अपवाह:- किसी नदी या निश्चित वाहिका द्वारा अपने साथ जल  का प्रवाह करना अपवाह कहलाता है।

अपवाह तंत्र :- किसी नदी एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा किसी क्षेत्र से जल को बहाकर ले जाना अपवाह तंत्र कहलाता है।

जल संभर/जल विभाजक :-  

जलग्रहण क्षेत्र :- किसी नदी द्वारा विशिष्ट क्षेत्र से जल बहाकर लाना या जल की प्राप्ति करना जल ग्रहण क्षेत्र कहलाता है।

राजस्थान में जल ग्रहण की दृष्टि से नदियों का सही क्रम-

(1)     बनास  (24.21%)- पूर्णत राजस्थान में बहने वाली सबसे लम्बी नदी  (480 km)

(2)     लूनी    (20.21%)

(3)     चम्बल (17. 18%)- राजस्थान की सबसे लम्बी नदी (966 km)

(4)     माही   (9.4%)

सतही  जल की दृष्टि से राजस्थान में नदियों का सही क्रम :-

भारत के कुल जल भण्डार का राजस्थान में जल (0.99%) मात्र (1%) है।  उसमें भी सतही जल (1.16%) तथा भूमिगत जल (1.70%) है।

राजस्थान में भूमिगत जल अधिक होने के कारण ही यहाँ सर्वाधिक सिंचाई कुओं और नलकूपों द्वारा की जाती है।

  1. चम्बल – राजस्थान की सबसे लम्बी बारहमासी नदी तथा राजस्थान का सबसे बड़ा नदी तंत्र है।
  2. बनास
  3. माही
  4. लूनी
  5. साबरमती

जल की उपयोगिता :- नदियों के जल का सर्वाधिक उपयोग पेयजल, सिंचाई, जल विद्युत उत्पादन, मत्स्य पालन जैव विविधता संरक्षण आदि में किया जाता है। जल की इन्ही उपयोगिताओं के आधार पर राजस्थान की नदियों का सही क्रम है :-

  1. चम्बल
  2. बनास
  3. माही
  4. साबरमती
  5. लूनी

जल की उपलब्धता की दृष्टि से राजस्थान में नदियों का क्रम

  1. चम्बल
  2. बनास
  3. माही
  4. लूनी
  5. साबरमती

1. राजस्थान में तीन प्रकार का अपवाह तंत्र पाया जाता है-

  1. आंतरिक प्रवाह तंत्र                   - 60%
  2. बंगाल की खाड़ी नदी तंत्र           - 24%
  3. अरब सागरीय नदी तंत्र              - 16%

(1) आंतरिक प्रवाह तंत्र:-

(2) आंतरिक प्रवाह तंत्र से संबंधित राजस्थान की प्रमुख नदियाँ:-

  1. घग्घर                     6  रूपनगढ़
  2. कांतली                   7  मेंथा
  3. काकनेय                 8  ढूंढ
  4. साबी                      9 खण्डेला
  5. रूपारेल                 10 खारी

(1) घग्घर नदी –शिवालिक नदी या इण्डो ब्रह्म नदी :-

घग्घर नदी की विशेषता :-

(2) कांतली नदी :-

(3) काकनेय नदी :-

(4) साबी नदी :-

(5) रूपारेल नदी :-

(6) रूपनगढ़ नदी :-

(7) मेन्था नदी :-

Note:-  मेन्था, ढूंढ, खारी, खण्डेला नदी उत्तर की ओर से सांभर झील में गिरती है। आंतरिक प्रवाह का सबसे अच्छा उदाहरण        सांभर झील है।

• वे नदियाँ जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपना जल अरब सागर में ले जाती है अरब सागरीय नदी तंत्र की नदियाँ कहलाती है।

• अरब सागरीय  नदी तंत्र राजस्थान के कुल अपवाह तंत्र का (16%) है। यह राजस्थान का सबसे छोटा अपवाह तंत्र है।

• अरब सागरीय नदी तंत्र की नदियाँ एश्चुरी (ज्वारनदमुख) का निर्माण करती है क्योंकि इन नदियों की गति तेज होती है तथा समुद्र से दूरी कम होने के कारण ये तीव्र वेग से समुद्र में गिरकर एश्चुरी का निर्माण करती है।

 

(1) लूनी नदी :-

लूनी नदी के अन्य नाम –

  1. वैदिक साहित्य में – मरूद्‌वृधा
  2. कालीदास में – अन्त: सलिला
  3. प्रारंभिक नाम – सागरमती (अजमेर)
  4. लवणवती नदी – लवण की मात्रा अधिक होने के कारण
  5. आधी खारी-आधी मीठी नदी – बालोतरा (बाड़मेर) तक लूनी का पानी मीठा रहता उसके बाद लूनी नदी में लवणता की मात्रा बढ़ जाती है।

लूनी नदी की विशेषताएँ –

लूनी नदी तंत्र से संबंधित परियोजनाएँ-

  1. जसवंतसागर बांध (पिचियाक बांध)-

लूनी नदी, बिलाडा़ (जोधपुर)

  1. जवाई परियोजना:-
  1. हेमावास बांध  :-
  1. बांकली बांध :-

Note :- हेमावास तथा बांकली बांध दोनो मध्यम श्रेणी की सिंचाई  परियोजना है।

लूनी की सहायक नदियाँ :-

  1. लीलड़ी - लूनी में मिलने वाली पहली सहायक नदी (सोजत-पाली)
  2. मीठड़ी - पाली
  3. बाण्डी – राजस्थान की सबसे प्रदूषित नदी (हेमावास-पाली)
  4. सूकडी़ – जालोर का सुवर्णिगिरी दुर्ग इसी नदी के किनारे  है। (देसुरी-पाली)
  5. जवाई – लूनी की सबसे लम्बी सहायक नदी इस पर

जवाई बांध बना हुआ है। जिसे मारवाड़ का अमृत सरोवर कहते है।

- जवाई की सहायक नदी मथाई नदी के किनारे रणकपुर    जैन मंदिर बने हुए है।

- जवाई नदी (सायला-जालोर) में खारी नदी आकर मिलती है जिसके पश्चात जवाई नदी सूकड़ी II के नाम से जानी जाती है।

  1. सागी    - जसवंतपुरा पहाडी़ (जालोर) से लूनी में सबसे अंत में मिलने वाली सहायक नदी है।
  2. जोजडी़ – लूनी की एकमात्र ऐसी सहायक नदी जो लूनी में दांयी ओर से आकर मिलती है और जिसका उद्गम अरावली की पहाडी़ नही है। ये नागौर के पोडलू गांव से निकलती है।

(2) पश्चिमी बनास नदी –

उद्गम   - नया सनवाड़ (सिरोही) से

प्रवाह क्षेत्र - सिरोही

समाप्ति  - कच्छ का रन ( गुजरात)

पश्चिमी बनास के किनारें गुजरात का डीसा शहर बसा है। इसकी सहायक नदी सीपू नदी है।

(3) साबरमती नदी –

उद्गम  –  अरावली पहाडी़ (झाडोल-उदयपुर)

प्रवाह क्षेत्र  –  उदयपुर

समाप्ति – खंभात की खाडी़ (गुजरात)

जल संरक्षण एवं संग्रहण-अरब सागरीय नदी तंत्र 

  1. माही नदी-

माही नदी की विशेषताएँ-

लिम्पूप नदी – मकर रेखा (\(23\frac12\%\) दक्षिणी अंक्षाश) को दो बार काटती है।

माही नदी की सहायक नदियाँ-

जाखम नदी-

सोम नदी-

इरू नदी-

अनास नदी -

माही नदी तंत्र से संबंधित परियोजना

  1. माही बजाज सागर परियोजना-

  1. कागदी पिकअप बांध -

  1. भीखाभाई सागवाडा़ परियोजना-

  1. कडाणा बाँध-

माही नदी की सहायक नदियों पर अन्य योजनाएँ-

  1. जाखम परियोजना- जाखम नदी-प्रतापगढ़

  2. अनास परियोजना-अनास नदी-बाँसवाड़ा

  3. सोम कागदर परियोजना- सोम नदी-उदयपुर

  4. सोम-कमला-अम्बा परियोजना-सोम नदी-डूंगरपुर

  1. पश्चिमी बनास नदी-

  1. साबरमती नदी-

साबरमती नदी की सहायक नदियाँ-

मानसी वाकल परियोजना-

सेई परियोजना-

  1. लूनी नदी-

- लूनी नदी की कुल लम्बाई 495 किमी है जबकि राजस्थान में लूनी नदी की लम्बाई 330 किमी है।

- लूनी नदी का उद्गम नाग पहाड़, पुष्कर (अजमेर) से होता है जहाँ इसका प्रारंभिक नाम सागरमती है।

- गोविन्दगढ़ (पुष्कर) से आने वाली सरस्वती नदी मिलने के बाद इसे लूनी कहते है।

- अजमेर के नाग पहाड़ से निकलकर नागौर, पाली, जोधपुर, बाड़मेर तथा जालोर के अर्द्वशुष्क क्षेत्रों में बहकर गुजरात के ‘कच्छ का रन’ में लूनी विलुप्त हो जाती है।

लूनी नदी के अन्य नाम –

  1. वैदिक साहित्य में – मरूद्‌वृधा

  2. कालीदास में – अन्त: सलिला

  3. प्रारंभिक नाम – सागरमती (अजमेर)

  4. लवणवती नदी – लवण की मात्रा अधिक होने के कारण

  5. आधी खारी-आधी मीठी नदी – बालोतरा (बाड़मेर) तक लूनी का पानी मीठा रहता उसके बाद लूनी नदी में लवणता की मात्रा बढ़ जाती है तो लूनी खारी हो जाती है।

लूनी नदी की विशेषताएँ –

लूनी नदी तंत्र से संबंधित परियोजनाएँ-

5. जसवंतसागर बांध (पिचियाक बांध)-

लूनी नदी, बिलाडा़ (जोधपुर)

6. जवाई परियोजना:-

7. हेमावास बांध  :-

8. बांकली बांध :-

Note :-हेमावास तथा बांकली बांध दोनो मध्यम श्रेणी की सिंचाई  परियोजना है।

लूनी की सहायक नदियाँ :-

  1. लीलड़ी - लूनी में मिलने वाली पहली सहायक नदी (सोजत-पाली)

  2. मीठड़ी - पाली

  3. बाण्डी – राजस्थान की सबसे प्रदूषित नदी (हेमावास-पाली)

  4. सूकडी़ – जालोर का सुवर्णिगिरी दुर्ग इसी नदी के किनारे है। (देसुरी-पाली)

  5. जवाई – लूनी की सबसे लम्बी सहायक नदी इस पर जवाई बांध बना हुआ है। जिसे मारवाड़ का अमृत सरोवर कहते हैं।

- जवाई की सहायक नदी मथाई नदी के किनारे रणकपुर जैन मंदिर बने हुए है।

- जवाई नदी (सायला-जालोर) में खारी नदी आकर मिलती है जिसके पश्चात जवाई नदी सूकड़ी II के नाम से जानी जाती है।

  1. सागी - जसवंतपुरा पहाडी़ (जालोर) से लूनी में सबसे अंत में मिलने वाली सहायक नदी है।

  2. जोजडी़ – लूनी की एकमात्र ऐसी सहायक नदी जो लूनी में दांयी ओर से आकर मिलती है और जिसका उद्गम अरावली की पहाडी़ नहीं है। ये नागौर के पोडलू गांव से निकलती है।

जल संरक्षण एवं संग्रहण-बंगाल की खाड़ी नदी 

 

बाणगंगा नदी-

चम्बल नदी-

चम्बल नदी की विशेषताएँ :-

  1. चम्बल नदी राजस्थान की एकमात्र नित्यवाही नदी है।

  2. चम्बल नदी राजस्थkन की सबसे लम्बी नदी है।

  3. चम्बल नदी राजस्थान में सतही जल, जल की उपलब्धता, जल की उपयोगिता की दृष्टि से सबसे बड़ी नदी है क्योंकि राजस्थान में सर्वाधिक नदियाँ चम्बल नदी तंत्र के अन्तर्गत आती है।

  4. चम्बल नदी पर चित्तौड़गढ़ में राजस्थान का सबसे ऊँचा जलप्रपात (चूलिया जलप्रपात) स्थित है।

  5. चम्बल नदी सर्वाधिक अवनालिका अपरदन /बीहड़/उत्खात स्थलाकृति के लिए प्रसिद्व है।

  6. चम्बल नदी हाड़ौती के पठार की मुख्य नदी है।

  7. चम्बल बेसिन में नवीन जलोढ़ मृदा (खादर) का विस्तार है।

चम्बल नदी से संबंधित परियोजनाएँ :-

चम्बल नदी घाटी परियोजना

 

चम्बल नदी की सहायक नदियाँ

 

चम्बल नदी में पश्चिम (बायीं ओर) से मिलने वाली सहायक नदियाँ -

  1. बामनी नदी/ब्राह्मणी नदी-

  1. कुराल नदी-

  1. बनास नदी-

बनास की सहायक नदियाँ-

  1. बेड़च/आहड़/आयड़ नदी

बेड़च नदी का उद्गम गोगुन्दा की पहाड़ियों (उदयपुर) से होता है तथा इसका प्रवाह क्षेत्र उदयपुर-चित्तौड़गढ़-भीलवाडा़ है।

बेड़च नदी बींगोद –भीलवाडा़ में बनास नदी में मिल जाती है।

विशेषता –

  1. मेनाल नदी-

  1. कोठारी नदी-

  1. खारी नदी-

चम्बल नदी में दायीं ओर (पूर्व) से मिलने वाली सहायक नदियाँ-

  1. पार्वती नदी-

  1. कालीसिंध नदी-

पूर्व से पश्चिम की ओर चम्बल में मिलने वाली सहायक नदियों का सही क्रम-

पार्वती-कुन्नु-कालीसिंध-क्षिप्रा-बामनी-कुराल-बनास

राजस्थान में पूर्व से पश्चिम की ओर चम्बल में मिलने वाली सहायक नदियों का सही क्रम-

पार्वती-कुन्नु-कालीसिंध- बामनी-कुराल-बनास
 

जल संरक्षण:-

पृथ्वी:-

  1. उत्तरी गोलार्द्ध:- 40 प्रतिशत जल मण्डल, 60 प्रतिशत स्थल मण्डल।

  2. दक्षिणी गोलार्द्ध:- 81 प्रतिशत जल मण्डल, 19 प्रतिशत स्थल मण्डल।

केन्द्रीय भू-जल प्राधिकरण की दृष्टि से राजस्थान के डार्क जोन:-

राजस्थान में जल संरक्षण

1. परम्परागत जल संरक्षण की विधि:- इस विधि में आगोर, झालरा, टोबा, मदार, जोहड़, नाडी, खड़ीन, टांका, बावड़ी, नेष्टा, कुई, तालाब, झील शामिल हैं।

2.  आधुनिक जल संरक्षण की विधि:- इस विधि के अंतर्गत रेन वाटर हार्वेस्टिंग (वर्षा जल संग्रहण), शुष्क कृषि पद्धति शामिल हैं।

परम्परागत वर्षा जल संरक्षण की विधियाँ:-

आगोर/पायतन:-

मदार:-

खड़ीन:-

नेष्टा/नेहटा/नेहड़/नेड़ा:-

झालरा:-

जोहड़:-

राजस्थान में परम्परागत जल संरक्षण की विधियाँ:-

नाड़ी:-

टोबा:-

कुई/बेरी:-

टाँका:-

राजस्थान में जल सरंक्षण

राजस्थान में परम्परागत जल संरक्षण विधियों में सर्वाधिक प्रचलित विधि झीलें हैं।

राजस्थान की झीलें

(A)राजस्थान में मीठे पानी की प्राकृतिक झील-

 

(1) पुष्कर झील (अजमेर)

पुष्कर झील की स्वच्छता हेतु वर्ष 1997 में कनाडा के सहयोग  सहयोग से 'पुष्कर गैप' परियोजना चलाई जा रही है।

राष्ट्रीय झील संरक्षण कार्यक्रम (2001) जो कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय (भारत सरकार) द्वारा झीलों के पुनरुद्धार, सौन्दर्यीकरण, संरक्षण तथा जल की गुणवता बढ़ाने हेतु संचालित किया जा रहा है। इसमें पुष्कर झील सहित राजस्थान की छह झीलें शामिल हैं।

(2) नक्की झील (माउण्ट आबू - सिरोही)

नक्की झील में टॉड रॉक (मेंढ़क के आकार की चट्टान) तथा  नन रॉक (घूँघट निकाले खड़ी महिला के आकार की चट्टान) सर्वाधिक प्रसिद्ध है।

(3) कोलायत झील (बीकानेर)

(4) गजनेर झील (बीकानेर)

राजस्थान की एकमात्र झील जो दर्पण के समान प्रतीत होती है। (प्रतिबिंब में गजनेर महल दिखाई देता है) गजनेर झील के पास ही गजनेर अभयारण्य बना है जो कि बटबड़ पक्षी के लिए प्रसिद्ध है।

(5) तलवाड़ा झील हनुमानगढ़

(6) तालछापर झील - चूरु

(7) नवलखा झील - बूँदी

(8) दुगारी/कनक सागर - बूँदी

(9) गैब सागर - डूँगरपुर

(10) मानसरोवर - झालावाड़

(11) कोडिला झालावाड़

(12) पीथमपुरी – सीकर

(B) राजस्थान की मीठे पानी की कृत्रिम झीलें:-

(1) जयसमंद झील/ढेबर झील (उदयपुर):-

(2) राजसमंद झील (राजसमंद):-

(3) पिछोला झील (उदयपुर):-

(1) जग मंदिर महल:-

(2) जगनिवास महल – इस महल का निर्माण महाराणा जगतसिंह द्वितीय ने करवाया था।

(4) फतेह सागर झील –उदयपुर:-

(5) आनासागर झील (अजमेर):-

(6) फॉय सागर झील (अजमेर):-

फॉय सागर झील का निर्माण अकाल राहत कार्य के दौरान अंग्रेज अधिकारी फॉय के निर्देशन में हुआ था।

(7) बाल समन्द झील- जोधपुर:-

बाल समन्द झील का निर्माण गुर्जर प्रतिहार शासक बालक राव (बाऊक) ने करवाया था।

(8) कायलाना झील – जोधपुर:-

इसका निर्माण जोधपुर के महाराजा सर प्रताप सिंह ने अकाल राहत कार्य के दौरान करवाया था।

(9) सिलीसेढ़ झील –अलवर:-

सिलीसेढ़ झील का निर्माण अलवर के महाराजा विनय सिंह ने करवाया था।

(10) जैत सागर –बूँदी

(11) राम सागर – धौलपुर

(12) तालाब शाही – धौलपुर

(13) तेज सागर – प्रतापगढ़

(14) मूल सागर – जैसलमेर

(15) अमर सागर - जैसलमेर

(16) गजरूप सागर – जैसलमेर

(17)  गढ़सीसर – जैसलमेर

(18) पन्नाशाह तालाब – झुंझुनूँ

राजस्थान की खारे पानी की झीलें

उत्तर पश्चिम राजस्थान में मुख्यत: खारे पानी की झीलें पाई जाती है जो कि टेथिस सागर का अवशेष है।

(1) कावोद झील – जैसलमेर:-

राजस्थान की सर्वश्रेष्ठ नमक उत्पादन झील है।

(2) लूणकरणसर झील – बीकानेर:-

राजस्थान/भारत की उत्तरतम खारे पानी की झील है।

(3) डीडवाना – नागौर:-

इस झील का नमक चमड़ा उद्योग तथा रंगाई छपाई उद्योग में

काम आता है।

(4) पचपदरा झील - बाड़मेर:-

(5) सांभर झील:-

राजस्थान में जल संरक्षण

परम्परागत जल संरक्षण विधियाँ

(1) तालाब

राजस्थान के प्रमुख तालाब

1.

गढ़सीसर तालाब

जैसलमेर

2.

बारेठा तालाब

भरतपुर

3.

एडवर्ड सागर

डूंगरपूर

4.

कीर्ति मोरी तालाब

बूंदी

5.

हिण्डोली तालाब

बूंदी

6.

तेजसागर तालाब

प्रतापगढ़

7.

मुरलिया तालाब

चितौड़गढ़

8.

वानकिया तालाब

चितौड़गढ़

9.

सोनापानी तालाब

चितौड़गढ़

10.

पदमिनी तालाब

चितौड़गढ़

11.

सरेरी  तालाब

भीलवाड़ा

12.

बड़ी तालाब

उदयपुर

13.

पन्ने शाह का तालाब

झुंन्झुनूँ

14.

तालाब शाही

धौलपुर

15.

लाखोटिया तालाब

पाली

16.

काला सागर तालाब

सवाईमाधोपुर

17.

सुख सागर तालाब

सवाईमाधोपुर

18.

जंगली तालाब

सवाईमाधोपुर

2.  बावड़ी (वापी)

(1) नंदा बावड़ी-

इस प्रकार की बावड़ी का निर्माण मनोकामना पूर्ण करने हेतु करवाया जाता था।
इस बावड़ी में एक ओर द्वार तथा तीन कूट बने होते हैं।

(2) भद्रा बावड़ी-

यह सबसे सुंदर बावड़ी होती है इसमें दो द्वार तथा तथा छ: कूट बने होते है।

(3) जया बावड़ी-

तीन द्वार तथा नौ कूट निर्मित बावड़ी

(4) सर्वतोमुख बावड़ी-

चार द्वार तथा बारह कूट निर्मित बावड़ी

राजस्थान की प्रमुख बावड़ियाँ

1.

चाँद बावड़ी

आभानेरी-दौसा

2.

लवाण बावड़ी

दौसा

3.

रानी जी की बावड़ी

बूंदी

4.

भावल देवी की बावड़ी

बूंदी

5.

काकी जी की बावड़ी

बूंदी

6.

नौलखा बावड़ी

डूंगरपूर

7.

त्रिमुखी बावड़ी

उदयपुर

8.

मांजी की बावड़ी

आमेर (जयपुर)

9.

तापी बावड़ी

जोधपुर

10.

जालप बावड़ी

जोधपुर

11.

कातना बावड़ी

ओसिया- जोधपुर

12.

एक चट्‌टान की बावड़ी

मण्डोर- जोधपुर

नोट

आधुनिक जल संरक्षण की विधियाँ-

(A) रेन वाटर हार्वेस्टिंग (वर्षा जल संग्रहण)

(1) वर्षा जल को सीधे जमीन से उतारना

(2) खाई बनाकर रिचार्जिंग करना

(3) कुओं में पानी उतारना

(4) ट्यूबवेल में पानी उताररा

(5) टैंक में पानी जमा करना

(B) शुष्क कृषि पद्धति

शुष्क कृषि- गैर सिंचित शुष्क भूमि पर कृषि तकनीक है जो वर्षा जल को रोकने, मिट्टी की नमी के वाष्पीकरण को दबाकर, मिट्‌टी में पानी को भंडारित करने और पानी का प्रभावी उपयोग करने की तकनीक है।
शुष्क कृषि पद्धति में फव्वारा पद्धति तथा बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति का प्रयोग कर वर्षा जल का सदुपयोग किया जाता है।