- भारतीय संविधान का निर्माण किसी निश्चित समय पर न होकर क्रमागत विकास का परिणाम है, जो ब्रिटिश शासन के दौरान धीमी गति से हुआ।
- भारत के संविधान का निर्माण भी एक दिन में तैयार नहीं हुआ है, उसे एक लम्बी विकास यात्रा तय करनी पड़ी है।
भारत शासन अधिनियम, 1919
- 1919 ई. के अधिनियम को मॉण्टेग्यू- चेम्सफोर्ड सुधार भी कहते हैं, क्योंकि इस अधिनियम के जन्मदाता भारत सचिव ‘मॉण्टेग्यू’ और भारत में वायसराय ‘चेम्सफोर्ड’ थे। यह अधिनियम ब्रिटिश सरकार द्वारा सुधारों का एक और तथाकथित प्रयास था। इसमें निम्न प्रावधान थे-
- इस अधिनियम का उद्देश्य भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी सरकार की स्थापना करना था। भारत सचिव मोंटेग्यू के द्वारा संवैधानिक घोषणा की गयी यही घोषणा 1919 के भारत शासन अधिनियम के रूप में पारित हुआ।
- इस अधिनियम ने पहली बार भारत में द्विसदनीय व्यवस्था और प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था प्रारम्भ की थी। इस प्रकार भारतीय विधान परिषद के स्थान पर राज्य परिषद (उच्च सदन) तथा विधान सभा (निम्न सदन) का गठन किया गया व वायसराय की कार्यकारी परिषद के 6 सदस्यों में से तीन सदस्यों का भारतीय होना अनिवार्य कर दिया गया।
- इस अधिनियम के द्वारा भारत में पहली बार केन्द्रीय तथा प्रान्तीय सरकारों के बीच प्रशासन के समस्त विषयों को दो भागों में विभाजन किया गया जो भारत में संघात्मक व्यवस्था के निर्माण की दिशा में प्रथम प्रयास था। प्रान्तों के लिए प्रस्तावित द्वैध-शासन प्रणाली 1 अप्रैल, 1921 को आरंभ की गई जो 1 अप्रैल, 1937 तक लागू रही।
- इसके तहत प्रान्तों में द्वैध शासन तथा आंशिक उत्तरदायी शासन की स्थापना की गई। इसके अंतर्गत प्रान्तीय विषयों को दो भागों में बांटा गया-
(i) आरक्षित विषय – आरक्षित विषयों का प्रशासन गवर्नर अपनी परिषद की सहायता से करता था तथा परिषद विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं होती थी। जैस- कानून एवं व्यवस्था, भू-राजस्व, वित्त, प्रशासन, उद्योग, कृषि, खनिज संसाधन आदि।
(ii) हस्तांतरित विषय – हस्तांतरित विषयों का प्रशासन गवर्नर मंत्रियों की सहायता से करता था जो कि विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी होते हैं। जैसे- स्वास्थ्य, शिक्षा, धार्मिक प्रबंधन, सार्वजनिक निर्माण विभाग आदि।
अधिनियम के दोष
1. केन्द्र में आंशिक रूप से उत्तरदायी सरकार की स्थापना नहीं की गई थी।
2. सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली को समाप्त करने की बजाए उसका और विस्तार किया गया।
महत्व
1.प्रांतों में पहली बार उत्तरदायी शासन की स्थापना का शुभारंभ किया गया था।
2.प्रथम बार भारत में ब्रिटिश शासन के उद्देश्य की स्पष्ट घोषणा की गई थी।
3. मताधिकार में वृद्धि की गई।
4.शासकीय सेवाओं के भारतीयकरण की दिशा में विशेष प्रगति हुई।
5.भारतीयों को राजनीतिक प्रशिक्षण का अवसर प्राप्त हुआ।
6.स्थानीय स्वशासन के क्षेत्र का विस्तार किया गया।
1935 ई. का अधिनियम (Act of 1935)
- 1930, 1931 और 1932 ई. के गोलमेज सम्मेलनों में किये गये विचार के आधार पर मार्च, 1933 में भावी सुधार योजना के संबंध में एक 'श्वेत-पत्र' (White Paper) प्रकाशित किया गया, जिसमें प्रांतों में उत्तरदायी शासन व्यवस्था और केन्द्र में आंशिक उत्तरदायी शासन की स्थापना का सुझाव दिया गया था। 'श्वेत-पत्र' के सुझावों को स्वीकार करते हुए ही ब्रिटिश सरकार द्वारा 1935 के 'भारतीय शासन अधिनियम' का निर्माण किया गया। अधिनियम की विशेषताएँ-
- यह अधिनियम भारत में पूर्ण उत्तरदायी सरकार के गठन में एक मील का पत्थर साबित हुआ। इस अधिनियम की प्रस्तावना 1919 की ही थी तथा भारत के लिए तैयार संवैधानिक प्रस्तावों में यह सबसे बड़ा, जटिल तथा अंतिम अधिनियम था। इस अधिनियम में 14 भाग, 321 धाराएँ तथा 10 अनुसूचियाँ थीं। इस अधिनियम के द्वारा प्रान्तों में द्वैध शासन को समाप्त कर दिया गया तथा प्रान्तीय स्वायत्तता का प्रावधान किया गया। प्रान्तीय विषयों पर विधि बनाने का पूर्ण अधिकार प्रान्तों को प्रदान किया गया एवं उन पर से केन्द्र का नियंत्रण समाप्त कर दिया गया जिसके कारण राज्यों में पूर्ण उत्तरदायी सरकार की स्थापना हुई।
- केन्द्र में द्वैध शासन प्रणाली का शुभारंभ किया गया, जिसके अन्तर्गत केन्द्रीय प्रशासन के विषयों को आरक्षित एवं हस्तांतरित में विभाजित किया गया व केन्द्र तथा उसकी इकाईयों के मध्य शक्तियों का विभाजन किया गया। संघ सूची में 59 विषय, राज्य सूची में 54 विषय तथा समवर्ती सूची में 36 विषय शामिल किए गए। अवशिष्ट शक्तियाँ गवर्नर जनरल में निहित की गई।
- संघीय लोक सेवा आयोग, प्रांतीय सेवा आयोग और दो या अधिक राज्यों के लिए संयुक्त सेवा आयोग की स्थापना की बात का भी उल्लेख किया गया था व उच्चतम न्यायालय तथा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना का प्रावधान किया गया। 1937 में संघीय न्यायालय की स्थापना दिल्ली में हुई जिसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश मोरिज गायर बने।
- साम्प्रदायिक प्रतिनिधत्व का विस्तार करते हुए उसमें दलितों, महिलाओं तथा मजदूरों को भी शामिल किया गया व 1858 द्वारा स्थापित भारत परिषद की समाप्ति कर दी गई।
- इसने 11 राज्यों में से छ: द्विसदनीय व्यवस्था प्रारंभ की। इस प्रकार बंगाल, बम्बई, मद्रास, बिहार, संयुक्त प्रांत और असम में द्विसदनीय विधान परिषद और विधानसभा बन गई। आपातकालीन प्रावधान तथा गवर्नर जनरल का वीटो एवं अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गई।
अधिनियम की आलोचना
- भारत का संविधान,भारत का सर्वोच्च विधान है जो संविधान सभा द्वारा लिखित है।भारत का संविधान विश्व के किसी भी गणतांत्रिक देश का सबसे लंबा लिखित संविधान है जो भारत में शासन व्यवस्था के बारेमेंउल्लेखित है।
- संविधान सभा- संविधान निर्माण के लिए गठित प्रतिनिधि सभा को संविधान सभा कहा जाता है। संविधान सभा का प्रथम दर्शन 1895 में तिलक के'स्वराज विधेयक' में देखने को मिलता है, जबकि स्पष्ट शब्दों में सबसे पहली बार महात्मा गाँधी ने 5 जनवरी, 1922 को कहा “भारतीय संविधान भारतीयों की इच्छानुसार ही होगा'।
- भारत में औपचारिक रूप से संविधान सभा के गठन का विचार सर्वप्रथम एम.एन. राय के द्वारा रखा गया। 1934 में स्वराज्य पार्टी ने पहली बार भारत के संविधान के निर्माण के लिए संविधान सभा के गठन की मांग की तथा कांग्रेस ने अपने फैजपुर अधिवेशन में उक्त मांग को स्वीकार किया। पं. जवाहरलाल नेहरू ने 1938 के कांग्रेस अधिवेशन में कहा की भारतीय संविधान का निर्माण एक संविधान सभा द्वारा किया जाये। भारतीयों की मांग और कई दौर कि वार्ताओं के मद्देनजर भारत में एक कैबिनेट मिशन को भेजा गया। इस मिशन ने दो संविधान सभाओं की मांग को ठुकरा दिया।
केबिनेट मिशन की संविधान सभा के गठन के संदर्भ में योजना-
- वर्ष 1946 को तीन सदस्यीय केबिनेट मिशन भारत आया जिसमें निम्न सदस्य सम्मिलित थे-
(1) लॉर्ड पेथिक लॉरेंस (अध्यक्ष)
(2) सर स्टेफर्ड क्रिप्स
(3) ए.वी. अलेक्जेंडर
- इस मिशन ने अपनी योजना 16 मई, 1946 को प्रकाशित की। संविधान सभा के गठन के सन्दर्भ में केबिनेट मिशन ने प्रमुख व्यवस्था इस प्रकार की-
1. भारत में संविधान सभा के लिए अप्रत्यक्ष निर्वाचन होगा।
2. संविधान सभामें 389 सदस्य होंगे।
- 292 ब्रिटिश प्रान्तों के
- 93 देशी रियासतों
- 4 चीफ कमीश्नर क्षेत्र से
3. 10 लाख व्यक्तियों(लगभग) पर संविधान-सभा में एक सदस्य होगा।
4. देशी रियासतों के प्रतिनिधियों का चयन रियासतों के प्रमुखों द्वारा किया जाना था।
संविधान सभा के चुनाव-
संविधान सभा के लिए चुनाव जुलाई-अगस्त, 1946 में 296 सीटों हेतु हुआ। जिनके परिणाम निम्न प्रकार रहे-
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस- 208सीटें
- मुस्लिम लीग- 73सीटें
- स्वतंत्र सदस्य-15 सीटें
Note- देशी रियासतों ने खुद को संविधान सभा से अलग रखने का निर्णय लिया। अत: उनकों आवंटित की गई 93 सीटें भर नहीं पाईं।
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि संविधान सभा आंशिक रूप से चुनी हुई और आंशिक रूप से नामांकित सभा थी।
संविधान सभा की कार्यप्रणाली-
संविधान सभा की समितियाँ-
- संविधान सभा ने संविधान के निर्माण से संबंधित विभिन्न कार्यों को करने के लिए कई समितियों का गठन किया। इनमें से 8 बड़ी समितियाँ थीं तथा अन्य छोटी।
- इन समितियों तथा इनके अध्यक्षों के नाम इस प्रकार हैं-
बड़ी समितियाँ -
1. संघ शक्ति समिति - जवाहरलाल नेहरू।
2. संघीय संविधान समिति - जवाहरलाल नेहरू।
3. प्रांतीय संविधान समिति - सरदार पटेल ।
4. प्रारूप समिति - डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ।
5. मौलिक अधिकारों एवं अल्पसंख्यकों संबंधी परामर्श समिति - सरदार पटेल।
note-इस समिति की दो उप समितियाँ थी
a.मौलिक अधिकार उप समिति - जे.बी. कृपलानी।
b.अल्पसंख्यक उप समिति – एच.सी. मुखर्जी।
6. प्रक्रिया नियम समिति - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
7. राज्यों के लिये समिति (राज्यों से समझौता करने वाली) - जवाहर लाल नेहरू।
8. संचालन समिति - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
छोटी समितियाँ -
1. संविधान सभा के कार्यों संबंधी समिति - जी.वी मावलंकर।
2. कार्य संचालन समिति - डॉ. के.एम. मुंशी।
3. सदन समिति - बी. पट्टाभिसीतारमैय्या।
4. राष्ट्र ध्वज संबंधी तदर्थ समिति - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ।
5. प्रारूप संविधान का परीक्षण करने वाली समिति – अल्लादी कृष्ण स्वामी अय्यर।
6. क्रीडेंशियल समिति - सर अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर।
7. वित्त एवं स्टाफ समिति - ए.एन. सिन्हा।
प्रारूप समिति(प्रमुख समिति)-
- संविधान सभा की सभी समितियों में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण समिति ‘प्रारूप समिति’ थी। इससमिति का गठन 29 अगस्त, 1947 को हुआ था। इस समिति को नए संविधान का प्रारूप तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
- इससमिति में सात सदस्य थे-
1. डॉ. बी.आर. अंबेडकर (अध्यक्ष)
30 अगस्त 1947 को इनको प्रारूप समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया।
2. एन. गोपालस्वामी आयंगर।
3. अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर।
4. डॉक्टर के.एम. मुंशी।
5. सैयद मोहम्मद सादुल्ला।
6. एन. माधव राव।
7. टी.टी. कृष्णामाचारी।
- विभिन्न समितियों के प्रस्तावों पर विचार करने के बाद प्रारूप समिति ने भारत के संविधान का पहला प्रारूप तैयार किया जिसे फरवरी 1948 में प्रकाशित किया गया था।
- भारत के लोगों को इस प्रारूप पर चर्चा करने और संशोधनों का प्रस्ताव देने के लिए 8 माह का समय दिया गया। लोगों की शिकायतों, आलोचनाओं और सुझावों के परिप्रेक्ष्य में प्रारूप समिति ने दूसरा प्रारूप तैयार किया, जिसे अक्टूबर, 1948 में प्रकाशित किया गया। प्रारूप समिति ने अपना प्रारूप तैयार करने में छह माह से भी कम का समय लिया। इसदौरान उसकी कुल 141 बैठकें हुई।
अंतरिम सरकार (1946)-
संविधान का प्रभाव में आना-
- डॉ बी.आर. अंबेडकर ने सभा में 4 नवंबर, 1948 को संविधान का अंतिम प्रारूप पेश किया। इस बार संविधान पहली बार पढ़ा गया जिस पर पाँच दिन तक आम चर्चा हुई।
- संविधान पर दूसरी बार 15 नवंबर, 1948 से विचार होना शुरु हुआ। इसमें संविधान पर खंडवार विचार किया गया।यह कार्य 17 अक्टूबर, 1949 तक चला। इस अवधि में कम से कम 7653 संशोधन प्रस्ताव आये थे।
- संविधान पर तीसरी बार 14 नवंबर, 1949 से विचार होना शुरु हुआ। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने “द कॉन्स्टीट्यूशनऐज सैटल्ड बाई द असेंबली बी पास्ड” प्रस्ताव पेश किया। संविधान के प्रारूप पर पेश इस प्रस्ताव को 26 नवंबर, 1949 को पारित घोषित कर दिया गया और इस पर अध्यक्ष व सदस्यों के हस्ताक्षर लिए गए। सभा में कुल 299 सदस्यों में से उस दिन केवल 284 सदस्य उपस्थित थे, जिन्होंने संविधान पर हस्ताक्षर किए। संविधान की प्रस्तावना में 26 नवंबर, 1949 का उल्लेख उस दिन के रूप में किया गया है जिस दिन भारत के लोगों ने सभा में संविधान को अपनाया, लागू किया व स्वयं को संविधान सौंपा।
- 26 नवंबर, 1949 को अपनाए गए संविधान में प्रस्तावना, 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियाँ थीं। प्रस्तावना को पूरे संविधान को लागू करने के बाद लागू किया गया।
- नए विधि मंत्री डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने सभा में संविधान के प्रारूप को रखा। उन्होंने सभा के कार्य-कलापों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्हें भारत के संविधान के पिता के रूप में पहचाना जाता है। इस महान लेखक, संविधान विशेषज्ञ, अनुसूचित जातियों के निर्विवाद नेता और भारत के संविधान के प्रमुख शिल्पकार को आधुनिक मनु की संज्ञा भी दी जाती है।
संविधान का प्रवर्तन-
- 26 नवंबर, 1949 को नागरिकता, चुनाव, तदर्थ संसद, अस्थायी व परिवर्तनशील नियम तथा छोटे शीर्षकों से जुड़े कुछ प्रावधान अनुच्छेद 5, 6, 7, 8, 9, 60, 334, 366, 367, 379,380, 388, 391, 392 और 393 स्वतःही लागू हो गए।
- संविधान के शेष प्रावधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुए। इस दिन को संविधान की शुरुआत के दिन के रूप में देखा जाता है और इसे गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है।
- इस दिन को संविधान की शुरुआत के रूप में इसलिए चुना गया क्योंकि इसका अपना ऐतिहासिक महत्व है। इसी दिन 1930 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन (दिसंबर 1929) में पारित हुए संकल्प के आधार पर पूर्ण स्वराज दिवस मनाया गया था।
संविधान सभा केअन्य कार्य-
संविधान सभा ने देश के लिए संविधान के निर्माण तथा कानूनों को लागू करने के अलावा संविधान सभा ने निम्न कार्य भी किये-
1. इसने 16 मई, 1949 में राष्ट्रमंडल में भारत की सदस्यता का सत्यापन किया।
2. इसने 22 जुलाई, 1947 को राष्ट्रीय ध्वज को अपनाया।
3. 14 सितम्बर, 1949 को हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकृत किया गया।
4. इसने 24 जनवरी, 1950 को राष्ट्रीय गान को अपनाया।
5. इसने 24 जनवरी, 1950 को राष्ट्रीय गीत को अपनाया।
6. इसने 24 जनवरी, 1950 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में चुना। यह संविधान सभा की अन्तिम बैठक थी जिसमें संविधान पर अंतिम रूप से हस्ताक्षर किये गये।
संविधान सभा की बैठक जब विधायिका के रूप में होती थी तब इसकी अध्यक्षता जी.वी. मावलंकर करते थे तथा जब सविधान सभा के रूप में होती तो इसकी अध्यक्षता डॉ. राजेन्द्र प्रसाद करते थे।
संविधान सभा के प्रमुख निर्वाचित नेता-
अनुसूचियाँ-
- प्रथम अनुसूची-
राज्यों के नाम एवं उनके न्यायिक क्षेत्र, संघ राज्य क्षेत्रों के नाम और उनकी सीमाएँ।
- दूसरीअनुसूची-
भारत के राष्ट्रपति, राज्यों के राज्यपाल, लोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, राज्यसभा के सभापति और उप-सभापति, राज्य विधानसभाओं के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष राज्य विधान परिषदों के सभापति और उप सभापति, सर्वोच्च न्यायालय केन्यायाधीश, उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक आदि) को प्राप्त होने वाले वेतन, भत्ते और पेंशन का उल्लेख किया गया है।
- तीसरी अनुसूची-
इसमें विभिन्न उम्मीदवारों द्वारा ली जाने वाली शपथ या प्रतिज्ञान के प्रारूप दिये गए हैं। संघ के मंत्री, संसद के लिए निर्वाचन हेतु अभ्यर्थी, संसद के सदस्य, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, राज्य मंत्री, राज्य विधानमण्डल के लिए निर्वाचन के लिए अभ्यर्थी, राज्य विधानमण्डल के सदस्य, उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश आदि के बारे में उल्लेखित है।
- चौथी अनुसूची-
राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों के लिए राज्यसभा में सीटों का आवंटन।
- पाँचवी अनुसूची-
अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन तथा नियंत्रण के बारे मेंउपबंध।
- छठी अनुसूची-
असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में उपबंध।
- सातवीं अनुसूची-
संघ सूची , राज्य सूची तथा समवर्ती सूची के संदर्भ में राज्य और केन्द्र के मध्य शक्तियों का विभाजन।
- आठवीं अनुसूची-
संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त भाषाएँ (मूल रूप से 14 मगर फिलहाल 22) ये भाषाएँ हैं- असमिया, बांग्ला, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिन्दी,कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगू तथा उर्दू।
- सिंधी भाषा को 1967 के 21वें संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था।
- कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली को 1992 के 71वें संशोधन अधिनियम द्वारा और बोड़ो, डोगरी, मैथिली और संथाली को 2003 के 92वें संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था।
- नवीं अनुसूची–
भू-सुधारों और जमींदारी प्रणाली के उन्मूलन से संबंधित राज्य विधानमण्डलों और अन्य मामलों से संबंधित संसद के अधिनियम और विनियम (मूलतः 13 परन्तु वर्तमान में 282)।
- इस अनुसूची को पहले संशोधन (1951) द्वारा मूल अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक समीक्षा से इसमें सम्मिलित कानूनों से इसे बचाने के लिए जोड़ा गया था। तथापि वर्ष 2007 में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि इस अनुसूची में 24 अप्रैल, 1975 के बाद सम्मिलित कानूनों की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
- दसवीं अनुसूची-
दल-बदल के आधार पर संसद और विधानसभा के सदस्यों की निरर्हता के बारे में उपबंध, इस अनुसूची को 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया। इसे ‘दल-परिवर्तन रोधी’ कानून भी कहा जाता है।
- ग्यारहवीं अनुसूची-
पंचायत की शक्तियों, प्राधिकारों व जिम्मेदारियों से संबंधित - इसमें 29 विषय हैं।
- इस अनुसूची को 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा जोड़ा गया।
- बारहवीं अनुसूची-
नगरपालिकाओं की शक्तियाँ, प्राधिकार व जिम्मेदारियाँ। इसमें 18 विषय हैं।
- इस अनुसूची को 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा जोड़ा गया।
भारतीय संविधान के स्रोत-
- संविधान निर्माताओं ने अमेरिका, ब्रिटेन और कई अन्य देशों के संविधानों का गहन अध्ययन करना शुरू किया व भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल जो भी प्रावधान उन्हें उपयुक्त लगे, उन्हें भारतीय संविधान में शामिल कर लिया।भारतीय संविधान पर सबसे अधिक प्रभाव भारत शासन अधिनियम-1935 का है।
- भारत शासन अधिनियम, 1935 -
- संघीय तंत्र
- राज्यपाल का कार्यकाल
- न्यायपालिका
- लोक सेवा आयोग
- आपातकालीन उपबंध
- प्रशासनिक विवरण।
- ब्रिटेन का संविधान –
- संसदीय शासन
- विधि का शासन
- विधायी प्रक्रिया
- एकल नागरिकता
- मंत्रिमण्डल प्रणाली
- परमाधिकार लेख
- संसदीय विशेषाधिकार
- द्विसदनवाद
- संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान –
- मूल अधिकार
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता
- न्यायिक पुनरावलोकन का सिद्धान्त
- उप-राष्ट्रपति का पद
- उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों कापद से हटाया जाना और राष्ट्रपति पर महाभियोग।
- आयरलैंड का संविधान –
- राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्त
- राष्ट्रपति की निर्वाचन पद्धति और राज्य सभा के लिए सदस्यों का नामांकन।
- कनाडा का संविधान –
- सशक्त केन्द्र के साथ संघीय व्यवस्था
- अवशिष्ट शक्तियों का केन्द्र में निहित होना
- केन्द्र द्वारा राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति और उच्चतम न्यायालय का परामर्शी न्याय निर्णयन।
- ऑस्ट्रेलिया का संविधान –
- समवर्ती सूची
- व्यापार, वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता
- संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक।
- जर्मनी का वाइमर संविधान –
- आपातकाल के समय मूल अधिकारों का स्थान।
- सोवियत संघ का संविधान –
- मूल कर्तव्य
- प्रस्तावना में न्याय का आदर्श।
- फ्रांस का संविधान –
- गणतंत्रात्मक और प्रस्तावना में स्वतंत्रता
- समता और बंधुता के आदर्श।
- दक्षिणी अफ्रीका का संविधान -
- संविधान में संशोधन की प्रक्रिया
- राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन।
- जापान का संविधान –
- विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया।