रीति-रिवाज

सोलह संस्कार

इस संस्कार के अन्तर्गत बालक को पहली बार घर से बाहर निकाला जाता है, यह संस्कार सूरज पूजन तथा कुआँ पूजन भी कहलाता है।

समावर्तन संस्कार के पश्चात् विवाह होने तक ब्रह्मचारी को स्नातक के नाम से जाना जाता था।

    देराळी:- समावर्तन संस्कार का बिगड़ा हुआ स्वरूप।

राजस्थान के रीति-रिवाज तीन भागों में विभक्त किए जा सकते हैं -

जन्म संबंधी रीति-रिवाज

विवाह संबंधी रीति-रिवाज

  राजपूतों में वर के पिता द्वारा अफीम अथवा केसर घोलकर उपस्थित सभी लोगों की मनुहार की जाती है, इसे सगाई का अमल/दस्तूर कहा जाता है।  

मृत्यु संबंधी रीति-रिवाज

बैकुण्ठी पर लेटाते समय सिर उत्तर दिशा में तथा पाँव दक्षिण दिशा में रखे जाते हैं।

बैकुण्ठी ले जाते समय उसे जो कँधा देते है वे कांधिया कहते हैं।

आदिवासियों का मृत्यु भोज कांगिया कहलाता है।

श्राद्ध उसी तिथि को किया जाता है, जिस तिथि को व्यक्ति की मृत्यु हुई थी।

प्रथाएँ

1.  सती प्रथा

अन्य नाम-सहमरण प्रथा/अन्वारोहण/सहगमन प्रथा

किसी महिला के पति की मृत्यु होने पर महिला द्वारा पति की चिता के साथ जिंदा जलना।

भारत में सर्वप्रथम सती होने के साक्ष्य 510 ई. में शिलालेख से प्राप्त होते है।

महासती/अनुमरण प्रथा:-

पति की किसी निशानी के साथ सती होने वाली महिला।

राजस्थान की एकमात्र महासती-उमादे मालदेव राठौड़ की पत्नी/रूठी रानी [1562 ई.]

माँ सती:- केसर कँवर-अपने पुत्र की चिता के साथ जिंदा जलने वाली महिला।

अणरव:-सती होने से पहले महिला द्वारा अपने परिवारजनों को निर्देशित करना।

बाल विवाह

बाल विवाह के विरूद्ध सर्वप्रथम 1929 ई. में अजमेर निवासी हरविलास शारदा ने बनाया जिसे शारदा एक्ट कहा जाता है।

शारदा एक्ट 1 अप्रैल, 1930 ई. को पूरे देश में लागू।

इस कानून के तहत विवाह योग्य न्यूनतम आयु

लड़का- 18 वर्ष

लड़की- 14 वर्ष

विधवा पुर्नविवाह

विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856

शारदा एक्ट

लागू-1 अप्रैल, 1930

संशोधन 1978-बाल विवाह अंकुश निवारण अधिनयम इसके तहत विवाह योग्य न्यूनतम आयु

लड़का -   21 वर्ष एवं लड़की 18 वर्ष

संशोधन-2006 बाल विवाह प्रतिषेध अधिनयम, 2006

अधिसूचित-10 जनवरी, 2007

लागू - 1 नवंबर, 2007

बाल विवाह रोकने हेतु कठोर नियमों का प्रावधान

समाधि प्रथा:-

समाधि-दो प्रकार

1-  जमीन समाधि/गढ़ा समाधि

2- जल समाधि

कन्यावध प्रथा

कन्यावध पर राजस्थान में सर्वप्रथम अंग्रेज अधिकारी हॉल ने मेरवाड क्षेत्र में मेर जाति की बैठक में लगाई।

त्याग प्रथा

दहेज प्रथा

चारी प्रथा

संथारा/संल्लेखना प्रथा:-

पर्दा प्रथा

दास प्रथा

बेगार प्रथा/हाली प्रथा

बंधित श्रम पद्धति अधिनयम, 1976

नोट:- बुंदी रियासत में महिलाओं से भी बेगार ली जाती थी।

सागड़ी/बन्धुआ मजदूर प्रथा

सागड़ी निवारण अधिनयम, 1961

माण/आन प्रथा:-

         1863 ई. में अंग्रेज अधिकारियों द्वारा इस प्रथा पर रोक लगाई।

         राज्य व राजा के प्रति स्थायी स्वामीभक्ति की शपथ लेना।

डावरिया प्रथा:-

उच्च राजघरानों में कन्या की विदाई के समय साथ भेजी जाने वाली कन्याएँ

महिलाओं का क्रय-विक्रय

महिलाओं की खरीद-फरोख्त पर वसूला जाने वाला कर "चौगान" कहलाता था।

इस प्रथा पर सर्वप्रथम रोक 1831 ई. में कोटा रियासत में लगी।

मौताणा प्रथा :-

भीलों/आदिवासियों में मौत का हर्जाना वसुलना।

दण्ड लगाये गये व्यक्ति अथवा उसके द्वारा दी गई राशि को चढोतरा कहते है।

नाता प्रथा:-

यह एक पुर्नविवाह का ही प्रकार है।

डाकण प्रथा:-

इस प्रथा पर रोक एम बी सी के कमाण्डर जे सी ब्रुक ने 1853 में लगाई।

छेङा-फाङना प्रथा:-

भीलों में तलाक देने की एक प्रथा।

जगङा प्रथा :-

भीलों में तलाक की एक प्रथा।

कूकङी रस्म/प्रथा :-

विवाह से पहले लड़की को चरित्र की परीक्षा देना।

इस प्रथा का प्रचलन सांसी जनजाति में है।