इरिथ्रोब्लास्टोसिस फिटेलिस –
• यह Rh कारक के कारण उत्तरदायी होता है।
• यदि नर Rh+ve तथा मादा Rh–ve हो तो उनके मध्य होने वाला विवाह जैविक रूप से निषेध माना जाता है।
• यदि माता का रुधिर वर्ग Rh– तथा गर्भस्थ शिशु का रुधिर वर्ग Rh+ होता है, तो उनके रुधिर में असमानता का कारण बन जाता है।
• इस परिस्थिति में माता Rh+ गर्भस्थ शिशु के दौरान अति-संवेदनशील हो जाती है, क्योंकि विकासशील शिशु की कुछ RBC माता की रुधिर धारा में मिल जाती है, जिससे माता में प्रति Rh–एंटीबॉडी का निर्माण हो जाता है।
• यह घटना प्रथम गर्भावस्था के समय नहीं होता है, क्योंकि शिशु व माता का रुधिर आवनाल द्वारा पृथक रहता है।
• लेकिन दूसरी गर्भावस्था/तीसरी गर्भावस्था में Rh+ शिशु इन Rh– एंटीबॉडी के संपर्क में आ जाता है तथा शिशु के रुधिर में ये एंटीबॉडी आकर RBC को नष्ट कर देती है, जो शिशु के लिए हानिकारक होता है।
• इससे शिशु में एनीमिया/पीलिया रोग हो सकते हैं। इस स्थिति को इरिथ्रोब्लास्टोसिस फिटेलिस कहते हैं।
• बच्चे के जन्म के समय माता के शरीर में Anti–D के इंजेक्शन लगाए जाते हैं (24 घण्टे के भीतर), जिससे माता के शरीर में एंटीबॉडीज का निर्माण नहीं होता है। इसे 'रोगम विधि' कहते हैं।
WBC (श्वेत रक्त कणिका, श्वेत रुधिराणु, ल्यूकोसाइट्स) –

• इनकी सामान्य संख्या 6000-8000 प्रति mm3 होती है।
• इनका आकार 12-20 \(\mu\) (माइक्रोन) होता है।
• इनकी आकृति अनियमित/अमीबीय होती है।
• WBC की संख्या में असामान्य वृद्धि को ल्यूकोसाइटोसिस कहते हैं। (ल्यूकेमिया, एलर्जी एवं जीवाणु में संक्रमण की संभावना)
• WBC की संख्या में असामान्य कमी को ल्यूकोसाइटोपीनिया कहते हैं। (एड्स, वायरल संक्रमण)
• अनियमित आकार के कारण ये WBC कई बार रक्त नलिकाओं से बाहर अंत:कोशिकीय स्थान में आ जाती है, जिसे 'डायापीडेसिस' कहते हैं।
• RBC के विपरीत WBC में केंद्रक एवं अन्य कोशिकांग पाए जाते हैं।
• WBC दो प्रकार की होती है -
(1) अकणिकामय श्वेत रक्त कणिका
(2) कणिकामय श्वेत रक्त कणिका
I. अकणिकामय श्वेत रक्त कणिका
• इसमें केंद्रक बड़े आकार का होता है।
• इनका निर्माण लसिका ग्रंथियों से होता है।
• इनका कोशिकाद्रव्य स्वच्छ होता है, जो कणिकारहित होता है।
• इसके अंतर्गत लिम्फोसाइट व मोनोसाइट आते हैं।
1. लिम्फोसाइट –
• इसकी कुल मात्रा WBC की 20-25% होती है।
• ये अगतिशील व अभक्षकाणु होती है।
• यह संक्रमण में एंटीबॉडी (प्रतिरक्षी) निर्माण करती है।
• यह सबसे छोटी WBC है।
• यह B– लिम्फोसाइट्स व T–लिम्फोसाइट्स में विभक्त होती है।
2. मोनोसाइट –
• केन्द्रक घोड़े की नाल व सेम के बीज के समान होता है।
• इसकी कुल मात्रा WBC का केवल 2-10% होती है।
• यह गतिशील होती है।
• यह एंटीजन का भक्षण करती है।
• यह सबसे बड़े आकार की WBC है।
II. कणिकामय श्वेत रक्त कणिका
• इसमें केंद्रक पालियों जैसे 2, 5 में विभक्त होता है।
• इनका निर्माण अस्थिमज्जा में होता है।
• इसके कोशिकाद्रव्य में विशेष कणिकाएँ पायी जाती है।
• इसके अंतर्गत इओसिनोफिल्स/एसिडोफिल्स या ऑक्सिफिल्स, बेसोफिल्स, न्यूट्रोफिल्स आते हैं।
1. इओसिनोफिल्स –
• इसकी कुल मात्रा WBC का 1-2% भाग होती है।
• केंद्रक दो पालियों में विभक्त होता है।
• इसे अम्लीय अभिरंजन इओसिन अभिरंजित किया जाता है।
• यह प्रतिरक्षण व एलर्जी में सहायक है, क्योंकि एलर्जी व संक्रमण में इनकी संख्या में वृद्धि होती है।
2. बेसोफिल्स –
• इनकी मात्रा WBC की 0-1% होती है।
• केंद्रक तीन पालियों में विभक्त होता है।
• इसे क्षारीय अभिरंजन मिथाइलीन ब्लू से अभिरंजित किया जा सकता है।
• यह एलर्जी के समय हिस्टामिन व सिरेटॉनिन का स्रवण करती है।
3. न्यूट्रोफिल्स –
• इनकी मात्रा WBC की 60-65% होती है, जो सर्वाधिक होती है।
• केंद्रक 5 या अधिक पालियों में विभक्त रहता है। इसलिए केंद्रक बहुपालित होता है।
• ये कणिकाएँ अम्लीय एवं क्षारीय दोनों अभिरंजन से अभिरंजित होती है।
• इसे मेक्रोफेजेज भी कहते हैं।
• संक्रमण में इन कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि होती है।
• यह लिंग परीक्षण में सहायक है।
नोट -
• मादाओं की न्यूट्रोफिल्स में केंद्रक के पास ड्रम-स्टिक जैसी एक संरचना पाई जाती है, जिसे बार काय (Barr Body) कहते हैं।
बार काय की संख्या = X-गुणसूत्रों की संख्या-1
उदाहरण -
नर (44 + XY) = 1-1 = 0
मादा (44 + XX) = 2-1 = 1
टर्नर सिन्ड्रोम (44 + XO) = 1-1 = 0