उपराष्ट्रपति

-     संविधान के अनुच्छेद-63 में उपराष्ट्रपति पद की व्यवस्था की गई है, जो आवश्यकता पड़ने पर अंतरिम काल के लिए राष्ट्रपति का कार्यभार संभाल सकता है।
-     हमारे देश में जो राजनीतिक व्यवस्था है, उसमें उपराष्ट्रपति का पद एक अनोखी व्यवस्था के रूप में स्थापित है, क्योंकि अन्य संसदीय पद्धति वाले देशों में उपराष्ट्रपति जैसा कोई पद नहीं है। यहाँ तक कि, भारतीय संघ के राज्यों में भी उपराज्यपाल का पद नहीं है।
-     हमारे यहाँ उपराष्ट्रपति के पद को अमेरिका के संविधान से ग्रहण किया गया है। उपराष्ट्रपति बनने के लिए आवश्यक अर्हताएँ वही निर्धारित की गई हैं, जो कि राष्ट्रपति के लिए हैं। उपराष्ट्रपति का चुनाव भी अप्रत्यक्ष, आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा होता है। 
अर्हता- 
-     उपराष्ट्रपति बनने के लिए राज्य सभा के सदस्य के रूप में निर्वाचित होने के लिए जो योग्यताएँ हैं उनको पूरा करना आवश्यक है जबकि राष्ट्रपति के लिए किसी व्यक्ति को लोक सभा का सदस्य बनने के लिए निर्धारित अर्हताएँ प्राप्त करनी चाहिए।     
निर्वाचन-
-     उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में लोक सभा व राज्य सभा के सभी मनोनीत सदस्य भाग लेते हैं।
-     उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में राज्यों की विधान सभा के सदस्य भाग नहीं लेते।
कार्यकाल-
-     उपराष्ट्रपति का कार्यकाल पाँच वर्षों का है, उसे राज्य सभा के तत्कालीन सदस्यों के बहुमत के प्रस्ताव से पद से हटाया जा सकता है, जिससे लोक सभा सहमत हो।
त्यागपत्र
-     उपराष्ट्रपति अपने कार्यकाल से पूर्व ही राष्ट्रपति को अपना त्याग पत्र दे सकता है।
वेतन
-     उपराष्ट्रपति को वेतन राज्य सभा के सभापति के रूप में मिलता है, न कि उपराष्ट्रपति के रूप में।
पुनर्निर्वाचन
-     भारत का उपराष्ट्रपति कितनी भी बार पुनर्निर्वाचित होने की शक्ति रखता है अर्थात̖ वह एक से अधिक बार चुनाव लड़ सकता है।
-     वर्ष-1957 में डॉ० राधाकृष्णन् उपराष्ट्रपति पद के लिए दोबारा निर्वाचित हुए थे। इसके बाद हामिद अंसारी को दोबारा उपराष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचित किया गया।
      उपराष्ट्रपति के कार्य
-     संविधान में उपराष्ट्रपति के किसी भी कार्य का उल्लेख नहीं है। वह राज्य सभा का पदेन सभापति होता है तथा उसे राज्य सभा के पदेन सभापति के रूप में वेतन एवं भत्ते भी प्राप्त होते हैं, उपराष्ट्रपति के रूप में नहीं।
-     उपराष्ट्रपति निम्नलिखित परिस्थितियों में राष्ट्रपति के पद पर कार्य कर सकता है-
(i) राष्ट्रपति की मृत्यु हो जाने पर।
(ii) राष्ट्रपति के त्यागपत्र दे देने पर।
(iii) महाभियोग या अन्य किसी प्रकार से राष्ट्रपति के हटाए जाने पर।
(iv) अन्य किसी कारण से उत्पन्न असमर्थता की स्थिति में जैसे बीमारी या अनुपस्थिति।
-     संविधान में यह उल्लेखित नहीं है, कि राष्ट्रपति किस प्रकार अपना कार्य करने में समर्थ नहीं होगा। परंतु डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की वर्ष-1960 में सोवियत संघ की 15 दिनों की यात्रा के दौरान उनका कार्य उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन̖ के द्वारा संपादित किया गया था। राष्ट्रपति यह निर्धारित कर सकता है, कि कब वह अपने कार्यों को करने में असमर्थ है, किस समय वह पुनः अपने कार्य संपादित करना चाहता है।
-     राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों के पद रिक्त होने के बाद राष्ट्रपति के कार्यों का संपादन भारत के उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के द्वारा किया जाएगा। वर्ष-1969 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन की मृत्यु हो गयी और उपराष्ट्रपति वी.वी. गिरी राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन कर रहे थे, परंतु नए राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेने के लिए उन्होंने उपराष्ट्रपति के पद से त्यागपत्र दे दिया। परिणाम स्वरूप उच्चतम न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश हिदायतुल्लाह के द्वारा राष्ट्रपति के कार्यों का संपादन किया गया।
उपराष्ट्रपति की शक्तियाँ एवं कार्य-
(i) राज्य सभा का सभापति-
-     उपराष्ट्रपति, राज्य सभा का सदस्य नहीं होता है, किन्तु उसका पदेन सभापति होता है। पदेन सदस्य होने के कारण उसे सदन में मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं है, परंतु किसी विषय पर पक्ष एवं विपक्ष में बराबर मत हों, तो उपराष्ट्रपति निर्णायक मत देने का अधिकार रखता है।
-     वह सदन में पूछे जाने वाले प्रश्नों का निर्धारण करता है।
-     वह सदन के सदस्यों के विशेषाधिकारों की भी रक्षा करता है।
(ii) सामाजिक समारोह का प्रतिनिधित्व-
-     सामाजिक समारोहों पर उपराष्ट्रपति, राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है। वह समय-समय पर होने वाले शैक्षणिक और सामाजिक उत्सवों में उपस्थित होता है।
-     जब उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है, तो उसे वे समस्त शक्तियाँ और सुविधाएँ प्राप्त होती हैं, जो राष्ट्रपति को प्राप्त हैं, लेकिन इस समय उपराष्ट्रपति, राज्य सभा के सभापति के रूप में कार्य नहीं करता है और न ही सभापति का वेतन प्राप्त करता है। इस स्थिति में उपराष्ट्रपति के कार्य राज्य सभा के उपसभापति द्वारा संपन्न किए जाते हैं।
-     उपराष्ट्रपति केवल राष्ट्रपति के चुनाव होने तक ही राष्ट्रपति पद का कार्यभार संभालता है। नए राष्ट्रपति का चुनाव छः माह के अंदर हो जाना चाहिए।
प्रधानमंत्री
-     भारत में संसदीय व्यवस्था को ब्रिटिश मॉडल से अपनाया गया है। प्रधानमंत्री तथा उसके मंत्रिपरिषद को वास्तविक कार्यपालिका कहा जाता है। प्रधानमंत्री को अपने मंत्रिपरिषद के चयन का अधिकार प्रदान किया गया है। प्रधानमंत्री तथा उसकी मंत्रिपरिषद संसद के प्रति उत्तरदायी होते हैं तथा सभी संसद के भी सदस्य होते हैं। उपर्युक्त व्यवस्था में मंत्रिपरिषद महत्वपूर्ण है, लेकिन उसमें भी सबसे महत्वपूर्ण हैं- प्रधानमंत्री, इस व्यवस्था में प्रधानमंत्री को 'समान व्यक्तियों में प्रथम' कहा गया है।
-     डॉ. अंबेडकर के अनुसार, 'यदि हमारे संविधान में किसी शासन अधिकारी की तुलना अमेरिका के अध्यक्ष से की जा सकती है, तो वह है, प्रधानमंत्री, न कि राष्ट्रपति।
-     प्रधानमंत्री संपूर्ण तंत्र की धुरी है। प्रधानमंत्री, राज्य रूपी जहाज का चालक है और समकक्षों में प्रथम है।
-     भारत में राज्याध्यक्ष (राष्ट्रपति) प्रतिष्ठित व सम्मानित व्यक्ति है, जबकि शासनाध्यक्ष (प्रधानमंत्री) कुशल व वास्तविक अध्यक्ष है।
-     संसदात्मक लोकतंत्र में वस्तुतः प्रधानमंत्री की स्थिति सर्वोच्च अधिकारी की होती है। प्रधानमंत्री, राष्ट्र का लोकप्रिय नेता है। वह मंत्रिपरिषद रूपी नाव का चालक होता है।
-     भारत के प्रधानमंत्री के संबंध में उक्त कथन सत्य है। संविधान के अनुच्छेद-74 के अनुसार, 'एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होगा, वह मंत्रिपरिषद की सहायता से राष्ट्रपति को उसके कार्यों में सहायता तथा सलाह देगी। 
 प्रधानमंत्री की नियुक्ति
-     आम चुनाव के बाद राष्ट्रपति, लोक सभा के बहुमत प्राप्त दल के नेता को सरकार बनाने के लिए निमंत्रण देता है और उसे प्रधानमंत्री नियुक्त करता है।
-     यदि लोक सभा में किसी दल का स्पष्ट बहुमत नहीं है, तो राष्ट्रपति अपने विवेक से प्रधानमंत्री को नियुक्त कर सकता है, राष्ट्रपति अपने स्वविवेक का इस्तेमाल करके ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त करेगा, जो कि लोक सभा में बहुमत का विश्वास प्राप्त करने की क्षमता रखता हो। विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रपति स्वविवेक का प्रयोग करके उचित प्रधानमंत्री चुन सकता है, जैसे
(i) यदि लोक सभा में किसी दल का स्पष्ट बहुमत न, हो।
(ii) यदि बहुमत दल का कोई सर्वमान्य नेता न हो, या नेता के पद के कई दावेदार हों।
(iii) राष्ट्रीय संकट के दौरान लोक सभा को भंग करके कुछ समय के लिए कार्यवाहक सरकार का नेता मनोनीत कर सकता है।  
 प्रधानमंत्री द्वारा पद और गोपनीयता की शपथ-
-     संविधान की तीसरी अनुसूची में संघीय मंत्रियों के शपथ और गोपनीयता का प्रावधान है। अत: तीसरी अनुसूची में प्रधानमंत्री के लिए अलग से शपथ का प्रावधान नहीं है, बल्कि मंत्रियों की पद की शपथ और गोपनीयता का प्रावधान प्रधानमंत्री के लिए भी लागू होता है।
-     इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री के लिए गोपनीयता की शपथ का भी प्रावधान है। प्रधानमंत्री के द्वारा यह कहा जाता है, कि उसके समक्ष लायी गयी किसी जानकारी को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में किसी को संप्रेषित नहीं करेगा और किसी व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह को इसकी जानकारी नहीं देगा।
-     प्रधानमंत्री के कर्त्तव्यों और कार्यों के संपादन के दौरान यदि आवश्यक हो, तो वह कोई सूचना किसी को संप्रेषित कर सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के ऊपर गोपनीयता को भंग करने का आरोप लगाया गया। आलोचकों ने कहा, कि डॉ. मनमोहन सिंह के द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय की महत्वपूर्ण और गोपनीय सूचनाओं को कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गाँधी को संप्रेषित किया गया।
प्रधानमंत्री के कार्य और उसकी शक्तियाँ-
समकक्षों में प्रथम-
-     भारतीय संविधान के अनुच्छेद-75(1) के अनुसार, मंत्रियों की नियुक्ति का अधिकार राष्ट्रपति को है। ये नियुक्तियाँ प्रधानमंत्री की सलाह से ही राष्ट्रपति करता है, परंतु मंत्रिमंडल के निर्माण में राष्ट्रपति की केवल औपचारिक भूमिका होती है, क्योंकि मंत्रियों का चयन प्रधानमंत्री द्वारा किया जाता है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से यह नहीं कह सकता है, कि अमुक व्यक्ति को मंत्रिपरिषद में नहीं लिया जाएगा। यद्यपि प्रधानमंत्री स्वेच्छा से राष्ट्रपति की राय को स्वीकार कर सकता है।
-     कोई मंत्री उस समय तक ही अपने पद पर रह सकता है, जब तक कि उसे प्रधानमंत्री का विश्वास प्राप्त है। वह किसी भी मंत्री को त्यागपत्र देने के लिए कह सकता है। यदि कोई मंत्री उसके आदेश का पालन करने से इंकार कर दे, तो प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति से अनुरोध कर संबंधित मंत्री को बर्खास्त करवा सकता है।
-     किसी भी परिस्थिति में यदि प्रधानमंत्री इस्तीफा देता है, तो संपूर्ण मंत्रिमंडल स्वतः विघटित हो जाता है।
-     प्रधानमंत्री अपने सभी मंत्रियों के विभागों का बँटवारा भी करता है। पूर्व में प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद की सदस्य संख्या निर्धारित करता था, परंतु अब यह संख्या निश्चित कर दी गई है, जो कि संसद की कुल सदस्य संख्या का 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। (91वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2003) प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल की बैठकों की अध्यक्षता करता है तथा बैठकों में विचार किए जाने वाले विषयों के कार्यक्रम तैयार करता है। यद्यपि निर्णय बहुमत से लिए जाते हैं, परंतु यहाँ उसकी स्थिति प्रभावपूर्ण व निर्णायक होती है। प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल का निर्माण करने व संचालन करने एवं नष्ट करने का कार्य करता है।
नीति निर्माता
-     प्रधानमंत्री, शासन का वास्तविक प्रधान होता है। अतः वह सभी नीतियों का निर्माता होता है। गृह, राष्ट्र और विदेश नीति के निर्माण में प्रभावशाली भूमिका होती है।
मंत्रिपरिषद की अध्यक्षता-
-     प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद का अध्यक्ष सर्वसम्मति या बहुमत से चुना जाता है। वही मंत्रिपरिषद की बैठकों की तिथि निश्चित करता है। उसमें पेश किए जाने वाले मसौदे तैयार करता है तथा बैठकों की अध्यक्षता करता है।
-     सभी मंत्रीगण अपने विभागों की कार्यकुशलता के लिए व्यक्तिगत रूप से प्रधानमंत्री के प्रति उत्तरदायी होते हैं। वह उन्हें शासन कार्य में परामर्श, प्रोत्साहन व  चेतावनी देता है।
-     दो मंत्रियों या विभागों में मतभेद होने पर अपना  निर्णय उन पर लागू करता है। सत्ता में वह समन्वयकर्ता की भूमिका निभाता है।
लोक सभा का नेता
-     प्रधानमंत्री, लोक सभा में बहुमत दल का नेता होता है। लोक सभा के नेता के रूप में उसके तीन प्रमुख कार्य होते हैं-
(i) वह लोक सभा अध्यक्ष से संपर्क बनाए रखता है एवं वह लोक सभा के अधिवेशन बुलाने, संपन्न कराने की अवधि प्रस्तावित करता है।
(ii) प्रधानमंत्री, सरकार के मुख्य प्रवक्ता के रूप में कार्य करता है।
(iii) वह सदन में सरकार की नीतियों को स्पष्ट करता है।
(vi) प्रधानमंत्री, विपक्षी दल से संपर्क बनाए रखता है तथा लोक सभा के नेता के रूप में सदन की समस्त कार्यवाही पर नियंत्रण रखता है एवं सरकारी नीतियों का स्पष्टीकरण करता है।      मंत्रिपरिषद और राष्ट्रपति के मध्य की कड़ी
-     संविधान के द्वारा, प्रधानमंत्री को मंत्रिपरिषद और राष्ट्रपति के मध्य एक महत्वपूर्ण कड़ी की भूमिका प्रदान की गई है।
-     अनुच्छेद-78 के अनुसार, मंत्रिमंडल के निर्णयों से प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति को अवगत कराता है। वह, राष्ट्रपति द्वारा माँगी गई प्रशासन से संबंधित जानकारी भी प्रदान करता है। किसी एक मंत्री द्वारा लिए गए निर्णय को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के माध्यम से मंत्रिपरिषद के सामने प्रस्तुत करवाता है।
प्रधानमंत्री और राज्यों का प्रशासन
-     प्रधानमंत्री प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से राज्यों के प्रशासन में समुचित रूप से हस्तक्षेप करता है। जैसे-राज्यों में राज्यपाल की नियुक्ति में अपनी राय देना।
-     केंद्रीय सरकार द्वारा राज्यों के प्रशासन को दिशा निर्देश देने का अधिकार भी उसे प्राप्त है।
-     राज्यों की वित्तीय स्थिति कमजोर होने की दशा में उनकी केंद्र पर निर्भरता बढ़ जाती है। प्रधानमंत्री, विभिन्न प्रकार के अनुदान और वित्तीय सहायता द्वारा राज्यों के प्रशासन को प्रभावित करता है।
-     अनुच्छेद-356 के तहत राज्यों में राष्ट्रपति शासन की घोषणा के पश्चात राज्यों का प्रशासन वास्तविक रूप से प्रधानमंत्री के हाथों में आ जाता है।
प्रधानमंत्री और आर्थिक नियोजन
-     देश के सर्वांगीण विकास के लिए नेहरू के काल से ही आर्थिक नियोजन को अपनाया गया है। भारत में आर्थिक नियोजन के लिये राष्ट्रीय विकास परिषद' (वर्ष-1952) का गठन किया गया है। इसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है। इस प्रकार, राज्यों को प्रदान की जाने वाली आर्थिक सहायता प्रधानमंत्री के निर्देशन द्वारा तय की जाती है।
आम चुनाव व प्रधानमंत्री
-     आम चुनाव में प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व और कार्यशैली का प्रभाव शुरू से ही देखने को मिलता है तथा मतदाता भी संभावित प्रधानमंत्री को मद्देनजर रखते हुए ही किसी दल को अपना समर्थन प्रदान करते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में देश का प्रतिनिधित्व
-     विदेशों में प्रधानमंत्री के वक्तव्य को देश की नीति समझा जाता है, वह समय-समय पर देश के हितों के लिए विदेशों की यात्रा करता है और भारत सरकार के दृष्टिकोण को दूसरे देशों के सामने प्रस्तुत करता है। समय-समय पर होने वाले अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व भी करता है।
राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के बीच संबंध-
-     भारतीय संविधान में संसदीय शासन प्रणाली अपनायी गयी है, जिसके अनुसार, राष्ट्रपति, कार्यपालिका का संवैधानिक प्रधान होगा तथा प्रधानमंत्री, कार्यपालिका का वास्तविक प्रधान होता है। संविधान में समूची कार्यपालिकीय शक्तियाँ राष्ट्रपति में निहित हैं, परंतु इसका व्यावहारिक प्रयोग प्रधानमंत्री के द्वारा ही किया जाता है।
-     राष्ट्रपति अपने कार्य मंत्रिपरिषद एवं उसके प्रधान प्रधानमंत्री की सलाह एवं सहायता के अनुसार करता है।
-     इंदिरा गाँधी ने 42वें संविधान संशोधन के द्वारा यह प्रावधान किया, कि राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद की सलाह एवं सहायता के अनुसार ही कार्य करेगा, जिससे यह विवाद समाप्त हो गया, कि राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद की सलाह के अलावा कार्य कर सकता है, अथवा नहीं।
-     वर्ष-1977 में जनता पार्टी सरकार ने 42वें संविधान संशोधन के प्रावधान में परिवर्तन नहीं किया, परंतु राष्ट्रपति को एक अतिरिक्त शक्ति प्रदान की गई, जिसके अनुसार राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद की सलाह को एक बार पुनर्विचार के लिए भेज सकता है। परंतु यदि मंत्रिपरिषद दोबारा इसे राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करे, तो राष्ट्रपति को विधेयक पर हस्ताक्षर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है।
-     यद्यपि इन संशोधनों के बावजूद व्यावहारिक रूप में राष्ट्रपति को निम्नलिखित स्वविवेक की शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं-
(i) जब प्रधानमंत्री की अचानक मृत्यु हो जाय, तो वह अपने विवेक से नए प्रधानमंत्री की नियुक्ति करता है।
(ii) जब सरकार अल्पमत में हो तथा लोक सभा अपना विश्वास खो दे। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य नहीं करेगा, बल्कि अपने विवेक के अनुसार कार्य करेगा।
(iii) यदि सरकार बनाने के लिए किसी दल के पास स्पष्ट बहुमत न हो, तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति अपने विवेक से किसी दल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं।
(iv) किसी विधेयक को पुनर्विचार के लिए भेजने के मामले में राष्ट्रपति अपने स्वविवेक का प्रयोग करते हैं।
(v) यदि मंत्रिमण्डल सदन में विश्वास मत सिद्ध न कर सके, तो राष्ट्रपति, लोक सभा को विघटित करने में स्वविवेक का प्रयोग करते हैं।
प्रधानमंत्री का कर्त्तव्य-
-     संविधान में प्रधानमंत्री का राष्ट्रपति के प्रति कर्त्तव्यों का भी उल्लेख किया गया है, जो निम्नलिखित हैं-
-     प्रधानमंत्री का यह कर्त्तव्य होगा, कि वह राष्ट्रपति को संघ के प्रशासन और विधान से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी निर्णयों को राष्ट्रपति को संप्रेषित करे।
मंत्रिपरिषद
-     भारत में संसदीय व्यवस्था को अपनाया गया है, जिसमें राष्ट्रपति, नाममात्र का या औपचारिक कार्यपालिका है तथा प्रधानमंत्री तथा उसकी मंत्रिपरिषद वास्तविक कार्यपालिका है।
-     भारतीय संविधान में ज्यादातर मंत्रिमंडल शब्द का प्रयोग न करके मंत्रिपरिषद शब्द का प्रयोग किया गया है। संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति को सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी व औपचारिक रूप से समस्त कार्यकारी शक्तियाँ राष्ट्रपति में निहित होने के बावजूद वास्तविक रूप से शासन की समस्त शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद द्वारा किया जाता है।
-     भारतीय संविधान में मंत्रिपरिषद में किसी प्रकार के विभाजन का उल्लेख नहीं है, बल्कि मंत्रियों के विभाजन का उल्लेख संसदीय विधि का भाग है। भारत के मूल संविधान में मंत्रिपरिषद की संख्या को निर्धारित नहीं किया गया था।
-     91वें संविधान संशोधन के द्वारा मंत्रिपरिषद की संख्या का निर्धारण किया गया है। मंत्रिपरिषद की अधिकतम संख्या लोक सभा के कुल सदस्य संख्या का 15% भाग से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसमें प्रधानमंत्री भी शामिल हैं।
-     मंत्रिपरिषद में तीन प्रकार के मंत्री होते हैं-
(i) केबिनेट मंत्री (ii) राज्य मंत्री (iii) उपमंत्री
कैबिनेट मंत्री
-     ये अपने-अपने विभाग के प्रमुख होते हैं। कैबिनेट मंत्री मंत्रिपरिषद का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अथवा केन्द्रीय भाग है, जो महत्वपूर्ण विभागों के प्रधान होते हैं तथा मंत्रिमंडल की बैठकों में स्वाभाविक रूप में भाग लेते हैं।
-     मंत्रिमंडल के सदस्य राजनीतिक रूप में सर्वाधिक प्रभावशाली सांसद होते हैं।
राज्य मंत्री
-     यह मंत्रिमंडलीय स्तर के नीचे स्तर का मंत्री होता है। राज्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री के अधीन कार्य करता है। सामान्यतः गृह मंत्रालय जैसे बड़े मंत्रालयों में राज्यमंत्री की नियुक्ति होती है, जिसे मंत्रालय के किसी भी भाग का कार्यभार सौंप दिया जाता है। सामान्यतः राज्यमंत्री कैबिनेट की बैठकों में भाग नहीं लेता। राज्यमंत्री को जब स्वतंत्र प्रभार दिया जाता है, तो राज्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री से स्वतंत्र रूप में कार्य करता है। सामान्यतः छोटे मंत्रालयों का दायित्व राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार को सौंपा जाता है। स्वतंत्र प्रभार वाला राज्यमंत्री कैबिनेट की बैठकों में आमंत्रण के बाद भागीदारी करता है। यदि इसके मंत्रालय से संबंधित कोई विषय कैबिनेट के समक्ष है, तो इसे कैबिनेट की बैठकों में आमंत्रित किया जाता है।
उपमंत्री
-     ये तीसरे स्तर के मंत्री होते हैं। ये विभागों में प्रशासनिक कार्यों का निर्वहन करते हैं। ये मंत्रिमंडल की बैठकों में भाग नहीं लेते। मंत्रिमंडलीय विचार-विमर्श में उनकी कोई भागीदारी नहीं होती। वर्तमान में उपमंत्री की नियुक्तियाँ नहीं हो रही है।
संसदीय सचिव
-     सत्ताधारी पक्ष के सांसदों को प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्रियों के द्वारा संसदीय सचिव को शपथ दिलायी जाती है। संसदीय सचिव मंत्रियों की सहायता करते हैं। इसलिए इनका दर्जा लगभग मंत्रियों के समान होता है।
-     भारत में विभिन्न राज्य सरकारों के द्वारा अनेक संसदीय सचिवों की नियुक्ति की गयी है, जिसके द्वारा संविधान में निर्धारित मंत्रिपरिषद के आकार का उल्लंघन नहीं होता, क्योंकि संसदीय सचिवों को सैद्धांतिक रूप में मंत्रिपरिषद के समूह में नहीं रखा जाता है।
मंत्रियों का समूह-
-     भारतीय संसदीय शासन में वर्तमान में मंत्रियों के समूह की संकल्पना का विकास हुआ है, जिसके अंतर्गत वे विषय जो अनेक मंत्रालयों से संबंधित होते हैं। ऐसे मामलों की देखभाल के लिए 3 या 4 मंत्रियों के समूह का निर्माण किया गया है।
-     यू. पी. ए. शासन के दौरान मीडिया को संबोधित करने के लिए मंत्रियों के एक समूह का निर्माण किया गया था। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंत्रियों के समूह के विचार को अस्वीकार कर दिया है।
मंत्रियों की नियुक्ति-
(i) प्रधानमंत्री पद पर राष्ट्रपति उस व्यक्ति को नियुक्त करता है, जिसे लोक सभा का बहुमत प्राप्त होता है।
(ii) अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की सलाह से करता है।
(iii) प्रधानमंत्री ही मंत्रियों के विभागों का बँटवारा करता है।
(iv) मंत्री किसी भी सदन, राज्य सभा अथवा लोक सभा से चुना जा सकता है।
(v) किसी ऐसे व्यक्ति को भी मंत्री या प्रधानमंत्री नियुक्त किया जा सकता है, जो किसी भी सदन का सदस्य नहीं है,
      लेकिन वह तभी तक मंत्री बना रह सकता है, जब तक वह छ: माह के भीतर किसी भी सदन (लोक सभा या राज्य सभा) का निर्वाचन द्वारा या मनोनयन द्वारा सदस्य नहीं बन जाता।
(vi) मंत्री दोनों सदनों, लोक सभा तथा राज्य सभा में बोल सकता है एवं कार्यवाही में भी भाग ले सकता है, परंतु मतदान के समय वह अपने मत का प्रयोग वहीं कर सकता है, जिस सदन का वहसदस्य है।
सामूहिक उत्तरदायित्व
-     मंत्रिमंडल, सामूहिक रूप से लोक सभा के प्रति उत्तरदायी होता है।
-     मंत्रिमंडल द्वारा लिए गए निर्णय से मंत्रिमंडल के सभी सदस्य सहमत होते हैं, मंत्रिमंडल के निर्णय की कोई भी सदस्य आलोचना नहीं कर सकता है। यदि मंत्रिमंडल का सदस्य मंत्रिमंडल के निर्णय से असहमत हैं, तो उसे मंत्रिमंडल में बने रहने का अधिकार नहीं है। एक मंत्री विशेष के निर्णय का बचाव लोक सभा में मंत्रिमंडल के सभी सदस्य करते हैं और यदि लोक सभा में मंत्रिमंडल के किसी भी सदस्य के विरुद्ध बहुमत से मतदान हो जाता है, तो समूचे मंत्रिमंडल को त्यागपत्र देना पड़ेगा। इसलिए संसदीय शासन के संबंध में यह कहा जाता है, कि मंत्रिमंडल के सदस्य साथ-साथ तैरते हैं तथा साथ-साथ डूबते हैं।
 उप-प्रधानमंत्री
-     भारतीय संविधान में उप-प्रधानमंत्री के पद का उल्लेख नहीं है। इसलिए तकनीकी रूप में उप-प्रधानमंत्री कैबिनेट मंत्री है, परंतु राजनीतिक कारणों से उप-प्रधानमंत्री के पद का निर्माण किया गया।
-     सरदार पटेल भारत के पहले उप-प्रधानमंत्री थे। उपप्रधानमंत्री की सभी शक्तियाँ एक कैबिनेट मंत्री की शक्तियाँ होती हैं।
-     उप-प्रधानमंत्री की नियुक्ति ज्यादातर कमजोर प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में हुई, जिन्हें या तो अपने दल में पूर्ण समर्थन प्राप्त नहीं था अथवा प्रधानमंत्री के दल का लोक सभा में पूर्ण बहुमत नहीं था।