब्ध है।
- सूक्ष्म गुरुत्वीय वातावरण में होने वाले अनुसंधान कार्यों हेतु तैयार इस स्टेश्यान के अंदर का गुरुत्व बल, गुरुत्व बल का दस लाखवाँ हिस्सा है। इस अंतरिक्ष स्टेशन का महत्व इस बात में निहित है कि यहाँ पृथ्वी के गुरुत्व बल की अनुपस्थिति में बुनियादी वैज्ञानिक अनुसंधान में लुप्त कई प्रक्रियाएँ व अवधारणाएँ स्पष्ट व प्रकट होंगी।
- वर्तमान में अंतरिक्ष स्टेशन का प्रयोग मुख्यतः मानव शरीर पर दीर्घकालिक अंतरिक्ष उड़ान के प्रभावों को समझने हेतु किया जा रहा है।
- इस अंतरिक्ष स्टेशन के दूरगामी उद्देश्यों में स्टेशन पर वैज्ञानिक प्रयोग, पृथ्वी विज्ञान से संबंधित अध्ययन, जैव चिकित्सकीय शोध, जैव प्रौद्योगिकी, तरल गतिकी, पदार्थ विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान व दहन विज्ञान से संबंधित अध्ययन शामिल हैं।
- आपातकाल में इस अंतरिक्ष स्टेशन पर मौजूद व्यक्तियों को कुशलतापूर्वक पृथ्वी पर वापस लाने के लिए यहाँ 'सोयूज' नामक एक रॉकेट कैप्सूल रख गया है।
- वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के अतिरिक्त चीन का अंतरिक्ष स्टेशन तिआनगोंग (Tiangong-1) भी कार्यरत है।
एण्ट्रिक्स (Antrix)
- यह इसरो की व्यावसायिक इकाई है, जो भारत की अंतरिक्ष क्षमताओं के विपणन के लिए केन्द्रीय एजेंसी का काम करती है। यह अमरीका की 'स्पेस इमेजिंग' के साथ सुदूर-संवेदी उपग्रह आँकड़ों को विश्व भर में सुलभ कराने में अहम भूमिका अदा करती है।
- एण्ट्रिक्स के जरिए टेलीमेट्री, ट्रैकिंग और कमांड समर्थन भी उपलब्ध कराए जाते हैं। उल्लेखनीय है कि यह भारत के PSLV द्वारा उपग्रह प्रक्षेपण सेवाएँ भी उपलब्ध कराता है। परिणामस्वरूप PSLV ने जर्मनी, कोरिया, बेल्जियम, अर्जेण्टीना आदि देशों के उपग्रहों को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में स्थापित किया है।
- इसके अतिरिक्त एण्ट्रिक्स ने अति-प्रतिस्पर्धी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रक्षेपण सेवाओं के लिए यूरोप एवं एशिया से अनुबंध हासिल किये। इस प्रकार देश में ही अंतरिक्ष यान और प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकियाँ विकसित करने के साथ-साथ भारत ने राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लाभार्थ विकसित उपग्रह प्रौद्योगिकी के प्रयोग में भी सफलता प्राप्त की है।
- भारत अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ अंतरिक्ष आधारित जानकारी बाँट रहा है तथा विश्व को वाणिज्यिक अंतरिक्ष सेवाएँ प्रदान कर रहा है। एण्ट्रिक्स द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले अंतरिक्ष यानों के पुर्जे के खरीददारों में दुनिया के प्रसिद्ध अंतरिक्ष यान निर्माता शामिल है।
अंतरिक्ष पर्यटन (Space Tourism)
- पिछले एक दशक में अंतरिक्ष पर्यटन लगातार बढ़ता जा रहा है, जिसका सबूत है कि अब तक लगभग 7 अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष पर्यटन कर चुके हैं।
- अपने खर्चे पर सर्वप्रथम अंतरिक्ष यात्रा करने वाले अमेरिका के अरबपति व्यावसायी डेनिस टीटो थे, जिन्होंने वर्ष 2001 में रूसी अंतरिक्ष यान सोयूज टी.एम. 32 से यह यात्रा पूरी की।
- सातवें अंतरिक्ष पर्यटक कनाडा के व्यवसायी गाई लैलीबेटें हैं जिन्होंने सितम्बर 2009 में रूसी अंतरिक्ष यान सोयूज टी.एम.ए. 16 से अंतरिक्ष यात्रा की। वे कुल 9 दिन अंतरिक्ष में रहे।
- वस्तुत: अंतरिक्ष पर्यटन के क्षेत्र में असीमित कारोबारी संभावना के मद्देनजर स्पेस एडवेंचर, वर्जिन गैलेक्टिक तथा एक्साकोर स्पेस एक्स जैसी तीन दिग्गज कम्पनियाँ इस क्षेत्र में कूद पड़ी हैं, जो कम खर्च पर छोटे अंतरिक्षयानों से अंतरिक्ष पर्यटन उपलब्ध कराएंगी।
- 2001 में अंतरिक्ष यात्रा करने वाले डेनिस टीटो प्रथम अंतरिक्ष पर्यटक थे। अनुशेह अंसारी (2006) प्रथम तथा अब तक की एकमात्र महिला अंतरिक्ष पर्यटक हैं।
अंतरिक्ष प्रदूषण (Space Pollution)
अंतरिक्ष प्रदूषण का अर्थ है मानवीय गतिविधियों द्वारा अंतरिक्ष में कचरे, छोटे-छोटे कणों तथा प्रदूषक पदार्थो का फैलना। पिछले 60 वर्षों में मानव ने अंतरिक्ष विज्ञान में कई उपलब्धियाँ तो हासिल की हैं किन्तु उन्हीं के साथ प्रदूषण जैसी कुछ समस्याएं भी पैदा हो गयी हैं।
इस प्रदूषण के निम्नलिखित कारण हैं :
- कभी-कभी किसी उपग्रहों में विस्फोट होने पर, या यांत्रिक समस्याओं के कारण उपग्रह क्षतिग्रस्त हो जाते हैं तथा छोटे-छोटे टुकड़ो में टूटकर खतरनाक कणों के रूप में कक्षा में घूमते रहते है। एक अनुमान के मुताबिक, अंतरिक्ष में 4.5 करोड़ टन के उपग्रह मलबे के रूप में चक्कर काट रहे हैं।
- एक अन्य कारण कॉस्मिक किरणें है। यह सुदूर बाह्य अंतरिक्ष से आती हैं और अंतरिक्ष यानों को भेदकर निकल जाती हैं। इससे भी अन्तरिक्ष कचरा उत्पन्न होता है।
- विभिन्न देशों द्वारा उपग्रह निरोधक प्रक्षेपास्त्र परीक्षण (Anti Satellite Missile Test) से भी अंतरिक्ष में प्रदूषण बढ़ा रहा है। चीन 2007 में इस तरह का परीक्षण कर चुका है। India ने मिशन शक्ति एंटी सैलेलाइट परीक्षण 2019 में किया । इसके तहत 300 किमी की ऊँचाई पर LEO में स्थित उपग्रह को गिराया गया।
केसलर सिन्ड्रोम –
- यह एक सैद्धान्तिक अवधारणा है, इसे 1978 में नासा विज्ञानी डॉनल्ड जे केसलर ने प्रस्तुत किया। उनके अनुसार निम्न भू-कक्षा (LEO) में अंतरिक्ष कचरा बहुत तेजी से घूम रहा है।
- यह किसी उपग्रह से टकराकर उसे भी छोटे-छोटे टूकड़ों में तोड़ सकता है। इस प्रकार आगे ये टुकड़े अन्य उपग्रहों का नष्ट कर देगें, यह एक श्रृंखला के रूप में शुरू हो जायेगी और अन्य सभी उपग्रहों को नष्ट कर देगी।
- यदि इस प्रकार की दुर्घटनाओं होती है तो वह चेर्नोबिल जैसी त्रासदी से हजारों गुना बड़े रूप में हो सकती है।
- अंतरिक्ष के कचरे और प्रदूषण की समस्या का विश्लेषण करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग से 'स्पैड्स' नामक यान को भेजा गया था
- जिसकी रिपोर्ट के अनुसार यदि अभी से ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में अंतरिक्ष प्रदूषण की समस्या खतरनाक रूप धारण कर सकती है। प्रदूषण को दूर करने के लिए अंतरराष्ट्रीय डेबी कोऑर्डिनेटर कमेटी का गठन किया गया है, जो अंतरिक्ष यान की सहायता से मलबों को हिन्द महासागर में छोड़ेगी।
समाधान
- अंतरिक्ष में भीड़-भाड़ को कम करना चाहिए।
- नाभिकीय ईंधन या अन्य खतरनाक किस्मों के ईंधनों का प्रयोग अंतरिक्ष में नहीं करना चाहिए। सौर ऊर्जा इसका सर्वश्रेष्ठ विकल्प है।
- उपग्रहों में जो रसायन आदि विस्फोटक पदार्थ हैं उनके लिए ठोस सुरक्षात्मक उपाय होने चाहिए ताकि बड़ी विपदाओं से बचा जा सके।