भारत के प्रमुख उद्योग
भारत में सबसे प्राचीन उद्योग के साक्ष्य हड़प्पा सभ्यता में मिलते हैं। उस काल में यहाँ सूती कपड़े, मृद भाण्ड उद्योग, कांस्य धातु के उपकरण और जहाजरानी उद्योग के प्रमाण मिलते हैं। इसके बाद गुप्तकाल में चन्द्रगुप्त द्वितीय का बना महरौली का लौह स्तम्भ जो दिल्ली में स्थित है, भारतीय प्राचीन अभियांत्रिकी उद्योग का प्रसिद्ध उदाहरण है। जो आज तक खुले में होने के बावजूद जंग रहित है। मध्यकाल में भारत में अनेक प्रकार के उद्योग विकसित हुए और जिनके कारण भारत का निर्यात बढ़ा और भारत को सोने की चिड़िया कहा जाने लगा। लेकिन आधुनिक भारत के प्रारंभ में यूरोपीय विशेषतः अंग्रेजों के आगमन के पश्चात् उनकी घातक आर्थिक नीति के कारण भारत की औद्योगिक व्यवस्था पिछड़ गई और भारत में कुटीर उद्योगों का पतन हो गया तथा भारत में ब्रिटिश उत्पादों की भरमार हो गई और भारत के औद्योगिक विकास की प्रवृत्ति धीमी हो गई।
19वीं सदी में भारत में नए उद्योगों की स्थापना एवं विकास प्रारंभ हुआ। भारत ने औद्योगिक विकास की रफ्तार पकड़ी। लेकिन देश विभाजन होने से भारत के औद्योगिकीकरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
1. उद्योगों के आकार का विषम ढ़ाँचा - आजादी के समय विभाजन के कारण कच्चे माल के उत्पादन स्थल पाकिस्तान में चले गए तथा कारखाने भारत में रह गए जिस कारण औद्योगिक विकास रुका। वहीं दूसरी ओर भारत में स्थापित बड़े उद्योगों में विदेशी उद्योगपतियों का योगदान था तथा लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास की प्रक्रिया धीमी थी। इस समय मध्यम आकार के कारखानों का विकास कम हुआ।
2. निम्न पूँजी गहनता - स्वतन्त्रता के प्रारंभिक वर्ष़ों में भारतीय उद्योग में पूँजी गहनता कम थी। मजदूरी का स्तर नीचा होने, प्रति व्यक्ति आय कम होने तथा तकनीकी पिछड़ेपन के कारण पूँजी की तीव्रता कम ही रहती थी।
3. उपभोक्ता वस्तु उद्योगों की प्रधानता - विनिर्माण में पूँजीगत वस्तु उद्योगों की तुलना में उपभोक्ता वस्तु उद्योगों की प्रधानता थी।
स्वतंत्रता प्राप्ति से अब तक (2011) 6 औद्योगिक नीतियाँ घोषित हो चुकी है-
1. प्रथम औद्योगिक नीति - 1948
2. दूसरी औद्योगिक नीति - 1956
3. तीसरी औद्योगिक नीति - 1977
4. चौथी औद्योगिक नीति - 1980
5. पाँचवीं औद्योगिक नीति - 1990
6. नई औद्योगिक नीति - 1991
वर्तमान में महारत्न कम्पनियाँ 8 हैं -
1. IOC Ltd. 2. NTPC Ltd. 3. ONGC Ltd.
4. SAIL Ltd. 5. CIL Ltd. 6. GAIL
7. BHEL 8. BPCL
8. नवरत्न योजना -
वर्तमान में 17 नवरत्न कम्पनियाँ हैं।
9. मिनीरत्न योजना -
मिनी रत्नों की संख्या वर्तमान में 74 हैं।
1. प्रथम पंचवर्षीय योजना : (1951-1956)
प्रथम योजना में अर्थव्यवस्था के औद्योगीकरण के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास नहीं किया गया। प्रथम योजनाकाल में सिंदरी उर्वरक कारखाना, चितरंजन में रेल इंजन बनाने का कारखाना, भारतीय टेलीफोन उद्योग, इंटीग्रल कोच फैक्ट्री, पिम्परी पेनिसिलीन फैक्ट्री, नेपा न्यूज पिंट, हिन्दुस्तान केबल्स व हिन्दुस्तान मशीन टूल्स (HMT) की स्थापना की गई।
2. द्वितीय पंचवर्षीय योजना : (1955-1956)
उद्योग को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। यह योजना पी.सी. महालनोविस के मॉडल पर आधारित थी। राउरकेला इस्पात कारखाना, छत्तीसगढ़ में भिलाई इस्पात कारखाना और पश्चिम बंगाल में दुर्गापुर इस्पात कारखाना स्थापित किया गया।
3. तृतीय पंचवर्षीय योजना : (1961-66)
औद्योगिक क्षेत्र का और अधिक विस्तार करना था। मशीन निर्माण और तकनीकी व प्रबंधकीय कौशल पर विशेष बल दिया गया।
- तीन एक वर्षीय योजनाएँ एवं औद्योगिक विकास : (1966-69)
4. चौथी पंचवर्षीय योजना : (1969-74)
तीसरी योजना के अधीन आरम्भ किए गए औद्योगिक प्रोजेक्टों को पूरा करने पर बल दिया गया। इसमें निर्यात-प्रोत्साहन एवं आयात प्रतिस्थापन उद्योगों के विस्तार का लक्ष्य रखा गया।
5. पाँचवीं पंचवर्षीय योजना : (1974-79)
पाँचवीं योजना के औद्योगिक कार्यक्रम आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य को ध्यान में रखकर बनाए गए।
6. छठी योजना : (1980-85)
छठी योजना में समग्र विकास की रणनीति अपनाई गई थी।
7. सातवीं योजना : (1985-90)
औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने को प्राथमिकता दी गई तथा सामाजिक न्याय सहित विकास पर बल दिया गया।
8. आठवीं योजना में उद्योग : (1992-97)
आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई। यह योजना जॉन डब्ल्यू, मिलर के मॉडल पर आधारित योजना थी।
9. नौवीं योजना : (1997-2002)
औद्योगिक विकास की गति मंद रही।
10. दसवीं योजना : (2002-07)
(i) संरचनात्मक विकास को प्राथमिकता प्रदान करना।
(ii) लघु व कुटीर उद्योगों के विकास को प्राथमिकता देना।
(iii) निर्यातोन्मुखी उद्योगों को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान करना।
(iv) औद्योगिक एवं आर्थिक विकास के मार्ग में आने वाली बाधाओं एवं प्रतिबन्धों को न्यूनतम करना।
11. ग्यारहवीं योजना : (2007-12)
(i) लक्ष्य - ‘त्वरित और समावेशी’ विकास रखा गया।
(ii) औद्योगिक वृद्धि दर 10 प्रतिशत के लगभग रखी गई है।
(iii) विभिन्न योजनाओं के आधुनिकीकरण के प्रयास का लक्ष्य।
बारहवीं पंचवर्षीय योजना
(i)प्राकृतिक कारक अथवा भौगोलिक कारक : कच्चा माल, शक्ति के साधन, श्रम, यातायात, बाजार, स्थल, जलापूर्ति, जलवायु
(ii)मानवकृत कारक : पूँजी, नीति, संस्था, बैंकिंग इन्श्योरेंस और तकनीकी ज्ञान
(iii)अन्य कारक :
A. कृषि आधारित उद्योग
1. वस्त्र उद्योग 2. चीनी उद्योग 3. कागज उद्योग
1. वस्त्र उद्योग
इसके अन्तर्गत सूती, ऊनी, रेशमी और कृत्रिम रेशों से बने वस्त्रों का उत्पादन होता है। कपड़ा उद्योग देश का संगठित क्षेत्र का एकमात्र सबसे बड़ा उद्योग है, जिसमें सबसे अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है।
(i) सूती वस्त्रोद्योग (ii) पटसन उद्योग
(iii) ऊनी वस्त्रोद्योग (iv) रेशमी वस्त्रोद्योग (v) कृत्रिम रेशा
वस्त्र उत्पाद - उत्पादक
मुसलीन (मलमल) - ढाका
चीनटर - मछलीपट्टनम
मैलिकोस - कालीकट
वफ्तास - मुंबई
सूती धागा - सूरत
(i) सूती वस्त्रोद्योग
1. महाराष्ट्र :
महाराष्ट्र 43% मिल के कपड़े का और 17% यार्न का उत्पादन करता है।
2. गुजरात :
दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। 23% कपड़े का और 8% यार्न का उत्पादन होता है।
3. मध्य प्रदेश :
इस उद्योग के विकास के पीछे जो महत्त्वपूर्ण कारण है, वह पिछड़ी अर्थव्यवस्था के चलते मिलने वाला सस्ता श्रम और कोयले से मिलने वाली ऊर्जा है।
महत्वपूर्ण केन्द्र :-ग्वालियर, उज्जैन, इंदौर, देवास, रतलाम, जबलपुर आदि।
4. तमिलनाडु :
महत्वपूर्ण केन्द्र :- चेन्नई, मदुरई, तिरुनेलवेली
5. पं. बंगाल :
कोलकाता सबसे महत्त्वपूर्ण केन्द्र है। यहाँ इस उद्योग के विकास में यहाँ की आर्द्र जलवायु, बंदरगाह और समीपवर्ती क्षेत्रों से मिलने वाला कोयला का योगदान है।
केन्द्र :- हावड़ा, मुर्शिदाबाद, हुगली, श्रीरामपुर
6. उत्तरप्रदेश :
कानपुर सबसे बड़ा केन्द्र है और इसे उत्तर भारत का मैनचेस्टर कहा जाता है।
अन्य केन्द्र :-
वाराणसी, अलीगढ़, सहारनपुर, आगरा, बरेली।
7. अन्य प्रदेश :-
(ii)पटसन उद्योग
यह दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण वस्त्रोद्योग है।
प. बंगाल में पटसन उद्योग का सबसे ज्यादा संकेन्द्रण है। यहाँ 59 जूट की मिले हैं और 42615 लूम हैं, जो कुल मिलों का 76% और कुल लूम्स का 80% हैं।
(iii)ऊनी वस्त्रोद्योग
1. पंजाब :
उत्पादन में पंजाब सबसे आगे है। यहाँ देश की कुल मिलों की 72% मिले अवस्थित हैं।
अन्य केन्द्र-अमृतसर, लुधियाना और खारवेर
2. महाराष्ट्र :
3. उत्तर प्रदेश : शाहजहाँपुर, मिर्जापुर, वाराणसी, कानपुर
4. गुजरात : जामनगर, अहमदाबाद, वड़ोदरा
5. हरियाणा : पानीपत, फरीदाबाद, गुरुग्राम
6. राजस्थान : बीकानेर, अलवर, भीलवाड़ा
(iv) रेशम वस्त्रोद्योग
मलबरी, टसर, इरी, मूंगा का उत्पादन भारत में होता है। इटली और जापान से मिल रही चुनौतियों के कारण इसके विकास की गति धीमी हैं।
(v) कृत्रिम रेशा
कृत्रिम रेशे के उत्पादन से वस्त्र उद्योग में क्रान्ति आ गई है। यह काफी मजबूत होता है। मानव निर्मित रेशों को दो भागों में बाँटा गया हैं - सेल्यूलोज (रेयन और एसिटेट) और नॉन-सेल्यूलोज (नायलॉन, पॉलिस्टर)
बाँस, यूकलिप्टस और दूसरे मुलायम लकड़ियों से पल्प बनाया जाता हैं।
2. चीनी उद्योग
चीनी-उद्योग का कच्चे-माल वाले प्रदेशों में केन्द्रित होने के निम्नलिखित कारण हैः-
(1)कृषि पर आधारित उद्योग होने के कारण मानसून के अनुसार इसके उत्पादन में परिवर्तन होता रहता है।
(2)चीनी-उत्पादन गन्ने के उत्पादन पर निर्भर करता है, जो खाद्यान्न की तुलना में गन्ना के मूल्य पर निर्भर करता है, जो खाद्यान्न की तुलना में गन्ना के मूल्य पर निर्भर करता है और इसका संबंध गन्ना और गुड़ की कीमतों से भी है।
(3)उत्पादन क्षेत्र से मिल तक पहुँचने की धीमी और लंबी प्रक्रिया से गन्ना के स्तर में गिरावट आ जाती है।
(4)चीनी-मिल केवल पेराई के मौसम में ही चलते हैं और शेष समय बंद रहते हैं क्योंकि दूर से गन्ना लाना मुश्किल है।
(5)गन्नों की गुणवत्ता और मात्रा की कमी।
(6)चीनी को अकुशल एवं अनार्थिक विधि से बनाने, कम उपज, पेराई का छोटा मौसम, गन्नों की ऊँची कीमत और ज्यादा उत्पाद-कर के कारण चीनी का उत्पादन महंगा हो जाता है।
(7)पुरानी तथा अक्षम मशीनरी।
3. कागज उद्योग
B. खनिज आधारित उद्योग
1. लौह-इस्पात उद्योग
लौह-इस्पात उद्योग औद्योगिक विकास की आधारशिला है, लौह-इस्पात का प्रति व्यक्ति उपभोग औद्योगिक विकास का सूचक भी है।
(i)TISCO (स्थापना 1907) - भारत का सबसे बड़ा उपक्रम है।
वर्ष1912 में स्टील का उत्पादन प्रारम्भ हुआ।
कच्चे माल का स्रोत-हेमेटाइट (नोआमुंडी);कोयल-रानीगंज, झरिया; मैंगनीज-जोड़ा (ओडिशा), डोलोमाइट, लाइमस्टोन, फायरक्ले-सुन्दरगढ़ (ओडिशा); जल-स्वर्णरेखा नदी, ऊर्जा-खरकाई डेम; सस्ता श्रम-बिहार, ओडिशा, बंगाल। टिस्को गोपालपुर (ओडिशा) में एक कांपलेक्स का विकार कर रहा है। यह तटीय भाग में अवस्थित है और भारत का सबसे अधिक सक्षम प्लान्ट होगा।
(ii)IISCO इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी -
वर्ष1937 में बर्नपुर में और वर्ष1908 में हीरापुर में प्लान्ट स्थापित किए गए। इन सबको मिलाकर IISCO की स्थापना हुई वर्ष1972 में इसको सरकार के नियंत्रण में लाया गया। हीरापुर में पीग आयरन का उत्पादन होता है, जिसको स्टील के उत्पादन हेतु कुल्टी भेजा जाता है।
लौह अयस्क - गुआ माइन्स (झारखंड), मयूरभंज
कोयल- झारिया
ऊर्जा - दामोदर घाटी परियोजना
डोलोमाइट, लाइमस्टोम - सुन्दरगढ़
(iii)MISCO : मैसूर आयरन एंड स्टील कम्पनी
हेमाटाइट आयरन - केमनगुंडी (चिकमंगलूर)
ऊर्जा - श्रावती पॉवर प्रोजेक्ट
लाइमस्टोन - मुंडीगुडा
मैंगनीज - सिमोगा, चित्रदुर्ग
लाइमस्टोम, डोलोमाइट - स्थानीय क्षेत्रों में उपलब्ध
(iv) SAIL हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड
यह सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है। द्वितीय पंचवर्षीय परियोजना में भिलाई, राऊरकेला और दुर्गापुर में प्लान्ट की स्थापना हुई।
भिलाई : दुर्ग जिले में इसकी स्थापना 1957 में सोवियत संघ के सहयोग से हुई। स्थापना का उद्देश्य इस क्षेत्र को विकसित करना था।
हेमेटाइट - डाली-राजहजरा रेंज
कोयला - कोरबा, करगली फिल्ड्स
लाइमस्टोन - नंदिनी माइन्स
मैंगनीज - भंडारा (महाराष्ट्र), बालाघाट (मध्य प्रदेश)
ऊर्जा - कोरबा थर्मल पॉवर
डोलोमाइट - विलासपुर
लौह अयस्क - सुन्दरगढ़, क्योंझर
कोयला - झरिया, तालचेर
ऊर्जा - हीराकुंड, पॉवर प्रोजेक्ट
मैंगनीज - बरागमयला
डोलोमाइट - बराडवार
लाइमस्टोन - पूर्णपाली
लौह अयस्क - बोलनी माइन्स और मयुरभंज
कोयला - झरिया, रानीगंज
लाइमस्टोन - वीरमित्रपुर (ओडिशा)
मैंगनीज - क्योंझर (ओडिशा)
डोलोमाइट - वीरमित्रपुर
ऊर्जा - दामोदर घाटी कॉरर्पाोरेशन
जल - दामोदर नदी
बोकारो : वर्ष 1972 में इस प्लान्ट का प्रारम्भ सोवियत सहयोग से हुआ। यह बोकारो और दामोदर नदियों के संगम के पास हजारीबाग जिले में स्थित है।
लौह अयस्क - किरिबुरू (ओडिशा)
कोयला - झरिया
लाइमस्टोन - पलामू
ऊर्जा - दामोदर घाटी परियोजना
चतुर्थ योजना में तीन नए प्लांट स्थापित हुए : सलेम (तमिलनाडु) विशाखापट्टनम (आंध्र प्रदेश), विजयनगर (कर्नाटक)।
2. एल्युमिनियम उद्योग
लौह-इस्पात उद्योग के बाद यह दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण उद्योग है। 50% के लगभग एल्युमिनियम की खपत विद्युत ऊर्जा के उत्पादन एवं वितरण से होती है। दूसरे अन्य क्षेत्र जहाँ एल्युमिनियम की खपत होती है वे हैं- बर्तन उद्योग (20%), ट्रांसपोर्ट (12%) और पैकिंग (8%)।
एक टन एल्युमिनियम के उत्पादन में 18573 kwh विद्युत ऊर्जा की आवश्यकता हाती है। उत्पादन व्यय का 70% भाग सिर्फ इसी मद में खर्च होता है। अतः ऊर्जा और बाॅक्साइट की प्राप्ति से ही यह निर्धारित होता है कि एल्युमिनियम संयंत्र की स्थापना कहाँ हो।
INDALCO. एल्युमिनियम कारर्पोरेशन ऑफ इंडिया की स्थापना वर्ष 1937 मे हुई। इसके संयंत्र ने जयकर्णनगर (JK Nagar) (प.बंगाल) में कार्य करना प्रारम्भ किया।
INDAL Co. (इंडियन एल्युमिनियम कम्पनी लिमिटेड) अलुपुरम (केरल) में अपना संयंत्र वर्ष 1938 में स्थापित किया।
दूसरी पंचवर्षीय योजना में हीराकुंड (ओडिशा), रेनुकुट (उत्तर प्रदेश) की स्थापना INDAL Co. और HINDALCO द्वारा।
वर्ष 1965 में कोरबा में BALCO के द्वारा रत्नागिरि में भी संयंत्र स्थापित किया गया।
वर्ष 1965 MALCO मेट्टूर में
वर्ष 1981 में NALCO दमनजोड़ी (कोरापुट) में
भारत का सबसे बड़ा संयंत्र अन्गुल, धोन्डानल जिला में।
3. ताम्र उद्योग (कॉपर स्मेलटिंग)
वर्ष 1924 में इंडियन कॉपर कारर्पोरेशन की स्थापना हुई।
पहला संयंत्र घाटशिला (सिंहभूम में)
वर्ष 1967 में हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड की स्थापना।
वर्ष 1972 में इंडिया कॉपर लिमिटेड की स्थापना।
वर्तमान में केवल दो संयंत्र काम कर रहे हैं :
1. घाटशिला (सिंहभूम) 2. खेतड़ी (झुंझुनूँ)
4. लेड और जस्ता उद्योग
पहला लेड स्मेलटिंग प्लान्ट टून्डु (धनबाद) में स्थापित हुआ।
राजस्थान के जावर और राजपुर दरीबा के अयस्क की प्राप्ति होती है।
देश में चार जिंक स्मेल्टर हैं :-
1. अलवाई - केरल
2. देबारी (उदयपुर) - राजस्थान
3. चन्देरिया (चित्तौड़गढ़) - राजस्थान
4. विशाखापट्टनम - आंध्र प्रदेश
5. सीमेन्ट उद्योग
यह कच्चे माल पर आधारित उद्योग है। चूना-पत्थर मुख्य कच्चा माल है। कुल उत्पाद का 66% (1.5 टन) चूना-पत्थर का उपयोग एक टन सीमेंट के उत्पादन में होता है।
वर्ष 1904 में पहली मिल चेन्नई में। प्रयास असफल साबित हुआ।
वर्ष 1912-13 में पोरबंदर में इंडियन सीमेन्ट क. लिमिटेड की स्थापना।
वर्ष 1915-कटनी में, वर्ष 1915-16 में लाखेरी (बूँदी) में क्लिक निक्सन कम्पनी द्वारा सीमेन्ट का कारखाना स्थापित किया गया।
जपला (बिहार), शाहाबाद (कर्नाटक) कैगोर, बानमोर, मेहगाँव, द्वारका। प्रथम राजस्थान - राजस्थान 11%, तमिलनाडु 8.5%, गुजरात 8.5%।
C. इंजीनियरिंग आधारित उद्योग
1. मशीन उपकरण
मशीन टूल्स का उत्पादन वर्ष 1932 में प्रारंभ हुआ किर्लोस्कर ब्रदर्स लिमिटेड के द्वारा।
वर्ष 1953 में हिन्दुस्तान मशीन टूल्स की स्थापना सार्वजनिक उपक्रम के रूप मे बेंगलुरू में हुई, स्विट्जरलैंड के सहयोग से स्थापना हुई।
हैवी इंजीनियरिंग निगम लि. रांची की स्थापना वर्ष 1958 में रूस के सहयोग से की गई।
वर्ष 1966 में विशाखापट्टनम में भारी मशीनरी उद्योग की स्थापना चेक सहयोग से हुई।
प्रजा टूल्स लिमिटेड, सिकंदराबाद में रक्षा उपकरण का उत्पादन होता है।
जादवपुर इकाई (कोलकाता) में बहुमूल्य उपकरणों का निर्माण होता है।
टेल्को (TELCO) - वर्ष 1951 में, जमशेदपुर
भेल (BHEL) - भोपाल, इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव
2. रेलवे लोकोमोटिव्स
चितरंजन लोकोमोटिव्स वर्क (CLW) : यह वर्धमान जिले (पश्चिम बंगाल) में है जिसकी स्थापना वर्ष 1950 में हुई। वर्ष 1972 से पहले यहाँ स्टीम लोकोमोटिव बनती थी। डीजल इंजन का कारखाना वाराणसी में है, जहाँ अब इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव का निर्माण होता है।
1. इंटीग्रल कोच फैक्ट्री, पेराम्बुर (तमिलनाडु) वर्ष 1955 में स्थापित।
2. कपूरथला कोच फैक्ट्री, कपूरथला (पंजाब)
3. रायबरेली कोच फैक्ट्री, रायबरेली (उत्तरप्रदेश) निर्माण कार्य प्रगति पर।
3. ऑटोमोबाइल्स उद्योग
सर्वप्रथम जेनेरल मोटर्स लि. की स्थापना वर्ष 1928 में मुम्बई में हुई।
फोर्ड मोटर्स, वर्ष 1980 में चेन्नई में।
प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स लिमिटेड कुर्ला (मुंबई)
हिन्दुस्तान मोटर लि. उत्तरपुरा (कोलकता)
मोटर साईकिल - फरीदाबाद, मैसूर
स्कूटर - लखनऊ, सतारा, आकुर्दी (पूना)
मारुती - गुरुग्राम
टेल्को - भारी और मध्यम कॉमर्शियल वाहन
4. हवाई जहाज उद्योग
वर्ष 1940 में बेंगलुरू में हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड उद्योग की स्थापना हुई। नासिक, कोयम्बटूर, हैदराबाद, कानपुर, लखनऊ अन्य महत्त्वपूर्ण केन्द्र हैं।
5. जलयान निर्माण उद्योग
आधुनिक ढंग का जलयान बनाने का पहला कारखाना सिंधिया नेवीगेशन कम्पनी द्वारा वर्ष 1941 में विशाखापट्टनम में स्थापित किया। वर्ष 1952 में इसे केन्द्र सरकार ने अधिगृहित किया। अब इसे हिन्दुस्तान शिपयार्ड कम्पनी चला रही है।
D. रसायन आधारित उद्योग
वस्त्रोद्योग, लौह इस्पात उद्योग और मेटालॉजिकल उद्योग के बाद यह चौथा बड़ा उद्योग है। इस उद्योग में सल्फ्यूरिक अम्ल का प्रयोग सबसे ज्यादा होता है। मुख्यतः उर्वरक, प्लास्टिक, पेंट, कृत्रिम रेशे के उत्पादन में 90% सल्फर आयात करना पड़ता है। मुख्यतः केरल, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और प. बंगाल में इकाइयाँ हैं।
1. उर्वरक
पेट्रो रसायन उत्पादित करने वाले क्षेत्रों के समीप इस उद्योग को स्थापित किया जाता है।
नाइट्रोजन उर्वरक का उत्पादन करने वाली इकाइयों में से 70% इकाईयाँ नेप्था का उपयोग कच्चे माल के रूप में करती हैं। नेप्था तेलशोधक इकाइयों का उप-उत्पाद होता है।
नाइट्रोजन का उपयोग करने वाले संयंत्रों का चलन बढ़ रहा है।
वर्ष 1906 में रानीपेट (तमिलनाडु) में पहला सुपर फाॅस्फेट प्लान्ट स्थापित किया गया था।
वर्ष 1951 में सिन्दरी (झारखण्ड) में पहला उर्वरक कारखाना आजादी के बाद स्थापित हुआ।
भारत नाइट्रोजन उर्वरक का चौथा बड़ा उत्पादक देश है।
FCI - फर्टिलाइजर कॉरर्पोरेशन ऑफ इंडिया : इसकी चार इकाइयाँ हैं : सिंदरी, तालचेर, गोरखपुर और रमागुंडम (आंध्र प्रदेश)।
NFL - (नेशनल फर्टिलाइजर लिमिटेड) इसके निम्न संयंत्र हैं - भटिन्डा, पानीपत, विजयपुर तथा अन्य केन्द्र उदयगमनडलम, कोचीन, थाल, नामरूप, बरौनी, पारादीप, आमालोर आदि-
HBJ गैस पाइपलाइन के माध्यम से हजीरा, विजयपुर, जगदीशपुर, आँवला, बाबराला और शाहजहाँपुर में प्लान्ट की स्थापना हुई है।
उद्योगों के विकास और वितरण में काफी क्षेत्रीय असमानता है। कहीं-कहीं समूह में उद्योग लगे हैं जिसका प्रमुख कारण कच्चे माल की समीपता और अन्य दूसरी सुविधा का होना है। इसको उद्योगों का जमघट कहते हैं। जिन क्षेत्रों में उद्योगों का संकेन्द्रण ज्यादा है, उसे औद्योगिक क्षेत्र कहते हैं।