राजस्थान के भौगोलिक क्षेत्र :-

- राजस्थान के भौगोलिक क्षेत्रों पर सर्वप्रथम विस्तृत अध्ययन वी.सी. मिश्र ने किया तथा उन्होने “राजस्थान का भूगोल” नामक एक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक का प्रकाशन 1968ई. में किया गया।
- उच्चावचों के आधार पर राजस्थान के भौगोलिक क्षेत्रों को चार भागों में बाँटा गया है। जो कि निम्न हैं-
- उत्तरी-पश्चिमी मरुस्थलीय क्षेत्र।
- मध्यवर्ती अरावली पर्वतमाला।
- पूर्वी मैदानी भाग।
- दक्षिणी-पूर्वी पठारी प्रदेश।
- उत्तरी पश्चिमी मरुस्थलीय क्षेत्र:-
- राजस्थान के कुल क्षेत्रफल 61.11% है। भाग उत्तर-पश्चिमी रेगिस्तानी भाग है।
- यह प्रदेश उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व में 640 किमी. लम्बा एवं पूर्व-पश्चिम में 300 किमी. चौड़ा है।
- राज्य की लगभग 40% जनसंख्या निवास करती है।
- वर्षा 20 सेमी. से 50 सेमी. होती है।
- राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी भाग में अरावली पर्वतमाला से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय सीमा तक रेतीले भू-भाग को मरुस्थलीय क्षेत्र कहा जाता है।
- इस मरुस्थल का नाम ‘थार का मरुस्थल’ है, जो भारत व पाकिस्तान दो देशों में 2,33,100 किमी2 क्षेत्रफल में फैला हुआ है। जिसका विस्तार राजस्थान में 1,75,000 किमी2 है।
- इस मरुस्थलीय क्षेत्र में वर्षा की मात्रा 0-50 सेंटीमीटर तक होती है तथा यह शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क जलवायु में आता है।
- राज्य के कुल क्षेत्रफल का
भाग मरुस्थलीय क्षेत्र में आता है।
- यह मरुस्थल अफ्रीका के ग्रेड पैलियोआर्कटिक मरुस्थल का पूर्वी भाग है।
- विश्व के अन्य मरुस्थलों की अपेक्षा यहाँ पर सर्वाधिक जैव-विविधता पाई जाती है। इसलिए डॉ. ईश्वर प्रकाश ने इसे रूक्ष क्षेत्र की संज्ञा दी।
- यहाँ की मृदा रेतीली-बलुई है तथा इस क्षेत्र में बाजरा, मोठ, गेहूँ, कपास, मूँग, सरसो का उत्पादन होता है।
- उत्तर-पश्चिमी मरुस्थलीय क्षेत्र अरावली के पश्चिम में राजस्थान के 12 जिलों में विस्तारित है।
- जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, गंगानगर, जोधपुर, हनुमानगढ़, नागौर, जालौर, चूरू, सीकर, झुंझुनूँ, पाली का पश्चिमी भाग।
- यहाँ की वनस्पति कँटीली, मरूद्भिद व छोटे पत्तों वाली होती है। जैसे- कैरू, बैर, खेजड़ी, कैक्टस, थोहर।
- मरुस्थलीय क्षेत्र को अध्ययन की दृष्टि से वर्षा के आधार पर दो भागों में बाँटते हैं।
- शुष्क मरुस्थल (0-25 सेंटीमीटर वर्षा)
- अर्द्धशुष्क मरुस्थल (25-50 सेंटीमीटर वर्षा)
- राजस्थान में अरावली पर्वतमाला वर्षा विभाजक का कार्य करती है तथा राजस्थान की वर्षा-विभाजक रेखा 50 सेंटीमीटर है।
- पूर्वी मरुस्थल व पश्चिमी मरुस्थल की वर्षा-विभाजक रेखा 25 सेंटीमीटर है।
- शुष्क मरुस्थलीय क्षेत्र:-
- यह न्यूनतम वर्षा वाला क्षेत्र है, यहाँ पर 0-25 सेंटीमीटर वर्षा होती है तथा यहाँ की वनस्पति काँटेदार होती है।
- यहाँ का सम क्षेत्र पूर्णत: वनस्पति रहित क्षेत्र है।
- इसमें जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर, नागौर व चूरू का आधा भाग, पश्चिमी जोधपुर सम्मिलित हैं।
- यहाँ की प्रमुख फसलो में सर्वाधिक क्षेत्रफल बाजरा व मोठ का होता है।
- इस क्षेत्र को हम दो भागों में बाँटते हैं-
- बालुकास्तूप युक्त मरुस्थलीय क्षेत्र।
- बालुकास्तूप मुक्त मरुस्थलीय क्षेत्र।
- बालुका-स्तूप युक्त मरुस्थलीय क्षेत्र:-
- इस क्षेत्र में बालुका-स्तूपो/रेतीले-टीलों का बाहुल्य होता है। 58.50% (लगभग 60%) क्षेत्र में बालुका-स्तूप पाए जाते हैं।
- बालुका-स्तूप प्रमुख रूप से दो प्रकार के होते हैं-
- अनुदैर्ध्य बालुका स्तूप:-
- यह पवनों के समानान्तर बनने वाले बालुका-स्तूप हैं।
- इनकी ऊँचाई 10-60 मीटर तक होती है।
- इनकी ऊँचाई 10-40 मीटर तक होती है।
- यह पवनों के समकोण या विपरीत बनने वाले बालुका स्तूप हैं।
- यह मरुस्थलीकरण के लिए जिम्मेदार होते हैं।
- बरखान:- (बरच्छान) :-

- यह अनुप्रस्थ बालुका-स्तूपों का ही प्रकार है।
- इसकी ऊँचाई 10-20 मीटर तक होती है।
- यह सर्वाधिक गतिशील होने के कारण विनाशकारी होते हैं।
- इससे स्थानीय भाषा में ‘धरियन’ कहते हैं।
- इनकी आकृति अर्द्धचन्द्राकार होती है।
- राजस्थान में रेखिय बालुका-स्तूप, तारा बालुका-स्तूप, अवरोधी
- बालुका-स्तूप, सब्रकाबिज बालुका-स्तूप व पवनानुवर्ती बालुका स्तूप आदि प्रकार के बालुका-स्तूप पाए जाते हैं।
- धोराउण्ड बालुका-स्तूप राजस्थान में नहीं पाया जाता है।
- सर्वाधिक बालुका-स्तूप शेखावाटी क्षेत्र, अनुदैर्ध्य बालुका स्तूप जैसलमेर-बाड़मेर में व अनुप्रस्थ बालुका स्तूप शेखावटी क्षेत्र में पाये जाते हैं।
- बालुकास्तूप मुक्त मरुस्थलीय क्षेत्र:- (41.5%) मरुस्थल का
- शुष्क मरुस्थलीय क्षेत्र का वह भाग जहाँ बालुका-स्तूपों का अभाव होता है। तथा वहाँ पर पहाड़ी क्षेत्र पाया जाता है।
- जैसलमेर का पोकरण क्षेत्र जो पहाड़ी क्षेत्र में आता है, बाड़मेर की छप्पन की पहाड़ियाँ (मालानी पर्वत क्षेत्र) व जालौर की ग्रेनाइट पहाड़ियाँ, बालुका-स्तूप मुक्त क्षेत्र में आते हैं।
- मालानी पहाड़ी क्षेत्र में हल्देश्वर पहाड़ी चोटी, जिसे मारवाड़ का लघु-माउण्ट कहा जाता है।
अर्द्धशुष्क मरुस्थलीय क्षेत्र:-
- इस मरुस्थलीय क्षेत्र में वर्षा की मात्रा 25-50 सेमी. होती है।
- इस क्षेत्र को प्रमुख रूप से चारों भागों में बाँटा जाता है।
- घग्घर नदी प्रवाह क्षेत्र:-
- घग्घर नदी का उद्गम हिमाचल प्रदेश में ‘कालका’ नामक स्थान से शिवालिक पहाड़ियों से होता है।
- यह नदी राजस्थान में हनुमानगढ़ जिले में टिब्बी नामक तहसील से प्रवेश करती है तथा राजस्थान के हनुमानगढ़ व श्रीगंगानगर जिलो में बहती हुई अपना जल पाकिस्तान के फोर्ट अब्बास तक ले जाती है।
- इस नदी को मृत नदी, सोतर नदी, नर नदी, प्राचीन काल में सरस्वती व वैदिक काल में द्वषद्वती कहा जाता था।
- घग्घर नदी के प्रवाह क्षेत्र को राजस्थान में ‘नाली/पाट’ तथा पाकिस्तान में ‘हकरा’ कहा जाता है।
- इस नदी का प्रवाह क्षेत्र राजस्थान के अर्द्धशुष्क मरुस्थलीय क्षेत्र में आता है।
- यहाँ कि सिंचाई व्यवस्था उत्तम होने से, यह राजस्थान का उपजाऊ क्षेत्र है।
- यह राज्य की एकमात्र अन्तर्राष्ट्रीय नदी है।
- राज्य की एकमात्र नदी, जो उत्तर दिशा से प्रवेश करती है।
- इसे बांगर के प्रदेश के नाम से जाना जाता है।
- इसे क्षेत्र के अंतर्गत चूरू, झुंझुनूँ, सीकर व नागौर का उत्तरी भाग आता है।
- यहां ज्यादातर बरखान (अर्द्ध वृत्ताकार) प्रकार के बालुका स्तूप पाए जाते हैं।
- अन्त:वृत्ति जलीय प्रदेश या अनन्तगोचर प्रदेश है।
- इस क्षेत्र की भूमि में चूने की मात्रा होने से, यहाँ पर कच्चे कुएँ खोदे जाते हैं। जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘जोहड़ या नाडा’ कहते हैं।
- जोहड़ का सबसे गहरा स्थान ‘चोंभी’ कहलाता है।
- यह नदी निर्मित अर्द्ध-शुष्क मैदान है, जिसे लूणी बेसिन कहा जाता है।
- लूणी नदी का प्रवाह क्षेत्र पाली, जालौर, सिरोही, जोधपुर, नागौर, बाड़मेर भागों तक विस्तरित है।
- लूणी बेसिन में सबसे अधिक विस्तृत मैदानी भाग समतल प्राचीन कांपीय मैदान है जो संपूर्ण बेसिन का 41.51% भाग को घेरता है।
- लूणी नदी की सहायक नदियाँ जोजरी, बांडी, गुहिया, जवाई, खारी आदि हैं।
- लूणी तथा उसकी सहायक नदियाँ जोधपुर जिले के दक्षिण-पूर्वी भाग पाली, जालौर सिरोही जिलों में बहती हैं।
- लूणी नदी बेसिन की पूर्वी सीमा कालाभरा डूंगर है।
- लूणी नदी का पानी बालोतरा तक पहाड़ी अपवाह तंत्र के कारण मीठा और इसके आगे नमक के कणों एवं मरुस्थली प्रदेश के अपवाह तंत्र के कारण खारा हो जाता है।
- लूणी बेसिन की प्रमुख कृत्रिम झीलें- फतहसागर, जसवंतसागर, अनंतसागर, सरदारसमंद, हेमवास, नया गाँव और सारदा आदि हैं।
- नागौर उच्च भूमि क्षेत्र:-
- यह लूणी बेसिन व शेखावटी क्षेत्र के बीच का उच्च भाग है।
- लूणी बेसिन के उत्तर में समुद्र तल से 300 से 500 मीटर ऊंचाई वाली नागौर उच्च भूमि स्थित है।
- इसकी उत्तरी सीमा शेखावाटी का अंत:प्रवाही मैदान बनाती है।
- इस क्षेत्र के पूर्वी भाग में कुछ खारे पानी की झीलें जैसे सांभर, डीडवाना, नावा व कुचामन हैं।
- इस क्षेत्र में नमक उत्पत्ति का स्त्रोत माइकाशिष्ट चट्टाने हैं जिनसे केशाकर्षण पद्धति से नमक सतह पर आता है।
- इस क्षेत्र में जल में अत्यधिक फ्लोराइड पाया जाता है तथा इसके अत्यधिक सेवन से व्यक्ति की हडि्डयो में टेढ़ापन आ जाता है। इस क्षेत्र को कुबड़पट्टी / बाँकपट्टी नाम से जाना जाता है।
- राजस्थान में सर्वाधिक फ्लोराइड की मात्रा मकराना के आसरवा गाँव के जल में हैं।
- उत्तर-पश्चिम मरुस्थलीय क्षेत्र की विशेषताएँ:-
- राजस्थान का सबसे कम वर्षा वाला स्थान जैसलमेर है।
- पश्चिम राजस्थान का सबसे आर्द्र स्थान रानीवाड़ा (जालौर) है।
- प्लाया झीलें:- दो बालुका-स्तूपो के बिच में निम्न-कगारों से घिरी हुई भूमि, जिसमें वर्षा का जल इकट्ठा हो जाता है तथा एक अस्थाई झील का निर्माण करती है, उसे ‘प्लाया झील’ कहा जाता है।
- राजस्थान में सर्वाधिक प्लाया झीलें जैसलमेर जिले में हैं।
- प्रमुख प्लाया झीलें:-
- जैसलमेर – कनोंड़, बरमसर, भाकरी
- बाड़मेर – थोब
- जोधपुर – बाप
- शेखावटी – परिहार रन क्षेत्र (सीकर)
- खड़ीन सर्वाधिक जैसलमेर में है, जो परम्परागत जल संरक्षण का स्त्रोत है।
- खड़ीन में जल सूख जाने के बाद उसकी उपजाऊ परत को महरो कहा जाता है। यहाँ पर बेझड़-कृषि (गेहूँ+जौ+चूना) तथा राइका कृषि (सरसो+तारामिरा) की जाती है।
- पश्चिमी राजस्थान में रेबारी व देवासी समाज को रायका कहा जाता है। इने घरों को ठण्ड़ी कहा जाता है।
- बाटाडुँ का कुआ:- इसे रेगिस्तान का जलमहल कहा जाता है। इसका निर्माण रावल गुमानसिंह/गुलाबसिंह ने करवाया था।
- चन्दन नलकूप:- इसे थार का घड़ा कहा जाता है। इससे 24 घण्टे मीठा पानी मिलता रहता है।
- कोलायत:- इसे मरुस्थल का सुन्दर उद्यान कहा जाता है।
- गजनेर झील:- इसे मरुस्थल का सुन्दर-दर्पण कहा जाता है।
- पीवणा:- यह सर्प की प्रजाति है। यह सबसे ज्यादा जैसलमेर में पाया जाता है।
- लाठी सीरीज:- यह एक भू-गर्भीय जल पट्टी है। इसके ऊपर, सेवण, अंजण, धामण, मूराल व तड़गम आदि घासे उगती हैं।
- सोनू/सानू क्षेत्र:- यह क्षेत्र जैसलमेर जिले में स्थित है। यहाँ पर स्टील ग्रेड चूना पत्थर पाया जाता है।
- राष्ट्रीय मरू उद्यान:- 1981 ई. राज्य का क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा अभ्यारण है। इसका क्षेत्रफल 3162 किलोमीटर2 है। यह जैसलमेर व बाड़मेर जिलो में विस्तृत है।
- आँकल गाँव (जैसलमेर):- इस गाँव में आँकल वुड फोसिल पार्क/काष्ठ जीवाश्म उद्यान स्थित है। जहाँ पर करोड़ों वर्षों पूर्व के लकड़ी के जीवाश्म मिले हैं।
- केक्टस गार्डन:- कुलधरा, जैसलमेर में स्थित है।
- बड़ोपल गाँव:- यह गाँव हनुमानगढ़ जिले में स्थित है जो कि इन्दिरा गाँधी नहर के कारण सेम की समस्या से प्रभावित है।
व्याख्या :- सेम की समस्या दरअसल, राजस्थान के नहरी इलाकों हनुमानगढ़, गंगानगर और बीकानेर के कई इलाकों में सेम की समस्या है। यहां नहरों के पानी के रिसाव के कारण आसपास की जमीन दलदली हो गई और इस वजह से वहां खेती नहीं हो सकती। राजस्थान का हजारों किमोमीटर का एरिया का समस्या से प्रभावित है।
- रेगिस्तान का मार्च:- उत्तर-पश्चिम मरुस्थलीय क्षेत्र, मध्यवर्ती अरावली पर्वतमाला से, जहाँ पर वह टूटी-फूटी या जीर्ण-क्षीर्ण अवस्था में है जो आगे बढ़ रहा है। इस मरुस्थलीय क्षेत्र का पूर्ववर्ती विस्तार होना ही रेगिस्तान का मार्च कहलाता है।
- रेगिस्तान के प्रसार के लिए जैसलमेर का नाचना क्षेत्र माना जाता है।
- मध्यवर्ती अरावली पर्वतमाला:-
- इसका क्षेत्रफल 9% है।
- इसमें जनसंख्या 10% है।
- अरावली पर्वतमाला एक प्राचीन वलित पर्वतमाला है। इसके
- समकालिन विश्व में अमेरिका की एक अप्लेशियन पर्वतमाला है।
- राजस्थान में यह पर्वतमाला वर्षा- विभाजक रेखा (50 सेमी.) तथा जल-विभाजक रेखा का कार्य करती है।
- राजस्थान के इस भौगोलिक क्षेत्र की उत्पत्ति पूर्व-केम्ब्रियन काल में हुई। आद्य-महाकल्प काल की देहली क्रम की चट्टानों से इसकी उत्पत्ति हुई है।
- राजस्थान में यह कर्णवत दक्षिण-पश्चिमी से उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में स्थित है।
- राजस्थान में यह पर्वतमाला क्वार्टज-चट्टानों के रूप में अवस्थित है।
- यहाँ पर वर्षा की मात्रा 50-70 सेमी. व मिट्टी-पवर्तीय एवं लाल मिट्टी पाई जाती है।
- इसकी उत्पत्ति गुजरात के पालनपुर से होती है तथा यह राजस्थान में खेड़ब्रह्मा (सिरोही) से प्रवेश कर राजस्थान के विभिन्न 17 जिलों से गुजरते हुए, हरियाणा होकर, अन्नत: दिल्ली की रायसिना पहाड़ी तक विस्तृत है, जहाँ पर राष्ट्रपति भवन बना हुआ है।
- इसकी कुल लम्बाई 692 किलोमीटर तथा राजस्थान में 550 किलोमीटर है।
- अरावली पर्वतमाला का 80% भाग राजस्थान में अवस्थित है।
- अरावली पर्वतमाला का राजस्थान में महत्व:-
- अरावली पर्वतमाला राजस्थान को मरुस्थलीय क्षेत्र और गैर-मरुस्थलीय क्षेत्र में विभाजित करती है।
- अरावली पर्वतमाला मरुस्थल के पूर्वीवर्ती विस्तार को रोकती है।
- अरावली पर्वतमाला राजस्थान की वर्षा-विभाजक रेखा (50 सेमी.) है। तथा यह राजस्थान की जल-विभाजक रेखा भी है। इसके पश्चिम तथा पूर्व में नदियाँ बहती हैं।
- राजस्थान की अधिकांश नदियों का उद्गम अरावली पर्वतमाला से होता है जैसे - बनास, बेड़च, साबरमती, लुणी, जवाई, कोठारी आदि।
- जोजरी नदी का उद्गम अरावली से नहीं होता है।
- अरावली पर्वतमाला वन एवं वन्य जीवों की दृष्टि से सम्पन्न क्षेत्र है।
- अरावली को राजस्थान का रूढ़ क्षेत्र कहा जाता है। यहाँ पर राज्य के सर्वाधिक खनिज उत्खनित होते हैं।
- राजस्थान में परिस्थिति असंतुलन से सर्वाधिक प्रभाव अरावली पर्वतमाला पर पड़ा है।
- अरावली पर्वतमाला मानसून के समानान्तर होने की वजह से पर्याप्त वर्षा नहीं हो पाती है।
- अध्ययन की दृष्टि से हम अरावली पर्वतमाला को तीन भागों में बाँटते हैं-
- दक्षिणी-पश्चिमी अरावली।
- मध्यवर्ती अरावली।
- उत्तरी-पूर्वी अरावली।
- वास्तव में अरावली पर्वतमाला का सही रूप दक्षिण-पूर्व अरावली क्षेत्र में ही मिलता है।
- इस क्षेत्र के प्रमुख जिले सिरोही, उदयपुर तथा राजसमन्द हैं।
- सिरोही जिले में अरावली पर्वतमाला की सर्वाधिक ऊँचाई है।
- अरावली पर्वतमाला की सर्वाधिक चौड़ाई एवं सर्वाधिक विस्तार उदयपुर जिले में है।
- अरावली पर्वतमाला की निम्नतम ऊँचाई व सबसे कम विस्तार अजमेर जिले में है।
- इस अरावली क्षेत्र में इसकी सर्वोच्च चोटी गुरुशिखर (1722 मीटर), सेर-1597 मीटर, देलवाड़ा-1441 मीटर अचलगढ़-1382 मीटर, ऋषिकेश-1017 मीटर सिरोही में है। सिरोही में आबू का पठार समुंद्र तल से 1200 मीटर की ऊँचाई पर 19 किलोमीटर लम्बा और 8 किलोमीटर चौड़ा है।
- राज्य का सबसे ऊँचा पठार उड़िया का पठार (सिरोही) है, जो आबू पठार से 160 मीटर ऊँचा है। (1360 मीटर)
- उदयपुर जिले की सर्वोच्च चोटी जरगा-1431 मीटर है।
- राजसमन्द में कुम्भलगढ़ की ऊँचाई 1224 मीटर, लीलागढ़ की ऊँचाई-874 मीटर, नागपाणी की ऊँचाई 867 मीटर है।
- उदयपुर में कमलनाथ-1001 मीटर व सज्जनगढ़-938 मीटर स्थित है। सायस की ऊँचाई 900 मीटर है।
- अरावली के पश्चिमी क्षेत्र में दूर तलहटी में स्थित बाड़मेर के मालानी पर्वत (56 की पहाड़ियों) में हल्देश्वर चोटी का पीपलूद ’मारवाड़ का लघु-माउण्ट’ कहलाता है।
- जालौर क्षेत्र में जसवंतपुरा की पहाड़ियाँ में स्थित डोरा पर्वत सबसे सर्वोच्च चोटी (869 मीटर) है। इसकी अन्य प्रमुख चोटियाँ में रोजा भाखर, ईसराना चोटी, झारोल चोटी और सुन्धा पर्वत जालौर जिले में स्थित है।
- अरावली का थोड़ा-सा भाग डूँगरपुर क्षेत्र में भी फैला हुआ है, जिसे पहाड़ो की नगरी कहा जाता है।
- इसे अरावली क्षेत्र में आबू के जैन मंदिर, जालौर का सुन्धा माता मंदिर, उदयपुर का जगत अम्बिका मंदिर प्रसिद्ध हैं तथा इस क्षेत्र में अचलगढ़ दुर्ग, चितौड़गढ़ दुर्ग, कुम्भलगढ़ दुर्ग आदि प्रमुख हैं। उदयपुर की प्रसिद्ध झीलें अरावली की गोद में ही बनी हुई हैं।
- दक्षिण-पश्चिम अरावली क्षेत्र के प्रमुख दर्रे या नाल दो पर्वतों के बीच में विकट एवं तंग रास्ता दर्रा या नाल कहलाता है, जो निम्न हैं-
- फुलवारी की नाल – उदयपुर
- सोमेश्वर की नाल – राजसमन्द
- केवड़ा की नाल – उदयपुर
- हाथी गुड़ा की नाल – राजसमन्द
- झिलवा/पगल्या की नाल –पाली में मेवाड़ व मारवाड़
- यह क्षेत्र 25o38’ उत्तरी अंक्षाश से 26o58’ उत्तरी अंक्षाश तथा 73o54’ से 74o22’ पुर्वी देशांतर के मध्य स्थित है।
- इसका विस्तार जयपुर के दक्षिण-पश्चिमी भाग से दक्षिण में राजसमंद जिले की देवगढ़ तहसील तक है।
- अरावली क्षेत्र में अरावली पर्वतमाला विस्तृत भाग में न होकर संकीर्ण अवस्था या कटी-फटी अवस्था में है।
- इस क्षेत्र की सबसे ऊँची चोटी तारागढ़-873 मीटर है। यहाँ पर तारागढ़ दुर्ग बना हुआ है।
- इसकी अन्य पर्वत चोटियाँ सर्पिलाकार में नाग का पहाड़ (795 मीटर), अजमेर के दक्षिण में स्थित हैं।
- टॉडगढ़ से सुदुर स्थित तलहटी में मारायजी की पर्वत चोटी (933 मीटर) है।
- मध्य अरावली क्षेत्र में स्थित पुष्कर झील राज्य की पवित्र झील है। यहाँ पर सावित्री-गायत्री पहाड़ियाँ एवं मन्दिर स्थित हैं। इसके पास में ही विश्व का एकमात्र प्राचीन ब्रह्मा मंदिर स्थित है।
- प्रमुख दर्रे:-
- कछवाली दर्रा
- पीपली दर्रा
- उदाबरी का दर्रा
- स्वरूप घाट दर्रा
- बर दर्रा
- परवेरिया का दर्रा
- शिवपुर घाट
- देबारी का दर्रा
- यह क्षेत्र 26o55’ से 28o4’ उत्तरी अंक्षाश एवं 74o55’ से 77o03’ पूर्वी देशांतर के मध्य स्थित है।
- इस भाग में अरावली श्रेणियाँ क्वार्टजाइट एवं फाईलाइट चट्टानों से बनी हैं।
- यहां पहाड़ियों के बीच में उपजाऊ घाटियाँ और कांपीय बेसिन हैं।
- इसका विस्तार सांभर से खेतड़ी तक है।
- इस क्षेत्र में प्रमुख रूप से जयपुर, दौसा, टोंक, सवाई माधोपुर, झुंझुनूँ, सीकर व अलवर जिले सम्मिलित हैं।
- इस क्षेत्र की सबसे ऊँची चोटी रघुनाथगढ़-1055 मीटर (सीकर) है।
- अन्य चोटियों में प्रमुखतया जयपुर की खो-920 मीटर, जयगढ़-648 मीटर, नाहरगढ़-599 मीटर आती हैं।
- झुंझुनूँ क्षेत्र में खेतड़ी अरावली पर्वतमाला का हिस्सा है, जहाँ पर राजस्थान का सर्वाधिक ताँबा निकाला जाता है। यह क्षेत्र अपने अवैध खनन के लिए जाना जाता है।
- सीकर में हर्ष की पहाड़ियाँ, मालखत/बालखेत की पहाड़ियाँ पर रैवासा धाम, जीण माता का मंदिर, हर्ष का मंदिर, रैवासा खारे पानी की झील व खंडेला की पहाड़ियाँ स्थित हैं।
- उत्तर-पूर्वी अरावली का सर्वाधिक विस्तार अलवर जिले में है। यहाँ पर अजबगढ़ की पहाड़ियाँ, अलवर-किला क्षेत्र, सरिस्का क्षेत्र व पाण्डुपोल हनुमान जी का मंदिर स्थित हैं।
- रणथम्भौर के पास अरावली पर्वतमाला व विंध्याचल पर्वतमाला का संगम होता है, यह क्षेत्र संक्रमित या संक्राति क्षेत्र कहलाता है। यहाँ पास में ही रणथम्भौर दुर्ग व त्रिनेत्र गणेशजी का मंदिर स्थित है।
- अरावली पर्वतमाला को A Beam Lying Across या स्थानीय भाषा में Ada-Vta कहा जाता है।
- बूँदी में इसको ‘आडावाला’ कहा जाता है।
- सीकर में इसे ‘मालखेत’ या ‘बालखेत’ की पहाड़ियाँ कहते हैं।
- बाड़मेर में इसे ‘मालानी’ पर्वत कहते हैं।
- अजमेर में इसे ‘मेरवाड़ा’ की पहाड़ियाँ कहते हैं।
- सम्पूर्ण पर्वतीय क्षेत्र को ‘मेरू क्षेत्र’ कहा जाता है।
- अरावली पर्वतमाला की औसत ऊँचाई 930 मीटर है।
प्रश्न यदि अरावली पर्वतमाला की स्थिति उत्तर-पश्चिम से दक्षिण- पूर्व की ओर होती तो राजस्थान की जलवायु पर क्या प्रभाव दृष्टिगोचर होता?
उत्तर वर्षा नहीं होती।
प्रश्न यदि अरावली पर्वतमाला राजस्थान में विद्यमान नहीं होती तो क्या प्रभाव दृष्टिगोचर होता?
उत्तर राजस्थान में मरुस्थलीय क्षेत्र का विस्तार हो जाता है।
- यह मैदानी भाग अरावली पर्वतमाला के पूर्व में स्थित है।
- इस मैदान का उत्तरी-पूर्वी भाग गंगा-यमुना के मैदानी भाग से मिला हुआ है।
- इस क्षेत्र के अंतर्गत अलवर, भरतपुर, करौली, सवाई माधोपुर, जयपुर, दौसा, टोंक एवं भीलवाड़ा तथा दक्षिण की ओर डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़ जिलों के मैदानी भाग सम्मिलित हैं।
- इस क्षेत्र का उत्तरी भाग जलोढ़ मृदा है और कुछ सिस्ट एवं क्वार्टजाइट की पहाड़ियाँ स्थित हैं।
- इसके दक्षिण-पूर्व में सैंडस्टोन है, जो अपर विन्ध्य समूह का है।
- बनास बेसिन जलोढ़ मृदा से युक्त है साथ ही देहली क्रम की शैल टोंक के निकट की पहाड़ियों के रूप में हैं।
- उत्तरी एवं मध्य भरतपुर जिला उपजाऊ मैदान है जो यमुना के मैदान का पश्चिमोत्तर भाग है तथा उपजाऊ जलौढ़ मिट्टी से युक्त है।
- इसके दक्षिण भाग में अनियमित पहाड़ियाँ हैं, जिन्हें ‘डांग’ कहते हैं।
- इसका क्षेत्रफल राज्य का लगभग 23% है।
- मैदानों का निर्माण मुख्यत: नदियों के द्वारा होता है।
- राजस्थान में मैदानी भागों का विस्तार पूर्व की ओर ज्यादा है। अत: नदियाँ प्रमुख रूप से राजस्थान में बांगर व खादर मैदानों का निर्माण करती हैं।
- बांगड़ का मैदान:- नदियों द्वारा बहाकर लाए गए प्राचीन निक्षेपों से निर्मित मैदान यहाँ पर नदियों को पानी वर्तमान में नहीं पहुँच पाता है, बांगड़ का मैदान कहलाता है।
- खादर का मैदान:- नदियों द्वारा बहाकर लाए गए नवीन निक्षेपों से निर्मित मैदानी भाग, जहाँ आज वर्षा का या नदियों का जल पहुंच जाता है, खादर का मैदान कहलाता है।
- पूर्वी मैदानी भाग की विशेषताएँ:-
- इसका क्षेत्रफल 23.03% है।
- जनसंख्या-39%
- पूर्वी मैदानी भाग राजस्थान में समतलीय आकृति का है।
- सर्वाधिक जन-घनत्व पूर्वी मैदानी भाग का है।
- इस क्षेत्र में वर्षा की मात्रा 70-90 सेमी. के बीच रहती है, तथा यहाँ आर्द्र प्रकार की जलवायु पायी जाती है।
- इस क्षेत्र में अधिकांशत: जलोढ़ या कछारी मिट्टी की अधिकता है। सिंचाई के साधनों की उपलब्धता के कारण रबी की फसल सर्वाधिक उत्पादित की जाती है।
- राजस्थान का पूर्वी-मैदानी भाग निम्न नदी-बेसिनों से बना हुआ है-
- चम्बल बेसिन
- बनास बेसिन
- माही बेसिन
- बाणगंगा बेसिन
- चम्बल नदी का उद्गम मध्यप्रदेश के मऊ के दक्षिण में मानपुर के समीप जनापाँव की पहाड़ियों से होता है तथा यह राजस्थान में चित्तौड़गढ़ जिले से प्रवेश करती है।
- इस बेसिन का कुल क्षेत्रफल 4500 वर्ग किमी. है, जो बीहड़ से प्रभावित है।
- इसके दक्षिण भाग में करौली पठार की अनियमित पहाड़ियाँ हैं, जिन्हें ‘डाँग लैंड’ कहते हैं, जो धौलपुर नगर के दक्षिण-पश्चिम स्थित हैं।
- चम्बल नदी राजस्थान में दक्षिणी-पूर्वी पठारी भाग से प्रवेश करते हुए बूँदी से आगे सवाईमाधोपुर, करौली तथा धौलपुर में मैदानों का निर्माण करती है।
- इसका मैदानी भाग उत्खात स्थलाकृति प्रकार का है। यह प्रमुख रूप से बिहड़ो के लिए जानी जाती है। राजस्थान में सर्वाधिक बिहड़ सवाई माधोपुर, धौलपुर तथा करौली जिले में है।
- बनास नदी को वन की आशा कहते हैं।
- बनास बेसिन की सीमा पश्चिम से 50 सेमी. की वर्षा रेखा द्वारा निर्धारित है।
- बनास बेसिन में उच्च भू-भाग टीलेनुमा हैं, जिसके कारण इसे पीडमान्ट मैदान भी कहा जाता है।
- बनास नदी का उद्गम राजसमन्द जिले से होता है।
- बनास नदी राजसमन्द, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, अजमेर, टोंक, सवाई माधोपुर में बहती है तथा जहाँ पर यह अजमेर, भीलवाडा, टोंक व सवाई माधोपुर में मैदानी भागों का निर्माण करती है।
- इस बेसिन में भूरी मिट्टी पाई जाती है।
- बाणगंगा नदी जयपुर में बैराठ की पहाड़ियों से निकलती है तथा NH 11 के समांतर बहते हुए जयपुर, दौसा, भरतपुर में मैदानी भागों का निर्माण करती है।
- यह नदी सीधे यमुना में जल ले जाने वाली राजस्थान की यह दूसरी नदी है।
- इसको छप्पन का मैदान भी कहते हैं।
- इसका विस्तार उदयपुर के दक्षिण-पूर्व से डूँगरपुर, बाँसवाड़ा और प्रतापगढ़ जिलों में है।
- यह क्षेत्र अधिक गहराई तक विच्छेदित होने के कारण इस विच्छेदित मैदान को तथा पहाड़ी भू-भाग को स्थानीय भाषा में बांगड़ के नाम से जाना जाता है।
- माही नदी दक्षिणी राजस्थान में काँठल के मैदान का, छप्पन के मैदान का व मेंडल क्षेत्र के मैदानी भागों का निर्माण करती है।
- दक्षिणी-पूर्वी पठारी प्रदेश:-
- यह प्रदेश 23o51’ से 25o27’ उत्तरी अंक्षाश एवं 75o15’ से 77o25’ पूर्वी देशांतर के मध्य स्थित है।
- यहां राज्य की 13% जनसंख्या निवास करती है।
- यह भू-भाग दो शैलों से निर्मित हैं एक विन्ध्य का पठार व दूसरा-हाड़ौती का पठार है।
- हाड़ौती का पठार ज्वालामुखी से निर्मित चट्टानों से बना हुआ है।
- इस क्षेत्र की बेसाल्टिक चट्टानें अपरदित होकर काली मिट्टी का रूप धारण कर लेती हैं।
- इस क्षेत्र में बूँदी, कोटा, बारां, तथा झालावाड़ का भाग सम्मिलित होता है।
- बूँदी की पहाड़ियाँ दोहरे आकार में फैली हुई हैं।
- बूँदी के क्षेत्र में पर्वतीय श्रृंखला को ‘आडावाला’ कहा जाता है तथा इसकी सबसे ऊँची चोटी सतूर 353 मीटर है।
- कोटा में स्थित मुकन्दरा की पहाड़ियाँ अर्द्ध चन्द्राकार रूप में फैली हुई है। इस क्षेत्र का सबसे ऊँचा शिखर चन्दवाड़ी के पास (517 मीटर) स्थित है।
- बारां जिले का शाहबाद क्षेत्र के पास पहाड़ियों की आकृति घोड़े की नाल के समान हैं।
- झालावाड़ का डग-गंगधर क्षेत्र भी पहाड़ी क्षेत्र में आता है।
- हाड़ौती के पठार की मिट्टी काली होने के कारण यह उपजाऊ क्षेत्र है।
- इस क्षेत्र की औसत ऊँचाई लगभग 500 मीटर है।
- इस क्षेत्र में चम्बल तथा इसकी सहायक नदियाँ द्वारा मैदानी भाग का निर्माण किया जाता है।
- इस मैदानी भाग में सोयाबीन, चावल, गन्ना, कपास व सन्तरा आदि का उत्पादन होता है।
- यह राजस्थान में भी कुछ क्षेत्रों में फैला हुआ है।
- प्रमुख रूप से विन्ध्य पर्वत मध्यप्रदेश में है।
- यह धौलपुर का लाल-पत्थर क्षेत्र है।
- यह करौली का पर्वतीय क्षेत्र है।
- सवाई माधोपुर के पास रणथम्भौर में अरावली तथा विंध्यन का संक्राति क्षेत्र है।
- चित्तौड़गढ़ में पठारी क्षेत्र स्थित है।
- भीलवाड़ा में पटि्टयाँ-क्षेत्र पाया जाता है।
- चित्तौड़गढ़ में केसरपुरा की पहाड़ियाँ (हिरा उत्खनन) स्थित हैं।
- बाँसवाड़ा का जगपुरा, आनन्दपुरा, भूकिया क्षेत्र (सोना उत्खनन) भी इसमें सम्मिलित हैं।
- दक्षिण-पूर्व पठारी प्रदेश राजस्थान के भौगोलिक क्षेत्र का 6.89% (लगभग 7%) भाग में फैला हुआ हैं।
- दक्षिण-पूर्व पठारी प्रदेश में राज्य की कुल 11% जनसंख्या निवास करती है।
- यहाँ पर वर्षा की मात्रा 80-120 सेमी. रहती है।
- यह राज्य का अति-आर्द्र जलवायु क्षेत्र है।
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भौगोलिक क्षेत्र
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जलवायु
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उत्तर-पश्चिम मरुस्थलीय क्षेत्र
अरावली पवर्तमाला
पूर्वी मैदानी भाग
दक्षिण-पूर्वी पठार
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शुष्क एवं अर्द्धशुष्क
उपआर्द्र
आर्द्र
अति आर्द्र
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- राजस्थान के भौगोलिक-क्षेत्र का निर्माण-क्रम:-
- अरावली पर्वतमाला
- दक्षिण-पूर्वीय पठारी प्रदेश
- पूर्वी मैदानी भाग
- उत्तर-पश्चिम मरुस्थलीय क्षेत्र
- राजस्थान के भौगोलिक क्षेत्रों के ऐतिहासिक नाम:-
- यौद्धेय - श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़
- विराट/ढूँढाड़ – जयपुर, दौसा, टोंक
- कुरू प्रदेश – अलवर का समीपवर्ती प्रदेश
- मेवात प्रदेश – अलवर, भरतपुर का क्षेत्र
- शूरसेन – भरतपुर, धौलपुर, करौली
- मत्स्य संघ – अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली का पूर्वी भाग
- डाँग क्षेत्र – धौलपुर, करौली
- रणत प्रदेश – रणथम्भौर
- हय-हय क्षेत्र – कोटा, बूँदी का क्षेत्र
- हाड़ौती क्षेत्र – कोटा, बूँदी, बाँरा, झालावाड़
- जांगल प्रदेश – बीकानेर
- अहिच्छत्रपुर – नागौर
- मारवाड़/गुर्जर प्रदेश/ गुर्जरात्रा – जोधपुर, पाली
- माँड – जैसलमेर
- श्रीमाल – बाड़मेर (प्राचीन काल में) तथा भीनमाल (वर्तमान में)।
- वल्ल/दुंगल – जैसलमेर, बाड़मेर
- थली – चूरू के सरदार शहर का पश्चिम भाग था पश्चिम मरुस्थलीय क्षेत्र
- जाबालीपुर/सुवर्ण गिरी प्रदेश – जालौर
- चन्द्रावती – सिरोही तथा आबू – प्रदेश (अर्बूद का क्षेत्र)
- मेवाड़ – उदयपुर, राजसमन्द, चित्तौडग़ढ, भीलवाड़ा
- शिवि एवं किवी/ मेदपाट/ प्राग्वाट – मेवाड़ का क्षेत्र
- ऊपरमाल – बिजौलिया व चित्तौड़गढ़ के मध्य का क्षेत्र।
- छप्पन का मैदान – बाँसवाड़ा व प्रतापगढ़ के मध्य का क्षेत्र।
- वाँगड़ – डूँगरपुर व बाँसवाड़ा का सम्मिलित क्षेत्र।
- सेवल / देवलिया – डूँगरपुर व बाँसवाड़ा का बीच का क्षेत्र
- बाँगड़ – नागौर व चूरू का कुछ क्षेत्र।
- भोराट का पठार – कुम्भलगढ़ (1224 मीटर) व गोगुन्दा (840 मीटर) के बीच का क्षेत्र।
- लसाड़िया का पठार - उदयपुर की जयसमन्द झील का पूर्वी भाग।
- देशहरो – जरगा व रागा पहाड़ियों (उदयपुर) के बीच का पहाड़ी क्षेत्र।
- खेराड़/मालखेराड़ – भीलवाड़ा तहसील का जहाजपुर क्षेत्र एवं टोंक का कुछ सम्मिलित क्षेत्र।
- भोमट क्षेत्र – डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, उदयपुर व सिरोही का वह पहाड़ी क्षेत्र जहाँ पर भील जनजाति निवास करती है।
- भाखर – सिरोही क्षेत्र में नुकीली व उबड़-खाबड़ पहाड़ियों का स्थानीय नाम।