बजट
बजट
- बजट शब्द अंग्रेजी के शब्द ‘Bowgette’ से लिया गया है जिसकी उत्पत्ति फ्रेंच शब्द Bougette से हुई। ‘bougette’ शब्द भी ‘bouge’से बना है जिसका अर्थ ‘चमड़े का थैला’ होता है।
- 1733 में बजट शब्द का प्रयोग इंग्लैण्ड में 'जादू के पिटारे' के अर्थ में किया गया।
- भारत में सर्वप्रथम 18 फरवरी, 1860 में बजट प्रस्तुत करने का श्रेय लॉर्ड कैनिंग के कार्यकाल में कार्यरत वित्तीय सदस्य जेम्स विल्सन को है। इसलिए जेम्स विल्सन को ‘भारतीय बजट का प्रणेता’ माना जाता है।
- बजट शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1803 ई. फ्रांस में किया गया।
- वर्ष 1924 से वर्ष 1999 तक बजट फरवरी के अंतिम कार्यकारी दिन शाम 5 बजे पेश किया जाता था। यह प्रथा सर बेसिल ब्लैकेट ने वर्ष 1924 में शुरू की थी।
- वर्ष 2000 में पहली बार यशवंत सिन्हा ने बजट सुबह 11 बजे पेश किया।
- स्वतंत्रता के बाद देश का पहला बजट पहले वित्त मंत्री आर.के. षणमुखम चेट्टी ने 26 नवंबर, 1947 को पेश किया। इसमें 15 अगस्त, 1947 से लेकर 31 मार्च, 1948 के दौरान साढ़े सात महीनों को शामिल किया गया।
- भारतीय गणतंत्र की स्थापना के बाद पहला बजट 28 फरवरी, 1950 को जॉन मथाई ने पेश किया था।
- संविधान में बजट को ‘वार्षिक वित्तीय विवरण’ कहा है। दूसरे शब्दों में, ‘बजट’ शब्द का संविधान में कहीं उल्लेख नहीं है। यह ‘वार्षिक वित्तीय विवरण’ के नाम से प्रचलित है तथा इसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 112 में किया गया है।
- मोरारजी देसाई ने अब तक सर्वाधिक दस बार बजट पेश किया है, छह बार वित्त मंत्री और चार बार उपप्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने ऐसा किया।
- बजट, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए सरकार की अनुमानित आय और व्यय का विवरण है। यह संसाधनों की उपलब्धता का अनुमान लगाने तथा तत्पश्चात् उन्हें पूर्व निर्धारित प्राथमिकता के अनुसार किसी संगठन की विभिन्न गतिविधियों के लिए आवंटित करने की प्रक्रिया है। इसके साथ ही यह जनता की आवश्याकताओं और उद्देश्यों के साथ दुर्लभ संसाधनों को संतुलित करने का प्रयास भी है।
- बजट सरकार की आय एवं व्यय का विवरण पत्र होता है, जिसमें वार्षिक अनुमान होते हैं।
- संविधान का अनुच्छेद 112 (केंद्र सरकार के लिए) तथा अनुच्छेद 202 (राज्य सरकार के लिए) संबंधित लोकसभा/विधानसभा के समक्ष वार्षिक वित्तीय विवरण प्रस्तुत करने का प्रावधान करता है।
- आर.के. षणमुखम चेट्टी ने वर्ष 1948-49 के बजट में पहली बार ‘अंतरिम’ शब्द का प्रयोग किया तब से लघु अवधि के बजट के लिए इस शब्द का इस्तेमाल शुरू हुआ।
- वर्ष 1921 के पश्चात् से, संघ सरकार के बजट दो प्रकार के थे-
रेल बजट
सामान्य बजट
- भारत में रेलवे बजट को सामान्य बजट से अलग ‘सर विलियम एकवर्थ कमेटी’ (1920-21) की रिपोर्ट पर वर्ष 1924 में किया था।
- वर्ष 2016 में विवेक देवराय कमेटी की सिफारिश पर पुन: रेल बजट को आम बजट के साथ प्रस्तुत करने की मंजूरी दे दी।
- वर्ष 2017-18 के बजट में इस विभाजन को पुन: समाप्त कर रेलवे बजट का सामान्य बजट में विलय कर दिया गया है। सामान्य बजट, केंद्रीय वित्त मंत्री द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।
- प्रतिवर्ष भारत सरकार का बजट संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत किया जाता है। बजट में सरकार का वित्तीय विवरण सम्मिलित होता है। इस वित्तीय विवरण में एक वित्तीय वर्ष की अनुमानित प्राप्तियाँ और व्यय होते हैं।
- वर्तमान व्यवस्था के अंतर्गत प्रतिवर्ष 1 अप्रैल से नया वित्तीय वर्ष आरंभ होता है। दूसरे शब्दों में, बजट आने वाले वर्ष के दौरान किस मद में कितना धन व्यय करना है, किसके द्वारा इसमें कितना योगदान दिया जाएगा और धन कहाँ से एकत्रित किया जाएगा, प्रस्ताव में इन सभी बातों का विवरण होता है।
सरकारी बजट :-
- यह लगभग सभी सरकारी संस्थाओं के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी है।
- विनियोजित राशि इसकी सीमा होती है और किसी भी परिवर्तन के लिए औपचारिक अनुमोदन की आवश्कयता होती है तथा दी गई व्यवस्था के अंतर्गत इसे प्राप्त करना कठिन होता है।
- इसका उद्देश्य कल्याणकारी होता है।
व्यापारिक बजट :-
- यह कानूनी रूप में बाध्यकारी नहीं है। यह बजट इच्छानुसार हो सकता है और इस बजट को बीच में भी छोड़ा जा सकता है। यह प्राय: लाभोन्मुख होता है।
- इसमें वित्तीय वर्ष के दौरान भारत सरकार के अनुमानित प्राप्तियों और खर्च का विवरण होता है, जो 1 अप्रैल से प्रारंभ होकर 31 मार्च तक होता है।
किसी भी बजट में निम्नलिखित तीन प्रकार की सूचनाएँ होती हैं
- आगामी वर्ष के लिए बजट अनुमान।
- चालू वर्ष का बजट और संशोधित आँकड़े।
- पिछले वर्ष की प्राप्तियों और व्यय के वास्तविक आँकड़े।
- वर्ष 1955-56 से पूर्व बजट केवल अंग्रेजी में छपता था, किंतु चिंतामणि द्वारकानाथ देशमुख ने इसे हिंदी में छापने के लिए कहा, जिसके बाद अभी बजट दोनों भाषा (अंग्रेजी व हिंदी) में छपता है।
वित्त मंत्री होते हुए भी बजट प्रस्तुत नहीं किया-
- हेमतवी नन्दन बहुगुणा
- के.सी. नियोगी
- बजट पेश करने के 75 दिन की अवधि के अंदर बजट को पारित करना आवश्यक होता है।
- बजट सरकार की राजकोषीय नीति का भाग है।
- 25 फरवरी, 1992 में भारत में पहली बार रेल बजट और 29 फरवरी, 1992 को आम बजट का ‘टेलीविजन पर प्रसारण’ शुरू हुआ था।
प्रधानमंत्री के साथ-साथ वित्त मंत्री के रूप में बजट पेश किया
पंडित जवाहरलाल नेहरू (1958-59 का बजट
श्रीमती इंदिरा गाँधी (1970-71 का बजट
राजीव गाँधी (1987-88 का बजट)
- देश में चार प्रधानमंत्री ऐसे हुए जो वित्त मंत्री के पद पर कार्य कर चुके हैं-
- मोरारजी देसाई
- चौधरी चरण सिंह
- विश्वनाथ प्रताप सिंह
- डॉ. मनमोहन सिंह
- बजट के दो भाग होते हैं-
- आय संबंधी
- व्यय संबंधी
- वित्त मंत्रालय संसद में प्रस्तुत करने के लिए एक नहीं बल्कि दो विवरण पत्र तैयार करता है-
- वार्षिक वित्तीय विवरण पत्र
- अनुदानों की माँगे
वार्षिक वित्तीय विवरण :-
- संविधान के अनु. 112 के तहत भारत सरकार की अनुमानित प्राप्तियों और व्यय का विवरण संसद के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।
- प्राप्तियों और संवितरण को सरकारी खातों के अंतर्गत तीन भागों में दर्शाया जाता है-
- संचित निधि :-
- ऐसी निधि, जिसमें भारत सरकार की सभी प्राप्तियाँ जमा की जाती हैं एवं सभी भुगतान निकाले जाते हैं।
- अनु. 266(1) में संचित निधि का प्रावधान है।
- पहली श्रेणी में निहित व्यय पर दोनों सदनों में चर्चा की जा सकती है, परंतु किसी भी सदन में इसे मतदान के लिए प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, यह बजट का गैर-मतदान योग्य भाग है। भारत की संचित निधि पर भारित व्यय में सम्मिलित है।
- राष्ट्रपति की परिलब्धियाँ और भत्ते तथा उसके कार्यबल के अन्य व्यय।
- राज्यसभा के सभापति (उपराष्ट्रपति) और उपसभापति तथा लोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन एवं भत्ते।
- सर्वोच्च नयायालय के न्यायाधीशों को देय वेतन, भत्ते एवं पेंशन।
- उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की पेंशन।
- भारत के नियंत्रक और महालेख परीक्षक के वेतन, भत्ते तथा पेंशन।
- संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों के वेतन, भत्ते और पेंशन।
- सर्वोच्च न्यायालय के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक तथा संघ लोक सेवा आयोग के कार्यालयों में सेवारत व्यक्तियों के वेतन, भत्ते और पेंशन सहित प्रशासनिक व्यय।
- संविधान, संसद या कानून द्वारा घोषित कोई भी अन्य भारित व्यय।
- दूसरी श्रेणी में आने वाला व्यय लोकसभा के समक्ष अनुदान माँग के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तथा सदन में उस पर मतदान किया जाता है। लोकसभा को ऐसी भी माँग को स्वीकार या अस्वीकार करने या उसमें निर्दिष्ट माँग को कम करने का अधिकार प्राप्त है। राष्ट्रपति की पूर्व अनुशंसा के बिना ऐसी किसी भी माँग हेतु प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता है। चूंकि ये मांगें सरकार के कार्यक्रमों और नीतियों के लिए आवश्यक होती हैं, इसलिए यदि किसी भी माँग को मतों द्वारा अस्वीकार कर दिया जाता है, तो यह सरकार की पराजय के समान होता है।
- आकस्मिकता निधि :-
- संविधान का अनुच्छेद 267 संसद को भारत की ‘आकस्मिकता निधि ’ स्थापित करने के लिए अधिकृत करता है। इस निधि से कानून द्वारा निर्धारित राशि का समय-समय पर भुगतान किया जाता है। तदानुसार, संसद ने 1950 में भारत की आकस्मिकता निधि को अधिनियमित किया।
- यह निधि राष्ट्रपति के नियंत्रण के तहत आती है तथा किसी अप्रत्याशित व्यय पूरा करने के लिए इसमें अग्रिम दिया जाता है। राष्ट्रपति की ओर से यह निधि वित्त सचिव द्वारा नियंत्रित की जाती है।
- भारत के लोक लेखा की भांति, इसे भी कार्यपालिका द्वारा संचालित किया जाता है।
- वर्तमान मे संसद द्वारा अधिकृत आकस्मिकता निधि का कोष 500 करोड़ रुपए है और इसे संसद द्वारा बढ़ाया जा सकता है। राष्ट्रपति की ओर से इस निधि को वित्त मंत्रालय द्वारा संचालित किया जाता है।
- लोक लेखा निधि :-
- भारत सरकार द्वारा अथवा उसकी ओर से प्राप्त अन्य सभी सार्वजनिक धनराशियाँ (भारत की संचित निधि में जाने वाली धनराशियों के अतिरिक्त) भारत के लोक लेख में जमा की जाती है।
- इसमें सरकार की देख-रेख में रखी गई भविष्य निधि, लघु बचत जमा जैसी सभी धनराशियाँ तथा सड़क विकास, प्राथमिक शिक्षा जैसी विशिष्ट मदों पर व्यय के लिए अलग से आरक्षित सरकारी आय, आरक्षित/विशेष निधियाँ इत्यादि सम्मिलित हैं।
- यह लेखा कार्यपालिका आदेश द्वारा संचालित होता है, अर्थात् इस लेखे से संसदीय विनियोग के बिना भुगतान किया जा सकता है।
- लोक लेखा की निधियाँ सरकार के अंतर्गत नहीं होती हैं और अंतत: इसे जमा करने वाली जनता या प्राधिकरणों को वापस किया जाना आवश्यक होता है। इसलिए इस प्रकार के भुगतानों के लिए संसदीय प्राधिकरण की आवश्यकता नहीं होती है, केवल उसे मामलें को छोड़कर जहाँ संसद के अनुमोदन के पश्चात् संचित निधि से राशियाँ आहरित की जाती हैं और विशिष्ट मदों पर व्यय लोक लेखा में रखी जाती हैं। इस स्थिति में, विशिष्ट मद पर किए जाने वाले व्यय के लोक लेखा से आहरण हेतु विशिष्ट मद पर वास्तविक व्यय को पुन: संसद के मतदान के लिए प्रस्तुत किया जाता है।
- संविधान के अनु. 266(2) के तहत लोक लेखा निधि की व्यवस्था है।
- संविधान के अधीन, बजट में राजस्व खाते के व्यय को अन्य व्यय से अलग दिखाना होता है इसलिए सरकार का बजट दो भागों में बँटा होता है-
- राजस्व बजट
- पूँजी बजट

बजट संबंधी खाते
1. राजस्व खाता :- राजस्व खाते में सरकार की राजस्व प्राप्तियाँ और इस राजस्व से किए जाने वाले व्यय सम्मिलित होते हैं।
- राजस्व प्राप्तियाँ :- राजस्व प्राप्तियाँ वे प्राप्तियाँ होती हैं, जिन्हें सरकार द्वारा अदाता को पुन: भुगतान किए जाने की आवश्यकता नहीं होती है, अर्थात् ये अप्रतिदेय होती हैं। इसे सरकार द्वारा पुन: प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इसलिए राजस्व प्राप्तियाँ, एक दिशीय लेनदेन होती हैं। राजस्व प्राप्तियाँ सरकार के लिए देयताओं का सृजन नहीं करती हैं। राजस्व प्राप्तियों को कर-राजस्व एवं गैर कर-राजस्व में विभाजित किया जाता है।
2. पूँजीगत खाता :- पूँजीगत खाता, केंद्र सरकार की परिसंपत्तियों तथा देयताओं का खाता है। इसमें पूँजीगत परिवर्तनों को भी ध्यान में रखा जाता है। इसमें सरकार की पूँजीगत प्राप्तियाँ एवं पूँजीगत व्यय सम्मिलित होते हैं।
3. सार्वजनिक ऋण खाता :- इसमें सरकार द्वारा ली गई ऋण की राशि को शामिल किया जाता है।
- योजनागत व्यय :- योजनागत व्यय से तात्पर्य केंद्रीय योजना पर होने वाले व्यय से होता है।
- गैर योजनागत व्यय :- गैर योजनागत व्यय से तात्पर्य सरकार द्वारा नियमित दायित्वों के निर्वहन पर किए जाने वाले व्यय होता है।
बजट प्रक्रिया के विभिन्न चरण :-
- बजट का प्रस्तुतिकरण :- बजट को ‘बजट भाषण’ के साथ प्रस्तुत किया जाता है। बजट भाषण दो भागों में होता है- भाग A में ‘देश का सामान्य आर्थिक सर्वेक्षण’ एवं भाग B में आगामी वित्तीय वर्ष हेतु ‘कराधान प्रस्ताव’ होते हैं। सदन में बजट के प्रस्तुतीकरण के दिन इस पर कोई चर्चा नहीं होती है।
- बजट भाषण :- वित्त मंत्री, जो भारत के राष्ट्रपति की ओर से, लोक सभा में बजट प्रस्तुत करते समय जो भाषण देता है उसे बजट भाषण कहते हैं। बजट भाषण अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है। बजट भाषण में वित्त मंत्री पूरे देश को यह बताता है कि पिछले, वर्तमान और अगले वित्त वर्ष में उसको किन-किन श्रोतों से पैसा मिला/मिलेगा और किन-किन मदों पर खर्च किए जाएगा।
- बजट सत्र :- संसद का सत्र प्रारम्भ होता है इस सत्र में आगामी वित्तीय वर्ष का अनुमानित बजट प्रस्तुत किया जाता है इसलिए इस सत्र को बजट सत्र कहा जाता है।
- बजट टीम :- बजट निर्माण की पूरी जिम्मेदारी वित्त मंत्रालय की होती है इस कार्य में वित्त मंत्रालय के अधीनस्थ विभाग, योजना आयोग, CAG, प्रशासनिक मंत्रालय भी सहयोग करते हैं।
- आम चर्चा / बहस :- साधारण बजट को प्रस्तुत करने की तिथि के कुछ दिन बाद तक बजट पर आम बहस चलती रहती है। दोनों सदन इस पर तीन से चार दिन बहस करते हैं।
- विभागीय समितियों द्वारा जाँच :- बजट पर आम बहस पूरी होने के बाद सदन तीन या चार हफ्तों के लिए स्थगित हो जाता है। इस अंतराल के दौरान संसद की स्थायी समितियाँ अनुदान की माँग आदि की विस्तार से पड़ताल करती हैं और एक रिपोर्ट तैयार करती हैं। इन रिर्पोटों को दोनों सदनों में विचारार्थ रखा जाता है।
- अनुदान की माँगों पर मतदान :- विभागीय स्थायी समितियों के आलोक में लोकसभा में अनुदान की माँगों के लिए मतदान होता है। मांगें मंत्रालयवार प्रस्तुत की जाती हैं। पूर्ण मतदान के उपरांत एक माँग, अनुदान बन जाती हैं।
- विनियोग विधेयक का पारित होना :- संविधान में व्यवस्था की गई है कि भारत की संचित निधि से विधि सम्मत विनियोग के सिवाय धन की निकासी नहीं होगी, तदानुसार भारत की निधि से विनियोग के लिए एक विनियोग विधेयक पुन: स्थापित किया जाता है ताकि धन को निम्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है।
- वित्त विधेयक का पारित होना :- वित्त विधेयक भारत सरकार के उस वर्ष के लिए वित्तीय प्रस्तावों को प्रभावी करने के लिए पुन:स्थापित किया जाता है। इस पर धन विधेयक की सभी शर्तें लागू होती हैं। वित्त विधेयक में विनियोग विधेयक के विपरीत संशोधन (कर को बढ़ाने या घटाने के लिए) प्रस्तावित किए जा सकते हैं।
बजट के प्रकार
- राजस्व बजट :– इसमें राजस्व आय व राजस्व व्यय आता है।
- संतुलित बजट :– संतुलित बजट में कुल आय एवं कुल व्यय बराबर होते हैं।\
- संतुलित बजट = कुल आय - कुल व्यय = 0
- बचत का बजट:– इसमें सरकार की आय अधिक होती है और व्यय कम होता है।
- बचत का बजट = कुल आय > कुल व्यय
- घाटे का बजट :– इसमें सरकार की आय कम एवं व्यय अधिक होता है।
- घाटे का बजट = कुल आय < कुल व्यय
समयावधि के आधार पर बजट के प्रकार
- समयावधि के आधार पर बजट को तीन भागों में विभाजित किया गया है-
- वार्षिक बजट :– प्रत्येक सरकार अपने संभावित आय-व्यय की संवैधानिक पूर्ति हेतु सामान्यतः आगामी वित्त वर्ष के लिए चालू वर्ष फरवरी में बजट प्रस्तुत करती है।
- पूरक बजट :– किसी वित्त वर्ष की समाप्ति पूर्व ही सरकार को किसी विशेष मद के व्यय हेतु और अधिक धन की आवश्यकता महसूस होती है तो सरकार संसद में अनुपूरक माँगों के लिए जो बजट पेश करती है उसे पूरक बजट की संज्ञा दी जाती है। इसे पास करने की प्रक्रिया भी सामान्य बजट जैसी ही है।
- अंतरिम बजट :- अंतरिम बजट को “वोट ऑन अकाउंट” कहा जाता है। कुछ लोग इसे लेखानुदान माँग और मिनी बजट भी कहते हैं। वोट ऑन अकाउंट के जरिए सीमित अवधि के लिए सरकार के जरूरी खर्च को मंजूरी मिलती है। जिस साल लोकसभा चुनाव होता है, उस साल सरकार अंतरिम बजट पेश करती है। चुनाव के बाद बनने वाली सरकार पूर्ण बजट पेश करती है।
सावर्जनिक संस्था के आधार पर बजट के प्रकार
- सार्वजनिक संस्था के आधार पर बजट तीन प्रकार के होते हैं-
- केन्द्र सरकार का बजट :- भारत सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट
- राज्य सरकारों के बजट:- इसमें सभी राज्यों के अलग-अलग बजट आते हैं।
- पंचायती राज एवं स्थानीय निकायों के बजट :- इसके तहत प्रत्येक राज्य में जिलेवार पंचायत राज संस्थाओं एवं नगर निगमों तथा नगरपालिका का समावेश होता है।
आम बजट :-
- बजट किसी भी वित्तीय वर्ष में सरकार के आय-व्यय का वार्षिक लेखा-जोखा है जिसमें सरकार की उन वित्तीय नीतियों का भी विस्तृत विवरण होता है जिसके आधार पर सरकार अगले एक वर्ष तक अपनी आर्थिक नीतियों का संचालन करती है।
बजटिंग का विकास :-
1. लाइन आइटम बजट :-
- 19वीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण में अधिकांश देशों में सरकारी बजट प्रक्रियाओं की विशेषताओं में अदक्ष लेखा प्रक्रियाएं, तदर्थवाद, न्यून केन्द्रीय नियंत्रण तथा निम्न निगरानी व मूल्यांकन प्रक्रिया विद्यमान थी।
- 19वीं शताब्दी के अंतिम चरण में, कुछ देशों में लाइन आइटम बजट प्रक्रिया प्रारंभ हुई।
- लाइन आइटम बजट से आशय ऐसे बजट से है जिसमें, व्यक्तिगत वित्तीय विवरण की मदों (आइटमों) को लागत केंद्रों या विभागों में समूहित किया जाता है। यह पिछले लेखांकन या बजट अवधि के वित्तीय आंकड़ों एवं वर्तमान व भावी अवधि के लिए अनुमानित वित्तीय आँकड़ों के बीच तुलना दर्शाता है।
- एक लाइन आइटम प्रणाली में बजट अवधि के लिए व्यय, विषय या ‘लाइन आइटम’ के अनुसार सूचीबद्ध किए जाते हैं। इन लाइन-आइटम में एक इकाई द्वारा वेतन, यात्रा भत्तों, कार्यालय खर्च आदि की निर्धारित सीमा का विवरण दिया जाता है। इस बात का ध्यान रखा जाता है कि संस्थाएँ या इकाइयाँ निर्धारित सीमा से अधिक खर्च नहीं करेगी। इस निर्धारित सीमा का निर्धारण केंद्रीय अधिकरण या वित्त मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
2. आउटकम बजट :-
- आउटकम बजट वित्त मंत्रालय और योजना आयोग के संयुक्त प्रयास का परिणाम है।
- इसके तहत योजना आयोग के अधीन Programme outcome and monitaring department के नाम से एक नये विभाग का सृजन किया गया है जो विभिन्न-विभागों की प्रगति रिपोर्ट तैयार करेगा और फिर इसी रिपोर्ट के आधार पर आउटकम बजट के लक्ष्यों का निर्धारण किया जाएगा।
- आशय यह है कि इसके जरिये सरकार विभिन्न विभागों के लिए स्पष्ट लक्ष्यों को निर्धारण करती है। वर्तमान में इसके अंतर्गत केवल योजनागत व्यय को शामिल किया गया है। उदाहरण के लिए भवन निर्माण, मेज और कुर्सियां आदि खरीदने के लिए धन का आवंटन करना निवेश है, जिसका आउटपुट विद्यालय का निर्माण है। यहां अंतत: शिक्षित होने वाले छात्रों की संख्या परिणाम (आउटकम) होगी।
- संसदीय इतिहास में पहला आउटकम बजट 25 अगस्त, 2005 को पेश किया गया।
3. निष्पादन बजट :-
- इसके जरिए आउटकम बजट द्वारा निर्धारित लक्ष्यों के संदर्भ में सरकार के विभिन्न विभागों के निष्पादन का मूल्यांकन किया जाता है और बतलाया जाता है कि संबद्ध विभाग उन लक्ष्यों को कहाँ तक प्राप्त करने में सफल रहे हैं और उसे कहाँ तक प्राप्त किया जा सकता है ? स्पष्ट है कि जहाँ आम बजट सरकार की वित्तीय नीतियों का विवरण और उसके क्रियान्वयन के लिए योजनाराशि का आवंटन करती है वहीं आउटकम बजट में आवंटित राशि के अनुरूप विभिन्न विभागों के लिए स्पष्ट लक्ष्यों का निर्धारण किया जाता है और निष्पादन बजट के जरिए उन लक्ष्यों के संदर्भ में संबंधित विभाग के निष्पादन का मूल्यांकन किया जाता है।
- निष्पादन बजट यह संकेत देता है कि व्यय की गई राशि किस प्रकार आउटपुट दे सकती है। हालांकि निष्पादन की अपनी एक सीमा है- इकाई की मानक लागत (विशेषकर सामाजिक कार्यक्रम में) की जानकारी प्राप्त करना सरल नहीं होता है। इसके लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है।
4. शून्य आधारित बजट / जीरोबेस बजट :-
- इसकी संकल्पना अमेरिका के टेक्सास इन्स्टूमेंट के बजट निदेशक पीटर फियर्स के द्वारा दी गई थी।
- भारत में 2000-01 से सार्वजनिक व्यय की कार्यकुशलता को बढ़ाने के लिए शून्य आधारित बजट की शुरुआत की गई।
- इसके अंतर्गत बजट को तैयार करते समय पूर्व से चली आ रही योजनाओं का उसके गुण-दोषों व निष्पादन के आधार पर मूल्यांकन किया जाता है और फिर उसके लिए राशि का आवंटन किया जाता है।
- दूसरे शब्दों में कहें, तो पिछले वर्ष के संदर्भ के बिना विभिन्न विभागों के बजट को तैयार करने की प्रक्रिया zero based Budgeting कहलाती है।
- इस प्रणाली को ‘सूर्यास्त बजट प्रणाली’ (सनसेट बजट सिस्टम) भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि वित्तीय वर्ष के सूर्यास्त पर प्रत्येक विभाग को एक शून्य आधारित बजट प्रस्तुत करना होता है जिसमें उसके प्रत्येक क्रियाकलाप व उपलब्धियों का लेखा-जोखा रहता है।
5. लैंगिक बजट/जेंडर बजट :-
- जेंडर बजटिंग से आशय महिलाओं के पृथक बजट से नहीं है अपितु यह लैंगिक रूप से संवेदनशील होकर संसाधनों का आवंटन सुनिश्चित करने की रणनीति तथा समिष्टगत आर्थिक नीति के निर्माण का एक साधन है।
- वर्ष 2005-06 के बजट में बजटीय आवंटन हेतु लैंगिक संवदेनशीलता को रेखांकित किया गया था।
- जेंडर बजटिंग एक प्रकार से सरकार द्वारा उल्लिखित लैंगिक प्रतिबद्धताओं को बजट प्रतिबद्धताओं में रूपांतरित करना है।
- इसमें महिलाओें के सशक्तिकरण हेतु विशेष पहलें और उनके लिए आवंटित संसाधनों के उपयोग तथा सरकार द्वारा महिलाओं के लिए बनाई गई नीतियों एवं सार्वजनिक व्यय के प्रभावों की जाँच सम्मिलित होते हैं।
- जेंडर बजट के माध्यम से सरकार द्वारा महिलाओं के विकास, कल्याण और सशक्तीकरण से सबंधित योजनाओं और कार्यक्रमों के लिए प्रतिवर्ष बजट में एक निर्धारित राशि की व्यवस्था की सुनिश्चित करने के प्रावधान किए जाते हैं।
6. ई-बजटिंग :-
- ई-बजटिंग से आशय इलेक्ट्रॉनिक अथवा उद्यम-व्यापी बजट से है।
- यह इंटरनेट की सहायता से लाभ प्रदान करता है।
- इसका लक्ष्य विभिन्न प्रतिष्ठानों द्वारा एक ऐसी उद्यम-व्यापी बजट प्रणाली निष्पादित करना है जो सरल एवं सुगम हो।
बजट पर नियंत्रण (Budgetary Control)
- संसद सभी बजट व्यवहारों पर नियंत्रण रखती है।
- संसद की स्वीकृति से समेकित निधि से रूपया निकाला जा सकता है इस संबंध में पार्लियामेंट को वोटिंग का अधिकार है।
- संसद प्रशासनिक व्यय एवं योजना व्यय को पूरा करने के व्यय राशि का अनुमोदन करती है।
- बजट प्रस्तावों पर संसद में बहस होती है पर इन सबके बावजूद संसद व्ययों का गहराई से अध्ययन एवं परीक्षण नहीं कर सकती है। इसलिए अनु. 118 के तहत लोकसभा कुछ वित्तीय समितियों का गठन करती है। कुछ प्रमुख समितियां इस प्रकार है-
1. आकलन समिति :–
- लोक सभा के नियम 310 के तहत् नियुक्त 30 सदस्य समिति जिसकी नियुक्ति लोकसभा करती है।
- इसकी रिपोर्ट पर सदन में बहस नहीं होती है।
आकलन समिति के कार्य:-
- मितव्ययिता, संगठन में सुधार, कुशलता, प्रशासनिक सुधार लाने के लिए समय-समय पर राय देना।
- प्रशासनिक कुशलता तथा मितव्ययता लाने के लिए वैकल्पिक नीति का सुझाव देना।
- परीक्षण करना कि अनुमान में निहित नीति सीमा के भीतर रकम खर्च हुयी है।
- संसद में पेश अनुमान का प्रारूप क्या हो।
- पूरे वित्तीय वर्ष के दौरान समय-समय पर अनुमानों का परीक्षण करती है। परीक्षण की प्रगति के संबंध में सदन को सूचित करती है।
2. विभागीय स्टैंडिंग समिति :–
- बजट प्रस्तावों तथा बिलों का गहराई से अध्ययन करना एवं सरकारी नीतियों तथा कार्यक्रमों के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही।
विभागीय स्टैंडिंग समिति के कार्य:-
- विभिन्न मंत्रालयों/विभागों की अनुदान माँगों पर विचार करना।
- विभागाध्यक्ष द्वारा संदर्भित बिलों के संबंध में विचार करना।
- विभागों की वार्षिक रिपोर्ट पर विचार करना।
- राष्ट्रीय आधारभूत दीर्घकालीन नीति प्रपत्रों पर विचार करना।
3. लोक लेखा समिति:-
- लोक लेखा समिति भारत सरकार के खर्चों की लेखा परीक्षा करने वाली समिति है।
- इसका गठन भारत शासन अधिनियम,1919 के अंतर्गत पहली बार 1921 में हुआ।
- यह सभी पक्षों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है। क्योंकि इसके सदस्यों का चुनाव एकल हस्तांतरणीय मत प्रणालियों द्वारा किया जाता है तथा इसका अध्यक्ष विपक्षी पार्टी का सदस्य होता है।
- वर्तमान में लोक-लेखा समिति में सदस्यों की संख्या 22(15 लोक सभा + 7 राज्य सभा) है। तथा इसका कार्यकाल 1 वर्ष का होता है।
लोक लेखा समिति के कार्य:-
- समिति के कार्यों के अंतर्गत CAG के वार्षिक प्रतिवेदनों की जाँच प्रमुख है, जो राष्ट्रपति द्वारा संसद में प्रस्तुत किया जाता है।
- जिन क्षेत्रों तथा कार्यों के लिए सरकार द्वारा धन आवंटित किया गया है, व्यय भी उन्हीं क्षेत्रों में किया जा रहा है अथवा नहीं।
- विभिन्न स्वायत्त, अर्द्ध-स्वायत्त संस्थानों के लिए स्वीकृत राशि तथा उसकी तुलना में कम या अधिक व्यय का निर्धारण।
- किसी वित्तीय वर्ष में किसी भी सेवा के मद में खर्च राशि की जाँच करना यदि वह राशि उस मद में खर्च करने के लिए स्वीकृत राशि से अधिक है।
4. सार्वजनिक उद्यम समिति :–
- सार्वजनिक उद्यमों के माध्यम से समेकित निधि से बहुत अधिक मात्रा में व्यय किए जाते हैं इस पर नियंत्रण हेतु सार्वजनिक उद्यम समिति का गठन किया गया।
सार्वजनिक उद्यम समिति के कार्य
- समिति सार्वजनिक उद्यमों के लेखों तथा CAG प्रतिवेदनों का पुनर्निरीक्षण करती है।
- विभिन्न उद्यमों के मितव्ययिता संगठन, प्रबंध तथा उत्पादन में सुधार तथा सुमन्नतीकरण के संबंध में सुझाव देती है।
5. रेलवे कन्वेशन कमेटी :-
- संसद की सबसे पुरानी कमेटी है।
- रेलवे द्वारा घोषित किए जाने वाले लाभांश की दर जो जनरल रेवेन्यू में देय है, की समीक्षा करती है।
- रेलवे वित्त से संबंधित अन्य मसलों पर भी विचार करती है।
लेखा-अंकेक्षण (Auditing of Account)
- कंट्रोलर जनरल ऑफ एकाउन्ट्स (CGA) संघ सरकार के लेखों का उचित तथा वैज्ञानिक ढंग से संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप रख-रखाव सुनिश्चित करता है।
- संघ सरकार के मासिक व वार्षिक लेखों को समेकित (Consolidate) करता है।
- वार्षिक लेखों को तैयार करता है।
नियंत्रक व महालेखा परीक्षक(Controller and Auditor-General)
- केन्द्र तथा राज्यों की आय-व्यय के लेखों का परीक्षण करता है व्यय निश्चित उद्देश्य और नियमानुसार हुआ है या नहीं।
- भारत सरकार के खातों को रखने का उत्तरदायित्व इसी का होता है।
- केन्द्र व राज्य सरकार के प्राप्तियाँ और भुगतान की रिपोर्ट तैयार करता है और संबंधित सरकारों को प्रस्तुत करता है।
- प्रत्येक सरकार के लेखों के संबंध में एक सामान्य वित्तीय विवरण पत्र तैयार कर उसे राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।
बजटीय घाटे के प्रमुख प्रकार
- बजटीय घाटा :- सरकार की कुल सार्वजनिक व्यय एवं कुल सार्वजनिक प्राप्तियों का अंतर बजट घाटा कहलाता है।
- बजट घाटा = कुल सार्वजनिक व्यय - कुल सार्वजनिक प्राप्तियाँ
- राजकोषीय घाटा :- सार्वजनिक व्यय का वह भाग जो राजस्व प्राप्तियों तथा गैर ऋण पूँजी प्राप्तियों से पूरा न होने पर सार्वजनिक उधार देयता से पूरा किया जाए तो इसे राजकोषीय घाटा कहते हैं।
- राजस्व घाटा :- राजस्व प्राप्ति पर राजस्व व्यय का आधिक्य को राजस्व घाटा कहा जाता है।
- प्राथमिक घाटा :- चालू वर्ष के बजट व्यवहार के कारण होने वाले घाटे को प्राथमिक घाटा कहते हैं। इसे राजकोषीय घाटे में से ब्याज अदायगिया निकालकर ज्ञात किया जा सकता है।
- प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा – ब्याज अदायगिया
बजट शब्दावली
- वित्त विधेयक :- नए करों को लागू करने, पुराने करों में घटते-बढ़ते या उन्हें यथावत् रखने के बारे में सरकारी प्रस्ताव वित्त विधेयक कहलाता है। संविधान के अनुच्छेद 110 के अनुसार वित्त विधेयक एक धन विधेयक है।
- समेकित कोष/संचित निधि :- कर तथा ऋण आदि के द्वारा सरकार जो धन प्राप्त करती है वह समेकित कोष कहलाता है। सरकार अपना संपूर्ण व्यय भी इसी कोष में करती है। संसद की स्वीकृति के बिना इस निधि में से कोई भी रकम नहीं निकाली जा सकती है।
- आकस्मिक कोष :- अप्रत्याशित और आकस्मिक खर्च के लिए संसद से सरकार यह आकस्मिक कोष स्वीकार कराती है, जिस पर प्रतिवर्ष संसद की अलग स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती। रकम की निकासी के बाद में संसद की स्वीकृति प्राप्त कर ली जाती है और खर्च की गई धनराशि निधि में वापस जमा कर दी जाती है। इस पर राष्ट्रपति का नियंत्रण होता है।
- राजस्व बजट :- इसमें कर तथा शुल्क आदि से प्राप्त होने वाले सरकारी आय शामिल होती है। दूसरी तरफ इसके संग्रह पर किए जाने वाला व्यय भी राजस्व बजट में शामिल होता है।
- पूँजीगत बजट :- इसमें सरकार द्वारा प्राप्त किया गया ऋण, उस पर किया गया खर्च तथा सरकारी परिसम्पतियों से होने वाली आय व व्यय शामिल होते हैं।
- जनलेखा :- करों से प्राप्त आमदनी के अतिरिक्त कुछ ऐसी धनराशि भी होती है जिसकी सरकार मालिक नहीं, केवल ट्रस्टी होती है और वह निर्धारित समय पर नियमानुसार ब्याज के साथ लौटा देती है। चूंकि यह धन सरकार के संबंधित पक्षों को लौटाना पड़ता है, इसलिए इस पर भी संसद की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती है।
- विनियोग विधेयक :- संसद द्वारा स्वीकृत बजट में से आवश्यक धनराशि निकालने के लिए जो विधेयक पेश किया जाता है, उसे विनियोग विधेयक कहते हैं।
- अनुदान माँग :- बजट में अलग-अलग विभागों की अपने विकास और कार्य संचालन पर व्यय किए जाने वाले माँग को अनुदान माँग कहते हैं। बजट पर बहस के दौरान यह माँग प्राय: संबंधित विभाग के मंत्री द्वारा ही प्रस्तुत की जाती है और वही बहस का जवाब भी देते हैं।
- कटौती प्रस्ताव :- संसद सदस्यों द्वारा बजट में दिखलाए गए खर्च को कम करने के लिए जो प्रस्ताव पेश किए जाते हैं, उन्हें कटौती प्रस्ताव कहते हैं। इन प्रस्तावों का असली उद्देश्य बजट के उस भाग पर विस्तार से बहस करना होता है। यदि कोई कटौती प्रस्ताव सरकार की इच्छा के विपरीत पारित हो जाए तो उसका सरकार के विरुद्ध अविश्वास माना जाता है।
- लेखानुदान :- पिछला बजट 31 मार्च को समाप्त हो जाता है इसके बाद उसे नहीं बढ़ाया जा सकता। इसलिए संसद अस्थायी रूप से सरकार को व्यय के लिए अग्रिम धनराशि देती है जिसे लेखानुदान कहते हैं।
- पूरक बजट :- यदि कभी बजट में स्वीकृत धनराशि 31 मार्च से पहले ही समाप्त हो जाती है, तो उस स्थिति में सरकार संसद के सम्मुख पूरक बजट प्रस्तुत करती है, जिसमें शेष समय के लिए अतिरिक्त धन की माँग की जाती है।
- वित्तीय घाटा :- वित्तीय घाटा खजाने की सबसे सच्ची तस्वीर है। इसमें बजट घाटे के साथ-साथ सरकार की शुद्ध उधारी को भी जोड़कर देखा जाता है।
संघीय बजट 2020-21 की प्रमुख विशेषताएँ
- केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी, 2020 को केंद्रीय बजट (वर्ष 2020-21) संसद में पेश किया।
- व्यय:-केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2020-21 में 30.42 लाख करोड़ रुपए खर्च करने का प्रस्ताव किया है, जो कि वित्त वर्ष 2019-20 के संशोधित अनुमान से 12.7 प्रतिशत अधिक है।
- प्राप्ति:- वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिये केंद्र सरकार ने 22.46 लाख करोड़ रुपए की प्राप्ति अनुमानित की, जो कि वित्तीय वर्ष 2019-20 से 16.3 प्रतिशत अधिक है।
- GDP वृद्धि: केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2020.21 में नॉमिनल GDP में 10 प्रतिशत की वृद्धि दर अनुमानित है।
- घाटा:- आगामी वित्त वर्ष के लिये राजस्व घाटा कुल GDP का 2.7 प्रतिशत निर्धारित किया गया है, जो कि जो वित्त वर्ष 2019-20 में 2.4 प्रतिशत के संशोधित अनुमान से अधिक है। राजकोषीय घाटा कुल GDP का 3.5 प्रतिशत निर्धारित किया गया है, जो कि वित्त वर्ष 2019-20 में 3.8 प्रतिशत के संशोधित अनुमान से कम है।
नोट:- वित्तीय वर्ष 2017-18 से बजट प्रस्तुत करने की तिथि में बदलाव करके 1 फरवरी कर दिया गया, इससे पूर्व 28 फरवरी या 29 फरवरी को बजट प्रस्तुत किया जाता था।