= कौन - दक्षिण भारत के सातवाहन वंश के सामंत थे।

= अपने आपको स्वतंत्र कर काँची के नागवंश को पराजित कर अपने वंश की नींव डाली।

= संस्थापक:- सिंह विष्णु

1. संगम साहित्य में पल्लवों को "तोडीयार" कहा गया है।

2. बाहुर अभिलेख (काँची) में पल्लवों को (तोण्डई) कहा जाता गया है।

3. रूद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख - इसमें "सुविशाख" नामक पल्लव को सौराष्ट्र का गवर्नर (प्रांतपाल) बताया गया है जिसने "सुदर्शन झील" का पुनर्निर्माण करवाया था।

4. दण्डी के ग्रंथ - अवंति सुंदरी में - पल्लव शासक सिंह विष्णु का उल्लेख मिलता है।

5. मतविलास प्रहसन:- पल्लव शासक महेन्द्रवर्मन प्रथम द्वारा रचित है।

जानकारी:- पल्लवकालीन सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक जीवन के बारे में जानकारी मिलती है।

6. महावंश - पल्लवों के प्रारम्भिक जीवन के बारे में जानकारी मिलती है।

7. सी-यू-की - ह्वेनसांग नरसिंह वर्मन प्रथम के समय काँची आया था। ह्वेनसांग नरसिंह वर्मन प्रथम को सबसे महान शासक बताया था।

= समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार उसने दक्षिणापथ विजय के दौरान पल्लव शासक "विष्णुगोप" को पराजित किया था।

= तमिलनाडु से प्राप्त प्राकृत भाषा के अभिलेखों में "पल्लव वंश" के प्रथम शासक का नाम "सिंहवर्मन" मिलता है।

1. सिंह विष्णु  - (575 ई. - 600 ई.)

- पल्लव वंश के संस्थापक थे।

- काँची को राजधानी बनाया था।

- उपाधि - अवनीसिंह

- विजय अभियान - वैल्लूर पालैयम तमिलनाडु से प्राप्त ताम्रपत्र के अनुसार।

- सिंह विष्णु ने अपना साम्राज्य कावेरी नदी तक विस्तृत कर "अवनी सिंह" की उपाधि धारण की थी।

2. कशाकुड़ी (तमिल) से प्राप्त दानपत्र के अनुसार - सिहं विष्णु ने मलय, मालव, चोल, सिंहल द्वीप व केरल पर विजय प्राप्त की थी।

- सिंह विष्णु के दरबार में महान विद्वान "भारवि" निवास करते थे जिन्होंने "किरातार्जुनियम्" नामक ग्रन्थ लिखा था।

- "किरातार्जुनियम्" में भगवान शिव किरात वेष में अर्जुन के साथ युद्ध का उल्लेख मिलता है।

- सिंह विष्णु वैष्णव धर्म के अनुयायी थे।

- इन्होंने मामल्लपुरम (वर्तमान महाबलीपुरम) में एक वराह मंदिर का निर्माण करवाया था।

- इस मंदिर में अपनी स्वयं की प्रतिमा भी स्थापित करवाई थी।
 

 

→ महेन्द्रवर्मन प्रथम - (600-630ई.)

1. पल्लव - चालुक्य संघर्ष

उल्लेख:- कुरम अभिलेख - इसके अनुसार नरसिंह वर्मन प्रथम ने पुलकेशिन II को क्रमश: पारियाल, शूरमार व मणिमंगलम के युद्ध में पराजित किया तथा पराजित करने के बाद उसकी पीठ पर "विजयाक्षर" अंकित करवा दिया था।

- 642 ई. में चालुक्यों की राजधानी बादामी पर अधिकार कर लिया था।

- मल्लिकार्जुन मंदिर (बादामी) के पीछे लगे शिलालेख में भी नरसिंह वर्मन प्रथम की विजय का उल्लेख है।

उपाधि - वातापीकौंड (वातापी को तोड़ने वाला / वातापी का अपहर्ता)

2. सिंहल द्वीप (श्रीलंका) अभियान:-

- पुलकेशिन II के विरुद्ध श्रीलंका के राजकुमार मानवर्मा की सहायता की थी।

- अत: नरसिंह वर्मन I ने मानवर्मा की सहायता हेतु अपनी एक विशाल नौ सेना भेजकर - मानवर्मा की सहायता की थी।

- मानवर्मा ने अपने विरोधी "हत्थदत्थ" को मारकर श्रीलंका का शासक बना था।

- कुरम अभिलेख के अनुसार नरसिंह वर्मन ने - चोल, केरल व पाण्ड्यों को पराजित किया था।

- निर्माण कार्य:- नरसिंह वर्मन प्रथम ने "महाबलीपुरम" में एकाश्मक रथ मंदिरों का निर्माण करवाया था।

- नरसिंह वर्मन शैली प्रचलित की थी।

- चीनी यात्री ह्वेनसांग ने काँची के वैभव का वर्णन किया है, उसके अनुसार - काँची 6 मील में फैला हुआ था - 100 से अधिक 48 व 1000 बौद्ध भिक्षुक निवास करते थे।

NOTE:- नरसिंह वर्मन प्रथम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र महेन्द्र वर्मन II शासक बना (668-670) जिसे चालुक्य शासक - विक्रमादित्य ने मार डाला।

1. पांड्य आक्रमण

कारण:- कुछ इतिहासकारों के अनुसार "परमेश्वरवर्मन II" का एक पुत्र "चित्रमाय" था जिसे परमेश्वरवर्मन II ने उत्तराधिकार से वंचित कर दिया, वह पाण्डे्य शासकों से जा मिला-

पिता की मृत्यु के बाद - पाण्ड्यों से मिलकर - काँची पर आक्रमण किया था।

2. चालुक्य शासक - विक्रमादित्य II व पुत्र कीर्तिवर्मन ने काँची पर आक्रमण कर अपार धन लूटा।

राष्ट्रकूट संघर्ष :- राष्ट्रकूट शासक दंतिदुर्ग ने “नंदिवर्मन II को पराजित किया था।

-        दोनों में संधि हुई।

-        दंतिदुर्ग ने अपनी पुत्री “रेखा” का विवाह नंदिवर्मन के साथ कर दिया था।

-        सत्य तथ्य :- नंदिवर्मन II वैष्णव धर्म का अनुयायी था।

निर्माण कार्य:-

-        नंदिवर्मन II ने काँची में “मुक्तेश्वर” शिव मंदिर व “बैंकुण्ठ पेदमाल” मंदिरो का निर्माण करवाया था।

Note:- नदीवर्मन II के वाद दंतिवर्मन (800-846) तक शासक रहा जिसे अभिलेखों में “विष्णु का अवतार”

-    दंतिवर्मन का पुत्र था।

-    इसने गंगो को पराजित किया।

-    चोल, राष्ट्रकूट व गंगवंश के साथ मिलकर “पाण्डेयो” को पराजित किया तथा कावेरी के क्षेत्र पर पुन: अधिकार कर लिया था।

-    राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष ने अपनी पुत्री “शंखा” का विवाह नंदिवर्मन III के साथ कर दिया था।

-    इसके दरबार में तमिल के महान विद्वान “पेरून्देवनार” निवास करते थे जिन्होंने “भारत वैणवा ” नामक ग्रन्थ की रचना की थी।

Note:- नंदिवर्मन III की मृत्यु के बाद उसका पुत्र “नृपतुंगवर्मन (869-880) शासक बना।

-        इस वंश का अतिम शासक अपराजित (880-903 ई.) इसे चोल शासक “आदित्य प्रथम” ने मार डाला था।

-        काँची के पल्लवों का पतन हो गया था।

-        पल्लव कालीन-कला-संस्कृति

-        द्रविड़ कला का आधार थी

-        दक्षिण भारत की मंदिर स्थापत्य के 3 अंग माने गए हैं।

1.   मण्डप

2.   रथ

3.   विशाल मंदिर- विशाल प्रवेश-गोपुरम

-        पर्सी ब्राउन ने पल्लव स्थापत्य कला को 4 भागों में विभाजित किया हैं।

1.   महेन्द्रवर्मन शैली (610-640 ई.)

-    इस शैली में कठोर पाषाण (चट्‌टानों) को काटकर गुहा मंदिरो का निर्माण जिन्हें “मण्डप” कहा गया है।

-    मण्डप साधारणत: स्तंभयुक्त बरामदे हैं जिनकी पिछली दीवार पर एक दो कक्ष निर्मित होते हैं: जैसे- पल्लवरम का पंचपांडव मंडप

2.   माम्मल शैली :-

-    इस शैली का विकास- नरसिंह वर्मन प्रथम द्वारा किया गया था।

-    इसके अन्तर्गत दो प्रकार के स्मारक-(1) मण्डप (2) रथ या एकाश्मक मंदिर

-    इन एकाश्मक मंदिरों में “द्रौपदी रथ” मंदिर सबसे छोटा है, जबकि “धर्मराज रथ” सबसे बड़ा व सुंदर है।

-        इन रथ मंदिरों को “सात पैगोड़ा” कहा जाता है।

1.   द्रोपदी रथ- सबसे छोटा

2.   नकुल-सहदेव रथ

3.   अर्जुन रथ

4.   भीम-रथ

5.   धर्मराज रथ-सबसे बड़ा/सुंदर था इस पर नरसिंहवर्मन की मूर्ति भी है।

6.   गणेश रथ

7.   पिडारी रथ

8.   वलयकंट्‌टैथ रथ

-        कुल रथ मंदिरो की संख्या-8 हैं।

-        इन रथ मंदिरो पर-शिव, गंगा, पार्वती, गणेश, द्वन्द्व, हरिहर, ब्रह्मा का अंकन मिलता है।

-        सप्तपेगोडा (महाबलीपुरम)- मूर्तिकला के लिए विख्यात है।

3.   राजसिंह शेली:-

-     गुहामंदिरो के स्थान पर ईंट व पाषाण की सहायता से “इमारती मंदिरो का निर्माण किया गया था।

शैली:- नरसिंह वर्मन II द्वारा

-     काँची का कैलाशनाथ मंदिर इसी शैली में निर्मित है जिसका निर्माण नरसिंह वर्मन II के समय प्रारंभ होकर- परमेश्वर वर्मन II के समय पूर्ण हुआ था।

4.   नंदिवर्म/अपराजित शैली (800-900 ई.)

-     इस शैली में छोटे-छोटे मंदिरों का निर्माण हुआ।

जैसे- काँची का “मुक्तेश्वर मंदिर”