-     गठबन्धन सरकार या राजनीति एक संसदीय सरकार का रूप है, जिसमें कई राजनीतिक दल सहयोग करते हैं, जिससे गठबन्धन के भीतर किसी भी एक दल का प्रभुत्व नहीं रहता है। इस व्यवस्था का आम कारण किसी एक दल द्वारा अपने बलबूते पर संसद में बहुमत प्राप्त न कर पाना है।
-     वास्तविक रूप में मिली-जुली सरकार का दौर वर्ष-1977 से माना जाना चाहिए, जब मोरारजी देसाई के नेतृत्व में सरकार बनी, परंतु वर्ष-1989 से भारत में वास्तविक गठबंधन सरकारों का युग प्रारंभ हुआ।
-     गठबंधन सरकार के दौर में प्रधानमंत्री के शक्ति और प्रभाव का ह्रास हुआ। वर्ष-1989 से लेकर वर्ष-2013 तक संघ में गठबंधन सरकारों का निर्माण हुआ। किसी भी एक दल को लोक सभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हो सका, जिसके कारण प्रधानमंत्री अनेक दलों के सहयोग के आधार पर निर्मित हुआ।
-     वर्ष-1991 में चन्द्र शेखर जब प्रधानमंत्री बने थे, उनके दल में केवल 54 सांसद थे और कांग्रेस दल के द्वारा उन्हें बाहर से समर्थन दिया गया था। वर्ष-1996 में प्रधानमंत्री देवेगौड़ा कांग्रेस के बाहरी समर्थन पर निर्भर थे। वर्ष-1998 के बाद अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, जो अनेक दलों के समर्थन पर सत्ता में बने हुए थे। वर्ष-2004 से लेकर वर्ष-2013 तक डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद पर बने रहने के लिए अनेक दलों के समर्थन पर निर्भर थे।
-     यदि प्रधानमंत्री राजनीतिक रूप से कमजोर हैं, तो वह संवैधानिक रूप में शक्तिशाली नहीं हो सकता। संसदीय शासन की मूलभूत परंपरा के अनुसार प्रधानमंत्री लोक सभा का नेता होता है, परंतु डॉ. मनमोहन सिंह लोक सभा के सदस्य ही नहीं थे।
-     यह ध्यान देने योग्य बात है कि भारत में गठबंधन की राजनीति की शुरुआत एक क्रमिक विकास की प्रक्रिया रही जिसकी शुरुआत देश के आजाद होने से लेकर विकास की सीढियाँ चढने तक हुई।
गठबंधन की राजनीति के सकारात्मक पक्ष-
-     गठबंधन राजनीति ने सहमति की राजनीति को जन्म दिया । यह सहमति कई महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर देश के वर्तमान विकास के लिए लाभकारी रही ।
-     गठबंधन की राजनीति के माध्यम से जहाँ कई क्षेत्रीय पार्टियाँ अस्तित्व में आयीं, वहीं कई राष्ट्रीय पार्टियों ने कालांतर से दबी सामाजिक समस्याओं की जड़ें खोदी। बसपा ने दलित उत्थान, अन्य पार्टियों ने पिछड़ी जातियों के राजनीतिक और सामाजिक दावे की बातें छेड़ी।
-     गठबंधन युग के पहले एक दल के ही मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दे पर हावी रहते थे। लेकिन गठबंधन के कारण अब कई महत्त्वपूर्ण मुद्दे राष्ट्र के समक्ष मात्र लाये ही नहीं जाते हैं बल्कि उन पर वाद-विवाद की भी पहल की जाती है।
-     वर्तमान सन्दर्भ में अब प्रांतीय और राष्ट्रीय दलों में भेद कम हो चुका है तथा कई महत्त्वपूर्ण मुद्दे इसी कारण राष्ट्रीय मुद्दे बन कर उभरने लगे हैं।
-     गठबंधन की राजनीति ने भारत को अधिक संघात्मक बनाया है।
गठबंधन सरकार की कमजोरियाँ-
-     भारत में गठबंधन सरकार कमजोर तथा अस्थायी होती है।
-     भारत में गठबंधन सरकार के समक्ष हमेशा से यह चुनौती रही कि किसी भी विषय पर एक आम सहमति कैसे बनाई जाए? कई विदेशी संधियाँ इस तरह की बाध्यता से अक्सर प्रभावित होती रही हैं।
-     गठबंधन सरकार के अस्तित्व को खतरा देखा जाता है कि कई दलों से मिलकर बनी सरकार को कई सिद्धांतों के मध्य एक समन्वय बनाना पड़ता है और असंतुलन की स्थिति से बचना पड़ता है।
-     मंत्रिमंडल के लिए सहयोगियों का चयन हमेशा प्रधानमन्त्री का विशेषाधिकार माना जाता है। परन्तु गठबंधन सरकार में प्रधानमन्त्री का यह विशेषाधिकार बुरी तरह प्रभावित होता है क्योंकि क्षेत्रीय दलों के नेता यह तय करते हैं कि मंत्रिमंडल में उनके दल का नेतृत्व कौन-कौन करेंगे और यह भी कि उन्हें कौन-कौन से विभाग दिए जायेंगे|