न्यायिक-पुनरावलोकन
• न्यायिक-पुनरावलोकन, एक ऐसी संस्थात्मक व्यवस्था है, जिसमें न्यायालय के द्वारा, विधायिका और कार्यपालिका द्वारा किये गये कार्यों की संवैधानिकता का परीक्षण किया जाता है।
• सर्वप्रथम विश्व में न्यायिक पुनरावलोकन का प्रारंभ अमेरिका में हुआ था, जहाँ 1803 कें मारबरी बनाम मेडिसन के मुकद्दमे में न्यायाधीश मार्शल ने इसको परिभाषित किया था।
• भारतीय संविधान में शासन के प्रत्येक अंगों पर निश्चित प्रतिबंध आरोपित हैं। उदाहरण के लिये, अनुच्छेद-13(2) में यह स्पष्ट प्रावधान है, कि राज्य किसी भी ऐसी विधि का निर्माण नहीं कर सकती है, जो मूल अधिकारों को कम करते हों या छीनते हों।
 न्यायिक-पुनरावलोकन (प्रत्यक्ष या परोक्ष)-
• अनुच्छेद-13 में न्यायिक-पुनरावलोकन का स्पष्ट आधार है। अतः भारतीय संविधान में सरकार का कोई अंग सर्वोच्च नहीं है, लेकिन जहाँ संविधान की व्याख्या का प्रश्न होगा, तो न्यायपालिका की प्राथमिकता, स्वाभाविक रूप में स्थापित होगी।
न्यायिक पुनरावलोकन से सम्बन्धित अनुच्छेद-
• भारतीय संविधान में न्यायिक पुनरावलोकन सिद्धान्त के आधार है-
1.अनुच्छेद – 13
2.अनुच्छेद – 32
3.अनुच्छेद – 131
4.अनुच्छेद – 246
5.अनुच्छेद – 368
न्यायिक-पुनरावलोकन की सीमाएँ-
-     संविधान निर्माताओं ने न्यायपालिका के न्यायिक-पुनरावलोकन के महत्व को रखते हुए संविधान में ही प्रतिबंध आरोपित कर दिए। ये प्रतिबंध निम्न हैं-
1. मंत्रिपरिषद द्वारा दी गयी राष्ट्रपति या राज्यपाल को सलाह।
2. राष्ट्रपति या राज्यपाल के नाम पर निर्मित या क्रियान्वित किसी विधि का परीक्षण न्यायालय इस आधार पर नहीं कर सकता, कि किसी अन्य ने तो इसका निर्माण नहीं किया है।
3. संसद की शक्ति तथा विशेषाधिकार।
4. संसद तथा विधायिका के द्वारा किये गये कार्य की या सदस्यों द्वारा प्रेरित शक्तियों का न्यायिक-पुनरावलोकन नहीं कर सकता।
5. न्यायालय, संसद तथा विधायिका की प्रक्रिया की वैधानिकता का पुनरीक्षण नहीं कर सकते।
6. अंतर्राज्यीय जल विवादों को भी न्यायिक-पुनरावलोकन के क्षेत्र से बाहर रखा गया है।
7. निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन का।
8. राष्ट्रपति तथा राज्यपाल द्वारा अपनी शक्तियों तथा कार्यों के करने के संदर्भ में कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं, जिन्हें न्यायिक-पुनरावलोकन से बाहर रखा गया है।    
 न्यायिक पुनरावलोकन की आलोचना-
• अनेक बार सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार वैध व उचित कानूनों को भी अवैध ठहराया है।
• न्यायिक पुनरावलोकन न्यायिक निरंकुशता को जन्म देता है।
• न्यायिक पुनरावलोकन प्रजातन्त्रीय सिद्धान्तों के विपरीत है। प्रजातन्त्र में कानूनों की वैधता भी जन-प्रतिनिधियों द्वारा ही जांची जानी चाहिए, क्योंकि उनका कानून निर्माण से गहरा सम्बन्ध होता है।
• यह विधानमण्डल को लापरवाह बना देता है। उसे पता होता है कि यदि कानून गलत बन भी गया तो न्यायालय उसे सुधार देगा।
• नीति-निर्माण करना सरकार का कार्य है न कि न्यायालयों का।
• यह बहुमत की निरंकुशता पर आधारित है। इसमें किसी कानून को अवैध घोषित करने के लिए न्यायाधीशों का बहुमत होना जरूरी है।
इससे राजनीतिक वाद-विवादों को बढ़ावा मिलता है।
न्यायिक पुनरावलोकन का महत्व
• न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति न्यायपालिका को स्वतन्त्र अस्तित्व प्रदान करती है।
• न्यायिक पुनरावलोकन द्वारा नागरिक अधिकारों की रक्षा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
• संघात्मक शासन प्रणालियों में शक्तियों के बटवारे में संविधानिक गतिरोध टालने में न्यायपालिका की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है।
• न्यायपालिका भारत में विधायिका व कार्यपालिका द्वारा पास किए गए कई असंवैधानिक कानूनों को रद्द कर सकती है।
• इस शक्ति के कारण न्यायपालिका संविधान का तीसरा सदन का रूप ले लेता है जो इसकी महता को बढ़ा देता है।
नौवीं अनुसूची का न्यायिक पुनरावलोकन
• 24 अप्रैल, 1973 को सर्वोच्च न्यायालय के केशवानंद भारती मामले में आए निर्णय के बाद संविधान की 9वीं  अनुसूची में शामिल किये गए किसी भी कानून की न्यायिक समीक्षा हो सकती है।
• सर्वोच्च न्यायालय ने आर.आर.कोह्लो-2007 वाद में कहा कि कोई कानून महज नौवीं अनुसूची में शामिल होने से न्यायिक समीक्षा से नहीं बच सकता अर्थात नौंवी अनुसूची का भी न्यायिक पुनर्विलोकन किया जा सकता है।
न्यायिक सक्रियता
-     न्यायिक सक्रियता, एक विवादास्पद संकल्पना है, जिसके संदर्भ में विधायिका और न्यायपालिका के दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। इसके तहत न्यायपालिका संवैधानिक प्रणाली के तहत संवैधानिक मूल्यों और नैतिकता को बनाए रखने के लिये सक्रिय भूमिका निभाती है।
-     न्यायिक सक्रियता में न्यायपालिका ने स्वयं को सक्रिय माना है। न्यायपालिका के अनुसार, न्यायपालिका का भी मूल उद्देश्य सामाजिक न्याय प्रदान करना है, केवल प्रक्रिया को बनाये रखना नहीं।
-     भारत में न्यायिक सक्रियता का तात्पर्य न्यायपालिका द्वारा मौलिक अधिकार व नीति-निदेशक तत्व के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करने की वजह से त्वरित निर्णय देने से है। इसी संदर्भ में न्यायिक सक्रियता की अवधारणा विकसित हुई है। न्यायिक सक्रियता के पक्ष में तर्क
• न्यायिक सक्रियता के माध्यम से न्याय-निर्णयन में आवश्यक नवाचार आता है व न्यायाधीशों को उन मामलों में अपने व्यक्तिगत ज्ञान का उपयोग करने का अवसर प्रदान करती है।
• न्यायिक सक्रियता पहले से स्थापित न्याय प्रणाली और उसके निर्णयों में त्वरित विश्वास कायम करती है।
• न्यायिक सक्रियता के माध्यम से न्यायपालिका विभिन्न मुद्दों पर जल्दी समाधान प्रदान करने का एक अच्छा विकल्प है।
न्यायिक सक्रियता के विपक्ष में तर्क
• न्यायिक सक्रियता के द्वारा न्यायपालिका संविधान द्वारा तैयार की गई सीमा रेखा का उल्लंघन करती है।
• अनेक बार न्यायाधीशों के न्यायिक निर्णय निजी या स्वार्थी उद्देश्यों से प्रेरित हो सकते हैं जो जनता को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचा सकते हैं।
न्यायिक सक्रियता सरकारी संस्थानों में से लोगों का विश्वास कम करती है।
न्यायिक अतिसक्रियता
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संविधान में विधायिका, न्यायपालिका व कार्यपालिका के मध्य, शक्ति विभाजन किया गया है एवं प्रत्येक अंग के अपने निर्धारित कार्य हैं।
-     वर्तमान में न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका को नीति निर्माण संबंधी आदेश दिये गये हैं। यही न्यायिक अतिसक्रियता है।
-     निम्नलिखित मामलों में हाल ही में न्यायपालिका ने कार्यपालिका को आदेश दिया है-
(i)   गेहूँ को गरीबों में मुफ्त बाँटने का आदेश दिया जाना ।
(ii) केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति को रद्द कर दिया जाना ।
(iii) काले धन हेतु सरकार द्वारा गठित विशेष जाँच टीम के सदस्यों पर न्यायपालिका द्वारा आपत्ति उठाया जाना ।
(iv) 2G स्पेक्ट्रम मामले की जाँच उच्चतम न्यायालय द्वारा स्वयं किया जाना ।
जनहित याचिका
• जनहित याचिका का तात्पर्य सार्वजनिक हित की रक्षा के लिए दायर किये गये मुकदमे से है, जो अन्य सामान्य अदालती याचिकाओं से अलग है।
•  जनहित याचिका में यह आवश्यक नहीं की पीड़ित पक्ष स्वयं अदालत में जाए। यह किसी भी नागरिक या स्वयं न्यायालय द्वारा पीड़ितों के पक्ष में दायर किया जा सकता है।
•  जनहित याचिका ने भारत में पूर्व प्रचलित Locus standi (केवल प्रभावित व्यक्ति ही न्याय पाने के अधिकार की अपील कर सकता है ) प्रक्रिया को बदल दिया। भारत के पूर्व न्यायाधीश पी.एन. भगवती को ‘जनहित याचिका का जनक’ माना जाता है। भारत में उच्चतम न्यायालय द्वारा वर्ष-1980 के पश्चात जनहित याचिका का प्रयोग किया जाने लगा था।
• वर्ष-1982 के एस. पी. गुप्ता बनाम् भारत संघवाद (जजेज केस) में न्यायपालिका ने जनहित याचिका को औपचारिक मान्यता प्रदान की तथा इसके प्रयोग का विकसित मानदण्ड भी निर्धारित किया।
जनहित याचिका के कुछ नियम
1.   लोकहित से प्रेरित कोई भी व्यक्ति, संगठन इन्हें ला सकता हैं।
2.   न्यायालय में भेजा गया पोस्टकार्ड भी याचिका मान कर स्वीकार किया जा सकता है।
3.   न्यायालय को अधिकार होगा कि वह इस याचिका हेतु सामान्य कोर्ट शुल्क भी माफ कर दे।
4.   यह राज्य के साथ ही निजी संस्थानों के विरुद्ध भी लाई जा सकती है।
जनहित याचिका की विशेषताएँ-
-     जनहित याचिका की विशेषताएँ निम्नलिखित रूप में व्यक्त की जा सकती हैं
(i) इसमें न्याय, व्यक्ति विशेष के हित में न होकर, समूह के हित में दिया जाता है।
(ii) इसमें जटिल औपचारिक क्रियाओं का अभाव होता है।
(iii) जनहित याचिका के द्वारा सामाजिक एवं आर्थिक अधिकारों को मान्यता प्रदान की गयी।
(iv) जनहित याचिका में प्रक्रिया के बजाय, न्याय को प्राथमिकता दी जाती है।
(v) जनहित याचिका के द्वारा वादी के पक्ष में कोई तीसरा या अन्य व्यक्ति रिट दायर कर सकता है।
(vi) न्यायपालिका, वादी की सहायता करती है तथा इसके अंतर्गत तथ्य इकट्ठा करने में न्यायपालिका ने जाँच आयोग की स्थापना भी की।
जनहित याचिका के प्रयोग के चरण
प्रथम चरण

• जनहित याचिका के प्रयोग के पहले चरण में समूह के अधिकारों की रक्षा का प्रयास किया गया। उदाहरण के लिए, एशियाड वर्कर्स केस में न्यायपालिका ने कम मजदूरी दिए जाने को जीवन के अधिकार का उल्लंघन माना। जबकि बंधुआ मुक्ति मोर्चा वाद में न्यायपालिका ने बालश्रम को रोकने का निर्देश दिया।
द्वितीय चरण-
• जनहित याचिका के द्वितीय चरण में पर्यावरण की रक्षा के लिए जनहित याचिका दायर हुई, जिसमें एम. सी. मेहता ने ताजमहल पर प्रदूषण और दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन में सी. एन. जी. प्रयोग करने का निर्देश दिया, न्यायपालिका ने यह भी कहा कि दिल्ली में औद्योगिक प्रदूषणकारी कारखानों को बाहर किया जाय।
तृतीय चरण-
जनहित याचिका के तीसरे चरण में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अनेक जनहित याचिकाएं दायर हुईं, जिसमें हवाला घोटाला, यूरिया घोटाला, चारा घोटाला जैसे मुद्दों पर न्यायपालिका ने सरकार को निर्देश दिया।
आलोचना-
-     जनहित याचिका के द्वारा न्यायालय ने अपने कार्यों में विस्तार किया। आलोचकों के अनुसार, न्यायालय, न्यायिक मुकद्दमों के कार्य से बढ़कर न्यायिक रूप में सक्रिय हो रही है। अतः जनहित याचिका के द्वारा न्यायिक सक्रियता का विवाद और गहरा हुआ।
-     आलोचकों ने इसे पैसाहित याचिका भी कहा। मूल प्रश्न उत्पन्न होता है, कि भारत जैसे देश में कितने लोगों को पत्रों के माध्यम से न्याय दिलाया जा सकता है। जबकि न्यायपालिका में पहले से ही लंबित मामले पड़े हैं। अतः जनहित याचिका के प्रयोग के साथ इसके दुरुपयोग को भी रोकने की आवश्यकता है।
प्रशासनिक अधिकरणों का प्रावधान (CAT)
• अधिकरण भी न्यायालय के समान ही होते हैं, परंतु इसमें निश्चित प्रकृति के मुकद्दमे आते हैं। जैसे-प्रशासनिक अधिकरणों में सरकारी निगमों, प्रशासनिक सेवाओं से संबंधित विवादों तथा किराया, औद्योगिक विवाद, श्रम विवाद इत्यादि।
• अधिकरणों की व्यवस्था मूल संविधान में नहीं थी, अपितु इन्हें 42वें संविधान संशोधन-1976 द्वारा जोड़ा गया।
• संविधान के भाग-14 (A) में 323 (A) और 323 (B) में अधिकरणों की व्यवस्था है।
अधिकरणों की प्रकृति-
• अधिकरण, न्यायिक तथा अर्द्ध-न्यायिक विवादों का समाधान करते हैं।
•  सभी न्यायालय अधिकरणों के समान होते हैं। न्यायालय को वे सभी अधिकार प्राप्त होते हैं, जो अधिकरण को प्राप्त होते हैं, परंतु न्यायालयों को प्राप्त सभी अधिकार अधिकरण को नहीं प्राप्त होते।
• अधिकरणों में तर्कों व साक्ष्यों के आधार पर मध्यस्थ की तरह विवादों का निपटारा करते हैं तथा इसमें दो सरकारी पक्षों के मध्य भी विवाद हो सकता है या फिर सरकारी और प्राईवेट पक्षकारों के बीच भी विवाद हो सकता है।
प्रशासनिक अधिकरण (अनुच्छेद-323(A))
केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण

संसद ने वर्ष-1985 में प्रशासनिक अधिकरणों की स्थापना की। (प्रशासनिक अधिकरण संवैधानिक निकाय है) इसके अंतर्गत विभिन्न राज्यों में राज्य, प्रशासनिक अधिकरण और संघीय स्तर पर केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण का निर्माण किया गया। चंद्र कुमार वाद के पश्चात इन अधिकरणों के निर्णय के विरुद्ध उच्च न्यायालय में भी अपील की जा सकती है। पहले सीधे उच्चतम न्यायालय में अपील का प्रावधान था।
संरचना
• यह एक प्रशासनिक अधिकरण बहुसदस्यीय निकाय है। इसमें एक अध्यक्ष तथा 65 सदस्य होते हैं, साथ ही उतने अन्य सदस्य हो सकते हैं, जितनी सरकार आवश्यक समझे।
नियुक्ति
कैट में एक अध्यक्ष और 65 सदस्य शामिल होते हैं। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
योग्यता
• प्रशासनिक अधिकारियों के लिए यह शर्त है, कि वह दो वर्षों तक सचिव के पद पर रह चुके हों।
• न्यायिक अधिकारी के लिए यह आवश्यक है, कि वह उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की योग्यता रखता हो।
कार्यकाल
सभी सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। अध्यक्ष की अधिकतम उम्र 65 वर्ष एवं सदस्यों की 62 वर्ष होती है।
सदस्यों को हटाया जाना
• अधिकरण की सदस्यों को कदाचार व असमर्थतता के आधार पर न्यायिक परीक्षण के उपरांत राष्ट्रपति द्वारा हटाया जाता है। हटाने की प्रक्रिया संसद विधि द्वारा निर्धारित करती है।
• वर्तमान समय में देश में कुल सत्रह (17) प्रशासनिक अधिकरण हैं। इनकी प्रधान पीठ दिल्ली में है। केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण की अधिकारिता से बाहर सेवक निम्नलिखित कर्मचारी केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण की अधिकारिता के अंतर्गत नहीं आते हैं
(i) सेना के कर्मचारी।
(ii) लोक सभा एवं राज्य सभा सचिवालय के सेवक।
(iii) उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के पदाधिकारी।
अन्य अधिकरण (अनुच्छेद-323 (B))
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अनुच्छेद-323 (B) के तहत विधायिकाओं को यह अधिकार है, कि वे निम्नलिखित मामलों को सुलझाने हेतु अधिकरणों का निर्माण कर सकती हैं
(i) करारोपण से संबंधित विवाद।
(ii) विदेशी विनिमय और आयात-निर्यात विवाद।
(iii) औद्योगिक और श्रमिक विवादों का समाधान।
(iv) भूमि सुधार एवं अधिग्रहण से संबंधित वाद।
(v) शहरी संपत्ति की सीलिंग।
(vi) संसद या विधान सभाओं से संबंधित विवादों का समाधान।
राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण
स्थापना

• राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण की स्थापना वर्ष-2010 में हुई।
उद्देश्य
• पर्यावरणीय संरक्षण तथा वन के संरक्षण से संबंधित वादों को त्वरित और प्रभावी रूप में हल करने के लिए एक विशेषज्ञ संस्था की स्थापना की गयी। पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन के कारण होने वाले जन और धन के नुकसान के मुआवजे का प्रावधान किया गया।
संरचना
• इसकी मुख्य बेंच 'नई दिल्ली' में स्थित है, जबकि इसकी क्षेत्रीय शाखाएँ पुणे, भोपाल, चेन्नई और कोलकाता में स्थित हैं।
सदस्य
NGT में अध्यक्ष, न्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य शामिल होते हैं, जिनका कार्यकाल 5 वर्षों का होता है। अधिकरण में कम-से-कम 10 और अधिकतम 20 पूर्णकालिक न्यायिक सदस्य एवं विशेषज्ञ सदस्य हों।
न्याय का तरीका
NGT प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत पर कार्य करती है।
अपील
न्यायाधिकरण के समक्ष आने वाले मामलों को छ: (6) महीने की अवधि में हल कर लिया जाएगा और उच्चतम न्यायालय में निर्णय देने के 90 दिन की अवधि में अपील किया जा सकता है।
शक्तियाँ-
न्यायाधिकरण को सिविल न्यायपालिका की शक्तियाँ प्राप्त हैं। इसके द्वारा पर्यावरणीय मुद्दे और उससे संबंधित नियमों के क्रियान्वयन से जुड़े हुए मुद्दे लाए जाते हैं।
लोक अदालतें
उद्देश्य

• इन अदालतों की स्थापना 'विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987' के तहत की गई।
• इन अदालतों का ध्येय आपसी बातचीत के माध्यम से विवादों का निपटारा करना है। यदि दोनों पक्ष सहमत हों, तो दूसरी अदालतों में चल रहे मुकद्दमे लोक अदालतों में हस्तांतरित कर समझौते का प्रयास किया जाता है।
• इन अदालतों में कोई शुल्क नहीं लगता। समझौते की स्थिति में दोनों पक्षों के शुल्क वापस कर दिए जाते हैं।
संरचना
• वर्ष-2002 तक ये अदालतें अस्थायी रूप से कार्य करती थीं। वर्ष-2002 में इस अधिनियम में संशोधन करके लोक अदालतों को स्थायी बना दिया गया।
• इन अदालतों की अध्यक्षता एक न्यायाधीश द्वारा की जाती है तथा इसमें दो अन्य सदस्य होते हैं। जरूरी नहीं है, कि ये सदस्य न्यायाधीश हों, सामान्यतः एक वकील तथा एक सामाजिक कार्यकर्ता इन अदालतों का सदस्य होता है।
कार्य
• लोक अदालतों को दीवानी अदालतों की मान्यता प्राप्त है, यह उन आपराधिक मामलों को भी देख सकते हैं, जिनकी प्रकृति समझौते योग्य (Compoundable) है।
• ये अदालतें पारंपरिक अदालतों से अलग तरह से काम करती हैं, इसमें सुलह समझौता को वरीयता दी जाती है। ये अदालतें अधिकतर सिविल मामलों को देखती हैं। भूमि विवाद, संपत्ति संबंधी विवाद, पारिवारिक विवाद इत्यादि मुकद्दमों को इन अदालतों के तहत लाया जाता है। आपसी सहमति से समझौते होने के कारण इन अदालतों के निर्णयों के खिलाफ अपील नहीं हो सकती है।
ग्राम न्यायालय
प्रष्ठभूमि

• न्याय प्रणाली को आम जन-मानस के निकट ले जाने के लिये संविधान के अनुच्छेद 39-A के अनुरूप ‘ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008’, संसद में पारित किया।
• इसके तहत 2 अक्तूबर, 2009 से कुछ राज्यों में ग्राम न्यायालयों ने कार्य करना शुरू किया।
संरचना
• प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट स्तर का न्यायाधीश होता है जिसे ‘न्यायाधिकारी’ कहा जाता है।
नियुक्ति
• न्यायाधीश की नियुक्ति संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के परामर्श से राज्य सरकार करती है।
कार्यक्षेत्र
• ग्राम न्यायालय सिविल और आपराधिक दोनों प्रकार के मामले देखता है। यह आपराधिक मामलों में उन्हीं को देखता है जिनमें अधिकतम 2 वर्ष की सज़ा होती है।
अपील
आपराधिक मामलों में अपील सत्र न्यायालय में की जा सकती है व दीवानी मामलों में अपील ज़िला न्यायालय के पास की जाएगी, जिसकी सुनवाई और निपटान अपील दायर करने की तारीख से छह महीने के भीतर किया जाएगा।
प्ली बार्गेनिंग
प्ली बार्गेनिंग, वादी व प्रतिवादी के मध्य एक प्रकार का समझौता है, जिसमें अपराधी अपने गुनाह को इस शर्त पर स्वीकार कर लेता है, कि उसे कम सजा दी जायेगी एवं इसमें बचाव पक्ष व अभियोजन पक्ष अदालत से बाहर समझौता कर सकते हैं तथा अपराधी अपना अपराध कबूल करता है। अतः अपराधी को निर्धारित दण्ड से कम दण्ड दिया जाता है।
उद्देश्य
• इसका उद्देश्य, अदालत और संबंधित पक्षों के समय और धन की बचत करना है।
• यह व्यवस्था केवल उन मामलों में लागू होती है, जिनमें अधिकतम 7 वर्षों का कारागार हो सकता है तथा महिलाओं व बच्चों के खिलाफ अपराधों में लागू नहीं होता है।
कुटुम्ब न्यायालय
• ये पारिवारिक विवादों के निराकरण के लिए गठित विशेष प्रकार के न्यायालय हैं
• यह न्यायालय विवाद, तलाक, भरणपोषण, संरक्षण एवं पति-पत्नी की संम्पति से संबंधित वादों का निराकरण करते हैं।
• पारिवारिक विवादों के निराकरण के लिए कुटुम्ब न्यायालय अधिनियम, 1984 ( Family Courts Act, 1984 ) पारित किया गया था और इसी के तहत इन न्यायालयों का गठन किया गया था।
• इनका गठन उन शहरों में किया जाता है जिनकी जनसंख्या 10 लाख या उससे ज्यादा होती है।
• इन न्यायालयों के फैसले कि अपील उच्च न्यायालय में ही कि जा सकती है।