गुर्जर - प्रतिहार वंश
भीनमाल शाखा
- प्रतिहारों की सर्वाधिक महत्त्वूपर्ण शाखा, जिसके प्रमुख शासक निम्नलिखित है –
1. नागभट्ट-I (730-60 ई.) –
- प्रतिहारों की भीनमाल शाखा का संस्थापक व इस शाखा का प्रथम शासक।
- इस "नागावलोक” भी कहा गया।
- चौहान, गुहिल, परमार, चंदेल, कलचूरि आदि इसके सामंत थे।
- अरब लेखक अल बिलादुरी के अनुसार खलीफा हाशिम का सेनापति प्रतिहारों से पराजित हुआ तथा सिन्ध शासक जुनैद को बहुत से प्रदेशों से हाथ धोना पड़ा था।
- राष्ट्रकूट शासक दन्तिदुर्ग ने उज्जैन में हिरण्यगर्भ यज्ञ किया, जिसमें नागभट्ट-I को प्रतिहार ( द्वारपाल) बनाया गया। सम्भवत: नागभटट-I दन्तिदुर्ग से पराजित हुआ होगा। इस घटना का उल्लेख अमोघवर्ष के संजन ताम्र में मिलता है।
- नागभट्ट-I ने भृगुकच्छ (भड़ौच) पर अधिकार किया।
- अन्य उपनाम – राम का प्रतिहार, नारायण का अवतार, इन्द्र के दम्भ का नाशक, क्षत्रिय ब्राह्मण आदि।
2. कक्कुक – यह नागभटट-I का भतीजा था, जिसका अन्य नाम ककुस्थ भी मिलता है। इसने मण्डोर में "विष्णुस्तंभ' का निर्माण करवाया, जो राजस्थान का दूसरा सबस प्राचीन विष्णुस्तंभ माना जाता है।
3. देवराज – कक्कुक का भाई था। इसने उज्जैन को अपना केन्द्र बनाया। यह वैष्णव धर्मावलम्बी था। वराह अभिलेख में इसे देशभक्त कहा गया है।
4. वत्सराज (783-795 ई.) –
- देवराज का पुत्र था।
- "सम्राट” की उपाधि धारण करने वाला प्रथम प्रतिहार शासक।
- अन्य उपाधियाँ – रणहस्तिन (युद्ध का हाथी), जयवराह
- इसी के काल में उद्योतन सूरी ने "कुवलयमाला' तथा जिनसेन ने "हरिवंशपुराण' की रचना की थी।
- वलिप्रबंध लेख से इसके काल में 3 प्रथाओं के प्रचलन का प्रमाण मिलता है।
(i) सती प्रथा (ii) नियोग प्रथा (iii) देवदासी प्रथा
- वत्सराज ने त्रिपक्षीय संघर्ष/ त्रिराज्य संघर्ष को प्रांरभ किया। यह संघर्ष कन्नौज पर अधिकार को लेकर प्रतिहार-पाल-राष्ट्रकूट वंशों के शासकों के मध्य हुआ था।
- वत्सराज ने पाल शासक धर्मपाल को पराजित किया, परंतु लौटते समय राष्ट्रकूट शासक ध्रुव-I से पराजित हुआ व थार के मरुस्थल में शरण ली।
- वत्सराज को "प्रतिहार वंश का वास्तविक संस्थापक' भी माना जाता है।
5. नागभटट-II (795-833 ई.) –
- वत्सराज का पुत्र था। माता - सुंदर देवी
- उपाधि - "परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर'
- कन्नौज पर अधिकार कर उसे राजधानी बनाया व धर्म पाल (पाल) को पराजित किया, परंतु लौटते समय राष्ट्रकूट शासक गोविन्द-III से पराजित होकर थार मरुस्थल में शरण ली।
- ग्वालियर लेख में इसे "कर्ण” कहा गया है।
- ग्वालियर अभिलेखानुसार - "जिस प्रकार पतंगे अग्नि में गिरते हैं, उसी प्रकार आँध्र, सिंधु, विदर्भ, कलिंग के नरेश नागभटट-II की ओर खिंचते चले आए।''
- निम्ननलिखित क्षेत्रों पर बलात् अधिकार किया –
काठियावाड़ (गुजरात), मालवा (मध्य प्रदेश), किरात (हिमाचल प्रदेश), तुरूष्क (पश्चिमी भारत का मुस्लिम राज्य), वत्स-कौशाम्बी (उत्तर प्रदेश), मत्स्य (पूर्वी राजस्थान)
- मुसलमानों को पराजित करना –
- "प्रबंध कोष” के अनुसार इसके सामन्त व चाहमान राजा गूवक-I(गोविन्दराज) ने सुल्तान बेग को हराया।
- "खुम्माण रासो” के अनुसार इसके सामन्त व गुहिल शासक खुम्माण ने मुसलमानों को पराजित किया।
- नागभट्ट-II ने गंगा में जीवित जलसमाधि द्वारा प्राणों का त्याग किया।
- समकालीन पाल शासक = देवपाल, धर्मपाल
6. रामभद्र (833-36) –
- नागभट्ट-II का पुत्र। निर्बल शासक था। इसकी हत्या इसी के पुत्र मिहिरभोज ने की थी।
7. महिरभोज (836-85) –
- मिहिरभोज का शब्दार्थ = सूर्य का प्रतीक
- इसे प्रतिहरों में "पितृहन्ता शासक” भी कहा जाता है।
- यह "सर्वाधिक प्रतापी' प्रतिहर शासक था।
- इसके काल में सुलेमान नामक अरब यात्री ने भारत की यात्रा की। सुलेमान ने मिहिरभोज की आलोचना करते हुए उसे अरबों का शत्रु व इस्लाम की दीवार तथा भारत को
- काफिरों का देश कहा, परंतु प्रशंसा में कहा कि विशाल अश्व सेना थी तथा चौरी-डकैती नहीं होती थी। सोने-चाँदी की खानें थी।
- विभिन्न स्त्रोतों में मिहिरभोज की उपमाएँ –
- ग्वालियर अभिलेख - आदिवराह
- दौलतपुर - प्रभास पाटन
- बग्रमा - संपुर्ण पृथ्वी को जीतने वाला
- ताम्र सिक्कों पर - मदादिवराह
- पाल शासक नारायणपाल को पराजित कर कन्नौज पर अंतिम रूप से अधिकार किया। व उसे स्थायी राजधानी बनायी।
- राष्ट्रकूट शासक कृष्ण-II को पराजित किया।
- पुत्र महेंद्रपाल-I को राज्य सौंपकर तीर्थयात्रा पर चला गया था।
8. महेंद्रपाल-I (885-910 ई.) –
- मिहिरभोज का पुत्र था। माता - चन्द्राभटि्टका देवी
- गुरु व दरबारी साहित्यकार - राजशेखर
- उपाधियाँ - निर्भय नरेश, रघुकुल चूड़ामणि
- रघुकुल चूड़ामणि की उपाधि राजशेखर ने दी थी।
- बंगाल, बिहार व काठियावाड़ को अपने राज्य में मिलाया।
- राजशेखर की मुख्य रचनाएँ – कर्पूर मंजरी, काव्य मीमांसा, विद्साल भंजिका, हरविलास, बाल रामायण, बाल भारत ( प्रचण्ड पाण्डाव), भुवनकोष आदि।
- बगाल के पहाड़पुर अभिलेख तथा बिहार में रामगया व गुनेरिया अभिलेखों से इस क्षेत्र पर इसके अधिकार की जानकारियाँ मिलती हैं ।
- ऊना अभिलेख से काठियावाड़ पर अधिकार की पुष्टि होती है।
9. भोज-II (910-13) – महेंन्द्रपाल का पुत्र , माता - देहनागा देवी
10. महिपाल-I (914-43) –
- महेंन्द्रपाल-I व महीदवी का पुत्र
- राजशेखर - दरबारी साहित्यकार
- राजशेखर ने इसे आर्यावर्त का महाराजाधिराज कहा है।
- उपाधियाँ - विनायक पाल, हेरम्भपाल, रघुकुल मुकुटमणि (राजशेखर ने कहा)
- अरब यात्री अलमसूदी भारत यात्रा पर आया। इसने
- महिपाल-I (बऊर) व राष्ट्रकूट शासक इन्द्र-III(बल्हर) के बीच युद्ध व महीपाल की पराजय का उल्लेख किया।
- अलमसूदी के अनुसार पंजाब व सिंध पर इसने अधिकार किया था। यह 915 ई. में बगदाद से भारत आया था। इसने 943-44 में भारत संबंधी अपना विवरण लिखा था। अलमसूदी महीपाल की सैन्य व्यवस्था का भी उल्लेख करता है।
11. महेन्द्रपाल-II (945-48) –
- पिता - महीपाल-I, माता - प्रसाधना दवी
- इसके बाद क्रमश: देवपाल, विनायकपाल-II, महीपाल-II, विजयपाल शासक बनें।
- विजयपाल के समय इसके सामंतों ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करना प्रारंभ किया। जैसे – भर्तृभट्ट-II (गुहिल), चंदेल, कलचूरि, चेदि इत्यादि।
राज्यपाल (990-1019 ई.) – इसके समय दिस. 1018 में महमूद गजनवी ने कन्नौज पर आक्रमण किया व कन्नौज को लूटा, कत्लेआम व नष्ट किया। इस समय राज्यपाल बिना युद्ध किए ही भाग गया था। अत: चंदेल शासक विद्याधर ने राजाओं का संघ बनाकर राज्यपाल को मृत्यु दण्ड दिया था।
त्रिलोचनपाल (1019-1027) – अलबरूनी के अनुसार इसके समय कन्नौज राजधानी नहीं थी। बल्कि "बारी' को राजधानी बनाया था, जो रामगंगा व सरयू के संगम पर थी।
इसके समय भी महमद गजनवी ने पुन: आक्रमण किया व लूटा।
यशपाल (1036-1093 ई.) – अंतिम शासक। चन्द्रदेव गहड़वाल ने इस पर आक्रमण कर कन्नौज पर अधिकार किया व कन्नौज के गहड़वाल राज्य की स्थापना की।
चौहानों को सूर्यवंशी बताने वाले स्त्रोत
- नयन चन्द्रसूरी – “हम्मीर महाकाव्य”
- जोधराज – “हम्मीर रासो”
- नरपति नाल्ह – “बीसल देव रासो”
- जयानक – “पृथ्वीराज विजय”
- G.H औझा – “राजपूताने का प्राचीन इतिहास”
- चौहानों को चन्द्रवंशी बताने वाले स्त्रोत
- आबू का अचलेश्वर शिलालेख (1285)
- हांसी अभिलेख
- चौहानों को इन्द्रवंशी बताने वाले स्त्रोत
- राज्यपाल का सेवाड़ी अभिलेख (पाली जिले की बाली तहसील में)
बिजोलिया शिलालेख व जान कवि – “कायम खाँ रासो” में चौहानो को ब्राह्मण कहा गया। बिजोलिया शिलालेख में चौहानों को ”वत्स गौत्रीय ब्राह्मणों की सन्तान” कहा गया।
- चौहानों का मूल स्थान से सम्बन्धित मत
- गोपीनाथ शर्मा – गुर्जरत्रा क्षेत्र
- डॉ.दशरथ शर्मा – चित्तौड़गढ़
- हम्मीर महाकाव्य
- पृथ्वीराज विजय पुष्कर
- सुर्जन चरित्र
- आसोपा ने पिछोला झील के चाहू ओर निवास के कारण चौहानों को चाहमान कहा।
- ‘पृथ्वीराज विजय’ में चौहानों का प्रथम शासक/संस्थापक चाहमान कहा है। जिसकी व्याख्या- क्रमश – चाप,हरि,मान व नीति में पारंगत होने वाले व्यक्ति के रूप में की गयी है।
- सपादलक्ष - सवालख गाँवों का समूह।
- शाकम्बरी (सांभर) रियासत – चौहानों की प्रारम्भिक रियासत।
वासुदेव चौहान (551ई.)
- चौहान वंश का संस्थापक/प्रथम शासक
- डॉ. दशरथ शर्मा ने बिजोलिया शिलालेख के आधार पर तथा राजशेखर के “प्रबन्ध कोष” के आधार पर वासुदेव चौहान को प्रथम शासक बताया है।
- इसने “साँभर कस्बा” बसाया व इसे राजधानी बनाया।
- “साँभर झील” का निर्माण करवाया।
- वासुदेव चौहान के बाद लगभग 400 वर्षों तक कम महत्वपूर्ण शासक रहे तथा ये प्रतिहारों के सामन्त थे, कुछ शासक निम्नलिखित है।
- सामन्त राज, नरदेव, जयदेव, विग्रहराज-I, चन्द्रराज, गोपेन्द्रराज।
- दुर्लभराज I - यह प्रतिहार नरेश वत्सराज का सामन्त था। इसके समय शाकम्भरी रियासत पर मुस्लिम आक्रमण हुआ (प्रथम बार)।
- गूवक I (गोविन्दराज I) – प्रतिहार नरेश नागभट्ट II ने इसे वीर राजा की उपाधि दी। हर्षनाथ मन्दिर का निर्माण शुरू करवाया। “सुल्तान वेग वारिस” को पराजित किया।
- चन्द्रराज II गूवक II (गोविन्द राज II) – अपनी बहन कमलावती का विवाह मिहिर भोज से किया।
- चन्द्रराज – इसकी रानी आत्मप्रभा/रूद्राणी ने कालसर्प दोष से मुक्ति पाने हेतु पुष्कर झील किनारे 1000 शिवलिंग स्थापित करवाए व 1000 दीपक जलाए। दिल्ली के तोमर शासक को पराजित किया।
- वाक्पतिराज – 188 युद्धों का विजेता माना जाता है। प्रतिहारो को पराजित किया। “महाराजा” की उपाधि धारण करने वाला प्रथम चौहान शासक।
- सिंहराज – प्रतिहारो से स्वयं को मुक्त किया। प्रथम स्वतंत्र चौहान शासक जिसने ‘हर्षनाथ मन्दिर’ का निर्माण पूर्ण करवाया। “महाराजाधिराज” की उपाधि धारण करने वाला प्रथम चौहान शासक।
- विग्रहराज II (956 राज्यारोहण तिथि) – प्रथम प्रतापी शासक, उपाधि- “परम भट्टारक महाराधिराज परमेश्वर” यह उपाधि धारण करने वाला प्रथम चौहान शासक, इसी के समय हर्षनाथ लेख (983 ई.) की रचना की गयी जिसमें वासुदेव से सिंहराज तक के शासकों की सूची मिलती है। इसने अन्हिल वाड़ा के चालुक्य शासक मूलराज I को पराजित किया। भड़ौच (भृगुकच्छ) व साँभर में आशापुरा देवी का मन्दिर बनवाया।
- दुर्लभराज II - इसे “दुर्लध्यमेरू” कहा गया है।
- गोविन्दराज III – पृथ्वीराज विजय में इसे “वेरीघट्ट” व ‘शत्रुसंहारक’ कहा गया है तथा फरिश्ता ने “तारीखे फरिश्ता” में इसे गजनी के शासक को मारवाड़ में रोकने वाला कहा गया है।
- वाक्पतिराज II – इसके पुत्र लक्ष्मण ने नाडोल(पाली जिले की देसूरी तहसील में) में चौहान शाखा को प्रारम्भ किया।
- वीर्यराम – 1024ई. में इसी के समय महमूद गजनवी ने साँभर पर आक्रमण किया।
- चामुण्ड राय – इसने पुन: साँभर पर अधिकार किया।
- दुर्लभराज III – सुल्तान इब्राहिम से युद्ध में वीरगति प्राप्त हुआ। मलेच्छों को मातंग भी कहा गया है।
- वि ग्रहराज III – यह एक दुराचारी शासक था। इसने महासत्या नामक ब्राह्मणी का अपहरण किया था।
- पृथ्वीराज I – “प्रबन्ध कोष” में इसे तुर्क सेना का विजेता कहा गया है। 1105 ई. में जीणमाता अभिलेख से इसकी जानकारी मिलती है। उपाधि – “परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर” पुत्र – अजयराज चौहान