भारतीय न्यायपालिका
• हमारे संविधान में स्पष्ट रूप से न्यायपालिका की व्यवस्था की गयी है। जिसमें उच्चतर न्यायपालिका द्वारा संविधान की व्याख्या, शासन के अंगों पर लगे प्रतिबंधों की जाँच, राज्य-केंद्र के मध्य विवादों के संदर्भ में निर्णय, मौलिक अधिकारों की रक्षा और अन्य विभिन्न कार्य के लिए किये जाते हैं।
- उच्चतर न्यायालय- भारतीय न्यायव्यवस्था सोपानात्मक है। सबसे उच्च शिखर पर सर्वोच्च न्यायालय है, जबकि न्यायिक दृष्टि से सभी न्यायालय सर्वोच्च न्यायालय के अधीन हैं। सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय को सम्मिलित रूप से उच्चतर न्यायालय कहते हैं। जबकि उच्च न्यायालय से भिन्न तथा निम्न न्यायालयों को अधीनस्थ न्यायपालिका कहते हैं।
- अधीनस्थ न्यायालय- अधीनस्थ न्यायालय प्रशासनिक दृष्टि से राज्य उच्च न्यायालय के अधीन होता है तथा इनमें जिला न्यायालय सर्वोच्च स्तर का न्यायालय है। इसके नीचे सत्र न्यायालय तथा तहसील न्यायालय होता है।
- अधिकरण (Tribunals)-42वें संविधान संशोधन वर्ष-1976 द्वारा भारत में अधिकरणों की व्यवस्था की गयी, जो न्यायपालिका के भार को कम करने हेतु विशेष उद्देश्यों से बनाया गया है।
- ये न्यायालय मूलतः सिविल वादों का निपटारा करते हैं तथा उच्च न्यायालय के समान शक्तियाँ धारण करते हैं।
- विशेष अदालतें- यह न्यायपालिका की आवश्यकताओं से उपजी व्यवस्था है, जरूरत के अनुसार विशेष अदालतों का गठन किया जाता है। जैसे-उपभोक्ता अदालत, परिवार अदालत, लोक अदालत, ग्रीन अदालत, ई. अदालत, मोबाइल अदालत इत्यादि।
सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court)
- सर्वोच्च न्यायालय, भारत का शिखर न्यायालय है। यह संघीय न्यायालय होने के साथ-साथ अंतिम अपीलीय न्यायालय भी है।
- यह कार्यपालिका के लिए सलाह भी प्रदान करता है। यह विश्व के शक्तिशाली न्यायालयों में से एक है।
- भारतीय सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली में अवस्थित है तथा मुख्य न्यायाधीश को यह अधिकार है, कि वह राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से उच्चतम न्यायालय की पीठ की स्थापना कर सकता है तथा स्थान परिवर्तित कर सकता है
सर्वोच्च न्यायालय का गठन-
- भारतीय संविधान के अनुसार, 'भारत में एक सर्वोच्च न्यायालय होगा, जो एक मुख्य न्यायाधीश तथा सात अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगा(मूल संविधान में)।' समय-समय पर आवश्यकतानुसार न्यायाधीशों की संख्या बढ़ायी जाती रही है।
- वर्तमान समय (वर्ष-2008) में एक मुख्य न्यायाधीश तथा 30 अन्य न्यायाधीश हैं।
सर्वोच्च न्यायालय का स्थान
- भारत का संविधान दिल्ली को सर्वोच्च न्यायालय का स्थान घोषित करता है।
- संविधान राष्ट्रपति के अनुमोदन से मुख्य न्यायाधीश को अन्य किसी स्थान अथवा एक से अधिक स्थानों को सर्वोच्च न्यायालय के स्थान के रूप में नियुक्त करने का अधिकार प्रदान करता है।
सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश की अर्हताएँ-
- वह भारत का नागरिक हो।
- वह कम से कम 10 वर्ष तक किसी एक अथवा दो उच्च न्यायालयों में लगातार वकालत कर चुका हो या पाँच वर्ष तक लगातार किसी भी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो।
- राष्ट्रपति की राय में विख्यात या कुशल विधिवेत्ता हो।
मुख्य व अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति-
- मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा तथा अन्य न्यायाधीशों एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश की सलाह से की जायेगी।
- भारत में सामान्यतः यह परंपरा रही है, कि उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जाता है।
- अपवादस्वरूप इंदिरा गाँधी के कार्यकाल के दौरान पहली बार एक कनिष्ठ न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया। वर्ष-1973 में ए. एन. रे. को मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया तथा न्यायमूर्ति ग्रोवर, शेतात एवं हेगड़े की वरिष्ठता का उल्लंघन किया गया।
- वर्ष-1977 में अहमदुल्लाह बेग को मुख्य न्यायाधीश बनाया गया तथा बी. आर. कृष्ण अय्यर की वरिष्ठता का उल्लंघन किया गया।
कॉलेजियम व्यवस्था-
- वर्ष-1998 में न्यायाधीशों के दूसरे मामले में न्यायालय ने यह निर्धारित किया, कि भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति में अब न्यायाधीशों की ही प्राथमिकता होगी।
- अब न्यायाधीशों की नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय के 4 न्यायाधीशों की कॉलेजियम से परामर्श करना होगा। यदि दो न्यायाधीशों ने भी अपनी राय प्रतिकूल रूप में प्रकट की, तो मुख्य न्यायाधीश उस नाम की अनुशंसा सरकार को नहीं भेजेंगे।
- कॉलेजियम के द्वारा सामान्यतः आम सहमति से निर्णय लिया जाता है, जिसमें मुख्य न्यायाधीश का विचार सम्मिलित होता है। परामर्श प्रक्रिया का अभिप्राय, केवल उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की राय नहीं है, बल्कि परामर्श का अर्थ, सहमति है।
न्यायाधीश नियुक्ति आयोग (संविधान संशोधन विधेयक)-
- भारत में अब तक उच्च न्यायालयों तथा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति, न्यायाधीशों की एक कॉलेजियम द्वारा किया जाता रहा है, परंतु इस व्यवस्था को लेकर रोष व्याप्त था। अतः न्याय प्रणाली की गुणवत्ता में सुधार हेतु संसद ने एक 'न्यायिक नियुक्ति आयोग' गठित करने की पहल की थी। इस हेतु राज्य सभा ने 99वाँ संविधान संशोधन पारित किया था।
उद्देश्य
- इस विधेयक का उद्देश्य, न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका तथा विधायिका को बराबर का अधिकार देना था।
- वर्ष-1993 से अब तक प्रचलित 'कॉलेजियम सिस्टम' के तहत न्यायपालिका स्वयं ही उच्चतर न्यायपालिका के न्यायाधीशों की नियुक्ति करती है तथा इसमें कार्यपालिका की कोई भूमिका नहीं है।
संरचना
नई व्यवस्था में न्यायाधीशों की नियुक्ति हेतु एक आयोग के गठन का प्रावधान था तथा आयोग में निम्नलिखित सदस्य थे
(i) सर्वोच्च न्यायालय का 'मुख्य न्यायाधीश' न्यायिक नियुक्ति आयोग का पदेन अध्यक्ष (Chairman) होगा।
(ii) सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश आयोग के पदेन सदस्य होंगे।
(iii) कार्यपालिका की तरफ से 'केन्द्रीय विधि मंत्री' आयोग के पदेन सदस्य होंगे।
(iv) दो या अन्य गणमान्य व्यक्तियों को इस आयोग का सदस्य नियुक्त किया जायेगा।
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग असंवैधानिक
- अक्टूबर, 2015 में उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए 99वें संविधान संशोधन को असंवैधानिक घोषित कर दिया और उच्चतम न्यायालय के अनुसार न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम व्यवस्था को बेहतर बताया।
- उच्चतम न्यायालय के अनुसार, न्यायाधीशों की नियुक्ति का मुद्दा न्यायपालिका की स्वतंत्रता का विषय है, जो संविधान का आधारभूत लक्षण है। इसलिए इसको संविधान संशोधन द्वारा भी समाप्त नहीं किया जा सकता।
शपथ
- उच्चतम न्यायालय के लिए नियुक्त न्यायाधीश को राष्ट्रपति या उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति द्वारा शपथ दिलाई जाती है।
- संविधान की तीसरी अनुसूची में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, अन्य न्यायाधीशों के लिए एक समान शपथ का प्रावधान है।
- न्यायाधीश के द्वारा भारतीय संविधान जो विधि द्वारा स्थापित है, इसके प्रति पूर्ण आस्था और निष्ठा की शपथ ली जाती है।
- उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों के शपथ का प्रावधान बिल्कुल उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की ही भाँति है।
न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया
- उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को राष्ट्रपति द्वारा दो आधारों पर हटाया जा सकता है
(i) दुर्व्यवहार के आधार पर।
(ii) सिद्ध कदाचार के आधार पर।
• संविधान में न्यायाधीशों को हटाने के लिए संसद की विशेष प्रक्रिया का उल्लेख है। न्यायाधीश को संसद की कुल सदस्य संख्या का बहुमत एवं उपस्थित तथा मत देने वाले 2/3 सदस्यों के बहुमत से हटाया जाएगा।
न्यायाधीश जाँच अधिनियम-1968 (संसदीय प्रक्रिया)-
- न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव, लोक सभा या राज्य सभा के किसी भी सदन में लाया जा सकता है। लोक सभा के 100 या राज्य सभा के 50 सदस्यों को संबोधित एक पत्र सदन के स्पीकर या सभापति को देते हैं।
- स्पीकर या सभापति द्वारा प्रस्ताव स्वीकार अथवा अस्वीकार किया जा सकता है।
- स्पीकर या सभापति द्वारा प्रस्ताव स्वीकार किए जाने पर निम्नलिखित प्रावधान किए जाते हैं। सदन द्वारा तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जाएगा, जिसमें
(i) उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या अन्य न्यायाधीश।
(ii) उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश।
(iii) कोई परंपरागत विधिवेत्ता।
यदि समिति ने आरोप सही पाया, तो प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा। (सिद्ध कदाचार या असमर्थता के आधार पर) जिस सदन में प्रस्ताव लाया गया है, वह सदन, विशेष बहुमत से न्यायाधीश के विरुद्ध प्रस्ताव पारित करेगा।
• विशेष बहुमत का आशय, सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत एवं उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से है।
• यह प्रस्ताव, संसद के एक ही सत्र में पारित होना चाहिए, इसके पश्चात दूसरे सदन में भी विशेष बहुमत से यह प्रस्ताव पारित किया जाएगा। प्रस्ताव पारित होने के पश्चात् राष्ट्रपति संबंधित न्यायाधीश को उसके पद से हटा देंगे।
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए नियुक्ति की आयु सीमा-
- उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की किसी न्यूनतम आयु का वर्णन नहीं है।
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों का कार्यकाल-
- संविधान ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश का कार्यकाल तय नहीं किया है। हालाँकि इस संबंध में निम्नलिखित तीन प्रावधान किये गए हैं:
- वह 65 वर्ष की आयु तक पदासीन रह सकता है। उसके मामले में किसी प्रश्न के उठने पर संसद द्वारा स्थापित संस्था इसका निर्धारण करेगी।
- वह राष्ट्रपति को लिखित त्यागपत्र देकर पद त्याग सकता है।
- संसद की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा उसे पद से हटाया जा सकता है।
तदर्थ न्यायाधीश-
- जब किन्हीं कारणों से उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों के कोरम/गणपूर्ति का अभाव होता है, तो भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है।
- तदर्थ न्यायाधीश के रूप में उच्च न्यायालय के उन न्यायाधीशों को नियुक्त किया जाता है, जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश नियुक्त होने की अर्हता रखते हैं और उन्हें उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की सभी उपलब्धियाँ प्राप्त होंगी।
सेवानिवृत्त न्यायाधीश-
- भारत के मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति की सहमति से उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के किसी अवकाश प्राप्त न्यायाधीश की नियुक्ति कर सकते हैं।
- अवकाश प्राप्त न्यायाधीशों की नियुक्ति कार्यभार अधिक होने तथा आवश्यकता पड़ने पर की जाती है।
- अवकाश प्राप्त न्यायाधीशों को तभी नियुक्त किया जा सकता है, जब वह सहमत हो।
- अवकाश प्राप्त न्यायाधीशों के वेतन एवं भत्ते, राष्ट्रपति के द्वारा निर्धारित होते हैं।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश-
- राष्ट्रपति के द्वारा कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की जा सकती है, जब
(i) भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त हो।
(ii) मुख्य न्यायाधीश कुछ समय के लिए अनुपस्थित हों
(iii) मुख्य न्यायाधीश अपने कार्यों को करने में सक्षम न हों।
न्यायाधीशों की स्वतंत्रता एवं स्वायत्तता का प्रावधान-
वेतन एवं भत्ते-
- उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को संघ की संचित निधि से वेतन, भत्ते एवं पेंशन दिए जाते हैं।
- वर्तमान में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को दो लाख अस्सी हजार प्रति माह तथा अन्य न्यायाधीशों को दो लाख पचास हजार रुपये प्रतिमाह दिए जाते हैं।
- यह बिन्दु ध्यान देने योग्य है, कि न्यायाधीशों के वेतन व भत्तों का निर्धारण संसद द्वारा किया जाता है।
- कार्यकाल के दौरान कोई वेतन व भत्तों में अलाभकारी परिवर्तन नहीं हो सकता। (अपवाद- अनुच्छेद-360 के अंतर्गत वित्तीय आपातकाल के दौरान वेतन से कटौती की जा सकती है)
- न्यायाधीशों के आचरण पर संसद या विधान सभा में कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती। (अपवाद जब हटाने की प्रक्रिया चल रही हो, तब चर्चा हो सकती है)
- उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है।
- अवकाश प्राप्ति के बाद न्यायाधीश भारतीय क्षेत्र में किसी भी न्यायपालिका के समक्ष वकालत नहीं करेंगे।
सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र
संविधान के संरक्षक के रूप में
- भारतीय न्यायपालिका संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य करती है तथा न्यायपालिका यह देखती है, कि क्या संविधान में उल्लिखित प्रावधानों का पालन किया जा रहा है या नहीं।
- संविधान के अनुच्छेद-13(2), अनुच्छेद-32, अनुच्छेद-245 एवं अनुच्छेद-368 में सर्वोच्च न्यायालय को यह अधिकार है, कि संविधान के प्रावधानों का सरकार के अन्य अंगों द्वारा अनुपालन करवाए
- केशवानंद भारती केस के अनुसार, यदि विधायिका तथा कार्यपालिका संविधान के आधारभूत ढाँचे को नष्ट करने का प्रयास करती है, तो न्यायालय उसे रोक सकता है।
मूल क्षेत्राधिकार-
- मूल क्षेत्राधिकार से तात्पर्य, ऐसे अधिकारों से है, जो केवल सर्वोच्च न्यायालय के पास है तथा अन्य कोई न्यायालय इन अधिकारों का प्रयोग नहीं करता है।
- अनुच्छेद-131 के अनुसार, केवल सर्वोच्च न्यायालय को ही यह अधिकार है, कि वह केन्द्र व राज्यों से संबंधित विवादों तथा राज्य के आपसी विवादों का निपटारा करे।
- स्पष्ट करता है कि सर्वोच्च न्यायालय के मूल व विशेष न्यायाधिकार के मामलों के बीच में :
1. एक तरफ सरकार तथा दूसरी तरफ एक या ज्यादा राज्य हों।
2. सरकार और एक या अधिक राज्य एक तरफ तथा दूसरी तरफ अन्य राज्य हों।
3. दो या अधिक राज्य हों।
रिट अधिकारिता या न्यायादेश क्षेत्राधिकार
- बिना संरक्षण के मौलिक अधिकारों की व्यवस्था खोखली है। भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के संरक्षक का दायित्व सर्वोच्च न्यायालय को सौंपा गया है।
- अनुच्छेद-13(2) के अनुसार, विधायिका, मौलिक अधिकारों को छीनने वाला कोई कानून नहीं बना सकती है। न्यायालय इस बात की जाँच करता है, कि क्या विधायिका द्वारा निर्मित कोई कानून मौलिक अधिकारों का हनन तो नहीं कर रहा है।
- अनुच्छेद-32 के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय को यह शक्ति है, कि वह मौलिक अधिकारों को लागू करवाने हेतु कार्यवाही करे।
- न्यायालय को बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण तथा अधिकार पृच्छा जैसी रिटें जारी करने का अधिकार है। यह न्यायालय के प्रारंभिक अधिकारिता में आता है।
अपीलीय अधिकारिता-
- अपीलीय अधिकारिता से आशय, उन मामलों से है, जिनमें उच्च न्यायालय से उच्चतम न्यायालय में अपील की जाती है। इन मामलों में सीधे उच्चतम न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती है, जब तक उच्च न्यायालय प्रमाणित नहीं करदे।
सिविल मामलों में अपील
- जब उच्च न्यायालय यह प्रमाण पत्र दे, कि किसी वाद में विधि की व्याख्या का कोई महत्वपूर्ण प्रश्न निहित है अथवा किसी वाद में संविधान की व्याख्या का कोई महत्वपूर्ण प्रश्न है तो अपील उच्चतम न्यायालय में की जा सकती है।
दाण्डिक मामलों में अपील
- दाण्डिक मामलों में अपील हेतु कुछ मामलों में प्रमाण-पत्र की आवश्यकता होती है। जबकि कुछ मामले बिना प्रमाण-पत्र के ही अपीलीय होते हैं।
- आपराधिक अथवा फौजदारी मामले में उच्च न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है जब-
1. किसी अपराधी को अधीनस्थ न्यायालय ने छोड़ दिया हो तथा अपील में उच्च न्यायालय ने उसे मृत्युदंड दिया हो।
2. किसी मामले को उच्च न्यायालय ने अधीनस्थ न्यायालय से हटाकर अपने पास हस्तांतरित कर लिया हो तथा अपराधी को मृत्युदंड दिया हो।
3. उच्च न्यायालय द्वारा प्रमाणित कर दिया जाए कि मामला सर्वोच्च न्यायालय में सुनने योग्य है।
विशेष इजाजत से अपील (अनुच्छेद-136)
- उच्चतम न्यायालय की विशेष इजाजत की यह शक्ति, अपीलीय शक्ति से भिन्न है।
- विशेष इजाजत उच्चतम न्यायालय द्वारा तब दी जा सकती है, जब विधि के किसी व्यापक महत्व का प्रश्न हो या ऐसी विशेष परिस्थितियाँ विद्यमान हों, जिसमें न्याय का घोर उल्लंघन किया गया हो।
- विशेष इजाजत के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय, सिविल एवं दाण्डिक दोनों मामलों में सुनवाई कर सकता है। विशेष इजाजत की अपील उच्चतम न्यायालय की आपवादिक शक्ति है, यह सामान्य शक्ति नहीं है। विशेष इजाजत के अंतर्गत सैन्य अधिकरणों के निर्णय की अपील उच्चतम न्यायालय में नहीं हो सकती।
सलाहकारी अधिकारिता क्षेत्र
- सलाहकारी अधिकारिता का अर्थ है, कि राष्ट्रपति किसी मामले में उच्चतम न्यायालय की सलाह ले सकता है। सलाह लेने के निम्नलिखित आधार हैं
(i) यदि सार्वजनिक महत्व का कोई मुद्दा हो।
(ii) संधि या समझौते जो संविधान के लागू होने से पूर्व किये गये हों।
- राष्ट्रपति, उच्चतम न्यायालय की सलाह मानने को बाध्य नहीं होता है।
- हालांकि उच्चतम न्यायालय प्रत्येक मुद्दे पर सलाह देने को बाध्य भी नहीं है तथा उच्चतम न्यायालय की सलाह राष्ट्रपति पर बाध्यकारी नहीं होती है।
- संविधान के लागू होने से पूर्व किये गये समझौतों एवं संधियों वाले मामलों में उच्चतम न्यायालय के लिए सलाह देना बाध्यकारी होता है, परंतु सरकार के लिये सलाह को मानना बाध्यकारी नहीं होता है।
सलाहकारी अधिकारिता की उपयोगिता-
सलाहकारी शक्ति के अंतर्गत् दी गयी सलाह से सरकार को उस महत्वपूर्ण तथ्य पर विधि की व्याख्या तथा जटिलताओं का उत्तर मिल जाता है। इसलिये सरकार विधि के निर्माण से पहले सलाह का ध्यान रखती है।
मामले जिन पर सलाहकारी शक्ति का प्रयोग किया गया
(1) दिल्ली विधि अधिनियम।
(2) केरल शिक्षा विधेयक।
(3) बेरूबाड़ी संघ का मामला।
(4) समुद्रीय प्रशुल्क अधिनियम।
(5) केशव सिंह वाद।
(6) राष्ट्रपति चुनाव-1974
(7) विशेष न्यायपालिका अधिनियम-1978
(8) कावेरी जल विवाद अधिनियम।
(9) राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवादास्पद ढाँचे का मामला।
(10) जजेजवाद-1998
(11) जम्मू एवं कश्मीर राज्य का पुनर्वास अधिनियम।
(12) स्पेशल रिफरेंस अधिनियम-2001
(13) गुजरात विधान सभा चुनाव-2002
(14) पंजाब जल समझौता समाप्ति अधिनियम-2004
(15) 2G स्पेक्ट्रम मामला-2012
अभिलेख न्यायालय
- अभिलेखों के न्यायालय के रूप में सर्वोच्च न्यायालय के पास दो शक्तियाँ हैं-
1. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय, कार्यवाही और उसके फैसले सार्वकालिक अभिलेख एवं साक्ष्य के रूप में दर्ज़ किये जाते हैं तथा किसी अन्य अदालत में चल रहे मामलों के दौरान इन पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता व ये रिकॉर्ड विधिक संदर्भों की तरह स्वीकार किये जाते हैं
2. न्यायालय की अवमानना करने पर दंडित करने का अधिकार है, यह सजा 6 माह का सामान्य कारावास या 2000 रुपये तक का आर्थिक दंड अथवा दोनों हो सकती है।
न्यायालय की अवमानना-
न्यायालय की अवमानना का अर्थ किसी न्यायालय की गरिमा तथा उसके अधिकारों के प्रति अनादर प्रदर्शित करना है। (न्यायालय का अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Court Act, 1971) के अनुसार )
अवमानना के प्रकार-
1. सिविल अवमानना: न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री, आदेश, रिट, अथवा अन्य किसी प्रक्रिया की जान बूझकर की गई अवज्ञा या उल्लंघन करना न्यायालय की सिविल अवमानना कहलाता है।
2. आपराधिक अवमानना: न्यायालय की आपराधिक अवमानना का अर्थ न्यायालय से जुड़ी किसी ऐसी बात के प्रकाशन से है, जो लिखित, मौखिक, चिह्नित , चित्रित या किसी अन्य तरीके से न्यायालय की अवमानना करती हो।
- सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय को अदालत की अवमानना के लिये दंडित करने की शक्ति प्राप्त है।
- वर्ष 1991 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाया कि उसके पास न केवल खुद की बल्कि पूरे देश में उच्च न्यायालयों, अधीनस्थ न्यायालयों तथा न्यायाधिकरणों की अवमानना के मामले में भी दंडित करने की शक्ति है।
- न्यायालय की अवमानना करने पर दंडित करने का अधिकार है, यह सजा 6 माह का सामान्य कारावास या 2000 रुपये तक का आर्थिक दंड अथवा दोनों हो सकती है।
न्यायालय की अवमानना व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता-
- भले ही संविधान के अनुच्छेद-19(1)(A) ने सभी नागरिकों को वाणी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी हो, मगर न्यायपालिका को न्यायालय की अवमानना संबंधी अधिकार दिए गये हैं, जो अनुच्छेद-19(1)(A) के तहत दी गयी स्वतंत्रता को सीमित कर देते हैं।
- यह प्रावधान न्यायपालिका की सुरक्षा एवं प्रोत्साहन के लिए आवश्यक है, कि इन दोनों प्रावधानों के बीच सामंजस्य स्थापित किया जाना बेहतर है।
उच्चतम न्यायालय से संबंधित अनुच्छेद: एक नजर में
अनुच्छेद विषय-वस्तु
124 उच्चतम न्यायालय की स्थापना तथा गठन
"124 A राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC)
124 B आयोग के कार्य
124 C संसद की कानून बनाने की शक्ति
125 न्यायाधीशों का वेतन इत्यादि
126 कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति
127 तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति
128 उच्चतम न्यायालय की बैठकों में सेवानिवृत न्यायाधीशों की उपस्थिति
129 अभिलेख न्यायालय के रूप में उच्चतम न्यायालय
130 उच्चतम न्यायालय का आसन
131 उच्चतम न्यायालय का मूल क्षेत्राधिकार
131 ए केन्द्रीय कानूनों की संवैधानिक वैधता से संबंधित प्रश्नों के बारे में उच्चतम न्यायालय का विशेष क्षेत्राधिकार (निरस्त)
132 उच्चतम न्यायालय का कुछ मामलों में उच्च न्यायालयों से अपील के मामले में अपीलीय क्षेत्राधिकार
133 सिविल मामलों में उच्च न्यायालय में अपील से संबंधित उच्चतम न्यायालय का अपीलीय क्षेत्राधिकार
134 उच्चतम न्यायालय का आपराधिक मामलों में अपीलीय क्षेत्राधिकार
134 ए उच्चतम न्यायालय में अपील के लिए प्रमाण-पत्र
135 उच्चतम न्यायालय द्वारा वर्तमान कानूनों के अंतर्गत संघीय न्यायालय के क्षेत्राधिकार तथा शक्तियों का उपयोग
136 उच्चतम न्यायालय द्वारा अपील के लिए विशेष अवकाश
137 उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णयों अथवा आदेशों की समीक्षा
138 उच्चतम न्यायालय के क्षेत्राधिकार को विस्तारित करना
139 कतिपय विषयों पर रिट जारी करने की उच्चतम न्यायालय की शक्ति
139 ए कुछ मामलों का स्थानांतरण
140 उच्चतम न्यायालय की आनुषंगिक शक्तियाँ
141 उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित कानून का सभी न्यायालयों पर लागू होना
142 उच्चतम न्यायालय के आदेशों तथा साथ ही अन्वेषण आदि से संबंधित आदेशों का प्रवर्तन कराना
143 राष्ट्रपति की उच्चतम न्यायालय से सलाह करने की शक्ति
144 सिविल तथा न्यायिक अधिकारियों का उच्चतम न्यायालय का सहायक होना
144 ए कानूनों की संवैधानिक वैधता से जुड़े प्रश्नों के विस्तारण के लिए विशेष प्रावधान (निरस्त)
145 न्यायालय के नियम इत्यादि
146 उच्चतम न्यायालय के पदाधिकारी तथा सेवक एवं व्यय इत्यादि