चौहानों को सूर्यवंशी बताने वाले स्त्रोत
- नयन चन्द्रसूरी – “हम्मीर महाकाव्य”
- जोधराज – “हम्मीर रासो”
- नरपति नाल्ह – “बीसल देव रासो”
- जयानक – “पृथ्वीराज विजय”
- G.H औझा – “राजपूताने का प्राचीन इतिहास”
- चौहानों को चन्द्रवंशी बताने वाले स्त्रोत
- आबू का अचलेश्वर शिलालेख (1285)
- हांसी अभिलेख
- चौहानों को इन्द्रवंशी बताने वाले स्त्रोत
- राज्यपाल का सेवाड़ी अभिलेख (पाली जिले की बाली तहसील में)
- बिजोलिया शिलालेख व जान कवि – “कायम खाँ रासो” में चौहानो को ब्राह्मण कहा गया। बिजोलिया शिलालेख में चौहानों को ”वत्स गौत्रीय ब्राह्मणों की सन्तान” कहा गया।
- चौहानों का मूल स्थान से सम्बन्धित मत
- गोपीनाथ शर्मा – गुर्जरत्रा क्षेत्र
- डॉ.दशरथ शर्मा – चित्तौड़गढ़
- हम्मीर महाकाव्य
- पृथ्वीराज विजय पुष्कर
- सुर्जन चरित्र
- आसोपा ने पिछोला झील के चाहू ओर निवास के कारण चौहानों को चाहमान कहा।
- ‘पृथ्वीराज विजय’ में चौहानों का प्रथम शासक/संस्थापक चाहमान कहा है। जिसकी व्याख्या- क्रमश – चाप,हरि,मान व नीति में पारंगत होने वाले व्यक्ति के रूप में की गयी है।
- सपादलक्ष - सवालख गाँवों का समूह।
- शाकम्बरी (सांभर) रियासत – चौहानों की प्रारम्भिक रियासत।
वासुदेव चौहान (551ई.)
- चौहान वंश का संस्थापक/प्रथम शासक
- डॉ. दशरथ शर्मा ने बिजोलिया शिलालेख के आधार पर तथा राजशेखर के “प्रबन्ध कोष” के आधार पर वासुदेव चौहान को प्रथम शासक बताया है।
- इसने “साँभर कस्बा” बसाया व इसे राजधानी बनाया।
- “साँभर झील” का निर्माण करवाया।
- वासुदेव चौहान के बाद लगभग 400 वर्षों तक कम महत्वपूर्ण शासक रहे तथा ये प्रतिहारों के सामन्त थे, कुछ शासक निम्नलिखित है।
- सामन्त राज, नरदेव, जयदेव, विग्रहराज-I, चन्द्रराज, गोपेन्द्रराज।
- दुर्लभराज I - यह प्रतिहार नरेश वत्सराज का सामन्त था। इसके समय शाकम्भरी रियासत पर मुस्लिम आक्रमण हुआ (प्रथम बार)।
- गूवक I (गोविन्दराज I) – प्रतिहार नरेश नागभट्ट II ने इसे वीर राजा की उपाधि दी। हर्षनाथ मन्दिर का निर्माण शुरू करवाया। “सुल्तान वेग वारिस” को पराजित किया।
- चन्द्रराज II गूवक II (गोविन्द राज II) – अपनी बहन कमलावती का विवाह मिहिर भोज से किया।
- चन्द्रराज – इसकी रानी आत्मप्रभा/रूद्राणी ने कालसर्प दोष से मुक्ति पाने हेतु पुष्कर झील किनारे 1000 शिवलिंग स्थापित करवाए व 1000 दीपक जलाए। दिल्ली के तोमर शासक को पराजित किया।
- वाक्पतिराज – 188 युद्धों का विजेता माना जाता है। प्रतिहारो को पराजित किया। “महाराजा” की उपाधि धारण करने वाला प्रथम चौहान शासक।
- सिंहराज – प्रतिहारो से स्वयं को मुक्त किया। प्रथम स्वतंत्र चौहान शासक जिसने ‘हर्षनाथ मन्दिर’ का निर्माण पूर्ण करवाया। “महाराजाधिराज” की उपाधि धारण करने वाला प्रथम चौहान शासक।
- विग्रहराज II (956 राज्यारोहण तिथि) – प्रथम प्रतापी शासक, उपाधि- “परम भट्टारक महाराधिराज परमेश्वर” यह उपाधि धारण करने वाला प्रथम चौहान शासक, इसी के समय हर्षनाथ लेख (983 ई.) की रचना की गयी जिसमें वासुदेव से सिंहराज तक के शासकों की सूची मिलती है। इसने अन्हिल वाड़ा के चालुक्य शासक मूलराज I को पराजित किया। भड़ौच (भृगुकच्छ) व साँभर में आशापुरा देवी का मन्दिर बनवाया।
- दुर्लभराज II - इसे “दुर्लध्यमेरू” कहा गया है।
- गोविन्दराज III – पृथ्वीराज विजय में इसे “वेरीघट्ट” व ‘शत्रुसंहारक’ कहा गया है तथा फरिश्ता ने “तारीखे फरिश्ता” में इसे गजनी के शासक को मारवाड़ में रोकने वाला कहा गया है।
- वाक्पतिराज II – इसके पुत्र लक्ष्मण ने नाडोल(पाली जिले की देसूरी तहसील में) में चौहान शाखा को प्रारम्भ किया।
- वीर्यराम – 1024ई. में इसी के समय महमूद गजनवी ने साँभर पर आक्रमण किया।
- चामुण्ड राय – इसने पुन: साँभर पर अधिकार किया।
- दुर्लभराज III – सुल्तान इब्राहिम से युद्ध में वीरगति प्राप्त हुआ। मलेच्छों को मातंग भी कहा गया है।
- विग्रहराज III – यह एक दुराचारी शासक था। इसने महासत्या नामक ब्राह्मणी का अपहरण किया था।
- पृथ्वीराज I – “प्रबन्ध कोष” में इसे तुर्क सेना का विजेता कहा गया है। 1105 ई. में जीणमाता अभिलेख से इसकी जानकारी मिलती है। उपाधि – “परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर” पुत्र – अजयराज चौहान
अजयराज चौहान – (1113-33 ई.)
- इसका काल “चौहानों के साम्राज्य का निर्माण काल” माना जाता है। चक्रवर्ती शासक होने के कारण इसे “अजयचक्री” कहा गया। अजमेर नगर (1113 ई.) बसाया व इसे राजधानी बनाया। बीठली पहाड़ी पर गढ़बीठली/तारागढ़/
- अजयमेरू दुर्ग बनवाया। मेवाड़ के कुँवर पृथ्वीराज ने अपनी पत्नी तारा के नाम पर इसका नाम तारागढ़ रखा था। सर्वाधिक आन्तरिक आक्रमण इसी दुर्ग पर हुए। अजयराज ने अजसप्रीय/द्रुम्स नामक सिक्के चलाए इन सिक्कों पर अपनी रानी सोमल्लदेवी/सोमलेखा का नाम उत्कीर्ण करवाया। अजयराज ने मालवा के शासक नरवरर्मन (परमार वंश) को तथा अन्हिल वाड़ा (गुजरात) के चालुक्य शासक मूलराज II को पराजित किया व इसके सेनापति सुल्हण को बन्दी बनाया व (घोडे़ पर बाँधकर) अजमेर लेकर आया। इसने चौहान राज्य का विस्तार भटिण्डा और दिल्ली तक किया। मथुरा से इसकी रजत मुद्राएँ मिली है जो मथुरा पर इसके अधिकार को पुष्ट करती हैं। इसने पुत्र अर्णोराज को सिंहासन सौंपकर पुष्कर में अपना अन्तिम समय व्यतीत किया।
अर्णोराज (1133-50 ई.) दरबारी विद्वान –
- (i) धर्मघोष सूरी (ii) देवबोध सूरी
- अन्य नाम – आनाजी, गजनी (अफगानिस्तान) के खुशरव मलिक को हराकर “गर्जनों मातँग” की उपाधि धारण की। चन्द्रानदी को रोककर नागपहाड़ व तारागढ़ के मध्य “आनासागर झील”का निर्माण करवाया। बिजोलिया शिलालेख के अनुसार निर्माण का उद्देश्य “तुर्कों के खून से सनी धरती को धोना” बताया गया है। अनासागार झील के निर्माण सम्बन्धी तिथियाँ
- बिजोलिया शिलालेख (1133-37ई. के मध्य)
- पृथ्वीराज रासो (1135-37 ई. के मध्य)
- जहाँगीर ने इस झील के किनारे दौलत बाग बनवाया जो वर्तमान में सुभाष उद्यान कहलाता है। शाहजहाँ ने इस उद्यान में बारदरियों (संगमरमर से बने 5 दरवाजे/द्वार) का निर्माण करवाया। इसी उद्यान में नूरजहाँ की माता अस्मत बेगम ने गुलाब से “इत्र बनाने की विधि” का अविष्कार किया था।
- अर्णोराज ने पुष्कर में “वराह मन्दिर” बनवाया इसकी वराह मूर्ति को जहाँगीर ने झील में फिंकवा दिया था।
अर्णोराज के युद्ध/विजेय –
- मालव नरेश नरवर्मा को पराजित किया।
- गुजरात के चालुक्य शासक जयसिंह सिद्धराज को 1134 ई. में पराजित किया व उसकी पुत्री कांचन देवी से विवाह किया।
- गुजरात के चालुक्य शासक कुमारपाल से 1145 ई. में पराजित हुआ व अपनी पुत्री जल्हण का विवाह कुमारपाल से किया। पाली, जालौर, नाडोल चालुक्यों को दिए।
- अर्णोराज की हत्या इसी के पुत्र जग्गदेव ने की व 1150-52 तक शासन किया। जग्गदेव को चौहानों में पितृहन्ता शासक माना जाता है।
- कुम्भाकालीन रणकपुर लेख में बूंदी का नाम वृन्दावती मिलता है।
- बूंदा मीणा के नाम पर बूंदी का नामकरण हुआ।
देवीसिंह/देवा हाड़ा-
- बम्बावड़े के सामंत चौहान वंशीय देवा हाड़ा ने मीणाओं का परास्त कर 1241 ई.में बूंदी राज्य की स्थापन की
- देवी सिंह ने अमरनाथ में गंगेश्वरी माता का मंदिर बनवाया तथा अमर धूण नामक स्थान पर बावड़ी बनवायी।
- 1243 ई. में इसने अपने पुत्र समरसिंह को हाड़ौती का शासक बना दिया।
- समर सिंह- समरसिंह ने कोटिया भील को हराकर कोटा पर अधिकार कर लिया।
- सुर्जन हाड़ा – इसने मेवाड़ से संबंध विच्छेद कर अपनी स्वतंत्र सत्ता की स्थापना की एवं रणथम्भौर दुर्ग पर अधिकार किया।
- अकबर द्वारा रणथम्भौर आक्रमण करने पर सुर्जन हाड़ा ने मुगल अधीनता स्वीकार कर ली।
- अकबर ने इसे ‘रावराजा’की उपाधि एवं पाँच हजार का मनसब दिया।
- इसने द्वारिका में रणछोड़ जी मंदिर का निर्माण करवाया।
- राव रतन सिंह- जहांगीर ने इसे पाँच हजार का मनसब दिया। जहांगीर ने इसे न्यायप्रियता के लिए ‘रामराज’ एवं चित्रकला प्रेमी होने के कारण ‘सरबुलन्द राय’ की उपाधि दी।
- राव शत्रुशाल- मुगल शासक शाहजहां ने इसे ‘राव’ की उपाधि, तीन हजार जात व दो हजार सवार का मनसब दिया।
- मुगल उत्तराधिकार युद्ध में दाराशिकोह की ओर से युद्ध करते ‘सामुगढ़ का युद्ध’(1658 ई.) में वीर गति को प्राप्त हुआ।
- राव अनिरुद्ध – शत्रुशाल की स्मृति में 1683 ई. में बूंदी में ’84 खम्भो की छतरी’ का निर्माण करवाया।
- अनिरुद्ध की पत्नी रानी नाथावती ने ‘रानी जी की बावड़ी’ का निर्माण करवाया।
- राव जोधसिंह- राव जोधसिंह 1706 ई. में बूंदी के जैतसागर तालाब में गणगौर की प्रतिमा एवं अपनी रानी के साथ नाव की सवारी करते समय डूब गया।
- तभी से यह ‘हाड़ों ले डूब्यो गणगौर’ विख्यात हो गया।
- राव राजा बुद्ध सिंह- औरगंजेब की मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी युद्ध में इसने बहादुरशाह का साथ दिया।
- बहादुरशाह ने इसे ‘महाराव राणा’ की उपाधि दी।
- बुद्धसिंह के शासनकाल में मुगल बादशाह फर्रुखसियर ने बून्दी का नाम बदलकर ‘फर्रुखाबाद’ कर दिया था।
- इसके समय सर्वप्रथम राजस्थान में मराठों का प्रवेश हुआ।
- जयपुर नरेश सवाई जयसिंह से झगड़ा होने पर जयसिंह ने बुद्धसिंह को हटाकर दलेलसिंह को बूंदी की गद्दी पर बैठा दिया।
- यह 1734 ई. में मराठों के राजस्थान प्रवेश का कारण बना।
- बुद्ध सिंह कि पत्नी ने होल्कर को राखी भेजकर बून्दी आमंत्रित किया।
- उम्मेद सिंह- यह मल्हारराव होल्कर की सहायता से शासक बना था।
- यह ‘श्रीजी’ के नाम से जाना जाता था।
- उम्मेदसिंह ने बूंदी के तारागढ़ किले में चित्रशाला का निर्माण करवाया।
- इसने अपने जीवनकाल में स्वयं की सोने की मूर्ति बनाकर उसका अंतिम संस्कार करवाया।
- बूंदी के शासक विष्णुसिंह हाड़ा ने 10 फरवरी 1818 को अंग्रेजो से संधि कर अधीनता स्वीकार की।
रामसिंह –
- 1857 की क्रांति के समय बूंदी का शासक
- 1857 की क्रांति में इसने अंग्रेजो का साथ नही दिया।
- इसने कन्या वध व डाकन प्रथा पर प्रतिबंध लगाया।
- सुर्यमल्ल मिश्रण इनके ही दरबार में था जिसने ‘वंश भास्कर’ की रचना की।
- बूंदी का अंतिम शासक बहादुर सिंह हाड़ा था।
पृथ्वीराज चौहान तृतीय – (1177-92)
- जन्म – अन्हिलपाटन (गुजरात,1166 ई, 1223 वि.स)
- माता – कर्पूरी देवी, पिता – सोमेश्वर चौहान
- 11 वर्ष की आयु में राज्यारोहण, संरक्षिका – कर्पूरी देवी
प्रधानमंत्री – कैमास (कदम्बवास) मूलत: दक्षिणी पूर्वी पंजाब के निवासी व सामन्त थे। ये दहिया राजपूत सरदार थे।
सेनापति – भुवन मल्ल (कर्पूरी देवी के सम्बन्धी चाचा)
पृथ्वीराज चौहान तृतीय की उपाधियाँ-
(i) दल पूँगल (विश्व विजेता)
(ii) रायपिथौरा (युद्ध में पीठ न दिखाने वाला)
- चालुक्य भीम द्वितीय पर 1178 में गौरी के आक्रमण के समय चालुक्यों को सहयता न देन की सलाह पृथ्वीराज तृतीय को कदम्बवास ने दी थी।
- स्वतंत्र रूप से निर्णय लेना 1178 से आरम्भ किया परन्तु इसमें बाधा बनने पर कदम्बवास के स्थान पर प्रतापिसंह को प्रधानमंत्री नियुक्त किया। पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने कदम्बवास की हत्या करवायी। पृथ्वीराज के अनुसार प्रतापिसंह ने कदम्बवास की हत्या की। गोपीनाथ शर्मा ने भी इसकी संभावना बतायी है।
- 1178 में “गुड़गाँवा युद्ध” में चाचा नागार्जुन के विद्रोह का दमन किया।
- 1182 में उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के “भण्डानिको का दमन”किया। ये मूलत: सतलज क्षेत्र में बढ़ रहा था। इसकी जानकारी “खतरगच्छ पट्टावली” से प्राप्त होती है।
- विग्रहराज IV ने भी भण्डाणिको को पराजित किया था पर पूर्ण दमन नही कर सका था। भण्डाणिक राज्य की सीमा महोबा से लगी थी।
- 1182 के “तुमुल के युद्ध” में महोवा राज्य (U.P) के चन्देल शासक परमर्दीदेव को पराजित किया। इस युद्ध में महोबा के 2 सेनापति आल्हा व ऊदल वीरगति को प्राप्त हुए।
महोबा से संघर्ष के प्रमुख कारण-
- भण्डाणिको के दमन के बाद लौटते समय घायल चौहान राज्य के सैनिको की हत्या परमर्दीदेव ने करवाई थी।
- भण्डाणिको के दमन के बाद महोबा राज्य से चौहान राज्य की सीधी सीमा लगने लगी अत: सीमा विवाद बढ़ा।
- पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने महोबा राज्य से संघर्ष के समय सर्वप्रथम नरायन पर अधिकार किया था।
- आल्हा-ऊदल से पूर्व परमर्दीदेव ने “मलखान” को चौहानो की प्रगति रोकन हेतु भेजा था। असफल रहा।
अजमेर-कन्नौज संघर्ष के कारण-
(1) पृथ्वीराज के अनुसार –
- संयोगिता विवाद अन्य नाम “पृथ्वीराज विजय में” तिलोत्तमा संजुक्ता “सुर्जन चरित में कांतिमती नाम मिलता हैं।
- G.H ओझा + डॉ. त्रिपाठी ने इस विवाद को काल्पनिक माना।
- G.H ओझा के अनुसार जयचन्द्र गहड़वाल द्वारा लिखित “रम्भा मंजरी” तथा उसके शिलालेखों में इस घटना का उल्लेख नही मिलता है। अत: अविश्वसनीय है।
- डॉ. त्रिपाठी ने स्वयंवर प्रथा, राजसूय यज्ञ प्रथा तब तक बन्द हो जाने का तर्क दिया जिसका खण्डन गोपीनाथ शर्मा ने किया।
- पृथ्वीराज रासो के मत का समर्थन गोपीनाथ शर्मा ने किया व डॉ. दशरथ शर्मा + अबुल फज़ल ने किया है।
(2) महोबा राज्य पर चौहानो का अधिकार होने के बाद चौहान व कन्नौज राज्यों की सीमा लगने लगी (हसन निजामी के अनुसार)अत: सीमा विवाद भी कारण बना।
(3) पूर्व में भी विग्रहराज चतुर्थ ने कन्नौज के विजयचन्द्र को पराजित किया था अत: शत्रुता पहले से ही थी।
चौहान-चालुक्य संघर्ष का कारण
- पृथ्वीराज रासो के अनुसार आबू के परमार शासक जैतसिंह की पुत्री इच्छिनी देवी से विवाह को लेकर। तथा भीम द्वितीय (चालुक्य) द्वारा पूर्व में सोमेश्वर चौहान की हत्या करना।
- पृथ्वीराज तृतीय के चाचा कान्हड़देव ने भीम द्वितीय के चचेरे भाई की हत्या की थी, तो भीम द्वितीय ने सोमेश्वर की हत्या कर दी व नागौर पर अधिकार कर लिया था। अत: बदला लेने हेतु पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने भीम द्वितीय से युद्ध कर उसे पराजित किया।
- गोपीनाथ शर्मा के अनुसार सीमाएँ लगने के कारण साम्राज्य विस्तार का प्रयास दोनों ओर से था अत: महतवकांक्षाओं का टकराव भी एक कारण बना।
- नागौर युद्ध के बाद हुई सन्धि मे नागौर, पाली, जालौर व सिरोही पर पृथ्वीराज तृतीय का अधिकार हो गया था।
- दोनो के बीच 1184 में नागौर का युद्ध हुआ इसमें भीम द्वितीय के प्रधानमंत्री जगदेव प्रतिहार ने चालुक्य सेना का नेतृत्व किया।
मो. गौरी-चौहान संघर्ष –
- विभिन्न स्त्रोतों मे पृथ्वीराज तृतीय व मोहम्मद गौरी के बीच संघर्ष की संख्या अलग-अलग बतायी गयी है-
- पृथ्वीराज रासो – 21 बार
- सुर्जन चरित्र – 21 बार
- प्रबन्ध कोष - 20 बार
- प्रबन्ध चिन्तामणी - 23 बार
- हम्मीर महाकाव्य – 7 बार
- फारसी तवारीख – 2 बार
- तबाकतें नासीरी (मिन्हाज सिराज)
- ताज-उल-मआसिर (हसन निजामी)
मो. गौरी
- मूलत : मध्य एशिया के गौर क्षेत्र का निवासी।
- गौर व गजनी के शासक गयासुद्दीन गौरी का छोटा भाई।
- मूल नाम – सिहाबुद्दीन गौरी, गजनी का गवर्नर
- भाई की आज्ञा से भारत पर आक्रमण
- 1175 मे मुल्तान जीता, 1178 में आबू युद्ध में भीम द्वितीय से पराजित, 1181 में सियालकोट पर अधिकार (पंजाब,पाक), 1186 में लाहौर पर अधिकार(मलिक खुसरू को हराकर), 1191 मे तबर हिन्द/सरहिन्द (पंजाब) पर अधिकार।
तराईन का प्रथम युद्ध- (1191)
- हरियाणा के करनाल जिले में है। सेनापति – खाण्डेराव
- इसमें पृथ्वीराज तृतीय की ओर से दिल्ली के “गोविन्दराय” ने भी भाग लिया व गौरी को घायल किया।
- घायल गौरी को अफगान सैनिक द्वारा युद्ध भूमि से बाहर ले जाया गया। मो. गौरी का पीछा नही किया गया, वह गजनी चला गया वही पुन: युद्ध की तैयारी की।
- पृथ्वीराज तृतीय ने काजी जियाउद्दीन से सरहिन्द छीन लिया व उसे बन्दी बनाकर अजमेर ले आया।
तराईन का द्वितीय युद्ध (1192)
- हसन निजामी के अनुसार लाहौर से ही गौरी ने चौहान को पत्र लिखा, जिसकी शर्तो को पृथ्वीराज ने अस्वीकार कर दिया। पत्र लेकर जाने वाला गौरी का दूत किवाम उल मुतक था।
- गौरी ने चौहान को सन्धि का छलावा दिया अत: असावधान चौहान सेना पर आक्रमण कर उसे पराजित किया। गौरी की विजय
- खाण्डेराव मारा गया। डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने तराईन द्वितीय युद्ध को एक युग परिवर्तनकारी घटना माना है।
- विन्सेंट स्मिथ – “तराईन द्वितीय युद्ध के बाद चौहान साम्राज्य समाप्त व बौद्ध धर्म के विनाश का समय प्रारम्भ हो गया”।
चौहान की पराजय क्यों हुई-
- चन्देल + गहड़वाल गठबन्धन
- मुख्य सेना का अनुपस्थित होना, अव्यवस्थित सेना।
- तराईन प्रथम युद्ध मे गौरी का पीछा न करना
- राजकार्य में ध्यान न देकर विलासिता पूर्वक जीवन जीना।
- पड़ौसी राज्यों से मैत्री सम्बन्ध न होने से समय पर सहायता न मिलतना।
- अश्वपति, प्रतापसिंह जैसे सामन्तो द्वारा विश्वासघात करना।
तराईन द्वितीय युद्ध के बाद चौहन की मृत्यु से सम्बन्धित मत-
- “पृथ्वीराज रासो”- पृथ्वीराज तृतीय को गजनी ले जाया गया वही मृत्यु।
- “पृथ्वीराज प्रबन्ध” – चौहान को बन्दी बनाकर अजमेर लाया गया, बाद में उसे खड्डा खोदकर गाड़ दिया गया।
- “हम्मीर महाकाव्य”- चौहान को कैद करके बाद में उसकी हत्या की गयी।
- “विरूद्ध विधि विध्वंस”- युद्ध में ही वीरगति
- हसन निजामी – “ताज उल मआसिर” बन्दी बनाकर अधीनता मनवाकर पुन: अजमेर का शासक बनाया बाद में विद्रोह करने पर मृत्युदण्ड दिया गया।
- मिन्हाज सिराज – “तबकाते नासीरी”- तराईन, द्वितीय युद्ध के बाद सिरसा (हरियाणा) स्थान पर उसकी हत्या कर दी गयी।
- अबुल फजल – गौरी उसे गजनी ले गया जहाँ उसकी मुत्यु हुई।
- गोपीनाथ शर्मा ने भी चौहान को बन्दी बनाने व बाद में उसकी हत्या करने के मत का समर्थन किया है। प्रमाण स्वरूप अजमेर के तत्कालीन सिक्कों पर लिखा है कि:-
- चौहान व मोहम्मद साम, का उल्लेख होने को माना जाता है।
- कलमा व लक्ष्मी का चित्र
- अव्यक्त मेव मोहम्मद अवतार लिखा है।
दरबारी साहित्यकार-
- चन्द्रबरदायी (पृथ्वीभट्ट)
- जयानक (कश्मीरी लेखक) इसकी रचना में तराईन युद्धों का उल्लेख नही है (पृथ्वी विजय)
- वागीश्वर
- जनार्दन
- विश्वरूप
- विद्यापति गौड़
- पृथ्वीराज चौहान चतुर्थ ने अजमेर में कला साहित्य विभाग की स्थापना की थी जिसका अध्यक्ष पद्मनाभ था।
- इसने दिल्ली के लालकोट में राय पिथौरागढ़ का निर्माण करवाया।
- पृथ्वीराज अजमेर के चौहान वंश का अन्तिम प्रतापी व सबसे प्रतापी शासक था।
- पृथ्वीराज तृतीय की छतरी/चबूतरा गजनी मे व स्मारक अजमेर के तारागढ़ दुर्ग में बना है।
- इसके बाद इसके भाई हरिराज को गौरी ने अजमेर का अधीनस्थ शासक बनाया परन्तु राजपूत सरदारो ने उसे टिकने नही दिया।
- पृथ्वीराज चौहान के पुत्र गोविन्दराज चौहान ने रणथम्भौर के चौहान वंश की स्थापना की।
- पृथ्वीराज चौहान तृतीय का प्रथम शिलालेख बड़ल्या/बेदला शिलालेख (उदयपुर) है तथा अन्तिम शिलालेख आवंल्दा शिलालेख है।
- डॉ. दशरथ शर्मा – “उसकी सैनिक भूलो के लिए उसे कभी क्षमा नही किया जा सकेगा लेकिन वह अपने गुणों के कारण रहस्यमयी शासक था।”
रणथम्भौर के चौहान वंश
- सवाई माधोपुर से 6 मील उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में।
- अमीर खुसरो के अनुसार दिल्ली से 2 सप्ताह की यात्रा पर।
- रण + स्तम्भ + पुर = रणथम्भौर
- रण व स्तम्भ नामक पहाड़ियाँ स्थित हैं।
- 8 वीं शताब्दी में रणथम्मन चौहान ने इसका निर्माण करवाया था।
प्रमुख शासक
गोविन्द राज/गोविन्द चन्द्र चौहान
- रणथम्भौर के चौहान वंश का संस्थापक
- यह पृथ्वीराज चौहान तृतीय का पुत्र था।
- इसने मोहम्मद गौरी की अधीनता स्वीकार की।
वल्लनदेव चौहान
- गोविन्दराज का पुत्र व उत्तराधिकारी
- प्रथम स्वतंत्र शासक
- इसने इल्तुतमिश को वार्षिक कर देना बन्द कर दिया।
- इल्तुतमिश ने रणथम्भौर पर आक्रमण कर अधिकार किया वल्लनदेव को वनों में शरण लेनी पड़ी
- प्रहलाद, वीरनारायण ने भी वनों में रहकर ही संघर्ष किया।
बागभट्ट-
- यह रणथम्भौर का प्रथम प्रतापी चौहान शासक था।
- रजिया सुल्तान ने इसके समय सफल आक्रमण किया परन्तु उसने किला खाली कर दिया क्योंकि इस पर अधिकार रखना अधिक खर्चिला कार्य था
- इसने पुन: रणथम्भौर पर अधिकार किया।
जय सिम्हा/जैत्रसिंह (1250-82) ई.
- इसके समय दिल्ली के सुल्तान नासीरूद्दीन महमूद (1246-66) ई. ने बलबन को रणथम्भौर अभियान पर भेजा।
- बलबन ने 2 बार रणथम्भौर अभियान किया उसने झाईन पर तो सफल सैन्य अभियान किया परन्तु रणथम्भौर पर अधिकार करने में असफल रहा।
- इसने अपने तीसरे पुत्र जो सर्वाधिक योग्य था उसे सिंहासन सौंपा। (गोपीनाथ शर्मा के अनुसार)
हम्मीर देव चौहान (1282-1301) ई.
- रणथम्भौर के चौहान वंश का सबसे प्रतापी शासक।
- दरबारी विद्वान = बीजादित्य
- दिग्विजय पर निकला, निम्नलिखित राज्यों को पराजित किया-
- भीमरस का राजा अर्जुन
- धार राज्य (भोज परमार)
- आबू, चित्तौड़, वर्धनपुर,पुष्कर,चम्पा
- दिग्विजय से लौटकर कोटियजन यज्ञ किया जिसका प्रमुख पण्डित विश्वरूप था।
- इसने कुल 17 युद्ध किए जिसमें 16 में विजयी हुआ।
- सुल्तान जलालुद्दी खिलजी ने 1291-92 ई. में रणथम्भौर पर असफल आक्रमण किया परन्तु झाईन पर अधिकार किया व इसे लूटा।
- झाईन को रणथम्भौर दुर्ग की कुंजी कहा जाता था।
- जलालुद्दीन ने 1192 ई. में रणथम्भौर का 8 माह तक घेरा डाला असफल रहने पर सेनापति मलिक अहमद चप को घेरा उठाने का आदेश दिया कारण पूछने पर जलालुद्दीन ने कहा कि-
- “ऐसे 10 किलों को भी मैं मुसलमान के एक बाल बराबर भी नहीं समझता”
- जलालुद्दीन के आक्रमण के समय हम्मीर का सेनापति “गुरूदास सैनी” वीरगति को प्राप्त हुआ।
अलाउद्दीन खिलजी के रणथम्भौर अभियान के कारण –
- चन्द्रशेखर- “हम्मीर हठ” के अनुसार अलाउद्दीन के भगोड़े सैनिक मोहम्मदशाह व केहब्रु को हम्मीर द्वारा शरण देना युद्ध का कारण बना। मोहम्मदशाह व अलाउद्दीन की मराठा बेगम चिमना बेगम के बीच प्रेम-प्रसंग बताया जाता है। इसे भी एक कारण बताया है।
- पद्मनाथ – “कान्हड़देव प्रबन्ध” के अनुसार 1299 ई. में अलाउद्दीन के गुजरात अभियान के समय मोहम्मदशाह व केहब्रु ने शाही सेना में विद्रोह किया व पराजित होकर हम्मीर के पास शरण ली। हम्मीद द्वारा इन्हें नहीं लौटाने पर युद्ध हुआ।
- अमीर खुसरो ने राजनीतिक महत्वकांक्षा को युद्ध का प्रमुख कारण माना (सर्वमान्य कारण)
- अलाउद्दीन खिलजी ने उलुग खाँ व नुसरत खाँ के नेतृत्व में शाही सेना रणथम्भौर भेजी (1299 ई.)
- प्रथम संघर्ष में हम्मीर की विजय हुई परन्तु उसका एक सेनापति भीमसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ तथा दूसरा धर्मसिंह लूट के माल को लेकर रणथम्भौर पहुँचने में सफल हुआ।
- इस समय हम्मीर मुनिव्रत/मौन व्रत में व्यस्त था।
- नाराज हम्मीर ने धर्मसिंह को अन्धा करवा दिया तथा उसके स्थान उसके भाई भोज को नियुक्त किया (स्त्रोत: हम्मीर महाकाव्य, डॉ. दशरथ शर्मा) धर्म सिंह प्रतिरोध लेना चाहता था, हम्मीर ने बाद में इसे धन वसूलने का दायित्व सौंपा तब धर्मसिंह ने अत्यधिक कर लगाए व कठोरता से इन्हें वसूल किया जिससे प्रजा में असन्तोष उत्पन्न हुआ।
- नुसरत खाँ मारा गया अत: शाही सेना में निराशा उत्पन्न हुई ऐसी स्थिति में अलाउद्दीन सेना सहित दिल्ली से रणथम्भौर पहुँचा।
- अलाउद्दीन ने लगभग 1 वर्ष तक रणथम्भौर दुर्ग का घेरा डाले रखा अन्तत: दुर्ग में अन्न की भारी कमी आ गयी थी।
- अमीर खुसरो इस अभियान में शाही सेना के साथ था। इसने दुर्ग में खाद्यान की कमी हेतु लिखा कि- “दुर्ग में सोने के 2 दानों के बदले अन्न का एक दाना भी नसीब नही था।”
- सरहिन्दी ने हम्मीर की घुड़सवार सेना की संख्या 12,000 तथा अमीर-खुसरो ने 10,000 बताई है।
- हम्मीर ने रतिपाल को सेनापति तथा रणमल को सेनानायक नियुक्त किया।
- अलाउद्दीन ने कूटनीति का प्रयोग करते हुए सन्धि का प्रस्ताव दिया। सन्धि की शर्तों को तय करने के लिए रतिपाल को भेजा गया जिसने विश्वासघात किया तथा गुप्त रास्ता बता दिया, इसने रणमल को अपनी ओर मिला लिया। सुर्जन शाह नामक अन्य अधिकारी ने भी विश्वासघात किया। शाही सेना ने दुर्ग में प्रवेश किया।
- अन्तिम समय जानकर रानी रंगदेवी/गंगदेवी ने जौहर (जल) व हम्मीद देव चौहान ने केसरिया का नेतृत्व किया तथा किले के द्वारा खोल दिए गए।
- नयनचन्द्र सूरी के “हम्मीर महाकाव्य” के अनुसार युद्ध के अन्तिम क्षणों में हम्मीर ने स्वयं अपना शीश काटकर भगवान शिव को अर्पित किया।
- निम्नलिखित के अनुसार इस दुर्ग पर अलाउद्दीन के अधिकार की भिन्न–भिन्न तिथियाँ दी गयी हैं-
- बरनी = 10 जुलाई,1301ई.
- इलियट = 11 जुलाई ,1301ई. (सर्वमान्य)
- हम्मीर महाकाव्य = 12 जुलाई,1301ई.
- मोहम्मद शाह
- केहब्रु
- रतिपाल
- रणमल
- दुर्ग का दायित्व उलुग खाँ को सौंपा गया।
- जन सामान्य का कत्लेआम किया गया व मन्दिरों को तोड़ा गया। अमीर खुसरो ने कहा – “कुफ्र का गढ़” इस्लाम का घर हो गया।
- इसामी- “हम्मीर के परिवार के किसी सदस्य को जीवित बन्दी नहीं बनाया जा सका।”
- अबुल फजल ने रणथम्भौर दुर्ग को सात पहाड़ियों से घिरा बख्तर बन्द दुर्ग कहा है।
जालौर का चौहान वंश
- जालौर का प्राचीन नाम जाबालिपुर बिजोलिया शिलालेख में मिलता है।
- साधारणत: जाल (एक प्रकार का वृक्ष) + लौर = जाल के वृक्षों की सीमा वाला क्षेत्र माना गया है।
- प्राचीन काल में यह प्रतिहारो व इनके बाद परमारों के अधीन था।
- जनश्रुति के अनुसार इसका एक नाम जालन्धर भी था। यह जालन्धर नाथ की तपोभूमि मानी जाती है। इस दुर्ग के पास सिरे मन्दिर (शिव मन्दिर) है जो नाथ सम्प्रदाय का माना जाता है।
- जालौर दुर्ग सूकड़ी नदी के (दाहिने) किनारे स्थित है।
- प्रतिहार नरेश वत्सराज के समय जैन आचार्य उद्योतन सूरी ने जालौर में ‘कुवलयमाला’ की रचना की थी।
- डॉ.दशरथ शर्मा के अनुसार प्रतिहार नरेश नागभट्ट प्रथम ने जालौर में अपनी राजधानी स्थापित की और उसने ही जालौर दुर्ग का निर्माण करवाया। G.H. ओझा ने परमारो को इसका निर्माता माना जाता है। जो सर्वमान्य नही है।
- सोनगिरि पर्वत के कारण यहाँ के चौहान शासक सोनगरा चौहान कहलाए।
- हसन निजामी “यह अजेय दुर्ग है” इसके द्वार कभी किसी विजेता द्वारा नही खोले गए।
प्रमुख शासक
कीर्तिपाल चौहान – 1181 ई. में परमारों को पराजित कर जालौर पर अधिकार किया व जालौर की चौहान शाखा की स्थापना की।
- यह नाडोल की चौहान शाखा के अल्हण चौहान का पुत्र था।
- अल्हण चौहान गुजरात के चालुक्यों का सामन्त था। प्रारम्भ में यह भी चालुक्यों की सेवा में था।
- सूंधा पर्वत अभिलेख में कीर्तिपाल के लिए “राजेश्वर”शब्द का प्रयोग हुआ है।
- कीर्तिपाल ने चालुक्यों की सहायता से मेवाड़ के शासक सामन्त सिंह को पराजित किया व मेवाड़ पर अधिकार किया।
- तत्पश्चात् जालौर पर अधिकार किया तथा यहाँ के परमारों को पराजित किया। जालौर को ही राजधानी बनाया।
- मुहणोत नैणसी ने कीर्तिपाल को “कीतू एक महान राजपूत” कहा।
समर सिंह (1182-1205) ई.
- कीर्तिपाल का पुत्र थाद्ध इसके समय दिल्ली पर मो.गौरी का शासन था।
- इसने किले की दृढ़ सुरक्षा का प्रबन्ध किया (सूंधा पर्वत शिलालेख स्त्रोत:)
- चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय (गुजरात) के साथ अपनी पुत्री लीलादेवी का विवाह किया।
उदयसिंह (1205-57)
- जालौर की सोनगरा चौहान शाखा का सबसे प्रतापी शासक (डॉ. दशरथ शर्मा)
- सुंधा अभिलेख में उदयसिंह को तुर्को का मानमर्दन करने वाला कहा गया है।
- नाडोल, मण्डोर, भीनमाल, सांचौर (जालौर सत्यपुर) पर विजय प्राप्त की।
- इल्तुतमिश ने इसके काल में जालौर पर 2 बार आक्रमण किया प्रथम बार उसे सन्धि करके 100 ऊँट + 200 घोड़े देकर लौटा दिया गया। दूसरी बार गुजरात के बाधेला शासक के साथ संयुक्त मोर्चा बनाया अत: इल्तुतमिश बिना लड़े ही लौट गया। (1221ई.) वि.सं. 1278 हसन निजामी के अनुसार (1228ई.)
- प्रधानमंत्री = यशोवीर (विद्वान भी था)
- मेवाड़ के समकालीन शासक जैत्रिसंह गुहिल ने अपने पूर्वज सामन्त सिंह की पराजय का बदला लेने हेतु जालौर पर आक्रमण किया परन्तु उदयसिंह ने अपनी पौत्री रूपा देवी (चाचिग देव की पुत्री) का विवाह जैत्रसिंह के पुत्र तेजसिंह के साथ करके मधुर सम्बन्ध स्थापित किए।
- 1254 ई. में दिल्ली के सुल्तान नासीरूद्दीन महमूद ने भी जालौर पर असफल आक्रमण किया।
- उदयसिंह के शासनकाल में जालौर अपने विस्तार और वैभव की पराकाष्ठा पर पहुँचा।
चाचिगदेव (1257-82 ई.)
- सुंधा अभिलेखानुसार इसने गुजरात के शासक वीरम को पराजित किया।
- समकालीन दिल्ली के सुल्तान नासीरूद्दीन, बलबन परन्तु दिल्ली पर मंगोलो के आक्रमण का भय होने से राजपूताना पर सुल्तानो का ध्यान नही गया।
सामन्त सिंह – (1282-1296ई.)
- 1291 ई. में जब दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी का जालौर पर आक्रमण हुआ तब सामन्त सिंह ने गुजरात के बाघेला राजा सारंग देव की सहायता से सफलता पूर्वक सामना किया। शाही सेना असफल होकर लौट गयी।
- सामन्त सिंह ने अपने पुत्र कान्हड़देव को 1296 में सत्ता सौंप दी।
कान्हड़देव चौहान (1296-1311)
- समकालीन राजनीतिक स्थिति
- दिल्ली = अलाउद्दीन खिलजी
- मेवाड़ (चित्तौड़) को प्रशासक = खिज्र खाँ (अलाउद्दीन खिलजी का पुत्र)
- सिवाणा – शीतलदेव चौहान
- मण्डोर – प्रतिहार
- आमेर – कच्छवाहा वंश
- मुख्य रानी = देसल देवी
- पुत्र = वीरम देवी
जानकारी के स्त्रोत
- पद्मनाभ – “कान्हड़देव”
“वीरम देव सोनगरा री बात”
- जालौर प्रशस्ती
- मकराना शिलालेख
- मुहणोत नैणसी – “नैणसी री ख्यात”
- फरिश्ता – “तारीखे फरिश्ता”
- अमीर खुसरो – “खजाईन-उल-फुतुह”
- जालौर पर अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के कारणों पर विभिन्न मत-
- कान्हड़देव प्रबन्ध – गुजरात अभियान के समय शाही सेना को मार्ग नही देना तथा लौटती शाही सेना पर कान्हड़देव द्वारा आक्रमण
- तारीखे फरिश्ता – “अलाउद्दीन द्वारा कान्हड़देव को दिल्ली बुलाकर अपमानित करना।”
- नैणसी री ख्यात - “वीरम देव तथा फिरोजा (अलाउद्दीन की बेटी)” के बीच प्रेम प्रसंग, वीरम देव द्वारा विवाह प्रस्ताव को ठुकरा देना।
- अमीर खुसरो – “राजनीतिक महत्वकांक्षा”(सर्वमान्य मत)
- अलाउद्दीन ने जालौर का प्रशासक कमलुद्दीन गुर्ग को नियुक्त किया।
- जालौर का नाम बदलकर जलालाबाद किया।
- किले में अलाई मस्जिद का निर्माण करवाया। जो मूलत: परमार शासक भोज द्वारा बनवायी गई संस्कृत पाठशाला थी।
- कान्हड़देव के भाई मालदेव सोनगरा ने बाद में अलाउद्दीन की अधीनता स्वीकार की, उसे चित्तौड़ का प्रशासक नियुक्त किया गया (1316-26) तक।
- डॉ.दशरथ शर्मा के अनुसार जून 1308 ई. में अलाउद्दीन सेना सहित जालौर अभियान हेतु चला। परन्तु सर्वप्रथम सिवाणा पर आक्रमण किया तथा 10 नवम्बर 1308 को सिवाणा पर विजय प्राप्त की।
सिवाणा विजय
- सिवाणा का तत्कालीन शासक शीतलदेव चौहान (कान्हड़ देव का भतीजा था)
- इस समय सिवाणा दुर्ग में साका हुआ जिसमें जौहर का नेतृत्व रानी मैणा दे द्वारा तथा केसरिया का नेतृत्व शीतल देव चौहान इस दुर्ग में दूसरा साका 1559 में यहाँ के शासक कल्ला जी रायमलोत के समय हुआ तब अकबर की सेना का नेतृत्व मोटा राजा उदयसिंह ने किया था।
- अलाउद्दीन के आक्रमण के समय (सिवाणा पर)भावले सरदार का विश्वासघात भी सिवाणा के पतन का एक कारण बना। इसने जल कुण्ड में गोरक्त मिला दिया तथा अन्न भण्डार में गाय की अस्थियाँ डलवा दी थी।
- अलाउद्दीन ने सिवाणा का नाम बदलकर खैराबाद किया व इसका प्रशासक कमालुद्दीन गुर्ग को नियुक्त कर दिल्ली लौट गया।
- सिवाणा दुर्ग को कुमटगढ़ तथा अणखैलो शिवाणो भी कहते है।
जालौर विजय
- कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में ही खिलजी ने जालौर अभियान पर सेना भेजी।
- दहिया सरदार बीका के विश्वासघात के कारण गुप्त मार्ग से शाही सेना में किले में प्रवेश किया।
- 1311 में किले पर खिलजी का अधिकार हो गया इस समय किले में साका हुआ जिसमे जौहर का नेतृत्व देसल दे ने तथा केसरिया का नेतृत्व कान्हड़ देव ने किया।
- कान्हड़देव + वीरमदेव वीरगति को प्राप्त हुए
सिरोही के चौहान
- प्राचीन नाम – अर्बुद क्षेत्र, अर्बुद – ऊपर उठा हुआ भाग।
- कर्नल जेम्स टॉड ने सिरोही नगर का मूल नाम शिवपुरी बताया है।
- इस क्षेत्र पर शासन करने वाले वंश – मौर्य, कुषाण, हूण, प्रतिहार, परमार, गुहिल,चौहान राठौड़ आदि।
- परमार वंश के समय यहाँ की राजधानी – चन्द्रवती
लुम्बा
- सिरोही के देवड़ा चौहान शाखा का आदि पुरूष।
- सिरोही के चौहान वंश का संस्थापक
- यह जालौर की देवड़ा शाखा से सम्बन्धित था।
- इसने 1311 ई. में आबू और चन्द्रवती केा परमारो से छीनकर अपनी सत्ता स्थापित की।
- 1320 में अललेश्वर मन्दिर का जीर्णोद्वार करवाया
- तथा इस मन्दिर को हैठूडी गाँव भेंट किया।
- 1321 मे लुम्बा की मृत्यु।
- लुम्बा के उत्तराधिकारी – तेजसिंह, कान्हड़देव, सामन्त सिंह, सलखा, रायमल
शिवभान/शिभान s/o रायमल –
सहसमल – शिवमान का पुत्र था।
- इसने शिवपुरी से 2 मील आगे 1425 ई. में सिरोही नगर बसाया। इस इस राजधानी बनाया।
- इसने सोलंकी राजपूतों के कुछ क्षेत्र पर अधिकार किया
- मेवाड़ के महाराणा कुम्भा ने डोडिया नरसिंह के नेतृत्व में सिरोही पर सैना भेजी तथा आबू,बसन्तगढ़, भूड़ तथा पूर्वी सिरोही का कुछ भाग जीत लिया। तथा अपनी विजय के उपलक्ष में वहाँ अचलगढ़ कुम्भस्वामी का मन्दिर, एक ताल व राजप्रसाद का निर्माण करवाया।
लाखा – 1451 में सिरोही का शासक बना।
- लाखा ने मेवाड़ी शासक कुम्भा की मृत्यु के बाद “पुन: आबु पर अधिकार” किया (उदा को पराजित करके)
- इसने (गुजरात के पंचमहल जिले मे) पाबागढ़ से लाकर “कालिका की मूर्ति” सिरोही में स्थापित की और स्वयं के नाम से वहाँ “लाखा तालाब” का निर्माण करवाया।
- पावागढ़ में 51 शक्ति पीठ में से एक महाकाली मन्दिर बना है। व 3 तालाब बने है।
जगमाल – लाखा का पुत्र
- इसका विवाह मेवाड़ के महाराणा रायमल की पुत्री “आनन्दी बाई ” से विवाह हुआ जिसे वह बहुत दु:ख देता था।
- रायमल के पुत्र कुँवर पृथ्वीराज सेना सहित सिरोही आया परन्तु बाद में धोखे से जहर द्वारा जगताल ने पृथ्वीराज की हत्या की। कुम्भलगढ़ में कुँवर पृथ्वीराज की 12 खम्भो की छतरी बनी है।
- महाराणा रायमल तथा दिल्ली के सुल्तान बहलोत लोदी के बीच युद्ध (1474 ई.) में जगमाल ने रायमल का साथ दिया था।
- जगमाल ने “जालौर के मजीद खाँ को पराजित” करके कर वसूल किया।
- अखैराज चौहान – इसने खानवा युद्ध में साँगा की सहयता की थी।
सुरताण देवड़ा –
बेरीसाल –
- इसके समय दुर्गादास राठौड़ ने सिरोही राज्य के कालिंद्री ग्राम में अजीत सिंह को शरण दी थी। जहाँ गौराधाय ने उन का पालन-पोषण किया था। कालिंद्री के जयदेव ब्राहृण के घर अजीत सिंह को छोड़ा गया था। (मुकुन्दराव खींची के माध्यम से)
शिवसिंह –
- इसने 11 सितम्बर 1823 ई. को अंग्रेजों के साथ सहायक सन्धि की थी। सहायक सन्धि करने वाला राजूपाने का अंतिम शासक था।
जालौर का चौहान वंश
- जालौर का प्राचीन नाम जाबालिपुर बिजोलिया शिलालेख में मिलता है।
- साधारणत : जाल (एक प्रकार का वृक्ष) + लौर (सीमा) जाल के वृक्षों की सीमा वाला क्षेत्र माना गया है।
- प्राचीन काल में यह प्रतिहारों व इनके बाद परमारों के अधीन था।
- जनश्रुति के अनुसार इसका एक नाम जालन्धर भी था। जय जालन्धर नाथ की तपोभूमि मानी जाती है।
- यहाँ स्थित दुर्ग के पास सिरे मन्दिर (शिव मन्दिर) है जो नाथ सम्प्रदाय का माना जाता है।
- जालौर दुर्ग सूकड़ी नदी के किनारे(दाहिने) स्थित है।
- प्रतिहार नरेश वत्सराज के समय जैन आचार्य उद्योतन सूरी ने जालौर में कुवलयमाला की रचना की थी।
- डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार प्रतिहार नेरश नागभट्ट प्रथम ने जालौर में अपनी राजधानी स्थापित की और उसने ही जालौर दुर्ग का निर्माण करवाया। G.H.ओझा ने परमारों को इसका निर्माता माना है। जो सर्वमान्य नहीं है।
- सोनगिरि पर्वत के कारण यहाँ के चौहान शासक सोनगरा चौहान कहलाए।
- हसन निजामी- “यह अजेय दुर्ग है इसके द्वार कभी किसी विजेता द्वारा नहीं खोले गए”।
प्रमुख शासक
कीर्तिपाल चौहान-
- 1181 ई. में परमारों को पराजित कर जालौर पर अधिकार किया व जालौर की चौहान शाखा की स्थापना की।
- यह नाडोल की चौहान शाखा के अल्हण चौहान का पुत्र था।
- अल्हण चौहान गुजरात के चालुक्यों का सामन्त था। प्रारम्भ में यह भी चालुक्यों की सेवा में था।
- सूंधा पर्वत अभिलेख में कीर्तिपाल के लिए “राजेश्वर” शब्द का प्रयोग हुआ है।
- कीर्तिपाल ने चालुक्यों की सहायता से मेवाड़ के शासक सामन्त सिंह को पराजित किया व मेवाड़ पर अधिकार किया।
- सामन्त सिंह के भाई कुमार सिंह ने चालुक्यों से सन्धि कर कीर्तिपाल को पराजित किया व पुन: मेवाड़ पर अधिकार कर लिया।
- तत्पश्चात् जालौर पर अधिकार किया तथा यहाँ के परमारों को पराजित किया। जालौर को ही अपनी राजधानी बनाई।
- मुहणोत नैणसी ने कीर्तिपाल को “कीतू एक महान राजपूत” कहा।
समर सिंह (1182-1205)
- कीर्तिपाल का पुत्र था। इसके मसय दिल्ली पर मो.गौरी का शासन था।
- इसने किले की दृढ़ सुरक्षा का प्रबन्ध किया (सूंधा पर्वत शिलालेख स्त्रोत)
- चालुक्य शासक भीमदेव II (गुजरात) के साथ अपनी पुत्री लीलादेवी का विवाह किया।
उदयसिंह (1205-57)
- जालौर की सोनगरा चौहान शाखा का (डॉ. दशरथ शर्मा)सबसे प्रतापी शासक।
- सुंधा अभिलेख में उदयसिंह को तुर्कों का मानमर्दन करने वाला कहा गया है।
- नाडोल,मण्डौर, भीनमाल, सांचौर (जालौर) सत्यपुर पर विजय प्राप्त की।
- इल्तुत मिश ने इसके काल में जालौर पर 2 बार आक्रमण किया। प्रथम बार उसे सन्धि करके 100 ऊँट + 200 घोडे़ देकर लौटा दिया गया। दूसरी बार गुजरात के बाघेला शासक के साथ संयुक्त मोर्चा बनाया अत: इल्तुतमिश बिना लड़े लौट गया ।
- प्रधानमंत्री = यशोवीर (विद्वान भी था)
- मेवाड़ के समकालीन शासक जैत्रसिंह गुहिल ने अपने पूर्वज सामान्त सिंह की पराजय का बदला लेने हेतु जालौर पर आक्रमण किया परन्तु उदयसिंह ने अपनी पौत्री रूपा देवी (याचिग देवी की पुत्री) का विवाह जैत्रसिंह के पुत्र तेजसिंह के साथ करके मधुर सम्बन्ध स्थापित किए।
- 1254 ई. में दिल्ली के सुल्तान नासीरूद्दीन महमूद ने भी जालौर पर असफल आक्रमण किया।
- उदयसिंह के शासनकाल में जालौर अपने विस्तार और वैभव की पराकाष्ठा पर पहुँचा।
चाचिगदेव (1257-82 ई.)
- सुंधा अभिलेखानुसार इसने गुजरात के शासक वीरम को पराजित किया।
- समाकालीन दिल्ली के सुल्तान – नासीरूद्दीन महमूद, बलबन परन्तु दिल्ली पर मंगोलो के आक्रमण का भय होने से राजपूताना पर सुल्तानों का ध्यान नहीं गया।
सामन्त सिंह (1282-1296ई.)
- 1291 ई. में जब दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी का जालौर पर आक्रमण हुआ तब सामन्त सिंह ने गुजरात के बाघेला राजा सारंगदेव की सहायता से सफलता पूर्वक सामना किया। शाही सेना असफल होकर लौट गयी।
- सामन्त सिंह ने अपने पुत्र कान्हड़देव को 1296 में सत्ता सौंप दी।
कान्हड़देव चौहान (1296-1311)
- समकालीन राजनीतिक स्थिति। मुख्य रानी = देसल देवी, पुत्र = वीरमदेव
- दिल्ली = अलाउद्दीन खिलजी
- मेवाड़ (चितौड़) = खिज्र खाँ (अलाउद्दीन खिलजी का पुत्र)
- सिवाणा = शीतल देव चौहान
- मण्डौर = प्रतिहार
जानकारी के स्त्रोत-
- पद्मनाभ – “कान्हड़देव प्रबन्ध” “वीरम देव सोनगरा री बात”
- जालौर प्रशस्ती
- मकराना शिलालेख
- मुहणोत नैणसी – “नैणसी री ख्यात”
- फरिश्ता = “तारीखे फरिश्ता”
- अमीर खुसरों – "खजाईन-उल-फुतुह”
जालौर पर अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के कारणो पर विभिन्न मत -
- कान्हड़देव प्रबन्ध- गुजरात अभियान के समय शाही सेना को मार्ग नहीं देना तथा लौटती शाही सेना पर कान्हड़देव द्वारा आक्रमण।
- तारीखे फरिश्ता- अलाउद्दीन द्वारा कान्हड़देव को दिल्ली बुलाकर अपमानित करना।
- नैणसी री ख्यात- वीरम देव तथा फिरोजा (अलाउद्दीन की बेटी) के बीच प्रेम प्रसंग, वीरमदेव द्वारा विवाह प्रस्ताव को ठुकरा देना।
- अमीर खुसरो-राजनीतिक महत्वकांक्षा - (सर्वमान्य मत)
- डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार जून 1308 ई. में अलाउद्दीन सेना सहित जालौर अभियान हेतु चला। परन्तु सर्वप्रथम सिवाणा पर आक्रमण किया तथा 10 नवम्बर,1308 को सिवाणा पर विजय प्राप्त की।
- सिवाणा विजय-
- सिवाणा पर तत्कालीन शासक शीतलदेव चौहान (कान्हड़देव का भतीजा था)
- इस समय सिवाणा दुर्ग में साका हुआ जिसमें जौहर का नेतृत्व रानी मैणा दे द्वारा तथा केसरिया का नेतृत्व शीतल देव चौहान द्वारा किया गया। यह इस दुर्ग का प्रथम साका था। इस दुर्ग में दूसरा साका 1559 ई. में यहाँ के शासक कल्ला जी रायमलोत के समय हुआ तब अकबर की सेना का नेतृत्व मोटा राजा उदयसिंह ने किया था।
- अलाउद्दीन के आक्रमण के समय (सिवाणा पर ) भावले सरदार का विश्ववासघात भी सिवाणा के पतन का एक कारण बना। इसने जल कुण्ड में गो रक्त मिला दिया तथा अन्न भण्डार में गाय की अस्थियाँ डलवा दी थी।
- अलाउद्दीन ने सिवाणा का नाम बदलकर खैराबाद किया व इसका प्रशासक कमालुद्दीन गुर्ग को नियुक्त कर दिल्ली लौट गया।
- सिवाणा दुर्ग के कुमटगढ़ तथा अणखैलो शिवाणो भी कहते हैं।
जालौर विजय-
- कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में ही खिलजी ने जालौर अभियान पर सेना भेजी।
- दहिया सरदार बीका के विश्वासघात के कारण गुप्त मार्ग से शाही सेना ने किले में प्रवेश किया।
- 1311 ई. में किले पर खिलजी का अधिकार हो गया इस समय किले में साका हुआ जिसमें जौहर का नेतृत्व रानी देसल दे ने तथा केसरिया का नेतृत्व ‘कान्हड़देव’ ने किया।
- कान्हड़देव + वीरमदेव वीरगति को प्राप्त हुए।
- अलाउद्दीन ने जालौर पर प्रशासक कमालुद्दीन गुर्ग को नियुक्त किया।
- जालौर का नाम बदलकर जलालाबाद किया।
- किले में अलाई मस्जिद का निर्माण करवाया। जो मूलत: परमार शासक भोज द्वारा बनवायी गई संस्कृत पाठशाला थी।
- कान्हड़देव के भाई मालदेव सोनगरा के बाद में अलाउद्दीन की अधीनता स्वीकार की उसे चित्तौड़ का प्रशासक नियुक्त किया गया (1316-1326 ई. तक)।