Rh कारक (Rh-Factor) –
• Rh–एंटीजन की खोज कार्ल लैण्ड स्टीनर तथा वीनर ने मकाका रीसस प्रजाति के बंदर में की थी तथा इसे Rh– कारक कहा, जिसमें Rh–एंटीजन उपस्थित हो, उसे Rh+ तथा Rh एंटीजन अनुपस्थित हो, तो इसे Rh– कहते हैं।
• ORh+ रुधिर वर्ग के लोग सार्वत्रिक दाता तथा ABRh+ वाले सार्वत्रिक ग्राही होते हैं।
• RH+ रुधिर, Rh– रुधिर वाले व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता है, परंतु Rh– रुधिर वाले व्यक्ति काे दिया जा सकता है। अत: ORh+ रुधिर ABRh– को नहीं दिया जा सकता।

• A,a तथा B, b (एंटीजन, एंटीबॉडी) कभी न मिलने चाहिए, इसी कारण रक्ताधान संभव नहीं हो पाता है।
• RBC की सतह पर रक्त समूह के एंटीजन ⇒ एग्लूटिनोजन (Aglutinogons)
• रक्त प्लाज्मा में रक्त समूह से संबंधित एंटीबॉडीज = एग्लूटिनिन्स (Aglutinins)
• यदि गलत रक्त समूह का रक्त किसी व्यक्ति के शरीर में डाल दिया जाता है, तो एग्लुटिनेशन (Aglutination) की क्रिया होती है, जिसमें RBC की सतह चिपचिपी होने से ये आपस में चिपक जाती है, ऐसे में रक्त RBC के गुच्छे, बन जाते हैं तथा गैसीय परिवहन प्रभावित होता है।
• एन्टीकोगूलेन्ट – प्लाज्मा में एक मजबूत विषमपॉलीसैकेराइड अधिक रुधिर का थक्का नहीं जमने देता इसे हिपेरिन भी कहते हैं।
Important Fact –
• यदि नर Rh+ve तथा मादा Rh–ve हो तो इनके मध्य होने वाले विवाह को जैविक रूप से निषेध माना जाता है।
• O– रक्त समूह सार्वत्रिक दाता है।
• AB+ रक्त समूह सार्वत्रिक ग्राही है।
• रक्त समूह O में RBC पर एंटीजन नहीं पायी जाती है।
• रक्त समूह AB में किसी भी प्रकार की एंटीबॉडी नहीं पायी जाती है।