डेयरी (Dairy)

राजस्थान की अर्थव्यवस्था मुख्यत: ग्रामीण व कृषि आधारित है। ग्रामीण क्षेत्रों में मिश्रित कृषि के तहत पशुपालन व डेयरी व्यवसाय का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

राजस्थान में डेयरी विकास कार्यक्रम, सहकारी समितियों के माध्यम से क्रियान्वित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत वर्ष 2019-20 में दिसम्बर, 2019 तक 15, 017 दुग्ध सहकारिता समितियों को राज्य में 21 जिला दुग्ध उत्पादन सहकारी संघों एवं राज्य स्तर पर शीर्षस्थ संस्थान, राजस्थान सहकारी डेयरी फेडरैशन (RCDF) लिमिटेड जयपुर से सम्बद्ध किया गया है। 

विभिन्न योजनाओं में उपलब्ध वित्तीय सहायता एवं स्वयं के संसाधनों से जिला दुग्ध संघ संयंत्रों की दुग्ध प्रसंस्करण क्षमता बढ कर 30.60 लाख लीटर प्रतिदिन हो गई है। वित्तीय वर्ष 2019-20 में माह दिसम्बर, 2019 तक RCDF से सम्बद्ध सभी दुग्ध संघों ने प्रतिदिन औसतन 24.23 लाख किग्रा. दुग्ध संकलित किया गया है। वर्तमान में, राज्य भर में 8.2 लाख दुग्ध उत्पादन सहकारीता पर आधारित डेयरी विकास कार्यक्रम से सम्बद्ध है एवं वर्ष पर्यन्त दुग्ध का पारिश्रमिक प्राप्त कर रहे है। दुग्ध संघों ने वर्ष 2019-20 के दौरान दुग्ध उत्पादकों को माह दिसम्बर, 2019 तक रु. 2,602.25 करोड़ का भुगतान किया है।

राजस्थान सहकारी डेयरी फैडरेशन द्वारा पोष्टिक पशुआहार भी उपलब्ध कराया जा रहा है। वर्ष 2019-20 में दिसम्बर, 2019 तक 2.97,936 मैट्रिक टन पशु आहार का उत्पादन किया गया है।

राजस्थान में 1972-73 में डेयरी विभाग के अन्तर्गत जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघों की स्थापना की गई। वर्ष 1975 में विश्व बैंक की सहायता से राज्य डेयरी विकास निगम' की स्थापना की गई। जिसे 1977 में राजस्थान सहकारी डेयरी फेडरेशन (RCDF) में परिवर्तित कर दिया गया।

राजस्थान में डेयरी विकास कार्यक्रम का वर्तमान संस्थागत ढ़ाचा

1.शीर्ष स्तर - राजस्थान सहकारी डेयरी फेडरेशन (RCDF) इसकी स्थापना 1977 में राज्य के दुग्ध उत्पादकों को उनके दूध का उचित मूल्य दिलवाने व उपभोक्ताओं को शुद्ध दुग्ध उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से की गई। RCDF सरस' ब्रांड से दुग्ध उत्पाद उपलब्ध कराता है।

2.जिला स्तर - जिला दुग्ध उत्पादक संघ - वर्तमान में राज्य में 21 जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ कार्यरत है।

3.प्राथमिक स्तर - प्राथमिक स्तर पर वर्तमान में राज्य में 14466 दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियाँ कार्यरत हैं। ये दुग्ध उत्पादकों से दूध एकत्रित कर जिला दुग्ध उत्पादक संघों को उपलब्ध करवाती है। दुग्ध प्रसंस्करण एवं विपणन का कार्य RCDF के अधीन डेयरी संयंत्रों व अवशीतन केन्द्रों द्वारा किया जाता है। वर्तमान में विभिन्न योजनाओं से उपलब्ध वित्तीय सहायता एवं स्वयं के संसाधनों से जिला दुग्ध उत्पादन संयंत्रों की दुग्ध प्रसंस्करण क्षमता बढ़कर 20.35 लाख लीटर प्रतिदिन (स्रोत 2017-18) हो गई है। वर्तमान में, राज्य भर में 8.0 लाख दुग्ध उत्पादक सहकारिता पर आधारित डेयरी विकास कार्यक्रम से संबंद्ध है। डेयरी फेडरेशन द्वारा घी, छाछ, लस्सी, श्रीखंड, पनीर, दही, चीज इत्यादि उत्पादों का भी उत्पादन किया जा रहा है।

राज्य में डेयरी विकास की मुख्य योजनाएँ

1.सरस सुरक्षा कवच (जन श्री बीमा योजना ) - RCDF द्वारा इस योजना का संचालन LIC के माध्य से किया जाता है। इस योजना के तहत राज्यभर के दुग्ध उत्पादकों को सामाजिक सुरक्षा के साथ साथ उनके बच्चों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसके तहत दुग्ध उत्पादकों को स्वाभाविक मृत्यु पर 30 हजार रूपए और दुर्घटना से मृत्यु पर 75 हजार रूपए तथा स्थायी अपंगता पर 37500 रूपए की बीमा राशि दी जाती है। बीमा योजना की छात्र शिक्षा सहयोग निधि योजना में बीमित दुग्ध उत्पादकों को कक्षा 9 से 12 में अध्ययनरत अधिकतम 2 बच्चों की शिक्षा के लिए 1200 रूपए प्रतिवर्ष प्रति छात्र की दर से अतिरिक्त लाभ भी देय होगा।

2. सरस सामूहिक आरोग्य बीमा योजना (मेडिक्लेम) - इस योजना के तहत दुग्ध उत्पादकों को कैशलेस चिकित्सा सुविधा प्रदान की गई है। जिसमें दुग्ध उत्पादकों द्वारा अपने व अपने परिजनों के इलाज में व्यय हुई संपूर्ण राशि यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी द्वारा सीधे ही संबंधित जिला चिकित्सालय को अदा की जाती है। दुग्ध उत्पादकों को चिकित्सालय में कोई राशि अदा नहीं करनी पड़ती है।