प्रथाएँ
सती प्रथा
अन्य नाम-सहमरण प्रथा/अन्वारोहण/सहगमन प्रथा
किसी महिला के पति की मृत्यु होने पर महिला द्वारा पति की चिता के साथ जिंदा जलना।
भारत में सर्वप्रथम सती होने के साक्ष्य 510 ई. में शिलालेख से प्राप्त होते है।
राजस्थान में सर्वप्रथम सती होने के प्रमाण 804 ई./वि.स. 861 में घटियाला अभलेख जोधपुर से प्राप्त हुए।
राजस्थान की प्रथम सती:- जोधपुर सेनापति रणुका की पत्नी संपल्ल कंवर।
राजस्थान की अंतिम सती:- 1987 ई. रूप कंवर दिवराला गाँव सीकर निवासी मालसिंह/मोहनसिंह की पत्नी।
राजस्थान सरकार ने सती निवारण अध्यादेश 1987 ई. में पारित किया।
राजस्थान में सर्वप्रथम 1822 ई. में बुंदी रियासत एवं 1823 ई. में कोटा रियासत ने इस प्रथा को गैर कानूनी घोषित किया।
लार्ड विलियम बैंटिक के प्रयासों से "सती निवारण अधिनयम, 1829" पारित किया गया जो सर्वप्रथम बंगाल में लागू हुआ।
इस कानून को पूरे देश में 1830 ई. में लागू किया गया।
इस अधिनियम के तहत राज्य में सर्वप्रथम अलवर रियासत में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगा।
महासती/अनुमरण प्रथा:-
पति की किसी निशानी के साथ सती होने वाली महिला।
राजस्थान की एकमात्र महासती-उमादे मालदेव राठौड़ की पत्नी/रूठी रानी [1562 ई.]
माँ सती:- केसर कँवर-अपने पुत्र की चिता के साथ जिंदा जलने वाली महिला।
अणरव:-सती होने से पहले महिला द्वारा अपने परिवारजनों को निर्देशित करना।
बाल विवाह
बाल विवाह के विरूद्ध सर्वप्रथम 1929 ई. में अजमेर निवासी हरविलास शारदा ने बनाया जिसे शारदा एक्ट कहा जाता है।
शारदा एक्ट 1 अप्रैल, 1930 ई. को पूरे देश में लागू।
इस कानून के तहत विवाह योग्य न्यूनतम आयु
लड़का- 18 वर्ष
लड़की- 14 वर्ष
विधवा पुर्नविवाह
विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के प्रयासों से लार्ड डलहौजी ने बनाया जबकि जुलाई, 1856 ई. में लॉर्ड कैनिंग ने इसे लागू किया।
विधवा पुनर्विवाह को बढ़ावा देने हेतु चांदकरण शारदा ने विधवा विवाह पुस्तक लिखी।
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने सर्वप्रथम अपने पुत्र का विवाह विधवा महिला के साथ करवाया।
शारदा एक्ट
लागू-1 अप्रैल, 1930
संशोधन 1978-बाल विवाह अंकुश निवारण अधिनयम इसके तहत विवाह योग्य न्यूनतम आयु
लड़का - 21 वर्ष एवं लड़की 18 वर्ष
संशोधन-2006 बाल विवाह प्रतिषेध अधिनयम, 2006
अधिसूचित-10 जनवरी, 2007
लागू - 1 नवंबर, 2007
बाल विवाह रोकने हेतु कठोर नियमों का प्रावधान
समाधि प्रथा:-
समाधि-दो प्रकार
1- जमीन समाधि/गढ़ा समाधि
2- जल समाधि
इस प्रथा पर सर्वप्रथम रोक 1844 ई. में जयपुर रियासत में रामसिंह द्वितीय ने लगाई।
लुडलो के प्रयासों से समाधि निवारण अधिनियम, 1861 पारित किया गया। जिसके तहत जीवित समाधि को आत्महत्या माना जायेगा।
कन्यावध प्रथा
कन्यावध पर राजस्थान में सर्वप्रथम अंग्रेज अधिकारी हॉल ने मेरवाड क्षेत्र में मेर जाति की बैठक में लगाई।
1833 ई. में सर्वप्रथम कोटा रियासत एवं 1834 में बूंदी रियासत ने इस प्रथा पर रोक लगाई।
कोटा के तत्कालीन शासक उम्मेदसिंह थे।
त्याग प्रथा
इस प्रथा पर सर्वप्रथम 1841 ई. में जोधपुर रियासत ने रोक लगाई।
1844 ई. में बीकानेर व जयपुर रियासत ने भी इस प्रथा पर रोक लगाई।
1868 में वाल्टर कृत राजपूत हितकारिणी सभा ने इस प्रथा पर नियम बनाये।
दहेज प्रथा
दहेज निवारण अधिनयम, 1961
चारी प्रथा
प्रचलन:- खैराड़ क्षेत्र-टौंक-भीलवाड़ा
पैसों के बदले लड़की के वैवाहिक ठिकानों को लगातार बदलते रहना।
संथारा/संल्लेखना प्रथा:-
जैन धर्म से संबंधित प्रथा
अन्न व जल का त्याग कर अपने प्राण त्यागना।
समुद्रगुप्त ने इसी विधि से अपना देह त्यागा।
पर्दा प्रथा
मुस्लिम आक्रांताओं की बुरी नजर से बचने हेतु मध्यकालीन इतिहास में इस प्रथा का प्रचलन।
इस प्रथा का सर्वाधिक विरोध स्वामी दयानंद सरस्वती ने किया।
दास प्रथा
युद्ध के समय दुश्मन राज्य की महिलाओं व पुरूषों को बंधक बनाकर दास-दासी के रूप में रखे जाते थे।
दास-दासियों का सर्वप्रथम उल्लेख कौटिल्य के अर्थशास्त्र में था।
दास-दासियों का निवास स्थल-राजलोक।
अकबर ने सर्वप्रथम इस प्रथा के उपर रोक लगाने का प्रयास किया।
1832 ई. में लार्ड विलियम बैंटिक ने इस प्रथा को गैर कानूनी घोषित किया।
राजस्थान में सर्वप्रथम 1832 ई. में कोटा रियासत ने इस प्रथा पर प्रतिबंध लगाया।
राजा द्वारा किसी दासी को उप पत्नी स्वीकार करने पर उसे पङदायत कहा जाता था।
राजा द्वारा किसी दासी अंगुठी/आभूषण पहनने की अनुमति देने पर उस दासी को पासवान/ खवासन कहा जाता था।
बेगार प्रथा/हाली प्रथा
बंधित श्रम पद्धति अधिनयम, 1976
कुछ समय के लिए राज्य के दुर्ग, महल अथवा जमींदारों का कार्य बिना मेहनताना करवाना।
नोट:- बुंदी रियासत में महिलाओं से भी बेगार ली जाती थी।
सागड़ी/बन्धुआ मजदूर प्रथा
सागड़ी निवारण अधिनयम, 1961
सेठ साहुकार द्वारा पैसे उधार देकर किसी व्यक्ति को कम मेहनताने में अपने पास बंधक बनाकर कार्य करवाना।
माण/आन प्रथा:-
1863 ई. में अंग्रेज अधिकारियों द्वारा इस प्रथा पर रोक लगाई।
राज्य व राजा के प्रति स्थायी स्वामीभक्ति की शपथ लेना।
डावरिया प्रथा:-
उच्च राजघरानों में कन्या की विदाई के समय साथ भेजी जाने वाली कन्याएँ
महिलाओं का क्रय-विक्रय
महिलाओं की खरीद-फरोख्त पर वसूला जाने वाला कर "चौगान" कहलाता था।
इस प्रथा पर सर्वप्रथम रोक 1831 ई. में कोटा रियासत में लगी।
मौताणा प्रथा :-
भीलों/आदिवासियों में मौत का हर्जाना वसुलना।
दण्ड लगाये गये व्यक्ति अथवा उसके द्वारा दी गई राशि को चढोतरा कहते है।
नाता प्रथा:-
यह एक पुर्नविवाह का ही प्रकार है।
डाकण प्रथा:-
इस प्रथा पर रोक एम बी सी के कमाण्डर जे सी ब्रुक ने 1853 में लगाई।
छेङा-फाङना प्रथा:-
भीलों में तलाक देने की एक प्रथा।
जगङा प्रथा :-
भीलों में तलाक की एक प्रथा।
कूकङी रस्म/प्रथा :-
विवाह से पहले लड़की को चरित्र की परीक्षा देना।
इस प्रथा का प्रचलन सांसी जनजाति में है।