लिम्फोसाइट्स-
• इनका उत्पादन लिम्फ ग्रंथियों, थाइमस, प्लीहा, आँतोa के पेयर्स पेचेज में व ‘अस्थिमज्जा’ में होता है।
• मोनोसाइट्स व ग्रेन्यूलोसाइट्स की उत्पादन की प्रक्रिया अस्थिमज्जा में होती है।
• WBC के उत्पादन को ल्यूकोपोएसिस कहते हैं।
• WBC का जीवनकाल-
(i) लिम्फोसाइट्स – कई वर्षों तक
(ii) मोनोसाइट – कुछ घंटो तक (1 दिन से भी कम)
(iii) ग्रेन्यूलोसाइट्स – 7 से 10 दिन
पट्टिकाणु- (Platelates,थ्रोम्बोसाइट्स)
• इनकी सामान्य संख्या 1.5 लाख से 4 लाख प्रति MM3 होती है।
• इसका उत्पादन अस्थिमज्जा में होता है, जिसे थ्रोम्बोपोएसिस कहते हैं।
• प्लेटलेट्स की संख्या में असामान्य कमी को थ्रोम्बोसाइटोपीनिया कहते है जैसे- डेंगू रोग से ग्रसित व्यक्ति में प्लेटलेट्स की संख्या में असामान्य कमी हो जाती है।
• प्लेटलेट्स की संख्या में असामान्य वृद्धि को थ्रोम्बोसाइटोसिस कहते हैं जैसे- रक्त नलिकाओं में रक्त के थक्के जमना।
• प्लेटलेट्स का मुख्य कार्य चोट लगने पर चोटग्रस्त स्थान पर रक्त का थक्का जमाना है, तथा इसके अलावा ये रक्त को गाढ़ा बनाने में सहायक है।
Blood Clotting (रुधिर थक्का)
• चोट लगने से कुछ समय बाद चोट से रुधिर का बहना रूक जाता है, जिससे चोटग्रस्त ऊतक का अत्यधिक रुधिर हृास नहीं होता है।
• रुधिर का थक्का एक जटिल प्राकृतिक प्रक्रिया हैं, जिसमें मुख्य चरण निम्न हैं-
• थ्रोम्बोप्लास्टिन, प्रोथोम्बिनेज एन्जाइम बनाता है, जो हिपेरिन को निष्क्रिय तथा प्लाज्मा प्रोटीन को सक्रिय बनाती है अत: प्रोथोम्बिनेज को थ्रोम्बिन में परिवर्तित करता है।
• इस प्रकार थ्रोम्बिन प्रोटीन पाचक एन्जाइम्स की भाँति कार्य करता है, जो फाइब्रिनोजन विटामिन-K की उपस्थिति में यकृत द्वारा निर्मित जो फाइब्रिन अणु में परिवर्तित करता है, जो रुधिराणुओं के साथ मिलकर थक्का बनाता है।
• रक्त स्कंदन (Blood Clotting) के बारे में मैफ्फरलेन ने केस्केड सिद्धांत (Cascade theory) प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार रक्त के जमने की क्रिया द्वारा 5-8 मिनट में चोटग्रस्त स्थान पर रक्त का थक्का बन जाता है।
• रक्त स्कंदन में कई कारक भाग लेते हैं जो निम्न है
I- फाइब्रिनोजन
II- प्रोथ्रोम्बिन
III- थ्रोम्बोप्लास्टिन
IV- कैल्शियम
V- प्रोएक्सिलेरिन
VI- एंटीहीमोफिलिक कारक-A
VII- एंटीहीमोफिलिक कारक-B
VIII- स्टुअर्ट-प्रोवर कारक
IX- एटीहीमोफिलिक कारक-C
X- हेगमान कारक
XI- लाकी-लॉरेंड कारक