विश्व में विभिन्न प्रकार की राजनीतिक व्यवस्थाएँ कार्य कर रही हैं। विभिन्न आधारों पर इन सरकारों को विभाजित किया जा सकता है, इनमें से केन्द्र व राज्य के मध्य शक्तियों के विभाजन के आधार पर सरकारों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।
(i) संघात्मक शासन।
(ii) एकात्मक शासन।

संघात्मक शासन
- संघात्मक सरकार से तात्पर्य, ऐसी व्यवस्था से है, जहाँ दो प्रकार की सरकारें होती हैं-
प्रथम- केन्द्र सरकार
द्वितीय- राज्य सरकार
- इस व्यवस्था में एक संविधान के माध्यम से विधायी व कार्यकारी शक्तियों को केन्द्र व राज्यों, दो स्तर पर विभाजित किया जाता है। संघात्मक सरकारों में केन्द्रीयकरण तथा विकेन्द्रीकरण के मध्य संतुलन बनाने का प्रयास किया जाता है। इन व्यवस्थाओं में राज्य अपनी सांस्कृतिक विविधता को बनाये रखना चाहते हैं, परंतु सुरक्षा की दृष्टि से वे एक सम्मिलित संघ में भागीदार होना चाहते हैं।
- वर्तमान में अमेरिका, स्विट्जरलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, रूस, ब्राजील में संघात्मक शासन है।
- अमेरिका को इस व्यवस्था का जनक माना जाता है, जहाँ 1787 में सर्वप्रथम इस व्यवस्था का प्रारम्भ हुआ।

संघवाद के लक्षण-
1. शक्तियों का विभाजन
2. दोहरी सरकार
3. संविधान का प्रमुख होना
4. न्यायपालिका की स्थिति
5. दोहरी नागरिकता
6. केंद के दूसरे सदन में राज्यों का समान प्रतिनिधित्व

एकात्मक शासन
- एकात्मक शासन में संपूर्ण शक्तियाँ केवल एक केन्द्रीय सरकार में निहित होती हैं। कानून निर्माण और नीति निर्धारण केवल केन्द्रीय सरकार द्वारा किया जाता है। जैसे-ग्रेट ब्रिटेन।
- इन व्यवस्थाओं में राज्य सरकारें एक नगर निगम की तरह होती हैं और उनके पास संवैधानिक अधिकार नहीं होते हैं।

संघात्मक एवं एकात्मक सरकार का तुलनात्मक विश्लेषण

संघात्मक सरकार    

एकात्मक सरकार

1. दोहरी सरकार (अर्थात् राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय सरकार)

एकल सरकार राष्ट्रीय सरकार होती है, जो क्षेत्रीय सरकार बना सकती है।

2. लिखित संविधान।

संविधान लिखित भी हो सकता है (फ्रांस) या अलिखित (ब्रिटेन) भी।

3. राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय सरकारों के मध्य शक्तियों का विभाजन।

शक्तियों का कोई विभाजन नहीं होता तथा समस्त शक्तियाँ राष्ट्रीय सरकार में निहित होती हैं।

4. संविधान की सर्वोच्चता।

संविधान सर्वोच्च भी हो सकता है (जापान) और नहीं भी (ब्रिटेन)।

5. कठोर संविधान।

संविधान कठोर भी हो सकता है (फ्रांस) या लचीला (ब्रिटेन) भी।

6. स्वतंत्र न्यायपालिका।

 

न्यायपालिका स्वतंत्र भी हो सकती है नहीं भी।

7. द्विसदनीय विधायिका।

 

विधायिका द्विसदनीय भी हो सकती है (ब्रिटेन) और एक सदनीय (चीन) भी।

 

भारतीय संविधान के संघात्मक लक्षण
- भारतीय संविधान निर्माताओं ने संघीय शासन-पद्धति को अपनाया किंतु संविधान के अनुच्छेद 1 में कहा गया है कि India, that is Bharat, shall be a Union of States', संविधान में संघ (Federation) के स्थान पर 'यूनियन' (Union) शब्द का प्रयोग किया गया है। अर्थात् भारत राज्यों का एक संघ है। जिसका आशय है कि-
भारतीय संघ राज्यों के बीच सहमति का प्रतिफल नहीं है तथा
राज्यों को संघ से पृथक् होने का अधिकार नहीं है
- भारत की संघीय व्यवस्था ‘कनाडाई मॉडल' पर आधारित है जिसमें केन्द्र को शक्तिशाली बनाया गया है।
- हालांकि भारतीय संविधान में संघ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। अमेरिकी संघ को अविनाशी राज्य का अविनाशी संघ कहा जाता हैं, जबकि भारतीय संघ को विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ कहा जाता है।
- भारत की संसद साधारण बहुमत से नये राज्यों की रचना, नाम, क्षेत्र में परिवर्तन कर सकती है। भारतीय संविधान में विशुद्ध रूप से संघीय व्यवस्था न अपनाकर संघात्मक व एकात्मक शासन व्यवस्था का मिश्रित रूप अपनाया गया है।

1. शक्तियों का विभाजन-
- भारत में एक संविधान द्वारा केन्द्र व राज्य के मध्य शक्तियों का विभाजन किया गया है।
- भारतीय संविधान के सातवीं अनुसूची में संघ एवं राज्यों के मध्य शक्तियों का विभाजन किया गया है। यह विभाजन एक लिखित एवं सर्वोच्च संविधान के द्वारा किया गया है। इसकी व्याख्या के लिए एक स्वतंत्र न्यायपालिका का भी प्रावधान है।
संघ सूची-
- इस सूची में मूलतः 97 विषय थे जबकि वर्तमान में 100 विषय हैं। संघ सूची में विषयों पर कानून निर्माण की शक्ति संसद को प्राप्त है।
1. भारत की और उसके प्रत्येक भाग की रक्षा, जिसके अंतर्गत रक्षा के लिए तैयारी और ऐसे सभी कार्य हैं, जो युद्ध के समय युद्ध के संचालन और उसकी समाप्ति के पश्चात प्रभावी सैन्यवियोजन में सहायक हों।
2. नौसेना, सेना और वायुसेना; संघ के अन्य सशस्त्र बल।
क. संघ के किसी सशस्त्र बल या संघ के नियंत्रण के अधीन किसी अन्य बल का या उसकी किसी टुकड़ी या यूनिट का किसी राज्य में सिविल शक्ति की सहायता में अभिनियोजन; ऐसे अभिनियोजन के समय ऐसे बलों के सदस्यों की शक्तियाँ, अधिकारिता, विशेषाधिकार और दायित्व।)
3. छावनी क्षेत्रों का परिसीमन, ऐसे क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन, ऐसे क्षेत्रों के भीतर छावनी प्राधिकारियों का गठन और उनकी शक्तियाँ तथा ऐसे क्षेत्रों में गृह वास-सुविधा का विनियमन (जिसके अंतर्गत भारत का नियंत्रण है)।
4. नौसेना, सेना और वायुसेना संकर्म।
5. आयुध, अग्रायुध, गोलाबारूद और विस्फोटक।
6. परमाणु ऊर्जा और उसके उत्पादन के लिए आवश्यक खनिज संपत्ति स्त्रोत।
7. संसद या विधि द्वारा रक्षा के प्रयोजन के लिए या युद्ध के संचालन के लिए आवश्यक घोषित किए गए उद्योग।
8. केंद्रीय आसूचना और अन्वेषण ब्यूरो।
9. रक्षा, विदेश कार्य या भारत की सुरक्षा संबंधी कारणों से निवारक निरोध; इस प्रकार निरोध में रखे गए व्यक्ति।
10. विदेश कार्य, सभी विषय जिनके द्वारा संघ का किसी विदेश से संबंध होता है।
11. राजनयिक, कौंसलीय और व्यापारिक प्रतिनिधित्व।
12. संयुक्त राष्ट्र संघ।
13. अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों, संगमों और अन्य निकायों में भाग लेना और उनमें किए गए विनिश्चयों का कार्यान्वयन।
14. विदेशों से संधि और करार करना और विदेशों से की गई संधियों, करारों और अभिसमयों का कार्यान्वयन।
15. युद्ध और शांति।
16. वैदेशिक अधिकारिता।
17. नागरिकता, देशीयकरण और अन्यदेशीय।
18. प्रत्यर्पण।
19. भारत में प्रवेश और उसमें से उत्प्रवास और निष्कासन; पासपोर्ट और वीजा।
20. भारत से बाहर के स्थानों की तीर्थयात्राएँ।
21. खुले समुद्र या आकाश में की गई दस्युता और अपराध; स्थल या खुले समुद्र या आकाश में राष्ट्रों की विधि के विरुद्ध किए गए अपराध।
22. रेल।
23. ऐसे राजमार्ग जिन्हें संसद द्वारा बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित किया गया है।
24. यंत्र नोदित जलयानों के संबंध में ऐसे अंतर्देशीय जलमार्गों पर पोतपरिवहन और नौपरिवहन जो संसद या विधि द्वारा राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किए गए हैं; ऐसे जलमार्गों पर मार्ग का नियम।
25. समुद्री पोतपरिवहन और नौपरिवहन, जिसके अंतर्गत ज्वारीय जल में पोतपरिवहन और नौपरिवहन है; वाणिज्यिक समुद्री बेड़े
संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 57 द्वारा (3-1-1977 से) अंतःस्थापित के लिए शिक्षा और प्रशिक्षण की व्यवस्था तथा राज्यों और अन्य अभिकरणों द्वारा दी जाने वाली ऐसी शिक्षा और प्रशिक्षण का विनियमन।
26. प्रकाशस्तंभ, जिनके अंतर्गत प्रकाशपोत, बीकन तथा पोतपरिवहन और वायुयानों की सुरक्षा के लिए अन्य व्यवस्था है।
27. ऐसे पत्तन जिन्हें संसद द्वारा बनाई गई विधि या विद्यमान विधि द्वारा या उसके अधीन महापत्तन घोषित किया जाता है, जिसके अंतर्गत उनका परिसीमन और उनमें पत्तन प्राधिकारियों का गठन और उनकी शक्तियाँ हैं।
28. पत्तन करतीन, जिसके अंतर्गत उससे संबद्ध अस्पताल हैं; जैसे- नाविक और समुद्रीय अस्पताल।
29. वायुमार्ग, वायुयान और विमान चालन; विमानक्षेत्रों की व्यवस्था; विमान यातायात और विमानक्षेत्रों का विनियमन और संगठन; वैमानिक शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए व्यवस्था तथा राज्यों और अन्य अभिकरणों द्वारा दी जाने वाली ऐसी शिक्षा और प्रशिक्षण का विनियमन।
30. रेल, समुद्र या वायु मार्ग द्वारा अथवा यंत्र नोदित जलयानों में राष्ट्रीय जलमार्गों द्वारा यात्रियों और माल का वहन।
31. डाक-तार; टेलीफोन, बेतार, प्रसारण और वैसे ही अन्य संचार साधन।
32. संघ की संपत्ति और उससे राजस्व, किंतु किसी (1****) राज्य में स्थित संपत्ति के संबंध में, वहाँ तक के सिवाय जहां तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध करे, उस राज्य के विधान के अधीन रहते हुए।
33. -- - -
34. देशी राज्यों के शासकों की संपदा के लिए प्रतिपाल्य अधिकरण।
35. संघ का लोकऋण।
36. करेंसी, सिक्का निर्माण और वैध निविदा, विदेशी मुद्रा।
37. विदेशी ऋण।
38. भारतीय रिजर्व बैंक।
39. डाकघर बचत बैंक।
40. भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार द्वारा संचालित लॉटरी।
41. विदेशों के साथ व्यापार और वाणिज्य; सीमा शुल्क सीमांतों के आर-पार आयात और निर्यात; सीमा शुल्क सीमांतों का परिनिश्चय।
42. अंतरराज्यिक व्यापार और वाणिज्य।
43. व्यापार निगमों का, जिनके अंतर्गत बैंककारी, बीमा और वित्तीय निगम हैं किंतु सहकारी सोसाइटी नहीं हैं, निगमन, विनियमन और परिसमापन।
44. विश्वविद्यालयों को छोड़कर ऐसे निगमों का, चाहे वे व्यापार निगम हों या नहीं, जिनके उद्देश्य एक राज्य तक सीमित नहीं हैं, निगमन, विनियमन और परिसमापन।
45. बैंककारी।
46. विनिमय-पत्र, चेक, वचनपत्र और वैसी ही अन्य लिखतें।
47. बीमा।
48. स्टॉक एक्सचेंज और वायदा बाजार।
49. पेटेंट, आविष्कार और डिजाइन; प्रतिलिप्याधिकार; व्यापार चिह्न और पण्य वस्तु चिह्न।
50. बाटों और मापों के मानक नियत करना।
51. भारत से बाहर निर्यात किए जाने वाले या एक राज्य से दूसरे राज्य को परिवहन किए जाने वाले माल की क्वालिटी के मानक नियत करना।
52. वे उद्योग जिनके संबंध में संसद ने विधि द्वारा घोषणा की है कि उन पर संघ का नियंत्रण लोकहित में समीचीन है।
1. संविधान (सातवाँ संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 29 और अनुसूची द्वारा 'पहली अनुसूची के भाग क या भाग ख में विनिर्दिष्ट' शब्दों और अक्षरों का लोप किया गया।
2. संविधान (सातवाँ संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 26 द्वारा प्रविष्टि 33 का लोप किया गया।
53. तेलक्षेत्रों और खनिज तेल संपत्ति स्त्रोतों का विनियमन और विकास; पेट्रोलियम और पेट्रोलियम उत्पाद; अन्य द्रव और पदार्थ जिनके विषय में संसद ने विधि द्वारा घोषणा की है कि वे खतरनाक रूप से ज्वलनशील हैं।
54. उस सीमा तक खानों का विनियमन और खनिजों का विकास जिस तक संघ के नियंत्रण के अधीन ऐसे विनियमन और विकास को संसद, विधि द्वारा, लोकहित में समीचीन घोषित करे।
55. खानों और तेलक्षेत्रों में श्रम और सुरक्षा का विनियमन।
56. उस सीमा तक अंतरराज्यिक नदियों और नदी दूनों का विनियमन और विकास जिस तक संघ के नियंत्रण के अधीन ऐसे विनियमन और विकास को संसद, विधि द्वारा, लोकहित में समीचीन घोषित करे।
57. राज्यक्षेत्रीय सागरखंड से परे मछली पकड़ना और मीन क्षेत्र।
58. संघ के अभिकरणों द्वारा नमक का विनिर्माण, प्रदाय और वितरण; अन्य अभिकरणों द्वारा किए गए नमक के विनिर्माण, प्रदाय और वितरण का विनियमन और नियंत्रण।
59. अफीम की खेती, उसका विनिर्माण और निर्यात के लिए विक्रय।
60. प्रदर्शन के लिए चलचित्र फिल्मों की मंजूरी।
61. संघ के कर्मचारियों से संबंधित औद्योगिक विवाद।
62. इस संविधान के प्रारंभ पर राष्ट्रीय पुस्तकालय, भारतीय संग्रहालय, इंपीरियल युद्ध संग्रहालय, विक्टोरिया स्मारक और भारतीय युद्ध स्मारक नामों से ज्ञात संस्थाएँ और भारत सरकार द्वारा पूर्णतः या भागतः वित्तपोषित और संसद द्वारा, विधि द्वारा, राष्ट्रीय महत्व की घोषित वैसी ही कोई अन्य संस्था।
63. इस संविधान के प्रारंभ पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और (1) (दिल्ली विश्वविद्यालय) नामों से ज्ञात संस्थाएँ; (1) (अनुच्छेद 371ङ के अनुसरण में स्थापित विश्वविद्यालय;) संसद द्वारा, विधि द्वारा, राष्ट्रीय महत्व की घोषित कोई अन्य संस्था।
64. भारत सरकार द्वारा पूर्णतः या भागतः वित्तपोषित और संसद द्वारा, विधि द्वारा राष्ट्रीय महत्व की घोषित वैज्ञानिक या तकनीकी शिक्षा संस्थाएँ।
65. संघ के अभिकरण और संस्थाएँ जो-
(क) वृत्तिक, व्यावसायिक या तकनीकी प्रशिक्षण के लिए हैं जिसके अंतर्गत पुलिस अधिकारियों का प्रशिक्षण हैं या
(ख) विशेष अध्ययन या अनुसंधान की अभिवृद्धि के लिए हैं; या
(ग) अपराध के अन्वेषण या पता चलाने में वैज्ञानिक या तकनीकी सहायता के लिए हैं।
66. उच्चतर शिक्षा या अनुसंधान संस्थाओं में तथा वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थाओं में मानकों का समन्वय और अवधारण।
67.
(1) (संसद द्वारा बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन) राष्ट्रीय महत्व के
(2) (घोषित) प्राचीन और ऐतिहासिक संस्मारक और अभिलेख तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष।
68. भारतीय सर्वेक्षण, भारतीय भूवैज्ञानिक, वनस्पति विज्ञान, प्राणी विज्ञान और मानव शास्त्र सर्वेक्षण; मौसम विज्ञान संगठन।
69. जनगणना।
70. संघ लोक सेवाएँ; अखिल भारतीय सेवाएँ; संघ लोक सेवा आयोग।
71. संघ की पेंशनें, अर्थात्‌ भारत सरकार द्वारा या भारत की संचित निधि में से संदेय पेंशनें।
72. संसद के लिए, राज्यों के विधान-मंडलों के लिए तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए निर्वाचन; निर्वाचन आयोग।
73. संसद सदस्यों के, राज्य सभा के सभापति और उपसभापति के तथा लोक सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन और भत्ते।
74. संसद के प्रत्येक सदन की और प्रत्येक सदन के सदस्यों और समितियों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ; संसद की समितियों या संसद द्वारा नियुक्त आयोगों के समक्ष साक्ष्य देने या दस्तावेज पेश करने के लिए व्यक्तियों को हाजिर कराना।
75. राष्ट्रपति और राज्यपालों की उपलब्धियाँ, भत्ते, विशेषाधिकार और अनुपस्थिति छुट्टी के संबंध में अधिकार; संघ के मंत्रियों के वेतन और भत्ते; नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के वेतन, भत्ते और अनुपस्थिति छुट्टी के संबंध में अधिकार और सेवा की अन्य शर्तें।
1. संविधान (बत्तीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1973 की धारा 4 द्वारा (1-7-1974 से) 'दिल्ली विश्वविद्यालय और' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
2. संविधान (सातवाँ संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 27 द्वारा 'संसद द्वारा विधि द्वारा घोषित' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
76. संघ के और राज्यों के लेखाओं की संपरीक्षा।
77. उच्चतम न्यायालय का गठन, संगठन, अधिकारिता और शक्तियाँ (जिनके अंतर्गत उस न्यायालय का अवमान है) और उसमें ली जाने वाली फीस; उच्चतम न्यायालय के समक्ष विधि-व्यवसाय करने के हकदार व्यक्ति।
78. उच्च न्यायालयों के अधिकारियों और सेवकों के बारे में उपबंधों को छोड़कर उच्च न्यायालयों का गठन और संगठन
(1) (जिसके अंतर्गत दीर्घावकाश है); उच्च न्यायालयों के समक्ष विधि-व्यवसाय करने के हकदार व्यक्ति।
(2)
79. किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता का किसी संघ राज्यक्षेत्र पर विस्तारण और उससे अपवर्जन।)
80. किसी राज्य के पुलिस बल के सदस्यों की शक्तियों और अधिकारिता का उस राज्य से बाहर किसी क्षेत्र पर विस्तारण, किंतु इस प्रकार नहीं कि एक राज्य की पुलिस उस राज्य से बाहर किसी क्षेत्र में उस राज्य की सरकार की सहमति के बिना जिसमें ऐसा क्षेत्र स्थित है, शक्तियों और अधिकारिता का प्रयोग करने में समर्थ हो सके; किसी राज्य के पुलिस बल के सदस्यों की शक्तियों और अधिकारिता का उस राज्य से बाहर रेल क्षेत्रों पर विस्तारण।
81. अंतरराज्यिक प्रव्रजन; अंतरराज्यिक करंतीन।
82. कृषि-आय से भिन्न आय पर कर।
83. सीमाशुल्क जिसके अंतर्गत निर्यात शुल्क है।
84. भारत में विनिर्मित या उत्पादित तंबाकू और अन्य माल पर उत्पाद-शुल्क जिसके अंतर्गत-
(क) मानवीय उपभोग के लिए ऐल्कोहोली लिकर,
(ख) अफीम, इंडियन हेंप और अन्य स्वापक औषधियाँ तथा स्वापक पदार्थ, नहीं हैं; किंतु ऐसी औषधीय और प्रसाधन निर्मितियाँ हैं जिसमें ऐल्कोहाल या इस प्रविष्टि के उपपैरा (ख) का कोई पदार्थ अंतर्विष्ट है।
85. निगम कर।
86. व्यष्टियों और कंपनियों की आस्तियों के, जिनके अंतर्गत कृषि भूमि नहीं है, पूँजी मूल्य पर कर; कंपनियों की पूँजी पर कर।
87. कृषि भूमि से भिन्न संपत्ति के संबंध में संपदा शुल्क।
88. कृषि भूमि से भिन्न संपत्ति के उत्तराधिकार के संबंध में शुल्क।
89. रेल, समुद्र या वायुमार्ग द्वारा ले जाए जाने वाले माल या यात्रियों पर सीमा कर; रेल भाड़ों और माल भाड़ों पर कर।
90. स्टॉक एक्सचेंजों और वायदा बाजारों के संव्यवहारों पर स्टांप-शुल्क से भिन्न कर।
91. विनिमयपत्रों, चेकों, वचनपत्रों, वहनपत्रों, प्रत्ययपत्रों, बीमा पालिसियों, शेयरों के अंतरण, डिबेंचरों, परोक्षियों और प्राप्तियों के संबंध में स्टांप-शुल्क की दर।
92. समाचारपत्रों के क्रय या विक्रय और उनमें प्रकाशित विज्ञापनों पर कर।
क. समाचारपत्रों से भिन्न माल के क्रय या विक्रय पर उस दशा में कर जिसमें ऐसा क्रय या विक्रय अंतरराज्यिक व्यापार या वाणिज्य के दौरान होता है।)
ख. माल के परेषण पर (चाहे परेषण उसके करने वाले व्यक्ति को या किसी अन्य व्यक्ति को किया गया है), उस दशा में कर जिसमें ऐसा परेषण अंतरराज्यिक व्यापार या वाणिज्य के दौरान होता है।)
93. इस सूची के विषयों में से किसी विषय से संबंधित विधियों के विरुद्ध अपराध।
94. इस सूची के विषयों में से किसी विषय के प्रयोजनों के लिए जाँच, सर्वेक्षण और आँकड़े।
95. उच्चतम न्यायालय से भिन्न सभी न्यायालयों की इस सूची के विषयों में से किसी विषय के संबंध में अधिकारिता और शक्तियाँ; नवीनीकरण विषयक अधिकारिता।
96. इस सूची के विषयों में से किसी विषय के संबंध में फीस, किंतु इसके अंतर्गत किसी न्यायालय में ली जाने वाली फीस नहीं है।
1. संविधान (पंद्रहवाँ संशोधन) अधिनियम, 1963 की धारा 12 द्वारा (भूतलक्षी प्रभाव से) अंतःस्थापित।
2. संविधान (सातवाँ संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 29 और अनुसूची द्वारा प्रविष्टि 79 के स्थान पर प्रतिस्थापित।
3. संविधान (छठा संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित।
4. संविधान (छियालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1982 की धारा 5 द्वारा (2-2-1983 से) अंतःस्थापित।
97. कोई अन्य विषय जो सूची 2 या सूची 3 में प्रगणित नहीं है और जिसके अंतर्गत कोई ऐसा कर है जो उन सूचियों में से किसी सूची में उल्लिखित नहीं है।

राज्य सूची
-  राज्य सूची में क्षेत्रीय महत्व के विषय आते हैं जिन पर कानून निर्माण की शक्ति राज्य विधानमण्डल को है।
- राज्य सूची में मूलतः 66 विषय से परंतु 42वें संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा राज्य सूची के 5 विषयों को (शिक्षा, वन, नाप एवं तौल, वन्यजीवों एवं पक्षियों का संरक्षण तथा न्याय का प्रशासन) समवर्ती सूची में शामिल कर दिया गया। वर्तमान में 61 विषय हैं।
- विशेष स्थिति जिन में केंद्र राज्य के विषयों पर कानून बना सकता है-
- अनुच्छेद 200 के अनुसार, राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रख सकता है और राष्ट्रपति बिना कोई कारण बताए विधेयक को अस्वीकृत कर सकता है।
- अनुच्छेद 249 के अनुसार, यदि राज्यसभा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से यह संकल्प पारित करती है कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक या समीचीन है कि संसद राज्य-सूची में शामिल किसी विषय पर विधि बनाए, तो संसद उस विषय पर संकल्प के प्रभावी रहने तक विधि बना सकेगी।
- अनुच्छेद 250 के अनुसार, जब देश में अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत राष्ट्रीय आपात की उद̖घोषणा लागू हो, तब संसद को राज्य-सूची में शामिल विषयों पर भारत या उसके किसी भाग के लिए विधि निर्माण का अधिकार होगा।
- अनुच्छेद 252 के अनुसार, यदि दो या दो से अधिक राज्यों के विधानमंडल संकल्प पारित करके संसद से अनुरोध करते हैं तो संसद राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बना सकेगी।
- अनुच्छेद 253 के अनुसार, संसद को यह विशेष शक्ति दी गई है कि वह भारत सरकार द्वारा किसी अन्य देश के साथ की गई संधि, करार, अभिसमय या किसी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन, संगठन आदि पर किए गए किसी निर्णय को लागू करने के लिए विधि पारित कर सकती है। ऐसी विधि भारत के संपूर्ण राज्य क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए हो सकती है।
- अनुच्छेद 356 के अनुसार, किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन या राज्य-आपात की उद्घोषणा की जाती है तो राज्य के विधानमंडल की शक्तियाँ कुछ समय के लिए केन्द्र को प्राप्त हो जाती हैं। अनुच्छेद-357 में यह स्पष्ट किया गया है कि राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य के विधानमंडल की शक्तियाँ संसद द्वारा या संसद के प्राधिकार के अधीन प्रयोग की जाएंगी।
1. लोक व्यवस्था (किंतु इसके अंतर्गत सिविल शक्ति की सहायता के लिए
(1) (नौसेना, सेना या वायु सेना या संघ के किसी अन्य सशस्त्र बल का या संघ के नियंत्रण के अधीन किसी अन्य बल का या उसकी किसी टुकड़ी या यूनिट का प्रयोग) नहीं है)।
(2)
2. सूची 1 की प्रविष्टि 2क के उपबंधों के अधीन रहते हुए पुलिस (जिसके अंतर्गत रेल और ग्राम पुलिस है)।
3. (3****) उच्च न्यायालय के अधिकारी और सेवक; भाटक और राजस्व न्यायालयों की प्रक्रिया; उच्चतम न्यायालय से भिन्न सभी न्यायालयों में ली जाने वाली फीस।
4. कारागार, सुधारालय, बोर्स्टल संस्थाएँ और उसी प्रकार की अन्य संस्थाएँ और उनमें निरुद्ध व्यक्ति; कारागारों और अन्य संस्थाओं के उपयोग के लिए अन्य राज्यों से ठहराव।
5. स्थानीय शासन, अर्थात्‌ नगर निगमों, सुधार न्यासों, जिला बोर्डों, खनन-बस्ती प्राधिकारियों और स्थानीय स्वशासन या ग्राम प्रशासन के प्रयोजनों के लिए अन्य स्थानीय प्राधिकारियों का गठन और शक्तियाँ।
6. लोक स्वास्थ्य और स्वच्छता; अस्पताल और औषधालय।
7. भारत से बाहर के स्थानों की तीर्थयात्राओं से भिन्न तीर्थयात्राएँ।
8. मादक लिकर, अर्थात्‌ मादक लिकर का उत्पादन, विनिर्माण, कब्जा, परिवहन, क्रय और विक्रय।
9. निःशक्त और नियोजन के लिए अयोग्य व्यक्तियों की सहायता।
10. शव गाड़ना और कब्रिस्तान; शव-दाह और श्मशान।
11. राज्य द्वारा नियंत्रित या वित्तपोषित पुस्तकालय, संग्रहालय या वैसी ही अन्य संस्थाएँ; (5) (संसद द्वारा बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन) राष्ट्रीय महत्व के (5) (घोषित किए गए) प्राचीन और ऐतिहासिक संस्मारकों और अभिलेखों से भिन्न प्राचीन और ऐतिहासिक संस्मारक और अभिलेख।
12. -
13. संचार, अर्थात्‌ सड़कें, पुल, फेरी और अन्य संचार साधन जो सूची 1 में विनिर्दिष्ट नहीं हैं; नगरपालिक ट्राम; रज्जुमार्ग; अंतर्देशीय जलमार्गों के संबंध में सूची 1 और सूची 3 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अंतर्देशीय जलमार्ग और उन पर यातायात; यंत्र नोदित यानों से भिन्न यान।
14. कृषि जिसके अंतर्गत कृषि शिक्षा और अनुसंधान, नाशक जीवों से संरक्षण और पादप रोगों का निवारण है।
15. पशुधन का परिरक्षण, संरक्षण और सुधार तथा जीवजंतुओं के रोगों का निवारण; पशु चिकित्सा प्रशिक्षण और व्यवसाय।
16. कांजी हाउस और पशु अतिचार का निवारण।
17. सूची 1 की प्रविष्टि 56 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, जल, अर्थात्‌ जल प्रदाय, सिंचाई और नहरें, जल निकास और तटबंध, जल भंडारकरण और जल शक्ति।
18. भूमि, अर्थात्‌ भूमि में या उस पर अधिकार, भूधृति जिसके अंतर्गत भूस्वामी और अभिधारी का संबंध है और भाटक का संग्रहण; कृषि भूमि का अंतरण और अन्य संक्रामण; भूमि विकास और कृषि उधार; उपनिवेशन।
19. -- - -
20. - - - -
21. मात्स्यिकी।
1. संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 57 द्वारा (3-1-1977 से) कुछ शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।
2. संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 57 द्वारा (3-1-1977 से) प्रविष्टि 2 के स्थान पर प्रतिस्थापित।
3. संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 57 द्वारा (3-1-1977 से) कुछ शब्दों का लोप किया गया।
4. संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 57 द्वारा (3-1-1977 से) प्रविष्टि 11, 19 और 20 का लोप किया गया।
5. संविधान (सातवाँ संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 27 द्वारा 'संसद द्वारा विधि द्वारा घोषित' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
22. सूची 1 की प्रविष्टि 34 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रतिपाल्य-अधिकरण; विल्लंगमित और कुर्क की गई संपदा।
23. संघ के नियंत्रण के अधीन नियमन और विकास के संबंध में सूची 1 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, खानों का विनियमन और खनिज विकास।
24. सूची 1 की (1) (प्रविष्टि 7 और प्रविष्टि 52) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उद्योग।
25. गैस और गैस संकर्म।
26. सूची 3 की प्रविष्टि 33 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्य के भीतर व्यापार और वाणिज्य।
27. सूची 3 की प्रविष्टि 33 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, माल का उत्पादन, प्रदाय और वितरण।
28. बाजार और मेले।
29. -
30. साहूकारी और साहूकार; कृषि ऋणता से मुक्ति।
31. पांथशाला और पांथशालापाल।
32. ऐसे निगमों का, जो सूची 1 में विनिर्दिष्ट निगमों से भिन्न हैं और विश्वविद्यालयों का निगमन, विनियमन और परिसमापन; अनिगमित व्यापारिक, साहित्यिक, वैज्ञानिक, धार्मिक और अन्य सोसाइटियाँ और संगम; सहकारी सोसाइटियाँ।
33. नाट्यशाला और नाट्यप्रदर्शन; सूची 1 की प्रविष्टि 60 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, सिनेमा; खेलकूद, मनोरंजन और आमोद।
34. दांव और द्यूत।
35. राज्य में निहित या उसके कब्जे के संकर्म, भूमि और भवन।
36. -- -
37. संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्य के विधान-मंडल के लिए निर्वाचन।
38. राज्य के विधान-मंडल के सदस्यों के विधान सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के और, यदि विधान परिषद् है तो, उसके सभापति और उपसभापति के वेतन और भत्ते।
39. विधान सभा की और उसके सदस्यों और समितियों की तथा, यदि विधान परिषद है तो, उस विधान परिषद की और उसके सदस्यों और समितियों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ; राज्य के विधान-मंडल की समितियों के समक्ष साक्ष्य देने या दस्तावेज पेश करने के लिए व्यक्तियों को हाजिर कराना।
40. राज्य के मंत्रियों के वेतन और भत्ते।
41. राज्य लोक सेवाएँ; राज्य लोक सेवा आयोग।
42. राज्य की पेंशनें, अर्थात्‌ राज्य द्वारा या राज्य की संचित निधि में से संदेय पेंशन।
43. राज्य का लोक ऋण।
44. निखात निधि।
45. भू-राजस्व जिसके अंतर्गत राजस्व का निर्धारण और संग्रहण, भू-अभिलेख रखना, राजस्व के प्रयोजनों के लिए और अधिकारों के अभिलेखों के लिए सर्वेक्षण और राजस्व का अन्यसंक्रामण है।
46. कृषि-आय पर कर।
47. कृषि भूमि के उत्तराधिकार के संबंध में शुल्क।
48. कृषि भूमि के संबंध में संपदा-शुल्क।
49. भूमि और भवनों पर कर।
50. संसद द्वारा, विधि द्वारा, खनिज विकास के संबंध में अधिरोपित निर्बंधनों के अधीन रहते हुए, खनिज संबंधी अधिकारों पर कर।
1. संविधान (सातवाँ संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 28 द्वारा 'प्रविष्टि 52' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
2. संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 57 द्वारा (3-1-1977 से) प्रविष्टि 29 का लोप किया गया।
3. संविधान (सातवाँ संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 26 द्वारा प्रविष्टि 36 का लोप किया गया।
51. राज्य में विनिर्मित या उत्पादित निम्नलिखित माल पर उत्पाद-शुल्क और भारत में अन्यत्र विनिर्मित या उत्पादित वैसे ही माल पर उसी दर या निम्नतर दर से प्रतिशुल्क-
(क) मानवीय उपभोग के लिए ऐल्कोहाली लिकर;
(ख) अफीम, इंडियन हेंप और अन्य स्वापक औषधियाँ तथा स्वापक पदार्थ, किंतु जिसके अंतर्गत ऐसी औषधियाँ और प्रसाधन निर्मितियाँ नहीं हैं जिनमें ऐल्कोहाल या इस प्रविष्टि के उपपैरा (ख) का कोई पदार्थ अंतर्विष्ट है।
52. किसी स्थानीय क्षेत्र में उपभोग, प्रयोग या विक्रय के लिए माल के प्रवेश पर कर।
53. विद्युत के उपभोग या विक्रय पर कर।
54. सूची 1 की प्रविष्टि 92क के उपबंधों के अधीन रहते हुए, समाचारपत्रों से भिन्न माल के क्रय या विक्रय पर कर।)
55. समाचारपत्रों में प्रकाशित (2) (और रेडियो या दूरदर्शन द्वारा प्रसारित विज्ञापनों) से भिन्न विज्ञापनों पर कर।
56. सड़कों या अंतर्देशीय जलमार्गों द्वारा ले जाए जाने वाले माल और यात्रियों पर कर।
57. सूची 3 की प्रविष्टि 35 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, सड़कों पर उपयोग के योग्य यानों पर कर, चाहे वे यंत्र नोदित हों या नहीं, जिनके अंतर्गत ट्रामकार हैं।
58. जीवजंतुओं और नौकाओं पर कर।
59. पथकर।
60. वृत्तियों, व्यापारों, आजीविकाओं और नियोजन पर कर।
61. प्रतिव्यक्ति कर।
62. विलास वस्तुओं पर कर, जिसके अंतर्गत मनोरंजन, आमोद, दांव और द्यूत पर कर हैं।
63. स्टांप-शुल्क की दरों के संबंध में सूची 1 के उपबंधों में विनिर्दिष्ट दस्तावेजों से भिन्न दस्तावेजों के संबंध में स्टांप-शुल्क की दर।
64. इस सूची के विषयों में से किसी विषय से संबंधित विधियों के विरुद्ध अपराध।
65. उच्चतम न्यायालय से भिन्न सभी न्यायालयों की इस सूची के विषय में से किसी विषय के संबंध में अधिकारिता और शक्तियाँ।
66. इस सूची के विषयों में से किसी विषय के संबंध में फीस, किंतु इसके अंतर्गत किसी न्यायालय में ली जाने वाली फीस नहीं है।

समवर्ती सूची
- इस सूची के विषय पर कानून बनाने की शक्ति राज्य और केंद्र दोनों को पप्राप्त है मगर किसी मुद्दे पर संघर्ष उत्पन्न होने पर केंद की विधि मान्य होगी।
- अनुच्छेद-254 के तहत अगर राज्य इस सूची के किसी विषय पर कानून बना दे और राष्ट्रपति सहमति दे दे तो यह विधि मान्य होगी।
- समवर्ती सूची में मूलतः 47 विषय थे लेकिन वर्तमान में 52 विषय है (42वें संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा इसमें 5 विषय राज्य सूची के शामिल कर दिये गये तथा नया विषय जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन भी शामिल किया गया।
1. दंड विधि जिसके अंतर्गत ऐसे सभी विषय हैं जो इस संविधान के प्रारंभ पर भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत आते हैं, किंतु इसके अंतर्गत सूची 1 या सूची 2 में विनिर्दिष्ट विषयों में से किसी विषय से संबंधित विधियों के विरुद्ध अपराध और सिविल शक्ति की सहायता के लिए नौसेना, सेना या वायुसेना अथवा संघ के किसी अन्य सशस्त्र बल का प्रयोग नहीं है।
2. दंड प्रक्रिया जिसके अंतर्गत ऐसे सभी विषय हैं जो इस संविधान के प्रारंभ पर दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत हैं।
3. किसी राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था बनाए रखने या समुदाय के लिए आवश्यक प्रदायों और सेवाओं को बनाए रखने संबंधी कारणों से निवारक निरोध; इस प्रकार निरोध में रखे गए व्यक्ति।
4. बंदियों, अभियुक्त व्यक्तियों और इस सूची की प्रविष्टि 3 में विनिर्दिष्ट कारणों से निवारक निरोध में रखे गए व्यक्तियों का एक राज्य से दूसरे राज्य को हटाया जाना।
5. विवाह और विवाह-विच्छेद; शिशु और अवयस्क; दत्तक-ग्रहण; विल, निर्वसीयतता और उत्तराधिकार; अविभक्त कुटुंब और विभाजन; वे सभी विषय जिनके संबंध में न्यायिक कार्यवाहियों में पक्षकार इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले अपनी स्वीय विधि के अधीन थे।
6. कृषि भूमि से भिन्न संपत्ति का अंतरण; विलेखों और दस्तावेजों का रजिस्ट्रीकरण।
1. संविधान (छठा संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 2 द्वारा प्रविष्टि 54 के स्थान पर प्रतिस्थापित।
2. संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 57 द्वारा (3-1-1977 से) अंतःस्थापित।
7. संविदाएँ जिनके अंतर्गत भागीदारी, अभिकरण, वहन की संविदाएँ और अन्य विशेष प्रकार की संविदाएँ हैं, किंतु कृषि भूमि संबंधी संविदाएँ नहीं हैं।
8. अनुयोज्य दोष।
9. शोधन अक्षमता और दिवाला।
10. न्यास और न्यासी।
11. महाप्रशासक और शासकीय न्यासी।
1. (11क. न्याय प्रशासन; उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों से भिन्न सभी न्यायालयों का गठन और संगठन।)
12. साक्ष्य और शपथ; विधियों, लोक कार्यों और अभिलेखों और न्यायिक कार्यवाहियों को मान्यता।
13. सिविल प्रक्रिया जिसके अंतर्गत ऐसे सभी विषय हैं जो इस संविधान के प्रारंभ पर सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आते हैं, परिसीमा और माध्यस्थ।
14. न्यायालय का अवमान, किंतु इसके अंतर्गत उच्चतम न्यायालय का अवमान नहीं है।
15. आहिंडन; यायावरी और प्रव्राजी जनजातियाँ।
16. पागलपन और मनोवैकल्य, जिसके अंतर्गत पागलों और मनोविकल व्यक्तियों को ग्रहण करने या उनका उपचार करने के स्थान हैं।
17. पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण।
(17क. वन।
17ख. वन्य जीवजंतुओं और पक्षियों का संरक्षण।)
18. खाद्य पदार्थों और अन्य माल का अपमिश्रण।
19. अफीम के संबंध में सूची 1 की प्रविष्टि 59 के उपबंधों के अधीन रहते हुए मादक द्रव्य और विष।
20. आर्थिक और सामाजिक योजना।
(1) (20क. जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन।)
21. वाणिज्यिक और औद्योगिक एकाधिकार, गुट और न्यास।
22. व्यापार संघ; औद्योगिक और श्रम विवाद।
23. सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा; नियोजन और बेकरी।
24. श्रमिकों का कल्याण जिसके अंतर्गत कार्य की दशाएँ, भविष्य निधि, नियोजक का दायित्व, कर्मकार प्रतिकर, अशक्तता और वार्धक्य पेंशन तथा प्रसूति सुविधाएँ हैं।
25. सूची 1 की प्रविष्टि 63, 64, 65 और 66 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, शिक्षा जिसके अंतर्गत तकनीकी शिक्षा, आयुर्विज्ञान शिक्षा और विश्वविद्यालय हैं; श्रमिकों का व्यावसायिक और तकनीकी प्रशिक्षण।)
26. विधि वृत्ति, चिकित्सा वृत्ति और अन्य वृत्तियाँ।
27. भारत और पाकिस्तान डोमिनियनों के स्थापित होने के कारण अपने मूल निवास-स्थान से विस्थापित व्यक्तियों की सहायता और पुनर्वास।
28. पूर्त कार्य और पूर्त संस्थाएँ, पूर्त और धार्मिक विन्यास और धार्मिक संस्थाएँ।
29. मानवों, जीवजंतुओं या पौधों पर प्रभाव डालने वाले संक्रामक या सांसर्गिक रोगों अथवा नाशकजीवों के एक राज्य से दूसरे राज्य में फैलने का निवारण।
30. जन्म-मरण सांख्यिकी, जिसके अंतर्गत जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण है।
31. संसद द्वारा बनाई गई विधि या विद्यमान विधि द्वारा या उसके अधीन महापत्तन घोषित पत्तनों से भिन्न पत्तन।
1. संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 57 द्वारा (3-1-1977 से) अंतःस्थापित।
2. संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 57 द्वारा (3-1-1977 से) प्रविष्टि 25 के स्थान पर प्रतिस्थापित।
32. राष्ट्रीय जलमार्गों के संबंध में सूची 1 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अंतर्देशीय जलमार्गों पर यंत्र नोदित जलयानों के संबंध में पोत परिवहन और नौपरिवहन तथा ऐसे जलमार्गों पर मार्ग का नियम और अंतर्देशीय जलमार्गों द्वारा यात्रियों और माल का वहन।
1. (१)
(क) जहाँ संसद द्वारा विधि द्वारा किसी उद्योग का संघ द्वारा नियंत्रण लोकहित में समीचीन घोषित किया जाता है वहाँ उस उद्योग के उत्पादों का और उसी प्रकार के आयात किए गए माल का ऐसे उत्पादों के रूप में,
(ख) खाद्य पदार्थों का जिनके अंतर्गत खाद्य तिलहन और तेल हैं,
(ग) पशुओं के चारे का जिसके अंतर्गत खली और अन्य सारकृत चारे हैं,
(घ) कच्ची कपास का, चाहे वह ओटी हुई हो या बिना ओटी हो, और बिनौले का, और
(ङ) कच्चे जूट का, व्यापार और वाणिज्य तथा उनका उत्पादन, प्रदाय और वितरण।)
33. क. बाट और माप, जिनके अंतर्गत मानकों का नियत किया जाना नहीं है।)
34. कीमत नियंत्रण।
35. यंत्र नोदित यान जिसके अंतर्गत वे सिद्धांत हैं जिनके अनुसार ऐसे यानों पर कर उद्‍गृहीत किया जाना है।
36. कारखाने।
37. बायलर।
38. विद्युत।
39. समाचारपत्र, पुस्तकें और मुद्रणालय।
40. (3) (संसद द्वारा बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन) राष्ट्रीय महत्व के (3) (घोषित) पुरातत्वीय स्थलों और अवशेषों से भिन्न पुरातत्वीय स्थल और अवशेष।
41. ऐसी संपत्ति की (जिसके अंतर्गत कृषि भूमि है) अभिरक्षा, प्रबंध और व्ययन जो विधि द्वारा निष्क्रांत संपत्ति घोषित की जाए।
42. संपत्ति का अर्जन और अधिग्रहण।)
43. किसी राज्य में, उस राज्य से बाहर उद̖भूत कर से संबंधित दावों और अन्य लोक माँगों की वसूली जिनके अंतर्गत भू-राजस्व की बकाया और ऐसी बकाया के रूप में वसूल की जा सकने वाली राशियाँ हैं।
44. न्यायिक स्टांपों के द्वारा संगृहीत शुल्कों या फीसों से भिन्ना स्टांप-शुल्क, किंतु इसके अंतर्गत स्टांप-शुल्क की दरें नहीं हैं।
45. सूची 2 या सूची 3 में विनिर्दिष्ट विषयों में से किसी विषय के प्रयोजनों के लिए जाँच और आँकड़े।
46. उच्चतम न्यायालय से भिन्न सभी न्यायालयों की इस सूची के विषयों में से किसी विषय के संबंध में अधिकारिता और शक्तियाँ।
47. इस सूची के विषयों में से किसी विषय के संबंध में फीस, किंतु इसके अंतर्गत किसी न्यायालय में ली जाने वाली फीस नहीं है।

अवशिष्ट शक्तियाँ-
- संविधान के अनुच्छेद 248 के अनुसार ऐसे विषय जिनका वर्णन उपर्युक्त तीन सूचियों में से किसी एक में भी अंकित नहीं किया गया है, उनके संबंध में कानून बनाने का अधिकार संघीय संसद को सौंपा गया है।
- इस संबंध में भारतीय संविधान ने कनाडा का अनुसरण किया है क्योंकि कनाडा में अवशिष्ट शक्तियाँ केन्द्र में निहित हैं। जबकि अमेरिका, आस्ट्रेलिया तथा स्विट्जरलैण्ड में अवशिष्ट विषय राज्य को प्राप्त हैं। स्वतंत्रता पूर्व 1935 के भारत शासन अधिनियम में अवशिष्ट शक्तियाँ गवर्नर जनरल में निहित थी। कोई विषय अवशिष्ट विषय है या नहीं इसके निर्धारण की न्यायालय के पास है।
2. द्वैध सरकार
- भारत में दो प्रकार की सरकारें होती हैं-
केन्द्र सरकार
राज्य सरकार।
- इस व्यवस्था में एक संविधान के माध्यम से विधायी व कार्यकारी शक्तियों को केन्द्र व राज्यों, दो स्तर पर विभाजित किया जाता है। इसके साथ ही ये अपनी शक्तियों का उपयोग करते है।

3. लिखित, कठोर व सर्वोच्च संविधान
- भारत का संविधान लिखित है जिसकी व्याख्या समय-समय पर उच्चतम न्यायालय द्वारा की जाती है और इसकी सर्वोच्चता को स्थापित किया जाता है।
- संविधान के संशोधन की प्रक्रिया को सरल और कठिन दोनों रूपों में बनाया गया है।


भारतीय संविधान के एकात्मक लक्षण-
- भारत के संविधान में अनेक ऐसे लक्षण हैं जो राज्यों के ऊपर केंद्र की प्रबलता को इंगित करते हैं।

1. इकहरी नागरिकता- केवल भारत की नागरिकता, राज्य और किसी देश की नहीं।
2. शक्तियों का बँटवारा केन्द्र के पक्ष में- केंद्र मजबूत विषयों पर कानून बनाने के लिए अधिक प्रभावी।
3. संघ और राज्यों के लिए एक ही संविधान
4. संघ सरकार राज्यों की सीमाओं के परिवर्तन में समर्थ
5. एकीकृत न्याय-व्यवस्था
6. आपातकाल में एकात्मक शासन
7. महत्वपूर्ण विषयों की एकीकृत व्यवस्था
8. राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति- राज्यों की शासन प्रणाली में दखलंदाजी का सबसे बड़ा कारण।
9. आर्थिक दृष्टि से राज्यों की दुर्बल स्थिति
10. राज्यों का राज्यसभा में असमान प्रतिनिधित्व
11. केन्द्र तथा राज्यों के मतभेदों का निवारण
12. एक राष्ट्र एक कर पर आधारित जीएसटी
13. राज्य विधानमंडलों द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए

केन्द्र-राज्य संबंध
- भारत में संघ (केन्द्र) और राज्यों के संबंधों को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है-
विधायी संबंध (अनुच्छेद 245-255)
प्रशासनिक संबंध (अनुच्छेद 256-263)

विधायी संबंध
- संविधान के भाग 11 में अनुच्छेद 245 से 255 तक केन्द्र तथा राज्यों के विधायी संबंधी से संबंधित है।
- अनुच्छेद 245- इस अनुच्छेद के तहत केंद्र की शक्ति का विस्तार अधिक है।
संसद भारत के संपूर्ण राज्य क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए विधि बना सकेगी तथा किसी राज्य का विधान मण्डल उस संपूर्ण राज्य के अलावा उसके किसी भाग के लिए विधि बना सकेगा।
- अनुच्छेद 246- संविधान की 7वीं अनुसूची में उल्लेखित विषयों पर विधि से संबंधित उल्लेख किया गया है। ये सूची निम्न है।
नोट- पूर्व में इनका वर्णन किया गया है।
- अनुच्छेद 249- यदि राज्यसभा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से यह संकल्प पारित करती है कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक या समीचीन है कि संसद राज्य-सूची में शामिल किसी विषय पर विधि बनाए, तो संसद उस विषय पर संकल्प के प्रभावी रहने तक विधि बना सकेगी।
- राज्यसभा द्वारा पारित ऐसा संकल्प एक वर्ष से अधिक समय तक प्रभावी नहीं रहेगा, परन्तु राज्यसभा जितनी बार चाहे, उपर्युक्त विधि से इस संकल्प को आगे विधि छः महीने की अवधि पूरी होने पर स्वतः समाप्त हो जाएगी।
- अनुच्छेद 250- जब देश में अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत राष्ट्रीय आपात की उद̖घोषणा लागू हो, तब संसद को राज्य-सूची में शामिल विषयों पर भारत या उसके किसी भाग के लिए विधि निर्माण का अधिकार होगा।
- अनुच्छेद 252- यदि दो या दो से अधिक राज्यों के विधानमंडल संकल्प पारित करके संसद से अनुरोध करते हैं तो संसद राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बना सकेगी। ऐसे अधिनियम का संशोधन या निरसन संसद द्वारा ही किया जा सकगा।
- अनुच्छेद 253- संसद को यह विशेष शक्ति दी गई है कि वह भारत सरकार द्वारा किसी अन्य देश के साथ की गई संधि, करार, अभिसमय या किसी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन, संगठन आदि पर किए गए किसी निर्णय को लागू करने के लिए विधि पारित कर सकती है। ऐसी विधि भारत के संपूर्ण राज्य क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए हो सकती है।
प्रशासनिक संबंध
- संविधान के अनुच्छेद 256-263 तक में केन्द्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों की चर्चा की गई है।
- अनुच्छेद 73 के अनुसार केन्द्र की प्रशासनिक शक्ति उन्हीं विषयों तक सीमित है, जिन पर संसद विधि-निर्माण की शक्ति रखती है।
- अनुच्छेद 162 के अनुसार राज्यों की भी प्रशासनिक शक्ति उन्हीं विषयों तक सीमित है, जिन पर विधि निर्माण का अधिकार राज्य विधानमण्डल को है।
- अनुच्छेद-256- राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार किया जाएगा, जिससे संसद द्वारा बनाई गई विधियों का अनुपालन सुनिश्चित हो।
संघ अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग ऐसे निर्देश देने में कर सकेगा जो भारत सरकार को आवश्यक प्रतीत होते हों।
- अनुच्छेद-257- प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार किया जाएगा कि उसके राज्य क्षेत्र में केन्द्र सरकार को अपनी कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में कोई बाधा न हो। साथ ही, केन्द्र को यह शक्ति भी दी गई है कि वह इस संबंध में राज्यों को निर्देश दे सके। इस प्रकार के निर्देश कुछ विशेष महत्व के विषयों के संबंध में दिए जा सकते हैं, जो निम्नलिखित हैं
⇒ राष्ट्रीय अथवा सैनिक महत्व के संचार साधनों के निर्माण व रख-रखाव के संबंध में।
⇒ अन्तरराज्यीय रेल परिचालन तथा उसकी परिसम्पत्तियों की रक्षा के संबन्ध में।
- अनुच्छेद-258- केन्द्र तथा राज्यों को यह शक्ति दी गई है कि वे निश्चित सीमाओं के भीतर अपने कुछ कार्य एक-दूसरे को हस्तांतरित कर सकते हैं।
- अनुच्छेद-261- संघ और प्रत्येक राज्य की सार्वजनिक क्रियाओं, अभिलेखों तथा न्यायिक कार्यवाहियों को समस्त भारतीय क्षेत्र में पूरा विश्वास और पूरी मान्यता प्रदान की जाएगी तथा भारतीय राज्य क्षेत्र के किसी भाग में किसी सिविल न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय या आदेश, उस राज्य क्षेत्र के भीतर सभी स्थानों पर निष्पादित किए जाएंगे।
- अनुच्छेद 262- संसद विधि द्वारा विभिन्न राज्यों के मध्य नदियों, घाटियों या जलाशयों आदि के जल के योग वितरण तथा नियंत्रण सम्बन्धी विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए प्रावधान कर सकती है। संसद ऐसे किसी विवाद के सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय की अधिकारिता को प्रतिनिषिद्ध भी कर सकती है।
उल्लेखनीय है कि अनु. 262 के तहत प्रदत्त शक्ति के प्रयोग में संसद द्वारा 'नदी बोर्ड अधिनियम 1956' तथा 'अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम 1956' पारित किया गया है। जल विवाद अधिनियम 1956 के तहत केन्द्र सरकार ऐसे विवादों के समाधान के लिए न्यायाधिकरण की स्थापना कर सकती है।
- अनुच्छेद 263- संविधान में अन्तर्राज्यीय परिषद के गठन का प्रावधान किया गया है। अन्तर्राज्य परिषद के गठन का अधिकार राष्ट्रपति को है।
यदि राष्ट्रपति को यह प्रतीत होता है कि ऐसे परिषद के गठन से लोकहित की सिद्धि होगी तो वह उसका गठन कर सकता है।
अन्तर्राज्यीय परिषद का गठन सर्वप्रथम वर्ष 1990 में  किया गया। प्रधानमंत्री इस परिषद का अध्यक्ष होता है। परिषद में प्रधानमंत्री तथा उसके द्वारा मनोनीत 6 कैबिनेट मंत्रियों के अतिरिक्त राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के मुख्यमंत्री व प्रशासक पदेन सदस्य होते हैं।

केन्द्र राज्यों के मध्य संघर्ष या तनाव के प्रमुख क्षेत्र-
केन्द्र-राज्यों के मध्य विवाद के प्रमुख मुद्दे निम्न हैं-
केन्द्रीय कानूनों या केन्द्रीय बल का राज्यों में तैनाती।
राजनीतिक हित से प्रेरित राष्ट्रपति शासन लागू करना।
राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इलेक्ट्रोनिक मीडिया का प्रयोग।
केन्द्र द्वारा राज्यों को दी जाने वाली सहायता से उत्पन्न विवाद।
केन्द्र व राज्यों के बीच वित्तीय हिस्सेदारी।
राज्यों के लिए वित्तीय आवंटन में भेदभाव को लेकर।
राज्यों में योजना संबंधी नीतियों को लेकर मतभेद।
राज्य सूची के विषयों पर केन्द्रीय हस्तक्षेप।
आवश्यक वस्तुओं पर केन्द्रीय नियंत्रण।
योजना आयोग की भूमिका को लेकर विवाद।
अखिल भारतीय सेवाओं के प्रबंधन को लेकर विवाद।
राज्य विधानमण्डल द्वारा पारित विधेयकों को राष्ट्रपति के लिए सुरक्षित रखना।
राज्यपाल की नियुक्ति व बर्खास्तगी से संबंधित विवाद।
मुख्यमंत्री के विरुद्ध जाँच आयोग की नियुक्ति।
नौकरशाही की भूमिका।

केंद्र-राज्य संबंधों पर प्रमुख आयोग या समितियाँ-

1. प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966)
2. राजमन्नार आयोग की सिफारिशें (वर्ष-1969-71)
3. आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (वर्ष-1973)
4. पश्चिम बंगाल सरकार का मेमोरेण्डम (वर्ष-1977)
5. सरकारिया आयोग (वर्ष-1983)
6. 'पंछी आयोग (वर्ष-2007)

प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966)
- इसका गठन 5 जनवरी, 1966 को किया गया व इस आयोग ने 1969 में रिपोर्ट सौंपी।
- प्रमुख सिफारिशें
- अन्तर्राज्यीय परिषद (अनुच्छेद 263) के गठन,
- राज्यपाल के रूप में गैरदलीय व्यक्ति की नियुक्ति,
- राज्यों के लिए अधिकतम शक्तियों का प्रत्यायोजन,
- राज्यों में केन्द्रीय सशस्त्र बल की तैनाती उनके अनुरोध पर ही की जाए।
- राज्यों को ज्यादा वित्तीय संसाधन स्थानान्तरित किये जाएँ ताकि उनकी केन्द्र पर निर्भरता कम की जा सके आदि प्रमुख सिफारिशें दीं।

राजमन्नार आयोग की सिफारिशें (वर्ष-1971)
प्रमुख सिफारिशें
- अंतर्राष्ट्रीय परिषद की स्थापना। (अनुच्छेद-263)
- वित्त आयोग को स्थायी संस्था के रूप में नियुक्त करना।
- योजना आयोग को समाप्त कर इसके स्थान पर एक सांविधिक संस्था का निर्माण।
- अनुच्छेद-356, 357, 365 जो राष्ट्रपति शासन से संबंधित है, को पूर्णतः समाप्त करना।
- संविधान के इस प्रावधान को समाप्त किया जाय, जिसमें यह उल्लिखित है, कि राज्य के मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद, राज्यपाल के प्रसाद पर्यंत पद पर बने रहेंगे।
- संघ सूची एवं समवर्ती सूची के कुछ विषय, राज्य सूची में हस्तांतरित हों।
- अवशिष्ट शक्तियाँ, राज्य सरकारों को सौंपना।
- अखिल भारतीय सेवाओं को पूर्णतः समाप्त करना।

आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (वर्ष-1973)-
प्रमुख सिफारिशें

- वर्ष-1973 में अकाली दल ने 'आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया, जिसमें केन्द्र एवं राज्य संबंधों के संदर्भ में आमूलकारी परिवर्तन करने की माँग व सुझाव, जिसमें संघ सरकार की शक्तियाँ केवल निम्न विषयों तक सीमित होनी चाहिए। जैसे-रक्षा, विदेश मामले, संचार, मुद्रा एवं बैंकिंग।
- आयोग के प्रस्तावानुसार, शेष शक्तियाँ राज्य सरकार को सौंप दिया जाय, परंतु संघ सरकार के इन माँगों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण नहीं अपनाया।
- संघ सरकार के अनुसार, ये माँगें विघटनकारी हैं। यद्यपि यह बिन्द ध्यान देने योग्य है. कि स्वायत्तता और विघटनवाद में अंतर होता है, परंतु राज्य सरकारों की आमूल-चूल परिवर्तन की माँग भी तार्किक प्रतीत नहीं होती. क्योंकि मूल समस्या राजनीतिक थी, संवैधानिक नहीं।

पश्चिम बंगाल सरकार का मेमोरेण्डम (वर्ष-1977) या ज्ञापन-
प्रमुख सिफारिशें

- पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने केन्द्र एवं राज्यों के संबंधों के विषय में संघ सरकार को एक ज्ञापन सौंपा, जिसकी माँगें निम्नलिखित थीं
- संविधान में 'यूनियन' की बजाय, 'संघ' शब्द का प्रयोग किया जाय।
- संघ सरकार की शक्तियों को केवल रक्षा, विदेश, मुद्रा, संचार और आर्थिक समन्वय तक सीमित कर दिया जाय, शेष सभी विषय, राज्य सूची में हस्तांतरित कर दिए जाँए।
- अवशिष्ट शक्तियों को राज्य सूची में रख दिया जाए।
- अनुच्छेद-356, 357, 360 को समाप्त कर दिए जाँए।
- अखिल भारतीय सेवाएँ समाप्त हों तथा भारत में केवल केन्द्रीय और राज्य सेवाएँ होनी चाहिए।
- नए राज्यों के निर्माण या राज्यों के पुनर्गठन के संदर्भ में संबंधित राज्यों की सहमति अनिवार्य हों।
- केन्द्र सरकार द्वारा अर्जित सभी प्रकार के राजस्व का 75% भाग राज्यों को सौंप दिया जाय। 80 के दशक से क्षेत्रीयता और स्वायत्तता की माँग और प्रभावी हुई तथा इस माँग पर सकारात्मक अनुक्रिया व्यक्त करते हुए, संघ सरकार ने पहली बार केन्द्र और राज्य के मध्य संबंधों पर पुनर्विचार करने के लिए वर्ष-1983 में 'सरकारिया आयोग' का गठन किया।

सरकारिया आयोग की रिपोर्ट(वर्ष-1983)
प्रमुख सिफारिशें

- सरकारिया आयोग के अनुसार, केन्द्रीयकृत नियोजन आवश्यक है।
- आयोग ने भारत में अखिल भारतीय सेवाओं को आवश्यक माना और आयोग ने तो यहाँ तक कहा, कि 'भारत में कुछ और अखिल भारतीय सेवाओं का निर्माण किया जाना चाहिए।'
- आयोग के अनुसार, राज्यपाल की संघ सरकार द्वारा नियुक्ति बिल्कुल उचित है। अनुच्छेद-200 समाप्त करने की आवश्यकता नहीं है।
- अनुच्छेद-356, 357, 360 भी संविधान में बना रहना चाहिए।
- संघ सरकार, राज्यों में सीधे केन्द्रीय सैनिक बल भेज सकता है।
- आयोग के अनुसार, अनुच्छेद-263 के प्रावधान के अनुसार, अंतर्राज्यीय परिषद् की स्थापना होनी चाहिए। इसलिए अनुशंसा के अनुरूप वर्ष-1990 में बी. पी. सिंह सरकार ने अंतर्राज्यीय परिषद् की स्थापना की।
- राज्यपाल, एक विशिष्ट व्यक्ति होना चाहिए, जिसका संबंध स्थानीय दलीय राजनीति से न हो।
- राज्यपाल का कार्यकाल 5 वर्षों का होना चाहिए। आपवादिक परिस्थिति में ही उसे समय से पूर्व हटाया जाय। लेकिन यदि उसे हटाया जाता है, तो इसके वास्तविक कारण लिखित रूप में संसद के समक्ष प्रस्तुत होना चाहिए।
- अनुच्छेद-356 का प्रयोग, अंतिम विकल्प के रूप में होना चाहिए।
- राज्य को अधिक वित्तीय शक्तियाँ प्रदान की जानी चाहिए। आयोग के अनुसार, करारोपण के संबंध में अवशिष्ट शक्तियाँ संघ में निहित होनी चाहिए। जबकि शेष अवशिष्ट शक्तियों को समवर्ती सूची में सम्मिलित किया जाना चाहिए।
- राष्ट्रीय विकास परिषद को पुनर्गठित कर, राष्ट्रीय आर्थिक विकास परिषद बनाया जाय।
- केन्द्र सरकार द्वारा आयकर पर सरचार्ज का प्रयोग नहीं करना चाहिए, यदि आवश्यक हो, तो इसका प्रयोग अपवाद स्वरूप ही होना चाहिए।
- अनुच्छेद-200 के अंतर्गत यदि राज्यपाल किसी राज्य विधेयक को राष्ट्रपति की राय के लिए आरक्षित करे, तो इस पर 4 महीने के अंदर निर्णय हो जाना चाहिए।

मदन मोहन पुंछी या पंछी आयोग (वर्ष-2007)
प्रमुख सिफारिशें

- पंछी आयोग की स्थापना वर्ष-2007 में हुई है। इन्होंने अपनी रिपोर्ट 2010 में प्रस्तुत की।
- पंछी आयोग की मान्यताएँ मूलतः सरकारिया आयोग से मिलती-जुलती हैं, लेकिन तकनीकी मामलों में दोनों में अंतर प्रतीत होता है।
- आयोग के अनुसार, अनुच्छेद-355, 356 में संशोधन होना चाहिए। उन्होंने आपात कालीन प्रावधानों के स्थानीय प्रयोग का समर्थन किया। उदाहरण के लिए, किसी जनपद के भाग में भी आपात काल लागू किया जा सकता है। उनके अनुसार, आपात काल तीन (3) महीने से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
- आयोग ने मुख्यमंत्री की नियुक्ति के संदर्भ में स्पष्ट रूप में अनुशंसा की है। आयोग के अनुसार, चुनाव पूर्व गठबंधन को एक दल माना जाय। चुनाव पूर्व सबसे बड़े गठबंधन को सरकार बनाने के लिए पहले आमंत्रित किया जाय तथा चुनाव के बाद निर्मित होने वाले गठबंधन को अंत में आमंत्रित किया जाय।
- राज्यपालों की योग्यता के संदर्भ में राय, सरकारिया आयोग की भाँति है, जिसमें कहा गया है, कि राज्यपाल के रूप में ऐसा व्यक्ति नियुक्त किया जाय, जिसका स्थानीय दलों से कोई संबंध न हो।
- आयोग ने राज्यपालों की मनमानी बर्खास्तगी की आलोचना की। आयोग के अनुसार, राज्यपालों को राजनीतिक फुटबाल की तरह प्रयोग नहीं करना चाहिए।
- आयोग ने राज्यपाल के कार्यकाल को 5 वर्ष निर्धारित करने की माँग की है।
- आयोग ने राज्यपाल को हटाने के लिए विधान सभा द्वारा महाभियोग की प्रक्रिया को स्वीकार करने की अनुशंसा की है।
- पंछी आयोग ने वर्ष-2007 में स्थापित वेकेंट चलैया आयोग की अनुशंसा का समर्थन करते हुए कहा, कि राज्यपाल की नियुक्ति एक समिति द्वारा होनी चाहिए, जिस समिति में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, लोक सभा का स्पीकर तथा संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री और उपराष्ट्रपति को भी मिल किया जा सकता है।
- आयोग ने अनुच्छेद-163(2) में विवेकाधीन शक्तियों को सीमित करने की अनुशंसा की है।
- आयोग ने अनुच्छेद-200 के अंतर्गत आरक्षित किसी भी विधेयक पर 4 महीने की अवधि में अनुमति प्रदान करने की अनुशंसा की है।
- आयोग के अनुसार, सांप्रदायिक हिंसा विधेयक में परिवर्तन करके यह प्रावधान होना चाहिए, कि केन्द्रीय सैनिक बलों को राज्य की सहमति के बिना कुछ समय के लिए तैनाती की जाय तथा तैनाती के बाद राज्य सरकार की अनुमति ली जा सकती है।
- आयोग ने आंतरिक सुरक्षा को बनाए रखने के लिए अमेरिका की भाँति 'राष्ट्रीय एकता परिषद' को ज्यादा शक्तिशाली बनाने की माँग की, जिस प्रकार अमेरिका में गृह सुरक्षा विभाग की भूमिका है।
- आयोग ने 'राष्ट्रीय एकता परिषद' को वर्ष में कम से कम एक बार सम्मेलन को अनिवार्य बताया।
- आयोग के अनुसार, भारत में राष्ट्रीय अन्वेषण एजेन्सी जैसी संस्थाओं के निर्माण की आवश्यकता है, जो आतंकवाद के संबंध में राज्यों के बीच बेहतर सहयोग सुनिश्चित करे।
- आयोग ने पंचायती नियोजन को ज्यादा प्रभावशाली बनाने की अनुशंसा की।
- आयोग ने वित्तीय स्वायत्तता का भी समर्थन किया।