राजस्थान खनिज सम्पदा की दृष्टि से एक सम्पन्न राज्य है। देश के खनिज क्षेत्र में राजस्थान प्रमुख राज्य होने के कारण ‘खनिजों का अजायबघर’ कहा जाता है।
राजस्थान के अरावली पर्वतमाला क्षेत्र तथा दक्षिण-पूर्वी पठारी भाग में खनिज प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।
राज्य में 81/82 प्रकार के खनिज पाए जाते हैं उनमें से वर्तमान में 57 प्रकार के खनिजों का उत्पादन हो रहा है।
खनिज-जो पदार्थ प्राकृतिक रूप में उपलब्ध हैं और जिनकी निश्चित आंतरिक संरचना होती है।
खनिज से तात्पर्य वे पदार्थ जो जमीन या चट्टानों से खोदकर निकाले जाते हैं तथा अयस्क वे खनिज जिनसे धातु प्राप्त की जाती है।
खनिजों की विविधता की दृष्टि से भारत में राजस्थान का प्रथम स्थान है।(खनिज भण्डारण)
खनिज उत्पादन की दृष्टि से भारत में राजस्थान का तीसरा स्थान है। (प्रथम – झारखण्ड, द्वितीय-मध्य प्रदेश)
खनिजों से आय की दृष्टि से भारत में राजस्थान का पाँचवाँ स्थान है।
राजस्थान में पाए जाने वाले खनिजों को मुख्यत: दो प्रकार के खनिजों में वर्गीकृत किया जाता है-
धात्विक खनिज – ऐसे खनिज जिनसे धातुएँ प्राप्त होती है धात्विक खनिज कहलाते हैं।
धात्विक खनिज लौह और अलौह दोनों प्रकार के होते हैं जैसे- लौहा, मैंगनीज, सीसा-जस्ता, चाँदी, ताँबा, सोना, बॉक्साइट आदि
अधात्विक खनिज – ऐसे खनिज जिनमें धातुएँ नहीं पाई जाती है जैसे- अभ्रक, पोटाश, नमक, बेन्टोनाइट, वोलेस्टोनाइट आदि।
आणविक खनिज – ऐसे खनिज जिनके प्रयोग द्वारा ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है। जैसे- यूरेनियम, थोरियम, लिथियम, बेरिलियम।
ईंधन खनिज – इस श्रेणी में कोयला, लिग्नाइट, प्राकृतिक गैस तथा पेट्रोलियम पदार्थों को सम्मिलित किया जाता है।
लौह धात्विक खनिज
लौह अयस्क – ऐसे अयस्क जिनमें लौह ऑक्साइड की मात्रा अधिक होती है। पृथ्वी के भूगर्भ में सर्वाधिक मात्रा में पाया जाने वाला धात्विक अयस्क लौह अयस्क है। भारत में लौह अयस्क कुडप्पा तथा धारवाड़ क्रम की चट्टानों में पाया जाता है। राजस्थान में धारवाड़ क्रम की चट्टानों में अरावली पर्वतीय प्रदेश में लौह अयस्क पाया जाता है।
मुख्यत: लौह अयस्क चार प्रकार का होता है-
मेग्नेटाइट - भारत में मेग्नेटाइट के सर्वाधिक भण्डार कर्नाटक में (72%) तथा राजस्थान में (6%) पाए जाते है। मेग्नेटाइट सर्वश्रेष्ठ किस्म का लौह अयस्क होता है किन्तु भारत में कम पाया जाता है। इसे काला लोहा भी कहते है इसमें लौह अयस्क की मात्रा 72% तक होती है। राजस्थान में मेग्नेटाइट किस्म भीलवाड़ा व सीकर जिले में पाई जाती हैं।
हेमेटाइट – इसमें 60-70% तक लौह अयस्क पाया जाता है। भारत में हेमेटाइट के सर्वाधिक भण्डार राजस्थान में पाए जाते हैं। राजस्थान में हेमेटाइट प्रकार का लोहा-जयपुर, दौसा, अलवर आदि में पाया जाता है। यह लाल/गेरुआ रंग का लौह अयस्क है। राजस्थान तथा भारत में सर्वाधिक हेमेटाइट प्रकार का लौह अयस्क पाया जाता है।
लिमोनाइट - इसे जलयोजित लोहा भी कहते हैं। इसमें 45 - 50% तक लौह अयस्क पाया जाता है। यह निम्न कोटि का लौह अयस्क होता है। लिमोनाइट व सिडेराइट का कोई आर्थिक महत्व नहीं होता है।
सिडेराइट – यह अत्यन्त ही निम्न कोटि का लौह अयस्क होता है। इसमें 45 % से भी कम लौह अयस्क पाया जाता है। यह भूरा लोहा होता है।
♦ राजस्थान में लौह अयस्क उत्पादक क्षेत्र
राजस्थान में सर्वाधिक हेमेटाइट प्रकार का लौह अयस्क पाया जाता है।
जयपुर के (मोरीजा बानोला)
दौसा के (नीमला राइसेला)
झुंझुंनूँ के (डाबला - सिंघाना)
मेग्नेटाइट प्रकार का लौह अयस्क
उदयपुर के नाथरा की पाल व थुर हुण्डेर में
भीलवाड़ा के पुर – बनेड़ा में पाया जाता है।
Note – लौह अयस्क के उत्पादन में भारत में राजस्थान का सातवाँ स्थान है।
लौह अयस्क का सर्वाधिक उत्पादन जयपुर में तथा सर्वाधिक भण्डार उदयपुर में है।
भीलवाड़ा के तिरंगा क्षेत्र में भी लौह अयस्क का उत्पादन प्रारंभ किया जाना प्रस्तावित है।
मैंगनीज
मैंगनीज लौह धात्विक खनिज है जो धारवाड़ क्रम की चट्टान/अरावती पर्वतीय प्रदेश में पाया जाता है।
मैंगनीज का मुख्य अयस्क – पाइरोलुसाइट है जो कि राजस्थान में मुख्यत: बाँसवाड़ा में पाया जाता है।
मैंगनीज को ‘Jack of All Trades’ कहा जाता है क्योंकि यह भारत में औद्योगिक इकाइयों की आधारशिला है।
इस्पात निर्माण, रासायनिक उधोग तथा सूखे सेल में मैंगनीज प्रयुक्त होता है।
मैंगनीज के उत्पादन तथा भण्डारण के दृष्टि से राजस्थान का देश में 8 वाँ स्थान है।
राजस्थान में मैंगनीज प्राप्ति के प्रमुख स्थान – बाँसवाड़ा- लीलवाना, तलवाड़ा नरड़िया
राजसमन्द – नगेड़िया
उदयपुर - छोटीसार, बड़ी सार
अलौह धात्विक खनिज
ताँबा (ताम्र धातु)
मानव द्वारा प्रयुक्त सबसे पहली धातु ताँबा है। जिसे कॉपर पाइराटीज कहते हैं।
ताँबे का रंग लाल भूरा होता है तथा यह आग्नेय, अवसादी, कायान्तरित चट्टानों से प्राप्त होता है।
ताँबा लचीला तथा विद्युत का उत्तम सुचालक होने के कारण विद्युत उपकरणों में अत्यधिक उपयोगी है।
ताँबा भण्डारण की दृष्टि से राजस्थान प्रथम स्थान तथा उत्पादन की दृष्टि से राजस्थान दूसरे स्थान पर है।
झुंझुनूँ को राजस्थान का ताँबा जिला, गणेश्वर सभ्यता (सीकर) को ताम्र सभ्यता की जननी तथा आहड़ (उदयपुर) को ताम्र नगरी कहते हैं।
राजस्थान में ताँबा प्राप्ति स्थल –
खेतड़ी – झुंझुनूँ,
सिंघाना – झंझुनूँ (मदान कुदान क्षेत्र में सर्वाधिक भण्डार मिले।)
खो दरीबा – अलवर
बीदासर – चुरू
पुर बनेड़ा – भीलवाड़ा
मीरा का नांगल क्षेत्र – सीकर
बन्ने वालों की ढाणी – सीकर
सीसा-जस्ता
सीसा – जस्ता को जुड़वाँ खनिज भी कहा जाता है।
राजस्थान का सीसा – जस्ता के उत्पादन में एकाधिकार है।
राज्य में सीसा – जस्ता में देश के कुल भण्डारों क 89% है।
राजस्थान में सीसा – जस्ता के प्रमुख भण्डार उदयपुर, राजसमंद, भीलवाड़ा, सवाई माधोपुर हैं।
सीसा का अयस्क – गेलेना तथा पाइरोटाइट है।
जस्ते का अयस्क – कैलेमीन, जिंकाइट व विलेमाइट है।
जस्ता गलाने पर उपउत्पादक कैडमियम तथा कोबाल्ट के रूप में प्राप्त होते हैं।
सीसा व जस्ता के साथ सामान्यत: चाँदी भी मिलती है।
सीसा – जस्ता व चाँदी की विश्व की सबसे पुरानी खान जावर खान (उदयपुर) है।
जावर खान में 14 वीं शताब्दी में मेवाड़ के महाराणा लाखा के शासन काल में खनन कार्य प्रारंभ हो गया था।
हिंदुस्तान जिंक लि. भारत की सबसे बड़ी सीसा-जस्ता चाँदी का खनन करने वाली कम्पनी है।
राजस्थान में सीसा – जस्ता की निम्न खानें या प्राप्ति स्थल है-
रामपुरा – आगुचा – भीलवाड़ा (गुलाबपुरा)
राजपुरा – दरीबा – राजसमंद
देबारी – उदयपुर
जावर खान - उदयपुर (सीसा – जस्ता के साथ चाँदी भी)
चौथ का बरवाड़ा – सवाई माधौपुर
गुढ़ा किशोरीदास क्षेत्र – अलवर
सिंदेसर खुर्दखान – रेलमगरा (राजसमंद)
♦ हिंदुस्तान जिंक लि. द्वारा राजस्थान में निम्न जिंक स्मेलटर प्लान्ट स्थापित किए गए-
चंदेरिया सीसा - जस्ता स्मेलटर, चित्तौड़गढ (ब्रिटेन के सहयोग से)
दरीबा स्मेलटर - राजसमंद
देबारी जिंक स्मेलटर – उदयपुर
चाँदी
राजस्थान में सामान्यत: सीसा-जस्ता के साथ मिश्रित धातु के रूप में चाँदी पाई जाती है। राजस्थान के उदयपुर जिले में जावर में तथा भीलवाड़ा के रामपुरा आगुचा में सीसा-जस्ता के साथ चाँदी भी निकाली जाती है। उदयपुर में जावर खान में 14 वीं शताब्दी में राणा लाखा के समय चाँदी की खान प्राप्त हुई थी।
चाँदी के भण्डारण व उत्पादन की दृष्टि से भारत में राजस्थान प्रथम स्थान है।
देश के चाँदी के कुल भण्डार में 87% भण्डार राजस्थान में है।
सिंदेसर खुर्द खान-रेलमगरा (राजसमंद) में चाँदी का उत्पादन अधिक मात्रा में हो रहा है।
सोना (स्वर्ण भण्डार)
सर्वप्रथम राजस्थान में स्वर्ण भण्डारों की खोज आस्ट्रेलियाई कम्पनी (इण्डो गोल्ड) ने की।
सोना सबसे कम क्रियाशील धातुओं में आता है इसके कारण यह प्रकृति में स्वतंत्र अवस्था में पाया जाता है। तथा यह अत्यन्त लचीला होने के कारण इसमें ताँबे की अशुद्धि मिलाई जाती है। स्वर्ण का कोई अयस्क नहीं होता है।
♦ स्वर्ण भण्डार प्राप्ति स्थल –
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आनंदपुर भूकिया – बाँसवाड़ा जगतपुरा भूकिया - बाँसवाड़ा तिमरान माता - बाँसवाड़ा खेड़ा – राजपुरा - उदयपुर |
टंगस्टन
टंगस्टन कठोर व उच्च गलनांक वाली धातु है। यह मुख्यत: विद्युत बल्बों के तंतु (फिलामेंट), अस्त्र शस्त्रों तथा युद्ध के टैंक बनाने में प्रयुक्त किया जाता है।
इसका प्रमुख अयस्क – वुल्फ्रेमाइट है।
राजस्थान में टंगस्टन प्राप्ति स्थल –
डेगाना – नागौर (राजस्थान में सर्वाधिक उत्पादन तथा देश की सबसे बड़ी टंगस्टन की खान है)
नानाकराब – पाली
वाल्दा क्षेत्र – सिरोही
आबू, रेवदर – सिरोही
Note – टंगस्टन की डेगाना खान को हिंदुस्तान जिंक लि. को दिया गया था लेकिन अभी वर्तमान में उत्पादन बंद है।
डेगाना स्थित खानदेश एकमात्र खान है जहाँ अभी टंगस्टन का उत्पादन हो रहा है।
बॉक्साइट
बॉक्साइट एल्युमिनियम का एक अयस्क है। एल्युमिनियम उद्योग में प्रमुख स्त्रोत बॉक्साइट है।
राजस्थान में इसके कुछ भण्डार बाराँ के माजोला, सहरोल, व शाहबाद तहसील में पाए गए हैं।
अधात्विक खनिज
राजस्थान अधात्विक खनिजों की दृष्टि से समृद्ध है। यहाँ अनेक प्रकार के अधात्विक खनिज पाए जाते हैं जिन्हे हम विभिन्न श्रेणियों में निम्नांकित रूप से विभक्त कर सकते हैं-
राजस्थान के प्रमुख अधात्विक खनिज –
(1) जिप्सम :- जिप्सम को सेलखडी, हरसौंठ व खड़िया मिट्टी भी कहते हैं।
भारत में राजस्थान जिप्सम का सर्वाधिक उत्पादन करता है, जो कि देश का उत्पादन का 94% है।
जिप्सम का उपयोग उर्वरक, प्लास्टर ऑफ पेरिस, सीमेंट, रंग रोगन तथा क्षारीय भूमि के उपचार में किया जाता है।
बीकानेर के जामसर में सबसे बडे़ जिप्सम भण्डार हैं।
राजस्थान में जिप्सम के प्राप्ति स्थल :-
बीकानेर- जामसर, लूणकरणसर, बिसरासर, पूंगल, हरकासर
नागौर – गोठ मांगलोद
बाड़मेर- कुरला, श्योकर, उत्तरलाई, कवास और पीर की ढाणी
गंगानगर- सूरतगढ, अनूपगढ़, घड़साना
हनुमानगढ- पल्लू (रावतसर), बड़ोपल
जैसलमेर- मोहनगढ़
पाली-खूटानी
अलवर-खुशखेडा
(2) रॉक फास्फेट :
रॉक फास्फेट एक उर्वरक खनिज है। रॉक फास्फेट का प्रयोग रासायनिक खाद (सुपर फास्फेट) के निर्माण तथा लवणीय भूमि के उपचार में होता है।
रॉक फास्फेट के उत्पादन में देश में राजस्थान का प्रथम स्थान है। राजस्थान में सर्वाधिक रॉक फास्फेट झामरकोटड़ा (उदयपुर) से निकलता है।
झामरकोटड़ा (उदयपुर) से RSMML द्वारा तथा माटोन (उदयपुर) से हिदुस्तान जिंक लिमिटेड द्वारा रॉक फास्फेट निकाला जाता है।
राजस्थान में रॉक फास्फेट के प्राप्ति स्थल-
उदयपुर- झामरकोटड़ा, माटोन, सीसारमा, भींडर
जैसलमेर- बिरमानिया व लाठी क्षेत्र
जयपुर- अचरोल
बाँसवाडा- सलोपत
सीकर-कानपुरा
(3) ऐस्बेस्टस :
ऐस्बेस्टस एक रेशेदार चमकदार सिलीकेट खनिज है तथा यह अग्नि व विद्युत का कुचालक होता है
क्राइसोटाइल,एस्बेस्टस, ट्रेमोलाइट, एकटिनोलाइट, एम्फीबोल तथा एन्थोफिलाइट की किस्मे है।
क्राइसोटाइल सबसे उत्तम किस्म का ऐस्बेस्टस होने के कारण सबसे अधिक उपयोग में लिया जाता है।
ऐस्बेस्टस सीमेंट की चादरें, पाइप, भवन निर्माण सामग्री व रासायनिक उद्योगो में प्रयुक्त होता है।
राजस्थान में प्राप्ति स्थल :-
उदयपुर-ऋषभदेव (अच्छी किस्म क्राइसोटाइल पाई जाती )
उदयपुर झाडोल (एन्थोफिलाइट ट्रेमोलाइट)
राजसमंद- देवगढ, आमेट, कुंभलगढ तहसील
अजमेर-कंवलाई, अर्जुनपुरा, कोटडा
भीलवाडा-आसीन्द
डूँगरपुर- जाडोल, देवल
(4) फेल्स पार :
देश में फेल्सपार में सर्वाधिक भंडार राजस्थान (90%) में है और राजस्थान में अजमेर जिले से (95%) फेल्सपार प्राप्त होता है। फेल्सपार खनिज की उत्पत्ति अभ्रक की खानों से सह उत्पाद के रूप में होती है।
फेल्सपार सोडियम, पोटाश व कैल्शियम का सिलिकेट है। राज्य में यह खनिज अरावली पहाडियों की पेग्मेटाइट में पाया जाता है।
फेल्सपार का उपयोग सिरेमिक उद्योग, चीनी के बर्तन, टाइल्स बनाने, सफेद सीमेंट तथा काँच उद्योग में किया जाता है।
राजस्थान में फेल्सपार के प्राप्ति स्थल :-
अजमेर- मकरेडा, बांदरसिंदरी , ब्यावर, जवाजा, मसूदा, पीसांगन, लोहागल
भीलवाड़ा- जहाजपुर
पाली- चानोदिया
(5) अभ्रक :
राजस्थान का अभ्रक में द्वितीय स्थान है (प्रथम-आंध्रप्रदेश)
राजस्थान में सर्वाधिक अभ्रक का उत्पादन भीलवाड़ा जिले में तथा अभ्रक ईंट निर्माण उद्योग भी राजस्थान में भीलवाडा में है।
सर्वाधिक अभ्रक उत्पादन भीलवाड़ा में होने से भीलवाड़ा को अभ्रक नगरी/माइका सिटी के नाम से जाना जाता है।
अभ्रक पूर्णत तापरोधी व विद्युत रोधक होता है। अभ्रक मुख्यत: ताप भट्टियों में, इलेक्ट्रानिक सामान के निर्माण में तथा वायुमान की खिडकियाँ बनाने में प्रयुक्त होता है।
सफेद अभ्रक को रूबी तथा गुलाबी अभ्रक को बायोटाइट कहते है।
अभ्रक के चूरे से चादरें बनाना माइकेनाइट कहलाता है।
राज्य में अभ्रक के प्राप्ति स्थल –
भीलवाडा- दांता, मांडल, टूंका, बनेड़ा, फूलिया, शाहपुरा
अजमेर-अराई, बाघसूरी, रामसर, पारा, केसरपुरा
राजसमंद व टोंक
(6) फ्लोर्सपार/फ्लोराइट :
फ्लोर्सपार को फ्लोराइट भी कहते है
फ्लोराइट का उपयोग कीटनाशक दवाई बनाने में होता है
फ्लोर्सपार का सर्वाधिक उत्पादन माण्डो की पाल(डूँगरपुर) मे होता है।
फ्लोर्सपार के भंडारण में राजस्थान दूसरा तथा उत्पादन में तीसरे स्थान पर है।
जालोर के भीनमाल तहसील के कराड़ा गाँव में फ्लोर्सपार के बडे़ भण्डार मिले हैं।
फ्लोर्सपार उदयपुर के काला मगरा व झालरा क्षेत्र तथा अजमेर के मुंडोती, तिलोरा व रिछमालिया क्षेत्र में भी पाया जाता है।
(7) डोलोमाइट :
कैल्शियम और मैग्नीशियम युक्त चूना पत्थर को डोलोमाइट कहते है।
राजस्थान में डोलोमाइट का सर्वाधिक उत्पादन उदयपुर व राजसमंद में होता है।
डोलामाइट का उपयोग लोहा-इस्पात उद्योगो में तथा फर्श के लिए पाउडर बनाने में किया जाता है।
डोलोमाइट के नवीन भणडार राजसमंद में मिले हैं।
डोलामाइट के प्राप्ति स्थल :
बाँसवाडा-विट्ठलदेव, त्रिपुरा सुन्दरी
उदयपुर- धारियावाद, ईसवाल
राजसमंद- नाथद्वारा, हल्दीघाटी , तलाई
अलवर, सीकर, झुंझुनूँ, भीलवाडा नागौर जिलों में भी डोलोमाइट के निक्षेप है।
(8) बेन्टोनाइट :
बेन्टोनाइट का उपयोग तेल शोधन कारखानों में खनिज तेलो को साफ करने में होता है। बेन्टोनाइट दो प्रकार का है-
सोडियम बेन्टोनाइट तथा कैल्शियम बेन्टोनाइट जो मुल्तानी मिट्टी की ही तरह होता है।
बेन्टोनाइट उत्पादन में राजस्थान का दूसरा स्थान है।(प्रथम गुजरात)
राजस्थान में बाड़मेर जिले में शिव तहसील सर्वाधिक बेन्टोनाइट उत्पादित होता है।
बेन्टोनाइट प्राप्ति स्थल- बाड़मेर, बीकानेर,झालावाड़ आदि है।
(9) पाइराइट्स :
पाराइट्स का उपयोग गंधक का तेजाब व उर्वरक बनाने में किया जाता है
राजस्थान में पाइराइट्स केवल सीकर के सलादीपुरा में पाया जाता है।
(10) केल्साइट:
केल्साइट का सर्वाधिक उत्पादन राजस्थान में (98%) होता है
केल्साइट मुख्यत: काँच व सिरेमिक उद्योग, ब्लीचिंग पाउडर आदि में प्रयुक्त होता है।
उदयपुर के गोगुन्दा व कोटडी तहसील में तथा सिरोही के पिंडवाडा तहसील में केल्साइट के भण्डार पाए जाते हैं।
(11) वर्मीक्यूलाइट:
यह ताप रोधी व ध्वनि रोधी होती हैं। राजस्थान में वर्मीक्यूलाइट का उत्पादन अजमेर में होता है।
(12) मैग्नेसाइट:
यह मैग्नीशियम का स्त्रोत है इसका उपयोग फर्टिलाइजर व खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में होता है।
राजस्थान में अजमेर के सरूपा, छाजा, गाफा क्षेत्र तथा डूँगरपुर व पाली में इसका उत्पादन होता है।
(13) बेराइट्स:
बेराइट्स बेरियम सल्फेट होता है जिसका उपयोग पेट्रोलियम उद्योग, तेल कुँओं की ड्रिलिंग मड बनाने ,पेंट उद्योग तथा कागज उद्योग में किया जाता है।
राजस्थान में बेराइट्स के सबसे बडे भण्डार उदयपुर तथा अलवर में है।
उदयपुर- गिर्वा, बाबरमल
अलवर- भानखेडा़ (बेराइ्टस का भण्डार)
(14) क्वार्ट्ज:
क्वार्ट्ज अर्थात स्फटिक पृथ्वी के भू-पर्पटी(क्रस्ट) पर सर्वाधिक पाया जाने वाला दूसरा खनिज है। (प्रथम-फेल्सपार) क्वार्ट्ज रंगहीन, पारदर्शी व कठोर खनिज होता है। क्वार्ट्ज का प्रयोग घड़ी बनाने तथा शिवलिंग और मूर्तियाँ बनाने में किया जाता है।
राजस्थान में क्वार्ट्ज का उत्पादन अजमेर व भीलवाड़ा में होता है।
(15) सिलिका सैंड/काँच बालुका:
सिलिका सैण्ड का उपयोग काँच बनाने में होता है इसलिए इसे काँच बालुका भी कहते है।
राजस्थान में सर्वाधिक सिलिका का उत्पादन जयपुर में होता है तथा राज्य में उत्पादित सिलिका का उपयोग धौलपुर की काँच फैक्ट्री में किया जाता है।
सिलिका सैण्ड प्राप्ति स्थल –
जयपुर
बाराँ-अटरू व छबड़ा
बाडमेर-शिव तहसील
बूँदी-बारोदिया
(16) गार्नेट/तामड़ा:
यह बहुमूल्य लाल, गुलाबी रंग का पत्थर है जो आभूषणों में प्रयुक्त होता है।
इसे रक्तमणि या फिरोजा भी कहते है यह दो प्रकार का होता है। (एब्रेसिव व जेम)
राजस्थान में जेम गार्नेट होता है टोंक, अजमेर, भीलवाड़ा में।
अजमेर के सरवाड़ – बाघसूरी, चौरसियावास, बांदनवाड़ा आदि क्षेत्रों में गार्नेट पाया जाता है।
भीलवाड़ा में एब्रेसिव गार्नेट के बडे़ भण्डार हैं।
गार्नेट मुख्यत: अजमेर के सरवाड़ तथा टोंक के राजमहल मे पाया जाता है।
(17) पन्ना (एमरल्ड):
पन्ना बेरिल नामक खनिज का प्रकार है जो हरे रंग का होता है।
राजस्थान जयपुर में पन्ने की अंतर्राष्ट्रीय मण्डी है। यहाँ पन्ने की पॉलिशिंग का काम होता है।
राजस्थान में पन्ना के भंडार
राजसमंद- कालागुमान, देवगढ़, कुंभलगढ़, नाथद्वारा, आमेट
अजमेर-बूबानी गाँव, राजगढ़
पन्ना का उपयोग – आभूषण आदि में किया जाता है।
Note : हाल ही में ब्रिटेन की माइनस मैनेजमैंट कम्पनी ने (बूबानी) अजमेर से देवगढ (राजसमंद) तक पन्ने की विशाल पट्टी का पता लगाया।
(18) सैण्ड स्टोन :
बलुआ पत्थर या बालुकाश्म (सैण्ड स्टोन) बालू के कणों का दवाब पाकर जम जाने से बनता है। बलुआ पत्थर में स्फटिक(क्वार्ट्ज) की बहुतायत होती है। बलुआ पत्थर दानेदार और छिद्रित होता है जिससे इसकी परतों में भूमिगत जल एकत्र हो जाता है। अत: ये महत्वपूर्ण जलस्त्रोत होते हैं।
राजस्थान में sand stone (बलुआ पत्थर) प्राप्ति स्थल
बंसी पहाडपुर (भरतपुर)
बाडी, बसे़डी (धोलपुर में गुलाबी सैण्ड स्टोन)
खैराबाद तहसील (कोटा में सफेद सेण्ड स्टोन)
राजस्थान में देश का 90% सैण्ड स्टोन उत्पादित होता है।
(19) घीया पत्थर/soap stone :
घीया पत्थर का उपयोग खिलौने, रंगीन पेन्सिल, टेलकम पाउडर, कीटनाशक आदि बनाने में होता है।
राजस्थान में राजसमंद, उदयपुर, दौसा, अजमेर, डूँगरपुर, बाँसवाडा, करौली जिलों में घीया पत्थर होता हैं।
(20) मुल्तानी मिट्टी/Bleaching clay :
भारत में सर्वाधिक मुल्तानी मिट्टी राजस्थान में मिलती है। राजस्थान में बाड़मेर व बीकानेर जिले में निकाली जाती है। मुल्तानी मिट्टी का सर्वाधिक प्रयोग सौदर्य प्रसाधनों में होता है।
(21) ग्रेनाइट:
ग्रेनाइट आग्नेय चट्टानो से प्राप्त होता है। देश में राजस्थान ही एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ विभिन्न रंगो का ग्रेनाइट मिलता है।
सर्वाधिक ग्रेनाइट राजस्थान में जालोर में मिलता है इस कारण जालौर को ग्रेनाइट सिटी भी कहते है।
गुलाबी व ग्रे ग्रेनाइट्र- जालोर
काला ग्रेनाइट- कालाडेरा- जयपुर
पीला ग्रेनाइट- पीथला गाँव – जैसलमेर
मरकरी लाल – सिवाणा, मुंगेरिया - बाड़मेर
जोधपुर, पाली तथा सिरोही में भी ग्रेनाइट पाया जाता है।
(22) पोटाश:
पोटाश का मुख्य अयस्क सिल्वानाइट है।
राजस्थान में देश के कुल पोटाश भण्डार का सर्वाधिक (91%) है।
राजस्थान के नागौर-गंगानगर बेसिन में हाल ही में 240 करोड़ टन पोटाश के भंडार मिले हैं जो 30,000 वर्ग किमी. में फैले हैं। जो विश्व में घोषित पोटाश के भंडार के पाँच गुना हो सकते हैं।
यह भंडार नागौर, गंगानगर, हनुमानगढ़ और बीकानेर के जिलों में फैला हुआ है।
(23) लैटराइट:
लैटराइट अधिकांशत: बॉक्साइट के साथ पाया जाता है।
लैटराइट मुख्यत: रोड मैटल व बिल्डिंग स्टोन के रूप में प्रयुक्त होता है।
राजस्थान में चित्तौड़गढ में लैटराइट की खान है।
चित्तौड़ के अलावा बाराँ, झालावाड़ में भी लैटराइट पाया जाता है।
(24) चूना पत्थर-लाइम स्टोन:
चूना पत्थर अवसादी शैलों में पाया जाने अधात्विक खनिज है।
चूना पत्थर के भण्डारों की दृष्टि से राजस्थान का देश में तीसरा स्थान है।
राजस्थान में सीमेंट ग्रेड, स्टील ग्रेड व केमीकल ग्रेड का चूना पत्थर पाया जाता है।
चित्तौड़गढ़ को राजस्थान का ‘lime stone district’ कहा जाता है
बाँसवाडा में सीमेंट ग्रेड व हाइग्रेड लाइमस्टोन पाया जाता है।
केमिकल ग्रेड का चूना पत्थर-सोजत,बिलाड़ा, बोरुन्दा (जोधपुर में)
स्टील ग्रेड – सोनू – जैसलमेर
हाल ही में – सबला – लोहारिया खनन क्षेत्र (डूँगरपुर) से लाइम स्टोन के भंडार मिले हैं।