-     भारतीय संविधान में ‘संसद' शीर्षक में संघीय व्यवस्थापिका की व्यवस्था की गई है, जिसमें दो सदन हैं-
      1. लोकसभा
      2. राज्य सभा
-     उच्च सदन या राज्य सभा
, जो कि राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है तथा निम्न सदन या लोकसभा, जो कि जनता का प्रतिनिधित्व करती है।
-     राष्ट्रपति को भी संसद का अभिन्न अंग माना गया है। यद्यपि राष्ट्रपति
, संसद के किसी सदन का सदस्य नहीं होता है, फिर भी वह उसका अभिन्न अंग है, क्योंकि वही सत्र को आमंत्रित व स्थगित करता है एवं संसद में उद̖घाटन भाषण देता है, वहाँ अपने संदेश भेजता है तथा संसद में पारित विधेयकों पर हस्ताक्षर कर उन्हें वैधानिकता प्रदान करता है।
-     संसद के अंग-
1. लोकसभा

2. राज्यसभा
3. राष्ट्रपति

लोकसभा

-     यह संसद का निम्न सदन होता है। लोकसभा के सदस्यों को जनता द्वारा प्रत्यक्ष रीति से चुना जाता है, जो व्यक्ति भारत का नागरिक हो तथा 18 वर्ष से अधिक आयु का हो, उसे लोकसभा के निर्वाचनों में मतदान करने का अधिकार होता है।
लोकसभा में सदस्य संख्या-
-     लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 550 निर्धारित की गयी है।
      नोट - हाल ही में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए दो से अनधिक सदस्य मनोनीत करने के प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है।
-     लोकसभा के 530 से अनधिक सदस्य राज्यों में प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष रीति से चुने जाएँगे व 20 से अनधिक सदस्य संघ-राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करेंगे
, जिनका निर्वाचन ऐसी रीति से होगा, जिसे संसद विधि द्वारा उपबंधित करे।
निर्वाचन-
-     संसद के द्वारा इन क्षेत्रों के लिए प्रत्यक्ष निर्वाचन का प्रावधान किया गया है। 
-     संविधान में परिकल्पना की गई है
कि निर्वाचित किए जाने वाले सदस्यों की कुल संख्या को राज्यों के बीच ऐसी रीति से विभाजित किया जाता है, जिससे कि प्रत्येक राज्य के लिए आवंटित स्थानों की संख्या और राज्य की जनसंख्या के बीच यथासंभव ऐसा अनुपात रहे, जो सब राज्यों के लिए समान हो।
कार्यकाल-
-     लोकसभा की निर्धारित कार्यावधि 5 वर्ष की है, वह राष्ट्रपति द्वारा समय से पूर्व भी भंग की जा सकती है जो प्रधानमन्त्री की सलाह पर की जाती है।  
शपथ का प्रावधान-

संविधान में लोकसभा सदस्यों के शपथ लेने का एक समान प्रावधान है।
वे भारत के संविधान और विधि के प्रति पूर्ण आस्था और निष्ठा की शपथ लेते हैं तथा भारत की संप्रभुता और अखण्डता बनाए रखने की शपथ लेते हैं तथा अपने कर्त्तव्यों को विश्वासपूर्वक संपादित करने की शपथ लेते हैं।
      परिसीमन आयोग-
-     लोकसभा क्षेत्रों का जनसंख्या के आधार पर समायोजन, परिसीमन आयोग के द्वारा किया जाता है, प्रत्येक जनगणना के बाद लोकसभा की सीटों का पुन:निर्धारण किया जाता है। इस हेतु संसद ने परिसीमन आयोग अधिनियम का निर्माण किया और वर्तमान समय तक निम्नलिखित परिसीमन आयोग स्थापित किये जा चुके हैं-
(A) वर्ष-1952
(B) वर्ष-1962
(C) वर्ष-1972
(D) वर्ष-2002
• वर्ष-2002 में लोकसभा सीटों को समायोजित करने के लिए 'कुलदीप सिंह आयोग' की स्थापना हुई, जिन्होंने लोकसभा में सीटों की संख्या नहीं बढ़ायी। लेकिन विभिन्न लोकसभा के सीटों के आकार में समायोजन किया गया। इस समायोजन का लाभ अनुसूचित जातियों और जनजातियों को प्राप्त हुआ, क्योंकि उनके लिए आरक्षित सीटों की संख्या लोकसभा में बढ़ गयी।
• वर्ष-2001 की जनगणना के आधार पर अनुसूचित जातियों के लिए 84 तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए 47 सीटें आरक्षित की गयी।
• 84वें संविधान संशोधन के द्वारा वर्ष-2026 तक लोकसभा सीटों की संख्या यथावत् रखने का प्रावधान किया गया।
• 87वें संविधान संशोधन के द्वारा यह भी प्रावधान किया गया कि राज्यों के भीतर लोकसभा क्षेत्रों की पुन:संरचना वर्ष-2001 की जनगणना के आधार पर ही होगी।

परिसीमन आयोग-
-     संविधान में लोकसभा का गठन उल्लेखित किया गया है।जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में लोकसभा की सीटों का विभिन्न राज्यों के लिए आवंटन किया गया है।
-     प्रत्येक जनगणना के बाद लोकसभा की सीटों का समायोजन किया जाता है। परिसीमन आयोग के द्वारा यह कार्य संपादित होता है।

      लोकसभा की सदस्यता हेतु योग्यताएँ (संवैधानिक प्रावधान)
-     वह भारत का नागरिक हो। उसकी आयु 25 वर्ष से ऊपर हो।
-     वह संसद के कानून द्वारा सभी निर्धारित योग्यताओं को धारण करता हो।
-     भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन कोई लाभ का पद धारण न किया हो
लेकिन मंत्री पद या संसद के कानून द्वारा निर्दिष्ट कोई अन्य पद इस वर्ग में नहीं आते।
-     किसी सक्षम न्यायालय द्वारा पागल
, दिवालिया, विदेशी या अनागरिक घोषित न किया गया हो।
-     वह संसद के कानूनों द्वारा निर्धारित किन्हीं अन्य अयोग्यताओं को न रखता हो।
-     कोई व्यक्ति एक ही समय में संसद के दोनों सदनों का या संसद के किसी सदन और राज्य के विधान मंडल का सदस्य नहीं हो सकता।
-     यदि संसद के किसी सदस्य की योग्यता के बारे में कोई शिकायत हो
तो राष्ट्रपति के पास भेजी जा सकती है, वह निर्वाचन आयोग की रिपोर्ट लेकर उचित कार्यवाही करेगा।
-     यदि कोई सदस्य सदन के अध्यक्ष को बिना उचित कारण बताये लगातार 60 दिनों तक सदन से अनुपस्थित रहता है, तो उसे अयोग्य ठहराकर उसके स्थान को रिक्त घोषित करने का प्रावधान है।
लोकसभा अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष-
-     संविधान के अनुसार
लोकसभा स्वयं ही अपने सदस्यों में से एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष का चयन करेगी।
      अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष का पद खाली होना या पद से हटाए जाना –
-     यदि लोकसभा के तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से पद से हटाए जाने का प्रस्ताव पास हो जाए परंतु इस प्रकार के प्रस्ताव को पेश करने के लिए कम से कम 14 दिन की पूर्व सूचना दी गई हो।
-     अध्यक्ष द्वारा स्वयं से पदत्याग करना।
-     यदि वह सदन का सदस्य नहीं रहता है।
      अध्यक्ष की अनुपस्थिति में अध्यक्षता-
-     इस स्थिति में उपाध्यक्ष लोकसभा की अध्यक्षता करता है। अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष की अनुपस्थिति में लोकसभा की अध्यक्षता, लोकसभा द्वारा बनाए गये पैनल में से वरिष्ठता के क्रम पर आने वाला व्यक्ति करता है।

      लोकसभा अध्यक्ष के अधिकार व शक्तियाँ-
-     लोकसभा अध्यक्ष विधायिका का सबसे महत्वपूर्ण पदाधिकारी है तथा इस कारण से वह अत्यधिक शक्तियाँ धारण करता है, जो निम्नलिखित प्रकार से हैं-
(
A) व्यवस्था संबंधी शक्तियाँ-
-     इसके अंतर्गत लोकसभा अध्यक्ष द्वारा संसदीय कार्यवाही संचालित करने के लिए सदन में व्यवस्था व मर्यादा बनाए रखना, सदन की कार्यवाही के लिए समय का निर्धारण करना, संविधान व सदन की प्रक्रिया संबंधित नियमों की व्याख्या करना, विवादास्पद विषयों पर मतदान कराना व अपने निर्णय की घोषणा करना, बराबर मत पड़ने पर निर्णायक मत देना, प्रस्ताव, प्रतिवेदन व व्यवस्था के प्रश्नों को स्वीकार करना, मंत्री पद छोड़ने के बाद सदस्य को सदन के सम्मुख अपना वक्तव्य देने की अनुमति देना, सदस्यों की जानकारी के लिए विचाराधीन महत्वपूर्ण विषयों पर उद̖बोधन देना, संवैधानिक मामलों पर अपनी सहमति देना, गणपूर्ति के अभाव में सदन की बैठक स्थगित करना, किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में बोलने की अनुमति देना व उसके भाषण के हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद की व्यवस्था करना तथा सदन के नेता की प्रार्थना पर सदन की गुप्त बैठक के आयोजन की स्वीकृति देना है।
(B) निरीक्षण व भर्त्सना संबंधी शक्तियाँ-
-     इसके अंतर्गत संसदीय समितियों की अध्यक्षता करना, संसदीय समितियों के अध्यक्षों को निर्देश देना, सार्वजनिक हित में सदन या समिति को आवश्यक जानकारी देने के लिए सरकार को आदेशित करना, सदन में असंसदीय व निरर्थक बातों को रोकना, अमर्यादित व उच्छृंखल संदर्भों को कार्यवाही में से निकालना, सदन में बोलने के लिए सदस्यों को स्वीकृति देना, किसी सदस्य को अराजक व्यवहार के कारण निष्कासित करना या उसे मॉर्शल द्वारा सदन से बाहर निकालना, गंभीर अव्यवस्था उत्पन्न होने पर सत्र को स्थगित कर देना, सदन की सीमा में किसी सदस्य की गिरफ्तारी या उसके विरुद्ध वैधानिक कार्यवाही करने की अनुमति देना, विशेषाधिकार प्रस्ताव स्वीकार करना व आरोपित अपराधी के विरुद्ध गिरफ्तारी के आदेश जारी करना तथा किसी व्यक्ति को सदन की अवमानना करने या उसके विशेषाधिकार के उल्लंघन करने पर सदन के निर्णय को लागू करना शामिल है।
(C) प्रशासन संबंधी शक्तियाँ-
-     इसमें संसद के सचिवालय पर नियंत्रण रखना, दर्शक दीर्घा व प्रेस दीर्घा का नियंत्रण करना, सदन के सदस्यों के लिए आवास व अन्य सुविधाओं की व्यवस्था का प्रावधान करना, सदन व उसकी समितियों की बैठकों की व्यवस्था करना, संसदीय कार्यवाही व आलेखों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था करना, सदन के सदस्यों व कर्मचारियों के जीवन व सदन की संपत्ति की सुरक्षा की उपयुक्त व्यवस्था करना तथा सदन के सदस्य का त्यागपत्र स्वीकार करना या उसे इस आधार पर अस्वीकार करना, कि ऐसा कार्य विवशता के कारण किया गया है।
(D) विविध शक्तियाँ-
-     इसमें सदन द्वारा पारित विधेयक को प्रमाणित करना कि कोई विधेयक, धन विधेयक है या नहीं। इसे निर्णित करना, संसद के संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता करना, राष्ट्रपति व सदन के मध्य संपर्क सूत्र के रूप में कार्य करना। संसदीय व्यवस्था में भारतीय संसदीय दल के पदेन प्रधान के रूप में कार्य करना, पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन की अध्यक्षता करना, संसदीय शिष्टमंडल के लिए सदस्यों को मनोनीत करना, शोक व संवेदना प्रकट करना, सदन के कार्यकाल की समाप्ति पर विदाई भाषण देना व महत्वपूर्ण राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर टिप्पणी करना, सदन द्वारा पारित विधेयक की स्पष्ट त्रुटियों को ठीक करना तथा राजनीतिक दल-बदल के अपराध से ग्रस्त संसत्सदस्य या सदस्यों के मामलों में अयोग्यता संबंधी निर्णय देना शामिल है।
 शपथ का प्रावधान-
संविधान में लोकसभा सदस्यों और राज्य सभा सदस्यों के शपथ लेने का एक समान प्रावधान है।
वे भारत के संविधान और विधि के प्रति पूर्ण आस्था और निष्ठा की शपथ लेते हैं तथा भारत की संप्रभुता और अखण्डता बनाए रखने की शपथ लेते हैं तथा अपने कर्त्तव्यों को विश्वासपूर्वक संपादित करने की शपथ लेते हैं।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार अयोग्यताएँ-
-     अनुच्छेद
-327 के अंतर्गत निर्वाचन नियंत्रित करने के लिए वर्ष-1951 के जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में अयोग्यताओं की कुछ शर्तों का उल्लेख किया गया है। (वे राज्य विधान सभाओं के सदस्यों के लिए भी हैं) जो इस प्रकार हैं-
कोई सदस्य किसी न्यायालय या चुनाव अधिकरण द्वारा निर्वाचन अनियमितताओं या चुनाव में भ्रष्टाचार का दोषी सिद्ध न किया गया हो।
उसे किसी न्यायालय द्वारा दो वर्ष से अधिक की कैद की सजा न दी गई हो।

उसने कानूनी प्रक्रिया के अनुसार निर्धारित समय के भीतर अपने चुनाव खर्च का विवरण जमा न किया हो।
वह सरकारी सेवा में भ्रष्टाचार व अविश्वसनीयता के कारण पदमुक्त न किया गया हो।
वह किसी ऐसे निगम का निदेशक या व्यवस्थापक या अभिकर्ता न हो, जिसमें सरकार की वित्तीय भागीदारी हो या लाभ का पद न धारण किया हो।
वह किसी सरकारी ठेके, सरकारी कार्यों व सेवाओं के क्रियान्वयन में आर्थिक हित न रखता हो।
निर्वाचन के लिए नामांकन-पत्र भरते समय उम्मीदवार में ऊपर लिखित अयोग्यताएँ नहीं होनी चाहिए। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के अनुसार अयोग्यता के विवाद का निर्धारण उच्च न्यायालय के द्वारा किया जाता है।

दल-बदल कानून के अंतर्गत अयोग्यता-
-     संविधान की दसवीं अनुसूची में दल-बदल संबंधी विधि का उल्लेख है। यदि किसी भी सदस्य के विरुद्ध दल-बदल कानून के उल्लंघन का मामला प्रस्तुत होता है, तो अयोग्यता का निर्धारण लोकसभा के स्पीकर के द्वारा किया जाता है।
संविधान में वर्णित अयोग्यता-
-     भारतीय संविधान में सांसद की उम्र लोकसभा के लिए 25 वर्ष और राज्य सभा के लिए 30 वर्ष - निर्धारित है। वह भारत का नागरिक होना चाहिए तथा वह किसी लाभ के पद पर नहीं होना चाहिए। किसी न्यायपालिका के द्वारा विकृत चित्त का घोषित नहीं होना चाहिए और न ही वह दिवालिया होना चाहिए। इन अयोग्यताओं का निर्धारण राष्ट्रपति के द्वारा निर्वाचन आयोग की सलाह पर किया जाता है।
दोहरी सदस्यता-
-     जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में दोहरी सदस्यता के संबंध में प्रावधान किया गया है। जिसके अनुसार यदि कोई भी व्यक्ति संसद के दोनों सदनों के लिए निर्वाचित हो जाता है तो उसे 10 दिन की अवधि के भीतर यह सूचित करना होगा कि वह किस सदन का सदस्य बना रहेगा। यदि वह ऐसी सूचना नहीं देता तो उसकी राज्य सभा की सदस्यता समाप्त हो जाएगी।
-     यदि किसी सदन का वर्तमान सदस्य
, दूसरे सदन के लिए निर्वाचित होता है, तो उसकी पहले से निर्वाचित सदन की सदस्यता समाप्त हो जाएगी।
-     यदि कोई सदस्य किसी सदन में दो सीटों से निर्वाचित हो जाता है
तो उसे इसमें से एक सीट रिक्त करनी होगी, अन्यथा उसकी दोनों सीटों की सदस्यता समाप्त हो जाएगी।
      लोकसभा में विपक्ष का नेता-
-     संसदीय व्यवस्था में लोकसभा में विपक्ष के नेता पद की मान्यता लोकसभा स्पीकर के द्वारा दी जाती है।
-     विपक्ष के नेता के लिए दल के सदस्यों की संख्या लोकसभा के कुल सदस्य संख्या का कम से कम 1/10 सदस्य होनी चाहिए। अतः विपक्ष के नेता पद के लिए दल के पास कम से कम 55 सांसद होने चाहिए।
-     वर्ष-1977 में भारत में विपक्ष के नेता के पद को वैधानिक बना दिया गया और विपक्ष के नेता के वेतन एवं भत्ते का प्रावधान किया गया।
-     विपक्ष नेता के वेतन एवं भत्ते कैबिनेट मंत्री के वेतन एवं भत्तों के समान होते हैं।

राज्य सभा
राज्य सभा, भारतीय संसद का उच्च सदन है। जो भारत संघ की इकाइयों का प्रतिनिधित्व करता है।
अमेरिका की सीनेट की तरह ही यह एक स्थायी सदन है। यह न तो कभी भंग होती है और न ही कभी इसकी नए सिरे से रचना होती है।

 सदस्य संख्या-
इसमें सदस्यों की अधिकतम संख्या-250 हो सकती है जिनमें 238 निर्वाचित होंगे और 12 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाएंगे।
वर्तमान में राज्य सभा की वास्तविक सदस्य संख्या 245 है, जिसमें 229 सदस्य राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा 4 सदस्य केन्द्र शासित क्षेत्रों से निर्वाचित होते हैं।

मनोनीत सदस्य-
राज्यसभा में मनोनीत सदस्य ऐसे सदस्य होंगे, जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला तथा समाज सेवा का विशेष या व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हो। राज्य सभा में राज्यों तथा संघ-राज्य क्षेत्रों की विधान सभाओं के लिए आवंटित स्थान को संविधान की चौथी अनुसूची में वर्णित किया गया है।
 निर्वाचन-
राज्यसभा अप्रत्यक्ष रीति से लोगों का प्रतिनिधित्व करती है क्योंकि राज्यसभा के सदस्य राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा आनुपातिक पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा चुने जाते हैं।     
राज्यसभा में प्रतिनिधित्व-

संघ के विभिन्न राज्यों को राज्यसभा में समान प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है।
भारत में प्रत्येक राज्य के प्रतिनिधियों की संख्या ज्यादातर उसकी जनसंख्या पर निर्भर करती है। इस प्रकार उत्तर प्रदेश में राज्य सभा में सर्वाधिक 31 सदस्य हैं
, जबकि मणिपुर, मिजोरम, सिक्किम, त्रिपुरा इत्यादि छोटे राज्यों से केवल एक-एक सदस्य हैं।
कार्यकाल-
-     लोकसभा के विपरीत राज्य सभा एक स्थायी निकाय है     और उसे कभी भी भंग नहीं किया जा सकता। राज्य सभा के प्रत्येक सदस्य की कार्यावधि छ: वर्षों की है, उसके सदस्यों में से यथासंभव एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक द्वितीय वर्ष की समाप्ति पर सेवानिवृत हो जाते हैं।
-     सदस्यों की पदावधि उस तिथि से आरंभ हो जाती है, जब भारत सरकार द्वारा सदस्यों के नाम राजपत्र में अधिसूचित किए जाते हैं।

शपथ का प्रावधान-
संविधान में राज्य सभा सदस्यों के शपथ लेने का एक समान प्रावधान है।
वे भारत के संविधान और विधि के प्रति पूर्ण आस्था और निष्ठा की शपथ लेते हैं तथा भारत की संप्रभुता और अखण्डता बनाए रखने की शपथ लेते हैं तथा अपने कर्त्तव्यों को विश्वासपूर्वक संपादित करने की शपथ लेते हैं।

सभापति व उपसभापति-
उप-राष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है जिसका संसद के दोनों सदनों द्वारा निर्वाचन किया जाता है।
उपसभापति पद के लिए राज्य सभा के सदस्यों द्वारा अपने में से किसी सदस्य का चयन किया जाता है।  

 राज्यसभा की सदस्यता के लिए योग्यता-
• राज्य सभा की सदस्यता के लिए 30 वर्ष या इससे अधिक की आयु होना आवश्यक है।
• वह भारत का नागरिक हो।
• वह भारत सरकार या किसी राज्य के अधीन लाभ का पद धारण न किया हो।
• वह पागल, दिवालिया न हो।
• वह
संसद के किसी कानून द्वारा अयोग्य घोषित न किया गया हो।
 राज्य सभा के कार्य एवं शक्तियाँ-
-     राज्य सभा एवं लोकसभा की तुलना में राज्य सभा को कम शक्तियाँ एवं कार्य प्राप्त हैं, फिर भी उसकी महत्ता को कम नहीं आंका जा सकता है, क्योंकि कोई भी गैर-धन विधेयक दोनों सदनों की स्वीकृति के बिना पारित नहीं किया जा सकता।
-     दोनों सदनों में मतभेद की स्थिति में राष्ट्रपति को दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाने का अधिकार है तथा राज्य सभा सरकार पर नियंत्रण रखने के लिए स्थगन प्रस्ताव
, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव व अन्य प्रस्ताव प्रस्तुत कर तथा आधे घंटे की बहस की माँग उठाकर सरकार पर अपना नियंत्रण रख सकती है, लेकिन मंत्रिमंडल को नष्ट नहीं कर सकती है।
-     धन विधेयक
, केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है परंतु राज्य सभा 14 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से पास करके लोकसभा को अपने सुझावों के साथ भेजती है तथा लोकसभा की इच्छा पर निर्भर करता है कि वह इन्हें स्वीकार करें या ना करें।
राज्य सभा व लोकसभा की एक समान शक्तियाँ-

      संविधान संशोधन के संदर्भ में-
• 
राज्य सभा को संवैधानिक संशोधनों के मामले में समान अधिकार प्राप्त हैं, क्योंकि संविधान के अनुसार, ऐसा विधेयक दोनों सदनों के विशेष बहुमत द्वारा पारित होना चाहिए।
• यह विधेयक संसद के किसी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिससे दोनों सदनों के मध्य गतिरोध होने पर राष्ट्रपति संसद की संयुक्त बैठक बुलाए।

राष्ट्रपति के निर्वाचन एवं महाभियोग के संदर्भ में-
-     राज्य सभा को राष्ट्रपति के निर्वाचन व महाभियोग में लोकसभा के समान शक्तियाँ प्राप्त हैं।
• यह बात सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व भारत के नियंत्रक व महालेखा परीक्षक जैसे उच्च पदाधिकारी को विशेष अभियोग द्वारा हटाने के बारे में भी लागू होती है।

आपात उद̖घोषणा-
राष्ट्रपति द्वारा आपात कालीन घोषणा हेतु दोनों सदनों द्वारा स्वीकृति मिलनी चाहिए। राष्ट्रपति द्वारा आपात काल में मौलिक अधिकारों को स्थगित करने वाले तथा वित्तीय आपात काल में वित्तीय औचित्य के सिद्धांतों के निर्धारण संबंधी आदेशों की स्वीकृति के लिए संसद के दोनों सदनों का समर्थन जरूरी है। संकट के समय सैनिक, कानून, न्यायालयों की स्थापना के लिए राज्य सभा को लोकसभा के समान अधिकार प्राप्त हैं।
प्रतिवेदनों के संदर्भ में-
विभिन्न स्वायत्तशासी संस्थाओं जैसे-संघ लोक सेवा आयोग, भारत के नियंत्रक व महालेखा परीक्षक, अल्पसंख्यक आयोग, वित्त आयोग आदि के प्रतिवेदन दोनों सदनों के सामने विचारार्थ रखे जाते हैं।  
राज्य सभा को प्राप्त विशेष शक्तियाँ-
• अनुच्छेद-249
के अनुसार, राज्य सभा अपने दो-तिहाई बहुमत से एक प्रस्ताव पास करके राज्य सूची के किसी विषय को राष्ट्रीय महत्व के आधार पर समवर्ती सूची या संघ सूची में रख सकती है।
• ऐसा प्रस्ताव एक वर्ष तक लागू रह सकता है, जिसे राज्य सभा बार-बार पास कर सकती है। प्रस्ताव पारित होने के बाद संसद सामान्य काल में राज्य सूची के उस विषय पर कानून बना सकती है।

• अनुच्छेद-312 के अनुसार यदि राष्ट्रीय हित के लिए आवश्यक या उपयोगी हो, तो दो-तिहाई बहुमत से पास प्रस्ताव के द्वारा राज्य सभा एक या अधिक अखिल भारतीय सेवाओं का गठन कर सकती है।
• लोकसभा के भंग होने पर राज्य सभा ही राष्ट्रपति के आपात कालीन अधिकारों के प्रयोग द्वारा लोकतांत्रिक नियंत्रक लगा सकती है।
• राज्य सभा, भारत के उपराष्ट्रपति के निष्कासन प्रस्ताव का प्रारंभ कर सकती है।

लोकसभा की विशेष शक्ति-
• धन विधेयक, पहले लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है। अनुदान की माँग पर मतदान केवल लोकसभा में होता है सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने की शक्ति केवल लोकसभा के पास है।
• लोकसभा का स्पीकर, संसद की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता करता है। संयुक्त बैठक में लोकसभा में ज्यादा संख्या होने के कारण संयुक्त बैठक में इसकी प्रभावी भूमिका होती है।
• मंत्रिपरिषद, लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। लोकतंत्र में लोगों के प्रतिनिधित्व का सदन होने के कारण लोकसभा का महत्व निर्विवाद रूप से है।
• धन विधेयक को प्रमाणित करने की शक्ति, लोकसभा के स्पीकर के पास है।
• राष्ट्रीय आपात (अनुच्छेद-352) को समाप्त करने की शक्ति
केवल लोकसभा के पास है।
बैठक-
• संविधान के अनुसार लोकसभा की बैठक वर्ष में कम से कम दो बार अवश्य होनी चाहिए और उन बैठकों के मध्य छ: (6) माह से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए।
 • गणपूर्ति या कोरम
• संसद के किसी सदन की बैठक जब इसकी गणपूर्ति या कोरम पूर्ण हो।
• गणपूर्ति या कोरम सदन की कुल संख्या का 1/10 भाग होता है।

लोकसभा के विघटन के पश्चात लंबित विधेयकों का भविष्य-
• अनुच्छेद-85 के अनुसार, यदि विधेयक राज्य सभा द्वारा पारित करके लोकसभा में लंबित है, तो लोकसभा के विघटन के पश्चात उसे समाप्त मान लिया जाएगा।
• यदि कोई विधेयक लोकसभा में लंबित है और लोकसभा विघटित हो जाय, तो वह विधेयक समाप्त मान लिया जाएगा।
• यदि कोई विधेयक, लोकसभा ने पारित कर दिया हो तथा लोकसभा के विघटन के समय राज्य सभा में लंबित हो, तो वह समाप्त मान लिया जाएगा।
• लोकसभा के विघटन के पश्चात दो प्रकार के विधेयकों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा-
• यदि कोई विधेयक राज्य सभा में ही प्रस्तुत हो तथा राज्य सभा में लंबित हो।
• यदि राष्ट्रपति ने सदन की संयुक्त बैठक को आहूत किया हो, तो लोकसभा के विघटन के पश्चात भी संयुक्त बैठक होगी
जिसमें विधेयक पर विचार किया जाएगा।
• ऐसे विधेयक, जिसे दोनों सदनों ने पारित करके राष्ट्रपति के समक्ष भेज दिया हो
लेकिन राष्ट्रपति ने उन्हें अनुमति नहीं प्रदान की हो।
राज्य सभा के गैर-संघात्मक लक्षण-
• भारत में राज्य सभा के सदस्यों का निर्वाचन राज्यों की जनसंख्या के अनुसार होता है, जिसके अनुसार उत्तर प्रदेश से राज्य सभा के सर्वाधिक जबकि मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय जैसे राज्यों से राज्य सभा में केवल एक-एक प्रतिनिधि को भेजा जाता है जिससे यह प्रतीत होता है कि राज्य सभा में सभी राज्यों का प्रतिनिधित्व समान नहीं है जो संघीय भावना के प्रतिकूल है, क्योंकि राज्य सभा में होने वाले मतदान में बड़े राज्यों के मतों का ही निर्णायक महत्व होता है।
• राज्य सभा के चुनाव में भाग लेने के लिए उस राज्य विशेष का निवासी होना आवश्यक नहीं है। अतः राज्य सभा, राज्यों का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकती है?

राज्य सभा और प्रधानमंत्री-
• संसदीय शासन की परंपरा के अनुसार प्रधानमंत्री लोकसभा का सदस्य होना चाहिए। लोकसभा जनता की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला सदन है और प्रधानमंत्री कार्यपालिका शक्तियों का वास्तविक प्रधान होता है। प्रधानमंत्री को लोकसभा का नेता माना जाता है। संसदीय शासन में प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति भी उत्तरदायी होते हैं। इसलिए संसदीय परंपरा के अनुसार प्रधानमंत्री राज्य सभा का सदस्य नहीं होना चाहिए। • भारतीय संविधान में यह स्पष्ट उल्लेखित है कि मंत्री अथवा प्रधानमंत्री किसी भी सदन का सदस्य हो सकते है।
• इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री बनीं, (वर्ष-1966) तब वे राज्य सभा की सदस्या थीं,
डॉ. मनमोहन सिंह, इन्द्र कुमार गुजराल और देवगौडा राज्य सभा के सदस्य होते हुए प्रधानमंत्री बने।
संसद में व्हिप-
-     व्हिप, एक प्रकार का निर्देश है जो विभिन्न राजनीतिक दलों के द्वारा अपने दलों के सांसदों के लिए प्रयोग किया जाता है। अतः सांसदों की संसद में उपस्थिति और मतदान के लिए व्हिप का प्रयोग किया जाता है।
-     प्रत्येक सदन में प्रत्येक दल के द्वारा एक मुख्य व्हिप की नियुक्ति की जाती है,
जो यह सुनिश्चित करता है कि उस दल के सदस्य उसके निर्देशों के अनुसार कार्य करें।
-     व्हिप के उल्लंघन के परिणाम स्वरूप सांसद की सदस्यता दल-बदल विरोधी अधिनियम के अंतर्गत समाप्त की जा सकती है।

संसद सदस्यों के विशेषाधिकार
• संसद में वाक् स्वातंत्र्य है।
• संसद में या उसकी किसी समिति में किसी सदस्य द्वारा कही गयी किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कार्यवाही किए जाने की उन्मुक्ति है।
•  किसी व्यक्ति द्वारा संसद के किसी सदन के प्राधिकार द्वारा या उसके अधीन किसी रिपोर्ट, पत्र, मतों या कार्यवाहियों के प्रकाशन के संबंध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कार्यवाही किए जाने से उन्मुक्ति है।
• संसद की कार्यवाहियों की जाँच करने के संबंध में न्यायालयों पर रोक।
• सदन के अधिवेशन के दौरान व उसके प्रारम्भ होने से 40 दिन पूर्व और 40 दिन बाद तक दीवानी मामलों में सदस्यों को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है।
• जूरी के सदस्यों के रूप में कार्य करने के दायित्व से सदस्यों को छूट है।
किसी सदस्य की गिरफ्तारी,
नजरबंदी, दोषसिद्धि, कारावास और रिहाई के बारे में तुरंत सूचना प्राप्त करने का सदन को अधिकार है।
-     सदन की किसी गोपनीय बैठक की कार्यवाहियाँ या फैसले प्रकट करने पर रोक है।
-     सदन के सदस्य या अधिकारी सदन की अनुमति के बिना सदन की कार्यवाहियों के संबंध में किसी न्यायालय में साक्ष्य नहीं देंगे या दस्तावेज पेश नहीं करेंगे।
      उपरोक्त विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों के अतिरिक्त. प्रत्येक सदन को आनुषंगिक शक्तियाँ भी प्राप्त हैं, जो उसके विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों के संरक्षण के लिए आवश्यक हैं। संसद को विशेषाधिकारों के हनन के मामले में लोगों को दण्डित करने का भी अधिकार है।

संसद की अवमानना-
-     ऐसी कार्यवाही जो संसद के किसी सदन या उसकी समितियों या उसके अधिकारियों के द्वारा सम्पादित कार्यों में बाधा उत्पन्न करें और किसी व्यक्ति के प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष कार्य जो संसद की गरिमा को ठेस पहुँचाए।
-     सदन की अवमानना का अभिप्राय अत्यधिक बड़ा है जिसमें विशेषाधिकार का उल्लंघन भी शामिल हो सकता है।

भारतीय संसद में विधि निर्माण की प्रक्रिया-
-     संसद का महत्वपूर्ण कार्य कानून बनाना है। इसके लिए सभी प्रस्ताव विधेयकों के रूप में संसद के सामने आने चाहिए।  प्रक्रिया के आधार पर विधेयकों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से है-
(i) सामान्य विधेयक
(ii) वित्त विधेयक
(iii) धन विधेयक
(iv) संविधान संशोधन विधेयक
-    
सरकारी विधेयक और गैर-सरकारी विधेयक के रूप में वर्गीकरण-
1.   सरकारी विधेयक- ये विधेयक मंत्रियों द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं।
2.   गैर-सरकारी विधेयक- ये विधेयक गैर-सरकारी सदस्यों द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं।

विधि निर्माण प्रक्रिया-
संसदीय व्यवस्था में विधि निर्माण की प्रक्रिया अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है। विधि निर्माण तीन चरणों के द्वारा संपन्न किया जाता है, जो निम्नलिखित है-
प्रथम वाचन-
• प्रथम वाचन में, विधेयक को प्रस्तुत करने के लिए सदन की अनुमति लेना आवश्यक होता है। अनुमति के पश्चात विधेयक प्रस्तुत करना एक औपचारिकता होती है।
• प्रथा के अनुसार इस अवस्था में विधेयक पर चर्चा नहीं की जाती है। एक दिन में कितने भी विधेयक प्रस्तुत किये जा सकते हैं। जब विधेयक सदन में प्रस्तुत हो जाता है, तो उसे भारत के राजपत्र में प्रकाशित किया जाता है।
 द्वितीय वाचन-
 -    द्वितीय वाचन में, विधेयक की विस्तृत एवं बारीकी से जाँच की जाती है।
-     द्वितीय वाचन के दो चरण हैं-प्रथम चरण में,
समूचे विधेयक पर सामान्य चर्चा होती है। इस चरण में सदन चाहे, तो विधेयक को सदन की प्रवर समिति या दोनों सदनों की संयुक्त समिति को निर्दिष्ट कर सकता है या चाहे तो सीधे इस पर विचार कर सकता है। विधेयक पर उपरोक्त समितियों द्वारा गहराई से विचार करने के पश्चात संशोधित प्रतिवेदन को छाप दिया जाता है, इसके बाद बिल या विधेयक का प्रस्तावक निम्न प्रस्ताव रख सकता है-
(i) प्रवर समिति द्वारा रिपोर्ट किए हुए बिल पर विचार किया जाये।
(ii) समिति के पास बिल पुनः भेजा जाये।
(
iii) बिल को जनमत के लिए पुनः प्रसारित किया जाये। यदि मंत्री या प्रस्तावक यह प्रस्ताव प्रस्तुत करता है कि विधेयक पर प्रतिवेदित रूप में विचार किया जाए तो उस पर वाद-विवाद की अनुमति दी जाती है।
 प्रतिवेदन रूप में विधेयक पर विवाद करने का प्रस्ताव स्वीकृत हो जाने के पश्चात विधेयक की प्रत्येक धारा पर बहुत सूक्ष्म रूप से सदन में विचार होता है। प्रत्येक खंड या धारा चर्चा के लिए अलग से सदन के समक्ष रखा जाता है तथा प्रत्येक धारा पर मतदान लिया जाता है,
जो संशोधन स्वीकृत हो जाते हैं, वे विधेयक का अंग बन जाते हैं।
तृतीय वाचन-
तृतीय वाचन विधेयक की किसी एक सदन में अंतिम अवस्था होती है। इस अवस्था में शाब्दिक, औपचारिक और आनुषंगिक संशोधन ही प्रस्तुत किये जा सकते हैं, क्योंकि विधेयक के सामान्य सिद्धांतों पर सहमति हो चुकी होती है तथा उसकी विस्तारपूर्वक जाँच भी हो चुकी होती है। तत्पश्चात, मंत्री यह प्रस्ताव कर सकता है कि विधेयक को पारित किया जाए।
उपरोक्त तीनों वाचनों की प्रक्रिया से गुजरने के पश्चात विधेयक को दूसरे सदन अर्थात् राज्य सभा में भेजा जाता है
, वहाँ पर भी इसी प्रकार की प्रक्रिया से विधेयक को गुजरना पड़ता है। अगर दूसरा सदन, विधेयक पर अपनी सहमति नहीं देता या विधेयक को स्वीकृति नहीं मिल पाती है, तो राष्ट्रपति दोनों सदनों का एक संयुक्त अधिवेशन बुलाता है तथा दोनों सदनों के बहुमत से विधेयक को पास करवाया जाता है। तत्पश्चात विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति की मोहर या हस्ताक्षर के पश्चात, बिल एक कानून का रूप ले लेता है।
सदन के बीच गतिरोध-
यदि किसी विधेयक को एक सदन द्वारा पारित किए जाने और दूसरे सदन को भेजने के बाद-
(i) दूसरे सदन के द्वारा विधेयक अस्वीकृत कर दिया गया हो।
(ii) विधेयक में किए जाने वाले संशोधनों के विषय में दोनों सदनों के बीच असहमति उत्पन्न हो गयी हो।
(
iii) दूसरे सदन को विधेयक प्राप्त होने के तारीख से 6 माह से अधिक बीत गए हो। उपरोक्त परिस्थितियों में सदन की संयुक्त बैठक बुलायी जा सकती है।
संयुक्त बैठक बुलाने की अधिसूचना राष्ट्रपति जारी करता है। संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा का स्पीकर करता है। संयुक्त बैठक में प्रस्ताव दोनों सदनों के उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा पारित होता है।
यह उल्लेखनीय है
, कि संयुक्त बैठक का आयोजन सामान्य विधि के निर्माण के लिए होता है। संविधान संशोधन के लिए संयुक्त बैठक का आयोजन नहीं होता है। अभी तक भारत में दहेज विरोधी अधिनियम (1961) बैंकिंग सेवा अधिनियम (1978) तथा आतंकवाद निवारक अधिनियम (2002) को समाप्त करने के विधेयक के संबंध में संयुक्त बैठक का आयोजन किया गया है। यह भी उल्लेखनीय है कि धन विधेयक के संबंध में किसी भी प्रकार की संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है।
राष्ट्रपति के हस्ताक्षर-
विधेयक पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह विधेयक अधिनियम बन जाता है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से ही यह सिद्ध होता है कि अधिनियम का निर्माण किस तिथि को किया गया है।
धन विधेयक-
-     धन विधेयक के अंतर्गत निम्नलिखित विषय सम्मिलित किए जाते हैं-
(i) किसी कर का लगाना, हटाना, परिवर्तन एवं नियंत्रण करना।
(ii) सरकार द्वारा धन उधार लेना।
(iii) भारत की संचित निधि या आकस्मिक निधि की अभिरक्षा करना।
(iv) कोष में धन का डालना या निकालना।
(v) किसी भी व्यय को भारत की संचित निधि पर भारित करना।
(vi) भारत की संचित निधि या लोक लेखा से धन प्राप्त करना या उसकी रक्षा करना अथवा संघ या राज्य के लोक लेखा की संपरीक्षा करना।

धन विधेयक पर राष्ट्रपति का अधिकार-
• धन विधेयक को प्रस्तुत करने से पहले राष्ट्रपति की अनुमति ली जाती है, इसलिए वह धन विधेयक पर अपनी अनुमति प्रदान करता है।
•  धन विधेयक, केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है। लोकसभा में पारित होने के बाद धन विधेयक को राज्य सभा में भेजा जाता है। राज्य सभा,
धन विधेयक को अस्वीकृत नहीं कर सकती। राज्य सभा धन विधेयक में संशोधन कर सकती है, परंतु इसको मानना या न मानना लोकसभा का विशेषाधिकार है। अतः लोकसभा इसे स्वीकार भी कर सकती है और अस्वीकार भी, परंतु राज्य सभा संशोधन की सिफारिश कर सकती है।
• धन विधेयक को, राज्य सभा को 14 दिन के भीतर स्वीकृति देनी होती है। यदि राज्य सभा ने 14 दिन के भीतर स्वीकृति नहीं दी है
तो भी विधेयक को राज्य सभा द्वारा स्वीकृत माना जाएगा। धन विधेयक के संबंध में सदनों की संयुक्त बैठक नहीं होती है। धन विधेयक के संबंध में राष्ट्रपति को मंजूरी देना आवश्यक होता है।
• कोई विधेयक, धन विधेयक है अथवा नहीं, इसका निर्धारण लोकसभा का स्पीकर करता है तथा उसका निर्णय अंतिम होता है। राष्ट्रपति धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता।

बजट-
• अनुच्छेद-112 के अनुसार, सरकार प्रत्येक वर्ष संसद में वार्षिक वित्तीय विवरण प्रस्तुत करती है। इसे ही बजट कहा जाता है।
• बजट प्रस्तुतीकरण- बजट का अर्थ है, वित्तीय आय-व्यय का वार्षिक विवरण।
• बजट, भारत सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत किया जाता है। बजट में आगामी वित्तीय वर्ष के लिए आय-व्यय का ब्यौरा होता है।
• बजट प्रस्तुत करने के अवसर पर वित्तमंत्री लोकसभा में एक भाषण देता है, जिसमें सरकार की वित्त नीति और आय-व्यय के संबंध में विस्तार से प्रकाश डाला जाता है। इसे बजट भाषण कहा जाता है, बजट भाषण के बाद वित्तमंत्री लोकसभा में बजट प्रस्तुत करता है।

बजट पर सामान्य चर्चा-
-     संसद के दोनों सदनों में बजट पर विस्तृत चर्चा आरंभ होती है और यह बहस दोनों सदनों में तीन से चार दिन तक चलती है। बजट पर दो चरणों में बहस होती है-सामान्य बहस और अनुदान माँगों पर विस्तृत बहस। इसके उपरांत मतदान होता है। बजट के दौरान संचित निधि पर भारित व्यय पर मतदान नहीं होता है।
सामान्य बहस के अंतर्गत बजट की प्रमुख नीतियों तथा साधारण सिद्धांतों पर बहस की जाती है। यहाँ सदस्य सरकार की राजकोषीय और आर्थिक नीतियों के सामान्य पहलुओं पर ही चर्चा करते हैं और कराधान तथा व्यय के ब्यौरों पर चर्चा नहीं करते हैं। इस प्रकार सामान्य बहस से दोनों सदनों को अपने विचार रखने का अवसर मिलता है।
-     राज्य सभा को प्राप्त शक्ति के अनुसार उसे सामान्य बहस
के अलावा बजट से कोई सरोकार नहीं होता। माँगों पर मतदान केवल लोकसभा में होता है।
लेखानुदान- लेखानुदान के द्वारा लोकसभा को यह शक्ति दी गयी है, कि बजट प्रक्रिया पूर्ण होने तक समस्त खर्चों के लिए सरकार को धन उपलब्ध कराता है। बजट पास होने में समय लगता है, इस दौरान सामान्य खर्चों के लिए धन प्राप्त करने हेतु 'लेखानुदान' पास किया जाता है। यह एक वर्ष के समस्त खर्चों  का 1/6 भाग के बराबर होता है, इसके तहत दो माह के खर्चे के लिए धन दिया जाता है।
अनुदान माँग-
-     संचित निधि पर भारित व्यय को छोड़कर अलग-अलग विभागों की मांगों पर सदन में विचार किया जाता है और प्रत्येक विभाग की माँग पर अलग-अलग मतदान होता है। इसे  ही अनुदान की माँग कहा जाता है। अनुदान माँगों पर बहस हेतु विपक्षी दलों द्वारा कटौती प्रस्ताव लाए जाते हैं, जो निम्नलिखित है।
(
i) नीतिगत कटौती- यह प्रस्ताव सरकार की नीतियों के प्रति असहमति प्रकट करने हेतु लाया जा सकता है इसके तहत अनुदान माँगों को घटाकर एक रुपया कर दिया जाता है।
(
ii) सांकेतिक कटौती- यह प्रस्ताव भी सरकारी नीतियों के प्रति असहमति प्रकट करने हेतु लाया जाता है जिसमें समस्त अनुदान माँगों में 100 रु. की कटौती करने का प्रस्ताव लाया जाता है।
(
iii) मितव्ययिता या आर्थिक कटौती- इसमें माँग की राशि का एक निश्चित अनुपात कम करने को कहा जाता है तथा इसका उद्देश्य नीति का विरोध करना नहीं, वरन माँगों में वास्तविक कटौती करना है।
विनियोग विधेयक-
• संविधान के अनुच्छेद-114 के अनुसार भारत की संचित निधि में से कोई धन विनियोग विधेयक से ही निकाला जा सकता है। इस विधेयक में लोकसभा द्वारा स्वीकृत अनुदानों की सभी माँगों तथा संचित निधि पर भारित व्यय सम्मिलित होता है।
•  इसका उद्देश्य
संचित निधि में से व्यय के विनियोग के लिए सरकार को कानूनी अधिकार देना है।
 वित्त विधेयक-
बजट पारित होने का अंतिम चरण वित्त विधेयक है, जिसके अंतर्गत सरकार कर लगाने अथवा इसे समाप्त करने का प्रस्ताव प्रस्तुत करती है। इसके पारित होने के बाद समूचा बजट पारित मान लिया जाता है।
अनुपूरक माँग-
-     संसद द्वारा बजट के दौरान स्वीकृत धन अनुमानित होता है। यदि कार्य विशेष हेतु  स्वीकृत धन वित्तीय वर्ष के भीतर कम पड़ जाता है, तो सरकार लोकसभा में अनुपूरक अनुदान की माँग प्रस्तुत करती है।
अतिरिक्त माँग-
-     जब किसी वित्तीय वर्ष में किसी नयी सेवा का निर्माण किया जाये जिसकी कल्पना बजट के निर्माण के समय नहीं की गयी थी, ऐसे खर्च को अतिरिक्त माँग के रूप में लोकसभा के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।
 ज्यादा की माँग-
-     जब किसी वित्तीय वर्ष में किसी सेवा में निर्धारित राशि से ज्यादा पैसा खर्च हो जाये तो इसकी अनुमति लोकसभा से अगले वित्तीय वर्ष में ली जाती है।
अपवादानुदान-
-     यदि किसी विशेष एवं निश्चित उद्देश्य के लिए सरकार अनुदान की माँग रखती है जो कि सामान्य वर्ष में खर्च के अतिरिक्त होता है इसे ‘अपवादानुदान’ कहते हैं।
प्रत्यानुदान-
-     वित्तीय वर्ष के भीतर किसी आवश्यक कार्य के लिए यदि धन की त्वरिक आवश्यकता हो
तो प्रत्यानुदान की माँग पेश की जाती है। यह कार्यपालिका के लिए एक 'ब्लैंक चेक' के समान है, जिसे लोकसभा प्रदान करती है।

वित्तीय विधेयक-

-     वित्तीय विधेयक तथा धन विधेयक में अंतर होता है। वित्तीय विधेयकों की दो श्रेणियाँ होती हैं-

प्रथम श्रेणी-

-     प्रथम श्रेणी के वित्तीय विधेयकों में अनुच्छेद-110 के प्रावधानों के साथ अन्य विषयों का भी उल्लेख किया जाता है। वित्तीय विधेयक को प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रपति की अनुमति आवश्यक होती है तथा इसे केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है। लेकिन प्रथम श्रेणी के वित्तीय विधेयकों की स्थिति धन विधेयक से भिन्न है क्योंकि राज्य सभा इसे संशोधित व अस्वीकार कर सकती है। लोकसभा तथा राज्य सभा के मध्य गतिरोध होने पर संयुक्त बैठक का प्रावधान भी लागू होता है।

वित्तीय विधेयकों की धन विधेयक से समानता-

-     वित्तीय विधेयक के निम्नलिखित दो प्रावधान धन विधेयक के समान होते हैं-

      (i) दोनों लोकसभा में ही पहले प्रस्तुत हो सकते हैं।

      (ii) राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना उन्हें प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

द्वितीय श्रेणी-

प्रोटेम स्पीकर-

संसद के सत्र-

-     संसद के सत्र राष्ट्रपति द्वारा बुलाए जाते है जो सामान्यतः तीन होते हैं ।

      (i) बजट सत्र, सामान्यतः फरवरी से मई तक होता है।

      (ii) मानसून सत्र, जो सामान्यतः जुलाई से सितंबर तक होता है।

      (iii) शीतकालीन सत्र, जो नवंबर से दिसंबर तक होता है।

-     प्रत्येक सत्र की बैठकों के बीच समयांतराल 6 माह से अधिक नहीं होना चाहिए।

-     राष्ट्रपति द्वारा कभी-कभी विशेष बैठकें भी बुलाई जा सकती हैं।

लेमडक सत्र-

सत्रावसान-

संसद में मतदान की प्रक्रिया-

सदन की भाषा-

स्थगन-

विघटन-

अधिवेशन-

प्रश्नकाल-

1.   तारांकित

2.   अतारांकित

-     तारांकित प्रश्न- तारांकित प्रश्नों का मौखिक जवाब मंत्री देते हैं व पूरक प्रश्न भी पूछे जा सकते हैं।

-     अतारांकित प्रश्न- इसका लिखित जवाब दिया जाता है व इनमें पूरक प्रश्न नहीं पूछा जा सकता।

अल्पकालिक चर्चा-
      इसके द्वारा सांसद सदन के समक्ष किसी भी महत्वपूर्ण सार्वजनिक मुद्दे को सदन के सामने उठा सकते हैं, चर्चा की अवधि सामान्यत: दो घण्टे की होती है इसलिए इसे दो घण्टे की चर्चा भी कहा जाता है।

शून्यकाल-

प्रस्ताव-

प्रस्ताव के प्रकार-
1.   मूल प्रस्ताव- यह एक पूर्ण प्रस्ताव है, जो स्वयं में स्वतंत्र भी है तथा इसके द्वारा सदन अपना मत व्यक्त करती है।
2.   स्थानापन्न प्रस्ताव- जो प्रस्ताव सदन में मूल प्रस्ताव के स्थान पर लाए जाते हैं
, उन्हें स्थानापन्न प्रस्ताव कहा जाता है। इसके द्वारा सदन में कोई भी सदस्य अपनी इच्छा और मत स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर सकता है। यह मूल प्रस्ताव पर निर्भर होता है।
3.   सहायक प्रस्ताव- ये मूल प्रस्ताव के बाद प्रस्तुत किए जाते हैं तथा ये मूल प्रस्ताव पर पूर्णत: निर्भर होते हैं। सहायक प्रस्ताव में अनेक प्रस्ताव शामिल होते हैं।

संकल्प-
-     सदन में प्रस्तुत मूल प्रस्ताव अथवा स्वतंत्र, आत्मनिर्भर प्रस्ताव संकल्प कहलाते हैं। संकल्प तीन प्रकार के होते हैं-
-     निजी सदस्यों के संकल्प, जिसके द्वारा कोई भी गैर-सरकारी सदस्य जो मंत्रिमंडल का भाग नहीं हैं। सदन के समक्ष कोई विधेयक अथवा संकल्प प्रस्तुत कर सकता है।
-     सरकारी संकल्प, संसदीय शासन में ज्यादातर संकल्प मंत्रियों के द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं। इसीलिए इन्हें सरकारी संकल्प कहा जाता है।
-     सांविधिक संकल्प, संसदीय शासन में विधि-निर्माण का प्रमुख स्थान है। विधि-निर्माण से संबंधित संकल्प को सांविधिक संकल्प कहा जाता है
, जिसके द्वारा विभिन्न विधेयकों के निर्माण अथवा संविधान संशोधन का संकल्प प्रस्तुत किया जाता है।

भारतीय संसद में विभिन्न प्रस्ताव-

धन्यवाद प्रस्ताव-

      राष्ट्रपति, लोकसभा के चुनाव के पहले सत्र और वर्ष के पहले सत्र में संसद को संयुक्त रूप में संबोधित करते हैं। इसके लिए किये

स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion)-

-     स्थगन प्रस्ताव, विशेष प्रक्रिया  है, क्योंकि जब स्थगन प्रस्ताव लाया जाता  है, तो संसद की सामान्य कार्यवाही को स्थगित कर दिया जाता है स्थगन प्रस्ताव लाने के आधार-

(i) कोई सार्वजनिक महत्व का अति आवश्यक विषय और इस विषय से पूरा देश प्रभावित हो।
(ii) स्थगन प्रस्ताव में लाया जाने वाला विषय सुनिश्चित होना चाहिए।
(iii) किसी सांसद के निजी मुद्दे या निजी शिकायत को इसमें नहीं उठाया जा सकता।

ध्यानाकर्षण प्रस्ताव-
-     किसी भी सार्वजनिक महत्व के मुद्दे और तात्कालिक मुद्दे पर किसी मंत्री का ध्यान आकर्षित कराने के लिए लाया जाता है।
-     यह वर्ष-1954 से ही यह प्रचलन में है।
अविश्वास प्रस्ताव-
-     अविश्वास प्रस्ताव, विपक्ष के द्वारा लाया जाता है। इसका कारण बताने की जरूरत नहीं है। पहला अविश्वास प्रस्ताव, नेहरू सरकार के विरुद्ध वर्ष-1963 में लाया गया था।
-     इसके पारित होने पर मंत्रिपरिषद को त्याग पत्र देना होता है।

निंदा प्रस्ताव-
• यह प्रस्ताव लोकसभा में विपक्ष द्वारा किसी मंत्री की आलोचना के लिए लाया जाता है।
•  इसका कारण बताने की जरूरत है।
• इसका उद्देश्य सरकार के कार्यों की आलोचना करना होता है। प्रस्ताव पास होने से सरकार नहीं गिरती है।

 सांसदों के वेतन एवं भत्ते-
• दोनों सदनों के सदस्य ऐसे वेतन और  भत्ते, जिन्हें संसद समय-समय पर, विधि द्वारा निर्धारित करे, प्राप्त करने के अधिकारी हैं। (अनुच्छेद-106)

संसदीय फोरम-
संसदीय फोरम, सांसदों द्वारा निर्मित एक अनौपचारिक मंच है, जिसके द्वारा सांसद नीति-निर्माण के लिए विभिन्न गैर-सरकारी स्वैच्छिक समूहों से परामर्श करते हैं और नागरिक समाज से भी विचार-विमर्श करते हैं।
अनेक मामलों पर संसदीय फोरम की स्थापना की गई है। संसदीय फोरम के द्वारा सांसदों को सदन में किसी मुद्दे को उठाने के लिए भी सहायता प्रदान की जाती है।
 संसदीय समितियाँ-

 वित्तीय समितियाँ-
      लोक लेखा समिति
-     यह सबसे पुरानी वित्तीय समिति है। लोक लेखा समिति में 15 सदस्य लोकसभा से तथा 7 सदस्य राज्य सभा से लिए जाते हैं, परंतु यह समिति लोकसभा की समिति कहलाती है।
-     भारत में संघ तथा राज्य दोनों के लेखा परीक्षण का अधिकार भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक को दिया गया है। यह नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक लेखाओं की परीक्षा करती है। राष्ट्रपति द्वारा इन लेखाओं की रिपोर्ट को सदन के पटल पर रखा जाता है। अत: लोक लेखा समिति का कार्य द्वितीय होता है, क्योंकि यह नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट पर कार्य करती है। समिति का मूल कार्य यह देखना है, कि
(i) क्या पैसा उसी मद में खर्च हुआ है, जिसके लिए दिया गया था?
(ii) क्या इस खर्च के लिए संसद ने अनुमति प्रदान कर दी
(iii) क्या संसद की अनुमति से ज्यादा था, अतिरिक्त खर्च तो नहीं हुआ है, यदि हुआ है, तो इसके लिए कौन सी परिस्थितियाँ उत्तरदायी हैं?
अत: लोक लेखा समिति अपने कार्य संपादन के लिए नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की सहायता लेती है।
लोक लेखा  समिति, वित्तीय क्षेत्र में सबसे पुरानी समिति मानी जाती है। इस समिति का अध्यक्ष, सामान्यतः विपक्षी दल का सदस्य होता है। लोक लेखा सहित अन्य समितियाँ भी सरकार की नीति विषयक मुद्दों की आलोचना नहीं करती।
लोक लेखा समिति को कभी-कभी प्रॉक्कलन समिति की 'जुड़वाँ बहन' भी कहा जाता है। क्योंकि इन दोनों समितियों के कार्य एक-दूसरे के पूरक हैं।

प्रॉक्कलन/ऑकलन समिति-
• आंकलन समिति केवल लोकसभा के 30 सदस्यों से निर्मित होती है।
• इस समिति का अध्यक्ष लोकसभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया जाता है।
• जब सरकार अपना बजट लोकसभा में प्रस्तुत करती है, तो इस बजट में आगामी वर्ष के लिए खर्च तथा प्राप्ति दोनों के आंकलन किए जाते हैं। अत: आंकलन समिति का मूल कार्य है, • कि क्या संगठन में कुशलता या प्रशासनिक सुधार के द्वारा खर्चे को बेहतर बनाया जा सकता है।
• समिति यह सुझाव भी देती है, कि सरकार को किस रूप में आंकलन प्रस्तुत करना चाहिए। क्या आंकलन सरकार द्वारा निर्धारित रीति के अनुरूप है? यह समिति भी सरकार की नीतियों की आलोचना नहीं करती।

 सार्वजनिक उपक्रम समिति

-     विभागों से संबद्ध स्‍थायी समितियों की संख्‍या 24 है जिनके क्षेत्राधिकार में भारत सरकार के सभी मंत्रालय/विभाग आते हैं।
-     इनमें से प्रत्‍येक समिति में
31 सदस्‍य होते हैं - 21 लोक सभा से तथा 10 राज्‍य सभा से जिन्‍हें क्रमश: लोक सभा के अध्‍यक्ष तथा राज्‍य सभा के सभापति द्वारा नाम-निर्दिष्‍ट किया जाता है।
-     इन समितियों का कार्यकाल एक वर्ष से अनधिक होगा।
24 समितियों के नाम निम्‍नांकित हैं:-

1.   वाणिज्‍य संबंधी समिति

2.   गृह कार्य संबंधी समिति

3.   मानव संसाधन विकास संबंधी समिति

4.   उद्योग संबंधी समिति

5.   विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और वन संबंधी समिति

6.   परिवहन, पर्यटन और संस्‍कृति संबंधी समिति

7.   स्‍वास्‍थ्‍य और परिवार कल्‍याण संबंधी समिति

8.   कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्‍याय संबंधी समिति

9.   कृषि संबंधी समिति

10. सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी समिति

11. रक्षा संबंधी समिति

12. ऊर्जा संबंधी समिति

13. विदेशी मामलों संबंधी समिति

14. वित्त संबंधी समिति

15. खाद्य, नागरिक पूर्ति और सार्वजनिक वितरण संबंधी समिति

16. श्रम संबंधी समिति

17. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस संबंधी समिति

18. रेल संबंधी समिति

19. शहरी विकास संबंधी समिति

20. जल संसाधन संबंधी समिति

21. रसायन और उर्वरक संबंधी समिति

22. ग्रामीण विकास संबंधी समिति

23. कोयला और इस्‍पात संबंधी समिति

24. सामाजिक न्‍याय और अधिकारिता संबंधी समिति